वैदिक काल में गाय का आर्थिक महत्त्व था। यह वस्तु की कीमत भी व्यक्त करती थी, इसलिए वस्तु विनिमय पद्धति के दौर में गाय विनिमय का भी साधन थी। गाय आरंभिक दौर में पालतू बनाये गए पशुओं में से एक है। जिस तरह आज किसी 'विशिष्ट'अतिथि के आगमन पर मुर्गा, खस्सी आदि का मांस खिलाते हैं, वैदिक काल में 'ब्राह्मण' अथवा 'विशिष्ट' अतिथि के स्वागत में गायें मारी जाती थीं। (ब्लूमफील्ड, अमेरिकन जर्नल ऑव फिलोलॉजी, पृष्ठ 17, 426; वेदिक इंडेक्स, पृष्ठ 15) ये विशिष्ट अतिथि प्रायः ब्राह्मण और देवता होते थे, क्योंकि गोमांस-भक्षण के साथ किसी की सामाजिक हैसियत जुड़ी हुई थी। आप कह ले सकते हैं कि गोमांस-भक्षण पर एक तरह से ब्राह्मणों का एकाधिकार था। 'ऋग्वेद' में देवताओं के लिए बैल का माँस पकाने की ओर कई संकेत किये गये हैं; उदाहरणार्थ, इंद्र कहता है-'मेरे लिए 15+20 बैल पकाते हैं।' (ऋग्वेद 10/86/14, 10/27/2)। 'ऋग्वेद' में आया है कि अग्नि के लिए घोड़ों, बैलों, सांडों, बांझ गायों एवं भेड़ों की बलि दी गयी है- 'यस्मिन्नश्वास ऋषभास उक्षणो वशा मेषा अव सृष्टास आहुताः। कीलालपे सोमपृष्ठाय वेधसे हृदा मतिं जनये चारुमग्नये।।' (ऋग्वेद, 10/91/14) याज्ञवल्क्यस्मृति (1/109) ने ब्राह्मण अतिथि के लिए एक बड़े बैल एवं बकरे को काटने की व्यवस्था दी है। फिर यह श्रुतिवाक्य है कि मित्र एवं वरुण के लिए अनुबंध्या (बांझ गाय) काटी जानी चाहिए। (पी वी काणे, धर्मशास्त्र का इतिहास, द्वितीय भाग, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, 1992, पृष्ठ 873) 'अतिथि' को ऋग्वेद में 'गोघ्न' अर्थात 'गाय की हत्या करनेवाला' कहा गया है। ठीक इसी तरह की बात आज हमारे गांव-घर में भी सुनने को मिलती है। मेरे आसपास एक कहावत मशहूर है-'मांस-भात घरैता खाय, हत्या लेले पाहुन जाय'।
कहने की जरूरत नहीं कि गोमांस को लेकर वैदिक संस्कृति के आचार्यों के बीच लंबी बहस चली है। कुछ ने तो इसकी पाबंदी को अनिष्टकारी तक बताया है। खैर, तो वैदिक काल में आर्थिक महत्त्व के चलते गाय को न मारे जाने की बात भी मिलती है। गौ को 'अघ्न्या' (ऋग्वेद 1/164/27 एवं 40, 4/1/6, 5/83/8, 8/69/21, 10/87/16) भी कहा गया है, जिसका अर्थ निरुक्त (10/43) ने यों लगाया है-'अघ्न्या अहन्तव्या भवति अघघ्नी इति वा', अर्थात 'वह जो मारे जाने योग्य नहीं है।' कभी-कभी अघ्न्या शब्द धेनु के विरोध में भी प्रयुक्त हुआ है (ऋग्वेद 4/1/6, 8/69/2), अतः यह तर्क उपस्थित किया जा सकता है कि ऋग्वेद के काल में दूध देनेवाली गायें काटे जाने योग्य नहीं मानी जाती थीं। इसी तर्क के आधार पर गायों के प्रति प्रशंसात्मक सूक्तों का भी अर्थ लगा सकते हैं। (यथा ऋग्वेद 6/28/1-8 एवं 8/101/15 एवं 16)।
'ऋग्वेद' (8/101/15-16) में गाय को रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, आदित्यों की बहिन एवं अमृत का केंद्र माना गया है और ऋषि ने अंत में कहा है-'गाय की हत्या न करो, यह निर्दोष है और स्वयं अदिति है।' ऋग्वेद (8/101/16) में गाय को देवी भी कहा गया है। इससे प्रकट होता है कि गाय क्रमशः देवत्व को प्राप्त होती जा रही थी। दूध के विषय में गाय की अत्यधिक महत्ता, कृषि में बैलों की उपयोगिता तथा परिवार में आदान-प्रदान एवं विनिमय संबंधी अर्थनीतिक उपयोगिता एवं महत्ता के कारण गाय को देवत्व प्राप्त हो गया। अथर्ववेद (12/4) में भी गाय की पूतता (पवित्रता) मानी गयी है। ब्राह्मण ग्रन्थों से पता चलता है कि तब तक गाय की बलि दी जाती थी।
ऋग्वेद में 16 बार गाय को 'अघ्न्या' अर्थात 'न मारे जाने योग्य' कहा गया है। स्वाभाविक है कि लाभकारी गाय को कौन मारना चाहेगा? अलाभकारी अर्थात बच्चा न देनेवाली गायें मारी जाती थीं। जैसे आज अलाभकारी गायों को किसान पंडिजी को दान में दे देते हैं अथवा हल जोतने के काम में लगा दिया जाता है। किसानों के पास इसके तर्क हैं। बताते हैं कि हल में लगाने से 'नाठी' गायें भी बच्चे जनने लगती हैं। अपने गांव के इन किसानों की बुद्धि मुझे भाजपा नेताओं की बुद्धि से ज्यादा व्यावहारिक लगती है।
गाय का आर्थिक महत्त्व होने की वजह से संस्कृत भाषा के अधिकतर शब्द भी 'गो' शब्द से बने मिलते हैं। बौद्ध काल में चूकि गहन खेती होने लगी, पशुधन की जरूरत महसूस हुई। इसलिए बौद्ध धर्म के प्रवर्तक बुद्ध ने 'युग की मांग' को देखते हुए अहिंसा पर जोर देना शुरू किया। बुद्ध की अहिंसा में भी गाय ही की प्रधानता रही क्योंकि बैल उसी से प्राप्त हो सकते थे। अहिंसा में बुद्ध का विवेक शामिल था। उसने मरे हुए जानवर का मांस खाने से लोगों को कभी नहीं रोका। बुद्ध एवं बौद्ध भिक्षा में मांस भी स्वीकार करते थे। सूअर का मांस खाकर बुद्ध के मरने की बात हम जानते हैं। यह अहिंसा बाद में रूढ़ि बन गई और गाय को पूजने की 'अविवेकी परम्परा' ने जन्म लिया। आज गाय माता- पिता से ज्यादा पूज्य हो गयी है। माता-पिता वृद्धाश्रम खदेड़ दिये गये हैं और गोमाता हमारे ड्राइंग रूम, हमारे दिमाग में बैठी हैं। हमें समय रहते समझना होगा कि मनुष्य से पशु को श्रेष्ठ बताना पशुता है, मनुष्यता नहीं।
गाय का महत्त्व हमारे धर्मग्रंथों में भी वर्णित है। भैंस आदि जानवरों से हमारे धार्मिक साहित्य के लेखक परिचित नहीं थे, इसलिए वह महत्त्व उन्हें न मिल सका। आर्य घोड़े से परिचित थे, इसलिए घोड़ा भी महत्त्व का हुआ। घोड़े भी खाए जाते हैं। गाय चूँकि ब्राह्मणों को दानस्वरूप भी दी जाती थी, गाय और ब्राह्मण एक हो गए। दोनों ही 'अवध्य' हैं, पूज्य हैं। जो धर्मग्रन्थ बौद्ध धर्म के बाद लिखे गए, ऐसा कहते हैं। वेद आदि में ऐसा नहीं है। यह सब बौद्ध प्रभाव में, और मुसलमानों के आगमन के बाद 'इस्लाम की प्रतिक्रिया' में हुआ। आज भी जो गोमाता की राजनीति हो रही है, उसमें 'प्रेम' नहीं, 'घृणा' ही है।
गाय की चिंता किसे है?
पांडेय बेचन शर्मा उग्र की एक कहानी है जिसका शीर्षक 'मूर्खा' है। कहानी में गुलाबो अम्मा हैं जिनके तीन बेटे हैं-रामेश्वर कांग्रेसी, कामेश्वर कम्युनिस्ट और दामोदर हिन्दूसभाई। कम्युनिस्ट लड़के कामेश्वर ने कभी तीस रुपये में एक गाय खरीदी थी। बूढ़ी हो जाने पर 'अर्थ-पिशाच-युग के प्राणी' अर्थात कम्युनिस्ट को गाय अनुपयोगी लगने लगती है। अतः वह उसे कसाई के हाथों बेच देने की गुलाबो अम्मा से अनुमति चाहता है। कांग्रेसी बेटा रामेश्वर भी अम्मा को समझाता है, 'अम्मा, जमाना महंगाई का है और इस गाय पर रुपया-सवा रुपया रोज़ सर्फ़ा पड़ जाता है।' (श्रेष्ठ रचनाएं, पृष्ठ 32) हिंदूसभाई दामोदर सबसे चपड़ निकला। 'उसने तय किया गुलाबो अम्मा के सो जाने पर, आधी रात में गाय को नगर की सीमा से बाहर हाँक आने का।' (पृष्ठ 32) हिंदूसभाई लड़का सब पर बीस पड़ा। उसने खीझ भरे स्वर में कहा, 'उसके (गाय के) मारे सारे घर में गंदगी, जिधर देखो गोबर ही गोबर। सीधे से तुम इसे कभी न निकालतीं, सो मैंने सोचा रातोंरात बाहर हाँक आऊँ।' (वही) (हिंदूसभाई बेटे की बात से 'स्वच्छता अभियान' चला रहे भाजपाई की याद आती है।) उस घर में केवल गुलाबो अम्मा ही है जो लाभ-हानि, उपयोगिता-अनुपयोगिता के तराजू पर तौले बगैर संबंधों को जीना जानती है। कहानी में गाय प्रतीक भर हो सकती है, असली कथा तो बूढ़ी हो चली गुलाबो अम्मा की ही लगती है। अम्मा कहती है, 'यह भी परिवार का प्राणी है, काल-गति से वैसे ही कमजोर बनी हुई, जैसे कि मैं हूँ।' (वही)
फेसबुकिया गोभक्ति
मेरे पड़ोस में एक राय जी रहते हैं। पटने की चालू जुबान में दूध बेचनेवाले को लोग राय जी कहते हैं। राय जी के पास देशी-विदेशी मिलाकर छह गाय हैं। सुबह चार बजे से ही गायों की सेवा से उनकी दिनचर्या शुरू होती है और रात दस बजे के बाद समाप्त होती है जब वे सो चुके होते हैं। उनका उठना-बैठना, सोना-जागना सब गाय ही के हिसाब से होता है। गाय से ज्यादा वे गाय के गोबर से घिरे होते हैं। सड़े गोबर और गोमूत्र की दुर्गन्ध से पड़ोसी हिंदुओं की नाक फटी जाती है। सब राय जी से चिढ़े रहते हैं। वे इनके दूध का भी सेवन नहीं करते। सुधा और राज का पाउच खरीदकर लाते हैं। ग्राहक बिना बच्चेवाली गाय का दूध लेना पसंद नहीं करते और बच्चे राय जी के लिए साक्षात विपत्ति हैं। गाय अगर बछिया जनमती है तब तो ठीक। साल दो साल की सेवा के बाद राय जी को एक अतिरिक्त गाय हाथ आ जाती है। लेकिन गोमाता ने अगर बछड़े को जन्म दिया तो राय जी की परेशानी बढ़ जाती है। एक ग्राहक का दूध तो बछड़ा ही गटक जाता है। खुद के बच्चे को दूध के लाले पड़ जायेंगे। गाय के बच्चे के मुंह में नहीं, राय जी के बच्चे के मुंह में जाब लगेंगे। इसलिए राय जी 'फेसबुकिया गोभक्ति' भूलकर जीवन का बीजगणित अपनाने को बाध्य होते हैं। बछड़े को दूध के बदले माड़ मिलना शुरू हो जाता है। एक तो अब के भात में माड़ के यूँ ही दर्शन नहीं होते। फिर एक से अधिक बछड़े रहे तो गौपुत्र को हवा पीकर ही जीवन गुजारना पड़ता है। हवा पीकर कोई कितने दिन जीवन की नैया खे सकता है? गौपुत्र बेचारे असमय ही जीवनलीला समाप्त कर लेते हैं।