Thursday, July 22, 2010

खाने को लेकर कुछ दिलचस्प किस्से


बचपन से लेकर आज तक खाने को लेकर मेरे मन में कभी पसंद-नापसंद का द्वंद्व नहीं रहा। इसका एक बड़ा कारण तो यह रहा कि छुटपन में ही मेरी राय बन चुकी थी कि खाने को लेकर पसंद-नापसंद बुर्जुआ मानसिकता की अभिव्यक्ति है। बाद में मैंने जब सर्वेश्वर की कविता पढ़ी तो अपना पक्ष और मजबूत पाया। लेकिन भात हमेशा ही मेरी कमजोरी रहा। बचपन में तो मैं भात के बगैर भोजन की कल्पना ही नहीं कर सकता था। कभी-कभी ऐसा अवसर आता तो मैं कुछ भी खाये बगैर सो जाता। ऐसा प्रायः रात में ही होता। जैसे ही मैं रात को दरवाजे पर से पढ़कर लौटता, मां से मेरा पहला सवाल होताखाना का बनैले हेंअर्थात् भोज में क्या बनायी हो। रो रात को मां से मेरा यही सवाल होता। जैसे ही उत्तर मिलता किरोटी बनी हैमैं झट मां को खटिया बिछाने कह देता।

इस बचपन की एक कहानी है। मेरे गांव में मधेसर सिंह नाम के एक सज्जन हैं। एक शाम को मैंने उनको गांव में पूआ बांटते देखा। पढ़ाई खत्म कर खाने को जब मैं घर आया तो वही पूर्वनिर्धारित रात्रिकालीन सवाल मां से किया। मनपसंद उत्तर मिलने पर मैंने आनन-फानन में खटिया बिछाने की आज्ञा जारी कर दी। भूख तो थी ही सो विमर्श में लग गया। अचानक ध्यान आया कि मधेसर सिंह वाला पूआ तो होगा ही। पूछने पर पता चला कि उसे तो पहले ही छोटे चचेरे भाइयों में से किसी एक ने चट कर रखा है। अंतिम सहारे का भी जब भरोसा रहा तो मैं सो गया। बस उस दिन से बड़े भाई अमरेन्द्र कुमार को मुझे चिढ़ाने हेतु उपयुक्त वाक्यांश हाथ लग गया-‘मधेसर वाला पूआ।मैं भात की अनुपस्थिति में जैसे ही खटिया बिछाने को कहता कि वे मां सेमधेसर का पूआदे डालने की सिफारिश कर जाते। इससे मेरा गुस्सा और भी बढ़ जाता।

दरअसल उन दिनों और आज भी मेरे गांव में दुर्गापूजा के अवसर पर चार-पांच दिनों तक पूरे गांव के लोगों एवं आसपास के गांव के ब्राह्मणों को पूआ-दूध खिलाने की परंपरा है। इस आयोजन से जुड़ी कई कहानियां हैं, एक मुझे अबतक याद है। बगल के किसी गांव के आधमनी जी (आध मन अर्थात् बीस किलो खाने के कारण उनका लोकप्रचलित नाम यही था) थे। उन्होंने जमकर खाया। कुछ इतना कि बेचारे का ठीक नाभि के पास पेट फट गया और दूध के फव्वारे निकल पड़े। घटना-स्थल पर ही मौत हो गई। मेरे यहां तो नहीं लेकिन दरभंगा-समस्तीपुर जिलों में खिला-खिलाकर मार डालने की कुलीन प्रथा रही है। वहां के लोग, जैसाकि बताते रहे हैं, भोजन के ऐसे खास आयोजनों पर पेट-भर खा लेने के बाद पैसे का लालच तक देते हैं। यानी एक लड्डू खाने पर पांच रुपये। कुछ देर तक यही क्रम चलता रहा, फिर एक लड्डू पर दस रुपये की छूट हो गई। इस तरह गरीबीजनित पैसे के लालच में कितने ही बेचारों की जान तक चली जाती रही है। कभी-कभी मेरे जेहन में आता है, इसका एक समाजशास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत करूं।

बड़े भाई (अमरेन्द्र कुमार) ने मेरे भात-प्रेम को लेकर कई किस्से बना रखे थे जिसे वे जब-तब घर के लोगों को सुनाया करते। उनलोगों के लिए यह एक तरह से मनोरंजन का जरिया था। भात को लेकर यह आसक्ति तभी कमी जब मैं अपने सबसे बड़े भाई (अखिलेश कुमार) के साथ पटना में रहने लगा। उन्हें मेरी यह आदत पसंद नहीं थी, शायद इसलिए कि भोजन में भात की अधिकता गंवई संस्कार की द्योतक मानी जाती थी। अतएव उन्होंने मेरा प्रेम निष्कंटक नहीं रहने दिया।

मैं भोजन की मात्रा भी सामान्य से थोड़ा ज्यादा लेता था। छात्रावास-जीवन के दिनों में खाना बनकर जब तैयार होता तो बड़े भाई के लिए अलग थाली या प्लेट में निकाल मैं उसी बर्तन को लेकर बैठ जाता जिसमें भोजन बनता। इसके दो कारण थे-पहला तो यह कि थाली या प्लेट की कमी होती और दूसरे, बर्तन में उतना ही शेष होता जितना मैं आसानी से चट कर सकता था। मेरी इस हरकत पर भाई साहब कहते कि उनका बनाया खाना तो कभी ज्यादा होता है और कभी कम। हालांकि इसका श्रेय वे मुझे प्रदान करने में किसी तरह की कृपणता या अनुदारता का प्रदर्शन नहीं करते।

एम. . की परीक्षा के दौरान कुछ दिनों के लिए मैंने अपने मित्र अशोक कुमार के साथ रहना प्रारंभ किया था। वैसे भी लालबाग स्थित उनके डेरे पर जाता तो बगैर खाये शायद ही कभी लौटता। एक दिन की बात है कि मैं अशोक जी के यहां खाने पर बैठा था तभी मकान-मालिक डा. सुनील कुमार पी. एम. सी. एच. से अपनी ड्यूटी पूरी कर लौटे थे। वे रात्रिकालीन ब्रश कर रहे थे। टहलते-टहलते वे हमलोगों के दस्तरखान वाले कमरे में दाखिल हो लिए। उन्होंने मुझसे पूछा-‘क्या नेताजी कुछ और चलेगा क्या ?’ मैंने भी आखिर पूछ ही लिख, ‘कुछ है क्या ?’ इस पर वे बोले किमेरे यहां तो अभी तक कोई खाया नहीं है, इसलिए सब धरा पड़ा ही है।मैंने कहा-‘तो ले आइए।उन्होंने अपने नौकर सोहराई को आवाज दी। वह भात से भरी तसली ले आया। मैंने डा. साहब से आग्रह किया किआपलोग जितना खाएंगे उतना निकालकर अलग रख लें।डा. साहब ने कहा किहमलोग फिर बना लेंगे, इसलिए आप निःसंकोच पूरा भात भी ले सकते हैं।मैंने उनसे दो-तीन बार आग्रह किया लेकिन हर बार वे अपनी इसी बात को दुहराकर मुझे निरुत्तर कर देते। अन्त में मुझे ही निर्णय लेना पड़ा। मैंने कहा, ‘तो फिर तसली को थाली में उलट दीजिए। सोहराई ने भी ऐसा ही किया। कुछ ही मिनटों में मेरी थाली का भात गायब हो गया। अलबत्त डा. साहब को नये सिरे से भोजन बनने के इंतजार में ब्रश करने की प्रक्रिया को थोड़ा लंबा करना पड़ा। इस अप्रत्याशित सदमे से बाहर आने पर डा़ साहब ने कहा, ‘नेताजी, आप बुरा माने तो एक बात कहूं। आपको एक दिन भोजन पर आमंत्रित करनेवाला था, लेकिन अब हिम्मत नहीं होती।मैंने उनके दुख को कम करने की कोशिश करते कहा किनिराश हों, आपही का तो खा रहा हूं।सोचता हूं, अब वे मिलें तो कहूं कि पहले जितना नहीं खाता मैं।

उन दिनों मेरी मित्र-मंडली में कुछ नये नाम जुड़े जिनमें एक विनय कुमार थे। उनकी उदार मेहमान नवाजी की वजह से यदा-कदा वहां भी जूठन गिरा आता। वे छात्र-जीवन में थे। अल्पाहारी भी थे; इसलिए उनके लिए भोजन की मेरी मात्रा उनमें अतिरिक्त जिज्ञासा पैदा कर देती थी। खासतौर पर वे मेरे द्वारा मुर्गे की हड्डी तक छोड़े जाने के कारण आतंकित थे। बाद में उनकी शादी हुई और एक पत्नी तथा एक नौकरी के साथ कलकत्ते में रहने लगे। शादी के बाद उन्होंने अपनी पत्नी को मेरा परिचय भी शायद इसी रूप में दे रखा था। लेक्चरशिप के साक्षात्कार हेतु मुझे और अशोक जी को वहां जाना था। विनय जी को पहले से इस बात की सूचना दी जा चुकी थी। और विनय जी ने भीसंकटका सामना करने के लिए पत्नी को तैयार कर रखा था। अतएव व्यवस्था काफी हो चुकी थी। शायद उतनी जिसका मैं वाकई हकदार नहीं था। जैसा मैं कह चुका हूं, सामान्य से थोड़ा ज्यादा खाता था। दिक्कत यह भी थी कि विनय जी सामान्य से थोड़ा कम खाते थे। अतएव जिस हिसाब से उन्होंने तैयारी कर रखी थी, मुझे विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़ लेने पड़े। वैसे मैं खाने-पीने के मामले में विनम्रता ओढ़ने की जहमत मोल नहीं लेता।
मेरे बड़े भाई ने कभी एक कहानी सुनायी थी। वे किसी होटेल में खाना खा रहे थे। वहां बी.एन. कॉलेज के कोई प्रोफेसर थे वे भी खाना खा रहे थे। भोजनोपरांत जिस कटोरी में दाल मिली थी उसमें पानी डालकर वे उसे पी गये। इस कहानी के बाद मैंने भी अपना आचरण कुछ-कुछ वैसा ही बनाया। इससे एक कदम आगे बढ़कर मैंने छिलका आदि भी फेंकना गैर-मुनासिब समझने लगा। कहना होगा कि आम, मूंगफली, केला आदि मैं छिलका के साथ ही खाने लगा। मुझे लगा, इस तरह खाने से मात्रात्मक एवं आर्थिक-दोनों ही तरह के लाभ प्राप्त होते हैं। विज्ञान की किताबों में रेसेदार भोजन के महत्व के बारे में भी पढ़ रखा था। कालक्रम से यह मेरी आदत हो गई। अब तो हालत यह हो गई है कि मैं किसी को छिलके उतारकर खाते या मुर्गे की हड्डी फेंकते देखता हूं तो मुश्किल से बर्दाश्त होती है। कुछ अच्छा नहीं लगता। गरीब देश में एक तरह की फिजूलखर्ची लगती है मुझे।

मेरी इन आदतों से लोगों को कभी-कभी परेशानी हो जाती है। तीन-चार साल पहले की बात है जब मैं मणि जी के यहां गया हुआ था। फलों का राजा आम का मौसम था, सो उन्होंने आम कटवाकर खाने को दिया। गूदा और छिलका में किसी तरह का भेदभाव किये बगैर मैं समूल खा गया। फिर हमलोग बातचीत में लग गये। अचानक मणि जी का ध्यान प्लेट की तरफ गया जो कहीं से भी जूठा होने का प्रमाण पेश नहीं कर रहा था। अंदर ही अंदर मणि जी चिंतित हो गये। मैंने उनकीदमित व्यथाउनके चेहरे पर पढ़ ली। हालांकि आश्वस्त होने खातिर उन्होंने पूछा भी। अतएव अविलब कहा, हां, हां, मैं आम खा चुका हूं। दरअसल मैं आम छिलके के साथ ही खाना पसंद करता हूं।इतना सुनने के बाद ही मणि जी का आत्मीय मन संतोष पा सका।

मेरे परिवार में मांसाहार का चलन कुछ पहले से ही रहा है। मेरे दादाजी (भुवनेश्वर सिंह) को खस्सी (बकरा) एवं मछली का पूरा चाव रहता। वे मानते थे कि खस्सी का मांस आंख की रोशनी बढ़ाने में मददगार होता है। वृद्धावस्था में, जब उनके मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ था, अक्सर कहा करते-‘एक खस्सी अगर खा लें तो बिजौरा (एक पड़ोसी गांव) तक का खपड़ा वे आसानी से गिनकर बता सकते हैं।हालांकि इस बात में वैज्ञानिक सच्चाई नहीं, मांसाहार की अतृप्त लालसा ही कुछ अधिक थी। मांस खाकर तृप्त होते उन्हें कभी नहीं पाया। मेरे सबसे छोटे चाचा (कृष्णंदन शर्मा जिनकी दिल की बीमारी से असामयिक मृत्यु हो गई) मांस बनाने एवं बांटने के एकमात्र इंचार्ज होते। मांसप्रेम में वे दादाजी पर भी बीस पड़ते थे। बनाते-बनाते उन्हें खाने की आदत थी। वितरण भी वे कुछ न्यायोचित तरीके से नहीं कर पाते थे। उनके नेतृत्व में दादाजी की तनिक आस्था नहीं थी। विश्वास तो हमलोगों का भी नहीं था, लेकिन विकल्पहीन। इसलिए किसी दिन घर में मांस बनता और खाकर हमलोग दालान पर सोने जाते तो एक अनौपचारिक मीटिंग का दृश्य बनता। दादाजी बड़ी बारीकी से एक-एक कर हम सब भाइयों से पूछते और पता करते कि कौन कितना खाया है। हमलोग तृप्त होने का अहसास कराना चाहते तो वे सहज ही अविश्वास की हंसी हंसते और बोलते, ‘हमारी थाली में तो जब गिराया तो मांस टन्न-से बोलाऔर फिर सभा भंग हो जाती।
मुर्गे का मांस खाकर वे अपने हिंदुत्व की रक्षा नहीं कर सकते थे। मुर्गे का मांस खाना मुसलमान होना था जो उन्हें तनिक पसंद था। उनके कथनों से मुसलमानों के प्रति घृणा झलकती। वे अक्सर कहते, ‘हिंदू बढ़े नेम से, मुसलमान बढ़े कुनेम से।इस कुनेम में मुर्गा खाना विशेष रूप से शामिल था। मछली के बारे में वे एक लोक प्रचलित कहावत पढ़ते-‘जे नर मछली खात है मुड़ी-पूंछ समेत। ते नर बैकुंठ जात है नाती-पोत समेत।।इसका वे जीवनपर्यंत अक्षरशः पालन करते रहे। वे मछली खाते-खाते मरे। उनकी आत्मा अब भी भटक रही होगी क्योंकि कुछ हिस्सा उनकी हथेली पर धरा रह गया था।
मांसाहार संबंधी कई वर्जनाएं मेरे बड़े भाई अखिलेश कुमार ने तोड़ी। गोमांस अथवा सूअर के मांस से उन्हें कोई परहेज नहीं रह गया था। उनकी शागिर्दी में मेरे लिए भी ये बातें विशेष महत्व या खास तवज्जो की नहीं होतीं। मसलन मैंने भी गोमांस के व्यंजन चाव से खाये। सन् 85 के आसपास हम दोनों भाई दरियापुर स्थित पटना ट्रेनिंग कॉलेज के हॉस्टल में चुके थे। वहां अब्दुल खालिक बदर नाम के एक आत्मीय सज्जन थे जो सब्जीबाग के दिलनवाज होटेल से हमलोगों के वास्ते टिकिया वगैरह ले आते। बड़े भाई तो उनके साथ बकरीद की दावत तक उड़ा आते। बदर साहब के मेजबान साथ में एक हिन्दू को पाकर जब कभी परेशान होते तो बदर साहब बेसाख्ता बोलते, अरे मियां, डरने की कोई बात नहीं। ये भी दस्तरखानी हैं और बड़े-छोटे का फर्क नहीं करते। टिकिया-कबाब तो हमलोगजकियाकी तरह लगभग रोजाना ही खाते, अलबत्त यीस्टू कभी-कभार। और उसे हमलोग बदर साहब की सिफारिश से इस्लामिया होटेल से खरीदते। जाड़े में कभी-कभार नेहारी का आनंद लूटते।

एम. . की मित्र-मंडली में शाह अहसानुद्दीन भी था। अशोक जी के लालबाग स्थित डेरे पर जाता तो उससे भी मिलना होता। उसके कमरे में साजिद नाम के दो लड़के और रहते। एक लंबे कद का तो दूसरा नाटे कद का। दूसरे को मैं छोटा साजिद कहता। वह मेरे गोमांस-प्रेम को हवा देता। मसलन शाम में नाश्ते के लिए जाता और ऐन मौके पर मैं मिल जाता तो साथ चलने का आग्रह करता। खिलाने में रुचि और उदारता दिखाता। तभी अहसान ने खलल पैदा कर दी। एक दिन उसने छोटे साजिद से आखिर कह ही दिया, ‘मियां, किस आदमी के चक्कर में तुम पड़े हो। ये गाय-बैल ही नहीं, सूअर से भी आगे जा चुके हैं।इतना सुनने के बाद उसके उत्साह की हवा निकल गई। इसके बाद उसने अपने को घोंधे की तरह अंदर को समेट लिया। और इस तरह मेराभोजनालयबंद हो गया।

कुछ साल पहले की बात है। बड़े भाई पटेल नगर का आवास छोड़कर मेरे पड़ोस में बसे थे। एक दिन जमकर बारिश हुई और कैंपस में पीले मेढ़क उछल-कूद मचाने लगे।मछुआरेके हाथ से मछली बच निकले-ऐसा कैसे संभव था। अविलंब अमरेन्द्र भैया कोशिकारजिंदा या मुर्दा पकड़ने का आदेश मिल गया। वे फौरन पानी में कूद पड़े। फिर क्या था। सारे मेढ़क पानी की बजाय किचेन में दिखने लगे-‘उभयचरहोने को चरितार्थ करते हुए। शिकार को मुट्ठी में कर बड़े भाई ने मुझे फोन से सूचित किया। वहां पहुंचा तो पाया कि घोर मांसाहारी परिवार में भी खाने की केवल दो ही थाली सजायी जा रही है। मैंने चावपूर्वक खाया। भाई साहब ने पूछाशिकार कैसा बना ?’ ‘देहाती मुर्गे और कबूतर के बीच की चीज है’, मैंने कहा। सचमुच बहुत ही स्वादिष्ट था। आज भी उसकी याद आती है तो स्वाद मुंह में घुलने लगता है। लेकिन शहरों के बारे में वे क्या जाने जिन्होंने लाहौर ही नहीं देखा।

Saturday, July 17, 2010

बिहार में सुशासन की हवा-मिठाई

यह अजीब-सी बात है कि बिहार में आये बदलाव को प्रदेश के बाहर के लोगों ने कुछ पहले जाना-समझा। इस बदलाव की धमक अमेरिका पहले पहुची, बाद को वहीं से रिडायरेक्ट होकर दुनिया के भिन्न-भिन्न कोनों में फैली। निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि बदलाव हुए हैं। बिहारवासी 'जंगल-राज' से चलकर सुशासन 'में दाखिल हो रहे हैं। ये दोनों ही 'फर्जी' नाम पत्रकारों-बुद्धिजीवियों की एक खास 'प्रजाति' के द्वारा गढ़े गये हैं। आश्चर्य होता है कि सुशासन की डुगडुगी बजाने में वही बुद्धिजीवी-पत्रकार शामिल हैं, जो 'जंगल-राज' के दिनों में 'लालू-राबड़ी ' की जीवनी तैयार करने हेतु लेखक ढूंढ रहे थे।

जंगल-राज और सुशासन में एक तात्विक अंतर है, जिसे मैं एक तटस्थ बिहारवासी होने के नाते महसूस कर सकता हूं। जंगल-राज के दिनों में सरकार उदारीकरण एवं बाजारवाद जैसी चीजों पर सखतीपूर्ण रवैया अपनाती थी। धनिकों का विरोध एवं गरीबों की भलाई स्थायी घोषणा थी उसकी। ये और बात है कि शब्द और कर्म में कभी मेल नहीं बिठाया जा सका। सुशासनी सरकार ने शब्द और कर्म की एकता दर्शायी है। यह सरकार वैश्विक पूंजी की गोद में बैठकर न केवल बातें करती है बल्कि उसके अनुपालन के लिए हर संभव प्रयास भी करती है। सूत्र रूप में कहें कि वर्तमान सरकार पूंजीपति वर्ग द्वारा तैयार उपभोक्ता माल की बिक्री की गारंटी देती है।

यह सब करने के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार की जरूरत पड ती है। अखबार इस जरूरत को आसानी से पूरा कर सकता है। इसलिए 'सरकारी' पत्रकारों की एक फौज जमा की गई। ऐसे पत्रकार अब सामयिक ज्वलंत मुद्‌दों पर न लिखकर 'कानों-कान' सुनते हैं और 'भूले-बिसरे' मुद्‌दों पर लिखते हैं। सामयिक घटनाओं पर लिखने के अपने 'खतरे' हैं। सामयिक चिंतन का 'मूड' तभी बनता है जब सरकार के नेता से असंतुष्ट विधायकों/लोगों को 'अपने पुराने घर' में वापिस लाने का इन्हें 'सरकारी फरमान' प्राप्त होता है। अखबार के मालिकों के लिए अलग से पैकेज की व्यवस्था की गई है। उनको सरकार की तरफ से मिलनेवाले विज्ञापनों में तीन-चार गुने की अप्रत्याशित वृद्वि की जा चुकी है। नतीजतन, अखबार के मालिक से लेकर नौकर-चाकर तक-सभी जनता को सुशासन की 'हवा मिठाई' बांट रहे हैं। बालिका सायकिल योजना के पक्ष में भी अखबारों/पत्रकारों ने सकारात्मक माहौल बनाने का जी-तोड़ प्रयास किया था। हमें बार-बार बताया गया कि महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह एक क्रांतिकारी प्रयास है। इसमें कई लोगों को कई तरह से कमाई का अवसर मिला। सरकार से लेकर विद्यालय के प्रधानाध्यापक तक को। सायकिल निर्माता कंपनियों को जब सिर्फ लडकियों को ही सायकिल बेचकर संतोष न हुआ तो सरकार को अपनी योजना में संशोधन लाना पड़ा जाहिर है, अब बालकों को भी सायकिल दी जा रही है। महिला सशक्तिकरण की बात कहां रही तब।

सायकिल का ही गोतिया मोटरसायकिल है। मोटरसायकिल बेचने का जरिया बेचारी पुलिस को बनना पडा। ध्यान रहे कि यह कोई आम या किफायती मोटरसायकिल नहीं है, बल्कि अपाचे टीवीएस १६० है। निश्चित रूप से इसकी खपत खुले बाजार में संभव नहीं क्योंकि इसकी कीमत अन्य आम मोटरसायकिल की तुलना में डेढ गुनी अधिक है। वर्तमान में इसकी कीमत ६१,००० रुपये है। यह सब जनता की 'सुरक्षा' और 'सुव्यवस्था' बहाल करने हेतु किया गया। हां, इससे इतना तो अवश्य हुआ कि पटना की सडकों पर पुलिस अब नजर आने लगी है! लोकतंत्र में पुलिस की 'सक्रियता' बढ जाए तो सुव्यवस्था का अंदाजा आप लगा ही सकते हैं। विधायकों को बड़ी गाडी दी गई। जनता के लिए रात-दिन एक वही तो करते हैं

शिक्षा का क्षेत्र अभी सबसे बड़ा बाजार है। इस क्षेत्र में विदेशी बड़ी कंपनियों को अवसर प्रदान करने के लिए केन्द्र सरकार भी कई गलत-सही तरीके से प्रयत्नशील है। इसलिए हमारी राज्य सरकार के पास एक 'नैतिक आधार' (वैसे अब इसकी फिक्र ही किसे है ) भी है। लगभग प्रत्येक उच्च माध्यमिक विद्यालय को पचास लाख रुपये की राशि प्रदान की गई है। इसमें कसरत-व्यायाम (जिम) के सामान से लेकर पुस्तकालय के लिए किताबों की खरीद तक शामिल है। जिम के सामान पर प्रत्येक विद्यालय को लगभग चार लाख की राशि खर्च करनी है। 'कुपोषण ' के शिकार नव नियोजित शिक्षक (उनका नियत वेतन मात्र छः हजार रुपये है। अगर सरकार की वर्तमान घोषणा को आधार बनाया जाये तो यह आठ हजार ठहरता है।) एवं अनीमिया से ग्रस्त बच्चे-बच्चियां जिमखाने से लाभ उठा सकेंगे-इसकी कल्पना मात्र क्या हास्यास्पद नहीं है ? सरकार ने यह आदेश भी पारित किया है कि प्लस टू के बच्चों को पढ़ाने के लिए पास-पड़ोस के एम. ए. पास युवकों को धरा-पकड़ा जाये और डेढ सौ रुपये की दैनिक मजदूरी देकर उन्हें उपकृत किया जाये। बिहार में लगता है, मानव संसाधन के उपयोग एवं विकास का यह 'सुशासनी नुस्खा' अपने आप मे एकदम ही 'मौलिक' विचार है। जहां तक पुस्तकालय के लिए किताबों की खरीद की बात है, वहां भी व्यापक गड़बड़ी देखी गई। एक तो सरकारी निर्देश के आलोक में टेक्स्ट बुक्स ही खरीदी गईं, और ठीक दूसरे वर्ष कक्षा नौ का पाठ्‌यक्रम बदल दिया गया। एकबारगी पुस्तकालय कूड़ाघर में तब्दील हो गया। ऐसी खरीद का आप क्या मतलब निकाल सकते हैं। दूसरी तरफ प्राथमिक विद्यालयों में सात पेजी चित्र-पुस्तकें ४०-५० रुपये में खरीदी गईं। यह सब सुशासनी सरकार के सखत निर्देशन में हुआ। यहां तक कि खरीद के लिए दुकान भी तय थी।इतना ही नहीं, प्रत्येक विद्यालय को कंप्यूटर देने की हमारी सरकार की अत्यंत 'महत्वाकांक्षी' योजना है। इस योजना को जमीन पर उतारने की दिशा में कुछ आवश्यक पहल भी हुई है। आप समझ सकते हैं कि जहां विद्यालयों में तक की सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहां कंप्यूटर देने के पीछे ''सुशासन की क्या हो सकती है। गौरतलब यह भी है कि प्रत्येक बच्चे को लैपटॉप से युक्त बनाने की अद्यतन योजना पर विमर्श जारी है। क्या मजाक है कि शिक्षक वर्ग में बगैर जूते (उनकी तनखवाह एक जोड़ी जूते के बराबर है) उपस्थित हों और बच्चे लैपटॉप पर चैटिंग करते। यह सब सुशासन ही में संभव है।

इसलिए, सुशासन के पैरोकार बुद्धिजीवियों से मेरी गुजारिश है कि वे मेरी इन बातों की तथ्यात्मक भूलों/गलतियों को बताएं, केवल सुशासन की हवा-मिठाई ही न बेचें।

Sunday, July 11, 2010

केवल एयरसेल चोर नहीं है

दूरसंचार के क्षेत्र में निजी कंपनियों की बाढ़, गलाकाटू प्रतिस्पर्द्धा एवं सरकारी नियंत्रण व हस्तक्षेप की कमी की वजह से आम जन का जीवन काफी मुश्किल हो गया है। भोले ग्राहकों को लुभाने के लिए ये अपनी कॉल-दरें तो कम कर देते हैं लेकिन अन्य तरीकों से कई गुना अधिक कीमत वसूल ले जाते हैं। मेरे पास इसके कुछ स्पष्ट उदाहरण हैं। एयरसेल का एक नंबर है मेरे पास-8083076273। पिछले तीन माह से यह डायलर ट्यून के नाम पर मासिक 30 रुपये की दर से काट रहा है। गत तीसरे माह किसी महिला कर्मचारी का फोन आया कि ‘आपको हमारी कंपनी ने एक बेहतर उपभोक्ता के रूप में चुना है, अतएव डायलर ट्यून की सुविधा मुहैया करायी जा रही है।’ मैं कुछ कहता इससे पहले धन्यवाद के साथ उसने फोन डिसकनेक्ट कर दिया। दो दिन बाद पता चला कि उसके एवज में तीस रुपये काट लिये गये हैं। कंपनी को मैंने अपना विरोध दर्ज जताया तो कहा कि ‘अच्छी चीज है, चलने दीजिए।’ मैंने इस सुविधा को तत्काल प्रभाव से बंद करने की हिदायत दी लेकिन वह रट लगाता रहा कि ‘यह सुविधा आपकी मांग पर आपको प्रदान की जा रही है।’ जब मैंने ‘अपनी मांग’ की ‘प्रामाणिकता’ (सबूत) की मांग की तो ऐसा कुछ भी उपलब्ध कराने से इनकार कर गया। आज तीसरा माह है जब फिर से उसने अपनी ‘लीला’ दुहरा दी। 8. 21 बजे सुबह एक मेसेज आया कि ‘डियर सब्स्क्राइबर, यू हैव बीन चार्ज्ड रूपीज थर्टी फॉर थर्टी डेज ऑफ सब्सक्रिप्शन फॉर डायलर ट्यून्स। एनी टाइम कॉल 53000 फॉर लेटेस्ट डायलर ट्यून्स।’ और मैंने पाया कि पुनः मेरे खाते से गाढ़ी कमाई के 30 रुपये कंपनी की जेब में चले गये। ग्राहकों को लूटने का इससे नायाब तरीका और क्या हो सकता है। बाजारवाद की यही नंगई है। ये और बात है कि एयरसेल अकेला चोर नहीं है। इसकी कथा से दूसरे का भी हाल जानें।

Saturday, July 10, 2010

...जैसे मुझे ही सम्मान मिला हो



आज ‘प्रभात खबर’ (पटना संस्करण) के मुख पृष्ठ पर हिन्दी के, और अव्वल तो बिहार के एक सुपरिचित-सुपठित कथाकार सुलभ जी की तस्वीर छपी है। तस्वीर यूके कथा सम्मान के अवसर की है। तस्वीर के नीचे लिखा है-‘खबर पृष्ठ आठ पर।’ पृष्ठ आठ को मैंने तीन बार देखा, बेटे से भी दिखवाया, लेकिन खबर नहीं थी। पत्रकारिता के वर्तमान दौर में खबर का न होना भी किसी अखबार के लिए ‘खबर’ हो सकती है। फिर इसका तो नाम ही है ‘प्रभात खबर’। गलती मेरी भी हो सकती है कि मैं सुबह के आठ बजे यह सब खोज रहा था!
कुछ दिन पहले सुलभ जी को उक्त सम्मान दिये जाने की खबर मैंने इसी अखबार में पढ़ी थी। खबर पढ़ते हुए लगा कि अरे, यह नाम अबतक छुटा हुआ था। वैसे यह नाम इतने दिनों तक छोड़ दिये जाने के लिए नहीं था। चलिए, आयोजकों ने अपनी गलती दुरुस्त कर ली। उन्हें ‘देर आए, दुरुस्त आए’ में विश्वास रहा हो शायद।
सुलभ जी एक कथाकार हैं, उससे पहले वे नाटककार हैं। मेरा मन बार-बार उन्हें एक नाटककार के रूप में देखने को करता है। उनकी कहानियों में मुझे नाटक के तत्वों का भरपूर उपयोग मिलता है। नाटकीयता के बगैर व्यंग्य की कल्पना नहीं की जा सकती। चाहे वह व्यक्ति पर व्यंग्य हो या व्यवस्था पर। विद्रूप को केवल व्यंग्य के सहारे ही बगैर अश्लील हुए प्रदर्शित किया जा सकता है। विधा के स्तर पर भी व्यंग्य और नाट्य बिल्कुल पास-पास के लगते हैं। व्यंग्य में शब्द कम हैं तो नाट्य में इससे भी कम। लेकिन असर शायद सर्वाधिक। सुलभ जी की कहानियों में जैसी नाटकीयता है, कविता में केवल आलोक धन्वा और मुक्तिबोध, शमशेर जैसे चंद नाम ही साध पाते हैं। निराला शायद स्रोत ही साबित हों।
और इन सब से ऊपर वे एक ‘मनुष्य’ हैं। एक पाठक के रूप में रचना की मेरी अपनी कसौटी है कि रचना में किसी लेखक का ‘व्यक्तित्व’ कितना बड़ा होकर आता है। रचना और रचनाकार-दोनों मुझे साथ-साथ प्रभावित करते हैं। ऐसा कभी नहीं हुआ कि रचना से प्रभावित होकर भी रचनाकार से अप्रभावित ही रहा। सुलभ जी ने दोनों ही स्तरों पर मुझे प्रभावित किया है। शायद इतना कि जब उन्हें सम्मान दिये जाने की बात पढ़ी तो लगा जैसे मुझे ही सम्मान मिला हो।

Wednesday, July 7, 2010

संस्कृति और इतिहास बोध

संस्कृति पर विमर्श प्रकारांतर से मानवजाति पर विमर्श है, क्योंकि इसके केन्द्र में वही है। अपने व्यापकतम अर्थ में संस्कृति वह सब कुछ है, जिसका निर्माण मानवजाति ने किया है और कर रही है-श्रम के औजारों से लेकर घर-गृहस्थी की वस्तुओं तक, रीति-रिवाजों और रहन-सहन के ढंग, तौर-तरीकों से लेकर विज्ञान और कला, धर्म और अनीश्वरवाद, नैतिकता और दर्शन तक। किंतु केवल इतना ही कहें तो संस्कृति की हमारी अवधारणा अथवा परिभाषा एकांगी और साथ ही भ्रामक भी होगी। इसलिए इतना भर याद रखना जरूरी है कि मानव संस्कृति का रचयिता है और साथ ही उसकी रचना भी। ऐसा कहते अथवा मानते हुए हम अपना इतिहास बोध जाग्रत कर रहे होते हैं। अर्थात् यह इतिहास का विवेक है जो हमें बताता है कि मानवजाति संस्कृति का केवल रचयिता ही नहीं है बल्कि वह खुद भी उसी की निर्मिति है। और कह लें कि हमारा इतिहास बोध भी ठीक-ठीक इसी रूप में संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।

अगर संस्कृति शब्द की व्युत्पत्ति पर गौर करें तो यह संस्कृत के बहुत पास का निकलेगा। संस्कृत का शाब्दिक अर्थ है शिष्ट और सभ्य। जो शिष्ट अथवा सभ्य नहीं है, प्राकृत है, जंगली है। बर्बरता संस्कृति की परिधि से बाहर की चीज है। जांगल युग हमारी संस्कति का पोषक नहीं, क्योंकि संस्कृति इस युग को अथवा बर्बरता की एक खास अवस्था को पारकर ही सृजित होती है। संस्कृत शब्द में संस्कार, संशोधन अथवा परिष्कार का भाव जुड़ा हुआ है। एक दूसरे तरीके से कहें तो अलगाव का भाव लिए हुए है। संस्कृत को प्राकृत से अलग करने की मुहिम शुरू हो चुकी है। भाषा के क्षेत्र में भी इसके गणित बिठाये जा रहे हैं। संस्कृत सिर्फ सभ्य और शिष्ट लोगों की भाषा बनी।

लोग अक्सर कहते पाये जाते हैं कि संस्कृत नाटकों में शूद्र और स्त्री समान रूप् से प्राकृत भाषा का प्रयोग करते पाये जाते हैं। संस्कृत केवल संभ्रांत वर्ग के लोग ही बोल पाते थे। वे इस तथ्य का हवाला भर देकर शांत हो लेते हैं। वे कभी नहीं कहते (अज्ञानतावश या भयवश ?) कि निम्न वर्ण (शूद्र) तथा स्त्रियों के संस्कृत भाषा का व्यवहार सिद्धांत रूप में भी वर्जित था। (इस विषय पर विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ेंप्राचीन भारत में वर्ण व्यवस्था और भाषा’, जन विकल्प,) नाट्यशास्त्र का लेखक भरतमुनि इसका प्रमुख सिद्धांतकार है। (संभव है, पंचम् वेद कहे जाने का यह भी एक आधार बनता हो।) प्राचीन भारत के इतिहास में यह वह काल है जब वर्चस्व की संस्कृति अपनी जड़ें जमा रही थीं। यहां हम अपनी सुविधा के लिए यह भी कह ले सकते हैं कि संस्कृत (संस्कृति एवं भाषा दोनों ही अर्थों में) वर्चस्व का भाव रहा है। वरना जिस देश में कुत्ता, सियार एवं हाथी तक के लिए संस्कृत संबोधन हैं वहां मनुष्य जाति के संभवतः सबसे बड़े वर्ग को संस्कृत बोलने से क्योंकर रोका जा रहा है ? आज भी महावत हाथी के साथ गच्छ, तिष्ठ जैसे संस्कृत क्रिया-रूपों के ही सहारे संवाद कायम कर पाता है। आज हमारे कुत्तों के नाम भले ही अंग्रेजी भाषा के हों लेकिन उनके संबोधन में उच्चरित शब्द अत्तु संस्कृत ही का है। संस्कृत भाषा के जानकार को पता है कि यह आदरार्थ प्रयुक्त है। अर्थात् आदर (सम्मान) में कहा गया शब्द जिसका भाषिक अर्थ है-‘आइए खाइए।

संस्कृति के क्षेत्र में इस तरह के अलगाव की प्रक्रिया तब शुरू होती है जब विकास की एक खास अवस्था हम तय कर चुके होते हैं। उससे पहले ऐसा करना शायद संभव भी नहीं होता। हम अपने इतिहास के अनुभवों के आधार पर देखें तो साफ होगा कि जिस आर्य अथवा वैदिक संस्कृति पर हम गर्व करते हैं (इतिहास पर गर्व करने का हमें पूरा हक है), वह अपने प्रारंभिक दिनों में ऐसी कुछ भी नहीं थी। बल्कि कहना होगा कि आर्यों का भारत आगमन यहां के मूल निवासियों की संस्कृति की तुलना में एक पिछड़ा कदम था। इसलिए अपने आरंभिक दिनों में आर्यों को जहां-कहीं भी (भाषा तक में) बेहतर और अनुकरणीय हाथ लगता, उसे वे अपनाने में तनिक संकोच करते। यहां तक कि दूसरों की पत्नियों और देवता तक को हड़प् ले जाने में कोई कोताही बरतते। निस्संदेह आर्यों को भारतीय प्रदेशों में औरतों की कमी महसूस हुई होगी। नतीजतन आर्यों के कई देवता तक को बगैर पत्नी के जीवन गुजारने को अभिशप्त होना पड़ा। संभवतः इसी कारण गोरे आर्यों की काली संतानें पैदा हो रही हैं। काले वर्ण के ऋषियों की उस दौर में बाढ़ है। इन्हीं सब बातों को लिखने के लिए मुक्तिबोध की पुस्तक भारत: इतिहास और संस्कृतिकी प्रतियां जला दी गई थीं। आर्य-रक्त की शुद्धता का दावा करनेवाले लोगों को भारतीय संस्कृति का यह विमर्श अच्छा नहीं लगता। इससे श्रेष्ठता और शिष्टता वाला भाव जाता रहता है। वे संस्कृति को एक अत्यंत गोल-मटोल अर्थ में लेना चाहते हैं, जबकि इसकी अनंत परतें हैं। एक साथ कई रूपों और धाराओं में संस्कृति प्रवहमान रहती है। इन धाराओं की आपसी टकराहट और सम्मिलन की प्रक्रिया में ही संस्कृति जीवंत बनती और सवंर्धित होती चलती है। जिस संस्कृति और कौम में टक्कर और आत्मसातीकरण की द्वैत प्रक्रिया नहीं चल रही होती अथवा ठप पड़ जाती है, उसका नष्ट होना तय है। इतिहास बोध से संपन्न व्यक्ति को मालूम है कि मानवजाति द्वारा निर्मित ऐसी कितनी ही संस्कृतियां काल के गर्भ में विलीन हो गईं, क्योकि समय की धारा को अपने अंदर समाहित नहीं कर सकीं।

संस्कृति अपने को कई रूपों में व्यक्त करती है। परंपरा और रीति-रिवाज इनमें प्रमुख हैं। जिस तरह एक बहुलतावादी समाज में संस्कृतियों की बहुलता होती है, उसी तरह परंपरा की भी बहुलता होती है। कई परंपराएं एक ही कालखं डमें साथ-साथ जीवित होती हैं। इनकी आपसी टकराहट से ही नवीनता का उन्मेष होता है। संस्कृति को एक एंतिहासिक संदर्भ में, एक निश्चित ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखने का मतलब एक स्वस्थ और समग्र दृष्टिकोण पैदा करना होता है। यानी किसी देश अथवा जाति की संस्कृति का अध्ययन अथवा उसकी आलोचना प्रस्तुत करते हुए हमें मुख्य रूप से दो बातें-निरंतरता और परिवर्तन को रेखांकित करने का प्रयास करना होता है। निरंतरता और परिवर्तन की इस विछिन्न/अविछिन्न प्रक्रिया में परंपरा संस्कृति की स्मृति होती है। जिस तरह प्रत्येक राष्ट्र और जाति की अपनी स्मृति है, ठीक उसी तरह संस्कृति अपनी परंपराओं में बसती है। मनुष्य की स्मृति में सब कुछ कैद नहीं होता। बहुत कुछ छोड़ते जाते हैं और नया ग्रहण करते जाते हैं। ठीक जैसे आदमी पुराना भूलता और नया सीखता चलता है। लेकिन सब कुछ नहीं भूलता, जबकि भूलना भी काफी अर्थवान है। मनुष्य भूलने की क्षमता खो दे तो शायद सबसे बड़ा अनर्थ हो। संस्कृति भी परंपरा का त्याग करती चलती है और नवीनता का अंगीकार। यहां इतिहास बोध यह निर्णय देता है कि परंपरा हमेशा तो त्याज्य है और ही नवीनता हमेशा ग्राह्य। कालिदास जब मालविकाग्निमित्र में कहते हैं कि जो पुराना है वह सभी सुंदर नहीं है और नया मात्र नया होने से ही निन्द्य है, तो इसी बात को वे भिन्न तरीके से कह रहे होते हैं। यह कालिदास का इतिहास जनित विवेक ही है जो परंपरा और नवीनता के बीच फर्क की पहचान करता है। किसी देश अथवा जाति के इतिहास में क्या ग्राह्य है और क्या अग्राह्य-इसका सम्यक फैसला हमारी इतिहास दृष्टि करती है। संस्कृति के अंदर सब कुछ बचा लेने लायक नहीं होता। बहुत कुछ समय की मार खाकर बेजान हो जाता है, इसलिए ग्राह्य-अग्राह्य का प्रश्न महत्वपूर्ण हो उठता है। परंपरा का वह हिस्सा जो जो वर्तमान के लिए अनुपयोगी और बेजान हो गया हो, त्याज्य है। परंपरा की ताबीज बनाकर रखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि तो संपूर्ण सुंदर है, नितांत असुंदर ही। उसमें सक्रियता भी है, प्रमाद भी, स्वार्थ भी है परमार्थ भी, संकीर्णता भी है, उदारता भी। इसलिए कालिदास का यह उद्गार कि पुराणमित्येव साधु सर्व-जो समय के बोध में सना है, हमेशा याद रखने लायक है। परंपरावादियों के लिए तो और भी, क्योंकि अतीत का उनका यह कथन हमारी परंपरा का अभिन्न हिस्सा हो चुका है, और जो वर्तमान समय में भी उतना ही सटीक है।

किंतु कहना होगा कि अपनी ही उक्ति से कालिदास ने कोई खास नसीहत नहीं ली। उन्होंने उन्हीं वर्णाश्रम अर्थों की कीर्ति बखानी जो भारतीय संस्कृति पर कालिमा का टीका सिद्ध हो चुके थे। अलबत्ता कहीं-कहीं रोष अवश्य प्रकट किया है। उनकी शकुंतला पुरुष के अधिकारों पर व्यंग्य करती है, उनकी सीता वाच्यं त्वया मदवचनात्स राजा कहकर राम को संदेश भेजती है। परंतु वास्तव में यह विद्रोह नहीं, विद्रोह की विडंबना है। शूद्र तपस्वी शम्बूक के राम द्वारा रघुवंश में मारे जाने पर महाकवि की लेखनी में बल तक नहीं पड़ता, वह स्वयं उस तपस्वी को उसके अनाचार पर धिक्कारता है। कालिदास का इतिहास-बोध-विरोध कई बार आत्म-प्रताड़ना तक को जन्म देता प्रतीत होता है। धूत कहो अवधूत कहो जैसी पंक्ति वही लिख सकता है जिसने अपने नथूनों में वर्ण व्यवस्था की संड़ांध महसूस की हो।

अज्ञेय ने शम्बूक -वध का एक नया पाठ तैयार किया-‘मैंने शम्बूक की कथा पढ़ी है। मैं उसे कभी उस अर्थ में ग्रहण नहीं कर पाया, जिस अर्थ में मुझे समझायी जाती रही है। शम्बूक वेदाध्ययन करने जा रहा था कि यज्ञ करने जा रहा था, वर्णांतर कर्म का यह छोटा-सा अपराध (छोटा ही सही, अपराध तो है ?) कदापि उस दंड का भागी नहीं था जो उसे मिला। इतना ही क्यों, यह प्रश्न कोई क्यों नहीं पूछता कि शूद्र की तपस्या में इतना बल था कि ब्राह्मण का बेटा मर जाये, तो ब्राह्मण का ब्राह्मणत्व का बल कहां चल गया था? क्या उसकी सीमा यही थी कि राजा के सामने जाकर रिरिया ले? क्यों नहीं राम ने भी उस ब्राह्मण से यह पूछा कि वह क्यों इतना हीनतेज हुआ? ’ अज्ञेय के लिए राम की तुलना में शम्बूक ज्यादा ग्राह्य है, क्योंकि शम्बूक स्थिति को, स्थितिशीलता को, परिवेश को बदलना चाहता है और राम उसे बनाये रखना चाहते हैं। संस्कृति की यह गतिशील व्याख्या इतिहास बोध और काल की मर्यादा से प्रेरित है। अत्यंत सपाट शब्दों में कह सकते हैं कि तात्कालिकता का दबाव है यह।

Wednesday, March 31, 2010

मध्यवर्गीय है दलित की अवधारणा

मैंने पाया है कि गांव में भिन्न जाति के लोगों के लिए बोली-बाजी के मुहावरे और शब्दावलियां अलग-अलग हैं। अगर हलवाहे मुसहर जाति से होते और उनको बैल दिक (परेशान) करते तो सहज ही कहते चमरे हीं दे अएबउ अर्थात् चमार को दे आएंगे। यहां यह भाव होता कि सामाजिक स्तरीकरण में मुसहर अपने को चमार जाति से श्रेष्ठ समझ रहा है। हलवाहा अगर चमार होता, तो कहता कसइबे हीं दे अएबउ। कसाई यानी इस्लाम। यहां यह गौरतलब है कि हिन्दू धर्म में चमार को अपने से हीन कोई न दिखता. जाहिर है, इसमें इस्लाम के प्रति घृणा भी समाविष्ट होती। और बात है कि अलग-अलग जातियों के लोगों को संबोधित करने के लिए अलग-अलग तरह की शब्दावली व्यवहृत होती है। गांव की पाठशाला, जहां पर ब्राह्मण शिक्षक-‘पंडितजी’, ठाकुर शिक्षक ‘बाबू साहब’ और अन्य जातियों के शिक्षक ‘मुंशीजी’ कहकर संबोधित होते हैं तथा उनके लिए अभिवादन भी अलग-अलग हैं। जैसे पंडित जी के लिए-‘‘पंडत जी पांय लागी’’, बाबू साहब के लिए-‘‘बाबू साहब जयशंकर’’ तथा मुंशी जी के लिए-‘‘मुंशी जी नमस्ते’’। (मनोज कमार मार्तंड, अस्तित्व, हंस , अगस्त, 2004, पृष्ठ, 23)।

‘श्राद्ध का भोज’ कविता में पंकज कुमार चौधरी ने गांव के श्राद्ध-भोज की एक सच्ची तस्वीर खींची है। गांवों में, जैसाकि ऐसे मौकों पर हमेशा ही होता है, सवर्णों एवं अवर्णों की अलग-अलग पांत बैठती है। गांव के सवर्ण अरबिन्द के लिए ‘अरबिन्द बाबू’ और ‘राजा भाई जी’ जैसे संबोधनों का प्रयोग है। अवर्ण पात्रों के नाम अकलूआ, चट्टूआ, बिसेसरा आदि हैं। जाति एवं सामाजिक व्यवस्था से हमारी भाषा कैसे प्रभावित होती है, कवि ने इसका खास ध्यान रखा है। कैसे एक ही व्यक्ति, जो खाद्य-सामग्री परोसनेवाला है, अरबिन्द बाबू से पूछते हुए ‘सब्जी’ शब्द का प्रयोग करता है जबकि अकलूआ, चट्टूआ, बिसेसरा से पूछते हुए ‘तरकारी’ शब्द से ही काम चलाता है। जो व्यक्ति भाषा की गहरी समझ और संवेदना रखता है, वह इन चीजों पर गौर करेगा। प्रसंगवश, मुझे निराला की कृति बिल्लेसुर बकरिहा ' की याद आ रही है। बिल्लेसुर, जैसाकि आप सब जानते हैं, विल्लेश्वर है, लेकिन बकरी चरानेवाला (बकरिहा) होने की वजह से लोगों की जुबान पर यह नाम चढ़ नहीं पाता। उपर्युक्त बातों के सहारे मैं अपनी इस बात को प्रस्थापित करने की कोशिश कर रहा हूं कि गांवों में ‘दलित समुदाय’ जैसी किसी चीज की अवधारणा का सर्वथा अभाव देखा जाता रहा है। वहां जातियां ही प्रधान हैं। और बड़ा विभाजन अगर करना चाहें तो वह सवर्ण और अवर्ण (बैकवर्ड एवं फॉरवर्ड) का है।

कई साल हुए सावित्री बाई के स्कूल की 13 साल की लड़की मुक्ताबाई ने जो निबंध लिखा था उसकी भी मुख्य अंतर्वस्तु जाति-व्यवस्था का अंतर्विरोध है। वह लड़की स्वयं मांग जाति से थी। उसका मानना है कि मुख्य अंतर्विरोध जाति व्यवस्थ का है। दलितों के अंदर भी महार और मांग में फर्क है। मांग जाति को महार की तुलना में निम्न सामाजिक हैसियत प्राप्त है। उस निबंध में दलितों के भीतर ब्राह्मणवादी सोच के अस्तित्व को दिखाते हुए लिखा कि महार भी अपने से नीचेवाले को दबाते हैं और निष्कर्षतः कहा कि इस व्यवस्था (जाति की) में सभी एक दूसरे को दबा रहे हैं। इसलिए इस बात को मान लेने का कोई आधार नहीं बनता कि दलित अपने आप में सामाजिक-सांस्कृतिक एवं आर्थिक रूप से शोषितों की एक मुकम्मल इकाई है।

ग्रामीण समाज के उलट शहरों-महानगरों में जातियों का एक तरह से लोप हुआ है। यहां समुदाय की अवधारणा जोर पकड़ रही है। पिछड़ी जातियां, दलित आदि। कहना होगा कि ये जातियों के नहीं समुदाय के नाम हैं। ‘दलित टर्म’ तो एक ‘अम्ब्रेला टर्म’ है। (सुधीश पचौरी, ‘अमरीका में ब्लैक्स को आरक्षण है’, हंस , अगस्त, 2004)। समुदाय इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में जाति के मुकाबले एक बड़ी राजनीतिक ताकत है। दलित समुदाय का जो मध्यवर्ग है, वह शहरों-महानगरों में केन्द्रित है। मध्यवर्ग को अपने दैनिक जीवन में रोज ही अपनी संगठित शक्ति का परिचय देकर अपना प्रभुत्व साबित करना होता है। इस प्रभुत्व के जरिए वे एक तरह का शक्ति-संतुलन स्थापित करते हैं। इस आधार पर वे अपनी सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक हितों की रक्षा करते हैं। आप कह ले सकते हैं कि पिछड़ी जाति एवं दलित का जो मध्यवर्ग है, वह अपने समुदाय की एकता को दिखाने की ‘राजनीति’ करते हैं। ‘दलित लेखन की राजनीति के इस चरण की सोची-समझी राजनीति जान पड़ती है। यह राजनीति एक नवोदित मध्यवर्ग द्वारा सामाजिक प्रतिष्ठा में अपने हिस्से की मांग और आभिजात्य के अर्जन से जुड़ी है...।’ (डा. अर्चना वर्मा, 'दलित लेखन सिर्फ एक वर्गीकरण है', हंस , अगस्त, 2004)। यह वर्ग अपने समुदाय के लोगों के बीच यह ‘मिथ्या चेतना’ पैदा करने, अथवा गढ़ने की कोशिश करता है कि उस जातीय समुदाय के सारे लोगों के सामाजिक-सांस्कृतिक स्वार्थ एक-से हैं। आर्थिक हितों की शायद ही यह दलित मध्यवर्ग चर्चा करता है क्योंकि ऐसा करने पर उनकी आपसी ‘नैसर्गिक एकता’ की कलई खुल सकती है!

दलितों के बीच मध्यवर्ग के निर्माण की प्रक्रिया अम्बेदकर के जमाने में ही शुरू हो चुकी थी. लेकिन कहना होगा कि एक राजनीतिक ताकत के रूप में उसका बहुत ही सीमित उपयोग संभव था। इसी बात को दलित चिंतक चन्द्रभान प्रसाद दूसरे शब्दों में कुछ इस तरह कहते हैं-‘दलितों में आज मध्यवर्ग का उदय हो रहा है, अपने शैशव अवस्था में है। आज का यही दलित शिशु यदि डॉ. अम्बेडकर के समय में उदित हो चुका होता, तो तस्वीर निर्णायक रूप से भिन्न हो चुकी होती, अपने जीवन काल में ही वे वह लड़ाई जीत चुके होते, जिसे हम उनका सपना मानते हैं।’ ('बौद्धिकता के अंकुर अभिजात वर्ग से', हंस , अगस्त, 2004)। उस जमाने में मध्यवर्ग हिदुओं एवं मुसलमानों के बीच ही उभर सका था। हिन्दू-मुस्लिम मध्यवर्ग का अंतर्विरोध ही प्रमुख था। शायद इसीलिए अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने इन्हीं दोनों के बीच के अंतर्विरोध एवं आपसी तनाव को गहरा करने की कोशिश की। हालांकि वे इस बात से नावाकिफ नहीं थे कि भारतीय समाज की एकता को तोड़ने के लिए दलित मध्यवर्ग का इस्तेमाल भी संभव है। बल्कि यहां यह जोड़ देना मुनासिब लगता है कि साम्राज्यवादी ताकतें इस दिशा में पहल ले चुकी थीं। ‘पहली आम जनगणना 1881 में जातियों और प्रजातियों की सूची बनी। 1891 में उच्च और निम्न जाति के रूप में वर्गीकरण हुए। 1901 में उच्च जाति हिन्दुओं ने जाति उल्लेख का तीव्र विरोध किया। 1911 की जनगणना में उन जातियों और उन कबीलों की अलग-अलग गणना की, जो ब्राह्मणों की श्रेष्ठता और, वेदों की सत्ता को नहीं मानते, बड़े-बड़े हिंदू देवी-देवताओं और गाय की पूजा नहीं करते, जो गोमांस खाते हैं।’(श्यौराजसिंह बेचैन, 'सत्ता-विमर्श और दलित', हंस , अगस्त, 2004)। इसके साथ ही वे सामाजिक व्यवस्था में छोटी-बड़ी जातियों का अपने हिसाब से श्रेणीक्रम निर्धारित करने की ‘राजनीति’ भी करते। कहते चलें कि इस साजिश में उनकी न्याय-व्यवस्था भी शामिल थी। और तो और वे ठीक मुसलमानों की तरह दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की भी व्यवस्था कर चुकनेवाले थे। ये सब करने के पीछे उनकी एक सोची-समझी राजनीति थी-‘फूट डालो और शासन करो।’ क्या यह तथ्य भी मतलब से खाली है कि अंग्रेजी साम्राज्यवाद के दिनों में सबसे अधिक संख्या में किताबें भारत की जाति व्यवस्था पर ही लिखी गईं ?

आज के दलित चिंतक यह कहते हुए कि अंग्रेज देर से आए और जल्दी चले गए’, कोई नई बात नहीं कर रहे होते। यह कोई चौंकानेवाली बात भी नहीं है। दरअसल भारत का जो उच्च मध्यवर्ग रहा है, चाहे वह हिदू, मुस्लिम या दलित ही क्यों न रहा हो, अंग्रेजी राज के बने रहने में ही अपना उद्धार देखा है। हिन्दू मध्यवर्ग 1857 की क्रांति से अपने को अगर विलग रखता है तो शायद इसीलिए कि अंग्रेजी राज में ही अपना भविष्य तलाश रहा था . यह और कोई नहीं अंग्रेजी पढ़ा उच्च मध्यवर्ग था। (पवन के वर्मा, बिकमिंग इंडियन ,) उनका स्पष्ट मानना था कि भारत का आधुनिकीकरण अंग्रेजों के बगैर संभव नहीं हो सकता। इतना ही नहीं, वे आधुनिकता के इस जोश में पश्चिम की हर अच्छी-बुरी चीज को अपना रहे थे और उसी प्रक्रिया में भारत की हर अच्छी-बुरी चीज का विरोध भी कर रहे थे। कुछ लोग तिलक के यहां जो स्वदेशी और भारतीयता पर कभी-कभी ‘अनावश्यक’ जोर देखते हैं, उसकी वजह शायद यही है कि वे भारतीय राजनीति में निम्न मध्यवर्ग के प्रतिनिधि नेता थे जो कहीं न कहीं उच्च मध्यवर्ग की जो पश्चिमपरस्ती (या कि राजभक्ति ?) थी, उसकी एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया भी थी। मुस्लिम मध्यवर्ग इस भूमिका में बाद में आए क्योंकि उनके बीच मध्यवर्ग का निर्माण हिन्दुओं की तुलना में अपेक्षाकृत विलंब से हुआ। वहां भी जिन्ना और अबुल कलाम आजाद की धारा है। जिन्ना शायद इतने आधुनिक या कि पश्चिमपरस्त हैं कि लगभगअभारतीयहैं गांधी ने नेहरु और जिन्ना में फर्क बताते हुए कहा था कि दोनों ही बड़े राजनेता हैं लेकिन नेहरु साथ ही एक बड़े देशभक्त भी हैं। दलित मध्यवर्ग और भी देर से पैदा हुआ। बल्कि कहना चाहिए कि दलितों के बीच मध्यवर्ग का व्यापक उभार केवल अभी ही देखने में आया है।

मुस्लिम मध्यवर्ग की ताकत का उपयोग भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की एकता को कमजोर करने हेतु अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने किया तो दलित मध्यवर्ग के वर्तमान उभार को अमरीकी नव उपनिवेशवाद ने वर्ग संघर्ष की अवधारणा को कमजोर करने के लिए किया। आज विमर्श की जो आंधी चली है-यथा दलित विमर्श, नारी विमर्श, पर्यावरण विमर्श या फिर उत्तर आधुनिकता का विमर्श ही क्यों न हो-सभी वर्गीय चेतना को कमजोर बनाने के वैश्विक हथकंडों को अमरीकी फंडिंग जारी है। अकारण नहीं है कि दलित बुद्धिजीवियों को चुन-चुनकर फोर्ड फाउंडेशन के फेलोशिप प्रदान किये जा रहे हैं। इन सबमें कहीं न कहीं एक अंतःसूत्रता है जिसकी गहरे में जाकर खोज की जानी चाहिए।

Monday, March 15, 2010

ऐसी खुशफहमी भी ठीक नहीं है, जोशी जी...!



जनसत्ता (6 दिसंबर, 2009) में प्रकाशित मेरे लेख ‘कला-आलोचना की भाषा’ (http://matmatantar.blogspot.com/2010/01/blog-post_08.html) पर दो बिल्कुल ही भिन्न तरह की प्रतिक्रिया दो भिन्न रूपों में आईं। पहली अलिखित, लेकिन दूसरी लिखित।

मैं अपना छपा लेख देख-पढ़ भी न पाया था (पटने में अखबार शाम में उपलब्ध हो पाता है) कि रामसुजान अमर जी (दिल्ली) का फोन आया कि ‘आपके लेख से जनसत्ता पढ़ना शुरू कर रहा हूं। लेख अच्छा है। आपकी चिंता में मेरी चिंता भी शामिल है।’(स्थानीय मित्र डॉ अशोक कुमार की भी ठीक यही प्रतिक्रिया थी)। रामसुजान जी ने फोन ही पर लगभग आध घंटे से भी ज्यादा समय तक एक तरह से चित्रकला आलोचना के इतिहास के बारे में बताया। इस विषय पर उनकी हालांकि तात्कालिक प्रतिक्रिया ही थी, लेकिन जानकारी इतनी समृद्ध कि लेख लिख कर भी मैं अपने को बौना महसूस कर रहा था।

दूसरी प्रतिक्रिया ज्योतिष जोशी जी की जनसत्ता (10 जनवरी, 2010) ही में प्रकाशित लेख की शक्ल में है। इस प्रतिक्रिया को पढ़ने पर मुझे लगा कि जोशी जी को कला आलोचना की ‘भाषा’ गढ़ने की चिंता कम, दूसरी चीजों की ज्यादा है। उन्हें अगर मेरा विश्लेषण ‘सतही’ लगा है, तो इसके ‘वाजिब’ कारण हैं। पहला तो यही कि मैंने ‘एक-दो’ समीक्षकों का ही नामोल्लेख किया है, वह भी ‘कोप के बहाने।’

यह सच है कि जोशी जी को मैं एक कला-समीक्षक के बतौर पढ़ता रहा हूं। अलबत्ता नामोल्लेख में मुझसे ‘भूल’ हो गई। हालांकि जोशी जी को ‘राहत’ की सांस लेनी चाहिए थी, क्योंकि वे मेरे ‘कोप’ का ‘शिकार’ होने से बच गए। ‘अखबार में नाम’ ही महत्त्वपूर्ण है, मुझे अगर पहले से इसकी थोड़ी भी ‘समझदारी’ या ‘दुनियादारी’ होती तो, सच कहता हूं, आपका ‘कोपभाजन’ बनना मैं कभी स्वीकार नहीं करता।

जोशी जी को लगा कि मैंने ‘पुष्ट परंपरा/विराट परंपरा’ की चर्चा नहीं की। चर्चा तो स्वयं जोशी जी भी नहीं कर पाए। मुझे अपनी ‘अक्षमता’ का अहसास पहले से था, जोशी जी को अब जाकर होगा। श्रीमान जोशी की राय में, ‘कलाओं में चित्रकला के सृजन की परंपरा उतनी ही पुरानी है, जितनी कला चिंतन की परंपरा। यह परंपरा संस्कृत से प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में गई...।’ और यह परंपरा निःसृत होती है ‘वेद’ से। हालांकि जोशी जी की यह कोई मौलिक स्थापना नहीं है। बुद्धिजीवियों का बाजाब्ता एक ‘गिरोह’ ही है जो कला तो क्या ‘सापेक्षतावाद’ एवं ‘विकासवाद’ तक को वेद ही में ढूंढ़ लेता है। (देखें, मीरा नंदा, ‘पोस्ट मॉडर्निज्म, हिन्दू नेशनलिज्म एंड वेदिक सायंस’, फ्रंटलाइन, 15 जनवरी, 2004, पृष्ठ-78।) कहूं कि जोशी जी ‘विराट परंपरा’ की बात तो करते हैं, लेकिन चीजों पर विचार करते समय उनकी ‘विराटता’ के दर्शन नहीं होते। वेद की ‘लक्ष्मण-रेखा’ पार नहीं कर पाते। इसमें बहुत हद तक उनका दोष नहीं है, दोष उस विचार-धारा का है, जिसके अनुयायी परंपरा जैसी गंभीर चीजों पर इतने ‘एकांगी’ और ‘पारंपरिक’ ढंग से विचार करते हैं कि ‘परंपरावादी’ होने की बू आने लगती है।

मेरे लिए तो चित्रकला की ‘विराट परंपरा’ प्रागैतिहासिक काल से शुरू होती है। आदिमानव के अस्तित्त्व के साथ चित्रकला भी जुड़ी हुई है। बल्कि आदिमानव को ‘मानव’ बनाने में कहीं न कहीं इस कला की सार्थक भूमिका की मैं तलाश करता हूं। ये और बात है कि आदिमानव का जो ‘कला-विमर्श’ रहा होगा, उसके प्रतिमान, ‘सौंदर्यशास्त्रीय’ की अपेक्षा ‘उपयोगितावादी’ मूल्यों से अधिक प्रेरित/प्रभावित रहे होंगे।

जोशी जी परंपरा की धार में बहते अतिशयोक्तिपूर्ण वक्तव्य देते चलते हैं। उन्हें इस बात का इलहाम है कि ‘साहित्यकारों द्वारा कला-आलोचना के क्षेत्र में काम करने की परंपरा हिंदी ही नहीं, दुनिया की हर भाषा में मिलती है।’ लेकिन ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी से लेकर अशोक वाजपेयी’ तक के ‘अनेक कलाविद’ के जो नाम गिनाए गए हैं, वे ‘किसी भी एक भाषा को आसानी से मयस्सर नहीं होते, जो हिंदी को हुए।’ कोई पाठक जोशी जी से पूछ ले सकता है कि ‘अभिव्यंजनावाद से लेकर प्रभाववाद’ तक जो कला-आंदोलन हुए हैं, वे भी आखिर किसी न किसी भाषा ही में हुए हैं, तो उनके अपने महावीर प्रसाद द्विवेदी या अशोक वाजपेयी नहीं रहे होंगे क्या? जोशी जी को यह स्पष्ट तरीके से मालूम है कि ‘ये आंदोलन वायवीय नहीं थे।’ वैसे, मेरे जानते कोई भी आंदोलन वायवीय नहीं होता।

जोशी जी अपने ही ‘यक्ष-प्रश्न’ से परेशान हैं कि ‘जब भाषा साहित्यकार को ही आती है (जोर हमारा) तो आलोचना लिखेगा कौन?’ इस कथन के पूर्वार्ध पर अगर विश्वास कर लिया जाए तो क्या चित्रकला या नाटक की भाषा के लिए कोई भी संभावना बची रहती है? शायद नहीं, क्योंकि श्रीमान जोशी शब्द-रूप के बगैर भाषा की कल्पना ही नहीं कर पाते। वे धन्य हैं जो प्रकृति की ‘मौन की भाषा’ भी समझ लेते हैं। बल्कि मैं तो बचपन से पढ़ता आ रहा हूं कि भाषा मनुष्य मात्र की पहचान या उपलब्धि है। जो सचमुच में साहित्यकार हैं, वे भाषा तांगे वाले या हल चलाने वाले से भी सीखते हैं। एक बच्चे से भी सीखनी होती है भाषा।

जाहिर है, जोशी जी अगर ‘साहित्यकार’ हैं तो भाषा पर उनका ‘एकाधिकार’ है। हालांकि उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के दौर में ऐसी खुशफहमी कुछ ठीक नहीं है,जोशी जी!