अफवाह, इतिहास नहीं है किंतु इतिहास-निर्माण-प्रक्रिया में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका से इनकार करना असंभव है। हमारे महापुरुष जितना इतिहास की किताबों में हैं, अफवाहों में उससे तनिक कम नहीं हैं। नेहरू ने इसका हाल कुछ इस तरह बयान किया है, ‘मुझे पता लगा कि मेरे पिताजी और मेरे बारे में एक बहुत प्रचलित दंतकथा यह है कि हम हर हफ्ते अपने कपड़े पैरिस की किसी लॉन्ड्री में धुलने को भेजते थे। हमने कई बार इसका खण्डन किया है, फिर भी यह बात प्रचलित है ही। इससे ज्यादा अजीब बाहियात बात की कल्पना भी मैं नहीं कर सकता।’ और आगे, ‘इसी तरह से एक दूसरी दंतकथा, जोकि इन्कार करने पर भी प्रचलित है यह है कि मैं प्रिंस ऑफ वेल्स के साथ स्कूल में पढ़ता था। सच बात तो यह है कि न तो स्कूल में ही उनके साथ पढ़ा हूँ और न मुझे उनसे मिलने या बात करने का ही मौका हुआ है।’ यह भी कि ‘नौजवान स्त्री-पुरुषों का तो, एक प्रकार से, मैं नायक बन गया था। और उनकी निगाह में मेरे आसपास कुछ वीरता की आभा दिखाई पड़ती थी, मेरे बारे में गाने तैयार हो गये थे और ऐसी-ऐसी अनहोनी कहानियाँ गढ़ ली गई थीं, जिन्हें सुनकर हंसी आती थी।’
अंग्रेजी राज में एक अन्य प्रचारित अफवाह की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए नेहरू ने लिखा था, ‘अखबारों में एक बे-सिर पैर की खबर निकली थी, और हालाँकि उसका खंडन किया जा चुका है, फिर भी वह समय-समय पर प्रकाशित होती रहती है। वह यह कि उस वक्त के यू. पी. के गवर्नर सर हारकोर्ट बटलर ने जेल में मेरे पिताजी के पास शेम्पेन शराब भेजी। सच तो यह है कि सर हारकोर्ट ने पिताजी के लिए जेल में कुछ नहीं भेजा, और न किसी दूसरे ने ही शेम्पेन या दूसरी कोई नशीली चीज भेजी। वास्तव में कांग्रेस के असहयोग को अपना लेने के बाद, 1920 से, उन्होंने शराब वगैरा पीना सब छोड़ दिया था, और उस वक्त वह कोई ऐसी चीज नहीं पीते थे।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के दिनों में एक अखबार में रिपोर्ट छपी थी जिसमें कहा गया था कि ‘गांधीजी के पास अपार दौलत है, जो कई करोड़ होगी’। जब गांधीजी 1931 में यूरोप रवाना हुए, तब उसके बाद फौरन ही, जवाहरलाल नेहरू ने पेरिस के एक प्रसिद्ध संवाददाता का एक लेख पढ़ा था। उन दिनों वह लंदन के एक अखबार का संवाददाता था। उसका वह लेख हिंदुस्तान के बारे में था। उस लेख में एक ऐसी घटना का जिक्र था, जो उसके कहने के मुताबिक, 1921 में उस वक्त हुई जब असहयोग के दौरान में प्रिंस ऑफ वेल्स ने यहां दौरा किया था। उसमें कहा गया था कि ‘किसी जगह (शायद वह दिल्ली थी), महात्मा गांधी एकाएक, जैसे नाटक में होता है, बिना इत्तिला के ही, युवराज के सामने जा पहुंचे और उन्होंने घुटने टेककर युवराज के पैर पकड़ लिये और ढाड़ मार-मारकर रोते हुए उनसे विनती की कि इस अभागे देश को शांति दीजिए।’ यह प्रसिद्ध पत्रकार 'डेली हैरल्ड' के स्लोकोम्ब थे। ‘गांधीजी जब विलायत गये तब फ्रांस में वह उनसे मिले थे और उन्होंने गांधीजी से कबूल किया था कि यह बात बिल्कुल मनगढ़ंत थी और उसके लिए माफी भी मांगी थी।’
गाँधीजी के चंपारण पहुंचने पर विरोधियों ने यह मशहूर कर दिया कि लोग गाँधी जी की वजह से इस कदर शोख हो गए हैं कि कोठी तक जलाना शुरू कर दिये हैं। अफवाह को सच साबित करने के लिए अंग्रेजों ने फूस की एक झोंपडी में आग लगा दी और "कोठी जलने की खबर बहुत अतिरंजित भाषा में 'स्टेट्समैन' आदि अखबारों में छपी भी।" बापू को आग लगने की खबर मिली तो तुरंत ही श्री विंध्यवासिनी प्रसाद को (जो गोरखपुर में वकालत करते थे और ब्रजकिशोर बाबू के सगे रिश्तेमंदों में से थे) इसकी तहकीकात के लिए भेजा। वहाँ जाकर उन्होंने बहुत विस्तारपूर्वक सारी बातों को जाँच की। पता चला कि यह आग कोठीवालों की ओर से ही लगाई गई थी और आग लगाने के पहले घर के अंदर की सारी चीजें हटा दी गई थीं। यहाँ तक कि लकड़ी के चौकठ, किवाड़, धरन इत्यादि भी घर के अंदर जली हुई चीजों में नहीं पाए गए। इन सामानों को भी बाहर निकालकर ही लाग लगाई गई थी। महात्मा जी ने इस रिपोर्ट को पढ़ा तो तुरंत ही इसकी कापी मजिस्ट्रेट के पास भेज दी और इसी आशय का एक छोटा-सा नोट अखबारों में छपने के लिए भेज दिया। (अनुग्रह नारायण सिंह, मेरे संस्मरण, पृष्ठ 27)
यहां यह जानना दिलचस्प है कि फणीश्वरनाथ रेणु का ‘मैला आँचल’ उपन्यास भी एक अफवाह के साथ शुरू होता है-‘यद्यपि 1942 के जन-आंदोलन के समय इस गांव में न तो फौजियों का कोई उत्पात हुआ था और न आंदोलन की लहर ही गांव तक पहुंच पाई थी, किंतु जिले भर की घटनाओं की खबर अफवाहों के रूप में यहां तक जरूर पहुंची थी।’ और अफवाह थी कि ‘मोगलाही टीशन पर गोरा सिपाही एक मोदी की बेटी को उठाकर ले गए। इसी को लेकर सिख और गोरे सिपाहियों में लड़ाई हो गई, गोली चल गई। ढोलबाजा में पूरे गांव को घेरकर आग लगा दी गई, एक बच्चा भी बचकर नहीं निकल सका। मुसहरू के ससुर ने अपनी आंखों से देखा था-ठीक आग में भूनी गई मछलियों की तरह लोगों की लाशें महीनों पड़ी रहीं, कौआ भी नहीं खा सकता था; मलेटरी का पहरा था। मुसहरू के ससुर का भतीजा फारबिस साहब का खानसामा है; वह झूठ बोलेगा?’
कहने की जरूरत नहीं कि अफवाहों के सबसे ज्यादा किस्से महात्मा गांधी को लेकर हैं। शाहिद अमीन एवं हसन इमाम ने गांधी की ‘चमत्कारी’ शक्तियों से संबंधित कुछ रोचक बातों का उल्लेख करते हुए कहा है कि ये चमत्कारी शक्तियाँ ही गांधी को महात्मा बनाती हैं। लोग मानते थे कि गांधी को उनकी इच्छा के विरुद्ध अंग्रेजी सरकार भी जेल में बंद नहीं रख सकती थी, कि उनमें ‘चमत्कारी’ शक्ति थी और वे इस शक्ति की बदौलत जब चाहते थे जेल का फाटक खुल जाता था और वे बाहर निकल जाते थे। इसी आशय का एक हरियाणवी लोकगीत है-‘एक जलेबी तेल में।/गांधी भेज्या जेल में।।/जेल का फाटक गिया टूट।/गांधी आया फोरन छूट।।’ सतीनाथ भादुड़ी का उपन्यास ‘ढोडायचरितमानस’ भी इस लोकधारणा का उल्लेख करता है, ‘‘सहसा खबर आती है कि गान्ही बाबा जिरानिया आ रहे हैं ‘साभा’ करने। उन्हें थोड़े ही कोई जेल में भर्ती कर रख सकता है! एक ही मन्तर से वे ताला और दीवाल तोड़कर बाहर चले आते हैं।’ ताना भगत, गांधी के अनन्य अनुयायी थे। उनकी धारणा थी कि गांधीजी की अहिंसा के प्रताप से सांप भी हिंसा पर उतारू नहीं हो सकता। अपने इसी विश्वास के बल पर उन्होंने अपने घर में विषैले सांप पाल रखे थे। करीब डेढ़ सौ विषैले सांप वे अपने मकान में टोकरी के अंदर रखते थे। ‘मैला आँचल’ में मठ के महंथ सेवादास को ‘सतगुरु साहेब’ सपने में दर्शन देते हैं और गांधीजी की पैरवी करते हैं। कहते हैं, ‘तुम्हारे गाँव में परमारथ का कारज हो रहा है और तुमको मालूम नहीं? गाँधी तो मेरा ही भगत है। गाँधी इस गाँव में इसपिताल खोलकर परमारथ का कारज कर रहा है। तुम सारे गाँव को एक भंडारा दे दो।’
आमजन के बीच गांधीजी की छवि ‘करुणा के अवतार’ की थी। वे ‘इतने बड़े संत हैं कि आँगन के कोने का सरसों का पौधा अगर झाड़ू से दब जाय, तो उनका दिल रो उठता है।’ ‘मैला आँचल’ की लक्ष्मी कोठारिन बालदेव जी को समझाती है, ‘महतमा जी के पंथ को मत छोड़िए, बालदेव जी! महतमा जी अवतारी पुरुख हैं। ...जिस नैन से महतमा जी का दरसन किया है उसमें पाप को मत पैसने दीजिए। जिस कान से महतमा जी के उपदेस को सरबन किया है, उसमें माया की मीठी बोली को मत जाने दीजिए। महतमा जी सतगुरु के भगत हैं।’ बालदेव जी, गांधी के भक्त हैं। इतने बड़े कि उन पर ‘कभी-कभी महतमा जी का भर (देवी-देवता का सवार होना) होता है। चुन्नी गोसाईं को तो रोज भोर को होता है।’ गांधीजी की मृत्यु पर कमली की मां कहती है, ‘वे तो नर-रूप धारन कर आए थे...लीला दिखाकर चले गए।’ ‘ढोडायचरितमानस’ का बाबूलाल सबको समझा रहा है, ‘गान्ही बाबा बड़ा गुणी आदमी हैं। ...गान्ही बाबा मांस-मछली, नशा-भाँग से परहेज रखते हैं। शादी-ब्याह नहीं किया है, नंगे रहते हैं।’ ये क्या! ‘रबिया पागल की तरह चिल्लाता दौड़ा आ रहा है-कोंहड़े के ऊपर गान्ही बाबा! ...कोंहड़े के छिलके पर गान्ही बाबा की मूरत अंकित हो गई है।’ और अब तो रेबन गुनी कोंहड़े को प्रणाम करता है। फिर चिल्लाकर कह उठता है-‘लोहा मान लिया, लोहा मान लिया मैंने गान्ही बाबा का।’ ‘कलियुग के रघुनाथ हैं महात्माजी।’
मेरीगंज से पुरैनिया जुलूस में जा रहे लोगों को पता है कि ‘जिसके हाथ में गन्ही महतमा का झंडा रहता है, उससे गाटबाबू, चिकिहरबाबू, टिकस नहीं माँगता है।’
1921 में फैजाबाद जिले में कुछ किसानों ने एक ताल्लुकेदार का माल असबाब लूट लिया। इन गरीब किसानों से कहा गया था कि महात्मा गांधी चाहते हैं कि वे लूट लें; और उन्होंने ‘महात्मा गांधी की जय!’ का नारा लगाते हुए इस 'आदेश का पालन' किया। और इस जनता को गांधी के बारे में कोई जानकारी नहीं है-‘कहाँ रहते हैं महात्माजी!...पक्की जहां खत्म हुई है, उससे भी काफी दूर, मुंगेर तारापुर, अयोध्या जी से भी दूर।’
1917 में गांधी जब चंपारण आए तो ‘चमत्कारी शक्तियां’ भी उनके साथ आयीं। गांधी का ‘नया मालिक’ के रूप में स्वागत किया गया। राजकुमार शुक्ल ने प्रचारित किया कि वे ‘ईश्वर का अवतार’ हैं तथा गोरे अंग्रेजों से भारतमाता की मुक्ति के लिए भेजे गये हैं। किसान मानकर चल रहे थे कि किसी ‘भगवान’ ही को ‘बड़का बड़का वकील लोग’ का समर्थन प्राप्त हो सकता है जिनके पास अबतक अपना दुखड़ा रोने के लिए भी उन्हें फीस की मोटी रकम देनी पड़ रही थी। डी. जी. तेंदुलकर बिहार के एक गांव की ऐसी ही मजेदार कहानी का जिक्र करते हैं। एक बुढ़िया गांधीजी के समीप आई और बोली-‘महाराज, मेरी उम्र 104 वर्ष की है और आंखों की नजर धुंधली हो चुकी है। मैंने बहुत सारे तीर्थस्थानों का भ्रमण किया है। मेरे खुद के घर में दो मंदिर स्थापित हैं। मेरे जानते राम और कृष्ण-दो ही अवतार थे। मैंने सुना है कि अब गांधी भी एक अवतार हैं। जबतक मैं उन्हें देख नहीं लेती हूं, मेरे प्राण अंटके रहेंगे।’
चंपारण पहुंचकर गांधी ने खुद स्वीकार किया कि ‘शायद ईश्वर ने मुझे निमित्त बनाया’। बेतिया के आसपास के इलाकों में पेड़-पौधों से लेकर छप्पर के कोंहड़ा-कद्दू तक पर गांधी की आकृति उभरने लगी। इन सब की जड़ में लोगों का यह विश्वास था कि गांधी कोई साधारण आदमी नहीं बल्कि ‘अवतारी पुरुष’ हैं। गांधी को आदमी से अवतारी पुरुष बनाने में अफवाह की खासी भूमिका रही है-‘गांधी कहै, गांधी कहै, मन चित्त लाइको।/गंगा सरजू चाहे कूपा पर नहाइ के।/लिहले अवतार एही देशवा में आइ के।’ महात्मा गांधी को अवतार मानकर उनकी तुलना राम और कृष्ण से की गई है। राम के साथ वानर सेना और लक्ष्मण थे। श्रीकृष्ण के ग्वाल-बाल तथा बलराम थे। गांधी के साथ जनता है और जवाहर हैं। रावण और कंसरूपी अन्यायी राज्य को हटाने ही गांधी आए हैं-‘अवतार महात्मा गांधी कै,/भारत के भार उतारै काँ,/सिरी राम मारे रावण काँ,/गांधी जी जग माँ परगट भये,/अन्यायी राज्य हटावै काँ,/अवतार महात्मा गांधी कै,/भारत कै भार उतारै काँ’। ब्रज के एक लोकगीत में भी गांधी को अवतार बताया गया है-‘अवतार महात्मा गांधी हैं भारत को भार उतारन को/सिरीराम ने रावण मारा था, कान्हा ने कंस पछाड़ा था/अब गांधी ने अवतार लिया इन अंगरेजन के मारन को/सिरी राम के हाथ में धनुष बाण, कान्हा के हाथ सुदर्शन था/गांधी के हाथ में चरखा है, भारतवासिन के तारन को।’
मुल्कराज आनंद के उपन्यास ‘अनटचेबल’ के नायक बाखा को लगता है कि गांधी एक ऋषि हैं, विष्णु के अवतार हैं। लोग हजारों की संख्या में दूर-दराज से उन्हें सुनने के लिए आने लगे, रेलवे-स्टेशन पर घंटों उनकी प्रतीक्षा में इंतजार करने लगे या राजपथ पर गांधीजी के एक क्षण के दर्शन के लिए प्रचंड गर्मी या बर्फीली हवा को सहते रहे।
इस तरह, हम पाते हैं कि आम औपनिवेशिक भारतीय मन पर इतिहास की घटनाओं के साथ-साथ अफवाह का भी असर रहा है। हमारी चेतना के निर्माण में इसकी भूमिका रही है।