बिहार राज्य अभिलेखागार की पत्रिका ‘अभिलेख बिहार’ में शारदा शरण का एक लेख प्रकाशित है, जिसका शीर्षक है-‘स्वतंत्रता संग्राम के दौरान की वीर गाथाएं: बक्सर जिला के संदर्भ में’। इस लेख में आजादी की लड़ाई के दौरान बिहार के बक्सर में प्रचलित गीतों का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इन गीतों में लगभग सभी स्थलों पर पुरुषों को ‘मर्द हो मर्दानगी के साथ, मरना सीख लो’, ‘चल भइया’, ‘शाहाबाद के वीर सपूतों’ तथा ‘अब चले झुण्ड मर्दानों का’ आदि संबोधनों से संबोधित किया गया है। अकारण नहीं है कि सुभद्राकुमारी चैहान जैसी कवयित्री भी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के लिए ‘खूब लड़ी मर्दानी’ लिख रही है। आजादी के दौर के इन गीतों में स्त्रियों का आह्वान नहीं है। एक गीत में चर्चा भी है तो बाधा के रूप में। कहा गया है-‘हम मातृभूमि के सैनिक हैं/अब प्राणों का है मोह कहाँ/केसरिया बाना पहन लिया/नारी बच्चों का छोह कहाँ।’ सन् 1931 ई. में भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव को फांसी दिये जाने के विरोध में प्रभुनारायण मिश्र द्वारा संपादित लाहौर की सूली अर्थात् सरदार भगत सिंह मस्ताना नामक कविताओं का एक संग्रह गया से प्रकाशित हुआ। इस संकलन में एक भोजपुरी कविता छपी थी जिसमें राट्रवाद के विरोधियों पर किस तरह व्यंग्य किया गया था: ‘मउगान्हि के मरद बनावे के परी।...गांव में मिटिंग सुनि घर में लुकात बाड़े।/ओकरा के चूड़ी पहिरावे के परी।।/आपुस में बइठी के गांधी के सिकायत करे।/तवना के मुंहे कारीख पोते के परी।।’ कहना अनावश्यक है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा पुरुष वर्चस्व की भाषा है।
श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की ‘आई फॉलो गांधीजी’ शीर्षक से एक किताब छपी थी। दादाभाई नौरोजी की पौत्री खुरशैद नौरोजी ने किताब पर ‘फॉलो’ को काटकर ‘स्वॉलो’ बना दिया। गांधीजी ने ठठाकर हँसते हुए कहा, ‘अरे, लड़कियों की अक्ल ही कितनी होती है? तुम मुंशी को क्या समझोगी?’ खुरशैद ने विषाद-भरे स्वर में कहा-‘बापूजी, आपके तथाकथित गांधीवादी भक्त लोग आपको और गांधीवाद को निगल जायेंगे।’ (रामनंदन मिश्र, महात्मा गांधी और मैं, जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान, 2020, पृष्ठ 26) भगत सिंह बम केस में क्रांतिकारी पार्टी का एक सदस्य फणीन्द्र मुकर्जी पुलिस का भेदिया हो गया था। पार्टी की गोपनीयता के लिए खतरा उत्पन्न होते देख यह निश्चय हुआ कि उसे गोली मार दी जाय। उपयुक्त व्यक्ति की खोज शुरू हुई। बिहार में कहीं पार्टी की मीटिंग हुई। मीटिंग में पार्टी के नेता किशोरी प्रसन्न सिंह अपनी पत्नी सुनीति देवी के साथ उपस्थित थे। सुनीति देवी ने प्रार्थना की: ‘यह काम मुझे सौंपा जाय’, किन्तु किशोरी बाबू ने ‘आदेश’ के इशारे से उन्हें बैठा दिया। सलाह-मशविरे के बाद यह काम एक दूसरे सदस्य को सौंप दिया गया। इस घटना के कुछ वर्ष बाद सुनीति देवी को तपेदिक हो गया। लाख प्रयत्न हुए, पर मृत्यु का पंजा ढीला न पड़ा। मृत्यु से कुछ घड़ी पहले किशोरी बाबू से कहा: ‘मेरी विदाई का समय अब दूर नहीं, इसलिए मुझे आपसे एक बात कहनी है कि जब किसी आदमी को आदमी की तरह मरने का मौका मिल रहा हो, तो उसे कभी रोकना मत।’ (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, जिंदगी मुस्करायी, भारतीय ज्ञानपीठ, नौवां संस्करण: 2000, पृष्ठ 39-40)
शारदा कुमारी देवी द्वारा छपरा से निकाला गया ‘महिला दर्पण’ नामक हिन्दी मासिक किसी महिला द्वारा संपादित अपने ढंग का पहला पत्र है। इसकी संपादिका को सलाह देते हुए तृतीय बिहार-प्रादेशिक साहित्य-सम्मेलन के सभापति शिवनंदन सहाय ने कहा था: ‘हमारे विचार में तो कौंसिलों में पुरुषो की प्रतिद्वन्द्विनी बनने की अपेक्षा गृहलक्ष्मी और गृहदेवियां बनने ही में आर्या महिलाओं की अधिकतर शोभा है। अपनी भगिनियों को ऐसी ही शिक्षा और उपदेश देना सम्पादिका के लिये उत्तम होगा।’ (बिहार का साहित्य, पहला खण्ड, पुस्तक भंडार, पृष्ठ 112)
'चाँद' पत्रिका के 29 जनवरी, 1925 के अंक में ‘सती’ की दो सूचनाएँ प्रकाशित हैं। एक छिंदवाड़ा की और दूसरी छपरा (बिहार) की। छपरा की घटना का स्रोत ‘वॉयस और इंडिया’ नामक पत्र है। उसमें ‘पटना के सुप्रसिद्ध देशभक्त बाबू राजेन्द्र प्रसाद जी’ ने उक्त आशय का एक पत्र प्रकाशित कराया था। छपरा के बाबू बब्बन सिंह असहयोग आन्दोलन से जुड़े थे। वे स्त्रियों को सूत कातने और कपड़े बुनने की शिक्षा देते थे। खादी के प्रचार में उन्होंने अपनी जमीन भी रेहन रख दी। इन्हीं बाबू बच्चन सिंह के निधन के बाद उनकी पत्नी ने भी स्वयं को आग लगा ली। राजेन्द्र प्रसाद के पत्र की अन्तिम पंक्तियां ध्यान देने लायक हैं, ‘‘आस-पास के मुहल्ले में बिजली की तरह यह खबर फैल गई कि रामसूरत सती हो गई और हजारों लोग दर्शन के लिए एकत्र होने लगे। जिन दोनों प्राणियों ने खादी के लिए अपना सर्वस्व समर्पण कर दिया था उनका इस तरह अन्त हो गया। रामसूरत उस सच्ची सती का उदाहरण छोड़ गई जिसके विषय में हम लोग पुस्तकों में तो बहुत कुछ पढ़ते हैं पर प्रत्यक्ष उदाहरण किंचित ही देखते हैं।’’ (आशुतोष पार्थेश्वर, चाँद की ‘राजनीति’ (सन्दर्भ: भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन), अनुसंधान, अंक 17-18 जनवरी-दिसम्बर 2021) ‘सती’ का आकर्षण इतना बड़ा है कि प्रेमचन्द भी अपनी कई आरम्भिक कहानियों में उसका उत्फुल्ल अंकन करते मिलते हैं। ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ (1908) और ‘गुनाह का अगनकुंड’ (1910) शीर्षक कहानियों में यह देखा जा सकता है। (आशुतोष पार्थेश्वर, पूवोक्त) पितृसत्तात्मक समाज का एक अत्यंत सहृदय पुरुष भी, अगर बहुत सचेत न हो तो, पुरुष-वर्चस्व अथवा स्त्री-विरोध की भाषा का प्रयोग करेगा। टैगोर एक जगह लिखते हैं: ‘सती जैसे अपने पति के सिवा दूसरे को नहीं देखती, अच्छी कविता सहृदय के सिवा और किसी की अपेक्षा नहीं रखती।’ (अमृतराय, नयी समीक्षा, हिंदुस्तानी पब्लिशिंग हाउस, बनारस, 1950, पृष्ठ 207) 8 नवंबर, 1945 को कुसुम को लिखे पत्र में गांधीजी कहते हैं-‘सच्ची विधवा मानती ही नहीं है कि अपना पति का देह छुट गया इसलिये देहधारी आत्मा भी छुट गया। विवाह होता है वह कुछ पुतले के साथ नहीं लेकिन पुतले में भी आत्मा रहती है उसके साथ। विधवा का पुनर्लग्न निषिद्ध माना जाता है, इसका कारण भी यही है। इस कारण सिर पटकना, आत्मघात करना आदि विचार आते हैं वह सब धर्म और नीति के विरुद्ध है।’ (गांधी संपूर्ण वांग्मय, 82, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली, नवंबर 1991, पृष्ठ 51)
1926 ई. में गांधीजी बिहार के दरभंगा आए हुए थे। उन्होंने देखा कि स्त्रियों के बैठने के स्थान पर चिक का पर्दा डाला हुआ था। यह स्थिति गांधीजी को ठीक नहीं लगी। उन्होंने विरोधस्वरूप अपने द्वारा संपादित पत्र ‘नवजीवन’ में एक तीव्र टिप्पणी लिखी। (रामनंदन मिश्र, महात्मा गांधी और मैं, जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान, पटना, 2020, पृष्ठ 6) रामनंदन मिश्र ने जब 1928 में पर्दा प्रथा के विरुद्ध संघर्ष का आरंभ किया तो गांधीजी ने 28 जून, 1928 के ‘यंग इंडिया’ में एक अग्रलेख लिखकर इसका स्वागत किया। कहा कि ‘पर्दा प्रथा बिहार की आधी मानवता को सामाजिक सेवा से ही नहीं, बल्कि बहुत स्थानों पर उन्हें प्रकाश और हवा से भी वंचित रखती है। जितना जल्द लोग समझ जायें कि बहुत-सी सामाजिक बुराइयां हमें स्वराज की ओर बढ़ने नहीं देतीं, उतनी ही ज्यादा लक्ष्य की ओर हमारी प्रगति होगी। (रामनंदन मिश्र, पूर्वोक्त)
डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने अपने घर की औरतों का हाल लिखा है-‘हमारे यहाँ पर्दा बहुत सख्त होता है। मैंने देखा है कि जब मेरी भौजाई आईं तो उनके साथ दो दाइयां आई थीं और वह केवल उन दोनों से ही बातें कर सकती थीं! जीरादेई में एक कमरे में रहती थीं। कभी ओसारे में भी निकलने की इजाजत नहीं थी।’ (आत्मकथा, सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2002, पृष्ठ 46) ‘मेरी भौजाई तो कमरे से बाहर निकलती ही न थीं। हाँ, नित्य-क्रिया के लिए जाने के समय पहले सब लोग हटा दिये जाते। लोगों में दूसरा कोई आंगन में रहता ही न था। अगर कोई छोटा लड़का होता तो वह भी हटा दिया जाता। इतने से भी काफी पर्दा नहीं होता और उनके नैहर की दाइयां कपड़े का पर्दा लगाकर उनको ले जातीं।’ ....‘मेरी माँ, चाची और बहन भी जब उनके कमरे में जाती तो वह घूँघट तान के बैठ जातीं। जीरादेई की कोई दाई भी वहां जाने न पाती।’ ......‘जबतक मेरी माँ जीवित रहीं तबतक न तो मेरी भौजाई और न मेरी स्त्री ही कभी अपने कमरे से निकलकर आजादी के साथ आंगन में घूम-फिर सकीं या बैठ सकीं।’ (वही, पृष्ठ 47) ...‘इस प्रकार घर में बराबर बंद रहते-रहते मेरी भौजाई और मेरी स्त्री दोनों का स्वास्थ्य खराब हो जाना स्वाभाविक था। ऐसा ही हुआ भी। दोनों ही कुछ दिनों तक, एक के बाद दूसरी, गठिया से तकलीफ पाती रहीं, जो, बहुत दिनों के बाद, जब वे आँगन में खूब घूमने-फिरने लगीं, तभी छूटी।’ (वही, पृष्ठ 60) श्री धर्मलाल सिंह ने ‘राजेन्द्र अभिनन्दन ग्रन्थ’ में ‘मिथिला की महारानियां’ शीर्षक लेख की पाद-टिप्पणी में लिखा है कि ‘‘दरभंगा-राज-परिचार में पर्दा प्रथा बड़ी कड़ाई से बरती जाती है। ‘असूर्यंपश्या सा तु राजदारा की कहावत चरितार्थ होती है। अतः उनका छायाचित्र लेना एकदम वर्जित था। इसीलिए, उनके चित्र दुर्लभ हैं।’’ (राजेन्द्र अभिनन्दन ग्रन्थ, पृष्ठ 377)
आजादी की लड़ाई के दौर के अधिकतर हिंदी लेखक अपने-अपने कारणों से ‘स्त्री की आजादी’ से चिंतित लगते हैं। फिलहाल ‘मतवाला-मंडल’ के ‘मनोरंजन-मूर्ति’ तथा शिवपूजन सहाय के ‘साहित्यिक गुरु’ ईश्वरीप्रसाद शर्मा की ‘सुधरी हुई स्त्रियाँ’ कविता के व्यंग्य का ‘आनंद’ लें-‘न कहना सास का माने, न स्वामी का कहा करती।/है मन में जिस तरह आता, उसी ढंग से रहा करती।।/है परदा दूर कर डाला, सभा में बोलती फिरती।/है छोड़ा काम घर का, देश के हित है फिरा करती।।/न भाती पाकशाला औ न भाता कूटना-पिसना।/है भाता पाठ ‘नावेल’ का, कलम का रातदिन घिसना।।/है सुधरी नारियों ने अब सजायी मेम-सी सज्जा।।/पुरुष से लड़ रही अधिकार के हित नारियाँ जग की।/भला क्यों चुप रहेंगी देवियाँ इस वृद्ध भारत की?/हटाकर जाल घुँघट का, मिटाकर आँख की लज्जा।/इसी से भूलकर प्राचीनता आदर्श की अपने।/यहाँ भी देवियाँ हैं देखती यूरोप के सपने।।/मगर भारत का रुतबा क्या बढ़ेगा ऐसे करतब से।/हमारी देवियों का मान बढ़कर है जगत भर से।।/हमारे ढंग निराले हैं, हमारी रीति न्यारी है।/हमें लखकर चकित होता सदा संसार भारी है।/हमारा तो भला होगा, न भूलें रूप यदि अपना।/न छोडें रीति को अपनी, न देखें और का सपना।/पढ़ें सब नारियाँ, विदुषी बनें, कर्तव्य को पालें।/न सीखें किन्तु यूरप की निराले ढंग की चालें।।/बनें गृह-देवियाँ वे तो, कभी मत ‘लेडियां’ होवें।/किसी दिन भूलकर प्राचीन मर्यादा नहीं खोवें।।’ (बिहार के नवयुवक हृदय, पृष्ठ 37-38)
श्रीयुत माधव शुक्ल (लखनऊ) की ‘स्त्री दर्पण’ (पृष्ठ 48-49) में ‘स्त्री-धर्म’ कविता छपी थी, यहां उसे भी उद्धृत करना दिलचस्प होगा: ‘हे अबला गन! धर्म गहो, नहिं बोर नर्क में जाओगी।/कब तक रह इस नीच दशा में अपना समय गंवाओगी।।/घर, दुआर, धन, भाई, बन्धु नहिं अन्त काम कोइ आता है।/केवल एक धर्म मरने पर साथ जीव के जाता है।।1।।/कुल मरजादा, देश बड़ाई, बनी तभी तक रहती है।/जब तक धर्म सत्य की धारा लोगों के हिय बहती है।।/पति चरणों पर ध्यान सदा, यहि केवल धर्म तुम्हारा है।/इसको छोड़ अधर्म महा नहिं जिसका पारावारा है।।2।।/जिस नारी का देव, पितृ, गुरु, जप तप, सबही स्वामी है।/है पतिव्रता वही, अन्त में स्वर्ग लोक की गामी है।।/जो विवाह के पति वचनों को सदा ध्यान में धरती हैं।/नहीं यथोचित धर्म ग्रन्थ का अपने आदर करती हैं।।3।।/वे नारी गन जो अभाग्य वश हो जाती हैं पति से हीन।/तिनको धर्म ग्रन्थ अवलोकन सदा उचित शृंगार विहीन।।/जो गृहस्थ निज कर धर्म का करती हैं श्रम कर प्रतिपाल।/शिक्षा दे पुत्री पुत्रों को सदा सिखाती उत्तम चाल।।4।।/सुख में कभी नहीं आपे से जो बाहर हो जाती हैं।/महा दुःख पड़ने पर भी जो नहीं कभी अकुलाती हैं।।/बड़े धैर्य के साथ सदा जो घर का काज चलाती हैं।/पति का सुयश बढ़ाने के हित जो कर्म सरसाती हैं।।5।।/ऐसे कामों का करना ही है गृहस्थ नारी का धर्म।/अहो देवियो! तिस्से छोड़ो जेते निंदित नीच कुकर्म।।/सुनो तुम्हारे बिना गृहस्थी बन सकती है कभी नहीं।/केवल पुरुष बना लेता है ऐसा भी है सुना कहीं ?।।6।।/मानों एक शरीर गृहस्थी हाथ पांव जिसके हैं नर।/भीतर की अवयव नारी हैं रहता तन जिसके बलपर।।/हाथ उठाकर मुख देता है भीतर अग्नि पचाती है।/और बनाकर रक्त देह की दिन दिन शक्ति बढ़ाती है।।7।।/तो फिर सोंचो यदि हो जावे भीतर रोग ही का वास।/यह शरीर तब धीरे धीरे हो जावेगा सत्यानास।।/जिससे इसकी सब प्रकार से रजा करना है तब धर्म।/सुयश बढ़ानेवाला बढ़कर नहीं कोई सत्कर्म।।8।।’ (श्रीयुत माधव शुक्ल (लखनऊ), ‘स्त्री दर्पण’, प्रयाग, भाग 2, अंक 1, 1 जनवरी, 1910, पृष्ठ 48-49)
‘स्त्री-धर्म’ पर अगर जोर है तो इसका कारण है कि ‘‘एक कुल में यदि कोई पुरुष व्यभिचारी बन जाये, तो उस कुल में वर्णसंकरता नहीं हो सकती; परन्तु उस कुल में यदि कोई स्त्री व्यभिचारिणी बन जाय, तो उसमें अवश्य ही वर्णसंकर पैदा होने लगेंगे। गीता में देख सकते हैं, कि पुरुषों के बिगड़ने से वर्णसंकर पैदा होंगे, ऐसा नहीं कहा गया है। वहाँ लिखा है कि-‘स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय! जायते वर्णसंकरः’ अर्थात् स्त्रियों के बिगड़ जाने से कुल में वर्णसंकर पैदा होते हैं। जिस जाति में वर्णसंकरता आ जाती है, वह जाति अवश्यमेव नष्ट हो जाती है।’’ (विन्ध्येश्वरीप्रसाद शास्त्री, आर्यमहिला, मासिक, भाग 10, संख्या 5-6, भाद्रपद-आश्विन, संवत 1984 विक्रम, पृष्ठ 133; हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ 566-567।) क्योंकि ‘जिस जाति में यह वर्णाश्रम रूपी बन्धन नहीं है, वह जाति चिरकाल तक जीवन धारण नहीं कर सकती। इस विषय में संसार की अनेक जातियों का उदाहरण इतिहास स्वयं दे रहा है। प्राचीन ग्रीक, रोमन, बेबीलोनियन, इजिप्सियन आदि अनेक जातियों का पता तक नहीं रहा है। दुनिया के इतिहास में चार हजार वर्ष के पहले की कोई जाति नहीं है; किन्तु अनन्तकाल से लेकर आज पर्यंत सनातन धर्मावलम्बिनी आर्य जाति जीवित है और भविष्य में भी इस वर्णाश्रम बन्धन की रक्षा करनेवाली हमारी सतीशिरोमणि आर्यमातायें हैं। यदि इनके अन्तःकरण से सतीत्व का संस्कार नष्ट हो जाये तो वह आर्यजाति जीवित नहीं रह सकती।’ (वही) किन्तु, भारतीय पितृसत्तात्मक समाज की मान्यता है कि ‘कुलीन स्त्रियां विपत्ति में भी सती-चरित्र का परित्याग नहीं करतीं।’ (कथासरित्सागर, प्रथम लम्बक, 13-14)
उर्दू के प्रसिद्ध साहित्यकार इम्तयाज अली ‘ताज’ को 14 सितंबर, 1920 के अपने खत में प्रेमचंद ने लिखा था: ‘‘मैं लिटरेचर को मैस्कुलिन देखना चाहता हूँ, फेमिनिज्म, ख्वाह वह किसी सूरत में हो, मुझे पसन्द नहीं। इसी वजह से मुझे टैगोर की अक्सर नज्में नहीं भातीं। यह मेरा भीतरी नुक्स है, क्या करूँ। अशआर भी मुझे वही अपील करते हैं जिनमें कोई जिद्दत (मौलिक सूझ) हो। ‘गालिब’ के रंग का मैं आशिक हूँ। अजीज लखनवी के ‘गुलकदे’ की खूब सैर की थी मगर बदकिस्मती से आज तक एक शेर भी मौजूँ नहीं कर सका। न जी चाहता है। गालिबन शायराना हिस (संवेदनशीलता) दिल में है ही नहीं।’’ (कलम का सिपाही, पृष्ठ 56) इस खत के कई बरस बाद इन्द्रनाथ मदान के एक सवाल का जवाब देते हुए भी कि बंगला साहित्य क्यों दिल को ज्यादा छूता है, उन्होंने लगभग यही बात कही थी-‘‘उसमें एक स्त्रियोचित गुण पाया जाता है, जिसे मैं अपने स्वभाव के प्रतिकूल पाता हूँ।’’ (कलम का सिपाही, पृष्ठ 56) एक बार जैनेन्द्र ने भी चर्चा की थी कि ‘बंगाली साहित्य हृदय को अधिक छूता है’, तो प्रेमचंद ने कहा था कि ‘उसमें स्त्री-भावना अधिक है’। (जैनेन्द्र, ‘प्रेमचंद: मैंने क्या जाना और पाया’, प्रेमचंद स्मृति अंक, प्रेमचंद रचनावली, खंड 20 में संकलित, पृष्ठ 21)
'स्त्री-भावना’ अथवा ‘स्त्रियोचित गुण’ अस्पष्ट नहीं है। आनंदी के बारे में अमृतराय लिखते हैं: ‘उन्हें कभी किसी से झगड़ा करते नहीं देखा गया और न वह दूसरी औरतों की तरह इधर की बात उधर लगाने में या टोले-पडोसवाले की निंदा में ही रस लेती थीं।’ (कलम का सिपाही, पृष्ठ 10) कहा जाता है कि खुद ‘मुंशी प्रेमचंद छोटे भाइयों की पत्नियों को घूँघट में ही देखना पसंद करते थे। घर में घुसने से पहले अपने आने की सूचना खांसकर दिया करते थे।’ (आजकल, दिसंबर 2010, पृष्ठ 12) प्रेमचंद कहते हैं, ‘आज काफी स्त्रियां नौकरी करने लगी हैं, मगर वह अच्छा नहीं है, मैं इसको अच्छा नहीं समझता। अब इसका नतीजा क्या हो रहा है? अब पुरुष और स्त्री दोनों नौकरियां करने लगे, तब इसके माने क्या हैं? रुपए ज्यादा आ जाएंगे। उसी का तो यह फल है कि पुरुषों की बेकारी बढ़ रही है।’ आगे, ‘स्त्रियों की कमाई एक पैसा नहीं होती थी, और स्त्रियां काफी दबदबे के साथ घर पर शासन करती थीं, तब क्या वह कमाई करती थीं?’ (शिवरानी देवी, प्रेमचंद: घर में, आत्माराम एंड संस, 2008, पृष्ठ 217)
प्रेमचंद का बालविवाह हुआ था, लेकिन वह ऐसा ‘बालक’ था जिसकी आँख में पत्नी का उम्र में बड़ा होना सबसे ज्यादा चुभा था। शिवरानी देवी की लिखी किताब का भरोसा करें तो ‘बालक प्रेमचंद’ को सबसे पहले पत्नी की उम्र दिखी, सुंदरता-कुरूपता इसके बाद ही आती है। इस शादी की सारी बात प्रेमचंद ने शिवरानी देवी से गुप्त रखी थी। उनके घर के लोग भी इस योजना से वाकिफ नहीं थे। आशंका थी कि बात प्रकट करने पर उनके ब्याहता होने की चर्चा होगी और दूसरी शादी में विघ्न उपस्थित होगा। शिवरानी देवी लिखती हैं, ‘एक की मिट्टी पलीद कर दी। जिसकी कुरेदन मुझे हमेशा होती है। जिसे मैं बुरा समझती हूँ, वह हमारे ही यहाँ हो और हमारे हाथों हो। मैं स्वयं तकलीफ सहने को तैयार हूँ, परन्तु स्त्री जाति की तकलीफ मैं नहीं देख सकती। उसी का प्रायश्चित शायद मुझे भी करना पड़ेगा, हालांकि मैं बेगुनाह हूँ। मेरे पिता को मालूम होता तो आपके साथ मेरी शादी हर्गिज न करते।’ (प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 10) आगे, ‘आप पुरुष थे, आप मुझे ब्याह लाये, वे तो घर में बैठी हैं। यह क्या स्त्रियों के साथ अन्याय नहीं है? मैं भी बदसूरत होती, तो आप मुझे भी छोड़ देते। अगर मेरा बस होता तो मैं सब जगह ढिंढोरा पिटवाती कि कोई भी तुम्हारे साथ शादी न करे।’ (प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 10-11) प्रेमचंद झेंपते हुए कहते हैं, ‘इसीलिए तो तुम्हें मालूम न हुआ’। (प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 11) प्रेमचंद का तीन स्त्रियों के साथ संबंध रहा। पहली स्त्री के जीवनकाल ही में आपने एक और स्त्री के साथ संबंध बनाया। शिवरानी देवी के साथ शादी के बाद भी प्रेमचंद का उस स्त्री के साथ संबंध बरकरार रहा। सवाल है कि उस स्त्री के रहते प्रेमचंद ने शिवरानी देवी के साथ शादी क्यों की? सवाल यह भी है कि वह स्त्री प्रेमचंद की पत्नी क्यों नहीं बन सकी?
‘हिन्द स्वराज’ में गांधीजी मशीनीकरण का विरोध करते हैं। विरोध के कई कारण हैं। एक प्रमुख कारण यह हो सकता है कि यंत्रों की वजह से ‘जो स्त्रियां घर की रानियां होनी चाहिए, उन्हें गलियों में भटकना पड़ता है, या कोई मजदूरी करनी पड़ती है।’ (हिन्द स्वराज, सर्व सेवा संघ-प्रकाशन, वाराणसी, जून 2016, पृष्ठ 10-11) स्त्री का ‘मालिक’ उसका पति है। यह ‘मालिक’ स्त्री को ‘घर की रानी’ बनाता है, अन्यथा वह ‘वेश्या’ है। गांधीजी ने पार्लियामेंट को ‘वेश्या’ कहा। वेश्या कहने के पीछे गांधीजी का तर्क है: ‘पार्लियामेंट को मैंने बेसवा (वेश्या) कहा वह भी ठीक है। उसका कोई मालिक नहीं है। उसका कोई एक मालिक नहीं हो सकता।’ (हिन्द स्वराज, पृष्ठ 34) व्युुत्पत्ति विज्ञान कहता है कि ‘विश्’ (कुल) से दो शब्द व्युत्पन्न हुए-‘वैश्य’ और ‘वेश्या’। (भगवतशरण उपाध्याय, खून के छींटे इतिहास के पन्नों पर, पृष्ठ 77) विश् की वर्णविषयक संज्ञा ‘वैश्य’ हुई और उससे सेवित सामूहिक संपत्ति-सी नारी ‘वेश्या’ कहलाई। (भगवतशरण उपाध्याय, भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, पृष्ठ 105) कहना अनावश्यक है कि वैश्य भी ब्राह्मण-क्षत्रिय की सामूहिक संपत्ति थे। पालि भाषा में वैश्य शब्द का स्त्रीलिंग ‘वेसी’, ‘वेसिया’ या ‘वेस्सी’ है, जिसका अनुवाद ‘एक निम्न जाति की औरत’, ‘वेश्या’ दिया गया है। शिवरानी देवी की पुस्तक ‘प्रेमचंद: घर में’ का समर्पण कुछ इस तरह है: ‘स्वामी,/तुम्हारी ही चीज/तुम्हारे चरणों में चढ़ाती हूँ/इस तुच्छ सेवा को अपनाना/तुम्हारी दासी या रानी’।
परंपरागत पितृसत्तात्मक भारतीय समाज ने स्त्रियों की कई कोटियां बना रखी है-पत्नी, प्रेमिका, वेश्या आदि। यहां सहज ही ‘आलोकधन्वा याद आते हैं। कितनी प्रासंगिक हैं उनकी कविता ‘भागी हुई लड़कियां’ की ये पंक्तियां ‘तुम/जो पत्नियों को अलग रखते हो/वेश्याओं से/और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो/पत्नियों से। 1920 के दशक के भारतीय परिवार-समाज के बारे में लिखती हुई मृणाल पांडे बताती हैं कि ‘घरों के भीतर मर्दाने अलग होते थे, जहाँ समय-समय पर घर के मर्दों की महफिलें जमती और कभी-कभार उसमें ‘‘वैसी’’ औरतें मुजरे को बुलवाई भी जाती थीं। पुरुषों के सन्दर्भ में यह सर्वस्वीकृत था, कि उनकी उद्दाम मर्दानगी सिर्फ घरेलू स्त्रियों के सहवास से तृप्त नहीं होती थी। अतः युवा औरतों ने भी दूसरी किस्म की स्त्रियों की बात चुपचाप स्वीकार कर ली थी। इन औरतों के दुखों की अभिव्यक्ति गीतों में होती थी, वास्तविक जीवन में नहीं। प्रसंगवश, वाराणसी की कचैड़ी गली से अनेक रसज्ञ ‘कजली’ का रसास्वादन करने मिर्जापुर पधारते थे। इस पर उनकी पत्नियां उन्हें उलाहने देकर गाती थीं- ‘मिर्जापुर कइल गुलजार/कचैड़ी गली सून कइल बलमू।’ (सुरेश चंद्र वर्मा, ‘ऋतु एवं क्रीड़ा गीत: कजली, आजकल, अगस्त 2012) और बड़ी-बूढ़ियाँ तो इस स्वैराचार को सगर्व अपने खानदान की हैसियत का प्रमाण मानतीं, बखानती थीं। पत्नी से रोमांस या अपनी घरवाली से खुला बनाव-लगाव अच्छी नजर से नहीं देखे जाते थे। लेखिका ने खुद अपने श्वसुर-कुल की बुजुर्ग महिलाओं से एक अधपगली महिला रिश्तेदार के बारे में सुना है, जो घर की युवा बहुओं द्वारा शाम को सिंगार-पटार करने पर बेतरह खफा हो उठती थीं-‘कुछ तो उन दूसरियों के लिए छोड़ो!’ वे कहती थीं, घर-गिरस्तवालियों का, आँचल चिकना होवै है, उन लोगों मैं। तुम लोग उनकी राह पकड़ोगी, तो उन बेचारियों की कमाई धमाई का क्या होगा ? (मृणाल पांडे, स्त्री: देह की राजनीति से देश की राजनीति तक, पृष्ठ 43)
एक बार रामानन्द चट्टोपाध्याय के ‘विशाल भारत’ में नाटक में काम करनेवाली नर्तकियों के चित्र छप गये तो उन्होंने संपादक बनारसीदास चतुर्वेदी जी को बुलाया और सख्त हिदायत दी-‘मैं आपकी स्वाधीनता में बाधक नही हो सकता, पर चूंकि मेरा अनुभव आपसे कुछ अधिक है, इसलिए यह सुझाव दे सकता हूँ कि नर्तकियों के चित्र आप ‘विशाल भारत’ मे न छापें। वे प्रायः चरित्रहीन होती हैं।’ चतुर्वेदी जी ने तर्क करने की धृष्टता की-‘कोई सम्पादक किस-किस के चरित्र की खोज-बीन कर सकता है? चरित्र तो बहुत से लीडरो और लीडरानियों के भी शायद अच्छे नही है।’ इस पर ‘बड़े बाबू’ (रामानन्द चट्टोपाध्याय) ने केवल इतना ही कहा, ‘नेता और नेत्री मंच पर चढकर अपने हाव-भाव से जनता को पथभ्रष्ट तो नहीं करते, जबकि नर्तकियां वैसा करती हैं।’ (बनारसीदास चतुर्वेदी, महापुरुषों की खोज में, पृष्ठ 35) एक और दिलचस्प किस्सा है। कुछ ही दिनो बाद कहीं से घूमते हुए श्री राखालदास बनर्जी (सुप्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता) ‘विशाल भारत’ के कार्यालय में पधारे और जब चतुर्वेदी जी ने उन्हें ‘बडे बाबू’ की उक्त बात सुनाई तो उन्होंने हँसकर कहा, ‘मैं भी अपना एक किस्सा सुना दूं। प्रयाग में मैं एक बार केदार बाबू से मिलने गया हुआ था। वह भी विद्यार्थी थे और मैं भी। गलती से एक ऐक्ट्रेस का चित्र, जो मेरे पास था, बड़े बाबू की मेज पर ही छूट गया। दूसरे दिन जब मैं वहाँ पहुंचा तो वह चित्र चार टुकडो में बंटा हुआ, जहाँ का तहाँ रक्खा दीख पडा। मैंने केदार बाबू से पूछा कि क्या मामला है? उन्होने कहा, ‘यह शिक्षा आपको बडे बाबू ने ही दी है। बडे बाबू प्राचीनतावादी विचारो के हैं। आपको उनसे बहस नही करनी चाहिए।’ तथ्य है कि ‘बडे बाबू ने अपने जीवन में न कोई नाटक देखा था, न कोई फिल्म। हाँ, शान्तिनिकेतन मे विद्याथियो के नाटक उन्होने अवश्य देखे थे।’ (वही) स्मरण रहे कि महात्मा गांधी के लिए रामानन्द बाबू ‘ऋषि’ थे तो महावीरप्रसाद द्विवेदी उन्हें ‘गुरुतुल्य’ मानते थे। रोमा रोला को तोलस्तोय से कुछ अधिक ही ‘करुण’ मालूम पड़े थे।
एक दृष्टांत और : ‘कई वर्षों की पुरानी बात है। हमें एक आवश्यक कार्यवश स्वर्गीय डाॅक्टर गंगानाथजी झा के आवास-स्थान पर जाना पड़ा। हमलोग वार्तालाप कर ही रहे थे कि प्रयाग विश्वविद्यालय के कतिपय छात्र भी वहां आ पहुंचे। आने का कारण पूछने पर छात्रों ने कहा-‘‘हम विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर की लड़की के नृत्य का कार्यक्रम बनाना चाहते हैं। अतः हमें इसके लिये अनुमति प्रदान की जाय।’’ डाॅक्टर साहब ने उन छात्रों की बात सुन लेने पर एक जिज्ञासाभरी दृष्टि हमपर डाली। डाॅक्टर साहब का आंतरिक अभिप्राय जान लेने में हमें कठिनाई नहीं हुई। हमने कहा-‘‘आप विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर हैं और ये आपके विश्वविद्यालय के छात्र हैं। अतः उपस्थित विषय पर हमारा कुछ कहना सर्वथा अनुचित और अप्रासंगिक है।’’ इसपर डाॅक्टर साहब ने मुस्कराकर कहा-वह तो आप ठीक कहते हैं; किंतु ऐसे नृृत्य के संबंध में आपके व्यक्तिगत विचार क्या हैं, हम यही जानना चाहते हैं।’’ उत्तर में हमने कहा-हम तो सनातनधर्मी हैं। हमारे निज के विचार कुछ नहीं; प्रत्युत हमारे विचार तो वे ही हैं, जो हमारे नीतिकारों के अनुभूत विचार हैं। यह कहकर हमने नीति का एक श्लोकार्ध पढ़ा-‘सलज्जा गणिका नष्टा निर्लजास्तु (निर्लज्जाश्च) कुलांगनाः’ अर्थात् ‘जो युवती हया-शर्म को तलाक दे युवकों के बीच नाचे वह क्या कुलांगना कही जा सकती है?’ इसे सुन डाॅक्टर साहब ने उन छात्रों को अनुमति देना अस्वीकृत कर दिया। इस पर स्थानीय दैनिक ‘लीडर’ में डाॅक्टर साहब के विरुद्ध आंदोलन भी उठाया गया; किंतु प्रौढ़ विचार रखनेवाले डाॅक्टर साहब के मन के ऊपर उस अवांछनीय आंदोलन का कुछ भी प्रभाव न पड़ा। इतना ही नहीं, डाॅक्टर साहब ने ‘को-एडुकेशन’ को भी अपने विश्वविद्यालय में पनपने नहीं दिया।’’ (श्री द्वारिकाप्रसाद चतुर्वेदी, ‘आधुनिक नारी’, कल्याण, नारी अंक, पृष्ठ 145-46)
इस चेतना का बीज पुनर्जागरणकालीन साहित्य में है। 1874 ईस्वी में भारतेन्दु हरिश्चंद्र ’बालाबोधिनी’ नाम से एक स्त्री विषयक पत्रिका निकालते हैं, किन्तु उसमें स्त्रियों को वही परंपरागत शिक्षा दी जाती है, जिसमें उन्हें एक ’अच्छा गुलाम’ बनने के ’गुर’ सिखाये जाते थे। दो वर्ष तक प्रकाशित इस मासिक पत्रिका के किसी भी अंक में स्त्रियों के अधिकार के सवाल नहीं उठाये गये, न ही उन्हें नये ज्ञान-विज्ञान की रौशनी में अपने जीवन के बारे में खुद सोचने की कोई प्रेरणा दी गई। ’नारि नर सम होहिं’ का नारा देनेवाले भारतेन्दु अपने बलिया वाले प्रसिद्ध व्याख्यान ’भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ में कहते हैं-’लड़कियों को पढ़ाइए, किन्तु उस चाल से नहीं जैसे आजकल पढ़ाई जाती है, जिससे उपकार के बदले बुराई होती है। ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल धर्म सीखें, पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज शिक्षा दें।’ यह बलिया में ददरी के मेले के समय ‘आर्य देशोपकरिणी सभा’ में दिया गया भाषण है। इसे भारतेन्दु के सेक्रेटरी इंदिरायन उपाध्याय ने पढ़ा था जो बाद में ‘नवोदिता हरिश्चंद्र चंद्रिका’ के दिसंबर, 1884 के अंक में प्रकाशित हुआ।
’बालाबोधिनी’ में व्यक्त ‘स्त्रियोद्धार’ के संदर्भ में वीर भारत तलवार लिखते हैं कि ’इस मासिक पत्रिका में स्त्रियों की हालत सुधारने के बजाय खुद स्त्रियों को ही सुधारने का इरादा दिखाई देता है। इसमें उनके अधिकारों की नहीं, उनके कर्तव्यों की चर्चा की गई है।’ इस पत्रिका में स्त्रियों से संबंधित सबसे लंबी रचना ’बाला प्रबोध’ थी, जो 1857 की जनवरी से शुरू होकर अगले तीन-चार अंकों तक छपी। बिजनौर (पीलीभीत) के पास सिकंदराबाद के निवासी हीरालाल ने इसे सरकारी स्कूलों में लड़कियों के पाठ्यक्रम में लगवाने के मकसद से लिखा था। यह ठीक वैसा ही था, जैसा पाठ्यक्रम भारतेन्दु चाहते थे। “इसमें सास-ससुर, देवर-ननद, जेठ-जिठानी, शिशु आदि के प्रति और रस्म-रिवाजों तथा त्यौहारों के वक्त घर की बहू को कैसा सुंदर और योग्य वर्ताव करना चाहिए, इसका बखान किया गया है।“ पूरी रचना 1870 में छप चुकी डिप्टी नजीर अहमद की किताब ’मिरात-उल-उरूस’ के ढर्रे पर बनी है। नजीर अहमद ने अपनी इस बेहद लोकप्रिय किताब में स्त्री-शिक्षा की जबरदस्त हिमायत की है, लेकिन साथ ही उन्होंने चेतावनी भी दी है कि ’वे मर्दों की बराबरी करने की बात अपने दिमाग में हर्गिज न लाएं।’
भारतेंदु के मित्र रामदीन सिंह के खड्गविलास प्रेस के मैनेजर बाबू साहिबप्रसाद सिंह उन दिनों स्कूली पाठ्यक्रम के लिए किताबें लिखनेवाले प्रमुख लेखक थे। उन्होंने भारतेंदु की सहायता से तीन जिल्दों में स्त्रीशिक्षा की किताब तैयार की। उनकी ‘स्त्रीशिक्षा की पहली किताब’ खड्गविलास प्रेस से 1883 में छपी। इसमें एक पाठ है-शीलवती। इस पाठ में शीलवती नामक स्त्री के जीवन के बारे में लिखा गया है कि वह “घर या बाहर के सब कामों को पति से पूछकर करती और पति जब किसी विषय में कुछ पूछता तो अपनी बुद्धि के अनुसार बड़ी सावधानता से अच्छा और हितकारी मंत्र कहती, पर यह भी कह देती कि नाथ! मैं क्या जानूँ। मेरी स्त्री की बुद्धि कितनी। अपने पति के भोजन इत्यादि किसी काम में विलंब न (रस्साकशी, पृष्ठ 194) करती, नित्य बड़े सवेरे पति के पहले उठती और स्नानादिक करके गृहस्थी के काम में लगती, जो कोई वस्तु बाहर से मँगवाना होता वह मंगवा रखती, पति के भोजन के पीछे आप खाती। भोजन के पीछे वह सीना-पिरोना करती या और जो कुछ घर का काम निकलता करती या कोई पुस्तक अवलोकन करती या कुछ लिखती।’ (बाबू साहिब प्रसाद सिंह, स्त्रीशिक्षा की पहली किताब, खड्गविलास प्रेस, 1883, बांकीपुर, पृष्ठ 46; रस्साकशी, पृष्ठ 194-95 पर उद्धृत) दूसरी पुस्तक की अधिकांश सामग्री ‘बालाबोधिनी’ से संकलित है। लज्जा, पवित्रता, सास, ससुर, जिठानी, देवर, देवरानी आदि से किस ढंग का व्यवहार करना चाहिए-इन सभी विषयों पर विशेष रूप से इस पुस्तक में विचार किया गया है। (आधुनिक हिन्दी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका, पृष्ठ 144)
1907 तक ‘सरस्वती’ में छपे लेखों में स्त्रियों के ‘हिमायती लेखक’ न तो उसे बराबरी का हक देना उचित समझते हैं न स्वतंत्रता देना चाहते हैं। इस पत्रिका के लेखक प्रकारांतर से मनु का समर्थन करते लगते हैं। उदाहरण के लिए यहां जनवरी, 1907 के अंक से उद्धृत है, ’लोग मनु का इस बात में विरोध करते हैं कि वे स्त्रियों को स्वतंत्रता दिए जाने के विरोधी हैं...अच्छा, जरा देर के लिए मान लीजिए कि मनु के इस अन्याय से स्त्रियों को बचाने के लिए गवर्नमेंट ने एक कानून बनाकर स्त्रियों और पुरुषों के अधिकार बराबर कर दिए-उनके अनुसार स्त्रियों को मनमाना काम करने की आज्ञा मिल गई। इस दशा में यदि कोई कानूनदां स्त्री पति से कहने लगे-“सुनिए जनाब! मेरे और आपके अधिकार बराबर हैं-मैं भी स्वाधीन, आप भी स्वाधीन। एक दिन मैं चूल्हा-चैका और झाड़ू-बुहारू करूँ, एक दिन आप। एक दिन मैं आपकी सेवा करूँ, एक दिन आप मेरी सेवा करें, अथवा यदि वह कह बैठे ’मुझे संतान पैदा करने से इंकार है’ तो बताइए ऐसी स्वाधीनता का क्या नतीजा होगा। ...समाज को एक शृंखला में बंधा रखने के लिए व्यक्ति विशेष की स्वाधीनता को एक निर्दिष्ट सीमा के भीतर रखने की बड़ी जरूरत है।“
भारतेंदु ने लडकियों के पाठ्यक्रम की आलोचना करते हुए कहा कि 'ये पाठ्यपुस्तकें कई कारणों से आपत्तिजनक हैं। मैं मिस रोज ग्रीनफील्ड से पूरी तरह सहमत हूं कि बड़ी लड़कियों को प्रेमसागर (लल्लूलाल का बनाया) ग्रंथ पढ़ने के लिए नहीं देना चाहिए। विद्यांकुर और इतिहासतिमिरनाशक उनके नैतिक चरित्र का विकास नहीं कर सकते। चरित्र निर्माण (मोरालिटी) और घरेलू प्रबंध वगैरह के बारे में बतानेवाली अच्छी पाठ्यपुस्तकें उनके पाठ्यक्रम में लगानी चाहिए।' कहना अनावश्यक है कि प्रेमसागर अगर आपत्तिजनक ग्रंथ था तो वह लड़कों के लिए भी आपत्तिजनक होना चाहिए था। (वीरभारत तलवार, रस्साकशी, पृष्ठ 34)
'बालाबोधिनी’ में स्त्री को एक इनसान के रूप में देखने और उसकी समस्याओं को समझने का कोई प्रयत्न नहीं दिखता। चार साल तक निकली इस पत्रिका के किसी भी अंक में स्त्रियों के किसी भी अधिकार का सवाल नहीं उठाया गया, न उन्हें नए ज्ञान-विज्ञान की रोशनी में अपने जीवन के बारे में खुद सोचने की कोई प्रेरणा दी गई। भारतेंदु ने ब्रजभाषा में शृंगारिक कविताएं लिखी हैं। अपनी दोनों प्रेमिकाओं के लिए पद लिखे थे। 'अंधेर नगरी' में उस समय की प्रसिद्ध गानेवाली कई वेश्याओं के नाम दिये गये हैं। ये सभी भारतेन्दु के दरबार में आती-जाती थी। इन्हीं में से किसी के हाव-भाव पर भारतेन्दु को कोई नई उक्ति सूझी थी जिसपर कविता बनाकर उपस्थित सज्जनों को सुनाते हुए उन्होंने कहा था कि ‘हम इन सबों का सहवास विशेषकर इसलिए करते हैं। कहिए! यह सच्चा मजमून कैसे हो सकता था।' लेकिन सच है कि चार वर्षों तक छपी बालाबोधिनी में शृंगार रस की दूर-दूर तक कोई गंध नहीं मिलती। (रस्साकशी, पृष्ठ 38)