Sunday, October 4, 2026

इतिहास और अफवाह

अफवाह, इतिहास नहीं है किंतु इतिहास-निर्माण-प्रक्रिया में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका से इनकार करना असंभव है। हमारे महापुरुष जितना इतिहास की किताबों में हैं, अफवाहों में उससे तनिक कम नहीं हैं। नेहरू ने इसका हाल कुछ इस तरह बयान किया है, ‘मुझे पता लगा कि मेरे पिताजी और मेरे बारे में एक बहुत प्रचलित दंतकथा यह है कि हम हर हफ्ते अपने कपड़े पैरिस की किसी लॉन्ड्री में धुलने को भेजते थे। हमने कई बार इसका खण्डन किया है, फिर भी यह बात प्रचलित है ही। इससे ज्यादा अजीब बाहियात बात की कल्पना भी मैं नहीं कर सकता।’ और आगे, ‘इसी तरह से एक दूसरी दंतकथा, जोकि इन्कार करने पर भी प्रचलित है यह है कि मैं प्रिंस ऑफ वेल्स के साथ स्कूल में पढ़ता था। सच बात तो यह है कि न तो स्कूल में ही उनके साथ पढ़ा हूँ और न मुझे उनसे मिलने या बात करने का ही मौका हुआ है।’ यह भी कि ‘नौजवान स्त्री-पुरुषों का तो, एक प्रकार से, मैं नायक बन गया था। और उनकी निगाह में मेरे आसपास कुछ वीरता की आभा दिखाई पड़ती थी, मेरे बारे में गाने तैयार हो गये थे और ऐसी-ऐसी अनहोनी कहानियाँ गढ़ ली गई थीं, जिन्हें सुनकर हंसी आती थी।’ 

अंग्रेजी राज में एक अन्य प्रचारित अफवाह की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए नेहरू ने लिखा था, ‘अखबारों में एक बे-सिर पैर की खबर निकली थी, और हालाँकि उसका खंडन किया जा चुका है, फिर भी वह समय-समय पर प्रकाशित होती रहती है। वह यह कि उस वक्त के यू. पी. के गवर्नर सर हारकोर्ट बटलर ने जेल में मेरे पिताजी के पास शेम्पेन शराब भेजी। सच तो यह है कि सर हारकोर्ट ने पिताजी के लिए जेल में कुछ नहीं भेजा, और न किसी दूसरे ने ही शेम्पेन या दूसरी कोई नशीली चीज भेजी। वास्तव में कांग्रेस के असहयोग को अपना लेने के बाद, 1920 से, उन्होंने शराब वगैरा पीना सब छोड़ दिया था, और उस वक्त वह कोई ऐसी चीज नहीं पीते थे।

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के दिनों में एक अखबार में रिपोर्ट छपी थी जिसमें कहा गया था कि ‘गांधीजी के पास अपार दौलत है, जो कई करोड़ होगी’। जब गांधीजी 1931 में यूरोप रवाना हुए, तब उसके बाद फौरन ही, जवाहरलाल नेहरू ने पेरिस के एक प्रसिद्ध संवाददाता का एक लेख पढ़ा था। उन दिनों वह लंदन के एक अखबार का संवाददाता था। उसका वह लेख हिंदुस्तान के बारे में था। उस लेख में एक ऐसी घटना का जिक्र था, जो उसके कहने के मुताबिक, 1921 में उस वक्त हुई जब असहयोग के दौरान में प्रिंस ऑफ वेल्स ने यहां दौरा किया था। उसमें कहा गया था कि ‘किसी जगह (शायद वह दिल्ली थी), महात्मा गांधी एकाएक, जैसे नाटक में होता है, बिना इत्तिला के ही, युवराज के सामने जा पहुंचे और उन्होंने घुटने टेककर युवराज के पैर पकड़ लिये और ढाड़ मार-मारकर रोते हुए उनसे विनती की कि इस अभागे देश को शांति दीजिए।’ यह प्रसिद्ध पत्रकार 'डेली हैरल्ड' के स्लोकोम्ब थे। ‘गांधीजी जब विलायत गये तब फ्रांस में वह उनसे मिले थे और उन्होंने गांधीजी से कबूल किया था कि यह बात बिल्कुल मनगढ़ंत थी और उसके लिए माफी भी मांगी थी।’ 

गाँधीजी के चंपारण पहुंचने पर विरोधियों ने यह मशहूर कर दिया कि लोग गाँधी जी की वजह से इस कदर शोख हो गए हैं कि कोठी तक जलाना शुरू कर दिये हैं। अफवाह को सच साबित करने के लिए अंग्रेजों ने फूस की एक झोंपडी में आग लगा दी और "कोठी जलने की खबर बहुत अतिरंजित भाषा में 'स्टेट्समैन' आदि अखबारों में छपी भी।" बापू को आग लगने की खबर मिली तो तुरंत ही श्री विंध्यवासिनी प्रसाद को (जो गोरखपुर में वकालत करते थे और ब्रजकिशोर बाबू के सगे रिश्तेमंदों में से थे) इसकी तहकीकात के लिए भेजा। वहाँ जाकर उन्होंने बहुत विस्तारपूर्वक सारी बातों को जाँच की। पता चला कि यह आग कोठीवालों की ओर से ही लगाई गई थी और आग लगाने के पहले घर के अंदर की सारी चीजें हटा दी गई थीं। यहाँ तक कि लकड़ी के चौकठ, किवाड़, धरन इत्यादि भी घर के अंदर जली हुई चीजों में नहीं पाए गए। इन सामानों को भी बाहर निकालकर ही लाग लगाई गई थी। महात्मा जी ने इस रिपोर्ट को पढ़ा तो तुरंत ही इसकी कापी मजिस्ट्रेट के पास भेज दी और इसी आशय का एक छोटा-सा नोट अखबारों में छपने के लिए भेज दिया। (अनुग्रह नारायण सिंह, मेरे संस्मरण, पृष्ठ 27)

यहां यह जानना दिलचस्प है कि फणीश्वरनाथ रेणु का ‘मैला आँचल’ उपन्यास भी एक अफवाह के साथ शुरू होता है-‘यद्यपि 1942 के जन-आंदोलन के समय इस गांव में न तो फौजियों का कोई उत्पात हुआ था और न आंदोलन की लहर ही गांव तक पहुंच पाई थी, किंतु जिले भर की घटनाओं की खबर अफवाहों के रूप में यहां तक जरूर पहुंची थी।’ और अफवाह थी कि ‘मोगलाही टीशन पर गोरा सिपाही एक मोदी की बेटी को उठाकर ले गए। इसी को लेकर सिख और गोरे सिपाहियों में लड़ाई हो गई, गोली चल गई। ढोलबाजा में पूरे गांव को घेरकर आग लगा दी गई, एक बच्चा भी बचकर नहीं निकल सका। मुसहरू के ससुर ने अपनी आंखों से देखा था-ठीक आग में भूनी गई मछलियों की तरह लोगों की लाशें महीनों पड़ी रहीं, कौआ भी नहीं खा सकता था; मलेटरी का पहरा था। मुसहरू के ससुर का भतीजा फारबिस साहब का खानसामा है; वह झूठ बोलेगा?’  

कहने की जरूरत नहीं कि अफवाहों के सबसे ज्यादा किस्से महात्मा गांधी को लेकर हैं। शाहिद अमीन एवं हसन इमाम ने गांधी की ‘चमत्कारी’ शक्तियों से संबंधित कुछ रोचक बातों का उल्लेख करते हुए कहा है कि ये चमत्कारी शक्तियाँ ही गांधी को महात्मा बनाती हैं। लोग मानते थे कि गांधी को उनकी इच्छा के विरुद्ध अंग्रेजी सरकार भी जेल में बंद नहीं रख सकती थी, कि उनमें ‘चमत्कारी’ शक्ति थी और वे इस शक्ति की बदौलत जब चाहते थे जेल का फाटक खुल जाता था और वे बाहर निकल जाते थे। इसी आशय का एक हरियाणवी लोकगीत है-‘एक जलेबी तेल में।/गांधी भेज्या जेल में।।/जेल का फाटक गिया टूट।/गांधी आया फोरन छूट।।’ सतीनाथ भादुड़ी का उपन्यास ‘ढोडायचरितमानस’ भी इस लोकधारणा का उल्लेख करता है, ‘‘सहसा खबर आती है कि गान्ही बाबा जिरानिया आ रहे हैं ‘साभा’ करने। उन्हें थोड़े ही कोई जेल में भर्ती कर रख सकता है! एक ही मन्तर से वे ताला और दीवाल तोड़कर बाहर चले आते हैं।’ ताना भगत, गांधी के अनन्य अनुयायी थे। उनकी धारणा थी कि गांधीजी की अहिंसा के प्रताप से सांप भी हिंसा पर उतारू नहीं हो सकता। अपने इसी विश्वास के बल पर उन्होंने अपने घर में विषैले सांप पाल रखे थे। करीब डेढ़ सौ विषैले सांप वे अपने मकान में टोकरी के अंदर रखते थे। ‘मैला आँचल’ में मठ के महंथ सेवादास को ‘सतगुरु साहेब’ सपने में दर्शन देते हैं और गांधीजी की पैरवी करते हैं। कहते हैं, ‘तुम्हारे गाँव में परमारथ का कारज हो रहा है और तुमको मालूम नहीं? गाँधी तो मेरा ही भगत है। गाँधी इस गाँव में इसपिताल खोलकर परमारथ का कारज कर रहा है। तुम सारे गाँव को एक भंडारा दे दो।’ 

आमजन के बीच गांधीजी की छवि ‘करुणा के अवतार’ की थी। वे ‘इतने बड़े संत हैं कि आँगन के कोने का सरसों का पौधा अगर झाड़ू से दब जाय, तो उनका दिल रो उठता है।’ ‘मैला आँचल’ की लक्ष्मी कोठारिन बालदेव जी को समझाती है, ‘महतमा जी के पंथ को मत छोड़िए, बालदेव जी! महतमा जी अवतारी पुरुख हैं। ...जिस नैन से महतमा जी का दरसन किया है उसमें पाप को मत पैसने दीजिए। जिस कान से महतमा जी के उपदेस को सरबन किया है, उसमें माया की मीठी बोली को मत जाने दीजिए। महतमा जी सतगुरु के भगत हैं।’ बालदेव जी, गांधी के भक्त हैं। इतने बड़े कि उन पर ‘कभी-कभी महतमा जी का भर (देवी-देवता का सवार होना) होता है। चुन्नी गोसाईं को तो रोज भोर को होता है।’ गांधीजी की मृत्यु पर कमली की मां कहती है, ‘वे तो नर-रूप धारन कर आए थे...लीला दिखाकर चले गए।’ ‘ढोडायचरितमानस’ का बाबूलाल सबको समझा रहा है, ‘गान्ही बाबा बड़ा गुणी आदमी हैं। ...गान्ही बाबा मांस-मछली, नशा-भाँग से परहेज रखते हैं। शादी-ब्याह नहीं किया है, नंगे रहते हैं।’ ये क्या! ‘रबिया पागल की तरह चिल्लाता दौड़ा आ रहा है-कोंहड़े के ऊपर गान्ही बाबा! ...कोंहड़े के छिलके पर गान्ही बाबा की मूरत अंकित हो गई है।’ और अब तो रेबन गुनी कोंहड़े को प्रणाम करता है। फिर चिल्लाकर कह उठता है-‘लोहा मान लिया, लोहा मान लिया मैंने गान्ही बाबा का।’ ‘कलियुग के रघुनाथ हैं महात्माजी।’ 

मेरीगंज से पुरैनिया जुलूस में जा रहे लोगों को पता है कि ‘जिसके हाथ में गन्ही महतमा का झंडा रहता है, उससे गाटबाबू, चिकिहरबाबू, टिकस नहीं माँगता है।’ 

1921 में फैजाबाद जिले में कुछ किसानों ने एक ताल्लुकेदार का माल असबाब लूट लिया। इन गरीब किसानों से कहा गया था कि महात्मा गांधी चाहते हैं कि वे लूट लें; और उन्होंने ‘महात्मा गांधी की जय!’ का नारा लगाते हुए इस 'आदेश का पालन' किया। और इस जनता को गांधी के बारे में कोई जानकारी नहीं है-‘कहाँ रहते हैं महात्माजी!...पक्की जहां खत्म हुई है, उससे भी काफी दूर, मुंगेर तारापुर, अयोध्या जी से भी दूर।’ 

1917 में गांधी जब चंपारण आए तो ‘चमत्कारी शक्तियां’ भी उनके साथ आयीं। गांधी का ‘नया मालिक’ के रूप में स्वागत किया गया। राजकुमार शुक्ल ने प्रचारित किया कि वे ‘ईश्वर का अवतार’ हैं तथा गोरे अंग्रेजों से भारतमाता की मुक्ति के लिए भेजे गये हैं। किसान मानकर चल रहे थे कि किसी ‘भगवान’ ही को ‘बड़का बड़का वकील लोग’ का समर्थन प्राप्त हो सकता है जिनके पास अबतक अपना दुखड़ा रोने के लिए भी उन्हें फीस की मोटी रकम देनी पड़ रही थी। डी. जी. तेंदुलकर बिहार के एक गांव की ऐसी ही मजेदार कहानी का जिक्र करते हैं। एक बुढ़िया गांधीजी के समीप आई और बोली-‘महाराज, मेरी उम्र 104 वर्ष की है और आंखों की नजर धुंधली हो चुकी है। मैंने बहुत सारे तीर्थस्थानों का भ्रमण किया है। मेरे खुद के घर में दो मंदिर स्थापित हैं। मेरे जानते राम और कृष्ण-दो ही अवतार थे। मैंने सुना है कि अब गांधी भी एक अवतार हैं। जबतक मैं उन्हें देख नहीं लेती हूं, मेरे प्राण अंटके रहेंगे।’ 

चंपारण पहुंचकर गांधी ने खुद स्वीकार किया कि ‘शायद ईश्वर ने मुझे निमित्त बनाया’। बेतिया के आसपास के इलाकों में पेड़-पौधों से लेकर छप्पर के कोंहड़ा-कद्दू तक पर गांधी की आकृति उभरने लगी। इन सब की जड़ में लोगों का यह विश्वास था कि गांधी कोई साधारण आदमी नहीं बल्कि ‘अवतारी पुरुष’ हैं। गांधी को आदमी से अवतारी पुरुष बनाने में अफवाह की खासी भूमिका रही है-‘गांधी कहै, गांधी कहै, मन चित्त लाइको।/गंगा सरजू चाहे कूपा पर नहाइ के।/लिहले अवतार एही देशवा में आइ के।’ महात्मा गांधी को अवतार मानकर उनकी तुलना राम और कृष्ण से की गई है। राम के साथ वानर सेना और लक्ष्मण थे। श्रीकृष्ण के ग्वाल-बाल तथा बलराम थे। गांधी के साथ जनता है और जवाहर हैं। रावण और कंसरूपी अन्यायी राज्य को हटाने ही गांधी आए हैं-‘अवतार महात्मा गांधी कै,/भारत के भार उतारै काँ,/सिरी राम मारे रावण काँ,/गांधी जी जग माँ परगट भये,/अन्यायी राज्य हटावै काँ,/अवतार महात्मा गांधी कै,/भारत कै भार उतारै काँ’। ब्रज के एक लोकगीत में भी गांधी को अवतार बताया गया है-‘अवतार महात्मा गांधी हैं भारत को भार उतारन को/सिरीराम ने रावण मारा था, कान्हा ने कंस पछाड़ा था/अब गांधी ने अवतार लिया इन अंगरेजन के मारन को/सिरी राम के हाथ में धनुष बाण, कान्हा के हाथ सुदर्शन था/गांधी के हाथ में चरखा है, भारतवासिन के तारन को।’ 

मुल्कराज आनंद के उपन्यास ‘अनटचेबल’ के नायक बाखा को लगता है कि गांधी एक ऋषि हैं, विष्णु के अवतार हैं। लोग हजारों की संख्या में दूर-दराज से उन्हें सुनने के लिए आने लगे, रेलवे-स्टेशन पर घंटों उनकी प्रतीक्षा में इंतजार करने लगे या राजपथ पर गांधीजी के एक क्षण के दर्शन के लिए प्रचंड गर्मी या बर्फीली हवा को सहते रहे।

इस तरह, हम पाते हैं कि आम औपनिवेशिक भारतीय मन पर इतिहास की घटनाओं के साथ-साथ अफवाह का भी असर रहा है। हमारी चेतना के निर्माण में इसकी भूमिका रही है।

Saturday, October 3, 2026

राम शरण शर्मा : कुछ स्मरणीय तथ्य

1. पटना में योगेंद्र मिश्र (वाई मिश्रा के नाम से ख्यात) नामक प्राचीन भारत के एक विद्वान थे। जब उनसे कोई रामशरण शर्मा जी के संस्कृत-ज्ञान के बारे में पूछता तो जवाब में वे बोलते कुछ न थे। एक जोरदार ठहाका भर लगा देते - हा .. हा ...हा..

2. रामशरण शर्मा हमेशा ही वस्तुनिष्ठ और प्रामाणिक इतिहास लेखन के आग्रही रहे, लेकिन विद्वानों ने उन पर लिखते हुए इस बात का तनिक ध्यान न रखा और 'मिथकीय पुरुष' बना दिया। इसी का नतीजा हैं कि अंतर्जाल पर सर्वत्र उन्हें 100 पुस्तकों का लेखक बताया जाता है। पटना के एक बहुप्रचारित विद्वान डॉक्टर ब्रजकुमार पांडेय (उन्होंने मेरे लेख को अपने नाम से छपा लेने का अपराध किया है) ने जैसाकि लिखा है, 'शर्माजी ने अपनी सभी किताबें अंग्रेजी में लिखी थीं और उन सबों का हिन्दी अनुवाद उन्होंने स्वयं किया था।' (जनशक्ति, पटना, 28 अगस्त 2011, पृष्ठ 3) यह तथ्य नहीं अफवाह है। शर्माजी की पहली पुस्तक 'विश्व इतिहास की भूमिका' प्रथमतः और मूलतः हिन्दी में लिखी गयी थी। 'पर्सपेक्टिव्स इन सोशल ऐंड इकनॉमिक हिस्ट्री ऑफ अर्ली इंडिया' (प्रथम संस्करण) का हिन्दी रूपांतर हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) से छपा है। शर्माजी ने 'अध्याय संख्या 2, 6 और 13 को स्वयं हिन्दी में लिखा है।' (प्रस्तावना) 'अध्याय संख्या 1, 11, 12, 14 और 17-19 का अनुवाद डॉक्टर कृष्णदत्त शर्मा ने किया है, और शेष अध्यायों का डॉक्टर सीताराम ने।' (प्रस्तावना)

'ऑरिजिन ऑफ स्टेट इन इंडिया' किताब मूल रूप से अंग्रेजी में इतिहास विभाग, बम्बई विश्वविद्यालय से प्रकाशित हुई थी जिसका हिन्दी संस्करण (प्रथम) 1986 में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली से छपा। इसके हिन्दी अनुवादक गोविन्द झा हैं। 

3. रामशरण शर्मा बड़े विद्वान और जटिल आदमी थे। वे प्रतिभाशाली लोगों को हतोत्साहित और झोलटंगवा को प्रोत्साहित करने में विश्वास रखते थे। सुनते हैं कि बी एन कॉलेज में इतिहास शिक्षक रामभूषण शर्मा, रामशरण शर्मा की एक उपलब्धि थे!

4. शर्माजी की किताब 'मैटेरियल कल्चर ऐंड सोशल फॉर्मेशन्स इन एन्शिएंट इंडिया' पढ़ते हुए आश्चर्यजनक रूप से मॉरिस विन्तर्निज की किताब 'हिस्ट्री ऑफ इंडियन लिटरेचर' की याद आती है। हाँ, शर्माजी का शब्द-चयन अपना है, मॉरिस के यहाँ मार्क्सवाद की 'दुहाई' नहीं है।

5. रामशरण शर्मा से पहले इतिहासकारों की एक लम्बी सूची है जो जनता का इतिहास लिख गए हैं. एस ए डांगे, काशीनाथ राजवाड़े, देवराज चानना, डी.डी. कोसंबी आदि अनेक नाम हैं. इस सूची के बगैर शर्मा जी के वास्तविक योगदान को नहीं समझा जा सकता. एक नाम मैं जान-बूझकर लिखना चाहूँगा-महादेव साहा. शर्मा जी के प्रसंग में यह और भी जरूरी नाम है. यह साहा ही थे जिनकी प्रेरणा से उन्होंने 'इंडियन फ्यूडलिज्म' का दूसरा संस्करण लाया. पहले और दूसरे संस्करण का अंतर भी नोट करने लायक है ! 

6. रामशरण शर्मा निस्संदेह एक गंभीर इतिहासकार हैं, लेकिन कभी-कभी बहुत ही 'दिलचस्प' और 'मनोरंजक' बात लिखते हैं। लिखते हैं कि "हाल के जाति आंदोलनों में अनेक शूद्र जातियों ने क्षत्रिय और ब्राह्मण होने का दावा किया है। इस प्रकार दुसाध अपने आपको दुःशासन का और ग्वाले यदुओं का वंशज बताते हैं। जनगणना रिपोर्टों के आधार पर इस प्रक्रिया को समाजशास्त्रियों ने संस्कृतीकरण नाम दिया है, हालांकि अनेक जाति नेता संस्कृत नहीं जानते।" (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, पृष्ठ 19, पादटिप्पणी संख्या 60) यहां इस बात का "हालाँकि अनेक जाति नेता संस्कृत नहीं जानते" क्या अभिप्राय हो सकता है? क्या संस्कृतिकरण संस्कृत-ज्ञान से जुड़ा मसला है?

7. प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत के रूप में साहित्यिक साक्ष्यों के अध्ययन की समीक्षा दिलचस्प हो सकती है. इतिहासकार अपने व्यक्तिगत आग्रहों/पूर्वाग्रहों के कारण साहित्यिक साक्ष्यों के साथ मनमानी करते रहे हैं. इस खेल में आर. एस. शर्मा जैसे प्रख्यात इतिहासकार तक शामिल हैं. एक उदारण देखें-'राम के वन चले जाने पर वाल्मीकि ने अयोध्या का जो वर्णन किया है उससे उजड़े नगर का स्पष्ट संकेत मिलता है. वहां व्यस्त जीवन का कोलाहल नहीं पाया जाता. इसके अलावा गलियों में गाडियां और रथ नहीं चलते, यज्ञ नहीं होते और ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए पण्य-वस्तुएं फूलों और मालाओं से नहीं सजाई जातीं. दुकानें सौदागरों से खाली हैं: सौदागर अपने व्यापार के अंत से चिंतित हैं.' (आर. एस. शर्मा, 'भारत के प्राचीन नगरों का पतन', राजकमल प्रकाशन, 1995, पृष्ठ 152) शर्मा जी इससे निष्कर्ष निकालते हैं कि देखिये शहरों का पतन हो रहा है. अब उनको कोई कैसे कहे कि यह वर्णन राम के वन-गमन के बाद हाट-समाज में पसरे दुःख का भी तो हो सकता है ! रामायण की कथा का ऐसे सीधे-सीधे इतिहास के स्रोत की बजाय इतिहास के रूप में स्वीकार कर लेना क्या उचित है ? 

8. "आर एस शर्मा की भारतीय फ्यूडलिज्म की परिकल्पना, जिसे मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य की संज्ञा दी जा रही थी, वास्तव में यूरोप में विकसित और पतित फ्यूडलिज्म की आंरी पिरेन (Henri Pirenne) द्वारा प्रतिपादित परिकल्पना के अनुरूप थी जिसे प्रोफेसर शर्मा ने कार्बन कॉपी की तरह भारतीय तथ्यों और साक्षियों पर चस्पा कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि पिरेन मार्क्सवाद का कट्टर विरोधी था। मार्क्स और एंगिल्स ने वाणिज्य और फ्यूडलिज्म में कोई अंतर्विरोध नहीं पाया और वाणिज्य को प्रत्येक उत्पादन व्यवस्था के साथ सुसंगत और अनुरूप पाया; वाणिज्य को किसी भी उत्पादन व्यवस्था का विघातक नहीं पाया। वाणिज्य-फ्यूडलिज्म का अंतर्विरोध पिरेन की परिकल्पना में केंद्रीय था और प्रोफेसर शर्मा की परिकल्पना में भी। रुचिकर बात यह है कि प्रोफेसर शर्मा ने इस परिकल्पना को तब अपनाया जब यूरोप में इस 'पिरेन थीसिस' को खारिज किया जा चुका था।" (हरबंस मुखिया, 'भारतीय इतिहास की गतिशील रूपरेखा', अनहद-8 : जून-2018, पृष्ठ 91)


मध्यकालीन भारत में पत्रकारिता

फ़ारसी के खबर का बहुवचन अखबार है। (अर्जुन तिवारी, हिंदी पत्रकारिता का बृहद इतिहास, पृष्ठ 33) भारत में संचार-तंत्र का व्यवस्थित सिलसिला मध्यकाल (मुस्लिम शासकों) में मिलता है. उन दिनों ‘वाकिया नवीस’ नियुक्त किये जाने लगे थे, जो अपने इलाके की पूरी ख़बरें बादशाह तक पहुँचाया करते थे. मुहम्मद बिन तुगलक (सन 1325-51) और शेरशाह सूरी (सन 1540-45) के समय डाक व्यवस्था इतनी चुस्त हो गई थी कि राजधानी में बैठे-बैठे बादशाह को पूरी सूचनाएं मिल जाती थीं. उस समय सूचना-संचार का जो रचनाक्रम था, उसके अनुसार ‘वाकिया नवीस’ (स्थानीय स्तर का संवाददाता), ‘खुफिया नवीस’, ‘सवानह नवीस’ (जीवनी लेखक) और ‘हरकारा’ (सन्देश वाहक) नियुक्त होते थे. औरंगजेब के शासनकाल में भारत प्रवास पर आये फ्रान्सीसी बर्नियर ने अपने यात्रा वृत्तान्त में वाकिया नवीसों का वर्णन किया है. (विजयदत्त श्रीधर, भारतीय पत्रकारिता कोश, प्रथम खंड, पृष्ठ 3)

मुगलकाल में ‘फरमान’, ‘दस्तक’, ‘परवाना’, ‘मह्जार’, ‘एकाउंटपेपर’ तथा ‘बिक्रीनामा’ पत्र के विभिन्न रूप प्रचलित थे. (अर्जुन तिवारी, हिंदी पत्रकारिता का बृहद इतिहास, वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण : 1997, पृष्ठ 33) डाक्टर वासुदेव सिंह ने लिखा है कि मुगलकाल में सूचनाएं ‘फरमान’ के रूप में जारी होती थीं. औरंगजेब के आदेश ‘पैगामे हिन्द’ के रूप में निकलते थे. इसे समाचारपत्र का रूप माना जा सकता है. ये हस्तलिखित होते थे और इसके लिखनेवाले ‘वाकया नवीस’ कहे जाते थे. बहादुरशाह के समय ‘सिराज-उल-अख़बार’ निकालने का पता चलता है, लेकिन इसका प्रकाशन नियमित नहीं था. (सुधा शुक्ल, महिला पत्रकारिता, प्रभात प्रकाशन, 2012, पृष्ठ 63 में उद्धृत)

ये ‘वाकया नवीस’ विभिन्न समाचारों को शासन द्वारा प्रदत्त ‘समाचार पुस्तिका’ में लिखकर विभिन्न शासकीय स्थानों पर उपलब्ध करवाते थे. मुगलकाल में यह निश्चित नियम था कि ‘वाकया नवीस’ अथवा राज्य के गुप्त समाचार लेखक सप्ताह में एक बार घटित होनेवाली घटनाओं को ‘वाकिया’ अथवा ‘गजट’ या ‘मरकरी’ (जिसमें महत्त्वपूर्ण घटनाओं का विवरण होता था) में लिखें. बादशाह की उपस्थिति में महिलाओं द्वारा रात्रि में लगभग नौ बजे पढ़कर सुनाये जाते थे ताकि यह जानकारी मिल सके कि राज्य में क्या हो रहा है. इसके अतिरिक्त गुप्तचरों को भी प्रति सप्ताह महत्त्वपूर्ण घटनाओं का विवरण भेजना होता था. मुख्यतः राजकुमारों की गतिविधियों के बारे में बादशाह आधी रात तक बैठकर इन विवरणों को सुना करता था. (डाक्टर सजीव भानावत, सांस्कृतिक चेतना और जैन पत्रकारिता, पृष्ठ 46)      

सल्तनत के समय दरबार की और से अख़बार जारी होने का प्रमाण मिलता है. मुग़ल बादशाह औरंगजेब के ज़माने में महत्त्वपूर्ण फैसले, आदेश, बादशाह के दौरे और दिनचर्या आदि का विवरण अख़बार में प्रकाशित किया जाता था. सन 1660 के ऐसे अख़बार की कुछ प्रतियाँ रायल एशियाटिक सोसायटी लन्दन में सुरक्षित हैं. (विजयदत्त श्रीधर, भारतीय पत्रकारिता कोश, प्रथम खंड, पृष्ठ 7)

सन 1841 ईस्वी में दिल्ली से फारसी भाषा में ‘सिराज-उल-अख़बार’ का प्रकाशन हुआ. यह आठ पृष्ठों का साप्ताहिक पत्र था जिसका प्रकाशन अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुरशाह के समय हुआ था और यह सरकारी गजट जैसा था. इसमें बादशाह के दैनिक कार्यक्रमों का ब्यौरा तथा देश-विदेश की ख़बरें रहती थीं. इसके स्वरूप का परिचय दिल्ली के मजिस्ट्रेट जान लारेंस की टीप से मिल जाता है : ‘‘बादशाह का समाचारपत्र सिराज-उल-अख़बार’ महल से प्रकाशित किया जाता है. इससे सम्बंधित सभी व्यक्ति शाही कर्मचारी हैं. इस पत्र की कुल 26 प्रतियाँ हर सप्ताह छपती हैं. अधिकतर प्रतियाँ बादशाह के प्रशंसकों को दी जाती हैं. कुछ प्रतियाँ महल के गार्ड, गवर्नर जनरल और लेफ्टिनेंट गवर्नर को भेजी जाती हैं. महल के जिन लोगों को इसकी प्रतियाँ दी जाती हैं उनके वेतन से एक रुपया प्रतिमाह इसका खर्च पूरा करने के लिए काटा जाता है. इस पत्र की भाषा ठेठ फारसी होती है.’’ (विजयदत्त श्रीधर, भारतीय पत्रकारिता कोश, प्रथम खंड, पृष्ठ 7) 

हालाँकि बहादुरशाह की सत्ता का व्यावहारिक रूप से पतन हो चुका था, किन्तु उनके दरबार के पद उस समय भी समाप्त नहीं हुए थे. उन पदों में से एक पद ‘वाकया नवीस’ का था. मसलहउद्दीन सैयद अबुल मुगलिया दरबार के अंतिम ‘वाकया नवीस’ थे. गार्सां द तासी ने इसे दिल्ली का सबसे पुराना अख़बार बताया है. ‘सिराज-उल-अख़बार’ के अंतिम दौर की कुछ प्रतियाँ, जिनमें 1857 की प्रतियाँ भी हैं, राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित हैं. इस अख़बार में प्रकाशित एक समाचार, जिसका शीर्षक ‘खबर गुलशनाबाद’ है, में संकेत मिलता है कि नासिक का नाम गुलशनाबाद भी है. इस समाचार में लिखा गया है कि ईसाई पादरियों द्वारा गौ-हत्या के विरोध में शहर के व्यापारियों ने अपनी दुकानें बंद रखीं. संभवतः यह देश में पहली हड़ताल रही होगी. इसी अख़बार से पता चलता है कि बादशाह अंग्रेजी समाचारपत्रों में प्रकाशित समाचारों का अनुवाद भी सुना करते थे. यदि अंग्रेजी समाचारपत्रों में बादशाह से सम्बंधित कोई असत्य समाचार होता था तो उसका खंडन ‘सिराज-उल-अख़बार’ में किया जाता था. (विजयदत्त श्रीधर, भारतीय पत्रकारिता कोश, प्रथम खंड, पृष्ठ 80)  मुगलों की अंतिम डायरी ‘उर्दू अख़बार’ थी. इसमें आगामी पत्र-पत्रिकाओं का स्वरूप विद्यमान था. (राम अवतार शर्मा, हिंदी साहित्य के विकास में हिंदी पत्रकारिता का योगदान, पृष्ठ 17)

भारतीय पत्रकारिता और खबर की यात्रा

आज पत्रकारिता इतिहास-लेखन की अनिवार्य स्रोत बन चुकी है लेकिन इतिहास का एक दौर था जब विश्वस्तर पर इतिहास के स्रोत के रूप में ‘उपेक्षित’ और ‘अविश्वसनीय’ समझी जाती थी। आधुनिक बिहार के इतिहासकार विजय चन्द्र प्रसाद चौधरी ने अपनी आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड का रास्ता चुना था। वहां के इतिहासकारों और विश्वविद्यालयों के बीच इतिहास के स्रोत के रूप में पत्रकारिता के प्रति जो उपेक्षा-भाव था उसे वीसीपी चैधरी ने अपनी पुस्तक ‘इतिहास का मुक्ति संघर्ष: स्वार्थ से यथार्थ तक’ (राहुल प्रेस, पटना : 1991) में लिपिबद्ध करने की कोशिश की है। उन्होंने लिखा है, ‘जब मैं 1956 में लिटन पर लंदन विश्वविद्यालय में पीएच. डी. का शोध-प्रबंध प्रस्तुत करने के लिए शोध-सामग्री एकत्र कर रहा था तो मेरे दर्शक प्रोफेसर सी. एच. फिलिप्स ने स्पष्ट तौर पर पत्र-पत्रिकाओं की स्रोत के रूप में उपेक्षा करने की हिदायत दी। मेरे ट्यूटर डाॅ. के. ए. वालहैचेट ने बताया कि यह विश्वसनीय स्रोत के रूप में यहां के विश्वविद्यालयों में मान्यता प्राप्त नहीं कर सकी है।’  

भारत में पत्रकारिता की शुरुआत औपनिवेशिक शासन से संबद्ध कही जा सकती है। ब्रिटेन में पत्रकारिता के अभ्युदय के शताब्दियों बाद भारत में पत्रकारिता शुरू हुई। श्री गंगाधर भट्टाचार्य द्वारा सन् 1816 में बंगाल गजट प्रकाशित करने के पूर्व अन्य किसी भारतीय द्वारा प्रकाशित देशी पत्र का उल्लेख नहीं मिलता। सन् 1780 से 1826 तक भारतीय प्रेस का इतिहास आंग्ल-भारतीय पत्रकारिता का इतिहास है। भारत में सबसे पहला प्रेस श्रीरामपुर में ‘बैपटिस्ट मिशनरी’ द्वारा स्थापित किया गया और पहला भारतीय पत्र एक अंग्रेज के संपादकत्व में 29 जनवरी सन् 1780 ई. में प्रकाशित हुआ तथा जेम्स आॅगस्ट हिकी द्वारा संपादित इस पत्र का नाम ‘हिकी बंगाल गजट’ था। देशी भाषा की पत्रकारिता का शुभारंभ भी सन् 1818 ई. में श्रीरामपुर के मिशनरियों द्वारा ही बंगला भाषा की मासिक पत्रिका ‘समाचार-दर्पण’ के प्रकाशन से हुआ।

भारत में प्रारंभिक समाचार पत्रों का प्रकाशन ईस्ट इंडिया कंपनी के असंतुष्ट कर्मचारियों के द्वारा किया गया। समाचार पत्रों के प्रकाशन की ओर प्रवृत्त हुए क्योंकि वे अपनी घुटन को अभिव्यक्ति देना चाहते थे। कंपनी के अधिकारी यहां न केवल व्यक्तिगत व्यापारिक गतिविधियों से धन संचय करते थे, वरन छोटे कर्मचारियों को दबाकर भी रखना चाहते थे ताकि उनकी अवांछनीय गतिविधियों पर पर्दा पड़ा रहे। अतः इन प्रारंभिक अंगरेज पत्रकारों को न केवल कंपनी के गुस्से का शिकार होना पड़ा। कंपनी ने ऐसे समाचार पत्रों को दी गई डाक रियायत वापस ले ली, ताकि उनका प्रचार-प्रसार न हो और वितरक रखने में उन्हें आर्थिक बोझ उठाना पड़े।

‘संपादक के नाम पत्र’ स्तंभ का जनक भी हिकी का ‘बंगाल गजट’ ही था। इससे ज्ञात होता है कि यह पत्र जनता की भावनाओं को अभिव्यक्ति देने का पक्षधर था। यह एक प्रजातांत्रिक सोच थी। 25 मार्च 1780 के अंक में फिलन थ्रोप्स के नाम से संपादक के नाम एक पत्र छपा था, जिसमें कोलकाता के पोर्तगीज श्मशान घाट की गंदगी के बारे में शिकायत की गई थी। हिकी की पत्रकारिता पर वारेन हेस्टिंग्स ने पहला प्रहार 14 नवंबर 1780 को यह आदेश जारी करके किया-‘‘आम सूचना दी जाती है कि एक साप्ताहिक समाचार पत्र जिसका नाम ‘बंगाल गजट’ है, जो जे. ए. हिकी द्वारा मुद्रित किया जाता है, के अंकों में निजी जिंदगी को कलंकित करनेवाले अनेक अनुचित अंश पाये गए हैं, जो शांति भंग करनेवाले हैं, अतएव इसे जी.पी.ओ. के माध्यम से प्रसारित होने की और अधिक अनुमति नहीं दी जा सकती।’’

किंतु, सारे अंग्रेजी अखबार हिकी के ‘बंगाल गजट’ नहीं थे। जवाहर लाल नेहरु ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि किसी अखबार का कोई पाठक शायद ही उन दिनों ख्याल करता होगा कि हिन्दुस्तान में करोड़ों किसान और लाखों मजदूर हैं या उनका कोई महत्त्व है। अंग्रेजों के अखबार बड़े अफसरों के कारनामों से भरे रहते। उनमें शहरों और पहाड़ों पर रहनेवाले अंग्रेजों के सामाजिक जीवन की यानी उनकी पार्टियों की, नाच-गानों और नाटकों की, लंबी-लंबी खबरें छपा करतीं। उनमें हिन्दुस्तानियों के दृष्टि-बिन्दु से हिन्दुस्तान की राजनीति की चर्चा प्रायः बिल्कुल नहीं की जाती थी, यहांतक कि कांग्रेस के अधिवेशन के समाचार भी किसी ऐसे-वैसे पन्ने के एक कोने में, और सो भी कुछ सतरों में, दिया करते। कोई खबर तभी किसी काम की समझा जाती, जब हिन्दुस्तानी, चाहे बड़ा हो या मामूली, कांग्रेस को या उसके दावों को बुरा-भला कह बैठता या नुक्ताचीनी कर बैठता। कभी-कभी किसी हड़ताल का थोड़़ा जिक्र आ जाता, और देहात को तो महत्त्व तभी दिया जाता जब वहां कोई दंगा-फसाद हो जाता। 

हिन्दुस्तानी अखबार भी अंग्रेजी अखबारों की नकल करने की कोशिश करते लेकिन वे राष्ट्रीय आंदोलन को उनसे कहीं ज्यादा महत्त्व देते थे। यों तो वे हिन्दुस्तानियों को छोटी-बड़ी नौकरियां दिलवाने, उनकी तरक्की और तबादले में, और किसी जानेवाले अफसर की बिदाई में दी जानेवाली पार्टी में, जिनमें लोगों में बड़ा उत्साह होता था, दिलचस्पी लेते थे। जब कभी नया बंदोबस्त होता, तो करीब-करीब हमेशा ही लगान बगैरा बढ़ जाता था, जिससे पुकार मच जाती; क्योंकि उसका असर जमींदारों की जेब पर भी पड़ता। बेचारे किसान, जो जमीन जोतते थे, उनकी कोई बात ही नहीं पूछता था। ये अखबार जमींदारों और कल-कारखानोंदारों के होते थे। यह हालत थी उन अखबारों की जो ‘राष्ट्रीय’ कहे जाते थे। 

धीरे-धीरे स्थिति बदलती है और अब अंग्रेजों के अखबारों को भी हिन्दुस्तान के राजनैतिक प्रश्नों के लिए जगह देनी पड़ती है; क्योंकि ऐसा न करें तो हिन्दुस्तानी पाठकों के टूट जाने का अन्देशा रहता है। परंतु यह बात वे अपने खास ढंग से ही करते हैं। हिन्दुस्तानी अखबारों की दृष्टि कुछ ‘विशाल’ हो गई है। वे किसानों और मजदूरों की भी बात किया करते हैं; क्योंकि एक तो आजकल यह फैशन हो गया है और दूसरे उनके पाठकों में कल-कारखानों और गांव-संबंधी बातों के जानने की तरफ दिलचस्पी बढ़ रही है। परन्तु दरअसल तो अब भी वे पहले की तरह हिन्दुस्तानी पूंजीपतियों और जमींदार वर्ग के हितों का ही ध्यान रखते हैं, जोकि उनके मालिक होते हैं। कितने ही हिन्दुस्तानी राजा-महाराजा भी अखबारों में अपना रुपया लगाने लगे हैं और वे हर तरह कोशिश करते हैं कि उन्हें अपने रुपयों का मुआवजा मिले। फिर भी इनमें से बहुत-से अखबार ‘कांग्रेसी’ कहलाते हैं, हालांकि वे जिनके नियंत्रण में हैं उनमें से बहुतेरे कांग्रेस के मेंबर भी न होंगे। जो अखबार जरा आगे बढ़े विचारों का प्रतिपादन करते हैं, उन्हें या तो बड़े-बड़े जुर्माने का, यहांतक कि प्रेस-एक्ट के जरिये दबा दिये जाने या सेंसर किये जाने का भी डर बना रहता है। 

बिहार का ‘प्रथम राष्ट्रवादी साप्ताहिक’ की संज्ञा पानेवाला साप्ताहिक पाटलिपुत्र का प्रकाशन हथुआ नरेश महाराज महादेवाश्रम शाही के एक्सप्रेस प्रेस से 1914 ई. में हुआ था। आरंभ में इसके संपादक नामी बैरिस्टर एवं ख्यात पुरातत्ववेत्ता काशी प्रसाद जायसवाल थे। वे अंगरेजी राज की नजरों में ‘एक खतरनाक क्रांतिकारी’ थे। राष्ट्रवादी गतिविधियों में सम्मिलित होने एवं अंगरेजी सरकार के विरुद्ध आंदोलनकारियों से मिलकर कुचक्र करने का आरोप लगाकर उन्हें कलकत्ता हाईकोर्ट का जज बनने के अयोग्य घोषित कर दिया गया था। जब वे पटना आये तब भी अंगरेजी सरकार का संदेह दूर नहीं हुआ। जब पाटलिपुत्र पूरे जोश और राष्ट्रवादी आवेश में सरकार की जड़ें खोदने के लिए कलम चला रहा था, उसके साथ एक दुर्घटना हो गई। छपरा की एक आमसभा का प्रतिनिधित्व इसके संचालक हथुआ महाराज ने किया था। उसी सभा में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित हुआ कि वर्तमान घोर विपत्ति में अंगरेजी सरकार की मदद की जाय। वहां से लौटने के बाद उन्होंने उक्त पारित प्रस्ताव की सूचना पाटलिपुत्र को प्रकाशनार्थ भेजी और यह खबर भी भिजवायी कि यह संवाद छापना बेहद जरूरी है। पाटलिपुत्र क्रांतिकारी विचारों का पोषक था अतः उक्त समाचार को नहीं छापना उसकी बाध्यता थी क्योंकि वह उसके सिद्धांतों के प्रतिकूल था। लेकिन प्रेस संचालक के आदेश को नहीं मानना भी व्यावहारिक दृष्टि से उचित नहीं था। अतः सिर्फ बारह प्रतियों में, जो नरेश और लार्ड के यहां भेजे जानवाले थे, में उक्त संवाद छपा और शेष में नहीं। संपादक के पी जायसवाल को इस ‘साहस’ के लिए कीमत चुकानी पड़ी थी।

‘सारसुधानिधि’ में ‘तुम्हें क्या’ नाम के एक लेख में राधाचरण गोस्वामी ने लिखा था : ‘हम देशीय पत्र संपादक हैं, हमारा सत्य कहना बुरा लगा, हमसे खुशामद कराने के लिए प्रेस एक्ट की घुड़की दिखलायी, पर तुम्हें क्या? हम झूठ तो नहीं बोलते, तुम्हारी वृथा खुशामद तो नहीं करते।’ पत्रकारों के सामने जो समस्या थी, वह बहुत कुछ इन वाक्यों में प्रकट हो गई है। या तो झूठ बोलकर खुशामद की जाय या सच कहकर प्रेस एक्ट की चपेट में अदालत की या हवालात की हवा खायी जाय। इसलिए सरकार की आलोचना के लिए व्यंग्य और हास्य का अधिक सहारा लिया जाता था। कभी लोग सब कुछ कह जाने के बाद सरकार की थोड़ी-सी प्रशंसा कर देते थे; कभी-कभी खरी-ही-खरी सुनाते थे जिसमें लगी-लिपटी की गुंजाइश ही न होती थी। पत्रकारिता के साथ साहित्य के जुड़ाव का यही ऐतिहासिक संदर्भ है। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझे बिना पत्रकारिता और साहित्य के अंतर्संबंधों को नहीं समझा जा सकता। वैसे भी, साहित्य और पत्रकारिता में अंतर केवल इतना है कि ‘साहित्य दीर्घकालीन पत्रकारिता है और पत्रकारिता अल्पकालीन साहित्य'.                                                                                                              कहने की जरूरत नहीं कि आधुनिक शिक्षा, नवजागरण और पत्रकारिता आपस में सब एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं। प्रेस और पत्रकारिता के अस्तित्त्व के बगैर आधुनिकता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आधुनिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार से  भारत के युवकों के बीच मध्य वर्ग पैदा हुआ। इस मध्यवर्ग ने बड़े ही महत्त्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन किये। यह सब प्रेस और अखबार के बगैर असंभव था क्योंकि अखबार ही जनता के वकील हो सकते हैं। अखबारों की इसी भूमिका को लक्षित करते हुए ‘बिहार बंधु’ ने बिहार के संदर्भ में लिखा था, ‘सर्वसाधारण के अभिप्रायों को जतानेवाला कोई भी वकील बिहार में नहीं है। जहां पर ऐसे वकील थे, वहां वालों की जय हुई। बिहार भाइयो, यह वकील समाचार पत्र ही है। यहां सर्वसाधारण की सम्मति से पुष्ट कोई भी पत्र नहीं है। प्रेस की दुर्बलता ही विफलता का कारण हुई, क्योंकि कोई भी आंदोलन प्रदेशव्यापी होकर समाचार पत्रों की सहायता बिना जीवित नहीं रह सकता। दूर मत जाइए। देखिए बंगालियों की चलायी हुई स्वदेशी मुवमेंट अल्पकाल में ही भारतव्यापी हो गई। किया था तो बंगालियों ने अपना फायदा सोचकर, पर समूचे भारत ने एक मन-प्राण होकर उसे क्यों चलाया ? इसका उत्तर यही है कि समाचार पत्रों ने इसकी महत्ता को भलीभांति दर्शाया।’ 

जाहिर है कि औपनिवेशिक काल का समाचार पत्र केवल ‘समाचार का पत्र’ नहीं अपितु वह ‘वकील’ की भूमिका में भी है। ‘वकील’ सिर्फ खबर देकर ही संतुष्ट नहीं हो सकता। उसे अपने मुवक्किल के पक्ष में व्याख्या भी करनी होगी। ‘बिहार बंधु’ ने एक समाचार प्रकाशित किया ‘भारतवर्ष में स्त्रियों की दशा’-‘‘पंडित रमाबाई इस विषय पर आजकल बम्बई में वक्तृता दे रही हैं और हाल में ‘आर्य महिला सभा’ नामक औरतों की एक सभा खुली है। इस सभा के खोलते वक्त जो उन्होंने व्याख्याान दिया उसका सारांश है-‘मरद औरत से किस बात में बड़ा है ? क्या सबब है कि मर्द लोगों ने इतनी उन्नति की और दिनरात करते जाते हैं ? क्या इसका कारण यह है कि वे स्त्रियों की अपेक्षा अधिक बलवान हैं ? मैं कहती हूं नहीं। केवल विद्या है जो पुरुषों को इस दर्जे तक पहुंचाया है। गुजरते जमाने में हम औरतों की कैसी अच्छी हालत थी और अब व्यवहार-उपद्रव पीड़ित है। बहुत दिनों तक सोये रहे अब हमें जागना और अपनी दशा सुधारनी चाहिए। सबलोगों को मालूम है कि स्त्री शिक्षा में बम्बई और मद्रास वाले बहुत बढ़े-चढ़े हैं। उत्तर पश्चिम प्रदेश और पंजाब भी इस विषय में कुछ न कुछ कर रहे हैं। और कौन सुनिश्चित इस बात को सुनकर खुश न होगा कि बंगाल की कादम्बिनी बोस और चन्द्रमुखी बोस दो लड़कियां इस साल बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण हुई हैं। पर अफसोस की बात है कि अभी तक बिहार में स्त्रियों को यथोचित शिक्षा प्रदान करने के लिए कोई बन्दोबस्त नहीं करता। हम अपने बिहारी भाइयों से ऊंचे आवाज से निवेदन करते हैं कि जब तक वे अपनी बालाओं को न पढ़ायेंगे, तब तक उन्नति की उम्मीद ही करना फिजूल है। इस सबब से यह सुनकर हमको बहुत खुशी मिली कि डुमरांव ‘नीति धर्मोपदेशिनी’ सभा ने ‘बालबोधिनी पाठशाला’ नामक एक स्कूल लड़कियों को पढ़ाने के लिए खोली है। हमारी समझ में बिहार, क्या मानी, भारतवर्ष के हर शहर में इस तौर का एक स्कूल होना चाहिए।’’ 

सोवियत संघ के विघटन के साथ शुरू हुई वैश्वीकरण एवं उदारीकरण की प्रक्रिया ने विचार और इतिहास के अंत की घोषणा कर दी है। कहा जा रहा है कि अब विचार नहीं खबर अथवा सूचना की जरूरत है। यह दरअसल खबरों के साथ लिपटे विचार को मार डालने की कवायद है। कई कवियों ने, जिनका अखबार और ‘खबरों की दुनिया’ को नजदीक और अंदर से देखा है, इस मर्म को पकड़ा है। कवि कुमार मुकुल ने अपनी कविता-पुस्तक ‘ग्यारह सितंबर और अन्य कविताएं’ में ठीक बयान किया है कि ‘खबरों को पाकर/खबरनवीस सन्तुष्ट होता है/उन्हें दबाकर संपादक’। 

दरअसल, ये ‘खबर’ महज खबर नहीं बल्कि मुकम्मल विचार हैं। इंदिरा जब 9-10 साल की बच्ची थी तभी जवाहर लाल नेहरु ने पत्रों के माध्यम से उसे समझाया था, बताया था कि कैसे नदी किनारे बिखरे गोल लाल-काले पत्थर पहाड़ का अभिन्न हिस्सा हैं अथवा स्वयं पहाड़ हैं। पहाड़ के टूटने, नदी के जल प्रवाह तथा अपरदन के अन्य अनेक कारणों को जाने समझे बगैर नदी किनारे मिले गोल पत्थर को पूरी तरह से समझने का दावा नहीं किया जा सकता। वैसे ये पत्थर अपनी विकास यात्रा की पूरी कहानी अपने साथ लिए चलते हैं, लेकिन जिसे इस कहानी में रुचि नहीं है या जिसमें अव्यक्त को पकड़ने की क्षमता नहीं है, नदी किनारे पड़े उस निठल्ले और बेजान पत्थर को उसके समूचे इतिहास से काट कर देखेगा। इस संदर्भ में मदन कश्यप की कविता की याद आ रही है जिसमें वे कहते हैं कि स्त्रियों ने चूल्हे की आग को राख की परतों में जिन्दा रखा है। चूल्हे में आग अथवा राख का होना अगर खबर है तो आग को बचाए रखने की जद्दोजहद सम्पूर्ण स्त्री जाति का इतिहास है, साथ ही आग और राख का इतिहास भी। खबर का बनना न बनना कई बार महज संयोग है। इस प्रसंग में आलोकधन्वा की कविता ‘भागी हुई लड़कियां’ भी कुछ बात जोड़ती है। कवि हमें सावधान करता है कि सिर्फ एक लड़की के भागने की बात स्वीकार मत कर लेना क्योंकि और भी लड़कियां हैं जो अपनी डायरी, अपने रतजगे और अपने सपने में भागी हैं। उनकी आबादी कई गुना ज्यादा है लेकिन जो अखबार के किसी कोने में दर्ज नहीं है। 

अक्सर अखबारों में खबर छपा करती है कि आज दो सौ यात्री बिना टिकट यात्रा करते पकड़े गए। निस्संदेह इसमें कुछ वैसे यात्री भी होते हैं जो टिकट जाँचकर्ता को पैसे दे दिलाकर ‘खबर का हिस्सा’ बनने से बच जाते हैं। क्या कभी अखबार में यह खबर छपी कि कुछ बिना टिकट यात्रा करते यात्री महज इसलिए बच गये कि जांचकर्ता ने उससे घूस की रकम खायी थी। ऐसी घटनाएं रोज ही घटती हैं पर दर्ज होने से हमेशा रह जाती हैं। कभी कभी तो दूरदर्शन के चैनलों पर घटना की लाइव प्रस्तुति तक दिखाई जाती है। कई बार प्रस्तुति के क्रम में दुर्घटना तक घट जाती है। दूसरे दिन अखबार में निकलता है कि गहरे तालाब में डूबकर बच्चे की मौत हो गयी। सवाल है कि बच्चा डूबा या कि डूबने दिया गया या कहें कि डूबा दिया गया। खबर तो यह होनी चाहिए थी।

प्राचीन भारत में स्त्री : सहानुभूति का साहित्य

प्राचीन काल में भी कुछ ऐसे लेखक हैं जिन्होंने स्त्रियों के विरोध में कही गयी अनर्गल, निरर्थक तथा आधारहीन उक्तियों का विरोध एवं उनकी कटु आलोचनाएं की है। वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में स्त्रियों के पक्ष का ओजस्वी समर्थन किया है, तथा उनकी प्रशंसा में बहुत कुछ कह डाला है। वराहमिहिर के मत से स्त्रियों पर धर्म एवं अर्थ आश्रित हैं, उन्हीं से पुरुष लोग इन्द्रिय-सुख एवं संतान-सुख प्राप्त करते हैं, ये घर की लक्ष्मी हैं, इनको सदैव सम्मान एवं धन देना चाहिए। इसके उपरांत वराहमिहिर ने उन लोगों की भर्त्सना की है जो वैराग्यमार्ग का अनुसरण कर स्त्रियों के दोषों की चर्चा करते हैं और उनके गुणों के विषय में मौन हो जाते हैं। वराहमिहिर निंदकों से पूछते हैं-‘सच बताओ, स्त्रियों में कौन-से दोष हैं जो तुमलोगों में नहीं पाये जाते ? पुरुष लोग धृष्टता से स्त्रियों की भर्त्सना करते हैं, वास्तव में वे (पुरुषों की अपेक्षा) अधिक गुणों से संपन्न होती हैं। वराहमिहिर ने मनु के वचनों को अपने समर्थन में उद्धृत किया है; ‘अपनी मां या पत्नी भी स्त्री ही है, पुरुषों की उत्पत्ति उन्हीं से होती है; अरे कृतघ्नी एवं दुष्ट, तुम जब इस प्रकार उनकी भर्त्सना करते हो तो तुम्हें सुख क्योंकर मिलेगा? शास्त्रों के अनुसार दोनों पति एवं पत्नी पापी हैं यदि वे विवाह के प्रति सच्चे नहीं होते, पुरुष लोग शास्त्रों की बहुत कम परवाह करते हैं किन्तु स्त्रियां बहुत परवाह करती हैं, अतः स्त्रियां पुरुषों की अपेक्षा अति उच्च हैं।’ वराहमिहिर पुनः कहते हैं-‘दुष्ट लोगों की धृष्टता कितनी बड़ी है, ओह! वे पवित्र एवं निरपराध स्त्रियों पर गालियों की बौछार करते हैं, यह तो वैसा ही है जैसा कि चोरों के साथ देखा जाता है, अर्थात् चोर स्वयं चोरी करते हैं और पुनः शोर-गुल करते हैं, ‘ठहरो, ओ चोर!’ अकेले में पुरुष, स्त्री की चाटुकारी करते हैं, किन्तु उसके मर जाने पर उनके पास इसी प्रकार के मीठे शब्द नहीं होते; किन्तु स्त्रियां कृतज्ञता के वश में आकर अपने पति के शवों का आलिंगन करके अग्नि में प्रवेश कर जाती हैं।’ कालिदास, बाण एवं भवभूति जैसे साहित्यकारों को छोड़कर वराहमिहिर के अतिरिक्त किसी अन्य लेखक ने स्त्रियों के पक्ष में तथा उनकी प्रशंसा में इतने सुंदर वाक्य नहीं कहे हैं। (धर्मशास्त्र का इतिहास, पृष्ठ 327) कालिदास एवं भवभूति ने बड़े ही कोमल ढंग से पति एवं पत्नी के प्रिय एवं मधुर संबंध की ओर संकेत किया है-‘गृहिणी सचिवः सखी मिथः प्रियशिष्या ललिते कलाविधौ। करुणाविमुखेन मृत्युना हरता त्वां वद किं न में हतम्।।’ ‘प्रेयो मित्र बन्धुता वा समग्रा सर्वे कामाः शेवधिर्जीवितं वा। स्त्रीणां भर्ता धर्मदाराश्च पुंसामित्यन्योन्यं वत्सयोर्ज्ञातमस्तु।।’ (धर्मशास्त्र का इतिहास, पृष्ठ 327-28)

भारतीय भाषा एवं गैर हिंदू योगदान

आज हम जिस संस्कृत भाषा और साहित्य की प्राचीनता पर गर्व करते हैं, उसकी खोज विदेशियों ने ही की- चाहे वे इंग्लैण्ड के हों या जर्मनी के। 'दि सैक्रेड बुक्स ऑफ द ईस्ट' श्रृंखला की किताबों को सम्पादित करने का काम जर्मनी के मैक्स मूलर ही ने तो किया। विदेशी के नाम पर अगर हम उनका चश्मा पहनने से इनकार कर दें तो अंधता के अभिशाप से हमें कौन बचा सकता है? तुलनात्मक भाषाशास्त्र (कंपैरेटिव फिलोलॉजी) पर काम करते हुए विदेशी विद्वानों ने ही साबित किया कि संस्कृत दुनिया की प्राचीनतम भाषाओँ में से एक है। विदेशी के नाम पर अगर उनके इस योगदान को स्वीकार करने से बचें तो हमारे पास गर्व करने लायक बचेगा क्या? संस्कृत भाषा और साहित्य की दुनिया में काम करनेवाले कोलब्रुक, ग्रिफिथ, मार्शल, स्मिथ, डिलन, मैक्स मूलर, मौरिस विन्तर्निज तथा आर पिशेल जैसे सैंकड़ों यूरोपीय विद्वानों को अगर हम भिन्न भौगोलिक सीमा के नाम पर छोड़ दें, स्वदेशी विद्वान हम लाएंगे कहाँ से? कोई हो तब तो? कुछ भारतीय विद्वान हुए भी हैं, तो वे इन्ही विदेशी विद्वानों के काम को आगे बढ़ाते रहे हैं। ये भारतीय विद्वान अपने पूर्ववर्ती विदेशी विद्वान के काम के आगे सिर झुकाकर ही आगे बढ़ते हैं। लेकिन जिन्हें संस्कृत और संस्कृति के नाम पर केवल वोट की राजनीति करनी है उन्हें इन विद्वानों के सम्मुख नतशिर होने की क्या जरुरत?

संस्कृत ही क्यों प्राकृत और हिंदी भाषा और साहित्य पर किसने काम किया? आर पिशेल ने जो 'प्राकृत भाषाओँ का व्याकरण' लिखा, उसकी तुलना में किस भारतीय भाषा वैज्ञानिक का नाम हम ले सकते हैं? आधुनिक भारत की बात करें तो मलाबार क्षेत्र में सत्रहवीं सदी के अंतिम चरण से लेकर अठारहवीं सदी के चौथे दशक तक क्रियाशील रहनेवाले जेस्विट पादरी फादर हैंक्सलेडेन ने संस्कृत का एक व्याकरण लिखा जो किसी भी यूरोपीय भाषा में संस्कृत पर लिखा गया पहला व्याकरण है। (द्विजेन्द्र नारायण झा, प्राचीन भारत : सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास की पड़ताल, ग्रंथ शिल्पी, प्रथम संस्करण : 2000, पृष्ठ 13) 1767 में सबसे पहले फादर कुर्डो ने संस्कृत और यूरोपीय भाषाओं के बीच के घनिष्ठ संबंध को पहचाना। (वही) यह भी याद रखें कि हिंदी भाषा का प्रथम व्याकरण जोशुआ केटलेर कृत 'दि लिंगुआ हिन्दुस्तानिका' (1698 ईस्वी) लैटिन में मिलता है। दूसरा व्याकरण बेंजामिन शुल्ज कृत 'ग्रामेटिका हिन्दोस्तानिका' (1745 ईस्वी) और तीसरा व्याकरण केसियानो बेलिगत्ती कृत 'अल्फाबेतुम ब्रह्मानिकम' (1771 ईस्वी) है। (डॉक्टर रामप्रकाश कुलश्रेष्ठ, आठवें दशक के हिंदी व्याकरण, परिषद पत्रिका, वर्ष 23, अंक 3, पृष्ठ 97) एक अन्य विदेशी परंपरा भी हिंदी व्याकरणों के संबंध में मिलती है, जिसका प्रारंभ मीरज़ा खां के ब्रजभाषा व्याकरण (1625 ईस्वी) से होता है, जिसका संकलन 'तुहफलत-उल-हिन्द' में है, जो नस्तालिक लिपि में और फ़ारसी भाषा में है। (कुलश्रेष्ठ, पूर्वोक्त, पृष्ठ 98)

देशभाषा के शब्दकोश की बात करें तो इसका श्रेय भी उन्हीं विदेशियों को जाता है। हिंदी के आरंभिक दो शब्दकोश जे फर्गुसन नामक एक विदेशी सज्जन ने प्रस्तुत किए थे, जो रोमन अक्षरों में सन 1773 में लंदन में छपे थे। इनमें से एक 'हिंदुस्तानी अंग्रेजी' का और दूसरा 'अंग्रेजी हिंदुस्तानी' का था। इसी प्रकार का एक कोश 1790 में मद्रास में छपा था जो हेनरी हेरिस के प्रयत्न का फल था। सन 1808 में जोसफ टेलर और विलियम हंटर के सम्मिलित उद्योग से कलकत्ते में एक 'हिंदुस्तानी अंग्रेजी कोश' प्रकाशित हुआ था। इसके उपरांत 1810 में एडिनबरा में जे बी गिलक्रिस्ट का और 1817 में लंदन में जे शेक्सपियर का एक 'अंग्रेजी हिंदुस्तानी' और एक हिंदुस्तानी अंग्रेजी कोश निकला था, जिसके बाद में तीन संस्करण हुए। (हिंदी शब्दसागर, प्रथम भाग, प्रथम संस्करण की भूमिका)

औपनिवेशिक भारत में भाषा और व्याकरण के साथ-साथ बाल शिक्षा के क्षेत्र में भी कई विदेशी विद्वान हुए हैं जिनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। फ्रेडरिक पिन्काट एक ऐसा ही नाम है। प्रमाण है कि भारतेंदु हरिश्चंद्र को एक चिट्ठी पिन्काट साहब ने ब्रजभाषा में लिखी थी। (रामचन्द्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ 262) हिंदी में उन्होंने दो पुस्तकों की रचना की है-'बालदीपक' (4 भाग कैथी और नागरी अक्षरों में) एवं 'विक्टोरिया चरित्र'। (मनोज कुमार अम्बष्ट, 'हिंदी का विकास और हिन्दीतर विद्वान', आजकल, सितंबर 2008, पृष्ठ 11) दोनों पुस्तक खड्गविलास प्रेस, बांकीपुर (पटना) में छपी थी। 'बालदीपक' में कुल 364 पृष्ठ और 60 पाठ हैं, जिनमें 6 पाठों में 'रामचरितमानस' से विभिन्न पाठों का संग्रह है। इस पुस्तक का संकलन औपनिवेशिक बिहार की पाठशालाओं के लिए किया गया था। इसके लेखों का चयन बहुत ही गहरी सूझ-बूझ और अंग्रेजी पाठ्य-पुस्तक के आलोक में किया गया था। इस संकलन को तैयार करते समय पिन्काट को शब्द-प्रयोग को लेकर काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, जिसे पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा भी है। 'बालदीपक' औपनिवेशिक बिहार के विद्यालयों में पढ़ाई भी जाती थी। (रामचन्द्र शुक्ल, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 262) उनके एक पाठ का एक अंश नमूने के तौर पर आप देख सकते हैं-'हे लड़को! तुमको चाहिए कि अपनी पोथी को बहुत संभालकर रखो। मैली न होने पावे, बिगड़े नहीं और जब उसे खोलो, पूरी चौकसाई से खोलो कि उसका पन्ना अंगुली के तले दबकर फट न जाय।'


संकट है कि अभी तक बाजार में 'विदेशी चश्मा' ही उपलब्ध है। अगर विदेशी न पहनने की अविवेकी जिद हम पाले बैठे हों तो हमें अँधा होने से कोई नहीं बचा सकता। एक सप्ताह पूर्व मैं आंख के डॉक्टर सुभाष प्रसाद के यहाँ गया था। डॉक्टर ने मोतियाबिंद के मरीज से पूछा, 'कौन सा लेंस लगा दूँ-देशी या विदेशी?' मरीज का जवाब था, 'विदेशी डॉक्टर साहब। मुझे अपनी आंखों की ज्यादा चिंता है।'

मुगल राजवंश और देशी भाषा

बाबर जब हिन्दुस्तान आया तो यहाँ की बोली और भाषा उसके लिए बिल्कुल ही अनजान रही होगी। अपनी इस भाषाई विवशता और संकट को लक्षित करते हुए उसने लिखा है, "न हम यहाँ की बोली समझ सकते और न यहाँ वाले हमारी ज़बान जानते हैं"। (सैयद नसीर हुसैन खाँ, मुगल और उर्दू, पृष्ठ 3) आगे चलकर वह फिर कहता है-"हमारे आदमियों के लिए यहाँ की ज़बान नई है और वह इससे भड़क रहे हैं"। (वही) किन्तु एक अनुभवी बादशाह को यह समझते तनिक देर नहीं लगी कि यदि उसके आदमियों की यह 'भड़क' बनी रही तो भारत शीघ्र ही उसके हाथ से निकल जायेगा और फिर हाथ मलने के सिवा कुछ भी बाकी न बचा रह सकेगा। अतः उसने संभलते-संभलते एक दिन कहा, "मुजका न हुआ कुज हविस मानिक व मोती"। (वही, पृष्ठ 5) पर इसके आगे यहाँ की बोली में कुछ न कह पाया तो उसकी ज़बान तुर्की ने उसका साथ दिया। तुर्की में उसने जो कहा उसका आशय संभवतः यह है कि "फकीरों के लिए एक टुकड़ा रोटी और एक पुरवा पानी बस है"। (वही, पृष्ठ 5; चंद्रबली पांडे, मुगल बादशाहों की हिंदी, ज्योतिष प्रकाश प्रेस, काशी, पृष्ठ 3, पादटिप्पणी संख्या 3)

उनकी कविताओं के हस्तलिखित ग्रंथ में इसे देखा जा सकता है। इस दोहे की पहली पंक्ति हिंदी में है और दूसरी मिश्रित अरबी, तुर्की एवं हिंदी में। सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या के यहां थोड़े पाठान्तर के साथ इस रूप में मिलता है :

"मुज का न हुआ कुज हवस-ए-मानक-ओ-मोती,

फुकरा हालीन बस बुल्गुसिदुर पानी-ओ-रोती।" अर्थात मुझे माणिक और मोतियों की हवस नहीं है। गरीब स्थिति के लोगों के लिए पानी और रोटी ही काफी है। (सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या, भारतवर्ष में आर्य भाषा का विकास, पृष्ठ 206) कहने की जरूरत नहीं कि तुर्की में लिखी उनकी आत्मकथा में भी अनेक भारतीय शब्द मिलते हैं।

हुमायूं के दरबारी कवियों में कुछ ऐसे भी फ़ारसी कवि थे जो हिंदी में रचना करते थे और हिंदी गीतों को बड़े प्रेम से बादशाह के समक्ष पेश करते थे। उनमें शेख अब्दुल वाहिब बिलग्रामी और शेख गदाई देहलवी मुख्य थे। एक ऐसे हिन्दू कवि की रचना हमें प्राप्त है जो हुमायूँ के दरबार में था और जो इस बात का गवाह है कि दरबार में शुद्ध हिंदी कवियों का स्वागत हो रहा था। यह स्वागत ऐसा था कि फ़ारसी कविता भी कुछ-कुछ हिंदी हो चली थी। (चंद्रबली पांडे, पूर्वोक्त, पृष्ठ 7) हुमायूँ के हिंदी-प्रेम के विषय में एक बात ध्यान देने की है। कहा जाता है कि गुजरात की विजय के बाद जब रूमी खां, हुमायूँ के दरबार में दाखिल हुआ तब उसको देखकर विजित बहादुरशाह का पालतू सुग्गा, जो उस समय हुमायूँ के अधीन था, हिंदी भाषा में बोल उठा-"फट पापी रूमी खां नमकहराम। फट पापी नमक हराम।" इसको सुनकर बादशाह ने कहा कि "रूमी खां! क्या करूँ! पक्षी है, नहीं तो इसकी ज़बान मुंह से बाहर खींच लेता।" (चंद्रबली पांडे, पूर्वोक्त, पृष्ठ 8)

शेरशाह ने हुमायूँ को खदेड़कर हिंदुस्तान से बाहर तो किया किन्तु हिन्दी उसके एजेंडे में रही। वह अपनी मुद्राओं पर न केवल नागरी को स्थान देता बल्कि शुद्धता के लिए फारसी के फरमान तक नागरी में लिखे जाते। कहने की जरूरत नहीं कि नागरी अक्षरों में फारसी फरमान लिखने की प्रथा लोदियों में भी थी। (देखें, ओरियंटल कॉलेज, लाहौर की उर्दू मैगजीन, मई 1933, पृष्ठ 116) शेरशाह अपने बचपन के पुराने और प्रिय नाम 'फरीद' से फारसी की तरह हिंदी में भी कविता करता था। उसकी काव्य प्रतिभा की प्रशंसा मलिक मुहम्मद जायसी ने अपनी पद्मावत में खुले मन से की है-"दीन्ह असीस 'मुहम्मद', करहु जुगहि जुग राज। बादशाह तुम जगत के जग तुम्हार मुहताज।।" (जायसी ग्रंथावली (पद्मावत), वही, पृष्ठ 6; चंद्रबली पांडे, पूर्वोक्त, पृष्ठ 9)

प्रायः लोग जानते हैं कि अकबर पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे किंतु तथ्य है कि उनके द्वारा ब्रजभाषा में लिखे दोहे भी हमें प्राप्त होते हैं। अकबर के नाम से प्रचलित दोहों में से एक यहां उद्धृत किया जा सकता है--

"जाको जस है जगत में, जगत सराहै जाहि,

ताको जनम सफल है, कहत अकब्बर साहि।" (रामनरेश त्रिपाठी, कविता कौमुदी, भाग 1, छठा संस्करण, संवत 1990, पृष्ठ 48-49; सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या, भारतवर्ष में आर्य भाषा का विकास, पृष्ठ 207 में उद्धृत) इसी पुस्तक में 'अकब्बर' नाम वाली दो और कविताएँ मिलती हैं। मुग़ल बादशाह अकबर द्वारा अपनी वृद्धावस्था में अपने निकट के मित्रों की मृत्यु के संबंध में रचित बतलाया गया एक दोहा इस प्रकार है--

"पीथल सों मजलिस गई, तानसेन सों राग।

हँसिबौ, रमिबौ, बोलिबौ, गयौ बीरबल साथ।।" 

अर्थात पीथल (बीकानेर के पृथ्वीराज) के साथ सभा गई, तानसेन के साथ गाना-बजाना; और हँसी-खुशी, बोलचाल, सारी बीरबल के साथ समाप्त हो गई। (श्री अलखधारी सिंह द्वारा अपनी कहानी 'राठौर वीरों की कहानियां' में पहली कहानी 'राजा रामसिंहजी', पृष्ठ 185, 1934 बीकानेर, में उद्धृत; और भी, अकबर के बतलाये गए एक और दोहे के लिए देखिए प्रो. अब्दुलगनी की पुस्तक 'मुगल दरबार में फ़ारसी भाषा एवं साहित्य का इतिहास', भाग 3, इलाहाबाद, 1930, पृष्ठ 31-32; सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 207) 

अकबर का शासनकाल हिंदी एवं बोलियों के लिए उत्थान का काल है। इस समय बादशाह के साथ उनके मुसलमान मंत्री भी हिंदी और बोलियों में कविताएं करते थे। बीरबल, अकबर के मुंहलगे माने जाते हैं। उनकी मृत्यु पर बादशाह काफी शोक संतप्त थे। उन्होंने अपना मनोभाव इस सोरठे के माध्यम से व्यक्त किया था : 'सब कुछ दीनन दीन, एक दुरायो दुसह दुःख। सोउ दै हमहि प्रबीन, नहि राख्यो कछु बीरबर।।' कहा जाता है कि बीरबल अपनी वर्षगाँठ पर अपना सर्वस्व दान कर दिया करते थे। युद्ध पर जाते समय भी उन्होंने यही किया था। उनकी मृत्यु भी वहीं हुई। इसका अकबर को बहुत दुःख हुआ जो इस सोरठे के माध्यम से व्यक्त हुआ है। (पं. अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी, हिंदी पर फ़ारसी का प्रभाव, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, सितंबर 1937)

अकबर के वंशज जहांगीर एवं शाहजहां ने तो ब्रजभाषा का बाजाब्ता अध्ययन किया। जहाँगीर ने अपने दरबार में न सिर्फ हिंदी को यथोचित जगह दी बल्कि खुद भी उसमें रचा। उनका लिखा एक पद है-"अति छबि छाजत है ललना लोचन तिहारे। रंग रंगीले रसाल छबीले सोहत लजीले सोहैं खात जात/झुकौ है कछू उसकौ है  ऐसे सोहन होत हमारे।। अद्भुत रूप गोप बरनो न जाय कोटिक/काम द्युति सुध बुध बिसारे। 'साह जहाँगीर' जान बूझकर सकुचावत/इन नैनन में रैन बिहारे।।" (संगीत रागकल्पद्रुम, प्रथम खंड, कृष्णानन्द रामसागर द्वारा विरचित, बंगीय साहित्य परिषद, कलकत्ता, सं. 1971 वि. पृष्ठ 128; चंद्रबली पांडे, पूर्वोक्त, पृष्ठ 25)

औरंगजेब के समय के विषय में भी 'तुहफतुल-हिन्द' से यह बात प्रमाणित होती है कि दिल्ली दरबार के मुसलमान उमरा भी ब्रजभाषा से अत्यंत प्रेम रखते थे। 'मआसिरे-आलमगीरी' के अनुसार, 1690 ईस्वी के आरंभ में जब औरंगजेब दक्षिण में था, तब बड़ी दूर बंगाल से एक मुसलमान प्रयास करता हुआ बादशाह से मिलने कृष्णा नदीवाले प्रदेश में पहुंचा, और वहां पहुंचकर उसने बादशाह से कहा-"आप मुझे अपना मुरीद (आध्यात्मिक शिष्य) बना लीजिए।" इस पर औरंगजेब ने उसे निम्न देशज पद्य की पंक्तियां कहकर फटकारा-

"टोपी लेन्दे, बावरी देन्दे, खरे निलज,

चूहा खान्दा मावली, तू कल बन्धे छज।" (Bibliotheca Indica का पाठ, पृष्ठ 334, सर यदुनाथ सरकार द्वारा उद्धृत) यहां औरंगजेब ने पंजाबी का व्यवहार किया है, न कि हिंदुस्तानी का; 'जबाने उर्दू-ए-मुअल्ला' की तो बात ही दूर रही। (सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 208, पादटिप्पणी संख्या 1)

Friday, October 2, 2026

बिहार में बापू

चंपारण में गांधी की सौवीं बरसी

1917 का चंपारण सत्याग्रह 2017 में अपनी 100वीं बरसी मनाने जा रहा है। सरकारी और गैर सरकारी संगठनों द्वारा उत्सव के आयोजन होंगे। एक बार फिर ’गांधी’ और उनके ’चेले’ ’महात्मा’ और ’देशभक्त’ घोषित होंगे और राजकुमार शुक्ल इतिहास से बाहर किये जायेंगे। क्या इस सौंवीं बरसी पर चंपारण आंदोलन के इतिहास का पुनर्मूल्यांकन नहीं करेंगे आप? क्या इस बात के सूत्र तलाशे जायेंगे कि गांधी के चंपारण आगमन के साथ ही स्थानीय नेतृत्व गायब क्यों हो गया? गांधी को लाया राजकुमार शुक्ल ने लेकिन उनके कर्ताधर्ता और सिपाही/सलाहकार बने डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, राजकिशोर बाबू और रामनवमी बाबू सरीखे लोग जो बगैर फीस के किसानों की बात नहीं रखते थे। क्या यह भी कहा जा सकता है कि चंपारण के किसान आंदोलन को गांधी के व्यक्तिगत सत्याग्रह में बदल दिया गया? क्या इस सत्याग्रह के बाद किसानों की समस्याएं खत्म हो गयी थीं? क्या कारण थे कि गांधी ने इस आंदोलन से कांग्रेस और पत्रकारों को दूर रखा? क्या कारण है कि किसानों की चिंता कर के आये गांधी ’रचनात्मक कार्य’ में लग गए? क्या वह सचमुच ’रचनात्मक’ थे या गांधी की ’शरणस्थली’? चंपारण सत्याग्रह की 100वीं बरसी पर ये सवाल मुझे बार-बार घेरते हैं।

चंपारण के गांधी

चंपारण आने से पहले गांधी इस जगह से परिचित न थे, किन्तु गांधी से यहाँ के लोग परिचित थे। गांधी से पहले तिलक, मालवीय जैसे कई प्रखर नेताओं को यहां लाने की कोशिश हुई थी, किन्तु यहाँ के गरीब किसानों के लिए किसी के पास समय नहीं था। किसान, कांग्रेस के एजेंडे में नहीं थे इसलिए गांधी यहां के लोगों के लिए अंतिम सहारा थे। चंपारण के किसान नेताओं की यह स्थिति भी नहीं थी कि कांग्रेस के मंच पर वे अपनी समस्या को रख सकें इसलिए उस समय के नामी-गिरामी वकील ब्रजकिशोर बाबू को किसानों ने अपनी बात कांग्रेस और गांधीजी तक पहुंचाने के लिए ’हायर’ किया। मरता क्या न करता! उम्मीद की जाती है कि इस कार्य हेतु ब्रजकिशोर बाबू ने किसान प्रतिनिधियों से मोटी रकम ली होगी। इस उम्मीद भरी अटकल की वजह गांधी की आत्मकथा है। गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि चंपारण में बिहारी वकीलों द्वारा किसानों से ली जानेवाली फीस की रकम सुनकर वे सन्न रह गये थे। कहने की जरूरत नहीं कि ये वे किसान थे जिनके घरों की औरतों की देह पर पूरे कपड़े भी नहीं होते थे। गांधीजी ने इस तरह के एक अनुभव का जिक्र किया है। आसपास के लोगों से मिलने के सिलसिले में वे एक घर के अंदर गये। मर्द लोग तो सामने आये। बातें करने। किन्तु घर की औरतें पर्दे की ओट से ही बातें सुनती रहीं। गांधी को मालूम था कि औरतों की भागीदारी के बगैर किसी आंदोलन की बात बेमानी है। इसलिए घर के मुखिया से उन्होंने घर की औरतों को भी बातचीत में शामिल करने का आग्रह किया। दो ही औरत सामने आ सकी। गांधी के पूछने पर कि ’क्या इस घर में दो ही महिला है’, उन्हें बताया गया कि साड़ी दो ही है। इसलिए एकबार में दो ही औरत सामने आ सकती है। बाकी स्त्रियां गमछी लपेटकर घर के अंदर गुजारा करती हैं। गांधी को चरखा की प्रेरणा इन्हीं घटनाओं से मिली होगी। आज 21वीं शती के व्यक्ति को जो कपड़ों में डूबा हुआ है, उसे चरखा का मर्म समझ में आने से रहा। उन्हें तो यह भी नहीं पता कि एक समय था जब आम भारतीय के लिए वस्त्र विलास की वस्तु समझा जाता था। इसे ’वस्त्राभूषण’ यूं ही नहीं कहा गया!

गांधीजी ने चंपारण को अपना ठिकाना बनाया। बिहार के कई प्रबुद्ध लोग (अधिकतर वकील) मदद के लिए आकर साथ रहने लगे। सबके नौकर-चाकर भी साथ थे। सबके अपने-अपने चूल्हे-चौके थे। ’तीन कनौजिया तेरह चूल्हा’ चरितार्थ करते ’स्वदेशी देशभक्त’ थे। एक अकेले गांधी थे जिसका कोई अमला-फैला नहीं था। बाकी सब नौकरों की चतुरंगिणी सेना के साथ थे। पैर दबाने के लिए अलग नौकर तो खाना बनाने के लिए अलग। गांधी पेशोपेश में थे कि किन साहबों से पहले निबटा जाये? इन काले साहबों से या गोरे निलहों से? शांतिनिकेतन का अनुभव काम आया। सारे नौकरों को छुट्टी दे दी। अब सबका खाना एक चौके में बनता। सब मिलकर बनाते। गांधी ने सबकी साहबी खत्म कर दी। गांधी ने सबको गांधी बनना सिखाया। लेकिन यह बीमारी इतनी जल्दी जानेवाली नहीं थी। गांधी जैसे ही अनुपस्थित होते कि नौकरों की फौज बुला ली जाती। फिर जैसे ही गांधी के आने का होता नौकरों को हटा दिया जाता। गांधी ने धीरे-धीरे सबको बिना नौकर का मालिक बनने को मजबूर किया। सबका मालिक एक है-और वह अकेला आदमी गांधी था!

बिहार में गांधी-1

बिहार राज्य अभिलेखागार, पटना में 1947 के दिनों की गांधी की एक दुर्लभ ऐतिहासिक तस्वीर सुरक्षित है। इस तस्वीर में एक कोने में दुबके गांधीजी हैं। मुँह को मास्क से ढंक रखा है। किसी कोरोना के भय से नहीं, बल्कि अस्पताल के ऑपरेशन थियेटर में होने की वजह से। मनु को दिल्ली, नोआखाली के दिनों से ही पेट मे लगातार दर्द हो रहा था किंतु समयाभाव की वजह से गांधी अपेंडिसाइटिस के इस ऑपरेशन को टालते आ रहे थे। बिहार आने के बाद उनके पास 10 दिनों का समय था इसलिए डॉक्टरों की सलाह को उन्होंने मंजूरी दे दी। मनु का ऑपरेशन हुआ और वह स्वस्थ हुई।

उन दिनों की घटनाओं का हाल मनु ने डायरी में नोट किया है। यह डायरी ‘बिहार के कौमी आग में’ शीर्षक से पुस्तकाकार छप चुकी है। मनु को बहुत सवेरे जगना और देर रात को सोना पड़ता था। गांधीजी के आराम करने का समय तय होता लेकिन मनु के सोने का कोई निर्धारित समय नहीं था। कभी-कभी तो काम करते और फंड के रुपये गिनते, हिसाब लिखते रात के एक तक बज जाते। कभी-कभी उसे भारी ऊब और तनाव महसूस होता। 5/3/47 की डायरी का समापन मनु ने इस तरह किया है, ‘बापू जी 11 बजे बिस्तर पर लेटे। उनके पैर दबाकर, सिर में तेल मलकर और मच्छरदानी बन्द करके मैं यहां आयी (घर से सोने की जगह थोड़ी दूर है)। बापूजी के कागजात ठीक से जमा कर रखे, सवेरे के लिए बैठक जमायी। डायरी लिखी। अब साढ़े बारह हो गये हैं। आंखों में नींद खूब भर गई है।’ (बिहार के कौमी आग में, पृष्ठ 8) मनु की मदद के लिए जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती देवी आ जाया करती थीं। मनु ने डायरी में नोट किया, ‘प्रभावती बहन ने उनके (गांधी के) पैरों में घी मला। प्रभा बहन के होने से मैं बड़ी निश्चिंत हूँ। वे स्वभाव की भी बहुत मीठी हैं। मुझे कहने लगीं, ‘‘तुम्हें कोई कुछ भी कहे, परन्तु तुम बापूजी को कभी न छोड़ना।’’ आगा खाँ महल से जुदा होने के बाद वे पहली ही बार यहाँ आयीं, अतः नयी-पुरानी बहुत बातें हुईं।’ (बिहार के कौमी आग में, पृष्ठ 3)

गांधीजी के बिहार आने की कोई योजना नहीं थी। बिहार को वे ‘अपना बिहार’ मानते थे क्योंकि चंपारण ने उन्हें गांधी बनाया था। उन्हें लगता था कि नोआखाली में बैठे-बैठे वे बिहार को संभाल लेंगे। लेकिन मामला गंभीर था। बिहारी हिन्दू ने नोआखाली का हिसाब बिहार के मुसलमानों के साथ कर लेने की ठानी थी। हिन्दू ही क्यों, गांधी को सूचना थी कि ‘इस कुकृत्य में बिहार के कांग्रेसी नेताओं का भी हाथ था।’ इस सूचना ने गांधी को अंदर तक मथ डाला। वे नोआखाली से सीधे पटना पहुंचे। स्थिति बहुत बिगड़ी हुई थी। गांधी ने अपील की ‘मेरे पास ऐसी बातें भी आई हैं कि अभी भी मुसलमान स्त्रियों को हिंदुओं के घरों में कैद करके रखा गया है। यह बात सच है तो मैं विनयपूर्वक कहता हूं कि ऐसा न कीजिए, उन सब बहनों को मेरे पास या राजेन्द्र बाबू के पास पहुंचा दीजिए।’ (वही, पृष्ठ 10)

बिहार में गांधी-2

1947 के दंगे में बापू नोआखाली से सीधे बिहार आये थे। पटना आने के तीसरे ही दिन सुबह की सैर के दौरान बापू की भेंट एक भिखारी से हुई। वह अंधा था इसलिए बापू को देख तो नहीं सकता था किन्तु उनके चरण का स्पर्श पाकर वह धन्य और पवित्र हो जाना चाहता था। कहने को वह हिन्दू था किन्तु आसपास के गांवों से भीख मांगकर जमा की गई चार आने की रकम उसने मुस्लिम-सहायता-कोष को सुपुर्द कर दी। हर्ष और उल्लास से गांधीजी की आंखों में चमक आ गई। उन्होंने भिखारी की पीठ थपथपायी और कहा कि आज से भीख माँगना छोड़ दो; अंधा आदमी भी बहुत काम कर सकता है। सूत तो कात ही सकता है। गांधीजी ने मनु को कहकर उसे तकली दिलवाई और स्वयंसेवकों से कहा कि सदाकत आश्रम में ऐसे लोगों का सदुपयोग हो।’ अपनी पीठ पर बापू का हाथ फिरा पाकर भिखारी काफी आनंद में था। एक ‘रॉयल बेगर’ ने एक सचमुच के भिखारी का उद्धार किया।

अपने ठिकाने पर लौटकर बापू ने मनु को समझाया, ‘तुमने देख लिया न, भिखारी जैसे ने भी पैसा अपने पेट में न डालकर खास नाम लेकर मुस्लिम-सहायता-कोष के लिए दिया। उसके चार आने की कीमत मेरी दृष्टि में तो चार करोड़ से भी अधिक है। इसका नाम है सच्चा दान! यह है बिहार की जनता! बिहार में कदम रखे आज तीसरा ही दिन है। इतने में ही यह जो छोटी-सी घटना हो गयी उसका मेरे मन पर बहुत अद्भुत असर हुआ है। ईश्वर ने यहाँ तक मेरी आवाज पहुंचायी है, यह उसकी महान कृपा है। हम जितने सच्चे होते हैं, निर्मल होते हैं, उतना उन गुणों का प्रतिबिंब ईश्वर हमें दिखाता ही है।’

बिहार में गांधी-3

बापू 5 मार्च, 1947 को कलकत्ता-पटना ट्रेन में सवार हुए। पटना जंक्शन पर भीड़ होने की आशंका से उन्होंने फतुहा स्टेशन पर उतर जाना ही मुनासिब समझा। इस बात की जानकारी कुछ ही लोगों को थी। इसलिए फतुहा स्टेशन पर बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह, विकास मंत्री डॉ. सैयद महमूद, अर्थमंत्री अनुग्रह नारायण सिंह तथा अब्दुल बारी कुछ चुनिंदा कार्यकर्ताओं एवं स्वयंसेवकों के साथ स्वागत एवं अगवानी के लिए वहां पहुंचे। किन्तु पत्रकारों को इस बात की खबर लग चुकी थी इसलिए वे लोग भी अपने लटकते कैमरों के साथ वहां प्रकट हो चुके थे। गाड़ी से उतरते ही बापू ने डॉ. सैयद महमूद से मजाक किया, ‘क्यों, आप तो अभी जिन्दे हैं न?’ श्रीकृष्ण सिंह की गाड़ी से बापू सैयद महमूद के आवास पर पहुंचे और उसे ही अपना ठिकाना बनाया। गांधी तक दंगे की जो खबर पहुंची थी उसके अनुसार बिहार के हिंदुओं ने बंगाल का बदला लिया था। कांग्रेसियों की भूमिका भी असंदिग्ध नहीं रही थी। इसलिए गांधी के इन दोनों से खिन्न होने के कारण थे। गांधी ने कहा कि ‘बिहार ने हिंदुस्तान का नाम डुबो दिया। नोआखाली के जंगली कृत्यों का अनुकरण करना न सीखना और बदले का विचार किये बिना मृत्यु का आलिंगन करके मानवोचित ढंग से जंगलीपन का सामना करना ही नोआखाली का बदला लेने का उचित मार्ग है।’ इस भाषण के बाद बापू को एक ‘तार’ प्राप्त हुआ जिसमें लिखा था, ‘बिहार के हिंदुओं को आप जरा भी उलाहना न दीजिए। उन्होंने जो कुछ किया है, वह कर्तव्यपालन की दृष्टि से ही किया है।’

'कबीर' में गांधी

स्वतंत्रता आंदोलन के समय बिहार में हर आदमी एक सर्जक था। होली हो या सोहर-सब में कबीर ही के बोल थे। बात जब ‘कबीर’ की हो तो क्या कहने। उस समय का एक प्रचलित ‘कबीर’:

‘अर रर, अर रर सुन लेहु मोर कबीर

दौरे में परजा के दुख की तनिक न पूछें बात

पकरि बेगारी गरिबन मारे जूता, घूंसा, लात

भला रे भला...

ये हाकिम नमक हराम बड़े।

चपरासिन से भले आदमिन के उखड़ावें मूंछ

अइसे अफसर ना सुधरेंगे जइसे कुकुर पूंछ

भला रे भला ...

इनके नस नस में जुलुम भरा।

धनवानन की डाली खा के सोवे पैर पसार

नील गाय, कुकुर, हिरनन का बिन बिन करे सिकार

भला रे भला...

इ बा लीला अफसरनन की।’ (नंदकिशोर शुक्ल, महात्मा गांधी की आंधी, 1920; मृत्युंजय सूरज नारायण सिंह, जायसवाल शोध संस्थान, पृष्ठ 38)