Monday, October 5, 2026

औपनिवेशिक बिहार के साहित्यिक हीरो: ईश्वरीप्रसाद शर्मा

सन् 1893 में जन्मे ईश्वरीप्रसाद शर्मा आरा नगर के मिश्रटोला मुहल्ले के निवासी सारंगधर मिश्र के इकलौते पुत्र थे। आपका परिवार आरंभ ही से शिक्षित-प्रतिष्ठित एवं गण्यमान्य रहा है। आपके पूर्वजों में चाचा पंडित श्रीधर मिश्र, पितामह पिनाकधर मिश्र तथा हिन्दी के आदि-गद्य लेखकों में शुमार पंडित सदल मिश्र रहे हैं।आप सात वर्ष के हुए तभी आपके पिताजी का देहांत हो गया। 1909 ईस्वी में आपकी माताजी भी चल बसीं। अब तो चाचा-चाची का प्यार ही ईश्वर का एकमात्र सहारा था। चाचा-चाची प्यार से इन्हें ‘बच्चनजी’ कहकर पुकारते। बचपन के साथी आपको ‘दीना’ या ‘दीनानाथ’ कहा करते। 'मनोरंजन' के संपादक स्वयं भी मनोरंजन-मूर्ति थे। हँसाने, गुदगुदाने या चिकोटी काटने का उनका स्वभाव था। रामवृक्ष बेनीपुरी ने लिखा है, 'एक बार काशी में मैं एक मारवाड़ी वासे में पालथी मारकर भोजन कर रहा था। पीछे से आकर किसी ने ऐसा गुदगुदा दिया कि मैं उठ खड़ा हुआ। मुड़कर देखता हूँ शर्मा जी खिलखिला रहे हैं।' (रामवृक्ष बेनीपुरी, 'मुझे याद है', नई धारा, वर्ष 4, अंक 10, पृष्ठ 83)

आपकी आरंभिक स्कूली शिक्षा आरा के ‘कायस्थ जुबली एकेडमी’ में हुई जहां के बाद में आप हिन्दी-शिक्षक नियुक्त हुए। सन् 1905 ईस्वी के स्वदेशी आंदोलन के युग में, इसी स्कूल की एक सभा में आपने अपना पहला व्याख्यान किया था। आपका पहला लेख, जो गद्य-काव्य था, 1909 ईस्वी में ‘भारत-जीवन’ में छपा था। 

आरा के महामहोपाध्याय पंडित सकलनारायण शर्मा के संपादन में 1900 ई. में ‘शिक्षा’ नामक साप्ताहिक की शुरुआत खड्गविलास प्रेस (पटना) से हुई थी जिसके संपादकों के इतिहास में भी ईश्वरीप्रसाद शर्मा का नाम जुड़ा है। 1912 ईस्वी में आपने आरा से सचित्र हिन्दी-मासिक ‘मनोरंजन’ का प्रकाशन किया, जिसकी उन दिनों बड़ी धूम थी। उस समय की प्रसिद्ध मराठी मासिक पत्रिका ‘मनोरंजन’ के तर्ज पर शर्मा जी ने इसे निकाला था। यद्यपि शर्मा जी की पत्रिका अपने मिजाज में साहित्यिक थी, किंतु शिक्षा संबंधी सामग्री की वजह से शीघ्र ही छात्रों के बीच लोकप्रिय हो गई। इस पत्रिका ने तीन वर्ष के अल्पकाल का जीवन प्राप्त किया था। 

यह नये ढंग का बहुत ही सुसज्जित और सुंदर मासिक था। तृतीय बिहार प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति बाबू शिवनन्दन सहाय के शब्दों में : ‘मनोरंजन खूब सज-धज कर निकलता था और अपने सुंदर लेखों से मन को रंजित किया करता था’। इसके दो महत्त्वपूर्ण विशेषांक भी प्रकाशित हुए थे। इस सर्वांगसुंदर विशेषांक के प्रकाशन का सारा खर्च श्रीरघुवीर नारायणजी ने राजाबहादुर कीर्त्यानन्द सिंह से दिलवाया था। इसके बाद आरा से ऐसी सर्वगुणसंपन्न कोई पत्रिका प्रकाशित नहीं हो सकी। 

‘मनोरंजन’ ने जिस समय बिहार प्रान्त में कार्य करना आरंभ किया था, उस समय इस प्रान्त में एकमात्र लक्ष्मी ही एक ऐसी मासिक पत्रिका थी जो अच्छी श्रेणी में गिनी जाती थी, परमात्मा की दया और हिन्दी के धुरन्धर लेखकों और कवियों की लेखनी का साहाय्य पाकर ‘मनोरंजन’ ने वर्ष ही भर में पत्र-साहित्य में एक अच्छा स्थान प्राप्त कर लिया, पर कहते दुःख होता है कि इसके प्रकाशन का भार भी हमारे ही निर्बल स्कन्धों पर रहने के कारण अर्थ की कृच्छ्रता से और प्रेस अपना न होने से गत वर्ष इसका जीवन नितान्त ही संशयापन्न हो गया था और यदि हरदास एण्ड कम्पनी के सुयोग्य संचालक पण्डित हरिदासजी वैद्य अपनी दयालुता से इसे फिर नहीं अपनाते तो शायद ‘मनोरंजन’ फिर नहीं निकल पाता, पर उक्त महोदय ने जिस प्रकार उत्साह देकर प्रथम वर्ष इसे निकलवाया उसी प्रकार मरने से भी इसका उद्धार किया और इसने फिर दुनिया का मुँह देखा। अबके प्रबन्ध अच्छा कर लिया गया है और यदि हमारे ग्राहकों ने पुरानी गड़बड़ी का खयाल छोड़कर सहायता की कमर कसी तो दो ही चार महीनों में इसकी रही-सही त्रुटियाँ भी दूर हो जायेंगी और कुछ ही अंकों के बाद चित्र और पृष्ठ तथा कागज की किस्म बढ़ाने का उद्योग किया जायगा। आशा है कि हमारे पाठक ‘मनोरंजन’ की सहायता को अग्रसर होंगे।’ 

रामसहाय लाल बुकसेलर ने 1921 ई. में द्विजदेव नारायण लाल के संपादकत्व में ‘श्रीविद्या’ नामक मासिक पत्रिका शुरू की थी जिसके संपादकों में लाला भगवानदीन, अखौरी शिवनन्दन सहाय के साथ ईश्वरीप्रसाद शर्मा का भी नाम है। लाला भगवानदीन के बाद आपने गया से निकलनेवाली पत्रिका ‘लक्ष्मी’ का भी संपादन किया था।

ईश्वरीप्रसाद शर्मा हास्य-व्यंग्य के उस्ताद, फक्कड़ों के बादशाह, मतवाला मंडल के सहयोगी थे। दफ्तर कभी वक्त से न जाते थे। मित्रों से कहते थे-‘त्यागपत्र हमेशा जेब में रखता हूं’। स्वादिष्ट भोजन करना, आये दिन थियेटर देखना, मित्रों के साथ गप लगाना, दूसरों को काम न करने देना-यही उनका दैनिक कार्यक्रम था। उनकी स्मृति इतनी तीक्ष्ण थी कि सैंकड़ों कविताएँ याद थीं। संस्कृत, बंगला, हिन्दी, उर्दू जब जिस भाषा की जरूरत हुई, सुनाने लगते थे। इस वैविध्य का वे यथोचित लाभ लेते। अनुवाद से लेकर व्यापारियों के लिए विज्ञापन लिखने तक जब जैसा काम मिला, वह आनन-फानन कर डालते थे और क्या मजाल कि कभी लिखे को काटना पड़ा हो। 

पंडित ईश्वरीप्रसाद शर्मा, शिवपूजन सहाय के गुरु कहे जाते हैं। आरंभ में इन्हीं के प्रोत्साहन से शिवपूजन सहाय ने हिन्दी-सेवा का व्रत लिया था। कुछ दिन तक आगरे में साथ रहकर दोनों ‘धर्माभ्युदय’ पत्र में काम कर चुके थे। इस पत्रिका का आधा अंश गुजराती में रहता था। आपने कुछ ही दिनों बाद उसे सर्वांग हिन्दीमय कर डाला। शर्मा जी केवल साहित्यिक गुरु न थे बनियों से पैसा वसूल करने की कला में कलकत्ते के हिन्दी लेखकों के 'आचार्य' थे। शिवपूजन सहाय को समझाते, ‘सीधी उंगली से घी नहीं निकलता। पेशगी रुपया मांगो; मिल जाय तो कहो, बकाया वसूल पाया।’

थियेटर देखने के शौकीन तो थे ही, अभिनय में भी बेजोड़ थे। आरा में आपने एक ‘मनोरंजन नाटक मंडली’ स्थापित कर ली थी, जो अच्छे-अच्छे नाटकों का सदा अभिनय करती थी। इस मंडली द्वारा प्रस्तुत नाटकों में आप भी एक सफल हास्य अभिनेता के रूप में रंगमंच पर उतरते थे। इस नाटक मंडली ने आपके द्वारा लिखित ‘सूर्योदय’ नामक नाटक का सफलतापूर्वक अभिनय किया था। इसमें आप स्वयं रंगमंच पर उतरे थे। इस मंडली द्वारा ‘सत्यहरिश्चन्द्र’, ‘मयूरध्वज’ आदि और भी कई नाटक अभिनीत हुए थे। ‘सत्यहरिश्चन्द्र’ में आपने डोम का स्वांग धारण किया था और ‘मयूरध्वज’ में भगवान श्रीकृष्ण का। एक बार ‘आरा नागरी-प्रचारणी सभा’ के वार्षिकोत्सव के अवसर पर आपने स्व. प. शिवनाथ शर्मा (‘आनंद’-संपादक) द्वारा रचित नागरी-निरादर’ नामक प्रहसन में मौलाना के वेष में रंगमंच पर उतरकर जबानदानी के बड़े-बड़े मौलवियों को भी हैरत में डाल दिया था। ‘सत्य हरिश्चंद्र’ में डोम का पार्ट इतना बढि़या किया था कि शिवपूजन सहाय हंसते-हंसते लोट-पोट हो गए थे।

एक अनुवादक के रूप में आपकी बड़ी ख्याति है। मराठी से आपने ‘इन्दुमती’ और 'रत्नदीप’ नामक उपन्यास का अनुवाद किया था। गुजराती से आपने जैनधर्म संबंधी पुस्तकों का अनुवाद किया था। ये पुस्तकें एक जैन प्रकाशक के नाम से प्रकाशित हुई हैं। बंगला से आपने किन्नरी’, ‘अन्नपूर्णा का मन्दिर’, ‘जल-चिकित्सा’ आदि अनेक प्रसिद्ध ग्रंथों का अनुवाद किया था। ‘पंजाब-हत्याकांड’ जैसी पुस्तक का बंगला-अनुवाद आपने एक ही महीने में करके श्रीनिहालचन्द्र वर्मा को दे डाला था। कलकत्ता के हरिदास एंड कंपनी से प्रकाशित ‘बंगला-हिन्दी कोश’ आपके केवल तीन महीने का फल है। मेरी कॉरेली लिखित ‘थेल्मा’ का अनुवाद आपने रामवृक्ष बेनीपुरी के अनुरोध पर एक पखवारे में ही कर डाला था। एक बार ग्रियर्सन्स ‘मैगजीन’ के पुराने अंकों की कुछ कहानियों का दस-पन्द्रह दिनों में ही अनुवाद कर आपने ‘प्रेमगंगा’ के नाम से पुस्तक तैयार कर ली, जो लखनऊ की गंगा पुस्तकमाला से प्रकाशित और बनैली राज के कुमार रामानन्द सिंह को समर्पित हुई। इसके लिए कुमार साहब ने आदरपूर्वक बुलाकर आपको पांच सौ रुपये दिये थे। संस्कृत से हिन्दी अनुवाद के लिए प्रसिद्ध नवलकिशोर प्रेस से वाल्मीकीय रामायण के विषय में बहुत दिनों से पत्र-व्यवहार हो रहा था। 

आपकी लिखी सबसे पहली मौलिक पुस्तक ‘चन्द्रकुमार’ उपन्यास है, जिसका प्लॉट घर की मजदूरिन के मुंह से सुनी कहानी के आधार पर रचा गया था। इसके बाद आपने ‘हिरण्यमयी’ की रचना की। इन दोनों पुस्तकों के बाद आपने अनेक पुस्तकें लिखीं और अनूदित कीं। इनकी संख्या लगभग 150 तक होगी। लगभग डेढ़ दर्जन पुस्तकें तो आपने दूसरों के लिए लिखीं।

आप पद्य रचना में भी सिद्धहस्त थे। आपके लिखे नीति-शिक्षापूर्ण सरस पद्यों का संग्रह ‘सौरभ’ के नाम से छपकर अप्रकाशित ही रहा। आपने व्यंग्य-विनोदमयी अपनी पद्य-रचनाएं ‘चना-चबेना’ के नाम से स्वयं प्रकाशित की थीं। इसी शैली की एक गद्य-पद्य रचना कचालू-रसीला’ के नाम से प्रकाशित करने की आपकी इच्छा पूरी नहीं हो सकी। आपका लिखा ‘मान-मर्दन’ नाटक भी अप्रकाशित ही है।

आपके द्वारा लिखित मौलिक, अनूदित एवं संपादित प्रमुख पुस्तकों के नाम हैं-‘कोकिला’, ‘स्वर्णमयी’, ‘मागधी कुसुम’, ‘मालिनी बाबू’, ‘गल्पमाला’, ‘हिन्दी-बंगला-कोश’, ‘चन्द्रधर’, ‘अन्योक्ति तरंगिनी’, ‘मातृवन्दना’, ‘सन सत्तावन का गदर’, ‘सूर्योदय’(नाटक), ‘रंगीली दुनिया’, ‘ईसप की कहानियां’ (तीन भाग), ‘सिपाही विद्रोह’, ‘सीता’, ‘शकुन्तला’, ‘सती-पार्वती’, ‘पंचशर’ (गद्य-काव्य), ‘उद्भ्रान्त प्रेम’, ‘अन्नपूर्णा का मंदिर’, ‘किन्नरी’, ‘इन्दुमती’, ‘प्रेमगंगा’, प्रेमिका, जल-चिकित्सा, सुशील-शिक्षा, ‘चन्द्रकुमार का मनोरमा’, ‘सच्ची मैत्री’, बाल-गल्पमाला’, पंजाब-हत्याकांड’, हिन्दी-बंगला-कोश’, ‘रामचरित्र’ आदि। 'रामचरित्र' ग्रंथ के प्रकाशित होने पर बनैली-नरेश कीर्त्यानन्द सिंह बहादुर ने आपको एक हजार रुपये का सम्मान-पुरस्कार दिया था। यह ग्रंथ उन्हीं को समर्पित है।

ऊपर से निठल्ले और हंसोड़ लगनेवाले शर्मा जी गहरी सूझ-बूझ के आदमी थे और कविता के साथ इतिहास के भी पंडित थे। 1922 ई. में उन्होंने ‘गदर का इतिहास’ लिखा और उसे भारत का स्वाधीनता संग्राम कहा था।

‘महादेवप्रसाद सेठ की प्रेरणा से’ भारत के ‘भाग्य-विधाता सीरीज’ के तहत ‘दादाभाई नौरोजी’ नामक चरित-पुस्तक लिखी। हिन्दी में दादाभाई की कोई बड़ी-सी जीवनी या उनके उपदेशों का संग्रह अबतक नहीं प्रकाशित हुआ था, इसलिए लेखक ने इकट्ठे ही दोनों अभावों की पूर्ति का प्रयत्न किया। इस पुस्तक को लिखने में लेखक ने मद्रास की जी.ए. नटेसन एण्ड कंपनी द्वारा प्रकाशित ‘स्पीचेज एण्ड राइटिंग्स ऑफ दादाभाई नौरोजी’ नामक ग्रंथ से पूरी सहायता ली थी। यह किताब ‘नागरी प्रचारिणी सभा’, आरा के पुस्तकालयाध्यक्ष बाबू शुकदेव सिंह को समर्पित की गई थी। लिखा था : ‘मित्रवर! जिन दिनों मैं दादाभाई की यह जीवनी रोगशय्या पर पड़े-पड़े लिख रहा था, उस समय संसार में तुम्हारे सिवा मेरा कोई सहायक न था। तुम्हारी सेवा शुश्रषा और सहायता के अभाव में मेरी मृत्यु हो जानी संभव थी और तब यह पुस्तक शायद ही मेरे हाथों पूरी हो पाती। उन्हीं स्मरणीय दिनों की स्मृति को बनाये रखने के लिये यह पुस्तक तुम्हीं को समर्पित है।’ 

'अन्नपूर्णा का मन्दिर’ हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर-सीरीज का तेरहवां ग्रंथ है। यह पुस्तक बंगाल की प्रसिद्ध उपन्यास-लेखिका श्रीमती निरुपमा देवी के 'अन्नपूर्णार मन्दिर’ का भाषांतर है। मूल पुस्तक को बंगाल में बहुत ही ऊंचा स्थान प्राप्त है। शर्मा जी के हिन्दी अनुवाद से पहले ‘बंगाल इंपीरियल लाइब्रेरी’ के बाबू शरच्चन्द्र सेन इसका अंग्रेजी भाषा में अनुवाद कर चुके थे। उनकी राय थी कि ‘इन दिनों किसी भी बंगला उपन्यास-लेखक ने इससे अच्छा उपन्यास नहीं लिखा’।

ईश्वरीप्रसाद शर्मा इस धारणा के माननेवाले थे कि ‘प्रत्येक बालक और युवा को अपने देश के प्रसिद्ध-प्रसिद्ध पुरुषों की जीवनियां पढ़नी चाहिए।’ साथ यह भी कि ‘इस तरह की छोटी-छोटी जीवनियों को सीधी-सादी भाषा में लिखकर बालकों और युवाओं के हाथ में देना प्रत्येक लेखक का कर्त्तव्य होना चाहिए।’ इससे बड़ा कर्त्तव्य है कि ‘ऐसी पुस्तकों की भाषा बोलचाल की और जल्द समझ में आने योग्य होनी चाहिए।’ इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु शर्मा जी ने ‘बाल-विनोद-वाटिका का बीसवां पुष्प’ अर्थात ‘भगवान गौतम बुद्ध’ की रचना की। बालकों एवं युवाओं को ध्यान में रखकर लिखी इस किताब की भाषा तो अवश्य ही सरल, सहज और बोधगम्य है, किन्तु इस प्रयास में एकाध स्थलों पर लेखक भूल गया लगता है कि वह किसी मिथकीय नहीं बल्कि ऐतिहासिक पुरुष की जीवनी लिख रहा है। एक जगह वे लिखते हैं, ‘‘अयोध्या के राजा दशरथ और उनके पुत्र ईश्वर के अवतार रामचन्द्र का नाम भला किस हिन्दू से छिपा है? आज से दो हजार वर्ष पहले उसी वंश के राजा शुद्धोदन हिमालय की तराई में अपने पिता के बसाए हुए ‘कपिलवास्तु’-नामक नए नगर में राज्य करते थे।‘‘

कहने की जरूरत नहीं कि बीसवीं शती के तीसरे दशक में हिन्दी साहित्य में बालक-बालिकाओं और स्त्रियों के पढ़ने योग्य पुस्तकों और पत्रों का बड़े धड़ल्ले से हो रहा था। कलकत्ते की प्रसिद्ध आर.एल. बर्म्मन एण्ड कम्पनी के अध्यक्ष बाबू रामलाल बर्म्मा ने इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु ‘रमणी रत्नमाला’ नाम से एक पुस्तकमाला निकालनी आरंभ की। इस माला की ‘सावित्री-सत्यवान’ और ‘नल-दमयन्ती’ जैसी पुस्तकें समाचारपत्रों एवं हिन्दी पाठकों के बीच खासी ख्याति अर्जित कर चुकी थीं। रामलाल जी ही के अनुरोध से, उनकी इस स्त्री-पाठ्य-ग्रंथमाला के लिए ईश्वरीप्रसाद शर्मा ने ‘रमणी रत्नमाला का तीसरा रत्न’ अर्थात ‘सीता’ नामक पुस्तक की रचना की। इस पुस्तक को तैयार करने में लेखक ने गोस्वामी तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’, महर्षि वाल्मीकि प्रणीत ‘रामायण’ और महाकवि भवभूति-रचित ‘उत्तररामचरित’ से सहायता ली है; इसी से यत्र-तत्र इन ग्रंथों के भावों की झलक इस पुस्तक में दिखलाई देती है।

वन में पहुंचाने के लिए गये हुए अपने देवर लक्ष्मण के मुंह से अपने पति की आज्ञा सुनकर सीता बोलीं-‘‘महाराज ने मुझे घर से निकालकर प्रजा को संतुष्ट किया है। मैं भी अपने स्वामी के आदेश को फिर आंखों पर रख, हंसते-हंसते सारे कष्ट सहने को तैयार हूं। दुख कैसा?’’ यह न सिर्फ सीता का आदर्श है बल्कि लेखक भी अपने समय और समाज में इसी आदर्श की स्थापना करना चाता हैं। 

मठिला-डुमरांव-निवासी पंडित रघुवीरदत्त शर्मा को समर्पित ‘चना-चबेना’ की अधिकतर रचनाएं ‘मतवाला’, ‘मौजी’, ‘गोलमाल’, ‘भूत’ और ‘मनोरमा’ में छप चुकी थीं। कुछ इधर-उधर के हैं तो कुछ एकदम कोरे हैं। पंडित जी की रचनाओं के विषय में तत्कालीन सुप्रसिद्ध विनोदी पत्र मतवाला’ ने पहले वर्ष के दूसरे अंक में लिखा था : ‘हम अपने सुप्रसिद्ध विनोदी मित्र ‘‘मनोरंजन’’-संपादक पण्डित ईश्वरप्रसाद शर्मा को भी बड़े प्रेम और आदर के साथ याद करते हैं, जिनकी हास्य-रसमयी कविताओं ने समय-समय पर ‘‘मतवाला’’ को विशेष चित्ताकर्षक बनाया है। शर्मा जी को विनोद का व्यसन है। वे मनोरंजन की मूर्ति हैं।’ 

शिवपूजन सहाय के नेतृत्व और मार्गदर्शन में चार खंडों में हिंदी साहित्य और बिहार जो संपादित किया गया, उसकी पहली प्रेरणा ईश्वरीप्रसाद शर्मा ही के हृदय में हुई थी। उन्होंने ही इस कार्य के लिए शिवपूजन सहाय जी को प्रेरित किया और आरा की नागरी-प्रचारिणी सभा के पुस्तकालय-संचालक शुकदेवसिंह को उनकी सहायता के लिए उत्साहित किया था। हिंदी-प्रेमियों से इतिहास के लिए सामग्री-संकलन के निमित्त अनुरोध करते हुए सबसे पहले सूचना उन्होंने ही लिखी थी और सामग्री-संकलन हेतु उसके साथ ही एक विवरण-पत्र भी तैयार कर दिया था। (हिन्दी-साहित्य और बिहार, प्रथम खण्ड, भूमिका, पृष्ठ ठ।)

औपनिवेशिक बिहार के साहित्यिक हीरो : बिहारभूषण पं. अम्बिकादत्त व्यास

'बिहारभूषण’, ‘भारतभूषण’, ‘भारतरत्न’, ‘भारतभास्कर’, ‘धर्माचार्य’, ‘महामहोपदेशक’, ‘सुकवि’, ‘अभिनव बाण’ व ‘साहित्याचार्य’ की उपाधियों से विभूषित पंडित अंबिकादत्त व्यास (24 मार्च, 1858-19 नवंबर, 1900) का जन्म तो जयपुर के सिलवटों के मुहल्ले में चैत्र शुक्ल अष्टमी को हुआ था, किन्तु उनका कार्यक्षेत्र बिहार रहा। व्यास जी में इतनी विलक्षण सृजन-प्रतिभा थी कि उन्होंने दस वर्ष की अल्पायु ही में साहित्य-सृजन के क्षेत्र में प्रवेश कर लिया। उनकी रचनाएँ दसवर्षीय बालक द्वारा विरचित हैं, यह अविश्वसनीय माना गया और समझा गया कि ये रचनाएँ समकालीन कवि मण्डल में ‘दत्त’ उपनाम से काव्य-रचना करनेवाले उनके पिता दुर्गादत्त की रचनाएँ हैं। कहा जाता है कि जब 'ग्वाल कवि' के शिष्य 'खंग कवि' काशी पधारे और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के दरबार में ‘सूरज देखि सकै नहि घुग्घू’ समस्या, पूर्ति के लिए दी गयी तो वहाँ पिता के साथ उपस्थित बालक अम्बिकादत्त व्यास ने तुरन्त एक सुन्दर पूर्ति करके वहाँ मौजूद कवि-समुदाय को चौंका दिया। फिर भी उनकी काव्य-प्रतिभा पर लोगों का सन्देह मिटा नहीं। ग्यारह वर्ष की अवस्था में उनकी काव्य-परीक्षा ली गई और ‘मूँदि गयी आँखें तब लाखें कौन काम की’ समस्या, पूर्ति के लिए दी गई तो उन्होंने पुनः तत्काल ही एक सुन्दर कवित्त बनाकर सुना दिया। भारतेन्दु ने 'कविवचन सुधा' में इनकी कविता इस सम्पादकीय टिप्पणी के साथ प्रकाशित की-‘इस विलक्षण बालक की बुद्धि विलक्षण ही है और अवस्था इसकी केवल बारह वर्ष की है। हम इसके और समाचार भी लिखेंगे।’ इस तरह बारह वर्ष ही की आयु में व्यास जी ने सरस्वती मन्त्र, अष्टावधान और अन्य चमत्कारों से काशी के रसिक मण्डल को मन्त्रमुग्ध कर अपने भावी सृजन के प्रति पूरी तरह आश्वस्त कर लिया। कवि भारतेन्दु उनकी काव्य-प्रतिभा पर ऐसे रीझे कि उन्होंने ‘काशी कवितावर्धिनी सभा’ में उन्हें ‘सुकवि’ की उपाधि से विभूषित कर दिया। आशुकवि के रूप में भी व्यास जी ने खूब ख्याति प्राप्त की। आप एक घटिका अर्थात् 24 मिनट में सौ श्लोकों की रचना कर लेने के कारण ‘घटिकाशतक’ तथा स्मृति प्रबुद्धतावश ‘शतावधानी’ भी कहे जाते थे। 

गवर्नमेंट संस्कृत काॅलेज से सन् 1880 में ‘साहित्याचार्य’ की उपाधि प्राप्त करने के बाद सन् 1883 ई. में आपकी नियुक्ति मधुबनी (दरभंगा, बिहार) के एक ग्रामीण संस्कृत स्कूल में हुई जहां लगभग तीन वर्षों तक अध्यापन कार्य किया। उसके बाद 1886 में मुजफ्फरपुर संस्कृत विद्यालय में, 1887 में भागलपुर जिला स्कूल में, 1896 में छपरा जिला स्कूल में तथा अंत में 1899 में पटना में रहकर संस्कृत एवं हिन्दी की अनथक सेवा की। भागलपुर जिला स्कूल के आप हेड पण्डित रहे थे। 

स्मरणीय और रेखांकित करने लायक तथ्य है कि पं. अम्बिकादत्त व्यास भागलपुर की हिंदी पत्रकारिता के जनक हैं। वहां की हिंदी पत्रकारिता का आरंभ सन् 1883 में हास्य रस की सामग्री से भरपूर मासिक 'वैष्णव पत्रिका’ के प्रकाशन से होता है। 'वैष्णव पत्रिका' ही साल भर बाद अर्थात् सन् 1884 में 'पीयूष प्रवाह' के नाम से निकली। (हिन्दी पत्रकारिता का बृहद् इतिहास के 118वें पृष्ठ में इसका नाम ‘पीयूष पत्रिका’ लिखा मिलता है जो सही नहीं है।) यह नारायण प्रेस, मुजफ्फरपुर से मुद्रित-प्रकाशित होती थी। इसके संपादक पंडित अम्बिकादत्त व्यास स्वयं थे। 1906 की विजयादशमी को जौनपुर से कालीशंकर व्यास ने भी सचित्र हिन्दी मासिक पत्र 'पीयूष प्रवाह' का प्रकाशन किया था। 

'आधुनिक हिन्दी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका' के लेखक धीरेन्द्रनाथ सिंह ने लिखा है कि पण्डित अम्बिकादत्त व्यास द्वारा संपादित 'पीयूष-प्रवाह' और 'वैणव-पत्रिका' की प्रतियां भी खड्गविलास प्रेस के साहित्य-संग्रहालय में अवश्य रही होंगी, किंतु देखने में नहीं आईं। ऐसा इसलिए कि उक्त पुस्तकालय व्यास जी के पटना-निवास में गोष्ठी का प्रधान केंद्र था। अतः यहां के संग्रह में 'पीयूष-प्रवाह' और 'वैणव-पत्रिका' की फाइलों का होना स्वाभाविक था। आपके अधिकतर निबंध इसी पत्र में निकलते थे। इन निबंधों में ‘धैर्य’, ‘क्षमा’, ‘ग्रामवास’, ‘नगरवास’ आदि उल्लेखनीय हैं। 

'पीयूष प्रवाह मासिक पत्र वैणव पत्रिका सम्मिलित’ में 'बिहारी सतसई' पर अम्बिकादत्त व्यास की कुछ कुंडलियां धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई थीं। ‘जले पर नोन ऐसा शोक पर शोक’ शीर्षक समाचार में संपादक पंडित अम्बिकादत्त व्यास ने भारतेन्दु जी के प्रति पद्यबद्ध अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि भी सादर अर्पित की है। 

व्यास जी की कुल 91 रचनाओं का उल्लेख मिलता है। डॉक्टर कृष्णकुमार द्वारा निर्मित सूची के अनुसार अम्बिकादत्त व्यास ने संस्कृत भाषा में कुल 27 और हिंदी तथा ब्रजभाषा में 64 ग्रन्थ लिखे थे, किन्तु हिंदी में 38 और संस्कृत में कुल 14 रचनाएं ही उपलब्ध हो सकी हैं। 1882 ई. के मार्च में व्यास जी ने भारतेन्दु के 'वेश्या-स्तोत्र' ही की भांति संस्कृत में 'द्रव्यस्तोत्र' की रचना की। यह रचना 'हिन्दी प्रदीप' में प्रकाशित हुई थी। बाद में इसका पुस्तकाकार प्रकाशन खड्गविलास प्रेस, पटना से 1888 ई. में हुआ था। इसमें 42 अनुष्टुप छन्द हैं, जिनमें धनकुबेरों पर व्यंग्य  है। व्यास जी की यह कृति उनकी नाट्य-कृतियों में उत्कृष्ट मानी जाती है। 1882 ही में संस्कृत पुस्तक 'सांख्यतत्त्व-कौमुदी’ की कारिका 'सांख्यतरंगिणी' की रचना की जिसका प्रकाशन 1891 ई. में रामदीन सिंह के ‘प्रकाशकीय वक्तव्य’ के साथ हुआ है। यह धारावाहिक रूप से 'वैष्णव-पत्रिका' तथा 'पीयूष-प्रवाह' में प्रकाशित हुई थी। 63 पृष्ठ की इस पुस्तक में कुल 72 लोकों की व्याख्या की गई है। 

बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि व्यास जी ने तीन संस्कृत रूपकों की रचना की थी। 'बिहारी बिहार' नामक पुस्तक के अंतिम भाग में उनके ग्रंथों का विवरण प्राप्त होता है, किंतु उस सूची में एकमात्र 'सामवतम्' ही का उल्लेख है। हालांकि 'सामवतम्' रूपक के अध्ययन से तीन रूपक की बात उजागर हो जाती है। उनके नाम 'सामवतम्', ’धर्माधर्मकलकलम' तथा 'मित्रालापः' हैं। उनके 'मन की उमंग' संग्रह में पांच रूपक हिंदी में तथा दो रूपक संस्कृत में है। 'मन की उमंग' संग्रह की भूमिका से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि इनका अभिनय मुजफ्फरपुर की धर्मसभा (धर्म संरक्षिणी सभा) में संपन्न हुआ था। आप कह सकते हैं कि मुजफ्फरपुर के रंगमंच के इतिहास में पहला नाटक ‘धर्म संरक्षिणी सभा’ के द्वारा अम्बिकादत्त व्यास ही का अभिनीत हुआ। 1882 में लिखा गया 'सामवतम्' नाटक खड्गविलास प्रेस, पटना से 1888 ई. में हुआ था। 'स्कन्दपुराण’ के एक पौराणिक आख्यान को 'सामवतम्’ नाटक की कथा का आधार बनाया गया है। इस नाटक में दुर्वासा मुनि अपने मित्रपुत्र सामवान् को ‘स्त्री हो जाने का शाप’ देते हैं। उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध का हिंदी लेखक ‘स्त्री-जीवन’ को शाप की तरह लेता है! व्यासजी ने संस्कृत नाट्य परंपरा में 'धर्माधर्मकलकलम' और 'मित्रालापः’ के रूप में एक नवीन शैली जोड़ी है। दोनों एक-एक संवाद के छोटे रूपक हैं। कुछ पद्यों से युक्त यह संवाद मुख्यतः गद्य में है और नाट्यशास्त्रीय दृष्टि से किसी नाट्यविधा में परिगणित नहीं किया जा सकता। 

'बिहारी बिहार' पुस्तक से जानकारी मिलती है कि भक्तिभाव से ओत-प्रोत संस्कृत भाषा में 'रत्नपुराण' एवं 'गणेश शतक' नामक दो रचना और थी जो अब उपलब्ध नहीं है। किंतु जो उपलब्ध है उसका नाम 'सहस्रनाम रामायणम्' है। यह संस्कृत की स्तोत्र परंपरा के अनुपालन में लिखा गया है। इसमें 1000 नामों द्वारा श्रीराम के गुणों को प्रदर्शित करते हुए संपूर्ण रामायण की कथा कही गई है। कहा जाता है कि इस पर तुलसी की 'विनयपत्रिका' का प्रभाव परिलक्षित है। संस्कृत के 'सांख्य सागर सुधा', 'पातंजल प्रतिबिंब' एवं 'दुखद्रुमकुठार’ ग्रन्थ इनके दार्शनिक चिंतन की गहराई को अभिव्यक्त करते हैं। 'सांख्य सागर सुधा' की रचना बालकों को सांख्य दर्शन का आरंभिक ज्ञान करवाने हेतु की गई थी। इसमें सांख्य दर्शन के प्रतिपाद्य विषय जड़-चेतन दो तत्त्वों की कल्पना, 25 तत्त्वों का विवेचन, तीन प्रकार के शरीर, जीव द्वारा प्रकृति एवं पुरुष के भेद को समझ लेने से परे कैवल्य ज्ञान, त्रिगुणात्मिका सृष्टि की उत्पत्ति आदि सभी विषय सरलता से वर्णित हैं। 'पातंजल प्रतिबिंब' ग्रन्थ में योग दर्शन के सूत्रों की परिभाषाओं और सिद्धांतों को कारिका रूप में निबद्ध करके प्रस्तुत किया गया है। इनमें समाधि, साधन, विभूति और कैवल्य चार पाद हैं। अपनी सरल भाषा शैली के कारण योग दर्शन का यह ग्रन्थ भी उपयोगी है। 

व्यास जी ने संस्कृत में 'अवतारमीमांसा' कारिका ग्रन्थ भी लिखा। इसमें अव्यक्त एवं अनादि ब्रह्म के पृथ्वी पर अवतरण को शंका एवं समाधान की शैली में सप्रमाण विवेचित किया गया है। 261 अनुष्टुप छंदों में 8 प्रश्न और ग्रन्थ के उत्तरार्द्ध में उनके समीचीन उत्तर देते हुए व्यास जी ने अवतारवाद के प्रति अपनी गहन निष्ठा व्यक्त की है। आपने संस्कृत कवियों के अभ्यास के लिए संस्कृत में 'कुण्डली दीपक' तथा 'समस्यापूर्ति सर्वस्व' जैसे ग्रन्थ लिखे तो विज्ञान, रेखागणित और इतिहास की भी पुस्तकें लिखीं, जो आज अनुपलब्ध हैं। 

बच्चों को संस्कृत भाषा सिखलाने की गरज से व्यास जी ने 'रत्नाष्टक', 'संस्कृत अभ्यास पुस्तकम्' (दो भाग), 'प्राकृत प्रवेशिका', 'बाल व्याकरण' तथा 'कथा कुसुमम्' आदि कृतियां लिखीं। 'कथा कुसुमम्' में विद्यार्थियों के लिए लिखी गई 25 छोटी-छोटी कथाएं संकलित हैं। 'बाल व्याकरण' पुस्तक में संस्कृत व्याकरण का प्रारंभिक ज्ञान कराने का प्रयत्न है। 'संस्कृत अभ्यास पुस्तकम्' की रचना अंग्रेजी भाषा से संस्कृत का अभ्यास कराने के लिए 'अंग्रेजी कम्पोजिशन बुक्स' के आधार पर लिखी गई थी। संस्कृत व्याकरण की दुरुहता से परिचय के लिए व्यास जी ने 'गुप्ताशुद्धिप्रदर्शनम्' की रचना की।

संस्कृत की समृद्धि एवं प्रतिष्ठा तथा शिक्षा प्रणाली के परिष्कार के लिए पं. अम्बिकादत्त व्यास द्वारा सन् 1887 ई. में स्थापित संस्था ‘बिहार संस्कृत-संजीवन समाज’ संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयासरत रही। इसकी पहली बैठक 5 अप्रैल, 1887 ई. को हुई, जिसकी अध्यक्षता पोप जॉन बेंजिन ने की थी। इसमें देश-देशान्तर के लोग आये थे। समाज के प्रथम सचिव स्वयं पं. अम्बिकादत्त व्यास थे। इस समाज द्वारा सन् 1940 ई. में त्रैमासिक के रूप में 'संस्कृतसंजीवनम्' का प्रकाशनारम्भ किया गया। यह पत्र पटना के बारी पथ से प्रकाशित होता था। इसका वार्षिक मूल्य छः रुपये था। इसके संपादक-मंडल में केदारनाथ ओझा, भवानीदत्त शर्मा, चंद्रकांत पाण्डे, त्रिगुणानंद शुक्ल तथा राम पदार्थ शर्मा आदि विद्वान थे। 'संस्कृतसंजीवनम्' के प्राचीन अंक नहीं मिलते। यह पत्रिका अपने प्रकाशनारम्भ के तेईसवें वर्ष अर्थात् जून, 1962 ई. से मासिक के रूप में प्रकाशित होने लगी। इसकी सम्पुष्टि 'संजीवनम्' के जून, 1962 ई. के अंक के सम्पादकीय की निम्नांकित पंक्तियों से होती है: ‘साम्प्रतिकानांसंस्कृतानुरागिणां सहयोगेन द्वाविंशवर्षं समाप्य संस्कृतसंजीवनमिदं त्रयोविंशवर्षेऽवतरतीति सुरसरस्वतीसेवकेभ्यः परमहर्षस्यायं विषयः। महतः हर्षस्यायमपि विषयो यत् त्रैमासिकं संस्कृत-सज्जीवनमनेनांङ्कन मासिकरूपेण प्रकाशते।’

पत्रिका के मुखपृष्ठ पर ‘भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतंचैव संस्कृतिः’ वाक्य छपता था तथा प्रायः प्रत्येक अंक के मुखपृष्ठ पर कोई न कोई मन्त्र, श्लोक या संस्कृत के सम्बन्ध में प्रसिद्ध व्यक्तियों की उक्ति प्रकाशित होती थी। इसमें प्रायः शोधात्मक निबन्ध, गीत, नाटक, प्रहेलिका, सामयिक समाचार, बालमण्डली के अतिरिक्त संस्कृत जगत् की गतिविधियों से सम्बद्ध समाचार होते थे। 

हिंदी के रूपकों में 'ललिता नाटिका', 'गोसंकट नाटक', 'भारत सौभाग्य', 'कलियुग और घी' तथा 'मन की उमंग' प्रसिद्ध हैं। भारतीय संस्कृति के ‘परम संरक्षक’ तथा हिन्दू धर्म के प्रति आस्थावान व्यास जी ने 'गोसंकट नाटक' (प्रथम संस्करण सन् 1886) के द्वारा समस्त हिन्दुओं को गोरक्षा के लिए सम्बोधित किया है। लेखक की राय में, ‘मुसलमान गोवध करने में तत्पर रहे हैं, किन्तु हिन्दू उसे माता के समान सम्मान देते रहे हैं।’ कहा जाता है कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के प्रोत्साहन में इस नाटक की रचना सम्वत् 1939 में सम्पन्न हुई। इसका प्रथम प्रकाशन 'उचित वक्ता' नामक पत्रिका में हुआ तथा बाद में सम्वत् 1941 में खड्गविलास प्रेस में पुस्तक के आकार में इसका प्रकाशन हुआ। 

'गोसंकट नाटक' का कथानक अकबर बादशाह के समय का है। इसमें श्री व्यास ने मुसलमानों का नृशंस औेर हिन्दू जाति पर अत्याचार करनेवाला रूप व्यक्त किया है। आपने इस नाटक में गाय की उपयोगिता का विशद वर्णन किया है और कहा है कि मुसलमान केवल हिन्दुओं को उत्तेजित करने के लिए गोवघ किया करते थे। मुसलमानों के ‘अत्याचारों’ का ‘मर्मस्पर्शी’ वर्णन है। एक बार गोवध के लिए जिद करनेवाले मुसलमानों से हिन्दू बलात् उस गाय को छुड़ा तो लेते है, परन्तु उन्हें सघर्ष करना पडता है। अकबर के दरबार में हस्ताक्षर अभियान से फरियाद की जाती है। अतः वह गोवध के निषेध की आज्ञा प्रसारित करता है। इस प्रसन्नता में हिन्दू ‘गोरक्षा-महोत्सव’ मनाते हैं। 

भारतेन्दु समाचार पत्रों की उपयोगिता और ताकत से परिचित थे। इसलिए 1873 में जब उन्होंने ‘हिन्दी समाज’ की स्थापना की तो अपने समय के वैष्णव मत का परिष्कार करके लोकोपयोगी बनाने की चेष्टा की और इस उद्देश्य हेतु 'भगवद्तोषिणी' नाम की एक पत्रिका भी निकाली जो अर्थाभाव के कारण कुछ ही महीने निकलकर बन्द हो गई। कभी-कभी उनका ‘वैष्णव-मत-परिष्कार’ मुस्लिम विरोध का रूप धारण कर लेता था। बकरीद के मौके पर मुसलमानों ने गोहत्या की तो भारतेंदु ने पटने के खड्गविलास प्रेस से प्रकाशित 'क्षत्रिय पत्रिका' के संपादक बाबू रामदीन सिंह को लिखा, ‘‘भागलपुर, मिर्जापुर, काशी इत्यादि कई स्थानों में प्रकाश्यरूप से केवल हमारा जी दुखाने के हॉको-ठोक यह अत्याचार हुआ है जो किसी-किसी समाचार-पत्र में प्रकाश भी हुआ है। आप भी अपने पत्र में इस विषय का भली भांति आंदोलन कीजिए। सब पत्र एक साथ कोलाहल करेंगे। तब काम चलेगा। हिन्दी, उर्दू, बंगाली, मराठी, अंग्रेजी सब भाषाओं के पत्रों में जिनके संपादक हिन्दू हों एक बेर बड़े धूम से इसका आन्दोलन होना आवश्यक है आशा है कि अपने शक्य भर आप इस विषय में कोई बात उठा न रक्खेंगे।’’ 

'कलियुग और घी' एक छोटा सा रूपक है। इस रूपक की रचना सम्वत् 1942 (सन् 1885) में हुई। यह उसी वर्ष नारायण प्रेस, मुजपफरपुर से प्रकाशित हुआ। यह रूपक वस्तुतः एक प्रचारात्मक रचना है, जिसमें कवि ने हिन्दुओं की सामाजिक तथा धार्मिक परम्पराओं में सुधारों का विरोध किया है। उस समय आर्यसमाजियों और ब्रह्मसमाजियों द्वारा किए जाने वाले बालविवाह और मूर्तिपूजा के खण्डन आदि का विरोध इस रूपक में है। अपने कथन की पुष्टि के लिए श्री व्यास ने स्थान-स्थान पर संस्कृत के वाक्यों व श्लोकों को उद्धृत किया है। उनकी यह मान्यता है कि कलियुग के प्रभाव से ही घी में चर्बी आदि अपवित्र द्रव्यों का संयोग हुआा है। इस तरह, अम्बिकादत्त व्यास ने धी में मिलावट के बहाने अपने हृदय की पीड़ा को अभिव्यक्त किया है।

ब्रह्म समाज आंदोलन, जो विधवा विवाह समेत महिला मुक्ति का पक्षधर था, बिहार में प्रभावकारी स्थिति में नहीं था। थोड़े से बंगाली परिवारों के बीच ही यह सीमित था। बावजूद इसके, बिहार का तत्कालीन हिंदू समाज ब्रह्मसमाजियों के विचारों को हिंदू धर्म के लिए खतरा मानकर नापसंद करता था। सन् 1887 ई. में मुजफ्फरपुर में हरिसुंदर बोस को इन्हीं विचारों के प्रचार के लिए जूतों की माला पहनाई गई थी। 'बिहार बन्धु' भी ब्रह्म समाज के समाज सुधार संबंधी कतिपय क्रांतिकारी विचारों की आलोचना करता था। यद्यपि आर्य समाज भी विधवा पुनर्विवाह का पक्षधर था और समय-समय पर बहुविवाह, बाल विवाह एवं बेमेल विवाह की प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाता रहा था, 'बिहार बन्धु' ने आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानंद का एक लेख प्रमुखता से छापा जिसका शीर्षक था, ‘अस्पृयता को हटाइए, स्वदेशी को अपनाइए।’ 

व्यास जी सनातन मतावलम्बी कट्टर हिन्दू ब्राह्मण थे। उनका मानना था कि प्राचीन वैदिक सभ्यता एवं ब्राह्मणों की गरिमा को लौटाकर ही हिन्दू समाज का भला हो सकता है। 'गीता' के उद्घोष ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परघर्मो हि भयावहः’ में उनकी गहन निष्ठा थी। उन्होंने तत्कालीन सामाजिक एव धार्मिक सुधारवादी आन्दोलनों का विरोध करते हुए खण्डनमण्डनात्मक साहित्य लिखा। पौराणिक धर्म के पक्ष में आपने हिन्दी में 'अबोध निवारण', 'पण्डित प्रपंच', 'दयानन्दमतमूलोच्छेद', 'दोषग्राही', 'गुणग्राही', 'मानस-प्रशंसा', 'वर्णव्यवस्था', 'आश्रम घर्म-निरूपण', 'मूर्तिपूजा' एवं 'अवतार मीमांसा' आदि पुस्तकें लिखी। 

उन्नीसवीं सदी के आठवें दशक में स्वामी दयानन्द के आर्यसमाज का बोलबाला था। सनातन धर्म का बड़ी बेरहमी से तर्क के साथ खण्डन किया जा रहा था। व्यास जी ने पटना में स्वामी दयानन्द के प्रभाव को अपने अनेक भाषणों से कम करने का प्रयास किया था। उनका एक भाषण 16 नवम्बर, 1885 ई. को पटना में हुआ था, जो अत्यन्त प्रभावशाली था। उस भाषण को खड्गविलास प्रेस के बाबू साहेबप्रसाद सिंह ने संकलित किया था। बाबू शिवनन्दन सहाय ने उसका उर्दू तथा अँगरेजी में अनुवाद किया था। इन भाषणों का संकलन 'दयानन्द-मत-मूलोच्छेद’ सन् 1885 ई में प्रकाशित हुआ था। हिंदी पुस्तक 'अबोध निवारण' की रचना व्यास जी ने स्वामी दयानंद की पुस्तक 'संस्कृत वाक्य प्रबोध' की अशुद्धियों को प्रदर्शित करते हुए की, और यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि स्वामी जी द्वारा लिखे गये वैदिक मंत्रों के अर्थ प्रामाणिक नहीं माने जा सकते। 

कट्टर सनातनी और समाज सुधार के विरोधी अम्बिकादत्त व्यास ने 'पीयूष प्रवाह' में ‘काजी जी दुबले क्यों' शीर्षक एक लेख छापा, जिसमें राजा रामपाल सिंह (सुधारकों में अग्रगण्य) पर यह आक्षेप था कि ‘अत्रभवान (अनेक पुस्तकों में अत्रभावन लिखा मिलता है) तो चाहते हैं कि सारा भारत इंग्लैंड हो जाए, लेकिन जो मर्दुमशुमारी दस-दस साल पर पाँच-पाँच करोड़ बढ़ रही है, उसी से यहाँ के लोगों को दोनों जून भरपेट खाने को नहीं मिलता और अब यदि अत्रभावन के सिद्धांत पर विधवा विवाह का भंडा फूटेगा तो भारत की मेदिनी और भूखों मरने लगेगी।’ वह लेख राजा साहब के पास आया। उन्होंने कहा कि ‘कोई इसका मुंहतोड़ उत्तर नहीं दे सकता?’ बालमुकुंद गुप्त जी ने उसी समय कहा-‘‘कल मैं इसका उत्तर ‘हिंदोस्थान’ में निकाल दूंगा।’’ उसी अवसर पर गुप्त जी ने ‘हिंदोस्थान’ में एक लेख लिखा, जिसका शीर्षक था ‘मैं सुकवि हूंँ’ (व्यास जी कविता में अपना नाम ‘सुकवि’ लिखा करते थे)। उस लेख में ‘सुकवि’ की खूब खबर ली गई। 

अम्बिकादत्त व्यास भारत को इंगलैंड बना दिये जाने के समर्थक नहीं थे किंतु ‘चिरजीवी रहो विक्टोरिया रानी’ के पूर्तिकारों में वे भी शामिल थे। इतना ही नहीं, व्यास जी ने मुजफ्फरपुर (बिहार) में सन् 1887 ई. में 'भारत-सौभाग्य' नामक नाटक की रचना की थी। उसी वर्ष यह पुस्तक खड्गविलास प्रेस से छपी। श्री कृष्णबिहारी मिश्र रचित 'प्रबोधचन्द्रोदय' नाटक के सदृश यह भी एक भावात्मक रूपक है जिसमें भारतसौभाग्य, विषयभोग, भारतदौर्भाग्य, प्रताप, उत्साह तथा शिल्प ‘पुरुष पात्र’ है तथा मूर्खता, फूट, शिक्षा, एकता, भारत-पताका, अंग्रेजीपताका, राजभक्ति, यंत्रविद्या, उदारता तथा दया ‘स्त्री पात्र’ है। रामदीन सिंह ने महारानी विक्टोरिया की जुबिली के अवसर पर ’भारत-सौभाग्य' को मुद्रित कर निःशुल्क वितरित किया था। यह पुस्तक बड़ी अच्छी सुनहली किनारी तथा विभिन्न रंगों में छापी गई थी। विदेाी पत्रों ने इसकी बड़ी सराहना की थी। यह नाटक 'क्षत्रिय-पत्रिका’ के ‘प्रीति-स्वरूप’ वितरित किया गया उपहार था। चार दृयों और इक्यावन पृठों का यह नाटक अंग्रेजी शासन के प्रति आस्था प्रकट करता है। इन चार अंकों में दिखलाया गया है कि अंग्रेजी राज के पूर्व मुगलकाल में यवनों के दुराचार, मूर्खता, फूट आदि से भारत में दुर्भाग्य का साम्राज्य आ गया था। अंग्रेजी राज में शिक्षा, उत्साह, एकता, यन्त्रविद्या और शिल्प ने दुर्भाग्य को दूर कर दिया। इसका श्रेय महारानी विक्टोरिया को दिया गया है, इसलिए अनेक भाषाओं में रचित कविताओं द्वारा महारानी के प्रति शुभकामनाएं व्यक्त की गई हैं। 

'जटिल वणिक्' रूपक में व्यास जी ने मुसलमानी राज्य की तुलना में अंग्रेजी राज की श्रेष्ठता साबित और अभिव्यक्त की है। इस हेतु उन्होंने एक जटिल तपस्वी और एक वणिक् का वार्तालाप कराया है। एक जटिल तपस्वी जब अपनी तपस्या से उठता है तो वह चित्तौड़ की रक्षा तथा उस पर मुसलमानों के आक्रमण की घटना से क्षुब्ध है तथा उनका संहार करने के लिए उस वणिक् से वह खड्ग मांगता है, परंतु वणिक् यह बताता है कि मुसलमानों का शासन समाप्त हो चुका है तथा इस समय राज-राजेश्वरी विक्टोरिया का राज्य है। इस समय प्रजा सुखी और धर्माचरण में पूर्ण स्वतंत्र है। 

बिहार की शिक्षण व्यवस्था में अपने जीवन का अधिकांश समय बितानेवाले अम्बिकादत्त व्यास ने बिहार के हिन्दी पढ़नेवाले छात्रों को अपनी प्रसिद्ध पाठ्यपुस्तक 'साहित्य-नवनीत' द्वारा काफी लाभ पहुंचाया। यह पुस्तक बहुत दिनों तक यहां स्वीकृत पाठ्य सामग्री थी। वे अपने समय के श्रेष्ठ विद्वानों में से थे। सन् 1885 ई. में प्रकाशित बाबू रामचरण सिंह के 'भाषा प्रभाकर' को उन्होंने जिस पाण्डित्य के साथ संशोधित किया था और उसमें जैसी समीक्षात्मक टिप्पणियाँ दी थीं, उनसे उनकी अद्भुत विद्वता का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। उसी ग्रन्थ में उन्होंने 'हिन्दीभाषा सूत्राधार' नामक एक व्याकरण की रचना प्रारम्भ करने की सूचना दी थी जो उनके असामयिक निधन से सम्भवतः पूरा नहीं हो सका। सन् 1901 ई. में माधव प्रसाद पाठक ने अपने 'हिन्दी बालबोध व्याकरण' की भूमिका में उसका उल्लेख करते हुए लिखा था कि ‘‘पण्डित अम्बिकादत्त व्यास साहित्याचार्य स्वर्गवासी ने ‘आर्यभाषा सूत्रधार’ नामक व्याकरण का लिखना आरम्भ किया था, परन्तु नहीं जान पड़ता कि वह ग्रन्थ कहाँ है, समाप्त हुआ कि नहीं, किसी ने कभी उसको देखा या नहीं, यह सब बातें गुप्त। उक्त पण्डित जी लोकोत्तर बुद्धि के मनुष्य थे यदि जीते रहते, तो अवश्य उस ग्रन्थ को प्रकाश करते। दैवयोग से वे अल्पायु हो गये।’’ हिन्दी व्याकरण का इतिहास के लेखक अनन्त चौधरी ने भी लिखा है कि ‘पं. अम्बिकादत्त व्यास संभवतः उक्त ग्रंथ को पूरा नहीं कर सके थे, क्योंकि बहुत खोज करने पर भी न तो हमें उसकी कोई प्रति कहीं मिली और न उसका अन्यत्र कोई उल्लेख ही मिला।’ 

1890 के आसपास हिंदुस्तान में खड़ी बोली के प्रचार का आंदोलन उठ खड़ा हुआ। खड़ी बोली के उन्नायक मुजफ्फरपुर के बाबू अयोध्याप्रसाद खत्री ने हिन्दी में विराम-चिह्न आदि के व्यवहार पर कई लेख लिखे। इसी समय, कलकत्ता में 1890 में 'हिन्दी बंगवासी' का जन्म हुआ। इसका संपादन पण्डित अमृत लाल चक्रवर्ती और पण्डित रुद्रदत्त शर्मा कर रहे थे। ये दोनों व्यक्ति विभक्तियों को मिलाकर लिखने के कट्टर समर्थक थे। इधर अम्बिकादत्त व्यास तथा श्री गोपालराम गहमरी बिहार बन्धु में मोर्चा संभाले थे। ये दोनों ही विभक्ति को शब्द से न मिलाकर लिखने के पक्ष में थे। अतः 'बिहार बन्धु' ने इनका समर्थन किया और अपना निर्णय देते हुए लिखा-‘‘सर्वनाम के साथ जो विभक्ति आवे वह साथ लिखी जावे।’’ इस विषय पर 'बिहार बन्धु' में गहमरी जी के कई करारे लेख छपे हैं। व्यास जी की 'विभक्ति विलास' (अनन्त चौधरी की किताब हिन्दी व्याकरण का इतिहास, पृष्ठ 380 में भूलवश ‘विभक्ति विभाग’ छप गया है।) नाम की एक पुस्तक सन् 1890 ई. में भागलपुर से प्रकाशित हुई थी, जिसमें हिन्दी भाषा में विभक्तियों को अलग लिखना कि नहीं; इस विषय का विचार करते हुए मानकीकरण का विचार किया था। 'विभक्ति विलास' में आपने इस बात को भलीभांति रखा था कि विभक्तियों को पृथकतया ही लिखना चाहिए।

पण्डित जी ने विभक्ति संबंधी उक्त प्रन को पत्र के रूप में छपाकर देश के श्रेष्ठ विद्वानों के पास भेजा था। अपनी पुस्तक में उन्होंने सभी विद्वानों के नाम के साथ उनकी सम्मतियाँ प्रकाशित की थीं। वे स्वयं विभक्ति को शब्द से हटाकर लिखने के पक्ष में थे। अधिकतर विद्वानों ने उन्हीं के मत का समर्थन भी किया था, किन्तु कलकत्ते के 'हिन्दी बंगवासी' नामक मासिक पत्र के सम्पादक ने उनके मत का विरोध करते हुए विभक्ति को शब्द से सटाकर लिखना उचित बताया था। पण्डित जी ने उक्त सम्पादक के पत्र का बड़ा ही तर्कयुक्त एवं व्यंग्यपूर्ण उत्तर दिया था। अपनी पुस्तक में उन्होंने उक्त सारी सामग्री ज्यों-की-त्यों उद्धृत की थी। अन्त में अपना निष्कर्ष देते हुए उन्होंने लिखा था कि “विभक्ति और उनके पूर्व के शब्दों को अलग ही लिखना उत्तम है और मिला के लिखना साधारण है, परन्तु जहाँ विभक्ति का रूपान्तर हो गया हो, वहाँ अलग नहीं लिखना और जहाँ विभक्ति के पहले कोई दूसरी विभक्ति अथवा अव्यय हो, वहाँ मिला के नहीं लिखना चाहिये।’’

पटना और इसके मुहल्ले

भाषाविज्ञान बताता है कि पटना, पट्टन शब्द से बना है। पट्टन संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है शहर या नगर। इससे इसका व्यापारिक महत्त्व प्रकट होता है।

प्राचीन जमाने में यह एक गांव रहा होगा, जैसा कि 'पाटलिग्राम' शब्द से जाहिर है। कहा जाता है कि इस इलाके में 'पाटली' नामक वृक्ष की प्रधानता थी। 'पाटलिपुत्र' नाम के मूल में यह 'पाटली' वृक्ष रहा होगा। यहां सघन वन तथा पुष्प उद्यान होने के संकेत 'कुसुमपुर', (कुसुमपुर, कन्नौज का भी प्राचीन नाम रहा है। देखें, कृष्ण कांत दुवे, 'कन्नौजी लोक संस्कृति और लोकगीत', आजकल, अगस्त 2012) 'पुष्पपुर' आदि नामों से भी मिलते है। 'वायु पुराण' में हमें 'कुसुमपुर' नाम मिलता है जिसका शाब्दिक अर्थ है 'फूलों की नगरी'। (डी आर पाटिल, दी एन्टीक्वेरियन रिमेन्स इन बिहार, के पी जायसवाल, शोध संस्थान, 1963, पृष्ठ 373) 'गार्गी संहिता' में इसे पुष्पपुर के साथ 'कुसुम-ध्वज' भी कहा गया है। (स्मिथ, अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया, पृष्ठ 228 में उद्धृत) पटना का प्राचीन 'कुसुमपुर' नाम आज भी 'फुलवारी शरीफ' में सुरक्षित देखा जा सकता है। (डी आर पाटिल, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 373)

मध्यकाल में यह 'अजीमाबाद' के नाम से जाना गया। यह नाम शहर और सूबा दोनों के लिए प्रचलन में था। (द कॉम्प्रिहेंसिव हिस्ट्री ऑफ बिहार, वॉल्यूम ll, पार्ट ll, पृष्ठ 232, पादटिप्पणी संख्या 6) 1704 ईस्वी में औरंगजेब का पोता अजीम-उस-शान बिहार का सूबेदार था जिसने शहर को अपने तरीके से बसाया। लोदियों के मुहल्ले का नाम 'लोदीकटरा', मुगल सेना के अधिकारियों का मुहल्ला 'मुगलपुरा' और उलेमा, साहित्यकार, शायर, कवि का मुहल्ला 'मैदाने फसाहत' के नाम से बसा। (वही) सद्र-उस-सुदूर (मुख्य न्यायाधीश) का निवास स्थान 'सदर गली' कहलाया (जैसे आज चपरासी क्वार्टर और ऑफिसर्स फ्लैट हैं) तो हिन्दू उमरा (अधिकारी) के कारण 'दीवान मुहल्ला' आबाद हुआ। मुगल काल में पटना शहर की पूर्वी सीमा पर माल पर चुंगी (सलामी) वसूलने का केंद्र था, इसलिए यह मुहल्ला 'मालसलामी' कहलाया।

कुछ मोहल्लों का नाम पेशे के आधार पर मशहूर हुए। बर्तन बनानेवालों का मुहल्ला 'ठठेरी बाजार' तो तीर-कमान बनानेवालों का मुहल्ला 'कमानगर की गली' हुआ। आज इसे 'कमंगर गली' के नाम से जाना जाता है ठीक जैसे मैंगल तालाब अब मंगल तालाब है। पान बेचनेवालों का मुहल्ला 'पानदारी', नमक का बाजार 'नूनगोला', चावल का बाजार 'चौहट्टा' और गुड़ का बाजार 'गुड़हट्टा' या 'गुरहट्टा' और मछली बाजार 'मछरहट्टा'। कचौड़ी गली तथा कठौती गली इसी श्रेणी में शुमार हैं।

आधुनिक पटना में भी पेशे और सरकारी विभाग के नाम पर कुछ मुहल्ले है। सी डी ए कॉलोनी, सी आई डी कॉलोनी, रेवेन्यू कॉलोनी, पुलिस कॉलोनी आदि। पेशा के नाम पर हमें पत्रकारनगर जैसा मुहल्ला भी प्राप्त होता है। कुछ मुहल्लों के नाम जाति के नाम पर रखे जाने लगे हैं। ए जी कॉलोनी मुख्य सड़क के एक तरफ 'श्रीनगर' मुहल्ला है तो दूसरी तरफ 'केसरी' नगर। कहने को तो श्रीकृष्ण सिंह और कलक्टर सिंह केसरी दो महापुरुष के नाम हैं, लेकिन मूल में जाति है।

सुधांशु जी के हिन्दी-प्रेम के किस्से

 बिहार में सरकारी स्तर पर हिन्दीकरण की दिशा में जो प्रयास हुआ है, वह बहुत हद तक लक्ष्मीनारायण सुधांशु के धीरज और चेष्टाओं का नतीजा है। उन्हीं के सुझाव से राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने सरकारी काम-काज में हिन्दी के उत्तरोत्तर व्यवहार में कैसे प्रगति की जाए, इसके लिए एक 'हिन्दी समिति' गठित की थी, जिसके प्रमुख स्तंभ सुधांशु जी ही रहे। (हंसकुमार तिवारी, 'राजनीति और साहित्य के सेतुबंध', परिषद-पत्रिका, वर्ष : 40, अंक : 3, दिसंबर 2000, पृष्ठ 19) उन्होंने ही बिहार विधानसभा द्वारा बिहार-राष्ट्रभाषा-अधिनियम निर्मित कराया और बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद की भी स्थापना करवाई। (रामदयाल पांडेय, 'डॉ. सुधांशु : एक स्मृति', परिषद पत्रिका, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 25)

जब वे विधानसभा के अध्यक्ष हुए तो कई लोगों ने सवाल उठाया कि इस पद पर रहते हुए आप प्रगति समिति के सिलसिले में घूम तो नहीं सकेंगे। सुधांशु जी मामला स्पष्ट किया। कहा, 'तो मैं विधानसभा का अध्यक्ष-पद छोड़ दूंगा। हिन्दी मेरे लिए पहले है।' (हंसकुमार तिवारी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 21)

उनके काल में विधानसभा में अंग्रेजी नहीं बोली जाती थी। कार्यालय की लिखा-पढ़ी अंग्रेजी में बिल्कुल नहीं होती थी, सरकार का कोई अंग्रेजी पत्र स्वीकार नहीं किया जाता था। यहां तक कि विधायकों आदि के देयक, जिनका संबंध कोषागार, बैंक और महालेखापाल से होता है, हिन्दी में ही होते थे। दिलचस्प घटना है कि 'मुख्यमंत्री होने पर पहले ही दिन श्री कृष्णवल्लभ सहाय जब विधानसभा में बोलने को खड़े हुए और अंग्रेजी से जैसे ही शुरुआत की, सुधांशु जी उन्हें बेधड़क रोक दिया।' (हंसकुमार तिवारी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 20)

प्रधानमंत्री इंदिरा जी जब पटना पधारीं तो हवाई अड्डे पर उनके स्वागत का जो आमंत्रण पत्र था, वह अंग्रेजी में छपा था इसलिए सुधांशु जी हवाई अड्डे स्वागत में नहीं गए। शाम को राजभवन के स्वागत-भोज में उपस्थित हुए क्योंकि वह निमंत्रण-पत्र हिन्दी में था। (हंसकुमार तिवारी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 20)

जब दिनकर जी भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति पद का 'चार्ज' लेकर सुधांशु जी से मिलने आए तो छूटते ही सुधांशु जी ने दिनकर जी से पूछा कि 'हस्ताक्षर हिंदी में किया या अंग्रेजी में?' इस तीखे प्रश्न पर दिनकर जी का चेहरा उतर गया और वे ग्लानिभरे शब्दों में धीमे से बोले-'किया तो अंग्रेजी में'। (भुवनेश्वरनाथ मिश्र माधव, 'गंगा की तरह पवित्र', परिषद पत्रिका, वर्ष 40, अंक 3, अक्तूबर-दिसंबर 2000, पृष्ठ 15)

Sunday, October 4, 2026

इतिहास और अफवाह

अफवाह, इतिहास नहीं है किंतु इतिहास-निर्माण-प्रक्रिया में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका से इनकार करना असंभव है। हमारे महापुरुष जितना इतिहास की किताबों में हैं, अफवाहों में उससे तनिक कम नहीं हैं। नेहरू ने इसका हाल कुछ इस तरह बयान किया है, ‘मुझे पता लगा कि मेरे पिताजी और मेरे बारे में एक बहुत प्रचलित दंतकथा यह है कि हम हर हफ्ते अपने कपड़े पैरिस की किसी लॉन्ड्री में धुलने को भेजते थे। हमने कई बार इसका खण्डन किया है, फिर भी यह बात प्रचलित है ही। इससे ज्यादा अजीब बाहियात बात की कल्पना भी मैं नहीं कर सकता।’ और आगे, ‘इसी तरह से एक दूसरी दंतकथा, जोकि इन्कार करने पर भी प्रचलित है यह है कि मैं प्रिंस ऑफ वेल्स के साथ स्कूल में पढ़ता था। सच बात तो यह है कि न तो स्कूल में ही उनके साथ पढ़ा हूँ और न मुझे उनसे मिलने या बात करने का ही मौका हुआ है।’ यह भी कि ‘नौजवान स्त्री-पुरुषों का तो, एक प्रकार से, मैं नायक बन गया था। और उनकी निगाह में मेरे आसपास कुछ वीरता की आभा दिखाई पड़ती थी, मेरे बारे में गाने तैयार हो गये थे और ऐसी-ऐसी अनहोनी कहानियाँ गढ़ ली गई थीं, जिन्हें सुनकर हंसी आती थी।’ 

अंग्रेजी राज में एक अन्य प्रचारित अफवाह की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए नेहरू ने लिखा था, ‘अखबारों में एक बे-सिर पैर की खबर निकली थी, और हालाँकि उसका खंडन किया जा चुका है, फिर भी वह समय-समय पर प्रकाशित होती रहती है। वह यह कि उस वक्त के यू. पी. के गवर्नर सर हारकोर्ट बटलर ने जेल में मेरे पिताजी के पास शेम्पेन शराब भेजी। सच तो यह है कि सर हारकोर्ट ने पिताजी के लिए जेल में कुछ नहीं भेजा, और न किसी दूसरे ने ही शेम्पेन या दूसरी कोई नशीली चीज भेजी। वास्तव में कांग्रेस के असहयोग को अपना लेने के बाद, 1920 से, उन्होंने शराब वगैरा पीना सब छोड़ दिया था, और उस वक्त वह कोई ऐसी चीज नहीं पीते थे।

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के दिनों में एक अखबार में रिपोर्ट छपी थी जिसमें कहा गया था कि ‘गांधीजी के पास अपार दौलत है, जो कई करोड़ होगी’। जब गांधीजी 1931 में यूरोप रवाना हुए, तब उसके बाद फौरन ही, जवाहरलाल नेहरू ने पेरिस के एक प्रसिद्ध संवाददाता का एक लेख पढ़ा था। उन दिनों वह लंदन के एक अखबार का संवाददाता था। उसका वह लेख हिंदुस्तान के बारे में था। उस लेख में एक ऐसी घटना का जिक्र था, जो उसके कहने के मुताबिक, 1921 में उस वक्त हुई जब असहयोग के दौरान में प्रिंस ऑफ वेल्स ने यहां दौरा किया था। उसमें कहा गया था कि ‘किसी जगह (शायद वह दिल्ली थी), महात्मा गांधी एकाएक, जैसे नाटक में होता है, बिना इत्तिला के ही, युवराज के सामने जा पहुंचे और उन्होंने घुटने टेककर युवराज के पैर पकड़ लिये और ढाड़ मार-मारकर रोते हुए उनसे विनती की कि इस अभागे देश को शांति दीजिए।’ यह प्रसिद्ध पत्रकार 'डेली हैरल्ड' के स्लोकोम्ब थे। ‘गांधीजी जब विलायत गये तब फ्रांस में वह उनसे मिले थे और उन्होंने गांधीजी से कबूल किया था कि यह बात बिल्कुल मनगढ़ंत थी और उसके लिए माफी भी मांगी थी।’ 

गाँधीजी के चंपारण पहुंचने पर विरोधियों ने यह मशहूर कर दिया कि लोग गाँधी जी की वजह से इस कदर शोख हो गए हैं कि कोठी तक जलाना शुरू कर दिये हैं। अफवाह को सच साबित करने के लिए अंग्रेजों ने फूस की एक झोंपडी में आग लगा दी और "कोठी जलने की खबर बहुत अतिरंजित भाषा में 'स्टेट्समैन' आदि अखबारों में छपी भी।" बापू को आग लगने की खबर मिली तो तुरंत ही श्री विंध्यवासिनी प्रसाद को (जो गोरखपुर में वकालत करते थे और ब्रजकिशोर बाबू के सगे रिश्तेमंदों में से थे) इसकी तहकीकात के लिए भेजा। वहाँ जाकर उन्होंने बहुत विस्तारपूर्वक सारी बातों को जाँच की। पता चला कि यह आग कोठीवालों की ओर से ही लगाई गई थी और आग लगाने के पहले घर के अंदर की सारी चीजें हटा दी गई थीं। यहाँ तक कि लकड़ी के चौकठ, किवाड़, धरन इत्यादि भी घर के अंदर जली हुई चीजों में नहीं पाए गए। इन सामानों को भी बाहर निकालकर ही लाग लगाई गई थी। महात्मा जी ने इस रिपोर्ट को पढ़ा तो तुरंत ही इसकी कापी मजिस्ट्रेट के पास भेज दी और इसी आशय का एक छोटा-सा नोट अखबारों में छपने के लिए भेज दिया। (अनुग्रह नारायण सिंह, मेरे संस्मरण, पृष्ठ 27)

यहां यह जानना दिलचस्प है कि फणीश्वरनाथ रेणु का ‘मैला आँचल’ उपन्यास भी एक अफवाह के साथ शुरू होता है-‘यद्यपि 1942 के जन-आंदोलन के समय इस गांव में न तो फौजियों का कोई उत्पात हुआ था और न आंदोलन की लहर ही गांव तक पहुंच पाई थी, किंतु जिले भर की घटनाओं की खबर अफवाहों के रूप में यहां तक जरूर पहुंची थी।’ और अफवाह थी कि ‘मोगलाही टीशन पर गोरा सिपाही एक मोदी की बेटी को उठाकर ले गए। इसी को लेकर सिख और गोरे सिपाहियों में लड़ाई हो गई, गोली चल गई। ढोलबाजा में पूरे गांव को घेरकर आग लगा दी गई, एक बच्चा भी बचकर नहीं निकल सका। मुसहरू के ससुर ने अपनी आंखों से देखा था-ठीक आग में भूनी गई मछलियों की तरह लोगों की लाशें महीनों पड़ी रहीं, कौआ भी नहीं खा सकता था; मलेटरी का पहरा था। मुसहरू के ससुर का भतीजा फारबिस साहब का खानसामा है; वह झूठ बोलेगा?’  

कहने की जरूरत नहीं कि अफवाहों के सबसे ज्यादा किस्से महात्मा गांधी को लेकर हैं। शाहिद अमीन एवं हसन इमाम ने गांधी की ‘चमत्कारी’ शक्तियों से संबंधित कुछ रोचक बातों का उल्लेख करते हुए कहा है कि ये चमत्कारी शक्तियाँ ही गांधी को महात्मा बनाती हैं। लोग मानते थे कि गांधी को उनकी इच्छा के विरुद्ध अंग्रेजी सरकार भी जेल में बंद नहीं रख सकती थी, कि उनमें ‘चमत्कारी’ शक्ति थी और वे इस शक्ति की बदौलत जब चाहते थे जेल का फाटक खुल जाता था और वे बाहर निकल जाते थे। इसी आशय का एक हरियाणवी लोकगीत है-‘एक जलेबी तेल में।/गांधी भेज्या जेल में।।/जेल का फाटक गिया टूट।/गांधी आया फोरन छूट।।’ सतीनाथ भादुड़ी का उपन्यास ‘ढोडायचरितमानस’ भी इस लोकधारणा का उल्लेख करता है, ‘‘सहसा खबर आती है कि गान्ही बाबा जिरानिया आ रहे हैं ‘साभा’ करने। उन्हें थोड़े ही कोई जेल में भर्ती कर रख सकता है! एक ही मन्तर से वे ताला और दीवाल तोड़कर बाहर चले आते हैं।’ ताना भगत, गांधी के अनन्य अनुयायी थे। उनकी धारणा थी कि गांधीजी की अहिंसा के प्रताप से सांप भी हिंसा पर उतारू नहीं हो सकता। अपने इसी विश्वास के बल पर उन्होंने अपने घर में विषैले सांप पाल रखे थे। करीब डेढ़ सौ विषैले सांप वे अपने मकान में टोकरी के अंदर रखते थे। ‘मैला आँचल’ में मठ के महंथ सेवादास को ‘सतगुरु साहेब’ सपने में दर्शन देते हैं और गांधीजी की पैरवी करते हैं। कहते हैं, ‘तुम्हारे गाँव में परमारथ का कारज हो रहा है और तुमको मालूम नहीं? गाँधी तो मेरा ही भगत है। गाँधी इस गाँव में इसपिताल खोलकर परमारथ का कारज कर रहा है। तुम सारे गाँव को एक भंडारा दे दो।’ 

आमजन के बीच गांधीजी की छवि ‘करुणा के अवतार’ की थी। वे ‘इतने बड़े संत हैं कि आँगन के कोने का सरसों का पौधा अगर झाड़ू से दब जाय, तो उनका दिल रो उठता है।’ ‘मैला आँचल’ की लक्ष्मी कोठारिन बालदेव जी को समझाती है, ‘महतमा जी के पंथ को मत छोड़िए, बालदेव जी! महतमा जी अवतारी पुरुख हैं। ...जिस नैन से महतमा जी का दरसन किया है उसमें पाप को मत पैसने दीजिए। जिस कान से महतमा जी के उपदेस को सरबन किया है, उसमें माया की मीठी बोली को मत जाने दीजिए। महतमा जी सतगुरु के भगत हैं।’ बालदेव जी, गांधी के भक्त हैं। इतने बड़े कि उन पर ‘कभी-कभी महतमा जी का भर (देवी-देवता का सवार होना) होता है। चुन्नी गोसाईं को तो रोज भोर को होता है।’ गांधीजी की मृत्यु पर कमली की मां कहती है, ‘वे तो नर-रूप धारन कर आए थे...लीला दिखाकर चले गए।’ ‘ढोडायचरितमानस’ का बाबूलाल सबको समझा रहा है, ‘गान्ही बाबा बड़ा गुणी आदमी हैं। ...गान्ही बाबा मांस-मछली, नशा-भाँग से परहेज रखते हैं। शादी-ब्याह नहीं किया है, नंगे रहते हैं।’ ये क्या! ‘रबिया पागल की तरह चिल्लाता दौड़ा आ रहा है-कोंहड़े के ऊपर गान्ही बाबा! ...कोंहड़े के छिलके पर गान्ही बाबा की मूरत अंकित हो गई है।’ और अब तो रेबन गुनी कोंहड़े को प्रणाम करता है। फिर चिल्लाकर कह उठता है-‘लोहा मान लिया, लोहा मान लिया मैंने गान्ही बाबा का।’ ‘कलियुग के रघुनाथ हैं महात्माजी।’ 

मेरीगंज से पुरैनिया जुलूस में जा रहे लोगों को पता है कि ‘जिसके हाथ में गन्ही महतमा का झंडा रहता है, उससे गाटबाबू, चिकिहरबाबू, टिकस नहीं माँगता है।’ 

1921 में फैजाबाद जिले में कुछ किसानों ने एक ताल्लुकेदार का माल असबाब लूट लिया। इन गरीब किसानों से कहा गया था कि महात्मा गांधी चाहते हैं कि वे लूट लें; और उन्होंने ‘महात्मा गांधी की जय!’ का नारा लगाते हुए इस 'आदेश का पालन' किया। और इस जनता को गांधी के बारे में कोई जानकारी नहीं है-‘कहाँ रहते हैं महात्माजी!...पक्की जहां खत्म हुई है, उससे भी काफी दूर, मुंगेर तारापुर, अयोध्या जी से भी दूर।’ 

1917 में गांधी जब चंपारण आए तो ‘चमत्कारी शक्तियां’ भी उनके साथ आयीं। गांधी का ‘नया मालिक’ के रूप में स्वागत किया गया। राजकुमार शुक्ल ने प्रचारित किया कि वे ‘ईश्वर का अवतार’ हैं तथा गोरे अंग्रेजों से भारतमाता की मुक्ति के लिए भेजे गये हैं। किसान मानकर चल रहे थे कि किसी ‘भगवान’ ही को ‘बड़का बड़का वकील लोग’ का समर्थन प्राप्त हो सकता है जिनके पास अबतक अपना दुखड़ा रोने के लिए भी उन्हें फीस की मोटी रकम देनी पड़ रही थी। डी. जी. तेंदुलकर बिहार के एक गांव की ऐसी ही मजेदार कहानी का जिक्र करते हैं। एक बुढ़िया गांधीजी के समीप आई और बोली-‘महाराज, मेरी उम्र 104 वर्ष की है और आंखों की नजर धुंधली हो चुकी है। मैंने बहुत सारे तीर्थस्थानों का भ्रमण किया है। मेरे खुद के घर में दो मंदिर स्थापित हैं। मेरे जानते राम और कृष्ण-दो ही अवतार थे। मैंने सुना है कि अब गांधी भी एक अवतार हैं। जबतक मैं उन्हें देख नहीं लेती हूं, मेरे प्राण अंटके रहेंगे।’ 

चंपारण पहुंचकर गांधी ने खुद स्वीकार किया कि ‘शायद ईश्वर ने मुझे निमित्त बनाया’। बेतिया के आसपास के इलाकों में पेड़-पौधों से लेकर छप्पर के कोंहड़ा-कद्दू तक पर गांधी की आकृति उभरने लगी। इन सब की जड़ में लोगों का यह विश्वास था कि गांधी कोई साधारण आदमी नहीं बल्कि ‘अवतारी पुरुष’ हैं। गांधी को आदमी से अवतारी पुरुष बनाने में अफवाह की खासी भूमिका रही है-‘गांधी कहै, गांधी कहै, मन चित्त लाइको।/गंगा सरजू चाहे कूपा पर नहाइ के।/लिहले अवतार एही देशवा में आइ के।’ महात्मा गांधी को अवतार मानकर उनकी तुलना राम और कृष्ण से की गई है। राम के साथ वानर सेना और लक्ष्मण थे। श्रीकृष्ण के ग्वाल-बाल तथा बलराम थे। गांधी के साथ जनता है और जवाहर हैं। रावण और कंसरूपी अन्यायी राज्य को हटाने ही गांधी आए हैं-‘अवतार महात्मा गांधी कै,/भारत के भार उतारै काँ,/सिरी राम मारे रावण काँ,/गांधी जी जग माँ परगट भये,/अन्यायी राज्य हटावै काँ,/अवतार महात्मा गांधी कै,/भारत कै भार उतारै काँ’। ब्रज के एक लोकगीत में भी गांधी को अवतार बताया गया है-‘अवतार महात्मा गांधी हैं भारत को भार उतारन को/सिरीराम ने रावण मारा था, कान्हा ने कंस पछाड़ा था/अब गांधी ने अवतार लिया इन अंगरेजन के मारन को/सिरी राम के हाथ में धनुष बाण, कान्हा के हाथ सुदर्शन था/गांधी के हाथ में चरखा है, भारतवासिन के तारन को।’ 

मुल्कराज आनंद के उपन्यास ‘अनटचेबल’ के नायक बाखा को लगता है कि गांधी एक ऋषि हैं, विष्णु के अवतार हैं। लोग हजारों की संख्या में दूर-दराज से उन्हें सुनने के लिए आने लगे, रेलवे-स्टेशन पर घंटों उनकी प्रतीक्षा में इंतजार करने लगे या राजपथ पर गांधीजी के एक क्षण के दर्शन के लिए प्रचंड गर्मी या बर्फीली हवा को सहते रहे।

इस तरह, हम पाते हैं कि आम औपनिवेशिक भारतीय मन पर इतिहास की घटनाओं के साथ-साथ अफवाह का भी असर रहा है। हमारी चेतना के निर्माण में इसकी भूमिका रही है।

Saturday, October 3, 2026

राम शरण शर्मा : कुछ स्मरणीय तथ्य

1. पटना में योगेंद्र मिश्र (वाई मिश्रा के नाम से ख्यात) नामक प्राचीन भारत के एक विद्वान थे। जब उनसे कोई रामशरण शर्मा जी के संस्कृत-ज्ञान के बारे में पूछता तो जवाब में वे बोलते कुछ न थे। एक जोरदार ठहाका भर लगा देते - हा .. हा ...हा..

2. रामशरण शर्मा हमेशा ही वस्तुनिष्ठ और प्रामाणिक इतिहास लेखन के आग्रही रहे, लेकिन विद्वानों ने उन पर लिखते हुए इस बात का तनिक ध्यान न रखा और 'मिथकीय पुरुष' बना दिया। इसी का नतीजा हैं कि अंतर्जाल पर सर्वत्र उन्हें 100 पुस्तकों का लेखक बताया जाता है। पटना के एक बहुप्रचारित विद्वान डॉक्टर ब्रजकुमार पांडेय (उन्होंने मेरे लेख को अपने नाम से छपा लेने का अपराध किया है) ने जैसाकि लिखा है, 'शर्माजी ने अपनी सभी किताबें अंग्रेजी में लिखी थीं और उन सबों का हिन्दी अनुवाद उन्होंने स्वयं किया था।' (जनशक्ति, पटना, 28 अगस्त 2011, पृष्ठ 3) यह तथ्य नहीं अफवाह है। शर्माजी की पहली पुस्तक 'विश्व इतिहास की भूमिका' प्रथमतः और मूलतः हिन्दी में लिखी गयी थी। 'पर्सपेक्टिव्स इन सोशल ऐंड इकनॉमिक हिस्ट्री ऑफ अर्ली इंडिया' (प्रथम संस्करण) का हिन्दी रूपांतर हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) से छपा है। शर्माजी ने 'अध्याय संख्या 2, 6 और 13 को स्वयं हिन्दी में लिखा है।' (प्रस्तावना) 'अध्याय संख्या 1, 11, 12, 14 और 17-19 का अनुवाद डॉक्टर कृष्णदत्त शर्मा ने किया है, और शेष अध्यायों का डॉक्टर सीताराम ने।' (प्रस्तावना)

'ऑरिजिन ऑफ स्टेट इन इंडिया' किताब मूल रूप से अंग्रेजी में इतिहास विभाग, बम्बई विश्वविद्यालय से प्रकाशित हुई थी जिसका हिन्दी संस्करण (प्रथम) 1986 में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली से छपा। इसके हिन्दी अनुवादक गोविन्द झा हैं। 

3. रामशरण शर्मा बड़े विद्वान और जटिल आदमी थे। वे प्रतिभाशाली लोगों को हतोत्साहित और झोलटंगवा को प्रोत्साहित करने में विश्वास रखते थे। सुनते हैं कि बी एन कॉलेज में इतिहास शिक्षक रामभूषण शर्मा, रामशरण शर्मा की एक उपलब्धि थे!

4. शर्माजी की किताब 'मैटेरियल कल्चर ऐंड सोशल फॉर्मेशन्स इन एन्शिएंट इंडिया' पढ़ते हुए आश्चर्यजनक रूप से मॉरिस विन्तर्निज की किताब 'हिस्ट्री ऑफ इंडियन लिटरेचर' की याद आती है। हाँ, शर्माजी का शब्द-चयन अपना है, मॉरिस के यहाँ मार्क्सवाद की 'दुहाई' नहीं है।

5. रामशरण शर्मा से पहले इतिहासकारों की एक लम्बी सूची है जो जनता का इतिहास लिख गए हैं. एस ए डांगे, काशीनाथ राजवाड़े, देवराज चानना, डी.डी. कोसंबी आदि अनेक नाम हैं. इस सूची के बगैर शर्मा जी के वास्तविक योगदान को नहीं समझा जा सकता. एक नाम मैं जान-बूझकर लिखना चाहूँगा-महादेव साहा. शर्मा जी के प्रसंग में यह और भी जरूरी नाम है. यह साहा ही थे जिनकी प्रेरणा से उन्होंने 'इंडियन फ्यूडलिज्म' का दूसरा संस्करण लाया. पहले और दूसरे संस्करण का अंतर भी नोट करने लायक है ! 

6. रामशरण शर्मा निस्संदेह एक गंभीर इतिहासकार हैं, लेकिन कभी-कभी बहुत ही 'दिलचस्प' और 'मनोरंजक' बात लिखते हैं। लिखते हैं कि "हाल के जाति आंदोलनों में अनेक शूद्र जातियों ने क्षत्रिय और ब्राह्मण होने का दावा किया है। इस प्रकार दुसाध अपने आपको दुःशासन का और ग्वाले यदुओं का वंशज बताते हैं। जनगणना रिपोर्टों के आधार पर इस प्रक्रिया को समाजशास्त्रियों ने संस्कृतीकरण नाम दिया है, हालांकि अनेक जाति नेता संस्कृत नहीं जानते।" (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, पृष्ठ 19, पादटिप्पणी संख्या 60) यहां इस बात का "हालाँकि अनेक जाति नेता संस्कृत नहीं जानते" क्या अभिप्राय हो सकता है? क्या संस्कृतिकरण संस्कृत-ज्ञान से जुड़ा मसला है?

7. प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत के रूप में साहित्यिक साक्ष्यों के अध्ययन की समीक्षा दिलचस्प हो सकती है. इतिहासकार अपने व्यक्तिगत आग्रहों/पूर्वाग्रहों के कारण साहित्यिक साक्ष्यों के साथ मनमानी करते रहे हैं. इस खेल में आर. एस. शर्मा जैसे प्रख्यात इतिहासकार तक शामिल हैं. एक उदारण देखें-'राम के वन चले जाने पर वाल्मीकि ने अयोध्या का जो वर्णन किया है उससे उजड़े नगर का स्पष्ट संकेत मिलता है. वहां व्यस्त जीवन का कोलाहल नहीं पाया जाता. इसके अलावा गलियों में गाडियां और रथ नहीं चलते, यज्ञ नहीं होते और ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए पण्य-वस्तुएं फूलों और मालाओं से नहीं सजाई जातीं. दुकानें सौदागरों से खाली हैं: सौदागर अपने व्यापार के अंत से चिंतित हैं.' (आर. एस. शर्मा, 'भारत के प्राचीन नगरों का पतन', राजकमल प्रकाशन, 1995, पृष्ठ 152) शर्मा जी इससे निष्कर्ष निकालते हैं कि देखिये शहरों का पतन हो रहा है. अब उनको कोई कैसे कहे कि यह वर्णन राम के वन-गमन के बाद हाट-समाज में पसरे दुःख का भी तो हो सकता है ! रामायण की कथा का ऐसे सीधे-सीधे इतिहास के स्रोत की बजाय इतिहास के रूप में स्वीकार कर लेना क्या उचित है ? 

8. "आर एस शर्मा की भारतीय फ्यूडलिज्म की परिकल्पना, जिसे मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य की संज्ञा दी जा रही थी, वास्तव में यूरोप में विकसित और पतित फ्यूडलिज्म की आंरी पिरेन (Henri Pirenne) द्वारा प्रतिपादित परिकल्पना के अनुरूप थी जिसे प्रोफेसर शर्मा ने कार्बन कॉपी की तरह भारतीय तथ्यों और साक्षियों पर चस्पा कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि पिरेन मार्क्सवाद का कट्टर विरोधी था। मार्क्स और एंगिल्स ने वाणिज्य और फ्यूडलिज्म में कोई अंतर्विरोध नहीं पाया और वाणिज्य को प्रत्येक उत्पादन व्यवस्था के साथ सुसंगत और अनुरूप पाया; वाणिज्य को किसी भी उत्पादन व्यवस्था का विघातक नहीं पाया। वाणिज्य-फ्यूडलिज्म का अंतर्विरोध पिरेन की परिकल्पना में केंद्रीय था और प्रोफेसर शर्मा की परिकल्पना में भी। रुचिकर बात यह है कि प्रोफेसर शर्मा ने इस परिकल्पना को तब अपनाया जब यूरोप में इस 'पिरेन थीसिस' को खारिज किया जा चुका था।" (हरबंस मुखिया, 'भारतीय इतिहास की गतिशील रूपरेखा', अनहद-8 : जून-2018, पृष्ठ 91)


मध्यकालीन भारत में पत्रकारिता

फ़ारसी के खबर का बहुवचन अखबार है। (अर्जुन तिवारी, हिंदी पत्रकारिता का बृहद इतिहास, पृष्ठ 33) भारत में संचार-तंत्र का व्यवस्थित सिलसिला मध्यकाल (मुस्लिम शासकों) में मिलता है. उन दिनों ‘वाकिया नवीस’ नियुक्त किये जाने लगे थे, जो अपने इलाके की पूरी ख़बरें बादशाह तक पहुँचाया करते थे. मुहम्मद बिन तुगलक (सन 1325-51) और शेरशाह सूरी (सन 1540-45) के समय डाक व्यवस्था इतनी चुस्त हो गई थी कि राजधानी में बैठे-बैठे बादशाह को पूरी सूचनाएं मिल जाती थीं. उस समय सूचना-संचार का जो रचनाक्रम था, उसके अनुसार ‘वाकिया नवीस’ (स्थानीय स्तर का संवाददाता), ‘खुफिया नवीस’, ‘सवानह नवीस’ (जीवनी लेखक) और ‘हरकारा’ (सन्देश वाहक) नियुक्त होते थे. औरंगजेब के शासनकाल में भारत प्रवास पर आये फ्रान्सीसी बर्नियर ने अपने यात्रा वृत्तान्त में वाकिया नवीसों का वर्णन किया है. (विजयदत्त श्रीधर, भारतीय पत्रकारिता कोश, प्रथम खंड, पृष्ठ 3)

मुगलकाल में ‘फरमान’, ‘दस्तक’, ‘परवाना’, ‘मह्जार’, ‘एकाउंटपेपर’ तथा ‘बिक्रीनामा’ पत्र के विभिन्न रूप प्रचलित थे. (अर्जुन तिवारी, हिंदी पत्रकारिता का बृहद इतिहास, वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण : 1997, पृष्ठ 33) डाक्टर वासुदेव सिंह ने लिखा है कि मुगलकाल में सूचनाएं ‘फरमान’ के रूप में जारी होती थीं. औरंगजेब के आदेश ‘पैगामे हिन्द’ के रूप में निकलते थे. इसे समाचारपत्र का रूप माना जा सकता है. ये हस्तलिखित होते थे और इसके लिखनेवाले ‘वाकया नवीस’ कहे जाते थे. बहादुरशाह के समय ‘सिराज-उल-अख़बार’ निकालने का पता चलता है, लेकिन इसका प्रकाशन नियमित नहीं था. (सुधा शुक्ल, महिला पत्रकारिता, प्रभात प्रकाशन, 2012, पृष्ठ 63 में उद्धृत)

ये ‘वाकया नवीस’ विभिन्न समाचारों को शासन द्वारा प्रदत्त ‘समाचार पुस्तिका’ में लिखकर विभिन्न शासकीय स्थानों पर उपलब्ध करवाते थे. मुगलकाल में यह निश्चित नियम था कि ‘वाकया नवीस’ अथवा राज्य के गुप्त समाचार लेखक सप्ताह में एक बार घटित होनेवाली घटनाओं को ‘वाकिया’ अथवा ‘गजट’ या ‘मरकरी’ (जिसमें महत्त्वपूर्ण घटनाओं का विवरण होता था) में लिखें. बादशाह की उपस्थिति में महिलाओं द्वारा रात्रि में लगभग नौ बजे पढ़कर सुनाये जाते थे ताकि यह जानकारी मिल सके कि राज्य में क्या हो रहा है. इसके अतिरिक्त गुप्तचरों को भी प्रति सप्ताह महत्त्वपूर्ण घटनाओं का विवरण भेजना होता था. मुख्यतः राजकुमारों की गतिविधियों के बारे में बादशाह आधी रात तक बैठकर इन विवरणों को सुना करता था. (डाक्टर सजीव भानावत, सांस्कृतिक चेतना और जैन पत्रकारिता, पृष्ठ 46)      

सल्तनत के समय दरबार की और से अख़बार जारी होने का प्रमाण मिलता है. मुग़ल बादशाह औरंगजेब के ज़माने में महत्त्वपूर्ण फैसले, आदेश, बादशाह के दौरे और दिनचर्या आदि का विवरण अख़बार में प्रकाशित किया जाता था. सन 1660 के ऐसे अख़बार की कुछ प्रतियाँ रायल एशियाटिक सोसायटी लन्दन में सुरक्षित हैं. (विजयदत्त श्रीधर, भारतीय पत्रकारिता कोश, प्रथम खंड, पृष्ठ 7)

सन 1841 ईस्वी में दिल्ली से फारसी भाषा में ‘सिराज-उल-अख़बार’ का प्रकाशन हुआ. यह आठ पृष्ठों का साप्ताहिक पत्र था जिसका प्रकाशन अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुरशाह के समय हुआ था और यह सरकारी गजट जैसा था. इसमें बादशाह के दैनिक कार्यक्रमों का ब्यौरा तथा देश-विदेश की ख़बरें रहती थीं. इसके स्वरूप का परिचय दिल्ली के मजिस्ट्रेट जान लारेंस की टीप से मिल जाता है : ‘‘बादशाह का समाचारपत्र सिराज-उल-अख़बार’ महल से प्रकाशित किया जाता है. इससे सम्बंधित सभी व्यक्ति शाही कर्मचारी हैं. इस पत्र की कुल 26 प्रतियाँ हर सप्ताह छपती हैं. अधिकतर प्रतियाँ बादशाह के प्रशंसकों को दी जाती हैं. कुछ प्रतियाँ महल के गार्ड, गवर्नर जनरल और लेफ्टिनेंट गवर्नर को भेजी जाती हैं. महल के जिन लोगों को इसकी प्रतियाँ दी जाती हैं उनके वेतन से एक रुपया प्रतिमाह इसका खर्च पूरा करने के लिए काटा जाता है. इस पत्र की भाषा ठेठ फारसी होती है.’’ (विजयदत्त श्रीधर, भारतीय पत्रकारिता कोश, प्रथम खंड, पृष्ठ 7) 

हालाँकि बहादुरशाह की सत्ता का व्यावहारिक रूप से पतन हो चुका था, किन्तु उनके दरबार के पद उस समय भी समाप्त नहीं हुए थे. उन पदों में से एक पद ‘वाकया नवीस’ का था. मसलहउद्दीन सैयद अबुल मुगलिया दरबार के अंतिम ‘वाकया नवीस’ थे. गार्सां द तासी ने इसे दिल्ली का सबसे पुराना अख़बार बताया है. ‘सिराज-उल-अख़बार’ के अंतिम दौर की कुछ प्रतियाँ, जिनमें 1857 की प्रतियाँ भी हैं, राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित हैं. इस अख़बार में प्रकाशित एक समाचार, जिसका शीर्षक ‘खबर गुलशनाबाद’ है, में संकेत मिलता है कि नासिक का नाम गुलशनाबाद भी है. इस समाचार में लिखा गया है कि ईसाई पादरियों द्वारा गौ-हत्या के विरोध में शहर के व्यापारियों ने अपनी दुकानें बंद रखीं. संभवतः यह देश में पहली हड़ताल रही होगी. इसी अख़बार से पता चलता है कि बादशाह अंग्रेजी समाचारपत्रों में प्रकाशित समाचारों का अनुवाद भी सुना करते थे. यदि अंग्रेजी समाचारपत्रों में बादशाह से सम्बंधित कोई असत्य समाचार होता था तो उसका खंडन ‘सिराज-उल-अख़बार’ में किया जाता था. (विजयदत्त श्रीधर, भारतीय पत्रकारिता कोश, प्रथम खंड, पृष्ठ 80)  मुगलों की अंतिम डायरी ‘उर्दू अख़बार’ थी. इसमें आगामी पत्र-पत्रिकाओं का स्वरूप विद्यमान था. (राम अवतार शर्मा, हिंदी साहित्य के विकास में हिंदी पत्रकारिता का योगदान, पृष्ठ 17)