Sunday, October 11, 2026

लोकनायक जयप्रकाश!

जयप्रकाश नारायण कहते हैं : 'मेरा अतीत-जीवन-पथ किसी बाहरी व्यक्ति को अस्थिरता तथा अन्धान्वेषण का एक टेढ़ा-मेढ़ा, वक्र रेखाचित्र-जैसा प्रतीत होगा।'

1929 में जेपी जब स्वदेश लौटे तो एक 'प्रतिबद्ध मार्क्सवादी' थे। मार्क्सवाद में उनका यह विश्वास 1936 में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'समाजवाद ही क्यों?' में स्पष्ट रूप से प्रकट होता है। इस पुस्तक के प्रथम अध्याय में जयप्रकाश स्पष्ट शब्दों में कहते हैं : 'समाजवाद का केवल एक रूप है, एक सिद्धांत है और वह मार्क्सवाद है।' किन्तु बाद के दिनों में उन्होंने स्वीकार किया कि 'वे मार्क्सवाद की विचारधारा द्वारा छले गये थे।' 

किन्तु इस 'मार्क्सवादी मन' ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में कांग्रेस की शरण ली, क्योंकि समय उन्हें 'मार्क्सवाद के अनुकूल' नहीं जान पड़ा। नतीजा हुआ कि 1940 के आसपास मार्क्सवाद का दामन छोड़ 'लोकतांत्रिक समाजवाद' का दामन थाम लिया। यह दौर 1952 तक जारी रहा। और कहना जरूरी है कि 1952 के प्रथम चुनाव में आशानुरूप सफलता न मिल पाने के बाद दलीय राजनीति से संन्यास ले भूदानी हो गए।

1934 के दिनों में जयप्रकाश जी सोशलिस्ट-कम्युनिस्ट एकता के लिए चिंतित रहा करते थे। घटना है कि जयप्रकाश जी ने डॉक्टर लोहिया से कहा कि 'यह कागज कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर में दे आओ'। इस पर लोहिया ने उत्तर दिया, 'मैं कम्युनिस्टों के दफ्तर में तो नहीं ही जाऊंगा'। इस पर जयप्रकाश जी ने फाइल लोहिया की देह पर फेंकते हुए कहा, 'डैम इट। तुम कम्युनिस्टों को अछूत समझते हो और देश में समाजवाद की स्थापना करना चाहते हो?' 

'1957 के बाद जब कम्युनिस्ट पार्टी का वर्चस्व बढ़ने लगा, और थोड़े दिनों तक कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट पार्टियों में टक्कर के बाद सोशलिस्ट पार्टी का प्रभाव घटने लगा तो जयप्रकाश जैसे सोशलिस्ट नेता कहने लगे कि हम जनसंघ के साथ मिलकर कम्युनिस्टों से लड़ेंगे। जयप्रकाश नारायण, डॉक्टर राममनोहर लोहिया ये सारे जो सोशलिस्ट नेता थे, वे कहते थे कि बिना जनसंघ से मिले हम कम्युनिस्टों का मुकाबला नहीं कर सकते।' 

समाजवादी जे.पी. को नक्षत्र मालाकार ने जो फटकार लगायी थी उसे भी याद रखना होगा. सन 1936 में सोनपुर में समाजवादियों का शिविर आयोजित था. नक्षत्र मालाकार भी शामिल थे. जयप्रकाश नारायण उस शिविर के प्रिंसिपल थे. एक दिन उन्होंने (नक्षत्र मालाकार) देखा कि शिविर के अंतर्गत दो तरह की भोजन-व्यवस्था चल रही है. उन्हें यह सब अच्छा नहीं लगा. उन्होंने जयप्रकाश नारायण जी से इस दोहरी व्यवस्था का कारण पूछ दिया. जयप्रकाश जी ने उत्तर दिया-‘यहाँ नेताओं के अलग और कार्यकर्ताओं के लिए अलग भोजन-व्यवस्था है.’ नक्षत्र मालाकार को इस उत्तर से घोर ‘रिएक्शन’ हुआ. उन्होंने कहा- ‘अइसन दुरंगी नीति से समाजवाद न अतौ जयप्रकाशजी.’ 

जेल से छूटने के बाद बाबा नागार्जुन लोगों को एक कविता सुनाते थे-'कदमकुआं, हुआँ, हुआँ, हुआँ', यानी सियार लोग जहाँ जमा थे, वही कदमकुआं था। कहने की जरूरत नहीं कि पटना के कदमकुआं मुहल्ले में जयप्रकाश बाबू रहते थे!

जे. पी. की कभी 'चेतावनी' थी : ‘मुझे सुनने में आया है कि हमारे बहुत से नौजवान भाई राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में भर्ती हो रहे हैं.  मैं साफ कहूँ, यह आप गलत कर रहे हैं, आप गलत रास्ते पर जा रहे हैं.’ ......‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पीछे करोड़पति हैं, राजे महाराजे हैं, उनका रुपया है, उनका हाथ है. उनके पीछे छिपे मतलब को समझना मुश्किल नहीं है.’ दुर्भाग्य कि अपनी ही 'चेतावनी' को भूल जे. पी. खुद आर. एस. एस. की गोद में जा बैठे!

बिहार के मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर ने लोकसभा को बताया था कि आपातकाल के दिनों में एक निर्दोष साधु को पुलिस सब इंस्पेक्टर ने गिरफ्तार कर लिया था। वह साधु गंडक नदी में स्नान के उपरांत 'जय नारायण, जय नारायण' का जाप कर रहा था। कहने की आवश्यकता नहीं कि साधु को जयप्रकाश नारायण का शिष्य समझ लिया गया!

मेरी राजनीति मेरा लेखन है

(मनोविज्ञान एवं मानसिक स्वास्थ्य की विनय कुमार की पत्रिका 'मनोवेद' के लिए कुमार मुकुल ने कभी मेरे सामने कुछ सवाल रखे थे. उन्हीं सवालों पर आधारित यह लिखित बातचीत है)

प्रश्न : क्या आप ईश्वर को मानते हैं ? धर्म को लेकर आपका नजरिया क्या है?

जब से मैंने होश संभाला है, धर्म और ईश्वर के प्रति घृणा और हिकारत ही का भाव रहा है। अपने मामले में अनास्था शब्द को अनुपयुक्त मानता हूं मैं। हालांकि तब इसके लिए मेरे पास कोई तर्क नहीं था। इसकी कोई जरूरत भी नहीं थी शायद। मेरी पैदाइशी गड़बड़ी रही हो या फिर कुछ ऐसा जो मेरे लिए आज तक अज्ञात और अपरिभाषित है। सात-आठ साल का होऊंगा जब अपने गांव के मन्दिर के प्रांगण  में स्थापित महादेव की बड़े भाई अमरेन्द्र कुमार व उनके एक ग्रामीण दोस्त बिपिन कुमार के साथ मिलकर पहले तो जमकर पिटाई की, फिर पानी से भरे आहर में फेंक दिया। उन्हीं दिनों की एक दूसरी घटना भी है जिसे मैं यहां याद करना चाहता हूं। विजय ठाकुर नामक विज्ञान के एक शिक्षक थे जिनके पास मैं अपने छोटे चचेरे भाई कृष्णकांत के साथ पढ़ने जाता। वहां से लौटते समय मेरे मित्र पूजा करने के ख्याल से कुछ फूल भी साथ ले लेते। फूल तो मैं भी लाता लेकिन घर पहुंचने से पहले एक खूंटे पर उसे रखता और पेशाब कर डालता। यह  क्रम जारी रहा जबतक भाई की शिकायत पर मास्टर साहब ने मेरी खासी मरम्मत  नहीं कर दी। आज धर्म और ईश्वर मेरे लिए जनता के शोषण का प्रभावी जरिया हैं। न कम न ज्यादा। इनका अस्तित्व हममें वैज्ञानिक चेतना का अभाव होना सिद्ध करता है। विज्ञान की पढ़ाई करना और वैज्ञानिक चेतना से लैस होना-दो अलग-अलग चीज है।

प्रश्न : किस व्यक्ति, घटना, पुस्तक, विचार, परिस्थिति आदि ने आपके युवा मानस  को निर्मित करने में अपनी क्या भूमिका अदा की, इस बाबत बतलाएं। अपने मानस की निर्माण-प्रक्रिया के बारे में बतलाएं।

मनुष्यता मैंने मां से सीखी। मेरे घर कोई भी आता-साघु, भिखारी आदि तो मां कुछ-न-कुछ उन्हें अवश्य देती। साधुओं को देख कभी-कभार हम भाई लोग बिदक जाते  तो मां समझाती कि भांट-फकीर के मुंह लगना अच्छी बात नहीं है। धर्म और ईश्वर में मेरी मां की भरपूर आस्था थी लेकिन धार्मिक कट्टरता या मूर्खता तनिक नहीं थी। ऐसा प्रायः होता कि हमलोग घर में अंडा, मुर्गी आदि लाते तो चुपके से मां उसी चूल्हे पर बना लेने को कहती जिस पर बाकी लोगों का निरामिष खाना बन चुका होता। उनका सामान्य-सा तर्क होता कि आग तो खुद एक पवित्र चीज है। आग में तपकर अशुद्ध चीज भी शुद्ध हो जाती है। अलबत्ता मुर्गा-अंडा बन जाने  के बाद चूल्हे को मिट्टी से अवश्य लीपती। सादगी, त्याग और ईमानदारी जैसे  ‘दुर्लभ’ और ‘खतरनाक’ गुण मां और चाचा (दिवंगत शिवनारायण शर्मा) से संयुक्त रूप से सीखने को मिले। कभी-कभी मां की भूमिका अगर कमतर लगी तो इसके कारण  हैं। यह भी हो सकता है कि मां की दुनिया सीमित थी इसलिए चचाजान थोड़े फायदे में जा रहे हैं। चाचा, जिन्होंने हम सब को पढ़ाया, मेरे आदर्श बने। बिजली बोर्ड की सरकारी नौकरी में होने के बावजूद परिवार की वजह से वे हमेशा अभाव में रहे। खादी की एक धोती, एक कुरता और एक चप्पल (जाड़े में जूता)। इससे ज्यादा मैंने नहीं देखा। लेकिन बड़े-बड़ों के सामने सीधा तनकर खड़े होने का माद्दा था। यह दृढ़ता शायद उन्हीं से मैंने हासिल की है।

व्यक्तित्व-निर्माण में शिक्षकों की भूमिका को भी निर्णयकारी मानता हूं। आरंभिक स्कूली जीवन के ग्रामीण शिक्षक जगदीश शर्मा मेरे लिए आदर्श रहे। उर्दू मिश्रित उनकी हिंदी मुझमें भाषा के प्रति झुकाव पैदा कर गई। हाईस्कूल के हिन्दी शिक्षक श्री रामविनय शर्मा, जो आज भी मेरे लिए आदर्श हैं, की भी बराबर की भूमिका रही। सन् 84 से बड़े भाई अखिलेश कुमार के साथ सैदपुर पी. जी. हॉस्टल (3, कमरा 11 एस) में रहने लगा। इतिहास की आलेचनात्मक दृष्टि उन्हीं से हासिल की। आज भी जब एकांत में होता हूं वे मुझे बड़े भाई से अधिक वैचारिक गुरु के रूप में ही याद आते हैं। और इन सबके साथ निराला मुझे बार-बार अपनी ओर आकर्षित करते रहे हैं। अंदर कहीं कुछ भरने में निराला के व्यक्तित्व का भी असर कबूल करता हूं।

बचपन के मेरे विद्रोही तेवर को हवा मिली पुस्तकों से। यों बचपन तो किताबों के बगैर ही गुजरा लेकिन आठवीं कक्षा तक आते-आते मैं मार्क्सवादी दर्शन से प्रभावित हो चुका था, परिचित कितना था नहीं जानता। उन दिनों 'कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र', 'साम्राज्यवाद : पूंजीवाद की चरम अवस्था', 'कम्युनिस्ट समाज में नैतिकता' आदि कुछ किताबें मैंने मनोयोग से पढ़ीं। इन सब ने मेरे व्यक्तित्व को एक आकार प्रदान करना प्रारंभ किया। इनके अलावे जिन किताबों ने मेरी मदद कीं उनमें गोर्की की 'मां', 'मेरा बचपन' और 'जीवन की राहों पर' उल्लेखनीय हैं। हावर्ड फास्ट का हिन्दी में अनूदित 'आदि विद्रोही', अज्ञेय की 'शेखर : एक जीवनी' (प्रथम खण्ड)। रजनी पाम दत्त की किताब 'इंडिया टुडे' (संक्षिप्त संस्करण जिसे पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने ‘भारत : वर्तमान और  भावी’ शीर्षक से प्रकाशित किया है) मैंने कई दफा पढ़ी। कहिए कि यह किताब इंटर के दिनों में मेरे लिए ‘मनोहर पोथी’ थी। इस किताब का मुझ पर काफी असर हुआ। आज भी अपने को कभी-कभी उसकी पकड़ के अंदर महसूस करता हूं। और इन सबसे आगे तक साथ गये डा. रामविलास शर्मा। 'शेखर : एक जीवनी' की बात कि ‘विद्रोही बनते नहीं, पैदा होते हैं’, पढ़ता तो लगता जैसे यह मेरे लिए ही लिखी गई हो। शेखर का स्कूल से भागना और घर आये पिता के कई दोस्तों को ‘नामहीन जंतु’ कहकर संबोधित करना मुझे काफी आह्लादित करता। कहूं कि एकाधिक बार घर से भागने की कोशिश मैं भी कर चुका हूं, लेकिन अपने इस निर्णय पर उस दिन की शाम तक ही टिका रह सका। कक्षा नौ में अपने एक ग्रामीण सहपाठी सतीश कुमार को किताबें दे दी कि मेरे घर पहुंचा देना और मां को कहना कि वह गरीबों की सेवा करने गया है।

प्रश्न : प्रेम... यह शब्द किस तरह से आपके जीवन में आया या नहीं आया... इसे  आपने किस तरह से लिया... इसने आपके मानस को कितना और कैसे प्रभावित किया...  यह बदलाव सकारात्मक था या नकारात्मक ... प्रेम के वरक्स सेक्स ने आपके युवा मन को किस तरह प्रभावित किया... क्या दोनों पूरक रहे या और कुछ....

प्रेम शायद हर के जीवन में आता है। मेरे जीवन में भी आया। प्रेम में होना अलौकिक (इसके वजन का शब्द न होने की वजह से इसका इस्तेमाल किया है) सुख का साथ होना है। केवल तभी मनुष्य अपनी पूरी मानवीयता के साथ होता है। इस प्रेम ने मेरे जैसे नीरस गद्यकार को भी कवि बना दिया। जब मैंने प्रेम करना शुरू किया था, पहली कविता लिखी थी- सपने से जागकर। तब नींद कम आती थी और सपने अधिक। जब तक जागता होता, बेचैन होता। कविता आने के साथ ही मेरे अंदर एक  विचार ने जन्म लिया, कि कविताएं गहन प्रेम और सपनों के बीच ही संभव हो सकती हैं।

मैं प्रेम और सेक्स को अलग-अलग नहीं देख पाता। मुझे तो हमेशा ही लगा कि सेक्स, प्रेम का मुखौटा लगाकर आता है। मुखौटा के हटते ही वह अश्लील लगने लगता है। सभ्य समाज या साहित्य को वह अश्लीलता पसंद नहीं। सबकी एक मर्यादा है। मर्यादा का यह आवरण इतना झीना और पारदर्शी है कि एक की ‘हद’ से दूसरे की ‘बेहद’ को जाना जा सकता है।

 प्रश्न : और विचार?

इसे संयोग कहें या परिस्थिति कि मेरे जीवन में सबसे पहले मार्क्स आये। स्वदेशी होने के बावजूद गांधी और नेहरू से परिचय बाद में हुआ। परिचय भी ऐसा कि कट्टर आलोचक रहा दोनों का। मेरा पूरा स्कूली जीवन गांधी और नेहरू को गालियां बकने में बीता। इसे मैं मार्क्सवादी होने का 'फर्ज' समझता रहा। कोई अगर गांधी-नेहरू का प्रशंसक मिल जाता तो लानत भेजता उन पर। लेकिन जैसे-जैसे मेरा अध्ययन विस्तृत होता गया, आलोचना की उग्रता कमती रही। नेहरू को पढ़ने के बाद उनका प्रशंसक होने से मैं अपने को नहीं रोक पाया। नेहरू को पहली बार और सीधे तौर पर ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ से जाना। फिर  मैंने ‘हिंदुस्तान की कहानी’ पढ़ी। अपनी इतिहास-दृष्टि विकसित करने व नेहरू की इतिहास-दृष्टि को समझने के लिए पत्रों वाली यह पुस्तक अवश्य पढ़ी जानी चाहिए। इस किताब को मैंने कई दफा पढ़ा बल्कि कहिए कि बार-बार पढ़ा। मेरी कोशिश होती है कि चार-छह माह के भीतर एक बार अवश्य ही पढ़ लूं। मेरा मानना है कि इस छोटी काया वाली पुस्तक को बी.ए. स्तर तक के विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य कर दिया जाय, अगर कुछ भी हम अनिवार्यतया पढ़ाते हों।

पता नहीं मैं इसे नेहरू-प्रेम कहूं या और कुछ कि कई दफा दूसरों के बारे में पढ़ते हुए भी नेहरू का कद बड़ा होने लगता है। मार्क्सवादी मोहित सेन की आत्मकथा पढ़ते हुए भी ऐसा ही महसूस किया अपने अंदर। ऐसा क्यों के जवाब में कोई उत्तर नहीं आता। गांधी मुझे एक लेखक के रूप में प्रभावित नहीं करते। कभी-कभी तो वे बेहद अतार्किक और बच्चों की-सी बातें करते लगते हैं। कुछ साल पहले जब मेरा बेटा दसवीं  में था तो 'हिंद स्वराज' के बारे में पूछा था। मैंने यही कहा था कि उनकी बहुत सारी बातें बकवास हैं। विचारों की उनके यहां कोई सीधी लाइन नहीं है। वे एक अत्यंत ही व्यावहारिक राजनीतिज्ञ हैं, दार्शनिक अथवा विचारक नहीं। इसलिए उनकी बातों में मुझे कोई तार्किक संगति नहीं दिखती। अपनी पिछली कही बातों का खंडन वे जितनी आसानी से कर जाते हैं कि कभी-कभी कोफ्त होती है। अलबत्ता निजी जीवन में जो उनके आचरण के नियम हैं वे मुझे बेमिसाल लगे हैं। मैं अपने लिए दृष्टि मार्क्स से लेता हूं और जीने का तरीका गांधी से। इन दोनों के मिश्रण में ही शायद भारत का भविष्य बसता है।

पटेल और सुभाष से सीधे कोई प्रभाव मैं नहीं स्वीकारता। अवचेतन में किसी तरह का हो तो उसकी बात अलग है। यही बात भगत सिंह और विवेकानंद के लिए भी कह सकता हूं। हां, स्त्री को समझना मैंने सीमोन द वोउआर से ही सीखा।

 प्रश्न : मनोविज्ञान का मतलब आपके लिये क्या  है... आप फ्रायड को जानते हैं ए उनके बाद के किसी मनोवैज्ञानिक को आप जानते हैं ?

 मेरे लिए मनोविज्ञान का मतलब है मनुष्य को जानने-समझने का विज्ञान। यह मनुष्य के व्यवहार का विज्ञान है। और मनुष्य का व्यवहार उसके परिवेश पर निर्भर होता है। हमें बहुत सारी चीजें अदृश्य रूप में विरासत में प्राप्त  होती हैं। बहुलांश हम अपने सामाजिक जीवन में सृजित करते हैं। इसलिए मेरे लिए एक सच्चा मनोवैज्ञानिक केवल और केवल वही हो सकता है जो समाजशास्त्री भी है। मनोवैज्ञानिकों में फ्रायड को ही थोड़ा-बहुत पढ़ा है।

 प्रश्न : आपकी प्रिय फिल्में  कौन -सी हैं और क्यों ?

 फिल्मों में मेरी कोई खास दिलचस्पी नहीं रही है। हॉल जाकर मैंने अबतक चार  ही फिल्म देखी है-‘अर्धसत्य’ अपने बड़े भाई अखिलेश कुमार के साथ, ‘प्रतिघात’ साले मृणाल केशरी के साथ, ‘खलनायक’ मित्र अशोक कुमार के साथ। एक का अभी स्मरण नहीं। सबसे अच्छी फिल्म मैंने दूरदर्शन पर देखी-‘एक दिन अचानक’। इस फिल्म में संवाद कम ही हैं, परिस्थितियों के चित्रण मात्र से जान आ जाती है। कहिए कि संवाद के बीच कहने के बाद जो कुछ अनकहा रह जाता है  और उस अनकहे को व्यक्त करने हेतु जो परिस्थिति निर्मित की जाती है-उसी का  मैं कायल हूं। अद्भुत कलात्मक। मैं उस फिल्म को बार-बार देखना चाहता हूं।

 प्रश्न : आप राजनीति को लेकर किस तरह सोचते हैं ?

 किसी (फिलहाल नाम भूल रहा हूं) ने कहा है कि आधुनिक काल के पहले धर्म राजनीति था जबकि आधुनिक काल का धर्म राजनीति है। मनुष्य न केवल एक सामाजिक प्राणी है बल्कि वह एक राजनीतिक प्राणी भी है। मेरी राजनीति मेरा लेखन है।

Saturday, October 10, 2026

रामविलास शर्मा : केवल जलती मशाल

रामविलास शर्मा मेरे सर्वप्रिय आलोचक रहे हैं, लेकिन उन पर आज तक नहीं लिख पाया। वे पढ़ने से फुर्सत ही नहीं लेने देते कि लिखूं। सोचता हूँ कितना मुश्किल है अपने प्रिय आलोचक पर लिखना।

पाठकों का एक बड़ा वर्ग है जिसने रामविलास शर्मा से मार्क्सवाद की ट्रेनिंग ली है। राहुल सांकृत्यायन के बाद वही हैं जिन्होंने भारत में मार्क्सवाद का इतने बड़े पैमाने पर प्रचार किया। पाठक बनाना एक बड़ा काम है। नंदकिशोर नवल, रामविलास जी को नये लोगों के लिए 'मदनानंद मोदक' कहते थे। और बात है कि नवल जी कुछ कम मोदक नहीं खाये!

रामविलास जी के अध्ययन और लेखन का क्षेत्र काफी व्यापक रहा है। उनकी इस व्यापकता से कई लोग चिढ जाते थे। एक बार मैंने रामशरण शर्मा के सामने रामविलास जी की इतिहास संबंधी स्थापनाओं को रखने की कोशिश की तो वे बिदक गये। बोले- 'उनकी बात रहने दीजिए, वे तो फिजिक्स पर भी लिख सकते हैं।' मैंने कहा कि मार्क्स भी तो तमाम चीजों पर लिखते थे! वे गुम लगा गए। रामविलास जी को इस व्यापकता की वजह से पढ़ना और पचाना-दोनों कठिन है। उन पर लिखना तो और भी। इस कठिनाई को मैंने महसूस किया है। शायद इसीलिए अपने प्रिय आलोचक पर अब तक एक लेख तक न लिख पाया।

 1857 के सिलसिले में मैंने उन्हें एक पत्र लिखा था। जवाब में उनका एक पोस्टकार्ड आया था। मुझसे वह पत्र खो गया। वे छोटे-बड़े सबको पत्र लिखते थे, ऐसा मै अपने अनुभव से कह सकता हूँ। दुखद कि उनका इकलौता पत्र भी मैं संभाल न सका।

डॉक्टर रामविलास शर्मा ने साहित्य, इतिहास, दर्शन और भाषा विज्ञान में काफी गंभीर काम किया है। 'भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद' (दो खंडों में) से लेकर 'मार्क्स और पिछड़े हुए समाज' तक में भारतीय और यूरोपीय इतिहास के विभिन्न कालखण्डों को समेटा है। दरअसल 'मार्क्स और पिछड़े हुए समाज' किताब में मूलतः प्राक पूंजीवादी समाज का विश्लेषण है, और मार्क्स ऐसे समाज को पिछड़ा हुआ मानते थे।

सदियों में कभी-कभार 

'निराला की साहित्य साधना' किताब डा. रामविलास शर्मा ने कवि के जीवन में डूबकर तैयार की है। निराला के जीवन की छोटी-बड़ी चीजों की ऐसी बारीक अभिव्यक्ति की ऐसी कला और सामर्थ्य पर किसी को भी एक बार ईर्ष्या हो सकती है। बड़ी ही साफगोई, ईमानदारी और उतनी ही गहरी आत्मीयता के साथ तैयार की गई जीवनी कि स्वयं उस जीवन को जीनेवाला भी देख-पढ़कर दंग रह जाए कि कितना कम जानता है वह अपने को। सहज अविश्वसनीय! मेरे लिए तय करना मुश्किल है कि उसे  उपन्यास कहूं कि जीवनी। पढ़िए तो लगता है जैसे किसी फिल्म की कहानी आपके आगे  से सरक रही हो। निराला को संभवतः रामविलास शर्मा की साहित्यिक  मेधा/प्रतिभा का पहले ही अंदाजा हो चुका था इसलिए वे उन्हें डाक्टर साहब  कहते। निराला की अकड़ भला किसी ऐरे-गैरे को डाक्टर कहने की अनुमति देती क्या ? इस डाक्टर ने ऐसी शव-परीक्षा की कि जो भी निराला के अंदर था उसे बाहर कर दिया। कुछ भी गोपन न रहा! इस किताब को पढ़ते हुए सदैव यह लगा कि निराला के साथ-साथ रामविलास शर्मा की खुद की साहित्य-साधना भी है। ऐसी जीवनी हमेशा नहीं लिखी जाती। सदियों में कभी-कभार। हिन्दी क्या विश्व साहित्य में भी ऐसी जीवनी दुर्लभ ही है।

Friday, October 9, 2026

हजारीबाग : जेल में हिंदी साहित्य

1930 में हजारीबाग जेल में समय काटने के लिए कैदियों द्वारा एक हस्तलिखित मासिक पत्र निकाला गया था, जिसका नाम ‘कारागार’ था। इसके चित्रकार गिद्धौर के राजकुमार कालिकाप्रसाद सिंह थे और व्यवस्थापक मुजफ्फरपुर के मथुराप्रसाद सिंह थे। संपादन का काम भवानीदयाल संन्यासी को सौंपा गया था। इसके प्रत्येक अंक में डा. राजेन्द्र प्रसाद का एक लेख अवश्य निकलता था। 'कारागार' के अनेक विशेषांक यथा 'कृष्णांक', 'दीपावली-अंक', 'सत्याग्रह-अंक' आदि निकले। 'सत्याग्रह-अंक' में तो बिहार के सत्याग्रह का पूरा इतिहास ही आ गया था। इसमें प्रान्त के प्रत्येक जिले के नेताओं ने अपने जिले के सत्याग्रह-संग्राम का सविस्तार वर्णन किया था। (स्वामी भवानीदयाल संन्यासी, ‘बिहार की विभूति’, श्रीराजेन्द्र अभिनन्दन ग्रन्थ, पृष्ठ 51)

मानिकपुर (गोपालगंज) ग्राम के वासी महेन्द्र सिंह (जन्म : 1886 ई.) को 'पाँच विकट यात्राएँ' (वाणी मंदिर छपरा से 1940 में प्रकाशित) एवं 'मानसरोवर की झाँकी' (उपर्युक्त प्रेस से प्रकाशित) का लेखक बताया जाता है। युद्ध के कारण आपकी ये दोनों पुस्तकें बिहार सरकार द्वारा जब्त कर ली गई थीं। (हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खण्ड, पृष्ठ 724, पादटिप्पणी संख्या 2) सन 1930 ईस्वी में आपको हजारीबाग सेंट्रल जेल में रखा गया था जहाँ आपने निम्नलिखित भजन की रचना की थी :

"दीन दयालु दया करिके, भवसागर से करु पार मुझे।

ममझधार पड़ी प्रभु नाव मेरी, कहुँ सूझत नाहिं अधार मुझे।।

परिवार भरा अति भार प्रभो, अरुझावत विविध प्रकार मुझे।

निरधार भयो पतवार बिना, अब डोलत नाथ उबार मुझे।।" (वही, पृष्ठ 724)

‘युवक’ का ‘विप्लव’ अंक बेनीपुरी डिस्पैच भी नहीं कर पाये थे कि नमक कानून तोड़ने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिये गये। उन्हें पटना कैम्प जेल में रखा गया। कुछ ही दिनों में उन्हें ‘बी’ क्लास देकर हजारीबाग सेंट्रल जेल भेज दिया गया। हजारीबाग जेल से ही इन्होंने 'कैदी' (1930 ई.) तथा 'तूफान' (1942) जैसी हस्तलिखित पत्रिकाओं का भी संपादन किया। (रामवृक्ष बेनीपुरी ग्रंथावली, भाग 1, बेनीपुरी प्रकाशन, पटना) राजेन्द्र बाबू ने ‘कैदी’ के लिए ‘प्रजा का हित’ लेख लिखा। यहीं पर बेनीपुरी ने 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो' का हिन्दी अनुवाद किया और अपनी पहली मार्मिक कहानी ‘कहीं धूप, कहीं छाया’ लिखी। इसी जेल की दीवारों के बीच बेनीपुरी ने ‘चन्द्रगुप्त’ जैसा देशभक्तिपूर्ण नाटक लिखा और जिसे कैम्प जेल के राजबन्दियों ने बड़ी लगन से मंच पर प्रस्तुत किया। (रामवृक्ष बेनीपुरी : रचना संचयन, पृष्ठ 17) 

1937 में यूनुस के शपथग्रहण के विरोध में बेनीपुरी और जयप्रकाश नारायण ने पटना में जुलूस और हड़ताल की घोषणा की थी। व्यापक जनसमर्थन के बीच दोनों ही गिरफ्तार कर हजारीबाग सेण्ट्रल जेल भेज दिये गये। इस जेल-प्रवास के दौरान बेनीपुरी के पुत्र 'गांधी' का निधन हो गया। मर्माहत कलाकार ने ‘गांधीनामा’ व्यथा-कथा का सृजन कर डाला। उन्होंने कहा कि ‘कलम केवल प्रहार ही नहीं करती, वह ढाल भी बनती है’। (रामवृक्ष बेनीपुरी, मुझे याद है, पृष्ठ 155) 

हजारीबाग जेल के लंबे प्रवास ने बेनीपुरी की रचना को भोथरा करने की बजाय धारदार बनाया। जेल की आम्रतरु की छाया में बेनीपुरी ने हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ नाटकों में एक ‘अम्बपाली’ की रचना की। यहीं ‘माटी की मूरतें’ जैसा भारतीय भाषाओं का अनूठा रेखाचित्र रचा। (मस्तराम कपूर, रामवृक्ष बेनीपुरी : रचना संचयन, साहित्य अकादमी, पृष्ठ 23) 'हजारीबाग सेंट्रल जेल के एकांत जीवन में अचानक मेरे गांव और मेरे ननिहाल के कुछ ऐसे लोगों की मूरतें मेरी आंखों के सामने आकर नाचने और मेरी कलम से चित्रण की याचना करने लगीं। उसकी इस याचना में कुछ ऐसा जोर था कि अंततः ये "माटी की मूरतें" तैयार होकर रहीं।' (रामवृक्ष बेनीपुरी ग्रंथावली, खंड 1, बेनीपुरी प्रकाशन, पटना, पृष्ठ 11) जेल के एकांत ने बेनीपुरी के सोये कवि को जगा दिया। कहने की आवश्यकता नहीं कि अपने आरंभिक साहित्यिक जीवन में बेनीपुरी कवि रहे थे। अतः अपने रवीन्द्रनाथ की सौ श्रेष्ठ कविताओं का अनुवाद किया। शेली, कीट्स और बायरन की श्रेष्ठ कविताओं के अनुवाद का नाम रखा ‘टूलिप्स’ और खुद की लिखी कविताओं का नाम ‘नया आदमी’ रखा। (बेनीपुरी ग्रन्थावली भाग-1, संकलित पृष्ठ 399-475; रामवृक्ष बेनीपुरी : रचना संचयन, पृष्ठ 25)

1940 ईस्वी में राहुल सांकृत्यायन अखिल भारतीय किसान सभा के पलासा (आंध्र प्रदेश) अधिवेशन के सभापति चुने गये थे। इलाहाबाद में अपने पुराने मित्र डा. उदय नारायण तिवारी के घर पर बैठकर वे अपना सभापति का भाषण लिख रहे थे कि तभी भारत सुरक्षा कानून में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। (राहुल सांकृत्यायन, ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ पुस्तक में महादेव साहा की ‘भूमिका’, लोकभारती प्रकाशन, 2014) वहाँ से उन्हें हजारीबाग जेल में पहुंचाया गया। उन्हें लगा कि वर्षों जेल में रहना पड़ेगा। उन्हें एहसास था कि मार्क्सवादी दृष्टिकोण से लिखी विज्ञान, समाजशास्त्र, दर्शन, भौतिकवाद आदि की पुस्तकों की बड़ी कमी है। अतः पुस्तक लिखने के लिए उन्होंने सामग्री एकत्र करना शुरू कर दिया। पहले एक ही बड़ी पुस्तक में उपर्युक्त सारे विषयों को समाहित करने की योजना थी। (वही) हजारीबाग जेल से राहुल का तबादला (21/7/41) देवली कैम्प (अस्थायी) जेल में कर दिया गया। यहां बम्बई, पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा बिहार से आये हुए राजनीतिक बंदियों में अधिकतर कम्युनिस्ट थे और सब के पास कुछ न कुछ किताबें थीं। इन किताबों का अध्ययन करने के बाद हजारीबाग जेल में लिखे सौ पृष्ठों को बेकार समझ ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ पर साइंस से लिखाई शुरू की और एक पुस्तक की जगह चार पुस्तकें लिखीं-‘विश्व की रूपरेखा’ (साइंस), ‘मानव-समाज’ (समाजशास्त्र), ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ (दर्शन) और ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’। (राहुल सांकृत्यायन, ‘प्राक्कथन’, वैज्ञानिक भौतिकवाद, 2014) कुछ पुस्तकें लिख लेने के बाद राहुल का तबादला फिर हजारीबाग जेल में कर दिया गया। यहीं दो हफ्तों में उन्होंने ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ का लिखना समाप्त किया। इसके बाद उन्होंने भोजपुरी में ‘ई हमार लड़ाई’, ‘जपनिया राछछ’, ‘जरमनवा के हार निहिचय’, ‘ढुनमुन नेता’, ‘नइको दुनिया’, ‘मेहरारुन के दुरदशा’ आदि छोटे-छोटे आठ नाटक लिखे। (महादेव साहा, पूर्वोद्धृत)

1940 के सत्याग्रह के दौरान दिसंबर माह में अनुग्रह नारायण सिंह को भी हजारीबाग जेल की यात्रा करनी पड़ी। सत्याग्रही की हैसियत से लक्ष्मी नारायण सुधांशु भी वहां पहुंच चुके थे। सुधांशु जी ने अनुग्रह नारायण सिंह को जेल में किताब लिखने की प्रेरणा दी। 'बचनबद्ध' अनुग्रह बाबू ने काफी सोच-विचार के बाद संस्मरण लिखना ही मुनासिब समझा। आधुनिक बिहार के पुनर्गठन में अनुग्रह बाबू की सक्रिय भूमिका रही थी, इसलिए 1912 के बाद के बिहार के इतिहास से वे भली भांति परिचित थे। और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि जेल में किताबों के अभाव के बीच स्मृति के आधार पर संस्मरण लिखना ही श्रेयस्कर था। इस तरह हजारीबाग जेल में अन्य कई किताबों के बीच 'मेरे संस्मरण' की पांडुलिपि तैयार हुई और आधुनिक बिहार का एक जीवंत दस्तावेज तैयार हुआ।

1942 की क्रांति के दिनों में जयप्रकाश नारायण के साथ हजारीबाग जेल में बाबू वीर कुंअर सिंह के वंशज एवं स्वतंत्रता सेनानी दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह भी बंदी थे। रामवृक्ष बेनीपुरी ने जेपी को बताया कि दुर्गा बाबू को लोकसाहित्य का गहरा अध्ययन है। लोकनायक का लोकसाहित्य से जुड़ाव के बारे में क्या कहना! दुर्गा बाबू ने जेल से प्राप्त डायरी पर रोजनामचा लिखना शुरू किया। जेल से निकलने के बाद हिमालय प्रेस ने इसे 'फरार की डायरी' के नाम से प्रकाशित किया। कहने की आवश्यकता नहीं कि इसमें जेपी के जेल से फरार होने की कथा भी दर्ज है।

जब देश में सन 42 की क्रांति ठंडी पड़ गई और कार्यकर्ता निराश और हताश थे, रामनंदन मिश्र ने हजारीबाग जेल की दीवारों के बीच 'क्रांति कैसे हो' किताब लिखी। इसके अंग्रेजी और बंगला संस्करण को बंगाल सरकार ने जब्त कर लिया था। ('दो शब्द', क्रांति कैसे हो, श्री सुदर्शन प्रेस, दरभंगा)

Monday, October 5, 2026

औपनिवेशिक बिहार के साहित्यिक हीरो: ईश्वरीप्रसाद शर्मा

सन् 1893 में जन्मे ईश्वरीप्रसाद शर्मा आरा नगर के मिश्रटोला मुहल्ले के निवासी सारंगधर मिश्र के इकलौते पुत्र थे। आपका परिवार आरंभ ही से शिक्षित-प्रतिष्ठित एवं गण्यमान्य रहा है। आपके पूर्वजों में चाचा पंडित श्रीधर मिश्र, पितामह पिनाकधर मिश्र तथा हिन्दी के आदि-गद्य लेखकों में शुमार पंडित सदल मिश्र रहे हैं। आप सात वर्ष के हुए तभी आपके पिताजी का देहांत हो गया। 1909 ईस्वी में आपकी माताजी भी चल बसीं। अब तो चाचा-चाची का प्यार ही ईश्वर का एकमात्र सहारा था। चाचा-चाची प्यार से इन्हें ‘बच्चनजी’ कहकर पुकारते। बचपन के साथी आपको ‘दीना’ या ‘दीनानाथ’ कहा करते। 'मनोरंजन' के संपादक स्वयं भी मनोरंजन-मूर्ति थे। हँसाने, गुदगुदाने या चिकोटी काटने का उनका स्वभाव था। रामवृक्ष बेनीपुरी ने लिखा है, 'एक बार काशी में मैं एक मारवाड़ी वासे में पालथी मारकर भोजन कर रहा था। पीछे से आकर किसी ने ऐसा गुदगुदा दिया कि मैं उठ खड़ा हुआ। मुड़कर देखता हूँ शर्मा जी खिलखिला रहे हैं।' (रामवृक्ष बेनीपुरी, 'मुझे याद है', नई धारा, वर्ष 4, अंक 10, पृष्ठ 83)

आपकी आरंभिक स्कूली शिक्षा आरा के ‘कायस्थ जुबली एकेडमी’ में हुई जहां के बाद में आप हिन्दी-शिक्षक नियुक्त हुए। सन् 1905 ईस्वी के स्वदेशी आंदोलन के युग में, इसी स्कूल की एक सभा में आपने अपना पहला व्याख्यान किया था। आपका पहला लेख, जो गद्य-काव्य था, 1909 ईस्वी में ‘भारत-जीवन’ में छपा था। 

आरा के महामहोपाध्याय पंडित सकलनारायण शर्मा के संपादन में 1900 ई. में ‘शिक्षा’ नामक साप्ताहिक की शुरुआत खड्गविलास प्रेस (पटना) से हुई थी जिसके संपादकों के इतिहास में भी ईश्वरीप्रसाद शर्मा का नाम जुड़ा है। 1912 ईस्वी में आपने आरा से सचित्र हिन्दी-मासिक ‘मनोरंजन’ का प्रकाशन किया, जिसकी उन दिनों बड़ी धूम थी। उस समय की प्रसिद्ध मराठी मासिक पत्रिका ‘मनोरंजन’ के तर्ज पर शर्मा जी ने इसे निकाला था। यद्यपि शर्मा जी की पत्रिका अपने मिजाज में साहित्यिक थी, किंतु शिक्षा संबंधी सामग्री की वजह से शीघ्र ही छात्रों के बीच लोकप्रिय हो गई। इस पत्रिका ने तीन वर्ष के अल्पकाल का जीवन प्राप्त किया था। 

यह नये ढंग का बहुत ही सुसज्जित और सुंदर मासिक था। तृतीय बिहार प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति बाबू शिवनन्दन सहाय के शब्दों में : ‘मनोरंजन खूब सज-धज कर निकलता था और अपने सुंदर लेखों से मन को रंजित किया करता था’। इसके दो महत्त्वपूर्ण विशेषांक भी प्रकाशित हुए थे। इस सर्वांगसुंदर विशेषांक के प्रकाशन का सारा खर्च श्रीरघुवीर नारायणजी ने राजाबहादुर कीर्त्यानन्द सिंह से दिलवाया था। इसके बाद आरा से ऐसी सर्वगुणसंपन्न कोई पत्रिका प्रकाशित नहीं हो सकी। 

‘मनोरंजन’ ने जिस समय बिहार प्रान्त में कार्य करना आरंभ किया था, उस समय इस प्रान्त में एकमात्र लक्ष्मी ही एक ऐसी मासिक पत्रिका थी जो अच्छी श्रेणी में गिनी जाती थी, परमात्मा की दया और हिन्दी के धुरन्धर लेखकों और कवियों की लेखनी का साहाय्य पाकर ‘मनोरंजन’ ने वर्ष ही भर में पत्र-साहित्य में एक अच्छा स्थान प्राप्त कर लिया, पर कहते दुःख होता है कि इसके प्रकाशन का भार भी हमारे ही निर्बल स्कन्धों पर रहने के कारण अर्थ की कृच्छ्रता से और प्रेस अपना न होने से गत वर्ष इसका जीवन नितान्त ही संशयापन्न हो गया था और यदि हरदास एण्ड कम्पनी के सुयोग्य संचालक पण्डित हरिदासजी वैद्य अपनी दयालुता से इसे फिर नहीं अपनाते तो शायद ‘मनोरंजन’ फिर नहीं निकल पाता, पर उक्त महोदय ने जिस प्रकार उत्साह देकर प्रथम वर्ष इसे निकलवाया उसी प्रकार मरने से भी इसका उद्धार किया और इसने फिर दुनिया का मुँह देखा। अबके प्रबन्ध अच्छा कर लिया गया है और यदि हमारे ग्राहकों ने पुरानी गड़बड़ी का खयाल छोड़कर सहायता की कमर कसी तो दो ही चार महीनों में इसकी रही-सही त्रुटियाँ भी दूर हो जायेंगी और कुछ ही अंकों के बाद चित्र और पृष्ठ तथा कागज की किस्म बढ़ाने का उद्योग किया जायगा। आशा है कि हमारे पाठक ‘मनोरंजन’ की सहायता को अग्रसर होंगे।’ 

रामसहाय लाल बुकसेलर ने 1921 ई. में द्विजदेव नारायण लाल के संपादकत्व में ‘श्रीविद्या’ नामक मासिक पत्रिका शुरू की थी जिसके संपादकों में लाला भगवानदीन, अखौरी शिवनन्दन सहाय के साथ ईश्वरीप्रसाद शर्मा का भी नाम है। लाला भगवानदीन के बाद आपने गया से निकलनेवाली पत्रिका ‘लक्ष्मी’ का भी संपादन किया था।

ईश्वरीप्रसाद शर्मा हास्य-व्यंग्य के उस्ताद, फक्कड़ों के बादशाह, मतवाला मंडल के सहयोगी थे। दफ्तर कभी वक्त से न जाते थे। मित्रों से कहते थे-‘त्यागपत्र हमेशा जेब में रखता हूं’। स्वादिष्ट भोजन करना, आये दिन थियेटर देखना, मित्रों के साथ गप लगाना, दूसरों को काम न करने देना-यही उनका दैनिक कार्यक्रम था। उनकी स्मृति इतनी तीक्ष्ण थी कि सैंकड़ों कविताएँ याद थीं। संस्कृत, बंगला, हिन्दी, उर्दू जब जिस भाषा की जरूरत हुई, सुनाने लगते थे। इस वैविध्य का वे यथोचित लाभ लेते। अनुवाद से लेकर व्यापारियों के लिए विज्ञापन लिखने तक जब जैसा काम मिला, वह आनन-फानन कर डालते थे और क्या मजाल कि कभी लिखे को काटना पड़ा हो। 

पंडित ईश्वरीप्रसाद शर्मा, शिवपूजन सहाय के गुरु कहे जाते हैं। आरंभ में इन्हीं के प्रोत्साहन से शिवपूजन सहाय ने हिन्दी-सेवा का व्रत लिया था। कुछ दिन तक आगरे में साथ रहकर दोनों ‘धर्माभ्युदय’ पत्र में काम कर चुके थे। इस पत्रिका का आधा अंश गुजराती में रहता था। आपने कुछ ही दिनों बाद उसे सर्वांग हिन्दीमय कर डाला। शर्मा जी केवल साहित्यिक गुरु न थे बनियों से पैसा वसूल करने की कला में कलकत्ते के हिन्दी लेखकों के 'आचार्य' थे। शिवपूजन सहाय को समझाते, ‘सीधी उंगली से घी नहीं निकलता। पेशगी रुपया मांगो; मिल जाय तो कहो, बकाया वसूल पाया।’

थियेटर देखने के शौकीन तो थे ही, अभिनय में भी बेजोड़ थे। आरा में आपने एक ‘मनोरंजन नाटक मंडली’ स्थापित कर ली थी, जो अच्छे-अच्छे नाटकों का सदा अभिनय करती थी। इस मंडली द्वारा प्रस्तुत नाटकों में आप भी एक सफल हास्य अभिनेता के रूप में रंगमंच पर उतरते थे। इस नाटक मंडली ने आपके द्वारा लिखित ‘सूर्योदय’ नामक नाटक का सफलतापूर्वक अभिनय किया था। इसमें आप स्वयं रंगमंच पर उतरे थे। इस मंडली द्वारा ‘सत्यहरिश्चन्द्र’, ‘मयूरध्वज’ आदि और भी कई नाटक अभिनीत हुए थे। ‘सत्यहरिश्चन्द्र’ में आपने डोम का स्वांग धारण किया था और ‘मयूरध्वज’ में भगवान श्रीकृष्ण का। एक बार ‘आरा नागरी-प्रचारणी सभा’ के वार्षिकोत्सव के अवसर पर आपने स्व. प. शिवनाथ शर्मा (‘आनंद’-संपादक) द्वारा रचित नागरी-निरादर’ नामक प्रहसन में मौलाना के वेष में रंगमंच पर उतरकर जबानदानी के बड़े-बड़े मौलवियों को भी हैरत में डाल दिया था। ‘सत्य हरिश्चंद्र’ में डोम का पार्ट इतना बढि़या किया था कि शिवपूजन सहाय हंसते-हंसते लोट-पोट हो गए थे।

एक अनुवादक के रूप में आपकी बड़ी ख्याति है। मराठी से आपने ‘इन्दुमती’ और 'रत्नदीप’ नामक उपन्यास का अनुवाद किया था। गुजराती से आपने जैनधर्म संबंधी पुस्तकों का अनुवाद किया था। ये पुस्तकें एक जैन प्रकाशक के नाम से प्रकाशित हुई हैं। बंगला से आपने किन्नरी’, ‘अन्नपूर्णा का मन्दिर’, ‘जल-चिकित्सा’ आदि अनेक प्रसिद्ध ग्रंथों का अनुवाद किया था। ‘पंजाब-हत्याकांड’ जैसी पुस्तक का बंगला-अनुवाद आपने एक ही महीने में करके श्रीनिहालचन्द्र वर्मा को दे डाला था। कलकत्ता के हरिदास एंड कंपनी से प्रकाशित ‘बंगला-हिन्दी कोश’ आपके केवल तीन महीने का फल है। मेरी कॉरेली लिखित ‘थेल्मा’ का अनुवाद आपने रामवृक्ष बेनीपुरी के अनुरोध पर एक पखवारे में ही कर डाला था। एक बार 'पियर्सन्स मैगजीन' के पुराने अंकों की कुछ कहानियों का दस-पन्द्रह दिनों में ही अनुवाद कर आपने ‘प्रेमगंगा’ के नाम से पुस्तक तैयार कर ली, जो लखनऊ की गंगा पुस्तकमाला से प्रकाशित और बनैली राज के कुमार रामानन्द सिंह को समर्पित हुई। इसके लिए कुमार साहब ने आदरपूर्वक बुलाकर आपको पांच सौ रुपये दिये थे। संस्कृत से हिन्दी अनुवाद के लिए प्रसिद्ध नवलकिशोर प्रेस से वाल्मीकीय रामायण के विषय में बहुत दिनों से पत्र-व्यवहार हो रहा था। 

आपकी लिखी सबसे पहली मौलिक पुस्तक ‘चन्द्रकुमार’ उपन्यास है, जिसका प्लॉट घर की मजदूरिन के मुंह से सुनी कहानी के आधार पर रचा गया था। इसके बाद आपने ‘हिरण्यमयी’ की रचना की। इन दोनों पुस्तकों के बाद आपने अनेक पुस्तकें लिखीं और अनूदित कीं। इनकी संख्या लगभग 150 तक होगी। लगभग डेढ़ दर्जन पुस्तकें तो आपने दूसरों के लिए लिखीं।

आप पद्य रचना में भी सिद्धहस्त थे। आपके लिखे नीति-शिक्षापूर्ण सरस पद्यों का संग्रह ‘सौरभ’ के नाम से छपकर अप्रकाशित ही रहा। आपने व्यंग्य-विनोदमयी अपनी पद्य-रचनाएं ‘चना-चबेना’ के नाम से स्वयं प्रकाशित की थीं। इसी शैली की एक गद्य-पद्य रचना कचालू-रसीला’ के नाम से प्रकाशित करने की आपकी इच्छा पूरी नहीं हो सकी। आपका लिखा ‘मान-मर्दन’ नाटक भी अप्रकाशित ही है।

आपके द्वारा लिखित मौलिक, अनूदित एवं संपादित प्रमुख पुस्तकों के नाम हैं-‘कोकिला’, ‘स्वर्णमयी’, ‘मागधी कुसुम’, ‘मालिनी बाबू’, ‘गल्पमाला’, ‘हिन्दी-बंगला-कोश’, ‘चन्द्रधर’, ‘अन्योक्ति तरंगिनी’, ‘मातृवन्दना’, ‘सन सत्तावन का गदर’, ‘सूर्योदय’(नाटक), ‘रंगीली दुनिया’, ‘ईसप की कहानियां’ (तीन भाग), ‘सिपाही विद्रोह’, ‘सीता’, ‘शकुन्तला’, ‘सती-पार्वती’, ‘पंचशर’ (गद्य-काव्य), ‘उद्भ्रान्त प्रेम’, ‘अन्नपूर्णा का मंदिर’, ‘किन्नरी’, ‘इन्दुमती’, ‘प्रेमगंगा’, प्रेमिका, जल-चिकित्सा, सुशील-शिक्षा, ‘चन्द्रकुमार का मनोरमा’, ‘सच्ची मैत्री’, बाल-गल्पमाला’, पंजाब-हत्याकांड’, हिन्दी-बंगला-कोश’, ‘रामचरित्र’ आदि। 'रामचरित्र' ग्रंथ के प्रकाशित होने पर बनैली-नरेश कीर्त्यानन्द सिंह बहादुर ने आपको एक हजार रुपये का सम्मान-पुरस्कार दिया था। यह ग्रंथ उन्हीं को समर्पित है।

ऊपर से निठल्ले और हंसोड़ लगनेवाले शर्मा जी गहरी सूझ-बूझ के आदमी थे और कविता के साथ इतिहास के भी पंडित थे। 1922 ई. में उन्होंने ‘गदर का इतिहास’ लिखा और उसे भारत का स्वाधीनता संग्राम कहा था।

‘महादेवप्रसाद सेठ की प्रेरणा से’ भारत के ‘भाग्य-विधाता सीरीज’ के तहत ‘दादाभाई नौरोजी’ नामक चरित-पुस्तक लिखी। हिन्दी में दादाभाई की कोई बड़ी-सी जीवनी या उनके उपदेशों का संग्रह अबतक नहीं प्रकाशित हुआ था, इसलिए लेखक ने इकट्ठे ही दोनों अभावों की पूर्ति का प्रयत्न किया। इस पुस्तक को लिखने में लेखक ने मद्रास की जी.ए. नतेसन एण्ड कंपनी द्वारा प्रकाशित ‘स्पीचेज एण्ड राइटिंग्स ऑफ दादाभाई नौरोजी’ नामक ग्रंथ से पूरी सहायता ली थी। यह किताब ‘नागरी प्रचारिणी सभा’, आरा के पुस्तकालयाध्यक्ष बाबू शुकदेव सिंह को समर्पित की गई थी। लिखा था : ‘मित्रवर! जिन दिनों मैं दादाभाई की यह जीवनी रोगशय्या पर पड़े-पड़े लिख रहा था, उस समय संसार में तुम्हारे सिवा मेरा कोई सहायक न था। तुम्हारी सेवा शुश्रषा और सहायता के अभाव में मेरी मृत्यु हो जानी संभव थी और तब यह पुस्तक शायद ही मेरे हाथों पूरी हो पाती। उन्हीं स्मरणीय दिनों की स्मृति को बनाये रखने के लिये यह पुस्तक तुम्हीं को समर्पित है।’ 

'अन्नपूर्णा का मन्दिर’ हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर-सीरीज का तेरहवां ग्रंथ है। यह पुस्तक बंगाल की प्रसिद्ध उपन्यास-लेखिका श्रीमती निरुपमा देवी के 'अन्नपूर्णार मन्दिर’ का भाषांतर है। मूल पुस्तक को बंगाल में बहुत ही ऊंचा स्थान प्राप्त है। शर्मा जी के हिन्दी अनुवाद से पहले ‘बंगाल इंपीरियल लाइब्रेरी’ के बाबू शरच्चन्द्र सेन इसका अंग्रेजी भाषा में अनुवाद कर चुके थे। उनकी राय थी कि ‘इन दिनों किसी भी बंगला उपन्यास-लेखक ने इससे अच्छा उपन्यास नहीं लिखा’।

ईश्वरीप्रसाद शर्मा इस धारणा के माननेवाले थे कि ‘प्रत्येक बालक और युवा को अपने देश के प्रसिद्ध-प्रसिद्ध पुरुषों की जीवनियां पढ़नी चाहिए।’ साथ यह भी कि ‘इस तरह की छोटी-छोटी जीवनियों को सीधी-सादी भाषा में लिखकर बालकों और युवाओं के हाथ में देना प्रत्येक लेखक का कर्त्तव्य होना चाहिए।’ इससे बड़ा कर्त्तव्य है कि ‘ऐसी पुस्तकों की भाषा बोलचाल की और जल्द समझ में आने योग्य होनी चाहिए।’ इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु शर्मा जी ने ‘बाल-विनोद-वाटिका का बीसवां पुष्प’ अर्थात ‘भगवान गौतम बुद्ध’ की रचना की। बालकों एवं युवाओं को ध्यान में रखकर लिखी इस किताब की भाषा तो अवश्य ही सरल, सहज और बोधगम्य है, किन्तु इस प्रयास में एकाध स्थलों पर लेखक भूल गया लगता है कि वह किसी मिथकीय नहीं बल्कि ऐतिहासिक पुरुष की जीवनी लिख रहा है। एक जगह वे लिखते हैं, ‘‘अयोध्या के राजा दशरथ और उनके पुत्र ईश्वर के अवतार रामचन्द्र का नाम भला किस हिन्दू से छिपा है? आज से दो हजार वर्ष पहले उसी वंश के राजा शुद्धोदन हिमालय की तराई में अपने पिता के बसाए हुए ‘कपिलवास्तु’-नामक नए नगर में राज्य करते थे।‘‘

कहने की जरूरत नहीं कि बीसवीं शती के तीसरे दशक में हिन्दी साहित्य में बालक-बालिकाओं और स्त्रियों के पढ़ने योग्य पुस्तकों और पत्रों का बड़े धड़ल्ले से हो रहा था। कलकत्ते की प्रसिद्ध आर.एल. बर्म्मन एण्ड कम्पनी के अध्यक्ष बाबू रामलाल बर्म्मा ने इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु ‘रमणी रत्नमाला’ नाम से एक पुस्तकमाला निकालनी आरंभ की। इस माला की ‘सावित्री-सत्यवान’ और ‘नल-दमयन्ती’ जैसी पुस्तकें समाचारपत्रों एवं हिन्दी पाठकों के बीच खासी ख्याति अर्जित कर चुकी थीं। रामलाल जी ही के अनुरोध से, उनकी इस स्त्री-पाठ्य-ग्रंथमाला के लिए ईश्वरीप्रसाद शर्मा ने ‘रमणी रत्नमाला का तीसरा रत्न’ अर्थात ‘सीता’ नामक पुस्तक की रचना की। इस पुस्तक को तैयार करने में लेखक ने गोस्वामी तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’, महर्षि वाल्मीकि प्रणीत ‘रामायण’ और महाकवि भवभूति-रचित ‘उत्तररामचरित’ से सहायता ली है; इसी से यत्र-तत्र इन ग्रंथों के भावों की झलक इस पुस्तक में दिखलाई देती है।

वन में पहुंचाने के लिए गये हुए अपने देवर लक्ष्मण के मुंह से अपने पति की आज्ञा सुनकर सीता बोलीं-‘‘महाराज ने मुझे घर से निकालकर प्रजा को संतुष्ट किया है। मैं भी अपने स्वामी के आदेश को फिर आंखों पर रख, हंसते-हंसते सारे कष्ट सहने को तैयार हूं। दुख कैसा?’’ यह न सिर्फ सीता का आदर्श है बल्कि लेखक भी अपने समय और समाज में इसी आदर्श की स्थापना करना चाता हैं। 

मठिला-डुमरांव-निवासी पंडित रघुवीरदत्त शर्मा को समर्पित ‘चना-चबेना’ की अधिकतर रचनाएं ‘मतवाला’, ‘मौजी’, ‘गोलमाल’, ‘भूत’ और ‘मनोरमा’ में छप चुकी थीं। कुछ इधर-उधर के हैं तो कुछ एकदम कोरे हैं। पंडित जी की रचनाओं के विषय में तत्कालीन सुप्रसिद्ध विनोदी पत्र मतवाला’ ने पहले वर्ष के दूसरे अंक में लिखा था : ‘हम अपने सुप्रसिद्ध विनोदी मित्र ‘‘मनोरंजन’’-संपादक पण्डित ईश्वरप्रसाद शर्मा को भी बड़े प्रेम और आदर के साथ याद करते हैं, जिनकी हास्य-रसमयी कविताओं ने समय-समय पर ‘‘मतवाला’’ को विशेष चित्ताकर्षक बनाया है। शर्मा जी को विनोद का व्यसन है। वे मनोरंजन की मूर्ति हैं।’ 

शिवपूजन सहाय के नेतृत्व और मार्गदर्शन में चार खंडों में हिंदी साहित्य और बिहार जो संपादित किया गया, उसकी पहली प्रेरणा ईश्वरीप्रसाद शर्मा ही के हृदय में हुई थी। उन्होंने ही इस कार्य के लिए शिवपूजन सहाय जी को प्रेरित किया और आरा की नागरी-प्रचारिणी सभा के पुस्तकालय-संचालक शुकदेवसिंह को उनकी सहायता के लिए उत्साहित किया था। हिंदी-प्रेमियों से इतिहास के लिए सामग्री-संकलन के निमित्त अनुरोध करते हुए सबसे पहले सूचना उन्होंने ही लिखी थी और सामग्री-संकलन हेतु उसके साथ ही एक विवरण-पत्र भी तैयार कर दिया था। (हिन्दी-साहित्य और बिहार, प्रथम खण्ड, भूमिका, पृष्ठ ठ।)

औपनिवेशिक बिहार के साहित्यिक हीरो : बिहारभूषण पं. अम्बिकादत्त व्यास

'बिहारभूषण’, ‘भारतभूषण’, ‘भारतरत्न’, ‘भारतभास्कर’, ‘धर्माचार्य’, ‘महामहोपदेशक’, ‘सुकवि’, ‘अभिनव बाण’ व ‘साहित्याचार्य’ की उपाधियों से विभूषित पंडित अंबिकादत्त व्यास (24 मार्च, 1858-19 नवंबर, 1900) का जन्म तो जयपुर के सिलवटों के मुहल्ले में चैत्र शुक्ल अष्टमी को हुआ था, किन्तु उनका कार्यक्षेत्र बिहार रहा। व्यास जी में इतनी विलक्षण सृजन-प्रतिभा थी कि उन्होंने दस वर्ष की अल्पायु ही में साहित्य-सृजन के क्षेत्र में प्रवेश कर लिया। उनकी रचनाएँ दसवर्षीय बालक द्वारा विरचित हैं, यह अविश्वसनीय माना गया और समझा गया कि ये रचनाएँ समकालीन कवि मण्डल में ‘दत्त’ उपनाम से काव्य-रचना करनेवाले उनके पिता दुर्गादत्त की रचनाएँ हैं। कहा जाता है कि जब 'ग्वाल कवि' के शिष्य 'खंग कवि' काशी पधारे और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के दरबार में ‘सूरज देखि सकै नहि घुग्घू’ समस्या, पूर्ति के लिए दी गयी तो वहाँ पिता के साथ उपस्थित बालक अम्बिकादत्त व्यास ने तुरन्त एक सुन्दर पूर्ति करके वहाँ मौजूद कवि-समुदाय को चौंका दिया। फिर भी उनकी काव्य-प्रतिभा पर लोगों का सन्देह मिटा नहीं। ग्यारह वर्ष की अवस्था में उनकी काव्य-परीक्षा ली गई और ‘मूँदि गयी आँखें तब लाखें कौन काम की’ समस्या, पूर्ति के लिए दी गई तो उन्होंने पुनः तत्काल ही एक सुन्दर कवित्त बनाकर सुना दिया। भारतेन्दु ने 'कविवचन सुधा' में इनकी कविता इस सम्पादकीय टिप्पणी के साथ प्रकाशित की-‘इस विलक्षण बालक की बुद्धि विलक्षण ही है और अवस्था इसकी केवल बारह वर्ष की है। हम इसके और समाचार भी लिखेंगे।’ इस तरह बारह वर्ष ही की आयु में व्यास जी ने सरस्वती मन्त्र, अष्टावधान और अन्य चमत्कारों से काशी के रसिक मण्डल को मन्त्रमुग्ध कर अपने भावी सृजन के प्रति पूरी तरह आश्वस्त कर लिया। कवि भारतेन्दु उनकी काव्य-प्रतिभा पर ऐसे रीझे कि उन्होंने ‘काशी कवितावर्धिनी सभा’ में उन्हें ‘सुकवि’ की उपाधि से विभूषित कर दिया। आशुकवि के रूप में भी व्यास जी ने खूब ख्याति प्राप्त की। आप एक घटिका अर्थात् 24 मिनट में सौ श्लोकों की रचना कर लेने के कारण ‘घटिकाशतक’ तथा स्मृति प्रबुद्धतावश ‘शतावधानी’ भी कहे जाते थे। 

गवर्नमेंट संस्कृत काॅलेज से सन् 1880 में ‘साहित्याचार्य’ की उपाधि प्राप्त करने के बाद सन् 1883 ई. में आपकी नियुक्ति मधुबनी (दरभंगा, बिहार) के एक ग्रामीण संस्कृत स्कूल में हुई जहां लगभग तीन वर्षों तक अध्यापन कार्य किया। उसके बाद 1886 में मुजफ्फरपुर संस्कृत विद्यालय में, 1887 में भागलपुर जिला स्कूल में, 1896 में छपरा जिला स्कूल में तथा अंत में 1899 में पटना में रहकर संस्कृत एवं हिन्दी की अनथक सेवा की। भागलपुर जिला स्कूल के आप हेड पण्डित रहे थे। 

स्मरणीय और रेखांकित करने लायक तथ्य है कि पं. अम्बिकादत्त व्यास भागलपुर की हिंदी पत्रकारिता के जनक हैं। वहां की हिंदी पत्रकारिता का आरंभ सन् 1883 में हास्य रस की सामग्री से भरपूर मासिक 'वैष्णव पत्रिका’ के प्रकाशन से होता है। 'वैष्णव पत्रिका' ही साल भर बाद अर्थात् सन् 1884 में 'पीयूष प्रवाह' के नाम से निकली। (हिन्दी पत्रकारिता का बृहद् इतिहास के 118वें पृष्ठ में इसका नाम ‘पीयूष पत्रिका’ लिखा मिलता है जो सही नहीं है।) यह नारायण प्रेस, मुजफ्फरपुर से मुद्रित-प्रकाशित होती थी। इसके संपादक पंडित अम्बिकादत्त व्यास स्वयं थे। 1906 की विजयादशमी को जौनपुर से कालीशंकर व्यास ने भी सचित्र हिन्दी मासिक पत्र 'पीयूष प्रवाह' का प्रकाशन किया था। 

'आधुनिक हिन्दी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका' के लेखक धीरेन्द्रनाथ सिंह ने लिखा है कि पण्डित अम्बिकादत्त व्यास द्वारा संपादित 'पीयूष-प्रवाह' और 'वैणव-पत्रिका' की प्रतियां भी खड्गविलास प्रेस के साहित्य-संग्रहालय में अवश्य रही होंगी, किंतु देखने में नहीं आईं। ऐसा इसलिए कि उक्त पुस्तकालय व्यास जी के पटना-निवास में गोष्ठी का प्रधान केंद्र था। अतः यहां के संग्रह में 'पीयूष-प्रवाह' और 'वैणव-पत्रिका' की फाइलों का होना स्वाभाविक था। आपके अधिकतर निबंध इसी पत्र में निकलते थे। इन निबंधों में ‘धैर्य’, ‘क्षमा’, ‘ग्रामवास’, ‘नगरवास’ आदि उल्लेखनीय हैं। 

'पीयूष प्रवाह मासिक पत्र वैणव पत्रिका सम्मिलित’ में 'बिहारी सतसई' पर अम्बिकादत्त व्यास की कुछ कुंडलियां धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई थीं। ‘जले पर नोन ऐसा शोक पर शोक’ शीर्षक समाचार में संपादक पंडित अम्बिकादत्त व्यास ने भारतेन्दु जी के प्रति पद्यबद्ध अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि भी सादर अर्पित की है। 

व्यास जी की कुल 91 रचनाओं का उल्लेख मिलता है। डॉक्टर कृष्णकुमार द्वारा निर्मित सूची के अनुसार अम्बिकादत्त व्यास ने संस्कृत भाषा में कुल 27 और हिंदी तथा ब्रजभाषा में 64 ग्रन्थ लिखे थे, किन्तु हिंदी में 38 और संस्कृत में कुल 14 रचनाएं ही उपलब्ध हो सकी हैं। 1882 ई. के मार्च में व्यास जी ने भारतेन्दु के 'वेश्या-स्तोत्र' ही की भांति संस्कृत में 'द्रव्यस्तोत्र' की रचना की। यह रचना 'हिन्दी प्रदीप' में प्रकाशित हुई थी। बाद में इसका पुस्तकाकार प्रकाशन खड्गविलास प्रेस, पटना से 1888 ई. में हुआ था। इसमें 42 अनुष्टुप छन्द हैं, जिनमें धनकुबेरों पर व्यंग्य  है। व्यास जी की यह कृति उनकी नाट्य-कृतियों में उत्कृष्ट मानी जाती है। 1882 ही में संस्कृत पुस्तक 'सांख्यतत्त्व-कौमुदी’ की कारिका 'सांख्यतरंगिणी' की रचना की जिसका प्रकाशन 1891 ई. में रामदीन सिंह के ‘प्रकाशकीय वक्तव्य’ के साथ हुआ है। यह धारावाहिक रूप से 'वैष्णव-पत्रिका' तथा 'पीयूष-प्रवाह' में प्रकाशित हुई थी। 63 पृष्ठ की इस पुस्तक में कुल 72 लोकों की व्याख्या की गई है। 

बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि व्यास जी ने तीन संस्कृत रूपकों की रचना की थी। 'बिहारी बिहार' नामक पुस्तक के अंतिम भाग में उनके ग्रंथों का विवरण प्राप्त होता है, किंतु उस सूची में एकमात्र 'सामवतम्' ही का उल्लेख है। हालांकि 'सामवतम्' रूपक के अध्ययन से तीन रूपक की बात उजागर हो जाती है। उनके नाम 'सामवतम्', ’धर्माधर्मकलकलम' तथा 'मित्रालापः' हैं। उनके 'मन की उमंग' संग्रह में पांच रूपक हिंदी में तथा दो रूपक संस्कृत में है। 'मन की उमंग' संग्रह की भूमिका से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि इनका अभिनय मुजफ्फरपुर की धर्मसभा (धर्म संरक्षिणी सभा) में संपन्न हुआ था। आप कह सकते हैं कि मुजफ्फरपुर के रंगमंच के इतिहास में पहला नाटक ‘धर्म संरक्षिणी सभा’ के द्वारा अम्बिकादत्त व्यास ही का अभिनीत हुआ। 1882 में लिखा गया 'सामवतम्' नाटक खड्गविलास प्रेस, पटना से 1888 ई. में हुआ था। 'स्कन्दपुराण’ के एक पौराणिक आख्यान को 'सामवतम्’ नाटक की कथा का आधार बनाया गया है। इस नाटक में दुर्वासा मुनि अपने मित्रपुत्र सामवान् को ‘स्त्री हो जाने का शाप’ देते हैं। उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध का हिंदी लेखक ‘स्त्री-जीवन’ को शाप की तरह लेता है! व्यासजी ने संस्कृत नाट्य परंपरा में 'धर्माधर्मकलकलम' और 'मित्रालापः’ के रूप में एक नवीन शैली जोड़ी है। दोनों एक-एक संवाद के छोटे रूपक हैं। कुछ पद्यों से युक्त यह संवाद मुख्यतः गद्य में है और नाट्यशास्त्रीय दृष्टि से किसी नाट्यविधा में परिगणित नहीं किया जा सकता। 

'बिहारी बिहार' पुस्तक से जानकारी मिलती है कि भक्तिभाव से ओत-प्रोत संस्कृत भाषा में 'रत्नपुराण' एवं 'गणेश शतक' नामक दो रचना और थी जो अब उपलब्ध नहीं है। किंतु जो उपलब्ध है उसका नाम 'सहस्रनाम रामायणम्' है। यह संस्कृत की स्तोत्र परंपरा के अनुपालन में लिखा गया है। इसमें 1000 नामों द्वारा श्रीराम के गुणों को प्रदर्शित करते हुए संपूर्ण रामायण की कथा कही गई है। कहा जाता है कि इस पर तुलसी की 'विनयपत्रिका' का प्रभाव परिलक्षित है। संस्कृत के 'सांख्य सागर सुधा', 'पातंजल प्रतिबिंब' एवं 'दुखद्रुमकुठार’ ग्रन्थ इनके दार्शनिक चिंतन की गहराई को अभिव्यक्त करते हैं। 'सांख्य सागर सुधा' की रचना बालकों को सांख्य दर्शन का आरंभिक ज्ञान करवाने हेतु की गई थी। इसमें सांख्य दर्शन के प्रतिपाद्य विषय जड़-चेतन दो तत्त्वों की कल्पना, 25 तत्त्वों का विवेचन, तीन प्रकार के शरीर, जीव द्वारा प्रकृति एवं पुरुष के भेद को समझ लेने से परे कैवल्य ज्ञान, त्रिगुणात्मिका सृष्टि की उत्पत्ति आदि सभी विषय सरलता से वर्णित हैं। 'पातंजल प्रतिबिंब' ग्रन्थ में योग दर्शन के सूत्रों की परिभाषाओं और सिद्धांतों को कारिका रूप में निबद्ध करके प्रस्तुत किया गया है। इनमें समाधि, साधन, विभूति और कैवल्य चार पाद हैं। अपनी सरल भाषा शैली के कारण योग दर्शन का यह ग्रन्थ भी उपयोगी है। 

व्यास जी ने संस्कृत में 'अवतारमीमांसा' कारिका ग्रन्थ भी लिखा। इसमें अव्यक्त एवं अनादि ब्रह्म के पृथ्वी पर अवतरण को शंका एवं समाधान की शैली में सप्रमाण विवेचित किया गया है। 261 अनुष्टुप छंदों में 8 प्रश्न और ग्रन्थ के उत्तरार्द्ध में उनके समीचीन उत्तर देते हुए व्यास जी ने अवतारवाद के प्रति अपनी गहन निष्ठा व्यक्त की है। आपने संस्कृत कवियों के अभ्यास के लिए संस्कृत में 'कुण्डली दीपक' तथा 'समस्यापूर्ति सर्वस्व' जैसे ग्रन्थ लिखे तो विज्ञान, रेखागणित और इतिहास की भी पुस्तकें लिखीं, जो आज अनुपलब्ध हैं। 

बच्चों को संस्कृत भाषा सिखलाने की गरज से व्यास जी ने 'रत्नाष्टक', 'संस्कृत अभ्यास पुस्तकम्' (दो भाग), 'प्राकृत प्रवेशिका', 'बाल व्याकरण' तथा 'कथा कुसुमम्' आदि कृतियां लिखीं। 'कथा कुसुमम्' में विद्यार्थियों के लिए लिखी गई 25 छोटी-छोटी कथाएं संकलित हैं। 'बाल व्याकरण' पुस्तक में संस्कृत व्याकरण का प्रारंभिक ज्ञान कराने का प्रयत्न है। 'संस्कृत अभ्यास पुस्तकम्' की रचना अंग्रेजी भाषा से संस्कृत का अभ्यास कराने के लिए 'अंग्रेजी कम्पोजिशन बुक्स' के आधार पर लिखी गई थी। संस्कृत व्याकरण की दुरुहता से परिचय के लिए व्यास जी ने 'गुप्ताशुद्धिप्रदर्शनम्' की रचना की।

संस्कृत की समृद्धि एवं प्रतिष्ठा तथा शिक्षा प्रणाली के परिष्कार के लिए पं. अम्बिकादत्त व्यास द्वारा सन् 1887 ई. में स्थापित संस्था ‘बिहार संस्कृत-संजीवन समाज’ संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयासरत रही। इसकी पहली बैठक 5 अप्रैल, 1887 ई. को हुई, जिसकी अध्यक्षता पोप जॉन बेंजिन ने की थी। इसमें देश-देशान्तर के लोग आये थे। समाज के प्रथम सचिव स्वयं पं. अम्बिकादत्त व्यास थे। इस समाज द्वारा सन् 1940 ई. में त्रैमासिक के रूप में 'संस्कृतसंजीवनम्' का प्रकाशनारम्भ किया गया। यह पत्र पटना के बारी पथ से प्रकाशित होता था। इसका वार्षिक मूल्य छः रुपये था। इसके संपादक-मंडल में केदारनाथ ओझा, भवानीदत्त शर्मा, चंद्रकांत पाण्डे, त्रिगुणानंद शुक्ल तथा राम पदार्थ शर्मा आदि विद्वान थे। 'संस्कृतसंजीवनम्' के प्राचीन अंक नहीं मिलते। यह पत्रिका अपने प्रकाशनारम्भ के तेईसवें वर्ष अर्थात् जून, 1962 ई. से मासिक के रूप में प्रकाशित होने लगी। इसकी सम्पुष्टि 'संजीवनम्' के जून, 1962 ई. के अंक के सम्पादकीय की निम्नांकित पंक्तियों से होती है: ‘साम्प्रतिकानांसंस्कृतानुरागिणां सहयोगेन द्वाविंशवर्षं समाप्य संस्कृतसंजीवनमिदं त्रयोविंशवर्षेऽवतरतीति सुरसरस्वतीसेवकेभ्यः परमहर्षस्यायं विषयः। महतः हर्षस्यायमपि विषयो यत् त्रैमासिकं संस्कृत-सज्जीवनमनेनांङ्कन मासिकरूपेण प्रकाशते।’

पत्रिका के मुखपृष्ठ पर ‘भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतंचैव संस्कृतिः’ वाक्य छपता था तथा प्रायः प्रत्येक अंक के मुखपृष्ठ पर कोई न कोई मन्त्र, श्लोक या संस्कृत के सम्बन्ध में प्रसिद्ध व्यक्तियों की उक्ति प्रकाशित होती थी। इसमें प्रायः शोधात्मक निबन्ध, गीत, नाटक, प्रहेलिका, सामयिक समाचार, बालमण्डली के अतिरिक्त संस्कृत जगत् की गतिविधियों से सम्बद्ध समाचार होते थे। 

हिंदी के रूपकों में 'ललिता नाटिका', 'गोसंकट नाटक', 'भारत सौभाग्य', 'कलियुग और घी' तथा 'मन की उमंग' प्रसिद्ध हैं। भारतीय संस्कृति के ‘परम संरक्षक’ तथा हिन्दू धर्म के प्रति आस्थावान व्यास जी ने 'गोसंकट नाटक' (प्रथम संस्करण सन् 1886) के द्वारा समस्त हिन्दुओं को गोरक्षा के लिए सम्बोधित किया है। लेखक की राय में, ‘मुसलमान गोवध करने में तत्पर रहे हैं, किन्तु हिन्दू उसे माता के समान सम्मान देते रहे हैं।’ कहा जाता है कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के प्रोत्साहन में इस नाटक की रचना सम्वत् 1939 में सम्पन्न हुई। इसका प्रथम प्रकाशन 'उचित वक्ता' नामक पत्रिका में हुआ तथा बाद में सम्वत् 1941 में खड्गविलास प्रेस में पुस्तक के आकार में इसका प्रकाशन हुआ। 

'गोसंकट नाटक' का कथानक अकबर बादशाह के समय का है। इसमें श्री व्यास ने मुसलमानों का नृशंस औेर हिन्दू जाति पर अत्याचार करनेवाला रूप व्यक्त किया है। आपने इस नाटक में गाय की उपयोगिता का विशद वर्णन किया है और कहा है कि मुसलमान केवल हिन्दुओं को उत्तेजित करने के लिए गोवघ किया करते थे। मुसलमानों के ‘अत्याचारों’ का ‘मर्मस्पर्शी’ वर्णन है। एक बार गोवध के लिए जिद करनेवाले मुसलमानों से हिन्दू बलात् उस गाय को छुड़ा तो लेते है, परन्तु उन्हें सघर्ष करना पडता है। अकबर के दरबार में हस्ताक्षर अभियान से फरियाद की जाती है। अतः वह गोवध के निषेध की आज्ञा प्रसारित करता है। इस प्रसन्नता में हिन्दू ‘गोरक्षा-महोत्सव’ मनाते हैं। 

भारतेन्दु समाचार पत्रों की उपयोगिता और ताकत से परिचित थे। इसलिए 1873 में जब उन्होंने ‘हिन्दी समाज’ की स्थापना की तो अपने समय के वैष्णव मत का परिष्कार करके लोकोपयोगी बनाने की चेष्टा की और इस उद्देश्य हेतु 'भगवद्तोषिणी' नाम की एक पत्रिका भी निकाली जो अर्थाभाव के कारण कुछ ही महीने निकलकर बन्द हो गई। कभी-कभी उनका ‘वैष्णव-मत-परिष्कार’ मुस्लिम विरोध का रूप धारण कर लेता था। बकरीद के मौके पर मुसलमानों ने गोहत्या की तो भारतेंदु ने पटने के खड्गविलास प्रेस से प्रकाशित 'क्षत्रिय पत्रिका' के संपादक बाबू रामदीन सिंह को लिखा, ‘‘भागलपुर, मिर्जापुर, काशी इत्यादि कई स्थानों में प्रकाश्यरूप से केवल हमारा जी दुखाने के हॉको-ठोक यह अत्याचार हुआ है जो किसी-किसी समाचार-पत्र में प्रकाश भी हुआ है। आप भी अपने पत्र में इस विषय का भली भांति आंदोलन कीजिए। सब पत्र एक साथ कोलाहल करेंगे। तब काम चलेगा। हिन्दी, उर्दू, बंगाली, मराठी, अंग्रेजी सब भाषाओं के पत्रों में जिनके संपादक हिन्दू हों एक बेर बड़े धूम से इसका आन्दोलन होना आवश्यक है आशा है कि अपने शक्य भर आप इस विषय में कोई बात उठा न रक्खेंगे।’’ 

'कलियुग और घी' एक छोटा सा रूपक है। इस रूपक की रचना सम्वत् 1942 (सन् 1885) में हुई। यह उसी वर्ष नारायण प्रेस, मुजपफरपुर से प्रकाशित हुआ। यह रूपक वस्तुतः एक प्रचारात्मक रचना है, जिसमें कवि ने हिन्दुओं की सामाजिक तथा धार्मिक परम्पराओं में सुधारों का विरोध किया है। उस समय आर्यसमाजियों और ब्रह्मसमाजियों द्वारा किए जाने वाले बालविवाह और मूर्तिपूजा के खण्डन आदि का विरोध इस रूपक में है। अपने कथन की पुष्टि के लिए श्री व्यास ने स्थान-स्थान पर संस्कृत के वाक्यों व श्लोकों को उद्धृत किया है। उनकी यह मान्यता है कि कलियुग के प्रभाव से ही घी में चर्बी आदि अपवित्र द्रव्यों का संयोग हुआा है। इस तरह, अम्बिकादत्त व्यास ने धी में मिलावट के बहाने अपने हृदय की पीड़ा को अभिव्यक्त किया है।

ब्रह्म समाज आंदोलन, जो विधवा विवाह समेत महिला मुक्ति का पक्षधर था, बिहार में प्रभावकारी स्थिति में नहीं था। थोड़े से बंगाली परिवारों के बीच ही यह सीमित था। बावजूद इसके, बिहार का तत्कालीन हिंदू समाज ब्रह्मसमाजियों के विचारों को हिंदू धर्म के लिए खतरा मानकर नापसंद करता था। सन् 1887 ई. में मुजफ्फरपुर में हरिसुंदर बोस को इन्हीं विचारों के प्रचार के लिए जूतों की माला पहनाई गई थी। 'बिहार बन्धु' भी ब्रह्म समाज के समाज सुधार संबंधी कतिपय क्रांतिकारी विचारों की आलोचना करता था। यद्यपि आर्य समाज भी विधवा पुनर्विवाह का पक्षधर था और समय-समय पर बहुविवाह, बाल विवाह एवं बेमेल विवाह की प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाता रहा था, 'बिहार बन्धु' ने आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानंद का एक लेख प्रमुखता से छापा जिसका शीर्षक था, ‘अस्पृयता को हटाइए, स्वदेशी को अपनाइए।’ 

व्यास जी सनातन मतावलम्बी कट्टर हिन्दू ब्राह्मण थे। उनका मानना था कि प्राचीन वैदिक सभ्यता एवं ब्राह्मणों की गरिमा को लौटाकर ही हिन्दू समाज का भला हो सकता है। 'गीता' के उद्घोष ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परघर्मो हि भयावहः’ में उनकी गहन निष्ठा थी। उन्होंने तत्कालीन सामाजिक एव धार्मिक सुधारवादी आन्दोलनों का विरोध करते हुए खण्डनमण्डनात्मक साहित्य लिखा। पौराणिक धर्म के पक्ष में आपने हिन्दी में 'अबोध निवारण', 'पण्डित प्रपंच', 'दयानन्दमतमूलोच्छेद', 'दोषग्राही', 'गुणग्राही', 'मानस-प्रशंसा', 'वर्णव्यवस्था', 'आश्रम घर्म-निरूपण', 'मूर्तिपूजा' एवं 'अवतार मीमांसा' आदि पुस्तकें लिखी। 

उन्नीसवीं सदी के आठवें दशक में स्वामी दयानन्द के आर्यसमाज का बोलबाला था। सनातन धर्म का बड़ी बेरहमी से तर्क के साथ खण्डन किया जा रहा था। व्यास जी ने पटना में स्वामी दयानन्द के प्रभाव को अपने अनेक भाषणों से कम करने का प्रयास किया था। उनका एक भाषण 16 नवम्बर, 1885 ई. को पटना में हुआ था, जो अत्यन्त प्रभावशाली था। उस भाषण को खड्गविलास प्रेस के बाबू साहेबप्रसाद सिंह ने संकलित किया था। बाबू शिवनन्दन सहाय ने उसका उर्दू तथा अँगरेजी में अनुवाद किया था। इन भाषणों का संकलन 'दयानन्द-मत-मूलोच्छेद’ सन् 1885 ई में प्रकाशित हुआ था। हिंदी पुस्तक 'अबोध निवारण' की रचना व्यास जी ने स्वामी दयानंद की पुस्तक 'संस्कृत वाक्य प्रबोध' की अशुद्धियों को प्रदर्शित करते हुए की, और यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि स्वामी जी द्वारा लिखे गये वैदिक मंत्रों के अर्थ प्रामाणिक नहीं माने जा सकते। 

कट्टर सनातनी और समाज सुधार के विरोधी अम्बिकादत्त व्यास ने 'पीयूष प्रवाह' में ‘काजी जी दुबले क्यों' शीर्षक एक लेख छापा, जिसमें राजा रामपाल सिंह (सुधारकों में अग्रगण्य) पर यह आक्षेप था कि ‘अत्रभवान (अनेक पुस्तकों में अत्रभावन लिखा मिलता है) तो चाहते हैं कि सारा भारत इंग्लैंड हो जाए, लेकिन जो मर्दुमशुमारी दस-दस साल पर पाँच-पाँच करोड़ बढ़ रही है, उसी से यहाँ के लोगों को दोनों जून भरपेट खाने को नहीं मिलता और अब यदि अत्रभावन के सिद्धांत पर विधवा विवाह का भंडा फूटेगा तो भारत की मेदिनी और भूखों मरने लगेगी।’ वह लेख राजा साहब के पास आया। उन्होंने कहा कि ‘कोई इसका मुंहतोड़ उत्तर नहीं दे सकता?’ बालमुकुंद गुप्त जी ने उसी समय कहा-‘‘कल मैं इसका उत्तर ‘हिंदोस्थान’ में निकाल दूंगा।’’ उसी अवसर पर गुप्त जी ने ‘हिंदोस्थान’ में एक लेख लिखा, जिसका शीर्षक था ‘मैं सुकवि हूंँ’ (व्यास जी कविता में अपना नाम ‘सुकवि’ लिखा करते थे)। उस लेख में ‘सुकवि’ की खूब खबर ली गई। 

अम्बिकादत्त व्यास भारत को इंगलैंड बना दिये जाने के समर्थक नहीं थे किंतु ‘चिरजीवी रहो विक्टोरिया रानी’ के पूर्तिकारों में वे भी शामिल थे। इतना ही नहीं, व्यास जी ने मुजफ्फरपुर (बिहार) में सन् 1887 ई. में 'भारत-सौभाग्य' नामक नाटक की रचना की थी। उसी वर्ष यह पुस्तक खड्गविलास प्रेस से छपी। श्री कृष्णबिहारी मिश्र रचित 'प्रबोधचन्द्रोदय' नाटक के सदृश यह भी एक भावात्मक रूपक है जिसमें भारतसौभाग्य, विषयभोग, भारतदौर्भाग्य, प्रताप, उत्साह तथा शिल्प ‘पुरुष पात्र’ है तथा मूर्खता, फूट, शिक्षा, एकता, भारत-पताका, अंग्रेजीपताका, राजभक्ति, यंत्रविद्या, उदारता तथा दया ‘स्त्री पात्र’ है। रामदीन सिंह ने महारानी विक्टोरिया की जुबिली के अवसर पर ’भारत-सौभाग्य' को मुद्रित कर निःशुल्क वितरित किया था। यह पुस्तक बड़ी अच्छी सुनहली किनारी तथा विभिन्न रंगों में छापी गई थी। विदेाी पत्रों ने इसकी बड़ी सराहना की थी। यह नाटक 'क्षत्रिय-पत्रिका’ के ‘प्रीति-स्वरूप’ वितरित किया गया उपहार था। चार दृयों और इक्यावन पृठों का यह नाटक अंग्रेजी शासन के प्रति आस्था प्रकट करता है। इन चार अंकों में दिखलाया गया है कि अंग्रेजी राज के पूर्व मुगलकाल में यवनों के दुराचार, मूर्खता, फूट आदि से भारत में दुर्भाग्य का साम्राज्य आ गया था। अंग्रेजी राज में शिक्षा, उत्साह, एकता, यन्त्रविद्या और शिल्प ने दुर्भाग्य को दूर कर दिया। इसका श्रेय महारानी विक्टोरिया को दिया गया है, इसलिए अनेक भाषाओं में रचित कविताओं द्वारा महारानी के प्रति शुभकामनाएं व्यक्त की गई हैं। 

'जटिल वणिक्' रूपक में व्यास जी ने मुसलमानी राज्य की तुलना में अंग्रेजी राज की श्रेष्ठता साबित और अभिव्यक्त की है। इस हेतु उन्होंने एक जटिल तपस्वी और एक वणिक् का वार्तालाप कराया है। एक जटिल तपस्वी जब अपनी तपस्या से उठता है तो वह चित्तौड़ की रक्षा तथा उस पर मुसलमानों के आक्रमण की घटना से क्षुब्ध है तथा उनका संहार करने के लिए उस वणिक् से वह खड्ग मांगता है, परंतु वणिक् यह बताता है कि मुसलमानों का शासन समाप्त हो चुका है तथा इस समय राज-राजेश्वरी विक्टोरिया का राज्य है। इस समय प्रजा सुखी और धर्माचरण में पूर्ण स्वतंत्र है। 

बिहार की शिक्षण व्यवस्था में अपने जीवन का अधिकांश समय बितानेवाले अम्बिकादत्त व्यास ने बिहार के हिन्दी पढ़नेवाले छात्रों को अपनी प्रसिद्ध पाठ्यपुस्तक 'साहित्य-नवनीत' द्वारा काफी लाभ पहुंचाया। यह पुस्तक बहुत दिनों तक यहां स्वीकृत पाठ्य सामग्री थी। वे अपने समय के श्रेष्ठ विद्वानों में से थे। सन् 1885 ई. में प्रकाशित बाबू रामचरण सिंह के 'भाषा प्रभाकर' को उन्होंने जिस पाण्डित्य के साथ संशोधित किया था और उसमें जैसी समीक्षात्मक टिप्पणियाँ दी थीं, उनसे उनकी अद्भुत विद्वता का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। उसी ग्रन्थ में उन्होंने 'हिन्दीभाषा सूत्राधार' नामक एक व्याकरण की रचना प्रारम्भ करने की सूचना दी थी जो उनके असामयिक निधन से सम्भवतः पूरा नहीं हो सका। सन् 1901 ई. में माधव प्रसाद पाठक ने अपने 'हिन्दी बालबोध व्याकरण' की भूमिका में उसका उल्लेख करते हुए लिखा था कि ‘‘पण्डित अम्बिकादत्त व्यास साहित्याचार्य स्वर्गवासी ने ‘आर्यभाषा सूत्रधार’ नामक व्याकरण का लिखना आरम्भ किया था, परन्तु नहीं जान पड़ता कि वह ग्रन्थ कहाँ है, समाप्त हुआ कि नहीं, किसी ने कभी उसको देखा या नहीं, यह सब बातें गुप्त। उक्त पण्डित जी लोकोत्तर बुद्धि के मनुष्य थे यदि जीते रहते, तो अवश्य उस ग्रन्थ को प्रकाश करते। दैवयोग से वे अल्पायु हो गये।’’ हिन्दी व्याकरण का इतिहास के लेखक अनन्त चौधरी ने भी लिखा है कि ‘पं. अम्बिकादत्त व्यास संभवतः उक्त ग्रंथ को पूरा नहीं कर सके थे, क्योंकि बहुत खोज करने पर भी न तो हमें उसकी कोई प्रति कहीं मिली और न उसका अन्यत्र कोई उल्लेख ही मिला।’ 

1890 के आसपास हिंदुस्तान में खड़ी बोली के प्रचार का आंदोलन उठ खड़ा हुआ। खड़ी बोली के उन्नायक मुजफ्फरपुर के बाबू अयोध्याप्रसाद खत्री ने हिन्दी में विराम-चिह्न आदि के व्यवहार पर कई लेख लिखे। इसी समय, कलकत्ता में 1890 में 'हिन्दी बंगवासी' का जन्म हुआ। इसका संपादन पण्डित अमृत लाल चक्रवर्ती और पण्डित रुद्रदत्त शर्मा कर रहे थे। ये दोनों व्यक्ति विभक्तियों को मिलाकर लिखने के कट्टर समर्थक थे। इधर अम्बिकादत्त व्यास तथा श्री गोपालराम गहमरी बिहार बन्धु में मोर्चा संभाले थे। ये दोनों ही विभक्ति को शब्द से न मिलाकर लिखने के पक्ष में थे। अतः 'बिहार बन्धु' ने इनका समर्थन किया और अपना निर्णय देते हुए लिखा-‘‘सर्वनाम के साथ जो विभक्ति आवे वह साथ लिखी जावे।’’ इस विषय पर 'बिहार बन्धु' में गहमरी जी के कई करारे लेख छपे हैं। व्यास जी की 'विभक्ति विलास' (अनन्त चौधरी की किताब हिन्दी व्याकरण का इतिहास, पृष्ठ 380 में भूलवश ‘विभक्ति विभाग’ छप गया है।) नाम की एक पुस्तक सन् 1890 ई. में भागलपुर से प्रकाशित हुई थी, जिसमें हिन्दी भाषा में विभक्तियों को अलग लिखना कि नहीं; इस विषय का विचार करते हुए मानकीकरण का विचार किया था। 'विभक्ति विलास' में आपने इस बात को भलीभांति रखा था कि विभक्तियों को पृथकतया ही लिखना चाहिए।

पण्डित जी ने विभक्ति संबंधी उक्त प्रन को पत्र के रूप में छपाकर देश के श्रेष्ठ विद्वानों के पास भेजा था। अपनी पुस्तक में उन्होंने सभी विद्वानों के नाम के साथ उनकी सम्मतियाँ प्रकाशित की थीं। वे स्वयं विभक्ति को शब्द से हटाकर लिखने के पक्ष में थे। अधिकतर विद्वानों ने उन्हीं के मत का समर्थन भी किया था, किन्तु कलकत्ते के 'हिन्दी बंगवासी' नामक मासिक पत्र के सम्पादक ने उनके मत का विरोध करते हुए विभक्ति को शब्द से सटाकर लिखना उचित बताया था। पण्डित जी ने उक्त सम्पादक के पत्र का बड़ा ही तर्कयुक्त एवं व्यंग्यपूर्ण उत्तर दिया था। अपनी पुस्तक में उन्होंने उक्त सारी सामग्री ज्यों-की-त्यों उद्धृत की थी। अन्त में अपना निष्कर्ष देते हुए उन्होंने लिखा था कि “विभक्ति और उनके पूर्व के शब्दों को अलग ही लिखना उत्तम है और मिला के लिखना साधारण है, परन्तु जहाँ विभक्ति का रूपान्तर हो गया हो, वहाँ अलग नहीं लिखना और जहाँ विभक्ति के पहले कोई दूसरी विभक्ति अथवा अव्यय हो, वहाँ मिला के नहीं लिखना चाहिये।’’

पटना और इसके मुहल्ले

भाषाविज्ञान बताता है कि पटना, पट्टन शब्द से बना है। पट्टन संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है शहर या नगर। इससे इसका व्यापारिक महत्त्व प्रकट होता है।

प्राचीन जमाने में यह एक गांव रहा होगा, जैसा कि 'पाटलिग्राम' शब्द से जाहिर है। कहा जाता है कि इस इलाके में 'पाटली' नामक वृक्ष की प्रधानता थी। 'पाटलिपुत्र' नाम के मूल में यह 'पाटली' वृक्ष रहा होगा। यहां सघन वन तथा पुष्प उद्यान होने के संकेत 'कुसुमपुर', (कुसुमपुर, कन्नौज का भी प्राचीन नाम रहा है। देखें, कृष्ण कांत दुवे, 'कन्नौजी लोक संस्कृति और लोकगीत', आजकल, अगस्त 2012) 'पुष्पपुर' आदि नामों से भी मिलते है। 'वायु पुराण' में हमें 'कुसुमपुर' नाम मिलता है जिसका शाब्दिक अर्थ है 'फूलों की नगरी'। (डी आर पाटिल, दी एन्टीक्वेरियन रिमेन्स इन बिहार, के पी जायसवाल, शोध संस्थान, 1963, पृष्ठ 373) 'गार्गी संहिता' में इसे पुष्पपुर के साथ 'कुसुम-ध्वज' भी कहा गया है। (स्मिथ, अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया, पृष्ठ 228 में उद्धृत) पटना का प्राचीन 'कुसुमपुर' नाम आज भी 'फुलवारी शरीफ' में सुरक्षित देखा जा सकता है। (डी आर पाटिल, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 373)

मध्यकाल में यह 'अजीमाबाद' के नाम से जाना गया। यह नाम शहर और सूबा दोनों के लिए प्रचलन में था। (द कॉम्प्रिहेंसिव हिस्ट्री ऑफ बिहार, वॉल्यूम ll, पार्ट ll, पृष्ठ 232, पादटिप्पणी संख्या 6) 1704 ईस्वी में औरंगजेब का पोता अजीम-उस-शान बिहार का सूबेदार था जिसने शहर को अपने तरीके से बसाया। लोदियों के मुहल्ले का नाम 'लोदीकटरा', मुगल सेना के अधिकारियों का मुहल्ला 'मुगलपुरा' और उलेमा, साहित्यकार, शायर, कवि का मुहल्ला 'मैदाने फसाहत' के नाम से बसा। (वही) सद्र-उस-सुदूर (मुख्य न्यायाधीश) का निवास स्थान 'सदर गली' कहलाया (जैसे आज चपरासी क्वार्टर और ऑफिसर्स फ्लैट हैं) तो हिन्दू उमरा (अधिकारी) के कारण 'दीवान मुहल्ला' आबाद हुआ। मुगल काल में पटना शहर की पूर्वी सीमा पर माल पर चुंगी (सलामी) वसूलने का केंद्र था, इसलिए यह मुहल्ला 'मालसलामी' कहलाया।

कुछ मोहल्लों का नाम पेशे के आधार पर मशहूर हुए। बर्तन बनानेवालों का मुहल्ला 'ठठेरी बाजार' तो तीर-कमान बनानेवालों का मुहल्ला 'कमानगर की गली' हुआ। आज इसे 'कमंगर गली' के नाम से जाना जाता है ठीक जैसे मैंगल तालाब अब मंगल तालाब है। पान बेचनेवालों का मुहल्ला 'पानदारी', नमक का बाजार 'नूनगोला', चावल का बाजार 'चौहट्टा' और गुड़ का बाजार 'गुड़हट्टा' या 'गुरहट्टा' और मछली बाजार 'मछरहट्टा'। कचौड़ी गली तथा कठौती गली इसी श्रेणी में शुमार हैं।

आधुनिक पटना में भी पेशे और सरकारी विभाग के नाम पर कुछ मुहल्ले है। सी डी ए कॉलोनी, सी आई डी कॉलोनी, रेवेन्यू कॉलोनी, पुलिस कॉलोनी आदि। पेशा के नाम पर हमें पत्रकारनगर जैसा मुहल्ला भी प्राप्त होता है। कुछ मुहल्लों के नाम जाति के नाम पर रखे जाने लगे हैं। ए जी कॉलोनी मुख्य सड़क के एक तरफ 'श्रीनगर' मुहल्ला है तो दूसरी तरफ 'केसरी' नगर। कहने को तो श्रीकृष्ण सिंह और कलक्टर सिंह केसरी दो महापुरुष के नाम हैं, लेकिन मूल में जाति है।