संयोग ऐसा हुआ कि मित्र कुमार मुकुल की लोहिया वाली किताब कई बार हाथ लगी और फिर दूर चली गई जिससे आद्योपांत पढ़ा जाना संभव न हो सका था। आज फिर उसे पढ़ने हेतु निकाला। आदतवश फ्लैप ही से पढ़ना शुरू किया। कुमार मुकुल लिखते हैं-''लोहिया की मुख्य स्थापना पूंजीवादी देशों के मजदूरों और औपनिवेशिक मजदूरों की स्थिति में अंतर को लेकर है। लोहिया की इस स्थापना से गुजरने के बाद 'दुनिया के मजदूरो एक हो' का नारा भावनात्मक लगने लगता है।'' अव्वल तो यह कि कुमार मुकुल जिसे लोहिया की 'मुख्य स्थापना' बताते हैं उस पर स्वयं मार्क्स काफी कुछ लिख चुके थे। बाद में उसे लेनिन ने भी 'अपडेट' किया। इसी 'ज्ञान' का नतीजा था कि लेनिन समाजवादी क्रांति को औपनिवेशिक देशों में चल रहे मुक्ति-संघर्ष से जोड़कर देखते थे। 'दुनिया के मजदूरो एक हो' का नारा न मार्क्स के ज़माने में 'भावनात्मक' था न आज है। यह ऐसा निष्कर्ष है जिसका अब तक का सबसे विकसित, वैज्ञानिक और समृद्ध तर्कशास्त्र है.
राममनोहर लोहिया में शुरू ही से मार्क्सवाद-विरोध का स्वर रहा है। इसका मुख्य कारण उन पर प्रोफेसर बर्नर सोम्बार्ट का प्रभाव है जिनकी छत्रछाया में उन्होंने बर्लिन में अध्ययन और शोधकार्य किया था। (गिरीश मिश्र, रामविलास शर्मा की बृहत्रयी का 'लोहिया कांड', आलोचना, अप्रैल-जून 2001, पृष्ठ 137) प्रोफेसर सोम्बार्ट अपने समय के प्रख्यात अर्थशास्त्री-समाजशास्त्री थे। उन्होंने अपना बौद्धिक जीवन एक मार्क्सवादी के रूप में शुरू किया परंतु अंत हिटलर-समर्थक नेशनल सोशलिस्ट के रूप में किया। इसीलिए आर्थर मित्ज़मैन ने उन्हें 'वेदर कॉक' कहकर पुकारा। 19वीं सदी के अंतिम वर्षों से ही सोम्बार्ट का वैज्ञानिक समाजवाद में विश्वास खत्म हो गया और उन्होंने मान लिया कि औद्योगिक सभ्यता प्रगति की एजेंट नहीं है इसलिए उसकी आवश्यकता नहीं है। राममनोहर लोहिया के चिंतन पर इन विचारों का असर स्पष्ट परिलक्षित होता है। उनका जयप्रकाश नारायण और आचार्य नरेन्द्र देव की तरह समाजवाद के प्रति कभी कोई आकर्षण नहीं रहा और न ही उन्होंने नेहरु द्वारा आजादी के पूर्व और बाद भारत के औद्योगिकीकरण पर दिए गए जोर का समर्थन किया। (गिरीश मिश्र, पृष्ठ 137)
1933 के आसपास की बात है। जो लोग जेलों में मार्क्सवादी साहित्य के सम्पर्क में आए उनमें अशोक मेहता, अच्युत पटवर्द्धन और मीनू मसानी के साथ लोहिया भी थे। इन लोगों का ख्याल हुआ कि किसानों और मजदूरों के संगठन के बारे में कांग्रेस का 'ओरिएंटेशन' होना चाहिए। उस वक्त जवाहरलाल नेहरू का विदर इंडिया निकला था। जवाहरलाल जी ने यह कहा कि कांग्रेस को अगर अपने राष्ट्रीय आंदोलन के लक्ष्य को पूरा करना है तो, 'इट शुड बेस इटसेल्फ ऑन वर्कर्स एण्ड पीजेन्ट्स'। यह नेहरू और उन नेताओं की समझदारी थी जो कम्युनिस्ट साहित्य के सम्पर्क में आए थे। (किशोरी प्रसन्न सिंह, राह की खोज में, अन्वेषा प्रकाशन, पृष्ठ 28)
1934 के दिनों में जयप्रकाश जी सोशलिस्ट-कम्युनिस्ट एकता के लिए चिंतित रहा करते थे। 1939 में कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन के समय की घटना है कि जयप्रकाश जी ने डॉक्टर लोहिया से कहा कि 'यह कागज कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर में दे आओ'। इस पर लोहिया ने उत्तर दिया, 'मैं कम्युनिस्टों के दफ्तर में तो नहीं ही जाऊंगा'। इस पर जयप्रकाश जी ने फाइल लोहिया की देह पर फेंकते हुए कहा, 'डैम इट। तुम कम्युनिस्टों को अछूत समझते हो और देश में समाजवाद की स्थापना करना चाहते हो?' (किशोरी प्रसन्न सिंह, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 193) बाद के अपने एक भाषण में जयप्रकाश नारायण ने भी लोहिया वाला स्टैंड लिया। कहा कि 'कम्युनिस्टों के साथ मित्रता का अर्थ अपने को धृतराष्ट्र-आलिंगन में देना है।' (वही) लोहिया को मार्क्सवादियों के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने की जो मित्र भूमिका निभानी चाहिए थी, दुर्भाग्य से वह संयुक्त मोर्चा नहीं बन पाया। जो लोहिया के साथ जुड़े हुए चिंतक थे उन्होंने मार्क्सवाद पर सबसे ज्यादा आक्रमण किया और यह दुर्भाग्यपूर्ण है। (आलोकधन्वा, पाखी, मई 2014, पृष्ठ 9)
1938 के अगस्त-सितंबर महीने में यूरोप की घटनाएं युद्ध की ओर संकेत करने लगी थीं। यूरोप की घटनाओं पर कांग्रेस-सोशलिस्ट पार्टी में बहस छिड़ी हुई थी। चेकोस्लोवाकिया पर जब संकट आया, म्यूनिख समझौते के सवाल को लेकर कांग्रेस-सोशलिस्ट पार्टी के कुछ जवाबदेह नेता युद्ध के खतरे की जवाबदेही सोवियत की नीतियों पर थोप रहे थे। किशोरी प्रसन्न सिंह जैसे कुछ नेता ठीक इसके उलट सोवियत की नीतियों का समर्थन करते हुए युद्ध के खतरे के लिए जवाबदेह और दोषी ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को बता रहे थे। (किशोरी प्रसन्न सिंह, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 165) इस टकराव के कारण पार्टी के चार बड़े नेता डॉक्टर राममनोहर लोहिया, मीनू मसानी, अशोक मेहता और अच्युत पटवर्द्धन पार्टी से अलग हो गये, पर जयप्रकाश नारायण के हस्तक्षेप पर फिर वापस हुए। (वही, पृष्ठ 165-66)
'1957 के बाद जब कम्युनिस्ट पार्टी का वर्चस्व बढ़ने लगा, और थोड़े दिनों तक कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट पार्टियों में टक्कर के बाद सोशलिस्ट पार्टी का प्रभाव घटने लगा तो जयप्रकाश जैसे सोशलिस्ट नेता कहने लगे कि हम जनसंघ के साथ मिलकर कम्युनिस्टों से लड़ेंगे। जयप्रकाश नारायण, डॉक्टर राममनोहर लोहिया ये सारे जो सोशलिस्ट नेता थे, वे कहते थे कि बिना जनसंघ से मिले हम कम्युनिस्टों का मुकाबला नहीं कर सकते।' (इन्द्रदीप सिन्हा, 'क्या रही कम्युनिस्ट पार्टी में फूट की पृष्ठभूमि?' कम्युनिस्ट संदेश, वर्ष 30, अंक 11-12,
मिथक और किंवदंती
लोहिया की गहरी दिलचस्पी हिन्दू मिथकों के अध्ययन और पुनर्व्याख्या में थी। उन्होंने दो पौराणिक ऋषियों-वशिष्ठ और विश्वामित्र को नये नजरिए से देखने की कोशिश की। 'वशिष्ठ को हिन्दू समाज में यथास्थिति और गतिहीनता का प्रतीक बतलाया जबकि विश्वामित्र को परिवर्तन और नीचे से ऊपर की ओर गतिशीलता का प्रतीक कहा।' (गिरीश मिश्र/ब्रजकुमार पांडेय, 'संस्कृतिसम्बन्धी लोहिया के विचार', कसौटी : नौ, पृष्ठ 44) लोहिया की इस व्याख्या से स्पष्ट है कि 'वे जातिप्रथा को चुनौती नहीं देते और न ही उसके औचित्य को नकारते हैं बल्कि वे विश्वामित्र को प्रगतिशील बतला उसके चौखटे में ही ऊपर की ओर उठ अपनी स्थिति सुधारने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित करते हैं। लगता है, उन पर बिहार और उत्तर प्रदेश में पिछली शताब्दी के दौरान छोटी जातियों द्वारा जनेऊ धारण कर और कर्मकांड अपनाकर क्षत्रिय या ब्राह्मण घोषित करने की मुहिम का जबर्दस्त असर था।' (वही, पृष्ठ 45) अकारण नहीं है कि डॉक्टर लोहिया ने, बाद में आकर जबसे नेहरू, जयप्रकाश जी से उनका टकराव हुआ, आर्थिक को छोड़ दिया, उन्होंने जाति को ही रखा। (भोगेन्द्र झा, क्रांतियोग, मातृभाषा प्रकाशन, दरभंगा, 2002, पृष्ठ 171) 'लोहिया के साथ मुश्किल थी कि उन्होंने अपनी मान्यताओं से अलग होकर समझने की कोशिश नहीं की। उन्होंने वर्णों को ज्यादा समझा, जातियों को ज्यादा समझा।' (आलोकधन्वा, पाखी, मई 2014, पृष्ठ 9) किन्तु जो हाथ दमन करता है, वह हाथ किसी जाति का नहीं है, वह हाथ केवल पूंजीवाद का है- इसे समझने में लोहिया असफल रहे। वे चीजों को मार्क्सवादी तरीके से न तो समझते थे, न समझना चाहते थे।
लोहिया का विश्लेषण राजनीतिक ज्यादा है, ऐतिहासिक बहुत ही कम, न के बराबर। राम, कृष्ण और शिव से संबंधित मिथकों और किंवदंतियों में इतिहास के प्रत्येक कालखंड में कुछ नया जुड़ता रहा है। इसकी व्याख्या काल-सापेक्ष व ऐतिहासिक संदर्भ ही में उचित है। यद्यपि ऐसा करना काफी मुश्किल है क्योंकि इनका कोई एक 'टेक्स्ट' नहीं है बल्कि 'टेक्स्ट्स' हैं। अतः कहना होगा कि मिथकों और किंवदंतियों की व्याख्या-पुनर्व्याख्या में लोहिया को थोड़ी सावधानी बरतनी थी।
लोहिया, अज्ञेय और दिनमान
27 फरवरी 1965 के अंक में लोहिया की चिट्ठी छपी थी। ..."सुना, मालिकों ने 'अमेरिकी टाइम' के नमूने पर 'दिनमान' निकालने की सोची है।" लोहिया अपने चारित्रिक अंदाज में व्यंग्यपूर्ण स्वागत करते हैं इस नये उपक्रम का। "एक ओर पुराने हिंदुस्तान की नासमझ पूजा करनेवाले पीछे देखू लोग हैं तो दूसरी ओर अमरीकी या रूसी या पश्चिम योरोपीय नकल पर चलनेवाले लोग। तीसरी ओर 'नकली एशियाई रुख अपनानेवालों' से भी लोहिया को वितृष्णा है। क्या खाक लिखेंगे वे विदेशी मामलों पर।" नहीं-नहीं। यह पीछे-देखू और बगल-देखू यानी विश्वयारी मनोवृत्ति नहीं चाहिए। 'आगे-देखू' रुख चाहिए। लोहिया का तेवर चुनौती भरा है : कि देखें, आप कैसे इस दुहरी-तिहरी समस्या से निबटते हैं। निबटने का माद्दा भी आप में है कि नहीं? (रमेशचंद्र शाह, पत्रकारिता के युग निर्माता : स. ही. वात्स्यायन 'अज्ञेय', प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, 2010, पृष्ठ 37)
अज्ञेय, लोहिया के कथित और अ-कथित दोनों को गंभीरतापूर्वक ग्रहण करते हैं और प्रत्युत्तर में कहते हैं-"दिनमान' के लिए अमरीकी 'टाइम' नमूना नहीं है। हाँ, समाचार संग्रह के लिए जितना बड़ा संगठन 'दिनमान' कर सकेगा, करेगा। विदेशी मामलों पर लिखनेवाले हिंदुस्तानियों की 'रुख' के अलावा एक कमी यह भी रहती है कि उनके सोचने पर अंग्रेजी की छाप बहुत गहरी रहती है, वे भारतीय भाषाओं में नहीं सोचते, अनुवाद में सोचते हैं-चाहे वे अंग्रेजी- विरोधी ही क्यों न हों। 'दिनमान' ऐसी भाषा में ऐसे चिंतन का प्रयत्न करेगा कि उसमें न तो 'हिंदुस्तान की नासमझ पूजा' दिखेगी और न हिंदुस्तान की किसी भी भाषा का कम-समझ मलीदा।" (वही, पृष्ठ 37-38)
'दिनमान' के प्रवेशांक में कच्छ के समझौते को लेकर 'पीढ़ियों का मिलन-शांति की भूमिका' शीर्षक से संपादकीय छपा था। इसपर अन्य कई लोगों के साथ लोहिया की भी प्रतिक्रिया आयी थी। अज्ञेय लिखते हैं-"कच्छ के समझौते की जो विविध प्रतिक्रियाएं हुईं, उनमें से कई-एक तो अपेक्षित थीं। जनसंघ का उसे राष्ट्रीय अपमान घोषित करना, जे. पी. का एक शांतिवादी के नाते उसका समर्थन करना, कृपलानी द्वारा सरकार का अत्यंत संव्यंग्य अनुमोदन, करियप्पा द्वारा समझौते की प्रशंसा-इनमें से किसी को भी आश्चर्यजनक नहीं कहा जा सकता। न ही राममनोहर लोहिया का समझौते को 'तिहरी पराजय' मानना और सरकार के माथे पर कालिख का टीका लगाने के साथ जनसंघ की प्रशंसा कर देना कोई विस्मय की बात है।" (वही, पृष्ठ 43 में उद्धृत)
लोहिया की अज्ञेय और भी जोरदार तरीके से खबर लेते हैं-"अपने गंभीर अध्ययन और मौलिक चिंतन के बावजूद लोहिया बराबर अपने को ऐसी स्थिति में डालते (या रखते), जहाँ उनकी नीतियों की बुनियाद एक सर्वथा नकारात्मक 'हटाओ'-वाद के सिद्धांत पर कायम रही है। इसी बुनियादी 'नास्तुवाद' के कारण राष्ट्रभाषा (या भाषाओं) का आंदोलन उनके लिए केवल 'अंग्रेजी हटाओ' का आंदोलन बन गया। आज समाजवाद की प्रतिष्ठा का उनका सारा आग्रह 'कांग्रेस हटाओ' का रूप लिये हुए है, चाहे इसके लिए उन्हें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष साम्प्रदायिकता का ही समर्थक बनना पड़ जाए। एक समय था जब उनके 'कांग्रेस हटाओ' के व्यापकतर नारे को भी वह केवल एक व्यक्ति पर केंद्रित करके कह सकते थे कि अमुक एक व्यक्ति को हटाओ, मानों उसके हटने से ही लोहियाई समाजवाद के सारे अवरुद्ध मार्ग खुल जाएंगे। आज वह महान व्यक्तित्व नहीं है, पर यह 'अमुक को हटाओ'-वादी प्रवृत्ति ज्यों-की-त्यों है।" (वही, पृष्ठ 44 में उद्धृत)
इससे ज्यादा गंभीर व मारक आलोचना लोहिया की राजनीति और कार्यपद्धति की भला और क्या हो सकती है! किन्तु लोहिया की दिनमानी आलोचना यहीं शेष नहीं होती। अज्ञेय आगे लिखते हैं-"लोहिया की ठेठ भाषा में ऐसे बिम्ब उभारने की शक्ति है, जिनकी छाप मन पर बनी रहे; पर तर्क में जब हम बिम्बों और प्रतीकों का सहारा अधिक लेने लगते हैं तब सच्चाई के खो जाने का भी खतरा रहता है। अपनी नकारात्मक राजनीति के समर्थन में लोहिया जो दलील देते हैं कि 'घर में कल फिर धूल जम जाएगी, क्या इस कारण गृहणी आज झाड़ू लगाना छोड़ देती है?' वह भी इसी कोटि की दलील है, सत्य उसमें खो जाता है, क्योंकि उसके एक अंश का एक चमत्कारी चित्र उसे ओट कर लेता है। गृहिणी कल की धूल के डर से आज का झाड़ू लगाना नहीं छोड़ती; पर साथ ही आज के अन्य सैंकड़ों कर्तव्य भी नहीं भूलती-भोजन-पानी की व्यवस्था, सामने झाड़ू लगाते समय पिछवाड़े का दरवाजा बंद करना या पिछवाड़े का कचरा फेंकते समय सामने की सांकल चढ़ा देना इत्यादि। और धूलवाली बात को ही सामने रखें, तो यह भी सोचना होगा कि क्या केवल घर के भीतर की धूल झाड़ना ही इति है? यदि गृहणी जानती है कि इतनी धूल का कारण यह है कि दूर की मरुभूमि क्रमशः शहर की ओर बढ़ती आ रही है और धूल वास्तव में वहीं से उड़कर आयी हुई रेत है, तो वह स्वयं झाड़ू लगाती हुई उन लोगों को प्रोत्साहन भी देगी जो मरुस्थल में पेड़ लगाकर उसकी बाढ़ रोकना चाहते हैं। और प्रोत्साहन न देगी तो कम-से-कम कोसती तो न जाएगी और न ही उसका रास्ता रोकनेवालों की दाद देगी। निस्संदेह यह तर्क भी वैसा ही रूपकवादी तर्क है, जिसे हमने खतरनाक बताया है। इसे प्रस्तुत करने का उद्देश्य यही दिखाना है कि यह भीड़ में भले ही प्रभाव दिखा जाए; सत्य के शोध में काम नहीं देता।" (वही, पृष्ठ 44-45 में उद्धृत)
बाल की खाल!
'समाजवादी नेताओं में से कुछ को अध्यात्म ने खींचा तो कुछ को व्यक्तिवाद ने।' (दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1987, पृष्ठ 153) 1934 का लोहिया युवक होते हुए भी 'विनयी और सुशील' था किन्तु बुढ़ापे के समीप पहुंचकर वे 'उग्रपंथी' हो गये थे। जवाहरलाल नेहरु को लेकर संभवतः एक ग्रंथि विकसित हो गयी थी। उनका विचार बन गया था कि जवाहरलाल जी से बढ़कर इस देश का अहित और किसी ने नहीं किया है तथा जब तक देश में कांग्रेस का राज है, तब तक देश की हालत बिगड़ती ही जायेगी। अतः उन्होंने निर्द्वन्द्व और सीधी राय बना ली थी कि जवाहरलाल जी का जितना भी विरोध किया जाय, वह कम है और कांग्रेस को उखाड़ने के लिए जो भी रास्ते दिखायी पड़ें, उन्हें जरूर आजमाना चाहिए। (दिनकर, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 154)
एक बार जब लोहिया की रामास्वामी नायकर से बात हुई तो उन्होंने अन्य बातों के साथ उनसे इस बात का भी अनुरोध किया कि वह गांधीजी के चित्र न जलाएं क्योंकि वह राष्ट्र के प्रतीक हैं। इस प्रसंग में उन्होंने (लोहिया ने) कहा, "यों तो मेरी राय है कि किसी की भी तस्वीर नहीं जलाई जानी चाहिए। परंतु यदि आप नेहरू की तस्वीर जलाते हैं तो मुझे बहुत ज्यादा एतराज न होगा, क्योंकि वह राष्ट्र के प्रतीक नहीं हैं।" (भगवान सिंह, 'गांधी, आंबेडकर और लोहिया', कसौटी : दस, पृष्ठ 47 में उद्धृत)
आजाद भारत में भी लोहिया को कई बार जेल जाना पड़ा था। एक बार वे जिस जेल में कैद किये गये थे, जवाहरलाल नेहरू की एक प्रतिमा स्थापित थी। जेल से छूटने पर लोहिया के मित्रों ने उनसे पूछा, "कहिए, इस बार का कारावास कैसा रहा?" लोहिया ने कहा, "कुछ मत पूछो। मैं जिस कोठरी में कैद था, उसी के सामने नेहरु की मूर्ति खड़ी थी और हर वक्त मेरी नजर उसी पर पड़ जाती थी। जल्दी रिहाई हो गयी, नहीं तो उस मूर्ति को देखते-देखते मैं पागल हो जाता।" (दिनकर, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 154) लोहिया का नेहरू-द्वेष इतना गहरा हो चुका था कि उनके निधन पर भी शमित न हुआ। कवि केदारनाथ अग्रवाल ने लिखा है, "इधर कल या परसों नेशनल हेराल्ड में पढ़ा कि राममनोहर लोहिया ने अमेरिका में नेहरू की मृत्यु का समाचार सुनकर बे सिर पैर की बकवास की है। हैरत में हूँ कि वह पागल तो नहीं है। कहता है कि नेहरू का कुछ भी योग नहीं है। धत्तेरे सिरफिरे की। उफ़! जी चाहता है कि ऐसे लोगों का दिमाग दुरुस्त किया जाये। बेहयाई की लिमिट हो गई। द्वेष और दम्भ की यह घोषणा बिल्ली की खिसियाहट की सिवाय कुछ नहीं है।" (केदारनाथ अग्रवाल का पत्र (5/6/1964) रामविलास शर्मा के नाम, मित्र संवाद, भाग 2, पृष्ठ 44)
सन 1962 ईस्वी के अक्टूबर में, चीनी आक्रमण से पूर्व दिनकर ने 'एनार्की' नामक व्यंग्य-काव्य लिखा था, जिसकी पंक्तियां हैं-"तब कहो, लोहिया महान है,/एक ही तो वीर यहां सीना रहा तान है।" ये दो पंक्तियां लोहिया को बहुत पसंद थीं। कभी-कभी वे दिनकर से पूछते कि 'ये पंक्तियां कहीं तुमने व्यंग्य में तो नहीं लिखी हैं' तो कवि का जवाब होता-"वैसे तो पूरी कविता ही व्यंग्य की कविता है, मगर व्यंग्य होने पर भी आपके 'सीना तानने' की बड़ाई ही होती है।" एक दिन मजाक-मजाक में लोहिया ने यह भी कहा, "महाकवि, ये छिट-पुट पंक्तियां काफी नहीं हैं। तुम्हें मुझपर कोई वैसी कविता लिखनी चाहिए, जैसी तुमने मेरे दोस्त जयप्रकाशजी पर लिखी थी।" "जिस दिन आप मुझे उस तरह प्रेरित कर देंगे, जिस तरह मैं जयप्रकाशजी से प्रेरित हुआ था, उस दिन कविता आपसे-आप निकल पड़ेगी।" (वही, पृष्ठ 155) जवाब तो दिनकर ने भी हँसते-हँसते दिया था लेकिन बात बड़ी ही गंभीर और चोट करनेवाली थी।
लोहिया जब आखिरी बार अमरीका गये थे, उन्हें लेखकों ने कुछ किताबें भेंट की थीं। उनमें से एक किताब कविता की किताब थी। कवयित्री थीं रूथ स्टीफेन। रूथ स्टीफेन ने अपनी पुस्तक इस टिप्पणी के साथ भेंट की थी : "For Ram, who rips shadows into rags." रूथ की नजर में लोहिया ऐसा आदमी है जो 'बाल की खाल उधेड़ता है और काल्पनिक छायाओं के चिथड़े उड़ा देता है।' सचमुच, कभी-कभी ऐसा लगता है कि जिस शत्रु पर लोहिया बाण चला रहे हैं, वह वास्तविक कम, काल्पनिक अधिक है। (वही)