Tuesday, September 15, 2026

भारत की गाय संस्कृति

वैदिक काल में गाय का आर्थिक महत्त्व था। यह वस्तु की कीमत भी व्यक्त करती थी, इसलिए वस्तु विनिमय पद्धति के दौर में गाय विनिमय का भी साधन थी। गाय आरंभिक दौर में पालतू बनाये गए पशुओं में से एक है। जिस तरह आज किसी 'विशिष्ट'अतिथि के आगमन पर मुर्गा, खस्सी आदि का मांस खिलाते हैं, वैदिक काल में 'ब्राह्मण' अथवा 'विशिष्ट' अतिथि के स्वागत में गायें मारी जाती थीं। (ब्लूमफील्ड, अमेरिकन जर्नल ऑव फिलोलॉजी, पृष्ठ 17, 426; वेदिक इंडेक्स, पृष्ठ 15) ये विशिष्ट अतिथि प्रायः ब्राह्मण और देवता होते थे, क्योंकि गोमांस-भक्षण के साथ किसी की सामाजिक हैसियत जुड़ी हुई थी। आप कह ले सकते हैं कि गोमांस-भक्षण पर एक तरह से ब्राह्मणों का एकाधिकार था। 'ऋग्वेद' में देवताओं के लिए बैल का माँस पकाने की ओर कई संकेत किये गये हैं; उदाहरणार्थ, इंद्र कहता है-'मेरे लिए 15+20 बैल पकाते हैं।' (ऋग्वेद 10/86/14, 10/27/2)। 'ऋग्वेद' में आया है कि अग्नि के लिए घोड़ों, बैलों, सांडों, बांझ गायों एवं भेड़ों की बलि दी गयी है- 'यस्मिन्नश्वास ऋषभास उक्षणो वशा मेषा अव सृष्टास आहुताः। कीलालपे सोमपृष्ठाय वेधसे हृदा मतिं जनये चारुमग्नये।।' (ऋग्वेद, 10/91/14) याज्ञवल्क्यस्मृति (1/109) ने ब्राह्मण अतिथि के लिए एक बड़े बैल एवं बकरे को काटने की व्यवस्था दी है। फिर यह श्रुतिवाक्य है कि मित्र एवं वरुण के लिए अनुबंध्या (बांझ गाय) काटी जानी चाहिए। (पी वी काणे, धर्मशास्त्र का इतिहास, द्वितीय भाग, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, 1992, पृष्ठ 873) 'अतिथि' को ऋग्वेद में 'गोघ्न' अर्थात 'गाय की हत्या करनेवाला' कहा गया है। ठीक इसी तरह की बात आज हमारे गांव-घर में भी सुनने को मिलती है। मेरे आसपास एक कहावत मशहूर है-'मांस-भात घरैता खाय, हत्या लेले पाहुन जाय'। 

कहने की जरूरत नहीं कि गोमांस को लेकर वैदिक संस्कृति के आचार्यों के बीच लंबी बहस चली है। कुछ ने तो इसकी पाबंदी को अनिष्टकारी तक बताया है। खैर, तो वैदिक काल में आर्थिक महत्त्व के चलते गाय को न मारे जाने की बात भी मिलती है। गौ को 'अघ्न्या' (ऋग्वेद 1/164/27 एवं 40, 4/1/6, 5/83/8, 8/69/21, 10/87/16) भी कहा गया है, जिसका अर्थ निरुक्त (10/43) ने यों लगाया है-'अघ्न्या अहन्तव्या भवति अघघ्नी इति वा', अर्थात 'वह जो मारे जाने योग्य नहीं है।' कभी-कभी अघ्न्या शब्द धेनु के विरोध में भी प्रयुक्त हुआ है (ऋग्वेद 4/1/6, 8/69/2), अतः यह तर्क उपस्थित किया जा सकता है कि ऋग्वेद के काल में दूध देनेवाली गायें काटे जाने योग्य नहीं मानी जाती थीं। इसी तर्क के आधार पर गायों के प्रति प्रशंसात्मक सूक्तों का भी अर्थ लगा सकते हैं। (यथा ऋग्वेद 6/28/1-8 एवं 8/101/15 एवं 16)।

'ऋग्वेद' (8/101/15-16) में गाय को रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, आदित्यों की बहिन एवं अमृत का केंद्र माना गया है और ऋषि ने अंत में कहा है-'गाय की हत्या न करो, यह निर्दोष है और स्वयं अदिति है।' ऋग्वेद (8/101/16) में गाय को देवी भी कहा गया है। इससे प्रकट होता है कि गाय क्रमशः देवत्व को प्राप्त होती जा रही थी। दूध के विषय में गाय की अत्यधिक महत्ता, कृषि में बैलों की उपयोगिता तथा परिवार में आदान-प्रदान एवं विनिमय संबंधी अर्थनीतिक उपयोगिता एवं महत्ता के कारण गाय को देवत्व प्राप्त हो गया। अथर्ववेद (12/4) में भी गाय की पूतता (पवित्रता) मानी गयी है। ब्राह्मण ग्रन्थों से पता चलता है कि तब तक गाय की बलि दी जाती थी।

ऋग्वेद में 16 बार गाय को 'अघ्न्या' अर्थात 'न मारे जाने योग्य' कहा गया है। स्वाभाविक है कि लाभकारी गाय को कौन मारना चाहेगा? अलाभकारी अर्थात बच्चा न देनेवाली गायें मारी जाती थीं। जैसे आज अलाभकारी गायों को किसान पंडिजी को दान में दे देते हैं अथवा हल जोतने के काम में लगा दिया जाता है। किसानों के पास इसके तर्क हैं। बताते हैं कि हल में लगाने से 'नाठी' गायें भी बच्चे जनने लगती हैं। अपने गांव के इन किसानों की बुद्धि मुझे भाजपा नेताओं की बुद्धि से ज्यादा व्यावहारिक लगती है।

गाय का आर्थिक महत्त्व होने की वजह से संस्कृत भाषा के अधिकतर शब्द भी 'गो' शब्द से बने मिलते हैं। बौद्ध काल में चूकि गहन खेती होने लगी, पशुधन की जरूरत महसूस हुई। इसलिए बौद्ध धर्म के प्रवर्तक बुद्ध ने 'युग की मांग' को देखते हुए अहिंसा पर जोर देना शुरू किया। बुद्ध की अहिंसा में भी गाय ही की प्रधानता रही क्योंकि बैल उसी से प्राप्त हो सकते थे। अहिंसा में बुद्ध का विवेक शामिल था। उसने मरे हुए जानवर का मांस खाने से लोगों को कभी नहीं रोका। बुद्ध एवं बौद्ध भिक्षा में मांस भी स्वीकार करते थे। सूअर का मांस खाकर बुद्ध के मरने की बात हम जानते हैं। यह अहिंसा बाद में रूढ़ि बन गई और गाय को पूजने की 'अविवेकी परम्परा' ने जन्म लिया। आज गाय माता- पिता से ज्यादा पूज्य हो गयी है। माता-पिता वृद्धाश्रम खदेड़ दिये गये हैं और गोमाता हमारे ड्राइंग रूम, हमारे दिमाग में बैठी हैं। हमें समय रहते समझना होगा कि मनुष्य से पशु को श्रेष्ठ बताना पशुता है, मनुष्यता नहीं।

गाय का महत्त्व हमारे धर्मग्रंथों में भी वर्णित है। भैंस आदि जानवरों से हमारे धार्मिक साहित्य के लेखक परिचित नहीं थे, इसलिए वह महत्त्व उन्हें न मिल सका। आर्य घोड़े से परिचित थे, इसलिए घोड़ा भी महत्त्व का हुआ। घोड़े भी खाए जाते हैं। गाय चूँकि ब्राह्मणों को दानस्वरूप भी दी जाती थी, गाय और ब्राह्मण एक हो गए। दोनों ही 'अवध्य' हैं, पूज्य हैं। जो धर्मग्रन्थ बौद्ध धर्म के बाद लिखे गए, ऐसा कहते हैं। वेद आदि में ऐसा नहीं है। यह सब बौद्ध प्रभाव में, और मुसलमानों के आगमन के बाद 'इस्लाम की प्रतिक्रिया' में हुआ। आज भी जो गोमाता की राजनीति हो रही है, उसमें 'प्रेम' नहीं, 'घृणा' ही है।

गाय की चिंता किसे है?

पांडेय बेचन शर्मा उग्र की एक कहानी है जिसका शीर्षक 'मूर्खा' है। कहानी में गुलाबो अम्मा हैं जिनके तीन बेटे हैं-रामेश्वर कांग्रेसी, कामेश्वर कम्युनिस्ट और दामोदर हिन्दूसभाई। कम्युनिस्ट लड़के कामेश्वर ने कभी तीस रुपये में एक गाय खरीदी थी। बूढ़ी हो जाने पर 'अर्थ-पिशाच-युग के प्राणी' अर्थात कम्युनिस्ट को गाय अनुपयोगी लगने लगती है। अतः वह उसे कसाई के हाथों बेच देने की गुलाबो अम्मा से अनुमति चाहता है। कांग्रेसी बेटा रामेश्वर भी अम्मा को समझाता है, 'अम्मा, जमाना महंगाई का है और इस गाय पर रुपया-सवा रुपया रोज़ सर्फ़ा पड़ जाता है।' (श्रेष्ठ रचनाएं, पृष्ठ 32) हिंदूसभाई दामोदर सबसे चपड़ निकला। 'उसने तय किया गुलाबो अम्मा के सो जाने पर, आधी रात में गाय को नगर की सीमा से बाहर हाँक आने का।' (पृष्ठ 32) हिंदूसभाई लड़का सब पर बीस पड़ा। उसने खीझ भरे स्वर में कहा, 'उसके (गाय के) मारे सारे घर में गंदगी, जिधर देखो गोबर ही गोबर। सीधे से तुम इसे कभी न निकालतीं, सो मैंने सोचा रातोंरात बाहर हाँक आऊँ।' (वही) (हिंदूसभाई बेटे की बात से 'स्वच्छता अभियान' चला रहे भाजपाई की याद आती है।) उस घर में केवल गुलाबो अम्मा ही है जो लाभ-हानि, उपयोगिता-अनुपयोगिता के तराजू पर तौले बगैर संबंधों को जीना जानती है। कहानी में गाय प्रतीक भर हो सकती है, असली कथा तो बूढ़ी हो चली गुलाबो अम्मा की ही लगती है। अम्मा कहती है, 'यह भी परिवार का प्राणी है, काल-गति से वैसे ही कमजोर बनी हुई, जैसे कि मैं हूँ।' (वही)

फेसबुकिया गोभक्ति

मेरे पड़ोस में एक राय जी रहते हैं। पटने की चालू जुबान में दूध बेचनेवाले को लोग राय जी कहते हैं। राय जी के पास देशी-विदेशी मिलाकर छह गाय हैं। सुबह चार बजे से ही गायों की सेवा से उनकी दिनचर्या शुरू होती है और रात दस बजे के बाद समाप्त होती है जब वे सो चुके होते हैं। उनका उठना-बैठना, सोना-जागना सब गाय ही के हिसाब से होता है। गाय से ज्यादा वे गाय के गोबर से घिरे होते हैं। सड़े गोबर और गोमूत्र की दुर्गन्ध से पड़ोसी हिंदुओं की नाक फटी जाती है। सब राय जी से चिढ़े रहते हैं। वे इनके दूध का भी सेवन नहीं करते। सुधा और राज का पाउच खरीदकर लाते हैं। ग्राहक बिना बच्चेवाली गाय का दूध लेना पसंद नहीं करते और बच्चे राय जी के लिए साक्षात विपत्ति हैं। गाय अगर बछिया जनमती है तब तो ठीक। साल दो साल की सेवा के बाद राय जी को एक अतिरिक्त गाय हाथ आ जाती है। लेकिन गोमाता ने अगर बछड़े को जन्म दिया तो राय जी की परेशानी बढ़ जाती है। एक ग्राहक का दूध तो बछड़ा ही गटक जाता है। खुद के बच्चे को दूध के लाले पड़ जायेंगे। गाय के बच्चे के मुंह में नहीं, राय जी के बच्चे के मुंह में जाब लगेंगे। इसलिए राय जी 'फेसबुकिया गोभक्ति' भूलकर जीवन का बीजगणित अपनाने को बाध्य होते हैं। बछड़े को दूध के बदले माड़ मिलना शुरू हो जाता है। एक तो अब के भात में माड़ के यूँ ही दर्शन नहीं होते। फिर एक से अधिक बछड़े रहे तो गौपुत्र को हवा पीकर ही जीवन गुजारना पड़ता है। हवा पीकर कोई कितने दिन जीवन की नैया खे सकता है? गौपुत्र बेचारे असमय ही जीवनलीला समाप्त कर लेते हैं।

Monday, September 14, 2026

संपादक की यात्रा

आप भारत में हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास देखेंगे तो कल और आज का अंतर समझ में आएगा। एक समय था जब अखबार का सारा दारोमदार संपादक के ऊपर होता था। साक्षरता कम होने की वजह से लेखक और पाठक दोनों का मिलना मुश्किल था। पाठकों की कमी का रोना नया नहीं है। एक संपादक को अखबार की ज्यादातर सामग्री खुद ही तैयार करनी होती थी। कभी-कभी तो पूरा का पूरा अखबार एक अकेला संपादक ही लिख मारता था। आनन्दकादम्बिनी के संपादक बद्रीनारायण चैधरी लगभग पूरा अखबार खुद ही रंग डालते थे। 1904-5 के दिनों तक 'सरस्वती' ’मासिक पुस्तक’ ही बनी रहती है और जिसका अभिप्रेत था कि जरूरत पड़ने पर एक अकेला आदमी अर्थात् संपादक नाम का जीव ही सारे लेख लिख डाले। भारतेन्दु इसे पत्रकार-कला के विरुद्ध मानते थे, इसलिए 'आनन्दकादम्बिनी' के संपादक को लिखा था : ’जनाब यह किताब नहीं है कि जो आप इकेले ही इकराम करते हैं बल्कि अखबार है कि जिसमें अनेक-जन-लिखित लेख होना आवश्यक है और यह भी जरूरत नहीं कि सब एक ही तरह के लिखक्कड़ हो।’ (रामरतन भटनागर, भारतेन्दु हरिश्चंद्र : एक अध्ययन, किताब महल, इलाहाबाद, 1947, पृष्ठ 106-7)

अखबार में तब संपादक के कई नाम चलते थे। अलग-अलग नामों से संपादक अपने अखबार में लिखने को अभिशप्त होता था। महावीर प्रसाद द्विवेदी 'सरस्वती' छोड़ने के बाद भी भिन्न नाम से लेख लिखा करते थे। बिहार के 'बिहार बन्धु' के संपादक केशव राम भट्ट ने तब की मुश्किलों का वर्णन करते लिखा है कि लेख, विज्ञापन और समाचार लिखने से लेकर प्रूफ देखने तक का सारा काम संपादक का होता था। इस स्थिति को बिहार बन्धु की एक टिप्पणी से बेहतर समझा जा सकता है। 'बिहार बन्धु' ने 'लक्ष्मी उपदेश लहरी' का स्वागत करते हुए लिखा था : ‘‘जून की संख्या हमारे हाथ में है। ...एक बात इसमें देखकर हमें आश्चर्य हुआ। जब टाइटिल पेज पर सम्पादक का नाम बाबू शब्द के साथ लिखा ही हुआ है तब हर सम्पादकीय लेख के नीचे ‘सम्पादक’ या ‘सम्पादक महाशय’ का उपनाम ‘दीन’ लिखने की क्या जरूरत है? क्या एक जगह नाम रहने से सम्पादक महाशय को सन्तोष नहीं होता?’’ (बिहार बन्धु, 6 जुलाई, 1907, पृष्ठ 3; पंडित रामजी मिश्र मनोहर, बिहार में हिन्दी पत्रकारिता का विकास, के पी जायसवाल शोध संस्थान, पटना, पृष्ठ 126)

1995 के दिनों में भी पटना से कुछ अखबार ऐसे ही निकलते थे। इन दिनों 'अमृतवर्षा' नाम का दैनिक अखबार यहाँ से निकला करता था। एक दिन वहां गया तो देखा कि एक आदमी कुर्सी पर बैठा धांय-धांय लिखे जा रहा है। नाम था प्रह्लाद भगत। बाद में ये एकलव्य एड्यूकेशनल काम्प्लेक्स में हिंदी शिक्षक हुए। बाद में मैं भी वहां काम करने लगा तो अमृतवर्षा के उनके अनुभव को जानने का मौका मिला। वे जबतक वहां रहे, लगभग अकेले ही अखबार निकालते रहे।

लेखक पैदा करनेवाले पहले संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी थे। कैसे-कैसे लोगों को और किस विधि से उन्होंने 'सरस्वती' के लिए एक लेखक-समूह पैदा किया, जगजाहिर है। मैथिलीशरण गुप्त का किस्सा तो मशहूर है ही। इतिहासविद् काशी प्रसाद जायसवाल के साथ दिनकर की बैठकी खूब जमती थी। उनसे जुड़े कई रोचक संस्मरण हैं। एक शाम जायसवाल जी और दिनकर ‘गप्प-शप्प’ के मूड में बैठे थे। जायसवाल जी ने शुरुआत की, ‘हिंदी में केवल दोय कवि भये।’ दिनकर ने पूछा, ‘वे कौन हैं भला?’ उन्होंने कहा, ‘एक तो वही चंद, और दूसरा यही हरिचंद।’ दिनकर ने अकचकाकर पूछा, ‘और तुलसीदास?’ वे बोले, ‘अरे, तुलसिया भी कौनो कवि रहा? उसकी तो बंदरवा न सुधार देता रहा जैसे गुप्तवा की महविरवा।’ प्रसिद्ध है कि तुलसीदास की अधूरी कविताओं को हनुमान जी पूर्ण कर देते थे और इधर तो सर्वविदित ही है कि मैथिलीशरण जी की कविताओं का संशोधन पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी किया करते थे। (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 8)

पद्मसिंह शर्मा ने महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पत्र में लिखा था, ’आजकल के संपादकों के संपादन से जब आपके संपादन की तुलना करता हूँ तो अंतरम् महदन्तरम् प्रतीत होता है। एक बार आपने स्वामी सत्यदेव के प्रसंग में कहा था कि कच्चा माल मांगकर उसे व्यवहारोपयुक्त बनाना पड़ता है। बात बिल्कुल ठीक थी। आजकल तो हिन्दी के अनेक संपादक कच्चे माल में भी कूड़ा-करकट मिलाकर उसे भद्दा बना देते हैं। शब्द-शुद्धि की ओर तो ध्यान नहीं देते, या ज्ञान ही नहीं रखते।’ (पद्मसिंह शर्मा के पत्र, आत्माराम एन्ड संस, 1956, पृष्ठ 221) एक बार सरस्वती में कवि विशाखदत्त-प्रणीत 'मुद्राराक्षस' नाटक पर एक लेख छपने को आया था। उसे देखकर द्विवेदी जी ने छापना स्वीकार कर लिया था। उसमें जहाँ-तहाँ पेंसिल से उन्होंने संशोधन भी किया था। लेख के अंत में पेंसिल से एक नया वाक्य लिखा हुआ था। कंपोज होने से पहले उसे देखने का अवसर उक्त लेख के लेखक को मिल गया। उन्होंने द्विवेदी जी की संपादन-पटुता की प्रशंसा कर कहा कि इस अंतिम वाक्य से लेख में सजीवता आ गई है, संशोधन से लेख की श्रीवृद्धि हुई है। (द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ, पृष्ठ 547) इसी प्रकार एक बार 'सरस्वती' की एक कविता में, कंपोज होने से पूर्व, एक प्रसिद्ध कवि की रचना में से साढ़े तीन पद्य साफ निकाल दिए हैं और अपनी ओर से आधा पद्य जोड़कर रचना के प्रवाह को यथापूर्व कर दिया है। (वही)

अखबार निकल जाने के बाद ग्राहक और पाठक बनाना भी संपादक ही का काम होता। आचार्य शुक्ल ने लिखा है: ‘‘उस समय हिंदी संवाद-पत्र पढ़नेवाले थे ही नहीं। पाठक उत्पन्न करने के लिए बाबू कार्तिकप्रसाद ने बहुत दौड़-धूप की थी। लोगों के घर जा-जाकर वे पत्र सुना तक आते थे। इतना सब करने पर भी उनका पत्र थोड़े दिन चलकर बन्द हो गया।’’ (रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ 457) तब 'भारतमित्र' नामक अखबार निकला करता था। इसके ग्राहकों ने शर्त रखी कि वे अखबार तभी लेना शुरू करेंगे जब उसके संपादक उसके घर आकर उसे बांच भी दें। मरता क्या न करता। भारत मित्र की चर्चा करते हुए संपादकाचार्य पंडित अंबिकाप्रसाद वाजपेयी ने लिखा है कि ‘‘उन दिनों हिन्दी पाठक बहुत कम थे, इसलिए ग्राहक तो लोग बन जाते थे, पर पत्र न पढ़ सकते थे। यह समस्या इस तरह हल की गयी कि पंडित दुर्गाप्रसाद कई गदिद्यों पर जाकर भारत मित्र पढ़कर सुना आया करते थे।’’ (पंडित अंबिकाप्रसाद वाजपेयी, विशाल भारत, मई 1931) 

आज ए.सी. में बैठकर गूगल बाबा के सहारे अखबार निकालने वाले बहुतेरे संपादकों को इस कठिन यात्रा का आभास तक न होगा। वे तो अपना ’संपादकीय’ भी ’टीमवर्क’ समझते हैं! ऐसे ही दौर के लिए पत्रकार-शिरोमणि बाबूराव विष्णु पराड़कर ने 1925 में वृन्दावन हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद से कहा था-‘‘पत्र सर्वांग सुन्दर होंगे। आकार बड़े होंगे। छपाई अच्छी होगी। मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे। लेखों में विविधता होगी, कल्पक्ता होगी, गम्भीर गवेषण की झलक होगी और मनोहारिणी शक्ति भी होगी। ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जायेगी। यह सब होगा, पर पत्र प्राणहीन होंगे। पत्रों की नीति देशभक्त, धर्मभक्त अथवा मानवता के उपासक महाप्राण सम्पादकों की नीति न होगी-इन गुणों से सम्पन्न लेखक विकृत मस्तिष्क समझे जायेंगे। सम्पादक की कुरसी तक उनकी पहुंच भी न होगी। वेतनभोगी सम्पादक मालिक का काम करेंगे। वे हम लोगों से अच्छे होंगे। पर आज भी हमें जो स्वतन्त्रता प्राप्त है, वह उन्हें न होगी।’’ (राजकिशोर, पत्रकारिता के नये परिप्रेक्ष्य, वाणी प्रकाशन, द्वितीय संस्करण: 2005, पृष्ठ 53)

बल्कि अब तो स्थिति है कि अखबार के संपादक बाल्टी-मग बेच रहे हैं। जी हां, आज सुबह मैंने अपने हाॅकर मनोज कुमार को अखबार की जगह हाथ में बाल्टी-मग लटकाए देखा तो तनिक अतिरिक्त जिज्ञासु हो उठा। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि दरअसल बिहार का नंबर वन अखबार दैनिक हिन्दुस्तान का अभी एक आॅफर चल रहा है। अगर आप 'प्रभात खबर', 'दैनिक जागरण' अथवा 'दैनिक भास्कर' में से कोई भी एक अखबार लेते हों तो आप उसे बंद कर तथा 500 रुपये देकर दैनिक हिन्दुस्तान की बुकिंग करवा सकते हैं। इस 500 रुपये की एवज में लगातार पांच महीने आपको हिन्दुस्तान उपलब्ध कराया जायगा। एक बाल्टी के साथ एक मग आपको तत्काल उपलब्ध कराया जायगा। अब हाॅकर आपको अखबार की जगह बाल्टी-मग टांगे मिलेंगे और संपादक बाल्टीवाले संपादक कहे जाएंगे।

Saturday, September 12, 2026

मिथक और इतिहास बोध

मुझे धार्मिक देवी-देवताओं से कोई सहानुभूति नहीं है लेकिन अगर कोई इसका विरोध यह कहते हुए करे कि "पिता ब्रह्मा से बलात्कृता सरस्वती आज हर जगह पूजी जा रही है", तो मुझे घोर आपत्ति है। प्रथमतया, यह कथन स्त्री विरोधी है और बलात्कार के लिए सरस्वती को दोषी ठहराता है। दूसरे, ऐसे कथन इतिहास और मिथकों की अनैतिहासिक समझ से जन्म लेते हैं। मुझे नहीं लगता कि सरस्वती और ब्रह्मा के बीच का यह यौन संबंध कोई बलात्कार की घटना है। हमें अन्य कई देवताओं के जीवन में भी यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। कहा जाता है कि पुषन ने अपनी माता से प्रेम याचना की। बेबिलोनिया में भी स्त्री देवता के साथ पुरुष देवता का संबंध मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण की एक पुरानी गाथा बताती है कि पुत्र प्राप्ति के लिए पुरुषों ने माताओं और बहनों के साथ पत्नी की तरह संभोग किया। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, पृष्ठ57)

ब्रह्मा-सरस्वती का सम्बंध पिता-पुत्री का वैध यौन संबंध है। 'जन्हु ने भी अपनी पुत्री जाह्नवी से विवाह किया था।' (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, पृष्ठ 161) अवेस्ता के यिम, यिमे, ऋग्वेद के यम-यमी का संवाद भाई-बहन के बीच यौन संबंध के अस्तित्व को ध्वनित करते हैं। सर्वदमन सिंह के मतानुसार मातृनामों से, जिनमें ऋग्वेद के 'मामतेय' का उदाहरण भी है, बहुपतित्व, बहुपत्नीत्व अथवा स्वच्छंद संभोग के संकेत मिलते हैं। (पोलिएंड्री इन एनशिएंट इंडिया, 1978, पृष्ठ 68)

प्राचीन मिस्र में भाई-बहन के बीच शादी होती थी क्योंकि संपत्ति का हस्तांतरण मां से पुत्री को होता था। आइसिस ओसिरिस की बहन तथा पत्नी थी। अथर्ववेद में उल्लिखित है कि असुरों में बाप-बेटी के बीच विवाह की प्रथा थी। महाभारत के कर्ण पर्व में मद्र देश के लोगों के विषय में ऐसी अनेक परम्पराओं का उल्लेख है। कहा गया है कि मद्र देश में शाकल की बाह्लीक स्त्रियां नंगी नाचती और हंसती हैं तथा स्वैरणी और स्वेच्छाचारिणी होती हैं और खुले मैदान में मैथुन का आनंद लेती हैं। (कर्ण पर्व, कुंभकोनम प्रकाशन, 37, 22-23) राजतरंगिणी में भी उल्लेख है कि गांधार के ब्राह्मणों में कौटुम्बिक मैथुन प्रचलित था। (राजतरंगिणी, 1.308)

कहने की जरूरत नहीं कि विवाह और परिवार रूपी संस्था के अभ्युदय के पहले पिता, पुत्र सभी यौन संबंध कायम कर सकते थे। एंगेल्स ने ठीक ही इसे 'यौन साम्यवाद' की संज्ञा दी है। भारतीय विद्वानों में काशीनाथ राजवाड़े ने भी काफी कुछ लिखा है इस विषय पर। तो यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति पर बंदिश रातोंरात नहीं लगी है। इतिहास के कई युगों और पीढ़ियों को गुजरना पड़ा है। पांच भाइयों के साथ द्रौपदी की शादी को औचित्य प्रदान करते हुए युधिष्ठिर ने महाभारत में परंपरा की ओर ध्यान दिलाया है। युधिष्ठिर ने इसी परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि गौतम-नन्दिनी जटिला ने सात ऋषियों के साथ ब्याह किया था। स्त्री-पुरुष के स्वच्छंद मैथुन के मामले में महाभारत की उक्तियाँ निर्णयात्मक हैं। पाण्डु उस युग की चर्चा करते हैं जिसमें स्त्रियां अनियंत्रित, स्वैरिणी, स्वेच्छाचारिणी और स्वतंत्र होती थीं। स्त्रियां विवाह के पहले भी पुरुषों की ओर आकृष्ट होती थीं लेकिन यह उनके लिए पाप नहीं माना जाता था। (आदि पर्व, 128. 4-5) ऋग्वैदिक समाज में भी प्रत्येक स्त्री को विवाह करने की आवश्यकता नहीं थी। इसलिए कुमारी से उत्पन्न बच्चे अधम पतित नहीं समझे जाते थे। (कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, लोपामुद्रा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1949, पृष्ठ 9) यह कहना अनावश्यक है कि ऋषि रूपवती स्त्रियों के आकर्षण के लिए मंत्र की रचना करते थे। (वही, पृष्ठ 8)

स्वच्छंद यौन संबंध का सबसे महत्वपूर्ण संकेत उद्दालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु की कथा में मिलता है। श्वेतकेतु ने अपने सामने देखा कि एक ब्राह्मण ने उसकी माता को हाथ पकड़कर खींच लिया है। इससे वह अत्यंत क्रोधित हुआ पर उसके पिता ने श्वेतकेतु से कहा कि इसमें क्रोधित होने की कोई बात नहीं है क्योंकि संसार की सभी स्त्रियां स्वच्छंद विचरण करती हैं और यह प्रथा अति प्राचीन काल से सनातन धर्म के रूप में चली आ रही है। (आदि पर्व, 128. 9-15) श्वेतकेतु के आख्यान से मिलती-जुलती अन्य अनेक परंपराएं हैं अतः कल्पित कथा कहकर इस आख्यान का तिरस्कार नहीं किया जा सकता है। (डी एन मित्तर, पोजीशन ऑफ वीमेन इन हिन्दू लॉ, पृष्ठ 203)

ऐसे ही मुनिकन्या वार्क्षी का ब्याह एक नाम वाले दस प्रचेताओं के साथ हुआ था। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 252) अहिल्या की कथा से भी इतना ही प्रकट होता है कि इंद्र प्राचीन परंपरा का द्योतक है। किसी पुरुष ने स्त्री को स्वतंत्र समझकर अहिल्या से संबंध किया, किन्तु अब सामाजिक परिस्थिति बदल चुकी थी। पितृसत्तात्मक समाज में यह सर्वमान्य नहीं रही थी। राम ने उसी प्राचीन परंपरा में अहिल्या को निर्दोष माना और समाज में जीवित माना। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 201)

हमारा इतिहास-विवेक इस बात को समझने में है कि यह प्रवृत्ति महाभारत के समय मुख्य प्रवृत्ति न होकर मरणासन्न है। दम तोड़ती इस प्रवृत्ति को स्मृति भर ही जगह मिली है हमारे शास्त्रों में। द्रौपदी की सास कुंती स्वयं सूर्य के साथ संभोग करती है। सूर्य ने यहां कुंती को जो समझाया है वह इस संदर्भ के लिए अर्थवान है। सूर्य कहता है कि 'स्वभाव से सभी स्त्री और पुरुष, अपनी इच्छा के अनुसार काम करने के लिए स्वाधीन हैं। वैवाहिक नियम का बंधन स्वभाव के विकार से उत्पन्न हुआ है।' (रांगेय राघव, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 279) किंतु सच है कि उसकी संतान को सामाजिक मान्यता नहीं मिलती। ये सारी कहानियां बस इसी बात की ओर संकेत हैं कि ये नये जमाने की बात नहीं है, जुज़रे जमाने की याद भर हैं।

मातृसत्ता के ध्वंस पर पितृसत्ता को स्थापित करती कहानियां भी रची जा रही थीं। कहानी है कि जमदग्नि, सत्यवती और ऋचीक के पुत्र तथा विख्यात भृगुवंशी परशुराम के पिता थे। उसकी पत्नी रेणुका थी। एक दिन रेणुका स्नान करने के लिए नदी-तट गई तो वहां उसने किसी गन्धर्वदंपति को जल में क्रीड़ा करते देखा। उस मनोहर दृश्य को देखकर उसके मन में ईर्ष्या जागी और वह उन दूषित विचारों से कलुषित हो गई। जब वह वापिस घर आई तो क्रोध के अवतार जमदग्नि ने उसे 'सतीत्व की कांति से हीन' देखकर बड़ा धमकाया और अपने पुत्रों को उसका सिर काट देने की आज्ञा दी। पहले चारों पुत्रों ने ऐसा क्रूर दुष्कृत्य करने में आनाकानी की। परशुराम उनका 'सबसे छोटा पुत्र' था। उसने तुरंत पिता की आज्ञा का पालन किया और कुल्हाड़े से अपनी माता का सिर काट डाला। शांत और प्रसन्न जमदग्नि ने परशुराम से वरदान मांगने के लिए आग्रह किया। परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की जो अविलंब स्वीकार की गई। (आप्टे, संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 438) यह कहानी हमें बताती है कि मातृसत्ता की कब्र पर पितृसत्ता के अंकुर फूटे हैं।

लोक में लाठी

प्रकृति से आदमी दो टाँगोंवाला प्राणी है। 'तीसरी टाँग' उसे इस भूलोक (मर्त्यलोक) में अर्जित करनी होती है। यह तीसरी टाँग 'बुढ़ापे की लाठी' है। यह लाठी इतनी अपरिहार्य है कि हमारे मुहावरों तक में आ घुसी है। इसे आप भाषा में 'बुढ़ापे की लाठी' का 'टाँग अड़ाना' भी कह सकते हैं। 

लाठी की महत्ता का अनुमान इसके पर्यायवाची शब्दों की भरमार से भी होता है। इसके लट्ठ, लऊर, लऊरि, लबेद, पटकन, बोंग, गोजी, बासमती, लोहबाना (लोहबंद), डंटा, पैना, छड़ी, सोंटा, ठेंगा, दुखहरन, दुखभंजन आदि कई नाम हैं। (दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह, भोजपुरी के कवि और काव्य, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, 1958, 'भूमिका', पृष्ठ 21) 

लाठी से बने 'लठैत', 'लठधर' शब्द की भी भारतीय संस्कृति में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। बिहार के जमींदारों के इन लठैतों की करतूत से भला कौन अपिरिचित होगा। अमवारी किसान आंदोलन के दौरान राहुल का सिर इन्हीं लठैतों ने लहूलुहान कर दिया था। महाकवि निराला का 'लंठ' (लेखकों में लंठ जैसे खुशनसीब) इसी का गोतिया लगता है। 'डोमाजी उस्ताद' के कहने ही क्या!

पहलवानों की लाठियां प्रसिद्ध रही हैं। औपनिवेशिक बिहार के दिनों में मथुरा सिंह (जयकिसुन बिगहा, जहानाबाद) की लाठी के किस्से यहाँ की हवा में होते। कहा जाता है कि उनकी लाठी इतनी बड़ी होती कि उसके सहारे वे दोमंजिले मकान की छत पर आसानी से छलांग लगाकर पहुंच जाते। तब के हिन्दू-मुस्लिम दंगों में इनकी लाठी की भी भूमिका रही। 

मेरे गांव में मनियामा (जहानाबाद) के सीताराम सिंह आते। खुद तो पांच फुट के जवान थे लेकिन लाठी सात फुट की रखते। बड़ी लाठी उनके पहलवान होने का भ्रम रचती। 'कलाकारों की रिलीफ पार्टी' में कथाशिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु ने एक ऐसे ही 'लाठीधारी' की तस्वीर खींची है : "आज सुबह से ही 'अपने लोग' स्वजन-सनेही, मित्र और प्रीतिभाजन-जन हमारी सुधि लेने आ रहे हैं। कोई खाली हाथ नहीं आता। एक हाथ में लट्ठ और दूसरे में हमारे लिए कोई-न-कोई आवश्यक सामान। सभी एक अभूतपूर्व 'मेकअप' में लूंगी या धोती लपेटे, गंजी पहने। डाक्टर रामवचन राय आये,- तो उनके हाथ में जो लाठी थी वह उनसे भी वजनी रही होगी। मैंने हँसकर कहा था-'आचार्यजी, लाठी में गुण बहुत हैं, सदा राखिये संग।" (फणीश्वरनाथ रेणु : चुनी हुई रचनाएं, भाग 3, पृष्ठ 114) 

कहना अनावश्यक है कि रेणु ने अपनी बात कहने के लिए गिरिधर कविराय का सहारा लिया है। कविराय की पूरी बात कुछ इस तरह है : "लाठी में गुण बहुत हैं, सदा राखिये संग/ गहरी नदी, नारा जहां, तहां बचावै अंग/ तहां बचावै अंग, झपटि कुत्ता को मारै/ दुशमन दावागीर, होय तिनहूं को झारै/ कह गिरिधर कविराय, सुनो हो धूर के बाठी/ सब हथियारन छांड़ि, हाथ में लीजै लाठी।" (डॉक्टर आशीष वशिष्ठ एवं योगिता वशिष्ठ, बृहद सूक्ति कोश, भाग 2, कल्पना प्रकाशन, 2021, पृष्ठ 208 में उद्धृत) गिरिधर कविराय कहते हैं कि हमेशा अपने पास लाठी रखें, अगर राह में गहरी नदी, नाला आ जाता है तो लाठी सहारा देती है, अगर कोई कुत्ता पीछे पड़ जाता है तब भी लाठी उससे बचाती है, अगर कोई दुश्मन हमला कर दे तो लाठी उसे भगा देती है। इसलिए कवि बार-बार यही कहते हैं कि सारे हथियार छोड़कर अपने पास बस लाठी रखो ।

भोजपुरवासियों ने अपने मन-मिजाज से कविराय का कहा माना है। इस मिजाज को सबसे पहले ग्रियर्सन ने पकड़ा। वे कहा करते थे कि बंगालियों ने कलम से जो किया, उसे भोजपुरियों ने लाठी से! शायद इसीलिए लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया में भोजपुरी भाषा पर अध्याय की शुरुआत उन्होंने गिरिधर कविराय की इस लाठी-चर्चा से की है। (दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह, भोजपुरी के कवि और काव्य, पृष्ठ 5) भोजपुरी में लाठी की अमोघ शक्ति को लेकर कई कहावतें प्रचलित हैं। कहा जाता है कि 'सइ पूरा चरन नु एक हूरा चरन' अर्थात सौ बार निहोरा करने से भी जो काम नहीं होता लाठी से हो जाता है। 

लाठी ही का असर कहिए कि उन्होंने बेद का तुक लबेद से मिला दिया। एक कहावत प्रचलित है : 'चार बेद और पांचवां लबेद' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 113)। मेरे गांव में इसको 'लाठीकोट' (कोर्ट) कहा जाता है। 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' तो आपने भी सुनी होगी। 'लबेद' का मतलब 'लाठी' ही है। पहले गांवों में 'लाठीकोट' का फैसला 'अंतिम' माना जाता था। जिसका परिवार बड़ा होता वह लाठीकोट में केस जीता हुआ समझा जाता। मेरे बाबा (दादाजी) एक पढ़ुआ पढ़ते थे-'जेकरा पाले चार धुरहिया, मारे लाठी छीने रुपइया'! इसी बात को दूसरे शब्दों में कहा गया है : 'जिसके चार भैय्या, मारें धौल छीन लें रुपैया'। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 140)

लाठी सिर्फ 'झपटि कुत्ते को मारै' ही नहीं है बल्कि यह सौंदर्य की भी खान है। हिंदी के रीतिकालीन कवियों ने 'कनक छड़ी सी कामिनी' कहकर वर्णन किया है तो बिरहा गीत में अत्यंत मोहक अंदाज में लाठी के हुर्रे की प्रशंसा निबद्ध है :

'हुरवा नियर तोर जुरवा ए गोरिया,

पुअवा नियर तोर गाल।

पनवा नियर तू त पातर बाड़ू गोरिया,

लोटवा नियर तोर भाल।।' (राहुल सांकृत्यायन, हिन्दी साहित्य का बृहत इतिहास, भाग 16, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, पृष्ठ 151)

वर्ण और दंड

स्मृतियों में आश्रम और वर्ण के अनुसार दंड धारण करने की व्यवस्था है। उपनयन संस्कार के समय मेखला आदि के साथ ब्रह्मचारी को दंड भी धारण कराया जाता है। प्रत्येक वर्ण के ब्रह्मचारी के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के दंडों की व्यवस्था है। ब्राह्मण को बेल या पलाश का दंड केशांत तक ऊँचा, क्षत्रिय को बरगद या खैर का दंड नाक तक ऊँचा धारण करना चाहिए। गृहस्थों के लिए मनु ने बाँस का डंडा या छड़ी रखने का आदेश दिया है। संन्यासियों में कुटीचक और बहूदक को त्रिदंड (तीन दंड), हंस को एक वेणुदण्ड और परमहंस को भी एक दंड धारण करना चाहिए, ऐसा निर्णयसिंधु में उल्लेख है। किसी-किसी ग्रंथ में यह भी लिखा है कि परमहंस परम ज्ञान को पहुंचा हुआ होता है, अतः उसे दंड आदि धारण करने की कोई आवश्यकता नहीं। राजा लोग शासन और प्रतापसूचक एक प्रकार का राजदंड धारण करते थे। (हिंदी शब्दसागर, चतुर्थ भाग, नागरी प्रचारिणी सभा, 1995, पृष्ठ 2188)

सच्चिदानंद सिन्हा : एक जन्मजात चक्रवर्ती

दसवीं की हिंदी की किताब में जगदीश चंद्र माथुर का एक पाठ पढ़ना होता था। शीर्षक था-'एक जन्मजात चक्रवर्ती'। इस शीर्षक से किसी को एतराज नहीं हो सकता। सच्चिदानंद सिन्हा के पूर्वज के नामों में 'बख्शी' लिखे होने का मतलब है कि वे मुग़लों के बड़े ओहदे वाले मुलाजिम रहते आये थे। वैसे उनका जन्म तो बिहार के आरा के पास मुरार गांव (बक्सर जिला के चौगाई प्रखंड) में हुआ था, किन्तु उनके पूर्वज लखनऊ के आसपास के रहे होंगे। अकारण नहीं है कि मुरार गांव का इनका टोला 'लखनौआ टोला' के नाम से जाना जाता है। कायस्थ तो वे थे ही। अब बख्शी, लखनऊ और बिहार के कायस्थ को मिला दीजिए तो चक्रवर्ती से कम क्या बनेगा भला!

तब कायस्थों की पढ़ाई अरबी-फ़ारसी से शुरू होती और विलायत की बैरिस्टरी पर खत्म होती। डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद हों या प्रेमचंद-सब मकतब और मदरसा के विद्यार्थी थे। हमलोग बचपन में एक कहावत सुनते थे-'पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, देखो रे किस्मत का खेल'! मर्म है कि कहावत बनने से पहले फारसीदाँ ही को नौकरी मिलती थी। अरबी-फ़ारसी-अंग्रेजी से पढ़ाई आरम्भ कर सच्चिदानंद विलायत पढ़ने गये। बैरिस्टरी की पढ़ाई कर चुकने के बाद तक वे अपना नाम अशुद्ध लिखा करते थे। 1890 में उनकी मुलाकात मैक्समूलर से हुई। मैक्समूलर को भारतविद और संस्कृतज्ञ दिखने की इतनी प्रबल चाह थी कि वह 'मोक्षमूलर' कहलवाना ज्यादा पसंद करता था। नाम बदलने की यह प्रवृत्ति यूरोप के कई अन्य विद्वानों में देखी गई है। मुजफ्फरपुर (बिहार) में जन्मे वेद-विद्वान मैकडॉनेल ने अपना संस्कृत नाम 'मुग्धानलाचार्य' रख छोड़ा था। भारतीय विद्वानों ने इन नामों के संस्कृत अनुवाद को लेकर काफी हास-परिहास किया है। महावीरप्रसाद द्विवेदी और चंद्रधर शर्मा गुलेरी तो खूब ही चुटकी लेते हैं! उसी मोक्षमूलर ने सच्चिदानंद को बताया कि आप अपना नाम गलत लिखते हो और शुद्ध रूप से परिचय कराया।

सिन्हा साहब जब विलायत से पढ़कर लौटे तो उनके चचेरे बड़े भाई ने उन्हें इलाहाबाद ठहरकर पाप का प्रायश्चित करने को कहा। तब का यही लोकाचार था। गांधीजी के प्रायश्चित भोज के बारे में हम सब जानते हैं। बिहार में डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के एक रिश्तेदार अभी-अभी पढ़कर लौटे थे। किशोरवयप्राप्त राजेन्द्र ने उस घटना से उत्पन्न विवाद को नजदीक से देखा था। आत्मकथा में लिखा भी है। के. पी. जायसवाल जब विलायत पढ़ने गये थे तो इनकी रसोई का सारा सामान भारत से गया था। अलग से क्या कहना कि इसमें ईंधन का कोयला तक शामिल था। सिन्हा साहब ने इस सामाजिक माहौल में प्रायश्चित करने और भोज करने से बड़े भाई को साफ मना कर दिया। किन्तु वे अपनी ताबीज लाना न भूले थे। तथ्य है कि बालक सच्चिदानंद का जब जन्म हुआ तो उन्हें एक मुसलमान संत के पास ले जाया गया। उस संत ने अपनी मूंछ के बाल उखाड़े और सच्चिदानंद के चाचा को इस हिदायत के साथ दिये कि इसे ताबीज बनाकर वह आजन्म साथ रखे। इस हिदायत का सच्चिदानंद ने आजन्म पालन किया।

1893 में जब वे स्वदेश लौटे तो देखे कि नौकरियों पर बंगाली कुंडली मारे बैठे हैं। महेशनारायण के बड़े भाई गोविंदनारायण बिहार के पहले ग्रेजुएट थे लेकिन बंगालियों के आगे इनकी एक न चल रही थी फलतः बेरोजगार थे। इससे महेशनारायण काफी क्षुब्ध और व्यथित थे। रोजगार एवं अवसर की तलाश की इस 'मध्यवर्गीय लड़ाई' को सच्चिदानंद सिन्हा ने एक व्यापक आधार प्रदान करने हेतु 'बिहारी पहचान' एवं 'बिहारी नवजागरण' की बात 'गढ़ी'। उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा है, 'सिर्फ खुद बिहारियों को छोड़कर बाकी लोगों में बिहार का नाम भी लगभग अनजान था।' आगे उन्होंने लिखा, 'पिछली सदी के 90 के दशक के प्रारंभ में मैं जब एक छात्र के रूप में लंदन में था, तब मुझे जबरन इस ओर ध्यान दिलाया गया। तभी मैंने यह दर्दनाक और शर्मनाक खोज की कि आम बर्ताव के लिए तो बिहार एक अनजान जगह है ही, और यहां तक कि अवकाशप्राप्त आंग्ल-भारतीयों के बहुमत के लिए भी बिहार अनजाना ही है।... मेरे लिए आज के बिहारियों को यह बताना बड़ा कठिन है कि उस वक्त मुझे और कुछ दूसरे उतने ही संवेदनशील बिहारी मित्रों को कितनी शर्मिंदगी और हीनता महसूस हुई जब हमें महसूस हुआ कि हम ऐसे लोग हैं जिनकी अपनी कोई अलग पहचान नहीं है, कोई प्रांत नहीं है जिसको वे अपना होने का दावा करें, दरअसल उनकी कोई स्थानीय वासभूमि नहीं है जिसका कोई नाम हो। यह पीड़ादायक भावना उस वक्त और टीस बन गई जब सन् 1893 में स्वदेश लौटने पर बिहार में प्रवेश करते-करते पहले ही रेलवे स्टेशन पर एक लंबे-तगड़े बिहारी सिपाही के बैज पर 'बंगाल पुलिस' अंकित देखा । घर लौटने की खुशियां गायब हो गईं और मन खट्टा हो गया। ... पर सहसा ख्याल आया कि बिहार को एक अलग और सम्मानजनक इकाई का दर्जा दिलाने के लिए, जिसकी देश के अन्य महत्वपूर्ण प्रांतों की तरह अपनी एक अलग पहचान हो, मैं सब कुछ करने का संकल्प लूं जो करना मेरे बूते में है। एक शब्द में कहूं तो यही मेरे जीवन का मिशन बन गया और इसको हासिल करना मेरे सार्वजनिक क्रियाकलापों की प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत।'

बिहार में बंगाली हितों का प्रवक्ता गुरुप्रसाद सेन का 'बिहार हेरल्ड' (1875) तब मौजूद था। बंगाली हितों के विरुद्ध बिहारी हितों की वकालत करनेवाला भी एक अखबार चाहिए था। अतएव, 1893 में विलायत से पढ़कर लौटे सच्चिदानंद सिन्हा ने पत्र शुरू करने के ख्याल से एक मीटिंग आयोजित की। उक्त मीटिंग में पत्र का नाम 'बिहारी' प्रस्तावित किया गया, किन्तु अंतत: साल भर के अंदर 1894 में 'बिहार टाइम्स' नाम से अंग्रेजी पत्र शुरू किया और 'कायस्थ समाचार' में काम कर रहे महेशनारायण को इसका संपादक बनाया। 1906 ही में इन दोनों ने मिलकर बंगाल से बिहार के पृथक्करण पर एक पुस्तिका जारी की। इसी वर्ष अखबार का पुराना प्रस्तावित नाम 'बिहारी' कर दिया गया किन्तु 1907 में महेश बाबू का निधन हो गया और वे अकेले पड़ गये। बंगाल से बिहार को पृथक किये जाने की इस लड़ाई में उन्होंने कायस्थ बुद्धिजीवियों को एक मंच पर ला दिया। अंग्रेजों के प्रति 'राजभक्ति' और राष्ट्रीय आंदोलन से 'विरक्ति' ने 1912 में बिहार को बंगाल से पृथक होना संभव बनाया।

सच्चिदानंद सिन्हा को किताब पढ़ने और उसे लाल-पीले रंगों में रंगने अर्थात स्केच से 'अंडरलाइन' करने का गहरा शौक था। उनकी इन्हीं किताबों के संग्रह से बाद में प्रसिद्ध सिन्हा लाइब्रेरी की स्थापना हुई। सिन्हा साहब पाठक के साथ-साथ पत्रकार और लेखक भी थे। उन्होंने बिहार और भारत के अपने समकालीनों के ऊपर विद्वतापूर्ण टिप्पणियां की हैं। टिप्पणियां पुस्तकाकार प्रकाशित हैं। अखिल भारतीय स्तर के नेताओं और बुद्धिजीवियों वाली किताब जानकी प्रकाशन, पटना से छपी तो बिहार के समकालीनों के ऊपर लिखी गई जीवनीपरक टिप्पणियां हिमालय प्रेस, पटना के मैनेजर पंडित जयनाथ मिश्र के आग्रह पर 1944 में छपी थीं। कहने की आवश्यकता नहीं कि हिमालय प्रेस बिहार में टेक्स्टबुक लेखन के प्रणेता रामलोचनशरण बिहारी के प्रसिद्ध पुस्तक भण्डार (लहेरियासराय, दरभंगा) का पटना ब्रांच था। इस किताब में बीसियों लोगों की जीवनियों के साथ-साथ लगभग चालीस पृष्ठों की एक लंबी भूमिका भी है जिसमें 1893 से 1912 तक के बंगाल से बिहार के पृथक्करण का जो संघर्ष चला उसका संक्षिप्त किन्तु ऐतिहासिक महत्त्व का विवरण लिखा है। आज किताब का 'ब्लर्ब' या 'आमुख' किसी वरिष्ठ लेखक से लिखाने का चलन है, किन्तु सच्चिदानंद सिन्हा ने अपनी किताब 'सम एमिनेंट बिहार कंटेम्प्रेरीज' का 'आमुख' उम्र में काफी छोटे किन्तु उद्भट विद्वान अमरनाथ झा से लिखवाया था! अमरनाथ झा के बारे में कहा जाता है कि अगर शेक्सपियर का सम्पूर्ण साहित्य भी खो जाय तो उनकी सहायता से एक-एक बात फिर से लिख ली जा सकती है। अमरनाथ झा के पिता सर गंगानाथ झा उनके गहरे मित्र थे और इस किताब में उनकी जीवनी भी संकलित है।

सच्चिदानंद सिन्हा का मानना है कि चूंकि 1894 में 'बिहार टाइम्स' के प्रकाशन से बिहार की पत्रकारिता और पृथक बिहार की मांग शुरू हुई, इसलिए इस वर्ष को बिहार में रेनेसां की शुरुआत का वर्ष माना जा सकता है। अगर अखबार के प्रकाशन से बिहार के रिनेसाँ को जोड़ा जा सकता है तो हिन्दी अखबार 'बिहार बन्धु' को यह श्रेय क्यों नहीं दिया जा सकता जो बंगाल से बिहार को अलग करने के मुद्दे को उठाता रहा था। फिर 'अनीश' और 'कासिद' जैसे उर्दू रिसाले तो बहुत पहले से ये मांग रखते आ रहे थे।

आश्चर्यजनक है कि किताब में महेशनारायण पर एक स्वतंत्र अध्याय है किंतु हिन्दी पत्र 'बिहार बन्धु' से उनके जुड़ाव की कोई चर्चा नहीं है। हो सकता है कि इसका कारण उनका हिंदी विरोधी रुझान रहा हो। सिन्हा साहब हिंदी के हिमायती तो नहीं ही थे, समय-बेसमय वे उस पर व्यंग्य भी किया करते थे। (राधिकारमण स्मृति अंक, नई धारा, पृष्ठ 317) 'बिहार बन्धु' से जुड़े महेशनारायण नाम के एक कवि भी थे जिनकी बिहार बन्धु प्रेस से 'स्वप्न' नाम की मुक्तछंद की लंबी कविता छपी थी। वे खड़ी बोली के बिहार के आरंभिक कवि हैं। सिन्हा साहब द्वारा उनकी इस उपलब्धि की चर्चा न किया जाना मेरे इस संदेह को और गहरा करता रहा है कि 'बिहार टाइम्स' के महेशनारायण और 'बिहार बन्धु' में खड़ी बोली की कविताएं लिखने वाला महेशनारायण अलग-अलग व्यक्तित्व तो नहीं? श्री जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी जी को भी इस बात को लेकर शक हुआ था। किन्तु, श्री रामलोचनशरण बिहारी द्वारा संपादित एवं संवत 1883 वि. में हिन्दी-पुस्तक भंडार, लहेरियासराय से प्रकाशित किताब 'बिहार का साहित्य' (पहला भाग) की पृष्ठ संख्या 6 पर जो संपादकीय टिप्पणी है, उससे स्पष्ट है कि दोनों एक ही आदमी थे।

हिंदी संस्कृति की जमीन

वागर्थ (सितंबर, 2025) पलटना शुरू किया तो संपादकीय लेख पर नजर गयी। शीर्षक है-'हिंदी संस्कृति की जमीन'। पत्रिका के संपादक और इस लेख के लेखक शंभुनाथ हैं। वे भारतीय नवजागरण पर 'साधिकार' विचार करते रहे हैं। पत्रिका में लिखते हैं : "1857 की घटना के बाद अंग्रेजों ने भारत में समाज सुधार को प्रोत्साहन देना बंद कर दिया। विधवा पुनर्विवाह (1856) उनका आखिरी सुधार था। उन्हें भय था कि सामाजिक सुधार से भारत के लोग पुरानी खाइयों से मुक्त हो जाएंगे तो वे एक होकर औपनिवेशिक सत्ता के लिए खतरा बन जाएंगे।" (पृ. 9) 

उपर्युक्त पंक्तियों में उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध के भारत की बड़ी सतही समझ है। भारत में अंग्रेज व्यापारिक कंपनी के रूप में आए थे। सामाजिक चेतना में ये इंग्लैंड के सबसे पिछड़े तबके के प्रतिनिधि थे, इसलिए हमें इस भ्रम से मुक्त रहना होगा कि इनके द्वारा भारत में किये जा रहे परिवर्तन समाज-सुधार की उदात्त भावना से प्रेरित थे। दरअसल, उनके परिवर्तन बाजार-निर्माण से प्रेरित थे। अठारहवीं-उन्नीसवीं शती का भारत अंग्रेजी माल का बेहतर उपभोक्ता नहीं था। एक जड़ समाज बेहतर उपभोक्ता हो भी नहीं सकता। जिस उन्नीसवीं शती के नवजागरण/हिंदी नवजागरण की हम बात करते हैं, किसी भी हिंदी पत्र के ग्राहक सौ की संख्या तक नहीं पहुंच पाये। पत्र की बिक्री सरकारी खरीद और संपादकों की इस गारंटी पर निर्भर थी कि वे घर-घर जाकर पत्र बांच आया करेंगे। एक उन्मुक्त या उदार समाज ही बाजार की वकालत कर सकता है। जातियों में बंटे समाज का व्यक्ति अव्वल तो बाजार/शहर से दूर ही रहता है, अगर किसी मुसीबत में आ भी गया तो अपना सत्तू लेकर आता है, ताकि बाजार की चीज खाकर उसे जाति-धर्म गँवाने की नौबत न आये। आरम्भ ही से हिन्दू धर्म बाजार विरोधी रहा है। इतिहास में झांकें तो प्राचीन भारत में बौद्ध धर्म का उद्भव और विकास बाजार के लिए समाज को खोलने का संघर्ष है। अकारण नहीं है कि बुद्ध, अम्बपाली (आज की भाषा में बाजारू स्त्री) का आतिथ्य स्वीकार करते हैं। इतना ही नहीं, बुद्ध शहरों की यात्रा करते हैं और नोट करने लायक बात है कि किसी शहर ही में उन्होंने अपनी मृत्यु की कल्पना/इच्छा की थी। अंग्रेज भी इसी बाजार के घोड़े पर सवार थे। यह अर्थहीन बात है कि उनके समाज-सुधार से भारतीय समाज की खाइयां कम हो रही थीं। इस तथाकथित सुधार ने जिस शिक्षित वर्ग/समाज का निर्माण किया था, वह अंग्रेजी राज का समर्थक था। बंगाल का मध्यवर्ग 1857 में अंग्रेजों के पक्ष में तो था ही, हिंदी का लेखक भी महारानी की प्रशस्ति और 'शोक-प्रकाश' लिख रहा था।

मनुस्मृति-दहन-दिवस

मित्र आज (2021) मनुस्मृति-दहन-दिवस मना रहे हैं। मैं उनके इस उत्सव का साझीदार नहीं हो सकता। इसलिए नहीं कि मैं मनुस्मृति के नियमों का पैरोकार हूँ। पैरोकार हो भी नहीं सकता। किन्तु वह हमारे समाज का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। उसे नष्ट करना इतिहास को, उसके एक महत्त्वपूर्ण स्रोत को नष्ट करना है। ऐसा करना या करने की सोचना मुझे बचकाना लगता है। बच्चा उटपटांग सोचने के लिए आजाद है!

डार्विन के विकासवाद की खोज के बाद यह साबित हो गया है कि मनुष्य, बंदरों की संतान है। आज विज्ञान के इस निष्कर्ष को मनुष्य जाति पर लगा एक 'कलंक' मान बंदरों को समूल नष्ट कर देने की मूर्खता नहीं कर सकते!

अंग्रेजों ने हम पर बड़े जुल्म किये। इसका मतलब यह नहीं कि आज हिंदुस्तान में उनके नाम पर खड़ी इमारतें ढहाते चलें। सारी अंग्रेजी किताबें जला डालें। नहीं, आज वे हमारी विरासत हैं। उन्हें सहेजकर रखना हमारा सरोकार होना चाहिए। ऐसा विवेक हम पैदा कर सकें।

मनु को हमने 'विलेन' गढ़ा है, जबकि अधिकतर लोग कमोबेश वही बात अपने-अपने तरीके से कह गये हैं। जिस बात के लिए मनु सबसे ज्यादा कोसे जाते हैं, 'आदिकवि' उसके स्रोत बनते हैं। मनु की अधिकतर बातें अपने पूर्ववर्ती कवियों और विधि-निर्माताओं की हैं। वाल्मीकि के मत में "नारी सदैव पुरुष के आश्रित रहनी चाहिए। कन्या के रूप में पिता, पत्नी के रूप में पति तथा माता के रूप में पुत्र उनके संरक्षक हुआ करते हैं।" (रामायण, 1/32/21, 1/33/3, 2/61/24; राधावल्लभ त्रिपाठी, संस्कृत कवियों के व्यक्तित्व का विकास, संस्कृत परिषद, सागर विश्वविद्यालय, सागर, 1976, पृष्ठ 13 में उद्धृत) महाभारत के शांति पर्व में बहुत से ऐसे श्लोक मिलते हैं जो अक्षरशः मनुस्मृति में पाए जाते हैं। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली, 1993, पृष्ठ 34) 

मनुस्मृति का महाभारत के साथ विलक्षण सम्बन्ध है। इसके 260 श्लोक ऐसे हैं जो अक्षरशः महाभारत में पाये जाते हैं। विद्वानों का मानना है कि इन दोनों ग्रंथों ने एक-दूसरे से इन श्लोकों को नहीं लिया है, बल्कि दोनों ग्रंथों का कोई एक मूल है। वशिष्ठ और विष्णुस्मृति में भी 160 श्लोक ऐसे हैं जो मनुस्मृति के हैं। (गंगानाथ झा, हिन्दू लॉ इन इट्स सोर्सेज, पटना विश्वविद्यालय, पटना, 1931, पृष्ठ 59)

जिसे हम 'लोकसाहित्य' कहते उल्लसित होते हैं, वहां भी तथ्य को प्रभुत्वशाली ताकतों ने अधिकाधिक रूप से अपने पक्ष में करने की कोशिश की है। एक कहावत है, 'औरत रहे तो आप से, नहीं तो जाय सगे बाप से' अर्थात 'स्त्री यदि स्वयं सच्चरित्रा है, तब तो वह रहेगी, अन्यथा अपने बाप के साथ भी निकल जाती है।' (फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 56) स्त्री को 'कामातुर' साबित करनेवाली कहावत देखिए : 'कातक कुतिया, माघ (कोश में 'माघ' की जगह माह लिखा है।) बिलाई, चैत चिड़िया, सदा लुगाई।' (पृष्ठ 68) और आगे, 'कौड़ी गांठ की, जोरू साथ की' अर्थात 'अपना पैसा हमेशा अपनी गांठ में और स्त्री को अपने साथ रखना चाहिए। अथवा पैसा गांठ का ही काम आता है और स्त्री तभी काबू में रहती है, जब अपने साथ रखी जाए।' (पृष्ठ 78)

मनुस्मृति का मूल्यांकन करते हुए हम ज्यादती करते हैं जब उसको ऐतिहासिक संदर्भ से काट देते हैं।