Sunday, September 6, 2026

प्रेमचंद : कुछ स्वतंत्र टिप्पणियां

गांधी और प्रेमचंद

प्रेमचंद हिंदी प्रदेश के सबसे बड़े लेखक हैं। टैगोर-गांधी विवाद में गांधी का पक्ष निराला के साथ प्रेमचंद ने भी लिया था। दोनों अपने-अपने कारणों से टैगोर से असहमत थे। प्रेमचंद को 'बंगाली भावुकता' पसंद नहीं थी। यह विवाद भी महत्वहीन है कि प्रेमचंद गांधीवादी थे या नहीं। गांधी को लेकर एक विश्वास और आकर्षण अवश्य था प्रेमचंद के यहां किन्तु वे गांधीवाद की सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं। गांधी के असहयोग आंदोलन के प्रभाव में नौकरी भी छोड़ते हैं किंतु आंदोलन और गांधीवाद की असफलता भी बताते चलते हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रेमचंद की राजनीतिक पढ़ाई गांधी से नहीं बल्कि गोखले और तिलक से शुरू होती है। प्रेमचंद की पृष्ठभूमि आर्य समाज की रही थी और अपने बाद के दिनों में वे रूस की बोल्शेविक क्रांति पर संपादकीय लिखा करते थे। साम्प्रदायिक समस्या के मामले में भी गांधी से प्रेमचंद आगे थे। गांधी के यहां सभी तरह की समस्याओं का निदान हृदय परिवर्तन में है। प्रेमचंद हृदय परिवर्तन नहीं मानते। वे कहते हैं कि जेल से लौटे जमींदार के शोषण में कोई फर्क नहीं है। यह भी बताते चलते हैं कि कल को अगर सुराज मिला तो यही जमींदार हमारा नियंता होगा।

प्रेमचंद के स्त्री-विचार

शिवरानी देवी की किताब 'प्रेमचंद घर में' का समर्पण पढ़ते हुए सोचता रहा कि नारीवादी विमर्शकार इसे कैसे पढ़ेंगे। उन्होंने लिखा है, 'स्वामी/तुम्हारी ही चीज तुम्हारे चरणों में चढ़ाती हूँ/इस तुच्छ सेवा को अपनाना/ तुम्हारी दासी या रानी।'

इन 'रानियों' के बारे में प्रेमचंद लिखते हैं, "आज काफी स्त्रियां नौकरी करने लगी हैं, मगर वह अच्छा नहीं है, मैं इसको अच्छा नहीं समझता। अब इसका नतीजा क्या हो रहा है? अब पुरुष और स्त्री दोनों नौकरियां करने लगे, तब इसके माने क्या हैं? रुपए ज्यादा आ जाएंगे। उसी का तो यह फल है कि पुरुषों की बेकारी बढ़ रही है।" (शिवरानी देवी, प्रेमचंद : घर में, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 217

"यह कमाई का सवाल अभी थोड़े दिनों से उठा है, नहीं तो पहले स्त्रियों की कमाई एक पैसा नहीं होती थी, और स्त्रियां काफी दबदबे के साथ घर पर शासन करती थीं, तब क्या वह कमाई करती थीं?" (वही, पृष्ठ 217)

प्रेमचंद और संयुक्त परिवार

शिवरानी देवी ने प्रेमचंद के बचपन की एक घटना का वर्णन किया है। घटना है कि 'चाचा ने सन बेचा और उसके रुपये लाकर उन्होंने ताक पर रख दिये। आपने अपने चचेरे भाई से सलाह की, जो उम्र में आपसे बड़े थे। दोनों ने मिलकर एक रुपया ले लिया। आप रुपया उठा तो लाये; मगर उसे खर्च करना नहीं आता था। चचेरे भाई ने उस रुपये को भुनाकर बारह आने मौलवी साहब की फीस दी। और बाकी चार आनों में से अमरूद, रेवड़ी वगैरह लेकर दोनों भाइयों ने खायी। चाचा साहब ढूंढ़ते हुए वहाँ पहुंचे और बोले-"तुम लोग रुपया चुरा लाये हो?" आपके चचेरे भाई ने कहा-"हाँ, एक रुपया भैया लाये हैं।" चाचा साहब गरजे-"वह रुपया कहाँ है?" "मौलवी साहब को फीस दी है।" चाचा साहब दोनों लड़कों को लेकर मौलवी साहब के पास पहुंचे और बोले-"इन लड़कों ने आपको पैसे दिये हैं?" "हाँ, बारह आने दिये हैं।" "उन्हें मुझे दीजिए।" चाचा साहब ने उनसे फिर पूछा-"चार आने कहाँ हैं?" उसका अमरूद लिया। चाचा अपने लड़के को पीटते हुए घर लाये। मेरी शकल अजीब हो गई थी। मैं डरता-डरता घर आया। मां  एक लड़के को पिटता देखकर मुझे भी पीटने लगीं। चाची ने दौड़कर मुझे छुड़ाया।' (शिवरानी देवी, प्रेमचंद घर में, आत्माराम एंड संस, 2008, पृष्ठ 20)

प्रेमचंद का बालमन सोचता है कि 'चाची ने मुझे ही क्यों छुड़ाया, अपने बच्चे को क्यों नहीं छुड़ाया?' लेकिन वे जान नहीं सके। फिर अनुमान लगाया-'शायद मेरी दुर्बलतावश उन्हें दया आ गई हो।' 

मैं यह तो नहीं कह सकता कि प्रेमचंद का 'अनुमानाधारित उत्तर' गलत है, किन्तु एक संयुक्त परिवार में पले-बढ़े होने का मेरा अनुभव इसे सहजतापूर्वक स्वीकार नहीं कर सकता कि प्रेमचंद 'दुर्बलता' से उपजी 'दया' की वजह से  बचे। क्या कारण है कि यह 'दुर्बलता' चाचा-चाची के हृदय में ही 'दया' उत्पन्न कर पाने में समर्थ है, मां के हृदय में नहीं। इसलिए कहा जा सकता है कि प्रेमचंद को संयुक्त परिवार के मूल्यों, उसकी नैतिकता ने बचाया है।

यहाँ एक चीज ध्यान देने की है कि 'चाचा' अपने बेटे को पीट रहे हैं और 'मां' अपने बेटे को। संयुक्त परिवार में अपने बेटा-बेटी को प्यार करना नैतिक और चारित्रिक 'दुर्बलता' माना जाता था जबकि उपेक्षा और तिरस्कार परिवार के लिए व्यक्ति का 'त्याग'। संयुक्त परिवार में एक बच्चे को प्यार सदैव चाचा-चाची से ही प्राप्त होता था। संयुक्त परिवार में सभी बच्चे आपस में भाई-बहन होते थे। अकारण नहीं है कि प्रेमचंद से बचपन में जब कोई उनसे भाइयों की संख्या पूछता था तो वे सदैव पांच भाई होने की बात कहते थे। (पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 20)

नमक का दारोगा और अलोपीदीन की संतानें

प्रेमचंद की कहानी 'नमक का दारोगा' का जो ‘प्वाईंट ऑफ इंफैसिस’ है वह यह कि कहानी का खलनायक (विलेन) अलोपीदीन नहीं हैं, बल्कि पूरी की पूरी समाज व्यवस्था है। अलोपीदीन से पहले महाजनों के कर्ज में डूबे उनके उनके पिता हैं जो नौकरी में जाने से पहले ही भ्रष्टाचार की घुट्टी पिला रहे हैं। परिवार के सारे लोगों की अतृप्त लालसाएं हैं। पत्नी की साड़ी और मां की तीर्थ-योजना है। समाज में कौन है जो अलोपीदीन की इज्जत न करता हो ? जमादार बदलू सिंह की तो बात ही छोड़ दें। इलाके के सारे प्रतिष्ठित लोग अलोपीदीन का मेहमान बनना अपना सौभाग्य मानते क्योंकि अपने इलाके के वे ‘सबसे प्रतिष्ठित जमींदार’ थे। अंग्रेज अफसर तक उनके मेहमान होते। क्या यह महज संयोग था कि अदालत ने अलोपीदीन को ‘बाइज्जत’ बरी कर दिया? ‘पं अलोपीदीन इस अगाध वन के सिंह थे।’ ‘डिप्टी मजिस्ट्रेट ने अपनी तजवीज में लिखा, पं. अलोपीदीन के विरुद्ध दिए गए प्रमाण निर्मूल और भ्रमात्मक हैं। वह बड़े भारी आदमी हैं। यह बात कल्पना के बाहर है कि उन्होंने थोड़े लाभ के लिए ऐसा दुस्साहस किया हो।’ 

प्रेमचंद का दारोगा ईमानदारी का जो ‘संस्कार’ लेकर नौकरी खोजने निकला है वह मार्के का है। उस संस्कार के जो अनिवार्य उपादान हैं, उसे देखें-‘मुंशी वंशीधर भी जुलेखा की विरह-कथा समाप्त करके सीरी और फरहाद के प्रेम-वृत्तांत को नल और नील की लड़ाई और अमेरिका के आविष्कार से अधिक महत्त्व की बातें समझते हुए (जोर मेरा है) रोजगार की खोज में निकले।’ इस तरह के रोमानी विचार वाले दारोगा की ईमानदारी पर कोई भरोसा करके गलत ही साबित होगा। सच पूछिए तो कहानी पढ़ते हुए मुझे ऐसा कुछ भी नहीं मिलता (सदास्था के बावजूद) जिसकी बुनियाद पर ‘अटूट विश्वास’ हो सके बल्कि प्रेमचंद ने तो दारोगा के भ्रष्ट होने-बनने या बना दिये जाने की ही कहानी लिखी है। नौकरी गंवाकर लौटे दारोगा से घर-समाज में कोई बोलने-बतियाने के लिए तैयार नहीं है। क्या दारोगा इसे महसूस करते हुए बदल नहीं रहा? कहानी के प्रारंभ में अलोपीदीन के बारे में दारोगा की जो राय है वह अंत तक काबिज रहती है क्या? क्या वह पूरी की पूरी बदल नहीं गई है? ‘वंशीधर ने गंभीर भाव से कहा-यों मैं आपका दास हूं। आप जैसे कीर्तिवान, सज्जन पुरुष की सेवा करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है।’ और आगे-वंशीधर की आंखें डबडबा आईं। हृदय के संकुचित पात्र में इतना एहसान न समा सका। एक बार फिर पंडितजी की ओर भक्ति और श्रद्धा की दृष्टि से देखा और कांपते हुए हाथ से मैनेजरी के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए।

...और प्रेमचंद 'स्वर्ग' की सैर नहीं कर सके!

पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी का गुरुदेव के 'दर्शनार्थ' शांतिनिकेतन आना-जाना लगा रहता था। उन्होंने हिन्दी के कई लेखकों को गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के 'दर्शन' कराने में सफलता पाई थी। उनकी यह 'आकांक्षा' थी कि कभी 'प्रेमचन्दजी और कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ को बातचीत करते हुए सुनें'। उन्होंने 'प्रेमचन्दजी को शान्तिनिकेतन बुलाने के लिए कई बार प्रयत्न किया', पर इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली। एक बार तो उन्हें यह 'आशंका' भी हो गई थी कि उन्होंने 'जान बूझकर' उनके निमन्त्रण की उपेक्षा की है। जब काशी में जाकर चतुर्वेदी जी ने उनसे पूछा कि 'आप शान्तिनिकेतन क्यों नहीं गये', तब उन्होंने बतलाया कि वे 'अपनी धर्मपत्नी तथा बच्चोंको छोड़कर अकेले कविवर के दर्शनार्थ नहीं जाना चाहते थे और इतना पैसा उनके पास था नहीं कि सबकी यात्रा का प्रबन्ध कर सकते।' (बनारसीदास चतुर्वेदी, संस्मरण, भारतीय ज्ञानपीठ, काशी, प्रथम संस्करण : अगस्त 1952, पृष्ठ 79-80) 

चतुर्वेदी जी की 'आशंका' निराधार नहीं है। प्रेमचंद के मन में बंगला साहित्य और विशेषकर रवींद्रनाथ ठाकुर के लिए कोई खास आकर्षण नहीं था। एक बार जैनेंद्र ने चर्चा की थी कि 'बंगाली साहित्य हृदय को अधिक छूता है', तो  प्रेमचंद ने कहा था कि 'उसमें स्त्री-भावना अधिक है। ...जैनेंद्र, मुझे कुछ ठीक नहीं मालूम। मैं बंगाली नहीं हूं। वे लोग भावुक हैं। भावुकता में जहाँ पहुंच सकते हैं, वहाँ मेरी पहुंच नहीं। मुझमें उतनी देन कहाँ? ज्ञान से जहाँ नहीं पहुंचा जाता, वहाँ भी भावना से पहुंचा जाता है। (जैनेन्द्र, 'प्रेमचंद मैंने क्या जाना और पाया', प्रेमचंद स्मृति अंक, प्रेमचंद रचनावली, खण्ड 20 में संकलित, पृष्ठ 21) आगे प्रेमचंद ने कहा, 'जैनेंद्र, रवींद्र, शरत दोनों महान हैं। पर हिन्दी के लिए क्या वही रास्ता है, शायद नहीं। हिन्दी राष्ट्रभाषा है। मेरे लिए तो वह राह नहीं ही है।' (वही)

उर्दू के प्रसिद्ध साहित्यकार इम्तयाज अली 'ताज' को 14 सितंबर, 1920 के अपने खत में प्रेमचंद ने लिखा था : "मैं लिटरेचर को मैस्कुलिन देखना चाहता हूँ, फेमिनिज्म, ख्वाह वह किसी सूरत में हो, मुझे पसन्द नहीं। इसी वजह से मुझे टैगोर की अक्सर नज्में नहीं भातीं। यह मेरा भीतरी नुक़्स है, क्या करूँ। अशआर भी मुझे वही अपील करते हैं जिनमें कोई जिद्दत (मौलिक सूझ) हो। 'ग़ालिब' के रंग का मैं आशिक हूँ। अज़ीज लखनवी के 'गुलकदे' की खूब सैर की थी मगर बदकिस्मती से आज तक एक शेर भी मौजूँ नहीं कर सका। न जी चाहता है। गालिबन शायराना हिस (संवेदनशीलता) दिल में है ही नहीं।" (कलम का सिपाही, पृष्ठ 56) इस खत के कई बरस बाद इन्द्रनाथ मदान के एक सवाल का जवाब देते हुए भी कि बंगला साहित्य क्यों दिल को ज्यादा छूता है, उन्होंने लगभग यही बात कही थी-"उसमें एक स्त्रियोचित गुण पाया जाता है, जिसे मैं अपने स्वभाव के प्रतिकूल पाता हूँ।" (वही)

प्रेमचंद के बारे में जैनेन्द्र लिखते हैं कि 'बड़े शब्दों से कहीं अधिक उन्हें छोटी-सी सचाई छूती थी। जहाँ जिंदगी थी वहां प्रेमचंद की निगाह थी। जहां दिखावा था, उसके लिए प्रेमचंद के मन में उत्सुकता तक न थी।' (वही, पृष्ठ 33) इसलिए 'जब शांतिनिकेतन जाने की बात आई तो उनका मन पूरी तरह ग्रहण न कर सका।' जैनेन्द्र को बोले, 'मैं तो वहां उस स्वर्ग की सैर करूँ, यहां घर के लोग तकलीफ में दिन काटें, क्या यह मेरे लिए ठीक है? और जैनेन्द्र, महाकवि रवींद्रनाथ तो अपनी रचनाओं द्वारा यहां भी हमें प्राप्त हैं। क्या वहाँ मैं उन्हें अधिक पाऊंगा?' (वही)

चतुर्वेदी जी ने प्रेमचंद को गुरुदेव से मिलवाने की कई बार कोशिश की लेकिन वे 'बहाने' बनाकर टालते रहे। एक बार जापानी कवि नोगुची कलकत्ते भाषण देने आए थे तब भी प्रेमचंद को बुलावा भिजवाया था। प्रेमचंद ने 'आर्थिक संकट' का 'बहाना' बनाया। चतुर्वेदी जी ने 'विशाल भारत' में प्रेमचंद के आर्थिक संकटों के बारे में लिखा भी था। नोगुची प्रसंग में प्रेमचंद ने जैनेन्द्र को जो बताया था वह ध्यान देने लायक है : 'यहां नोगुची हिन्दू-यूनिवर्सिटी आए उनका व्याख्यान भी हो गया। मगर मैं न जा सका।' (वही, पृष्ठ 30)

प्रेमचंद और अन्धविश्वास

इस बात को लेकर प्रेमचंद की प्रायः ही आलोचना हुई है कि अंधविश्वास और अलौकिक तत्वों के प्रसंग में वे विरोधाभासों के शिकार हैं। "कभी-कभी वे भूत-प्रेत की तरह आव-बाव बकती थीं। एक पण्डित ओझाई का काम करते थे, वैद्य का भी काम करते थे। मेरी चाची ने कहा-उन्हें बुला लाओ। मैं उन्हें बुला लाया। पण्डित जी आये और ओझों की तरह कुछ उन्होंने अलाय-बलाय किया। मैं भी दोपहर तक बैठा उन्हीं के साथ हवन करता रहा।" (शिवरानी देवी प्रेमचंद, प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 13)

"प्रेमचंद को सामुद्रिक विद्या में यकीन था। उनका एक दफ्तरी था जिसका बताया सही-सही घटित होता था।" (जैनेन्द्र कुमार, 'प्रेमचंद मैंने क्या जाना और पाया', प्रेमचंद रचनावली-20, पृष्ठ 23)

जहां एक तरफ वे अंधविश्वास, सामाजिक-नैतिक रूढ़ियों, धार्मिक विश्वासों, यहां तक कि 'ईश्वर' के अस्तित्व में भी संदेह करते हैं, वहीं उनकी कुछ कहानियों में भूत-प्रेत, पुनर्जन्म, तर्कहीन अलौकिकताओं के प्रति स्वीकार का भाव लक्षित होता है। 'विध्वंस', 'मूठ', 'गुप्त धन', 'नाग-पूजा', 'भूत', 'खूनी', 'पिसनहारी का कुआं, 'मन्त्र', 'प्रतिशोध' आदि कहानियां इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। 

इनमें से कुछ कहानियां, जैसे 'नाग पूजा', 'खूनी', 'प्रतिशोध' आदि तो निपट अंधविश्वास की पुष्टि करनेवाली कहानियां हैं और उनका (डा. गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास 1900-1950 पृष्ठ 137) कोई अभिप्रायगत वैशिष्ट्य लक्षित नहीं होता। 'नाग पूजा' में एक नाग के एक लड़की से प्रेम करने और 'खूनी' तथा 'प्रतिशोध' में 'प्रेत विद्या की सहायता से अपराधी का पता लगाने के चमत्कार की कथा प्रस्तुत की गयी है। तत्कालीन समाज में इस प्रकार के विश्वास प्रचलित थे, यह तो सच है, पर इनके प्रति आलोचनात्मक या व्यंग्यात्मक दृष्टि का अभाव प्रेमचंद के संदर्भ में आश्चर्यजनक है। 'मूठ' चलाकर दुश्मन को मार डालने का अंधविश्वास भी गांवों में प्रचलित था और प्रेमचंद की कहानी 'मूठ में इसका वर्णन किया गया है। चोर का पता लगाने के लिए केन्द्रीय पात्र एक ओझा से 'मूठ' चलाने का आयोजन करता है और इसे केवल सुनकर ही चोर नौकरानी की देह ऐंठने लगती है, आंखें पधरा जाती हैं, और वह बेहोश हो जाती है। पर इस कहानी को थोड़ा मोड़ देकर प्रेमचंद ने इसे अन्धविश्वास-समर्थन के दोष से बचा लिया है। वास्तव में 'मूठ चला नहीं है। ओझा 'मूठ' चलाने उतारने का नाटक करके केन्द्रीय पात्र से पांच सौ रुपये झटक लेता है। इस नाटक से ही चोर स्वस्थ भी हो जाता है। कहानी के सतर्क पाठ से पता चलता है कि प्रेमचंद अंधविश्वास ग्रस्त ग्रामीणों और धूर्त ओझाओं का चित्रण करते हैं। पर कथा के आरंभ में 'मूठ' के प्रभाव का वर्णन पाठक को गलत संदेश देता है। यह कहानी भी तत्कालीन सामाजिक संरचना के अध्ययन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हो सकती है। इस स्थिति से उत्पन्न मनःस्थिति का चित्रण करने में भी प्रेमचंद सफल हैं। 

अन्धविश्वास समर्थित प्रेमचंद की कुछ कहानियां सामाजिक-नैतिक मूल्यों से जुड़कर कुछ सार्थकता प्राप्त कर लेती हैं, जैसे 'विध्वंस' में 'ईश्वरीय न्याय' के रूप में जमींदार की हवेली का जल जाना, 'गुप्त धन में अनैतिक तरीके से दूसरों का धन हथिया लेनेवाले बाप-बेटे का मर जाना, 'भूत' में मृत पत्नी का अपने पति के उसकी छोटी बहन से विवाह कर लेने के विरोध में बार-बार प्रकट होना, 'पिसनहारी का कुआं' में धरोहर के पैसे दबा लेने पर मृत गोमती का उसके विरोध में बार-बार प्रकट होना, 'मन्त्र' में मन्त्र द्वारा सांप के विष का उतर जाना आदि प्रसंग सामाजिक-नैतिक प्रश्नों से जुड़कर किंचित् सार्थक हो गये हैं और आज के उत्तर-आधुनिक पाठ में तो उनकी नये ढंग से व्याख्या भी की जा सकती है। 'विध्वंस' में जमींदार की हवेली के आकस्मिक रूप में जल जाने की व्याख्या दलित-आक्रोश की तीव्रता के रूप में, 'पिसनहारी का कुआँ' में धरोहर के धन हड़पने के विरोध के रूप में, 'मन्त्र' में गरीब आदमियों के हृदय में मानवीय संवेदना के बचे होने के रूप में, 'भूत' में पत्नी की मृत्यु के बाद पुत्री के रूप में पाली हुई साली से विवाह करने के नैतिक द्वन्द्व के रूप में संभव है। (डा. गोपाल राय, पृष्ठ 138) 

'नागपूजा' अन्धविश्वास पर आधारित कहानी है। आश्चर्य है कि प्रेमचंद बहुत गंभीरता से इस विषय पर कहानी लिखते हैं जिसमें एक नाग एक कुमारी लड़की से इतना प्रेम करता है कि जिससे भी उसका विवाह तय होता है, या विवाह हो जाता है, उसे वह डस लेता है। यदि इस कथा से किसी विशेष अभिप्राय की व्यंजना होती, यदि इस अन्धविश्वास के प्रति प्रेमचंद की दृष्टि व्यंग्य और आलोचना की होती, तो कहानी सार्थक होती, पर ऐसा कुछ नहीं दिखायी पड़ता। (डा. गोपाल राय)

'पिसनहारी का कुआं' नैतिक मूल्यबोध की कहानी है धरोहर के पैसे दबा लेने का बुरा परिणाम होता है, यही इस कहानी का प्रतिपाद्य है। पर परिणाम दिखाने के लिए प्रेमचंद ने अतिलौकिक बातों का समावेश कर दिया है, जिससे ऐसी बातों में उनके भी विश्वास की पुष्टि होती है। मसलन जब चौधरी विनायक सिंह मृत गोमती के कुआं बनवाने की धरोहर के पैसे अपने बेटे को नहीं देते, तो उनकी पत्नी स्वयं जाकर पैसे लाना चाहती है। पर ले नहीं पाती, क्योंकि वहां उसे गोमती खड़ी दिखायी पड़ती है। उसका बेटा भी ऐसा ही अनुभव करता है। गोमती अपनी धरोहर की रक्षा कर रही है। पर वह चौधरी को पैसे लेने से नहीं रोकती। चौधरी उस पैसे से अपने बेटे का कर्ज चुका देते हैं। कुआं नहीं बन पाता। चौधरी के बेटे को व्यापार में सदा नुकसान ही होता रहता है इस तरह बारस वर्ष बीत जाते हैं। बाप-बेटे की मृत्यु के बाद विधवा बहू को जो लड़की पैदा होती है, वह और कोई नहीं बल्कि गोमती ही है। उसके उद्योग से कुआं तैयार हो जाता है, और उसी दिन वह मर भी जाती है। तात्पर्य यह कि जब तक कुआं तैयार नहीं होता गोमती की आत्मा भटकती रहती है, और कुआं तैयार हो जाने पर उसे शान्ति मिल जाती है। इस अतिलौकिक घटना का कोई तर्क नहीं है। (डा. गोपाल राय, पृष्ठ 201, पाद टिप्पणी 141)

प्रेमचंद-जयन्ती और इतिहास की लीपापोती

कल प्रेमचंद की जयन्ती थी। वक्ताओं की कमी नहीं रही। कुछ ऑफलाइन बोले तो कुछ ऑनलाइन। कुछ लोग सन्तुलित बोले तो अधिकतर बहके-बहके से। दिल्ली विश्वविद्यालय की विदुषी सुधा सिंह भी छात्रों, शोधकर्ताओं और विद्वान मित्रों को ऑनलाइन संबोधित कर रही थीं। अपनी बात कहने से ज्यादा दूसरों के कहे की लीपापोती कर रही थी। लीपापोती के क्रम में उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की पहली शादी बचपन में हो गई थी। यह प्रेमचंद का फैसला नहीं था। उनको जब फैसले लेने का मौका मिला तो उन्होंने एक 'विधवा' को चुना। यह कहकर उन्होंने प्रेमचंद को समाज से आगे चलनेवाला बताया। बिना पढ़े बोलनेवाले को लगता है कि वह सब नया-नया और मौलिक स्थापना दे रहा है। सही है कि प्रेमचंद का बालविवाह हुआ था लेकिन यह ऐसा 'बालक' था जिसकी आँख में पत्नी का उम्र में बड़ा होना सबसे ज्यादा चुभा था। शिवरानी देवी की लिखी किताब का भरोसा करें तो 'बालक प्रेमचंद' को सबसे पहले पत्नी की उम्र दिखी, सुंदरता-कुरूपता इसके बाद ही आती है। फिर भी प्रेमचंद इस शादी को निभा ले जाते। प्रेमचंद ने स्वीकार किया है कि 'अगर बीच में चाची न होतीं तो शायद मेरी उनकी ज़िंदगी एक साथ बीत भी जाती। (वही, पृष्ठ 11) पिता के फैसले ने प्रेमचंद की सुप्त इच्छा को हवा दी। उनका मानना था कि उनके ससुर ने उनके बेटे को कुएं में धकेल दिया है इसलिए वे उसकी दूसरी शादी अवश्य करेंगे। बालक प्रेमचंद को पिता का यह फैसला मालूम था और इस तरह दूसरी शादी की उनकी राह आसान हो गई थी। किन्तु राह इतनी भी आसान नहीं थी कि प्रेमचंद इसे डंके की चोट पर घोषित कर के करते। आज भी और तब भी समाज इतना प्रगतिशील नहीं था कि एक शादीशुदा व्यक्ति को कोई पिता अपनी अब्याहता लड़की देता। इसलिए जो लोग इस प्रेमचंद के विधवा-विवाह के 'फैसले' को क्रांतिकारी कदम घोषित करने को उतावले हो रहे हैं, वे सर्वप्रथम अपने पाँव जमीन पर कर लें। अब हवाबाजी का समय नहीं रहा। सच्चाई तो यह है कि दूसरी शादी की सारी बात प्रेमचंद ने गुप्त रखी थी। उनके घर के लोग भी इस योजना से वाकिफ नहीं थे। आशंका थी कि बात प्रकट करने पर उनके ब्याहता होने की चर्चा होगी और दूसरी शादी में विघ्न उपस्थित होगा। मैं अपनी बात के समर्थन में शिवरानी देवी की किताब 'प्रेमचंद : घर में' से दो उद्धरण पेश करता हूँ। शिवरानी देवी कहती हैं, 'एक की मिट्टी पलीद कर दी। जिसकी कुरेदन मुझे हमेशा होती है। जिसे मैं बुरा समझती हूँ, वह हमारे ही यहाँ हो और हमारे हाथों हो। मैं स्वयं तकलीफ सहने को तैयार हूँ; परन्तु स्त्री जाति की तकलीफ़ मैं नहीं देख सकती। उसी का प्रायश्चित शायद मुझे भी करना पड़ेगा; हालांकि मैं बेगुनाह हूँ। मेरे पिता को मालूम होता तो आपके साथ मेरी शादी हर्गिज़ न करते।' (प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 10) आगे, 'आप पुरुष थे, आप मुझे ब्याह लाये, वे तो घर में बैठी हैं। यह क्या स्त्रियों के साथ अन्याय नहीं है? मैं भी बदसूरत होती, तो आप मुझे भी छोड़ देते। अगर मेरा बस होता तो मैं सब जगह ढिंढोरा पिटवाती कि कोई भी तुम्हारे साथ शादी न करे।' (प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 10-11) प्रेमचंद झेंपते हुए कहते हैं, 'इसीलिए तो तुम्हें मालूम न हुआ'। (वही, पृष्ठ 11)

प्रेमचंद का तीन स्त्रियों के साथ संपर्क रहा। पहली स्त्री के जीवन-काल में ही आपने एक और स्त्री से संबंध बनाया। शिवरानी देवी के साथ शादी के बाद भी प्रेमचंद का उस स्त्री के साथ सम्बन्ध बना रहा। सवाल है कि उस स्त्री के रहते प्रेमचंद ने शिवरानी देवी के साथ शादी क्यों की, वह स्त्री प्रेमचंद की पत्नी क्यों नहीं बन सकी?

देशकाल, परिवेश और अनुवाद की समस्या

अनुवाद एक अत्यंत कठिन दायित्व है। रचनाकार किसी एक भाषा में सर्जना करता है, जबकि अनुवादक को एक ही समय में दो भिन्न भाषा और परिवेश/वातावरण को साधना होता है। परिवेश और वातावरण पर बल देते हुए राधाकृष्णन ने गीता के अनुवाद के बहाने कहा था-‘गीता के किसी भी अनुवाद में वह प्रभाव और चारुता नहीं आ सकती, जो मूल में है। इसका माधुर्य और शब्दों का जादू किसी भी अन्य माध्यम में ज्यों का त्यों ला पाना बहुत कठिन है। अनुवादक का यत्न विचार को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करने का रहता है, परन्तु वह शब्दों की आत्मा को पूरी तरह सामने नहीं ला सकता। वह पाठक में उन मनोभावों को नहीं जगा सकता, जिनमें कि वह विचार उत्पन्न हुआ था।’ (राधाकृष्णन, भगवद्गीता (हिंदी), राजपाल एंड संस, 'भूमिका', पृष्ठ 8)

एक अनुवादक के लिए स्थानीय संस्कृति, परिवेश और वातावरण का ज्ञान आवश्यक है। बात 1920 के आसपास की है, जब ‘ललाट में लाल चंदन का टीका लगाए हुए भारतीय महिला की फोटो देखकर एक अमेरिकन स्त्री ने कहा था कि यह इसके पति द्वारा मारी हुई ईंट के कारण निकला हुआ रुधिर-चिह्न है।’ (गणेशशंकर विद्यार्थी रचनावली : एक, पृष्ठ 187) महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भी एक रोचक तथ्य की ओर ध्यान दिलाया है। एक बार कलकत्ते के किसी अखबार में एक खबर छपी थी कि उसी तरफ किसी जिले के अंगरेज मजिस्ट्रेट अपने इजलास में बैठे हुए एक मुकद्दमा सुन रहे थे। उस समय मुकद्दमे वालों में से किसी ने कहा कि ‘‘इस जमीन पर चिर दिन (बहुत रोज) से कब्जा है’’। साहब ने समझा कि 'चिर दिन' किसी आदमी का नाम है। इससे आपने 'चिर दिन' के हाजिर होने का हुक्म दे दिया! (महावीरप्रसाद द्विवेदी, सहित्यालाप, खड्गविलास प्रेस, पटना, 1929, पृष्ठ 166)

यद्यपि किस्सा है, लेकिन रोचक एवं सारगर्भित है। कहानी है कि कई साल पहले एक इतिहासकार वीर कुंवर सिंह पर शोध के सिलसिले में भारत आये थे। उन्होंने एक फाइल में burhi शब्द लिखा देखा जिस पर कुंवर सिंह ने कभी एक लाख रुपये खर्च किये थे। उक्त इतिहासकार ने लिखा कि वीर कुंवर सिंह की एक बूढ़ी हो चली रखैल थी जिस पर उन्होंने रुपये खर्च किये थे। एक जमींदार के बारे में ऐसा निष्कर्ष निकालना तनिक स्वाभाविक और सुविधाजनक भी था। कुछ दिनों बाद उसी फाइल को एक बिहारी इतिहासकार ने देखा और burhi को ‘बरही’ पढ़ा। लिखा कि कुंवर सिंह ने पोते की ‘बरही’ पर लाख रुपये खर्च किये थे। 'जालहंस की सुभाषित मुक्तावली’ में चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने एक भारतीय विद्वान की खोज पर व्यंग्य किया है। उक्त विद्वान ने अंग्रेजी माध्यम से अर्जित संस्कृत ज्ञान की वजह से जल्हण को जालहंस बना दिया था। दरअसल उसने रोमन लिपि में लिखे Jalhan's को 'जालहंस' पढ़ लिया। (मस्तराम कपूर, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, साहित्य अकादेमी, द्वितीय संस्करण ; 1993, पृष्ठ 52)

रवींद्रनाथ ठाकुर ने एक बार पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी से कहा था : ‘हिन्दी मैं पढ़ लेता हूँ, सामान्यतः उसका अर्थ भी समझ लेता हूँ, किन्तु शब्दों के साथ जो वातावरण लिपटा होता है, उसे मैं नहीं समझ सकता। सच तो यह है कि शब्दों के साथ लिपटे हुए वातावरण का ज्ञान मुझे अपनी भाषा को छोड़कर और कहीं भी नहीं होता, यहां तक कि अंग्रेजी में भी नहीं।’ (दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 79) गुरुदेव से बातचीत के उपरांत चतुर्वेदी जी ने कहा, ‘दिनकर जी, रवींद्रनाथ स्वीकार करते हैं कि अँगरेजी शब्दों के साथ लिपटे हुए वातावरण को वे समझ नहीं पाते। यह एक बात है, जिसकी खबर उन सभी भारतीय लेखकों तक पहुंचा दी जानी चाहिए, जो अपनी भाषाएं छोड़कर अँगरेजी में लिख रहे हैं, विशेषतः कविताएं लिख रहे हैं।’ (वही) इसलिए, जो दोनों भाषा का ‘मर्म’ नहीं जानता, अच्छा अनुवादक नहीं हो सकता। अर्थ का अनर्थ तो कोई भी कर सकता है! अनर्थ ही कहिए कि आनंदमठ उपन्यास में एक बांग्ला कहावत का अनुवाद करते लिखा है, "गाय है तो गाड़ीवान नहीं गाड़ीवान है तो गाय नहीं!" (हिंदी अनुवाद, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 41) गाड़ी में जब बैल जुतते हैं तो कहावत में गाय क्यों? क्या बंगाल में हल या गाड़ी में गाय जोतने की परंपरा रही है?

अर्थ का अनर्थ तब ज्यादा ही होता है जब हम शब्दशः अनुवाद कर देना चाहते हैं। ‘‘कभी एक स्थानीय दैनिक में निकला था-‘जब पुलिस के बड़े अधिकारी वहां पहुंचे, तब पुलिसवालों और डाकुओं में गोलियों का आदान-प्रदान हो रहा था।’ गोलियां न हुईं मानों मिठाइयां हो गईं। अनुवादक को अंग्रेजी में ‘एक्सचेंज’ मिला; और उसने बिना समझे-बूझे उसके स्थान पर आदान-प्रदान रखकर काम चलता किया।’’ (रामचंद्र वर्मा, शब्दार्थ दर्शन, पृष्ठ 17) रामवृक्ष बेनीपुरी हजारीबाग जेल के वार्डों के अंग्रेजी नामों के हिंदी अनुवाद पर टिप्पणी करते हैं : "जुवेनाइल वार्ड के लिए 'छोकरा किता' अनुवाद वैसे ही है, जैसा विमेन्स वार्ड के लिए 'रंडी किता'। समझ में नहीं आता, ये अनुवाद किसने कब किये, किन्तु जेलों में, थोड़े दिनों पहले तक, 'रंडी किता', 'छोकरा किता' आदि शब्द ही प्रचलित थे।" (रामवृक्ष बेनीपुरी, जयप्रकाश, साहित्यालय, पटना, प्रथम संस्करण : मार्च 1947, पृष्ठ 164)

हर भाषा की अपनी एक खास प्रकृति है। इसलिए जिस भाषा में हम अनुवाद कर रहे होते हैं, उसकी प्रकृति, उसके मिजाज का रक्षण आवश्यक हो जाता है। शब्द, संस्कृति के वाहक होते हैं। यह भी कह सकते हैं कि संस्कृति बदलने से शब्द, वाक्यांश तथा मुहावरों के अर्थ बदल जाते हैं। मिसाल के तौर पर ‘दीपक तले अंधेरा’ कहावत कन्नड़ और कश्मीरी में भी है। कन्नड़ में (अन्य अर्थों के साथ-साथ) इसका अर्थ है, ‘चरित्रवान आदमी का भी दीपक की तरह अंधेरा पक्ष होता है। यानी उसमें प्रछन्न बुराइयां हो सकती हैं।’ कश्मीरी में अन्य अर्थों के साथ-साथ एक राजनीतिक अर्थ भी है। वह यह कि ‘अच्छे राजा के बुरे अनुचर हो सकते हैं’। (ए के रामानुजन, भारत की लोक कथाएँ, नेशनल बुक ट्रस्ट, 2011, 'भूमिका', पृष्ठ 21) इसलिए शब्दों और वाक्यांशों का अनुवाद अपने देश/प्रदेश की भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार होता है। जैसे अंग्रेजी में ‘वार्म रिसेप्शन’ इसलिए प्रचलित हुआ कि इंग्लैंड जैसे ठंढे देशों में इसकी (गर्मी की) आवश्यकता थी। इसी शब्द के लिए भारत जैसे सम तापमान वाले देशों में इसे ‘हृदय को शीतल करना’ कहा जा सकता है। (प्रसेनजित कुमार, 'अननुवाद्यता के चरण और शब्दावली', गवेषणा, अंक 107, वर्ष 2016) इसलिए अनुवादक को एक ही समय में स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा दोनों की भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना होता है।

शब्दशः अनुवाद एक खतरनाक बीमारी है, क्योंकि एक भाषा के शब्द के लिए हू-ब-हू दूसरी भाषा में अक्सर नहीं मिलते। कई बार शब्द महज शब्द नहीं होते, उनके साथ एक अवधारणा जुड़ी होती है। उन अवधारणाओं का अनुवाद किसी भी विदेशी भाषा में, जहां वैसी किसी अवधारणा का अस्तित्व न हो, मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव कार्य है। एक अच्छे अनुवादक को भाषा की इस सीमा की मर्यादा समझनी होगी। नहीं तो क्या आवश्यकता थी कि अंग्रेजी की किताबों अथवा शब्दकोशों के लिए ‘स्वदेशी’, ‘सत्याग्रह’ और ‘अहिंसा’ जैसे अवधारणात्मक पद ज्यों के त्यों उठा लिये जाते? हिन्दी में भी ठीक अंग्रेजी ही की तरह अनगिनत शब्द हूबहू ले लिये गये हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि आज भी हम इस बहस से मुक्त नहीं हो सके हैं कि ‘सेकुलरिज्म’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ तथा ‘धर्म’ और ‘रिलीजन’ एक ही चीज हैं कि भिन्न हैं। गुलेरी जी ने लिखा है कि ‘‘मत या सम्प्रदाय के अर्थ में धर्म शब्द का प्रयोग करना हमने विदेशियों से सीखा है, जब विदेशी भाषाओं के ‘मजहब’, ‘रिलीजन’ शब्द यहां प्रचलित हुए, तब भूल से या स्पर्धा से हम उनके स्थान में धर्म शब्द का प्रयोग करने लगे। परंतु हमारे प्राचीन ग्रंथों में, जो विदेशियों के आने के पूर्व रचे गये थे, कहीं पर भी ‘धर्म’ शब्द मत, विश्वास या सम्प्रदाय के अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ, प्रत्युत उनमें सर्वत्र स्वभाव और कर्तव्य इन दो ही अर्थों में इसका प्रयोग पाया जाता है।’’ (विश्वनाथ त्रिपाठी, हिंदी नवजागरण के अग्रदूत : चंद्रधर शर्मा गुलेरी, नेशनल बुक ट्रस्ट, 1995, पृष्ठ 81)

यह समस्या तब और विकट रूप में प्रस्तुत होती है जब हम बोली के शब्दों का अनुवाद करना चाहते हैं। बोली के शब्दों और भंगिमाओं का अनुवाद जब उसी देश की भाषा में असंभव है तो विदेशी भाषा के बारे में क्या कहा जाय। क्या रेणु का मैला आँचल उपन्यास बोली के शब्दों को छोड़कर रचा जा सकता था? देवेंद्र सत्यार्थी का विश्वास करें तो स्त्री गीतों में जो दर्द और करुणा है उसका अनुवाद दुनिया की अन्य किसी भी भाषा में असंभव है।

अनुवाद की एक समस्या श्रेष्ठताबोध और हीनताबोध से भी जुड़ी है। हम किसी भाषा को श्रेष्ठ मान लेते हैं तो किसी को हीन। हम भारतीय विदेशी भाषा के शब्दों का शुद्ध उच्चारण करने की कोशिश करते हैं। हवेनत्सांग और माओत्सेतुंग को वांगच्वांग तथा माओजेडोंग होते देर नहीं लगी। तोल्स्तोय का 'लेव' अब लेफ हो गया है तो चेखव, चेखफ। विदेशी नामों के उच्चारण को दुरुस्त करने की इतनी व्यग्रता लेकिन अपने ही देश की बांग्ला भाषा के अनेक नाम गलत वर्तनी के साथ लिखे जा रहे हैं। भूदेव मुकर्जी हिंदी में मुखर्जी बने बैठे हैं।वोमेश (womesh) कहीं व्योमेश तो कहीं उमेश। मजेदार है कि प्रकाशन विभाग की अंग्रेजी की किताब में भी उमेश (Umesh) है। इतिहासकार बिपन तो एकाध अपवाद को छोड़कर प्रायः ही बिपिन हैं। अंग्रेजी काल में मिश्र, गुप्त और मौर्य जो मिश्रा, गुप्ता, मौर्या बना वह आज भी बदस्तूर जारी है। चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ जी ने तनिक चुटकी लेते हुए लिखा भी है, ‘गीता के दर्शनशास्त्र को निचोड़ डालनेवाले लेखक भी पारसीधर्म का हाल लिखते समय जरथुश्त को ‘‘जरथुश्ता’’ और अहूर-मज्द को ‘‘अहुरामज्दा’’ लिख देते हैं।’ (वही, पृष्ठ 19) नामों को लेकर हम तनिक भी सचेत नहीं रहते। द्विवेदी जी कहीं महावीर प्रसाद अलग-थलग हैं तो कहीं साथ (महावीरप्रसाद)। हजारीप्रसाद द्विवेदी की भी यही गति है। फणीश्वरनाथ रेणु की कौन कहे! डॉक्टर सच्चिदानंद सिन्हा ने स्वीकार किया है कि जर्मनी में मैक्स मूलर के साथ मुलाकात से पहले तक वे अपने नाम की स्पेल्लिंग गलत लिखा करते थे।

इस प्रसंग में मुझे अपने काॅलेज (बी. एन. काॅलेज, पटना) के अंग्रेजी प्राध्यापक रमेश प्रसाद सिन्हा की ‘कहानी’ याद आ रही है। उनके बच्चे किसी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते थे। एक दिन उनसे पूछा : ‘पापा, आप भरता के बारे में जानते हैं?' पिता ने विश्वासपूर्वक कहा, ‘अरे! भरता तो हमलोग प्रायः ही खाते हैं। इसे भुरता या चोखा भी कहा जाता है और यह आलू, बैगन या करैला-किसी भी चीज का बनाया जा सकता है।’ बेटे ने पिता के ‘अज्ञान’ का मजाक उड़ाते कहा, ‘नहीं, नहीं पापा। भरता तो रामा का यंगर ब्रदर था।’ बेटे का ‘ज्ञान’ पिता के सिर के उपर से निकल गया। नतीजा हुआ कि मेरे अंगेजी शिक्षक ने बेटे का नाम अंग्रेजी स्कूल से कटवा दिया।

कुछ पाश्चात्य भारतविदों ने भारत के पंडितों के मध्य अपनी धाक जमाने के लिए अपने नाम तक के संस्कृत अनुवाद कर डाले थे। कहना अनावश्यक है कि वेद-विद्वान मैकडाॅनेल अपना संस्कृत नाम ‘मुग्धानलाचार्य’ सुनकर कुछ ज्यादा ही मुदित और मुग्ध थे। मैक्स मूलर भी ‘मोक्ष मूलर’ होकर कैवल्य का सुख लूटते थे। भारतीय विद्वानों ने इन नामों के संस्कृत अनुवाद को लेकर काफी हास-परिहास किया है। महावीरप्रसाद द्विवेदी और चन्द्रधर शर्मा गुलेरी तो खूब ही चुटकी लेते हैं।

समय में बदलाव के साथ शब्द के अर्थ भी बदलते रहे हैं। वेदों का अनुवाद आज की संस्कृत भाषा के प्रचलित शब्दार्थों के सहारे नहीं हो सकता ठीक जैसे शेक्सपीयर के जमाने की अंग्रेजी का अनुवाद आज के प्रचलित शब्दों और अर्थों के सहारे असंभव है। निरुक्तकार यास्क ने भी वेद से लगभग 400 ऐसे शब्द गिनाये हैं जिनके अर्थ उन्हें भी नहीं मालूम थे। लगभग चार सौ शब्द थे जिनका ओर-छोर ज्ञात नहीं हो पा रहा था। इस वैयाकरण ने उन शब्दों की एक सूची भी दी है। इसलिए एक अच्छे अनुवादक से उम्मीद की जाती है कि भाषा की समझ के साथ ही उसका इतिहास बोध भी विकसित हो।

प्रत्येक विषय की अपनी भाषा है, उसके खास पारिभाषिक शब्द हैं जिनकी बारीकी का पता उस विषय के जानकार ही को होता है। इसलिए अनुवाद की आदर्श स्थिति यह है कि कविता का अनुवाद कवि करे, कहानी का अनुवाद कहानीकार और समाज विज्ञान की पुस्तकों का अनुवाद कोई समाज विज्ञानी ही करे। तभी विषय के साथ न्याय की उम्मीद की जा सकती है।

कुछ अनुवादों ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया है। तोलस्तोय की किताब का पुनरुत्थान नाम से भीष्म साहनी का अनुवाद और नेहरू की 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' का हिंदुस्तान की कहानी नाम से सस्ता साहित्य मंडल का अनुवाद उम्दा कहा जा सकता है। नेहरू की ही लेटर्स फ्रॉम ए फादर टू हिज डॉटर के अनुवादक प्रेमचंद जी हैं। उस अनुवाद पर कौन टिप्पणी कर सकता है! हावर्ड फास्ट के 'ग्लैडिएटर' उपन्यास का अमृतराय ने आदिविद्रोही नाम से बेजोड़ अनुवाद किया है। मैं तो ई. एच. कार की 'व्हाट इज हिस्ट्री' के अनुवादक अशोक चक्रधर की भी तारीफ किये बगैर नहीं रह सकता।

तिलक को याद करते हुए

 वैसे तो तिलक कांग्रेस के गरमदली नेता थे लेकिन वे मॉडरेट नेताओं के बीच भी समादृत थे। उनके प्रशंसकों में मोतीलाल नेहरू तक थे। गांधी पर रानाडे-गोखले और तिलक का असर था। कहा जाता है कि गांधी के राजनीतिक गुरु गोखले थे तो साहित्यिक गुरु तिलक। प्रेमचंद ने भी राष्ट्रवाद की दीक्षा गोखले से पहले तिलक ही से ली। गाँधी पर तिलक के 'गीता-रहस्य' का प्रभाव अलक्षित नहीं है। तिलक के 'हिन्दू प्रतीक' भी गांधी के यहाँ हैं। 

मोतीलाल नेहरू पर तिलक के प्रभाव को स्वीकार करते हुए जवाहरलाल नेहरू लिखते हैं, '1907 और 1908 में और कुछ साल बाद तक वह बेशक माडरेटों में भी माडरेट थे और गरम दल के सख्त ख़िलाफ़ थे, हालाँकि मेरा ख़याल है कि वह तिलक की तारीफ करते थे।' (मेरी कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, पृष्ठ 47) तिलक के प्रशंसकों में प्रेमचंद जैसे लेखक भी थे।

बाल विवाह को रोकने के लिए जब एज ऑफ कंसेंट बिल आया, 1891 के आसपास, तो तिलक ने डटकर उसका विरोध किया। इसकी वजह से लोगों को उनके बारे में काफी 'गलतफहमी' भी हुई और यह समझा गया कि समाज-सुधार के मामले में तिलक का दृष्टिकोण कट्टर सनातनी हिन्दू का है। लेकिन बात यह न थी। उनके विरोध का कारण यह न था कि वह बाल-विधवा के पोषक थे बल्कि यह था कि यह सब काम खुद हम भारतीयों के करने के हैं, अंग्रेज शासकों को इस सब से क्या मतलब। (अमृतराय, प्रेमचंद : कलम का सिपाही, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 1976, पृष्ठ 79)

साप्ताहिक पत्र 'केसरी' के संपादक बाल गंगाधर तिलक को लोग जितना उनकी विद्वता के कारण जानते हैं उससे अधिक उनको उनके 'दुर्भाग्य' के कारण जानते हैं। जब 'केसरी' का जन्म हुआ था, तभी एक मान-हानि के मुकदमे में फँसने से उनको कई महीने कारागार-वास करना पड़ा था। 1897 ईस्वी में 'शिवाजी के उद्गार' शीर्षक कविता प्रकाशित करने पर उनके ऊपर जो आपत्ति आई उससे उनका नाम प्रायः सारे भारतवर्ष में ही नहीं, किन्तु विलायत तक में हुआ। इस आपत्ति में कुछ अंश से उद्धार पाने में तिलक जी की विद्वता ही सहायक हुई। (महावीर प्रसाद द्विवेदी, अतीत स्मृति, लीडर प्रेस, प्रयाग, 1930, पृष्ठ 33)

बीसवीं सदी के प्रथम दशक में लोकमान्य तिलक की राजनीतिक कार्यवाही का मूल्यांकन सरदार भगतसिंह ने इस प्रकार किया था : '1906 के कांग्रेस अधिवेशन में लोकमान्य तिलक का बोलबाला था। नवयुवक समुदाय उनकी खरी और स्पष्ट बातों के कारण उनका भक्त बन गया था। उनकी निर्भीकता, कुछ कर गुजरने की भावना और बड़े से बड़े कष्ट सहने के लिए हर क्षण तैयार रहने के कारण नवयुवक उनकी ओर खिंचे चले आ रहे थे। कांग्रेस अधिवेशन के अतिरिक्त कांग्रेस के पंडाल के बाहर भी लोकमान्य के अनेक भाषण इस अवसर पर हुए थे। (जगमोहन सिंह और चमनलाल, भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज, नयी दिल्ली, 1986, पृष्ठ 151; रामविलास शर्मा, स्वाधीनता संग्राम : बदलते परिप्रेक्ष्य, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, 1992, पृष्ठ 95)

जो नवयुवक तिलक की ओर खिंचे चले आ रहे थे, उनमें हिंदी कवि और राजनीतिक कार्यकर्ता माखनलाल चतुर्वेदी भी थे। तिलक जो क्रांतिचेता नवयुवकों के लिए आकर्षण के जबरदस्त केंद्र बने थे, उसका सशक्त वर्णन माखनलाल चतुर्वेदी ने एक कविता में किया है : 'तेरी हुंकारों का फल था, अगणित वीरों ने प्राण दिया,/राष्ट्रीय शक्ति ने तुझ से ही अमृतसर में था त्राण लिया।/तुझको अब कष्ट नहीं देंगे, हाथों में झंडा ले लेंगे,/मांडले के क्या, शूली के कष्टों को सादर झेलेंगे/इंग्लैंड नहीं नभमंडल में हम तेरे हैं, हो आवेंगे,/तूने नरसिंह बनाए हैं, अपना तिलकत्व दिखावेंगे।' (माखनलाल चतुर्वेदी रचनावली, खंड 6, दिल्ली, पृष्ठ 67; रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत)

वे युवाओं पर खास नजर और सहानुभूति रखते थे। खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल चाकी द्वारा मुजफ्फरपुर में किये गये बमप्रहार पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने मराठी 'केसरी' में लिखा, 'भारत के पूर्वी क्षितिज-मुजफ्फरपुर में स्वाधीनता का सूरज उदित हो चुका। उसे कोई बड़ी से बड़ी शक्ति रोक नहीं सकती। उनकी इस प्रतिक्रिया पर उन्हें छः वर्षों के कारावास की सजा मांडले जेल में भोगनी पड़ी। (के. के. दत्त, बिहार के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास, भाग 1, पृष्ठ 121)

यह वह समय था जब लोग लिखते हुए डरते थे कि इसे पढ़कर तिलक की क्या प्रतिक्रिया होगी। पद्मसिंह शर्मा ने द्विवेदी जी के नाम अपने पत्र में लिखा कि हाल की 'सरस्वती' में 'सभा' की 'सभ्यता' पढ़कर दुख हुआ, कांग्रेस के मौके पर आर. सी. दत्त, मिस्टर तिलक आदि महोदय नागरी प्रचारिणी सभा के भवन में एकत्र हुए थे, वे भले आदमी सभा की करतूत प्रकाश हो जाने पर अपने दिल में क्या कहेंगे। (द्विवेदी युग के साहित्यकारों के कुछ पत्र, पृष्ठ 137)

प्रसिद्ध नेता डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुंजे ने 13 अप्रैल, 1907 में 'हिंदी केसरी' पत्र को नागपुर से निकाला था। इसमें लोकमान्य तिलक के प्रसिद्ध पत्र 'केसरी' का अनुवाद होता था। इसके संपादक माधवराव सप्रे थे तथा सहायता के लिए जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल और पंडित लक्ष्मी वाजपेयी थे। यद्यपि इसके लेख कम से कम एक सप्ताह पुराने होते थे, फिर भी हिंदीसेवी इसे बड़े चाव से पढ़ते थे। यही नहीं यह हिंदी प्रान्तों में राजनीति की गीता के समान उत्सुकता तथा आदर से पढ़ा जाता था। इस पत्र ने विशेषतः उत्तर भारत के नवयुवकों में ओजस्वी देशभक्ति को जागृत करने का साहसपूर्ण कार्य किया था। कुछ दिनों में यह कई हजारों की संख्या में प्रकाशित होने लगा। उस समय गरम दल का यही प्रामाणिक पत्र था। परंतु यह अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सका क्योंकि सरकार की दमन नीति और भारतमाता और कालापानी इन दो संपादकीय टिप्पणियों के प्रकाशित होते ही 23 अगस्त 1908 में इसके संपादक सप्रे को राजद्रोह के अपराध में पकड़ लिया फलतः 1909 में यह पत्र बन्द हो गया। (डॉ. सुशीला जोशी, हिन्दी पत्रकारिता : विकास और विविध आयाम, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, द्वितीय संस्करण : 1991, पृष्ठ 37)

19 दिसंबर, 1919 को दिल्ली में स्थापित 'राजपूताना मध्यभारत सभा' की ओर से सन 1920 में वर्धा से विजय सिंह पथिक के संपादन में बाल गंगाधर तिलक के मराठा 'केसरी' के सहयात्री/सहधर्मी के रूप में 'राजस्थान केसरी' नामक पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ। (एस. एल. राठौड़, पॉलिटिकल एन्ड कॉन्स्टिट्यूशनल डेवलपमेंट इन दि प्रिंसली स्टेट्स ऑफ राजस्थान, पृष्ठ 40; डॉ. मनोहर प्रभाकर, राजस्थान में हिन्दी पत्रकारिता, पंचशील प्रकाशन, जयपुर, 1981, पृष्ठ 73) यह पत्र राजस्थान और मध्यभारत की जनता के अभाव-अभियोगों, उनकी पीड़ाओ और दमन की कथाओं को मुखर करने लगा। श्री अर्जुनलाल सेठी, केसरी सिंह बारहठ और विजय सिंह पथिक की त्रिमूर्ति इस पत्र को संघर्षों के बीच निरंतर प्राण-वायु प्रदान करती रही। श्री रामनारायण चौधरी इस पत्र के प्रकाशक और सहायक संपादक थे। ठाकुर केसरीसिंह बारहट के जामाता श्री ईश्वरीदान आसिया और सागरमल गोपा भी इस पत्र के संपादन से सम्बद्ध थे। पहले यह पत्र वर्धा से और बाद में अजमेर से निकलने लगा। (श्रमजीवी पत्रकार संघ परिचय पुस्तिका, पृष्ठ 61) पत्र की निर्भीक वाणी से घबड़ाकर ब्रिटिश सरकार और रियासती राजाओं ने अपना दमनचक्र आरम्भ कर दिया। श्री रामनारायण चौधरी को मानहानि के एक मुकदमे में तीन माह की सजा भुगतनी पड़ी। (नवज्योति दैनिक, 14 अगस्त, 1972, पृष्ठ 4) परिणामस्वरूप यह तेजस्वी पत्र स्वल्प किन्तु सार्थक जीवन बिताकर समाप्त हो गया।

27 जुलाई, 1924 को तिलक की मूर्ति का अनावरण करते हुए मोतीलाल नेहरू ने जो भाषण किया था उसका एक अंश देखें : "many and various are the glowing tributes paid to the great work of our hero by the ablest writers and speakers of the day. My contribution can be but poor. But I crave your indulgence to put before you a few thoughts on the lesson of his great life as I read it. I shall not detain you at any length over his early career or even the later achievements of his versatile genius which distinguished him as a great scholar, a vigorous writer, and a clear thinker. The Orion, the Arctic Home and the Gita Rahasya, monuments of scholarship and original thinking as they are, have been aptly described by Babu Aurobindo Ghosh as merely the by-products of the great genius of Tilak. For as he observes that these works were produced "in periods of compulsary cessation from his life-work, planned and partly, if not wholly, executed during the imprisonments which could alone enforce leisure upon this unresting worker for his country." (Selected Works of Motilal Nehru, Vol. 4, p 225.)

मात्र युद्धकथा नहीं है महाभारत

महाभारत में प्राचीन भारतीय ज्ञान का विशाल भंडार है। उसकी स्वयं की यह घोषणा है कि जो द्विज अंगों और उपनिषदों सहित चारों वेदों को जानता है, परंतु इस महाभारत-इतिहास को नहीं जानता, वह विचक्षण विद्वान नहीं है। महाभारत को बार-बार 'भारत-इतिहास', 'भारत-पुराण', 'इतिहास-शिरोमणि' आदि कहा गया है। सौति पूछते हैं कि मैं आपलोगों को क्या सुनाऊँ ? धर्मार्थ से संयुक्त पुराणों की कथा या 'इतिवृत्तं नरेन्द्राणामृशीणां च महात्मनाम्'? राजाओं और ऋषियों के इतिवृत्त आज के अर्थ में इतिहास नहीं हैं। महाभारत में पुराण का अर्थ पुरानी पुण्य-कथाएं हैं और इतिहास का अर्थ राजाओं-ऋषियों की वंशावलियों और क्रिया-कलापों का वर्णन। यों इन दोनों को प्रत्येक पुराणों में पाया जाता है। पुराण-इतिहास में अन्वय-व्यतिरेक संबंध है।

यह महाग्रंथ आख्यानों और उपाख्यानों से भरा पड़ा है। सच पूछिए तो पूरा महाभारत पीपल के पत्ते में फैली हुई नसों की तरह आख्यानों में बंधा हुआ है। कोई व्यक्ति अपनी बात आख्यानों के बिना नहीं कह पाता। ये आख्यान लोक से लिए गए हैं और जहां तहां जड़ दिए गए हैं। कभी-कभी तो इसमें ऐसी कथा का सन्निवेश किया गया है जो सारी शास्त्रीय मान्यताओं को ध्वस्त कर देती है। नेवला-कथा ऐसी ही एक कथा है। महाभारत में इतने अधिक विषयों का समावेश हुआ है कि विश्वकोष मालूम पड़ता है। कहा भी गया है, 'जो इसमें है वही अन्यत्र भी है और जो नहीं है वह अन्यत्र भी नहीं है।' किंतु, वैविध्य इसकी समस्या नहीं है। विषयों में इतने विपर्यय, अंतर्विरोध और पुनरुक्तियां हैं कि वे विद्वानों की जटिल समस्याएं बनी हुई हैं। ऐसे में महाभारत से प्राप्त सामग्री का उपयोग किसी एक काल के लिए करना कठिन है। जहां इसके आख्यानात्मक अंश से दसवीं शताब्दी ई. पू. की झांकी मिलती है, वहीं इसके उपदेशात्मक अंशों का संबंध काफी परवर्ती काल से, यानी ईसा की चौथी शताब्दी से, मालूम होता है। इस महाकाव्य में मूलतः 8,800 श्लोक थे और यह रचना 'जय' कहलाती थी। फिर वे बढ़कर 24 हजार हुए और रचना का नाम 'भारत' पड़ा। बाद में बढ़कर वे एक लाख हो गये और यह ग्रंथ 'महाभारत' कहलाया। गुप्तकालीन अभिलेखों में एक लाख का उल्लेख है। यद्यपि समीक्षित संस्करण में अभी प्रायः 82 हजार श्लोक मिलते हैं।' कहना होगा कि आज के बृहद्‌काय महाभारत में भी एक लाख श्लोक नहीं हैं। 'हरिवंश' को मिलाकर, जिसे खिलपर्व के नाम से भी जाना जाता है, श्लोकों की संख्या एक लाख तक पहुंच जाती है। किंतु, अब इसे महाभारत का अंग नहीं माना जाता।

महाभारत में तीन कथावाचक हैं-व्यास, वैशंपायन और गल्व गणकपुत्र उग्रश्रवा सौति। व्यास ने इसे वैशंपायन को सुनाया था, वैशंपायन ने जनमेजय को और उग्रश्रवा सौति ने कुलपति शौनक के नैमिषारण्य में होने वाले द्वादशवर्षीय सत्र में ब्रह्मचारी ऋषियों को। इस तरह भी महाभारत के तीन संस्करण ठहरते हैं। आज के महाकाव्य काव्य की सामग्री सौति संस्करण की ही मानी जानी चाहिए। उसके बाद भी लोगों ने बहुत कुछ जोड़ा होगा। लगता है, शौनक ने अपने द्वादशवर्षीय सत्र में महाभारत का एक नया संस्करण तैयार कराया। उनके कहने से सौति द्वारा भार्गव वंश का इतिहास भी इसमें सम्मिलत कर लिया गया। पौलोम पर्व के पांचवें अध्याय में कथा आरंभ होने के पूर्व ही शौनक कहते हैं 'उनमें से प्रथम मैं भृगुवंश का ही वर्णन सुनना चाहता हूं।' शौनक भार्गव थे। विष्णु सीताराम सुखणकर ने अपने एक प्रसिद्ध लेख 'भृगुवंश और भारत' में इस तथ्य को विस्तार से उजागृत किया है। सुकथंकर के अनुसार, यह कार्य न व्यास का था, न वैशंपायन का और न सौति का। वास्तविकता यह है कि महाभारत का एक महत्त्वपूर्ण संस्करण भार्गवों के प्रबल और साक्षात् प्रभाव के अंतर्गत तैयार किया गया है। आदिपर्व में पौर्व उपाख्यान, आरण्यक में कार्तवीर्य उपाख्यान, उद्योग में अंबा उपाख्यान, शांति में बिपुलोपाख्यान और अश्वमेध में उत्तंक उपाख्यान भार्गवों के उपाख्यान हैं। जमदग्नि और परशुराम की जन्म-कथा का भूरिषः उल्लेख है। भार्गव परशुराम द्वारा इक्कीस बार क्षत्रियों के नाश करने की कहानी दस बार कही गई है, जिसकी टेक 'त्रिसप्तकृत्वः पृथिवी कुता निःक्षत्रिया पुरा' पर टूटती है। क्षत्रियों के गर्व तोड़ने का उल्लेख तो बीस बार आया है। यही नहीं, भार्गव के देवतुल्य चरित्र कृष्ण, द्रोण, कर्ण आदि के चरित्रों से टक्कर लेते हैं। कहीं-कहीं उन्हें पीछे भी छोड़ जाते हैं। कहना पड़ेगा कि सौति संस्करण में बहुत-सी कथाएं बेतरतीब ढंग से एक कर दी गई हैं। उनमें से बहुत से आख्यान-उपाख्यान अप्रासंगिक लगते हैं।

महाभारत युद्धकथा-मात्र नहीं ठहरता। यदि यह युद्धकथा होता तो इसे शल्यपर्व पर समाप्त हो जाना चाहिए था या अधिक से अधिक सौप्तिक पर्व पर। शांतिपर्व के बाद महाभारत एक दूसरी दिशा की ओर मुड़ जाता है-त्रासदी, करुणा या शांति की ओर। स्त्रीपर्व के बाद शांतिपर्व। महाभारत में यह पर्व आकार में सबसे बड़ा है। इसमें राजधर्म, वर्णाश्रम धर्म, मोक्ष, दर्शन, पांचरात्र आदि के संबंध में विस्तृत सामग्री एकत्र कर दी गई है। यह हिन्दू-धर्म-कोश बन गया है। वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार 'इन अध्यायों में प्राचीन भारत के धार्मिक इतिहास की तीन परतें सुरक्षित हैं। पहली परत में विभिन्न तत्त्वचिंतकों के पृथक मत, उनके अनंतर दूसरी परत में सांख्य आदि दर्शनों की सामग्री और तीसरी परत में शैव एवं पंचरात्र भागवत धर्मों की सामग्री है। शांतिपर्व की शैली और शब्दावली महाभारत के अन्य सर्गों से विशिष्ट है।'

रचना की दृष्टि से सभापर्व सबसे पुराना मालूम पड़ता है, फिर भी इसके संकलन का काल ईसा पूर्व पहली शताब्दी से पहले नहीं माना जा सकता। संभवतः, अनुशासन पर्व और शांति पर्व करीब-करीब एक ही समय संकलित हुए। यह भी कह ले सकते हैं कि अनुशासन पर्व, शांतिपर्व ही का विस्तार है। इसमें कई विषयों की पुनरुक्ति है। शांतिपर्व के 'राजधर्म' प्रकरण में मनुस्मृति से मिलते-जुलते अनेक श्लोक हैं, खासकर राजा की दैवी उत्पत्ति, बाह्मणों के दावे और दंड के महत्त्व के संबंध में यह प्रकरण मुख्यतः उपदेशात्मक है, और ऐसा प्रतीत होता है कि यह शांतिपर्व में ईस्वी सन् की प्रथम और चौथी शताब्दियों के बीच किसी समय सन्निविष्ट किया गया। इसलिए, उत्तर वैदिक काल या वेदोत्तर काल की राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन के लिए शांतिपर्व की सामग्री का उपयोग करना उचित नहीं होगा। राजत्व की उत्पत्ति संबंधी परिकल्पना शांतिपर्व के 'राजधर्म' प्रकरण का सर्वाधिक उर्वर अंश है। इस परिकल्पना में ब्राह्मणवादी दृष्टि से राजपद के औचित्य को बुद्धिपूर्वक सिद्ध करने का प्रथम प्रयास किया गया है। 

महाभारत का मनुस्मृति के साथ विलक्षण संबंध है। मनुस्मृति के 260 श्लोक ऐसे हैं जो महाभारत में अक्षरशः पाये जाते हैं। कह सकते हैं कि महाभारत के शांति पर्व में बहुत से ऐसे श्लोक हैं जो अक्षरशः मनुस्मृति में मिलते हैं। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली, 1993, पृष्ठ 34) विद्वानों का मानना है कि इन दोनों ग्रंथों ने एक-दूसरे से इन श्लोकों को नहीं लिया है, बल्कि दोनों ग्रंथों का कोई एक मूल है। (गंगानाथ झा, हिन्दू लॉ इन इट्स सोर्सेज, पटना विश्वविद्यालय, पटना, 1931, पृष्ठ 59)

इसलिए महाभारत में किसी एक काल का नहीं, बल्कि कई कालखण्डों का इतिहास है।

Wednesday, May 23, 2018

बिहार में शिक्षा की दुरवस्था के बहाने

शिक्षा की बिगड़ती स्थिति पर चर्चा सामाजिक पतन के संदर्भ में ही हो सकती है। तीस-चालीस साल पहले हम शिक्षा को अगर बेहतर स्थिति में पाते हैं तो उसके कारण भी हैं। वह दौर नेशनलाइजेशन और सरकारी संस्थानों के प्रति श्रद्धा और कमिटमेंट का है। मूल्यों के प्रति कमिटमेंट है। इस दौर में सरकार और जनता के समन्वित प्रयास से संस्थान खुले। सिर्फ स्कूल नहीं। हर गांव का अपना एक सार्वजनिक पुस्तकालय था। आज वे सारे सार्वजनिक पुस्तकालय निजी हो गए हैं। पटने की सिन्हा लाइब्रेरी की हालत क्या हुई? किताबों के पन्ने ब्लेड से काटे हुए हैं। ब्रिटिश लाइब्रेरी बन्द हो गई। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद गया तो पता चला कि पुस्तकालय की किताबें घरों की अलमारियों की शोभा बढ़ा रही हैं। एक वाक्य में कहें कि सामाजिक संस्थानों के प्रति जो हमारा भाव था, आज नहीं है। आज सरकार से लेकर समाज और व्यक्ति तक में निजी संस्थानों के प्रति आकर्षण बढ़ा है। हम अपने परिवार के किसी सदस्य का इलाज सरकारी अस्पताल में कराने का साहस नहीं रखते। गाँव-घर ही नहीं परिवार के सदस्य भी मान बैठते हैं कि कंजूसी कर गया। सरकारी और गैर सरकारी स्कूलों को हमने 'प्रतिष्ठा' का प्रतीक बना दिया है। जिनके पास थोड़ी भी 'प्रतिष्ठा' है, उनके बच्चे सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ते। सरकारी स्कूल में पढनेवाले बच्चे पहले मजदूर हैं, विद्यार्थी बाद में। उनके लिए पढ़ाई पार्ट टाइम जॉब है। सरकारी स्कूलों की जो प्रतिष्ठा घटी है उसके लिए सरकार की नीतियां भी जिम्मेवार हैं। सरकार ने कॉलेजों से इंटर की पढ़ाई खत्म कर दी बगैर किसी वैकल्पिक व्यवस्था के। यह सरकार की सोची-समझी चाल थी। पहले दसवीं तक की शिक्षा को निजी हाथों में दिया। फिर बारहवीं तक को। और अब निजी विश्वविद्यालय को खुला न्यौता है। इस खेल को समझना होगा। सरकारी स्कूलों में अगर शिक्षक नहीं हैं तो इसके कारण हैं। कारण निजी विद्यालयों को प्रोत्साहित करना है। प्रोत्साहन से आगे बढ़कर सरकार निजी विद्यालय को अब सरकार 25 प्रतिशत सीट के लिए पैसे देती है। सरकारी स्कूल के शिक्षकों के लिए सरकार के पास पैसे नहीं है। गरीब बच्चों के नाम पर निजी विद्यालयों को धन देने के लिए संसाधन की कमी नहीं होती। सरकारी स्कूल के शिक्षक जब सम्मानजनक वेतन की मांग करते हैं तो सारे पत्रकार अर्थशास्त्री हो जाते हैं। आज तक किसी अर्थशास्त्री पत्रकार ने लिखा कि निजी स्कूलों को इस तरह पैसा बांटना गलत है। रही बात शिक्षकों की तो वे अभाव और असंतोष के बीच खड़े हैं। एक तो शिक्षकों को वेतन बहुत कम मिलता है। वह भी पांच-छह माह से पहले मयस्सर नहीं होता। नतीजतन उसे जीवित रहने के लिए दूसरे धंधे करने पड़ते हैं। किसी को आइसक्रीम बेचना पड़ता है तो किसी को पीएच डी लिखने का धंधा। जो लोग शिक्षा को लेकर चिंतित हैं उन्हें इस बात की भी चिंता करनी होगी कि शिक्षक को आइसक्रीम न बेचना पड़े। समाज ने शिक्षक को अयोग्य कहते-कहते मर्यादाहीन बना दिया है। शुरू में (2007) जब मैं स्कूल गया था तो अभिभावक मजाक करते थे। अभिभावक की बात बच्चों तक पहुंच गई। बच्चे ने कहा था, आप इतना पढ़े तो पांच हजार की नौकरी मिली तो आपके पढ़ाये विद्यार्थी को कितने की मिलेगी? जाहिर है, आज शिक्षक समाज का सबसे उपेक्षित तबका है। समाज का भला करना है अगर तो शिक्षक ही क्यों हर पढ़े-लिखे आदमी को हीरो बनाना सीखना होगा। पढ़े-लिखे लोगों को उपेक्षित करके शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की बात बेमानी है।
अखबारी हैं ये आंकड़े

बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा कि 'राज्य में प्राथमिक विद्यालय तक पढ़ाई करने के बाद काफी कम लड़कियां मध्य विद्यालय तक पहुँच पाती थीं। इसके लिए हमने मध्य विद्यालय में कपड़े दिये, नौवीं कक्षा में साइकिल दी। यह इसलिए किया कि लड़कियां कम से कम मैट्रिक तक पढ़ें। इसके पूर्व पूर्णिया, कटिहार, पटना में साइकिल से लड़कियां पढ़ने स्कूल नहीं जाती थीं। उस समय 1.70 लाख लड़कियां मैट्रिक तक पढ़ती थीं। साइकिल योजना की शुरुआत करने के बाद यह आंकड़ा 8.15 लाख तक पहुँच गया है।' (प्रभात खबर, पटना, 11/12/2016, पृष्ठ 1)

संभव है, यह आंकड़ा सही हो। लेकिन यह 'अखबारी' है। सच है कि मिड डे मील, साइकिल और पोशाक की योजनाओं ने बच्चों को विद्यालय की ओर आकर्षित किया है। बल्कि यह कहना ज्यादा यथातथ्य होगा कि बच्चों के अभिभावक विद्यालय की ओर खिंचे हैं। कारण है इन इन योजनाओं के माध्यम से बँटनेवाली राशि। विद्यालय में अगर लड़कियों का नामांकन बढ़ा है तो उसकी वजह भी राशि ही है। पिछले सालों में देखा गया कि एक एक बच्चे का चार चार विद्यालयों में नामांकन होता था। बच्चे चारों विद्यालयों से योजना की राशि उठाते थे। तब नामांकन की प्रक्रिया सरल थी और 8वीं कक्षा की टी सी आसानी से उपलब्ध हो जाया करती थी। कहने की जरूरत नहीं कि गलत नामांकन के इस खेल में अभिभावक के साथ शिक्षक और प्रधानाध्यापक तक संलिप्त थे। कई स्कूलों की हुई जाँच से इस तथ्य की संपुष्टि हो चुकी है। इतना ही नहीं, कई पदाधिकारी तक इसमें शामिल पाये गए हैं। छात्रवृत्ति घोटाले का स्मरण ही यह बताने के लिए काफी होगा कि स्कूलों में केवल नकली छात्र/छात्रा ही नहीं बढ़े अपितु नकली विद्यालय भी उठ खड़े हुए। इन सब कारणों से विद्यालय आनेवाले छात्रों की संख्या बढ़ी हो तो क्या आश्चर्य! ऐसे में सुशासनी मुख्यमंत्री द्वारा अपनी पीठ थपथपाना निरर्थक है।

नामांकन के इस खेल ने लड़कियों को अगर आंकड़ों ने मान बढ़ाया तो इसका कारण आर्थिक व्यापार है। कोई भी 'निवेशकर्ता' लड़कों का नामांकन कराना नहीं चाहता। लड़के के नामांकन से किसी को घाटे का सामना करना पड़ सकता है। गणित है कि नौवीं कक्षा के छात्र को 2500 रुपये साइकिल के तथा 1800 रुपये छात्रवृत्ति के मिलेंगे। वहीँ नौवीं की छात्रा को 2500 रुपये साइकिल के, 1800 रुपये छात्रवृत्ति के, 1000 रुपये पोशाक के और 150 रुपये नैपकिन के मिलेंगे।

पूर्व मंत्री की बेटी के यौन शोषण मामले में जाँच के दौरान पीड़िता द्वारा पटना के नोट्रेडेम पब्लिक स्कूल, मुजफ्फरपुर के पारा माउंट एकेडेमी सहित सहरसा जिले के सिमरी बख्तियारपुर अंतर्गत सोनपुरा कन्या मध्य विद्यालय में पढ़ाई की बात सामने आई है। (प्रभात खबर, पटना, 22/4/2017) बिहार की स्कूली दुनिया के लिए यह कोई चौंकानेवाली खबर नहीं बल्कि एक कटु यथार्थ है। बिहार सरकार सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे छात्रों/छात्राओं की संख्या में जो वृद्धि दिखा रही है उसकी सच्चाई यही है कि एक बच्चे का नाम चार-चार सरकारी विद्यालयों में है। इसकी एकमात्र वजह छात्रों/छात्राओं को साईकिल, पोशाक, नैपकिन व छात्रवृत्ति की राशि है। सरकार यह पैसा सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई को प्रोत्साहन के नाम पर दे रही है, जबकि व्यवहार में ठीक इसका उल्टा हो रहा है। छात्र और अभिभावक का यह धंधा हो चुका है कि वे चार स्कूलों में नाम लिखाते हैं और एक मोटी रकम सरकार से ऐंठते हैं। सरकारी पैसे से वे पब्लिक स्कूलों और प्राइवेट कोचिंग की फीस भरते हैं। आपको सुनकर थोड़ी हैरानी होगी कि अभिभावक अब सरकारी विद्यालय बच्चे की पढ़ाई से सम्बंधित जानकारी के लिए नहीं बल्कि यह पूछने आते हैं कि किस बोर्ड का सर्टिफिकेट वे काम में लाएं। इसलिए बिहार सरकार को अगर सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक माहौल लौटाना है तो पैसे की लूट बंद करनी होगी।


आज लगभग हर पिता का सूत्रवाक्य है 'बेटा वही जो किसी तरह से पैसे कमा ले'. पैसे न कमानेवाला बेटा अपने ही घर में प्रताड़ित है. और यह भी सत्य है कि गलत हुए बगैर पैसा नहीं होता तथा पैसा हो जाने पर गलत हुए बगैर नहीं रहा जा सकता. यह नियम है, अपवाद की चर्चा न करें तो बेहतर. एक अकेला शिक्षक और शिक्षा का दोष नहीं. हर घर का मूल्य बदलना होगा. ऐसे में एक शिक्षक से उम्मीद की जाती है कि वह बच्चे का व्यक्तित्व गढ़े और इस तरह समाज का निर्माण करे. इसके लिए जरूरी है कि बच्चों के साथ-साथ समाज उसे हीरो/मॉडल समझे. आज की तारीख में शिक्षक समाज का सबसे नकारा जीव मान लिया गया है. सरकार ने उसकी दुर्गति कुछ इस तरह कर रखी है कि समाज में शिक्षक का नामकरण 'पेटपोसवा मास्टर' है. विडंबना यह है कि वह बेचारा अपने नाम के अनुरूप पेट भी कहाँ पोस पा रहा है ? छात्र सीधे शब्दों में शिक्षक से कहता है कि 'सर, इतना पढ़ने पर आपको छह से बारह ('एकमुश्त' वेतन-वृद्धि के बाद) हजार की नौकरी मिली. आपके पढ़ाये को कितने की नौकरी मिलेगी ?' इसे शब्दजाल न समझें. यह चेतावनी है कि अगर समाज को बदलना है, तो शिक्षक को समाज और बच्चे का हीरो/मॉडल बनाना होगा. इसमें जितना विलम्ब होगा, समाज उतना पीछे जायेगा. प्रेमचंद ने कभी लिखा था कि विद्या पढ़ने से नहीं, गुरु के आशीर्वाद से आती है. बिहार के नियोजित शिक्षक अपनी ही पीड़ा में कुछ इस कदर कराह रहे हैं कि वे आशीर्वाद क्या खाक देंगे !
सरकार किताब नहीं कूड़ा तैयार कराती है

बिहार सरकार 'गुणवत्तापूर्ण शिक्षा' की बात करती है. शिक्षा की बदहाली जानने के लिए तरह -तरह के गैर सरकारी संगठनों से सर्वे कराती है और सरकारी पैसा पानी की तरह बहाती है.लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकलता. ठोस नतीजा निकलता है ठोस काम करने से. बिहार सरकार के श्रम मंत्री दुलालचंद्र गोस्वामी तक ने स्वीकार किया है कि 'सरकारी स्कूलों की अपेक्षा निजी स्कूलों में पढ़ाई बेहतर होती है।' (प्रभात खबर, पटना, 10 अगस्त 2014, पृष्ठ 8) अगर स्थिति ऐसी है तो इसके कई कारण हैं।

सरकारी पुस्तकों का हाल देखकर लगता है कि जिन्हें एक वाक्य लिखने नहीं आता उनसे पाठ्य-पुस्तकें लिखवाई जाती हैं. नतीजा आपके सामने है. राज्य के कुल बीस विद्वानों ने मिलकर दसवीं कक्षा (सामाजिक विज्ञान) की पुस्तक 'इतिहास की दुनिया' तैयार की है. कहना अनावश्यक है कि 'प्रस्तुत पाठ्यपुस्तक की पांडुलिपि तैयार करने के पूर्व राज्य शिक्षा शोध व प्रशिक्षण परिषद, पटना द्वारा विभागीय पदाधिकारियों, विषय विशेषज्ञों, भाषा विशेषज्ञों और प्रारंभिक स्तर के शिक्षकों की कार्यशाला आयोजित की गई। काफी गहन चर्चा के बाद पुस्तक की पांडुलिपि का निर्माण किया गया। हालांकि हसन वारिस (तत्कालीन निदेशक प्रभारी) 'गहन चर्चा' की बात को खुद ही खारिज कर कहते हैं : 'अल्प समय में निर्मित पुस्तक के लिये समालोचनाओं व सुझावों का परिषद स्वागत करेगी।' 'अल्प समय' में 'गहन चर्चा' के बाद जो पुस्तक तैयार हो सकती है, उसका कुछ नमूना आप देख सकते हैं।

उसका 'आमुख' पढ़ रहा था. महज एक शुद्ध वाक्य देख पाने के लिए मैं तरस गया. किस साहस के साथ अपने बच्चों को कहूँ कि इस कूड़े से बचो. बच्चे तो किताब को प्रमाण मानते हैं. और विद्वानों द्वारा लिखित-परिवर्धित इस किताब को कूड़ा कौन कह रहा है ? एक नियोजित शिक्षक जिसपर न छात्र को भरोसा है, न सरकार को, न समाज को! कुछ नमूना आप भी देखें-(1) 'पाठ्य-पुस्तक के सभी अध्याय रोचकपूर्ण है।' (2) 'पाठ्य-पुस्तक में दिए गए विषय वस्तु विद्यार्थियों के दैनिक अनुभव पर आधारित हो, ऐसा प्रयास किया गया है।' (3) 'कहीं-कहीं ऐसे संदर्भित प्रश्न हैं, जिसे बच्चे वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विकसित करते हुए सत्य के निकट जाने हेतु कौतुहलता व जिज्ञासा रहेगी।' (4) 'पुस्तक की अधिकांश क्रियाकलाप बिना किसी सामग्री या कम लागत की सामग्री के साथ करवाई जा सकती है।' (5) 'पाठ्यक्रम के उद्देश्य और प्रकरण यथा भोजन, पदार्थ, सजीवों का संसार, गतिमान वस्तुएं, लोग एवं उनके विचार, वस्तुएं कैसे कार्य करती हैं, प्राकृतिक परिघटनाएं तथा प्राकृतिक संसाधन की मुख्य अवधारणाओं में दिये गये विषय-वस्तु पाठ्यपुस्तक के अध्यायों में परिलक्षित एवं समाविष्ट किया गया है।'

कहना होगा कि उक्त पुस्तक के दो पृष्ठ के 'आमुख' में शायद ही कोई ऐसा वाक्य हो जिसमें भाषिक और व्याकरणिक अशुद्धि 'समाविष्ट' न हो और वह 'परिलक्षित' न हो। शर्मनाक बात तो यह है कि 'आमुख' के लेखक को यह भी पता नहीं है कि पुस्तक 'सामाजिक विज्ञान' की है, अथवा 'विज्ञान' की। वे लिखते हैं, 'आशा है विज्ञान की यह पाठ्यपुस्तक बच्चों के लिए लाभदायक, आनंददायी और रुचिकर सिद्ध होगी।' सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में 'विज्ञान के रहस्यों को खोलने करने का प्रयास' होगा तो पुस्तक रुचिकर होगी ही!

बिहार राज्य शोध एवं प्रशिक्षण परिषद् , बिहार द्वारा विकसित व बिहार स्टेट टेक्स्टबुक पब्लिशिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड से प्रकाशित 6ठी कक्षा की हिंदी पाठ्यपुस्तक 'किसलय' (भाग-1) देखने को मिली। इस पुस्तक में पृष्ठ संख्या 3 पर एक विज्ञापन है जिसमें 'आनेवाली' (आने वाली) 'ध्यानपूर्वक' (ध्यान पूर्वक), 'मानवरहित' (मानव रहित), 'लापरवाहीपूर्वक' (लापरवाही पूर्वक), 'अन्तर्गत' आदि शब्द लिखने में लापरवाही बरती गई है। 'याद रहे आपकी जिन्दगी अमूल्य है' को 'याद रहे, आपकी जिन्दगी अमूल्य है।' यद्यपि यह एक पूर्ण वाक्य है, पुस्तक में पूर्ण विराम का प्रयोग नहीं किया गया है। पृष्ठ 4 पर 'असली चित्र' शीर्षक से एक कहानी संकलित है, जिसका पात्र 'तेनालीराम' है। दरअसल इसका सही नाम तेनालीरामन है। पृष्ठ 12 पर प्रश्न संख्या 2 में लिखा है, "ऊँची डाली, काली चिड़िया'। इन वाक्यों में ऊँची डाली की तथा काली चिड़िया की विशेषता बताता है।" अव्वल तो 'ऊँची डाली, काली चिड़िया' वाक्य नहीं है, इसलिए यहां पूर्ण विराम का अनावश्यक और निरर्थक प्रयोग है। दूसरे, ऊँची डाली की तथा काली चिड़िया की विशेषता 'बताती' है, न कि बताता है। पृष्ठ 98 पर केदारनाथ अग्रवाल की कविता 'वसंती हवा' है। दरअसल यह अपने मूल रूप में 'बसंती हवा' है। कविता में आगे लिखा है, 'हरे खेत, पोखर,/झुलती चली मैं/झुमती चली मैं।' मूल में यह 'झुलाती चली मैं, झुमाती चली मैं' है। इस तरह की 'अगंभीरता' से कविता में अर्थ का अनर्थ हुआ है। फिर आगे लिखा है, "उसे भी झकोरा, किया कान में 'कू', उतरकर भागी मैं"। कहने की जरूरत नहीं कि मूल कविता में 'उतरकर "भगी" मैं' है न कि 'भागी'। भागी से कविता की लय भी बाधित होती है। और आगे, 'खड़ी देख अलसी, लिए शीश कलसी, मुझे खूब सूझी-हिलाया-पिलाया, गिरी पर न कलसी'। ध्यान रहे कि मूल कविता में हिलाया-पिलाया' की बजाय 'हिलाया-झुलाया' लिखा है।

बीस विद्वानों की देखरेख में बच्चों के लिए तैयार की गई इस पाठ्यपुस्तक में इस कदर की अगंभीरता और लापरवाही अक्षम्य है। खासकर जब डॉक्टर एस. ए. मुईन (विभागाध्यक्ष, एस सी ई आर टी, पटना) और डॉक्टर ज्ञानदेव मणि त्रिपाठी जैसे 'आत्ममुग्ध' शिक्षाविद भी इसमें शामिल हों।

‘बिहार स्टेट टेक्स्टबुक पब्लिशिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड’ द्वारा कक्षा ग्यारह के लिए इतिहास की पाठ्यपुस्तक ‘विश्व इतिहास के कुछ विषय’ (प्रथम संस्करण : 2007, पुनर्मुद्रण : 2008) तैयार करवाई गई है. ‘पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति’ के सदस्यों के ‘नाम-पदनाम’ छापने में पूरा एक पृष्ठ जाया हुआ है. नीलाद्रि भट्टाचार्य उक्त समिति के मुख्य सलाहकार हैं. ‘विश्व इतिहास का अध्ययन’ शीर्षक से दो पृष्ठ की उनकी भूमिका भी है. उसकी कुछ पंक्तियाँ यहाँ देखें : (1) ‘‘नए इतिहासकार को अब कुछ ऐसे प्रमाण मिलते हैं जिन्हें पहले अनदेखा कर दिया गया था. वे इन प्रमाणों की व्याख्या करती हैं, नए अंतर्संबंध कायम करती है और इस तरह से एक नयी किताब लिख डालती हैं.’’ (2) ‘‘अक्सर किन्हीं विशेष घटनाओं का इतिहास पश्चिम की विजयी यात्रा की बड़ी कहानी का ही हिस्सा था.’’ (3) ‘‘इस यात्रा में विश्व इतिहास के कुछ विषय आपकी मदद करेगी’’. (4) ‘‘सबसे पहले यह पुस्तक विकास और प्रगति की महान कहानियों के पीछे छुपे ज्यादा ‘अँधेरे’ इतिहासों से आपका परिचय कराएगी’’.

Tuesday, May 22, 2018

भारतीय संस्कृति और 'स्वच्छता अभियान'


देश अभी 'स्वच्छता अभियान' के दौर से गुजर रहा है। लगभग सभी सरकारी और गैर सरकारी संगठन 'स्वच्छ भारत' बनाने के अभियान में जुटे हैं। शौचालय-निर्माण से लेकर स्वच्छता पर सेमिनार तक इस अभियान के हिस्सा हैं। डाउन टू अर्थ  पत्रिका, जो पिछले कई वर्षों से प्रकाशित हो रही है, स्वच्छता की समस्या से अटूट रिश्ता रखती है। आज पटना में उक्त पत्रिका की ओर से एक कार्यक्रम आयोजित था जिसमें थोड़े क्षणों के लिए मुझे भी शरीक होने का अवसर प्राप्त हुआ।

स्वच्छता अभियान में 'खुले में शौच' को विशेष 'फोकस' किया जा रहा है। माना जा रहा है खुले में शौच करना 'असभ्यता' और अस्वास्थ्यकर है। बताया जा रहा है कि हम जो खुले में शौच करते हैं वह हमारे वातावरण को तो दूषित करता ही है, साथ ही साथ और अंततः पेय जल में मिल जाता है। गोष्ठी में एक वक्ता ने कहा कि सूअर भी अपना मल नहीं खाता लेकिन खुले में शौच के परिणामस्वरूप हम मनुष्य पेय जल के रूप में मलपान करने को विवश हैं। मैं खुले में शौच करने की वकालत का साहस तो नहीं कर सकता लेकिन हमारा ग्रामीण जीवनानुभव इस तरह के तर्क को मानने से इनकार अवश्य ही करेगा। जिन्होंने गांव देखा है उनको मालूम है कि मल सूअर का पसंदीदा पारंपरिक आहार है। वे मल को अविलंब खा डालते हैं। अगर सूअर न भी हो तो ऐसे-ऐसे कीड़े होते हैं जो दो दिन में मल को मिट्टी बना डालते हैं। इसलिए पेयजल के रूप में मलपान करने की बात वही कर सकता है जिसने गांव सिर्फ किताबों में देखा, पढ़ा है।

हमारी भारतीय संस्कृति में मल इतना 'त्याज्य' और 'घृणित' कभी नहीं रहा है जितना इसे आज साबित करने की कोशिशें हो रही हैं। कहीं यह 'घृणा की राजनीति' का अनिवार्य फल तो नहीं? मैं बचपन से सुनता आ रहा हूँ कि 'सुखल गुह ब्राह्मण के लिट्टी', अर्थात सूखा हुआ मल तो ब्राह्मण की तरह दोषमुक्त है! भारतीय संस्कृति में अपना मल-मूत्र खाने की प्राचीन परंपरा रही है। पेशाब को शिवाम्बु भी कहा जाता रहा है और अघोरी जैसे पंथों के लोग तो आज भी मल-मूत्रपान को सिद्धि का अनिवार्य सोपान मानते हैं। और तो और मैंने अपने बचपन में मल को रामबाण औषधि की तरह व्यवहृत होते देखा है। एक समय की बात है जब मेरे पड़ोस की एक महिला ने आत्महत्या के निमित्त जहर खा लिया था। कई तरह के घरेलू उपचार किये गये लेकिन सब निष्फल गया। अंत में किसी की बुद्धि खुली और उसने मल घोलकर पिलाने की बात की। सलाह मान ली गई और मल पीते ही अगले क्षण मरीज ने सारा जहर बाहर उँड़ेल दिया। गनीमत कहिए कि उसकी अंतड़ियां अंदर ही रहीं।

बौद्ध ग्रंथ की एक कहानी में वर्णित है कि सक्क रोगी बुद्ध के शौचालय को स्वयं अकेले साफ करने पर जोर देता है और कहा गया है कि बुद्ध के मलमूत्र को अपने सिर पर उठाकर ले जाने में उसने बड़े आनंद का अनुभव किया। (देवराज चानना, प्राचीन भारत में दासता, पृष्ठ 196) बुद्ध के शौचालय का वर्णन प्रस्तुत है : 'उस शौचालय का दरवाजा था। वह सुगंधों से भरा हुआ था और पुष्प मालाओं से सजा हुआ था। उसमें और कोई नहीं जा सकता था और वह सेतिय की तरह दिखाई देता था। (समंतपासादिका, पृष्ठ 745; चानना, पूर्वोद्धृत, 199, पाद टिप्पणी संख्या 71)

धर्मानंद कोसंबी ने इस तरह की एक रोचक कहानी का हवाला दिया है-'काशी में तेलंग स्वामी नामक एक प्रसिद्ध संन्यासी थे। वे नंगे रहते थे। काशी में उनके समान नंगे घूमने वाले दूसरे भी बहुत-से परमहंस थे। उस समय वहाँ गॉडविन नामक बड़ा लोकप्रिय कलक्टर था (जिसे काशी के लोग गोविंद साहब कहते थे)। हिन्दू लोगों के रीति-रिवाजों की जानकारी उसने सहानुभूतिपूर्वक प्राप्त कर ली और ये नंगे बाबा लंगोटी लगाकर घूमा करें इसके लिए निम्नलिखित युक्ति निकाली। रास्ते में घूमने वाला नंगा बाबा जब भी पुलिस वालों को मिलता तो वे उसे साहब के पास ले जाते। तब साहब उससे पूछता, "क्या तुम परमहंस हो?" जब वह "हाँ" कहता तो साहब उसे अपना अन्न खाने को कहता। भला नंगा बाबा साहब का अन्न कैसे खाता? तब गोविंद साहब कहता, "शास्त्र में कहा गया है कि परमहंस तो किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं मानता और तुम्हारे मन में तो भेद-भाव मौजूद है। अतः तुम्हें नंगा नहीं घूमना चाहिए।" इस प्रकार बहुत-से नागा बाबाओं को उसने लंगोटी पहनने को बाध्य किया। एक बार ऐसा ही प्रसंग तेलंग स्वामी पर आ गया। जब यह बात फैल गई कि स्वामी जी को लेकर पुलिस वाले कलक्टर साहब के बंगले पर गये हैं तो उनके शिष्य एवं चाहने वाले बड़े-बड़े पंडित तथा अन्य प्रभावशाली व्यक्ति साहब के बंगले पर गये। साहब ने सबको बिठा लिया और तेलंग स्वामी से पूछा, "क्या आप परमहंस हैं?" स्वामी जी ने जब "हाँ" कहा तो साहब ने दूसरा प्रश्न पूछा, "क्या आप यहाँ का अन्न खाएंगे?"इस पर स्वामी जी ने पूछा, "क्या आप मेरा अन्न खाएंगे?" साहब ने जवाब दिया, "यद्यपि मैं परमहंस नहीं हूँ, फिर भी किसी का भी अन्न मैं खा लेता हूँ।" स्वामी जी ने वहीं अपने हाथ पर मलत्याग किया और हाथ आगे बढ़ाकर वे गोविंद साहब से बोले, "लीजिये, यह है मेरा अन्न। आप इसे खाकर दिखाइये!" साहब को बड़ी घृणा हुई और वह गुस्से से बोला, क्या यह आदमी के खाने योग्य अन्न है?" तब स्वामी जी ने वह विष्ठा खा डाली और हाथ झाड़-पोंछकर साफ कर लिया। यह देखकर साहब ने स्वामी को छोड़ दिया और फिर कभी उनकी बात भी नहीं पूछी।' (धर्मानंद कोसंबी, भगवान बुद्ध : जीवन और दर्शन, लोकभारती प्रकाशन, 1987, पृष्ठ 75-76)। जब धर्मानंद कोसंबी 1902 ईस्वी में काशी में थे तो वहां के पंडितों ने यह कहानी उन्हें बड़े "आदर" से सुनाई थी और उससे पहले उसी "आदर-बुद्धि" के साथ काशी-यात्रा नामक पुस्तक में यह प्रकाशित भी हुई थी। (धर्मानंद कोसंबी, पूर्वोद्धृत)

कहने की जरुरत नहीं कि भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा में शौच का संबंध स्वच्छता से कम, शुचिता अर्थात पवित्रता से ज्यादा है। संस्कृत के 'शौचम्' का अर्थ 'मलत्याग के कारण दूषित व्यक्तित्व का शुद्धिकरण' है। (वामन शिवराम आप्टे, संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश, पृष्ठ 1111) शायद इसीलिए हमारे यहां स्वच्छता का शुचिता से अलग शायद ही कभी अस्तित्व रहा हो। भारतीय ग्रामीण जनमानस में सदियों से चली आ रही बात कि 'खाना और पैखाना एक साथ नहीं रहना चाहिए', कमोबेश आज भी अमल में है। अर्थात जिस मकान में रसोईघर हो वहां शौचालय की बात सोची भी नहीं जा सकती। यह अवधारणा खुले में शौच का एक प्रमुख कारण रही है। इसीलिए कुछ सालों पहले तक गांव-देहात के लोग शहर में बसनेवाले लोगों को विधर्मी मानते रहे थे कि उनके घरों में रसोईघर और शौचालय साथ-साथ होता है। एक समय था जब ग्रामीण हिन्दू घरों में औरत को स्नान करने के उपरांत ही रसोईघर में प्रवेश की अनुमति होती थी। हाल-हाल तक यह बात कल्पना से परे थी कि कोई स्त्री रसोईघर में चप्पल पहनकर चली जाए। आज भी ग्रामीण परिवेश और मानसिकता की अधिकतर औरतें शौचालय से लौटने के बाद स्नान करना धर्म मानती हैं। कुछ औरतें 'फ्रेंच बाथ' से काम चलाती हैं तो कुछ औरतें अपनी देह पर पानी की बूंदें छिड़ककर 'पवित्र' होती रही हैं। कुछ घरों में अब भी आपको वैसी स्त्रियां मिल जाएंगी जिनके पास शौच जाने के लिए अलग वस्त्र होते हैं, ठीक जैसे अस्पतालों में मरीज से मिलने जाने के पहले वस्त्र बदलने होते हैं। यह है भारतीय समाज की परंपरा और आधुनिकता। दोनों में वस्त्र बदलने की क्रिया समान है लेकिन उसके पीछे की चेतना में फर्क है। एक में प्रेरक शक्ति शुचिता है तो दूसरे में स्वच्छता। दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि 21वीं शताब्दी में भी एक आम भारतीय की स्वच्छता की अवधारणा शुचिता से खाद-पानी लेती है।

Sunday, May 20, 2018

शौच और सूअर की कथा

भारत के दूसरे गांवों की तरह मेरे गांव में भी खुले में शौच के लिए जाने का दस्तूर था। शौच के लिए मेरे गांव में पुरुषों के बीच जो शब्द प्रचलित था वह 'दिसा-मैदान' अथवा 'डोल-डाल' था। कुछ लोग इसे 'फारिग' होना भी बोलते। प्रायः इन शब्दों से खुलापन और गति की ध्वनि निकलती है।

गांव में लोग सुबह-सुबह शौच जाते। कुछ लोगों को शाम को भी शौच की दरकार होती। अमल/नशा करनेवाले लोगों के बीच सुबह-शाम दो बार शौच जाने का रिवाज था। शाम में कुछ लोग भांग खाते और शौच के लिए जाते। मेरे गांव में एक कहावत भी प्रचलित थी-'भांग के गोला पेट में/लोटा लेकर खेत में।' लेकिन गांजा पीनेवाले इससे भिन्न नियम का पालन करते। वे पहले शौच जाते फिर चिलम में मुंह लगाते। गांजा पहले पीने से मल सूख जाता है। पैखाना को मल कहा जाता। हमारे गांव के भुकु बाबा हमेशा इसी नियम का पालन करते। पहले डोलडाल तब चिलम।

पितृसत्तात्मक भारतीय समाज में स्त्रियों की नागरिकता दोयम दर्जे की है; इसलिए तमाम तरह की बंदिशें हैं। सबसे बड़ी बंदिश तो यही है कि औरत, औरत की तरह दिखे नहीं। उसका खाना, नहाना, हगना आदि सब 'गोपनीय' कर्म हैं। उसके अधिकतर रोग 'गुप्त रोग' हैं। एक औरत खा सकती है, नहा सकती है और हग भी सकती है, लेकिन यह सब करती हुई 'दिखना' अनैतिक कर्म है। लोक में एक प्रचलित कहावत है-'औरत के नेहनई (स्नान) और खनई (भोजन) कोई देखे कोई न देखे।' विशेष रूप से मर्द न देखे। 'हगनई' तो शायद ही कोई देखे! इसीलिए गांव की स्त्रियां 'हगनई' को 'पर्दा जाना' कहती हैं लेकिन गांव के मनचले मर्द 'पर्दा' कहां मानते हैं! मुर्दहिया की किसुनी भौजी अपने पति को चिट्ठी में लिखती है : 'संभगिया क रहरिया में गंउवा क मेहरिया सब मैदान जाली, त ऊ (बन्सुवा) चोरबत्ती बारै ला।' (अनिता भारती, मुर्दहिया के स्त्री पात्र, मंतव्य 8 में उद्धृत)

'ढोड़ायचरितमानस' की महतो-पत्नी लोटा लेकर मैदान जा रही रमिया से सवाल करती है-''अरी ओ रमिया! कहाँ चली?' मुँह भरी हँसी लेकर रमिया जवाब देती है-'मैदान'।
कहती है क्या छोकरो! मैदान जा रही है लोटा लेकर?'
'क्यों, उससे क्या होता है?' 'फिर पूछती क्यों है? तू क्या मर्द है जो लोटा लेकर मैदान जायेगी?" (ढोड़ायचरितमानस, पृष्ठ 128) 'भांग के गोला पेट में, लोटा लेकर खेत में' कहावत का उत्तरांश अर्थात 'लोटा लेकर खेत में' जानेवाली बात महिलाओं पर लागू नहीं होती है। लोटा हाथ में लेने से मर्द समझ जाते हैं कि 'वह' दिसा-मैदान के लिए जा रही है। 'ढोड़ायचरितमानस' की रमिया लोटा लेकर 'मैदान' जाती है। उस गांव के लिए यह एक नई प्रथा की शुरुआत थी। यह बात मर्द क्या गांव की स्त्रियों को भी नहीं पचती है। उन औरतों की टिप्पणी है, 'कहती हूँ, क्या लाज-शर्म उतारकर रख दिया है? लोटा लेकर मैदान जा रही हो, मर्द लोग देखेंगे? लोटा हाथ में लिए झोटाहा देखते ही तो मर्द लोग समझ जायेंगे कि तू कहाँ जा रही है? यह सीधी बात भी क्या लोटे में घोलकर पिला देना होगा तारापुर की राजकन्या को? यह सब किरिस्तानी चाल-चलन हमारे मुहल्ले में चलाने आई है? यह क्या नट्टिन लोगों का गांव है?' (ढोड़ायचरितमानस, पृष्ठ 128)

मैं जब बहुत छोटा था तो शौच के लिए घर के आगे की परती जमीन में जाया करता। गांव के अंदर की परती जमीन को 'खंढ़ी' कहा जाता। खंढ़ी अथवा कोली (दो मकान के बीच की गली कोली कहलाती) शौच के लिए उपयुक्त जगह मानी जाती। जो बच्चे अधिक शौच करते उनकी माता अथवा दादी उन्हें चिढ़ातीं-'गोड़-हाथ सिरकी/पेट नदकोला/कने जा ह$ ... बाबू?/ हगे जा ही कोला।' मैं शौच के लिए जिस खंढ़ी का इस्तेमाल करता वहां दरअसल एक कच्चा कुआं था। उस कुआं में अब पानी नहीं था। इसलिए अब उसमें घर का कूड़ा फेंका जाता। साथ ही, उसके मुंह को ढंककर इस लायक बना दिया गया था कि शौच के लिए बच्चे बैठ सकें। घर के छोटे बच्चे उसी का प्रयोग करते। हमारे समय में चापाकल/हाथकल का प्रयोग शुरू हो चुका था इसलिए बेकार और अप्रासंगिक हो गये कुओं की इससे ज्यादा उपयोगिता नहीं रह गई थी।

थोड़ा बड़ा हुआ तो स्कूल में दाखिला हुआ। वहां भी शौचालय की व्यवस्था नहीं थी। स्कूल के बगल में एक सार्वजनिक पोखर था जहां बच्चे शौच करते। किसी लड़के को अगर शौच जाना होता तो अपने शिक्षक से 'पोखर' जाने की अनुमति प्राप्त करता। यह पोखर हमारा सार्वजनिक शौचालय होता। लड़कियों के लिए 'पोखर' की सुविधा नहीं थी। मुझे भी स्कूल अवधि में असमय शौच जाने की आदत नहीं थी। इसलिए तीन साल के स्कूली जीवन में मैं एक-दो बार ही 'पोखर' का लाभ ले सके। यहां बच्चे सार्वजनिक रूप से शौच करते। लगता जैसे एक स्कूल यहां भी चल रहा हो। अंग्रेज जमाने में तो कभी-कभी इस तरह सामूहिक शौच का आनंद लेना जीवन से हाथ धोना था। 1942 की क्रांति के समय आरा के पास जमीरा में पाखाना फिर रहे कुछ लोगों को गोली मार दी गई थी। (मन्मथनाथ गुप्त, भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास, आत्माराम एंड संस, 2009, पृष्ठ 374)

गांव में भी अब पोखर ही मेरा शौचालय होता। मेरे दरवाजे के ठीक नीचे एक बड़ा और गहरा पोखर था। यहां शौच करना निर्विघ्न नहीं होता। अगल-बगल के भुक्खड़ कुत्ते हमारे मल पर अपनी दावेदारी ठोकते और हमें दिक करते। कुत्तों की तुलना में कुतिया में मल खाने के लिए उतावलापन कुछ ज्यादा ही होता। कुत्ते किसी न किसी के पालतू होते। कुतिया लावारिस होती। अखाद्य ही उनका खाद्य होता। इसलिए मलत्याग करते बच्चे उनके निशाने पर होते। इसलिए मलत्याग के समय हमें चौकन्ना रहना होता और उन कुतियों को ढेला मार-मारकर भगाना होता।

जब थोड़ा और बड़े हुए तो दूर के और बड़े पोखर में जाने लगे। हम सुबह-सुबह शौच के लिए जाते तो पाते कि वहां पहले ही से पालतू सुअर स्वतंत्र विचरण कर रहे हैं। मेरे गांव में मुसहर जाति के लोगों का एक बड़ा टोला था। आज भी है। वे बड़े पैमाने पर सुअर पाला करते। आदमी का मल उसका प्रिय भोजन होता। लोक में एक कहावत प्रसिद्ध है, 'गाँड़ में गुह न सौ सुअर के न्यौता'। इससे पता चलता है कि मनुष्य का मल सुअर का प्रिय पारंपरिक आहार रहा है। हम मलत्याग कर रहे होते और वे आ धमकते। एक-दो सूअर का सामना करना मुश्किल नहीं होता किंतु जब उनका संख्या बल अधिक होता तो आक्रामक हो उठते। सूअर अपनी जिद और आक्रामकता के लिए मशहूर हैं।

 सामान्यतया वे हमारे उठने का इंतजार करते। लेकिन कभी-कभी उठने में देर कर देते तो उनके सब्र का बांध टूट जाता और पीछे से धक्का दे देते। कई बार हम वहीं लुढ़क जाते। हमारे गांव के एक बुजुर्ग के साथ कभी ठीक ऐसी ही घटना घटी थी। इससे मुक्ति के लिए उन्होंने एक तरकीब निकाली। जब तक वे शौच कर रहे होते, अपने चारों ओर लाठी घुमाया करते। तभी हमलोग बचपन में गुनगुनाया करते, लाठी में गुण बहुत है/सदा राखिए संग/झपटी कुत्ता को मारे.....। आप कुत्ता की जगह सुअर पढ़ सकते हैं।

जब हम बड़े हुए और पटना रहने लगे तो यदा-कदा घर जाते और घर में बने कच्चे शौचालय का इस्तेमाल करते। अधिकांश समय घर के बाहर व्यतीत करनेवाले किसान परिवार में घर के अंदर शौच करनेवाले को तनिक हिकारत की दृष्टि से देखा जाता। घर के बड़े-बूढ़ों की व्यंगोक्ति का मैं निशाना बनता। वे कहते, 'पटना जाकर यह लड़का इतना अहदी (आलसी) हो गया है कि दिसा-मैदान के लिए भी घर से बाहर नहीं निकलता। पता नहीं इसके जीवन का बाकी रोजगार कैसे चलेगा?' अब हम राह चलते पैखाने का समाजशास्त्रीय विश्लेषण भी करने लगे थे। मसलन कौन-सा पैखाना खाते-पीते घर के लोगों का है और कौन गरीबों का। इस संदर्भ में मां एक कहानी कहती थी जिसका सार था, 'बाकी के गुह कचर-मचर, राजा के गुह गुहसंकरी।' कौन स्वस्थ आदमी का पैखाना है और कौन अस्वस्थ आदमी का-यह भी हम नोट करते। बचपन में हमलोग एक कहानी सुनते थे। मेरे गांव के लखनलाल के अगुआ आये थे। शादी-व्याह के निमित्त जो लोग आते हैं उनको अगुआ कहा जाता है। पहले जब अगुआ आता था तो उसमें एकाध प्रश्नादि पूछनेवाला भी होता। उसने लड़के से सवाल किया कि 'दिशा कितने तरह की होती है?' लड़का पढ़ा-लिखा नहीं था। तनिक मंदबुद्धि भी था। कहा, 'दिसा का कोई हिसाब नहीं है। जैसा खाना, वैसा पैखाना। रोटी-भात खाने पर कठिल (कड़ा) पैखाना होगा। खेसारी की दाल खाने पर पतला और खेसारी-चना के साग खाने पर काला।' अगुआ को इतने गहन ज्ञान वाला लड़का नहीं चाहिए था। उठकर जो गये सो फिर लौटकर नहीं आये।