चंपारण में गांधी की सौवीं बरसी
1917 का चंपारण सत्याग्रह 2017 में अपनी 100वीं बरसी मनाने जा रहा है। सरकारी और गैर सरकारी संगठनों द्वारा उत्सव के आयोजन होंगे। एक बार फिर ’गांधी’ और उनके ’चेले’ ’महात्मा’ और ’देशभक्त’ घोषित होंगे और राजकुमार शुक्ल इतिहास से बाहर किये जायेंगे। क्या इस सौंवीं बरसी पर चंपारण आंदोलन के इतिहास का पुनर्मूल्यांकन नहीं करेंगे आप? क्या इस बात के सूत्र तलाशे जायेंगे कि गांधी के चंपारण आगमन के साथ ही स्थानीय नेतृत्व गायब क्यों हो गया? गांधी को लाया राजकुमार शुक्ल ने लेकिन उनके कर्ताधर्ता और सिपाही/सलाहकार बने डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, राजकिशोर बाबू और रामनवमी बाबू सरीखे लोग जो बगैर फीस के किसानों की बात नहीं रखते थे। क्या यह भी कहा जा सकता है कि चंपारण के किसान आंदोलन को गांधी के व्यक्तिगत सत्याग्रह में बदल दिया गया? क्या इस सत्याग्रह के बाद किसानों की समस्याएं खत्म हो गयी थीं? क्या कारण थे कि गांधी ने इस आंदोलन से कांग्रेस और पत्रकारों को दूर रखा? क्या कारण है कि किसानों की चिंता कर के आये गांधी ’रचनात्मक कार्य’ में लग गए? क्या वह सचमुच ’रचनात्मक’ थे या गांधी की ’शरणस्थली’? चंपारण सत्याग्रह की 100वीं बरसी पर ये सवाल मुझे बार-बार घेरते हैं।
चंपारण के गांधी
चंपारण आने से पहले गांधी इस जगह से परिचित न थे, किन्तु गांधी से यहाँ के लोग परिचित थे। गांधी से पहले तिलक, मालवीय जैसे कई प्रखर नेताओं को यहां लाने की कोशिश हुई थी, किन्तु यहाँ के गरीब किसानों के लिए किसी के पास समय नहीं था। किसान, कांग्रेस के एजेंडे में नहीं थे इसलिए गांधी यहां के लोगों के लिए अंतिम सहारा थे। चंपारण के किसान नेताओं की यह स्थिति भी नहीं थी कि कांग्रेस के मंच पर वे अपनी समस्या को रख सकें इसलिए उस समय के नामी-गिरामी वकील ब्रजकिशोर बाबू को किसानों ने अपनी बात कांग्रेस और गांधीजी तक पहुंचाने के लिए ’हायर’ किया। मरता क्या न करता! उम्मीद की जाती है कि इस कार्य हेतु ब्रजकिशोर बाबू ने किसान प्रतिनिधियों से मोटी रकम ली होगी। इस उम्मीद भरी अटकल की वजह गांधी की आत्मकथा है। गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि चंपारण में बिहारी वकीलों द्वारा किसानों से ली जानेवाली फीस की रकम सुनकर वे सन्न रह गये थे। कहने की जरूरत नहीं कि ये वे किसान थे जिनके घरों की औरतों की देह पर पूरे कपड़े भी नहीं होते थे। गांधीजी ने इस तरह के एक अनुभव का जिक्र किया है। आसपास के लोगों से मिलने के सिलसिले में वे एक घर के अंदर गये। मर्द लोग तो सामने आये। बातें करने। किन्तु घर की औरतें पर्दे की ओट से ही बातें सुनती रहीं। गांधी को मालूम था कि औरतों की भागीदारी के बगैर किसी आंदोलन की बात बेमानी है। इसलिए घर के मुखिया से उन्होंने घर की औरतों को भी बातचीत में शामिल करने का आग्रह किया। दो ही औरत सामने आ सकी। गांधी के पूछने पर कि ’क्या इस घर में दो ही महिला है’, उन्हें बताया गया कि साड़ी दो ही है। इसलिए एकबार में दो ही औरत सामने आ सकती है। बाकी स्त्रियां गमछी लपेटकर घर के अंदर गुजारा करती हैं। गांधी को चरखा की प्रेरणा इन्हीं घटनाओं से मिली होगी। आज 21वीं शती के व्यक्ति को जो कपड़ों में डूबा हुआ है, उसे चरखा का मर्म समझ में आने से रहा। उन्हें तो यह भी नहीं पता कि एक समय था जब आम भारतीय के लिए वस्त्र विलास की वस्तु समझा जाता था। इसे ’वस्त्राभूषण’ यूं ही नहीं कहा गया!
गांधीजी ने चंपारण को अपना ठिकाना बनाया। बिहार के कई प्रबुद्ध लोग (अधिकतर वकील) मदद के लिए आकर साथ रहने लगे। सबके नौकर-चाकर भी साथ थे। सबके अपने-अपने चूल्हे-चौके थे। ’तीन कनौजिया तेरह चूल्हा’ चरितार्थ करते ’स्वदेशी देशभक्त’ थे। एक अकेले गांधी थे जिसका कोई अमला-फैला नहीं था। बाकी सब नौकरों की चतुरंगिणी सेना के साथ थे। पैर दबाने के लिए अलग नौकर तो खाना बनाने के लिए अलग। गांधी पेशोपेश में थे कि किन साहबों से पहले निबटा जाये? इन काले साहबों से या गोरे निलहों से? शांतिनिकेतन का अनुभव काम आया। सारे नौकरों को छुट्टी दे दी। अब सबका खाना एक चौके में बनता। सब मिलकर बनाते। गांधी ने सबकी साहबी खत्म कर दी। गांधी ने सबको गांधी बनना सिखाया। लेकिन यह बीमारी इतनी जल्दी जानेवाली नहीं थी। गांधी जैसे ही अनुपस्थित होते कि नौकरों की फौज बुला ली जाती। फिर जैसे ही गांधी के आने का होता नौकरों को हटा दिया जाता। गांधी ने धीरे-धीरे सबको बिना नौकर का मालिक बनने को मजबूर किया। सबका मालिक एक है-और वह अकेला आदमी गांधी था!
बिहार में गांधी-1
बिहार राज्य अभिलेखागार, पटना में 1947 के दिनों की गांधी की एक दुर्लभ ऐतिहासिक तस्वीर सुरक्षित है। इस तस्वीर में एक कोने में दुबके गांधीजी हैं। मुँह को मास्क से ढंक रखा है। किसी कोरोना के भय से नहीं, बल्कि अस्पताल के ऑपरेशन थियेटर में होने की वजह से। मनु को दिल्ली, नोआखाली के दिनों से ही पेट मे लगातार दर्द हो रहा था किंतु समयाभाव की वजह से गांधी अपेंडिसाइटिस के इस ऑपरेशन को टालते आ रहे थे। बिहार आने के बाद उनके पास 10 दिनों का समय था इसलिए डॉक्टरों की सलाह को उन्होंने मंजूरी दे दी। मनु का ऑपरेशन हुआ और वह स्वस्थ हुई।
उन दिनों की घटनाओं का हाल मनु ने डायरी में नोट किया है। यह डायरी ‘बिहार के कौमी आग में’ शीर्षक से पुस्तकाकार छप चुकी है। मनु को बहुत सवेरे जगना और देर रात को सोना पड़ता था। गांधीजी के आराम करने का समय तय होता लेकिन मनु के सोने का कोई निर्धारित समय नहीं था। कभी-कभी तो काम करते और फंड के रुपये गिनते, हिसाब लिखते रात के एक तक बज जाते। कभी-कभी उसे भारी ऊब और तनाव महसूस होता। 5/3/47 की डायरी का समापन मनु ने इस तरह किया है, ‘बापू जी 11 बजे बिस्तर पर लेटे। उनके पैर दबाकर, सिर में तेल मलकर और मच्छरदानी बन्द करके मैं यहां आयी (घर से सोने की जगह थोड़ी दूर है)। बापूजी के कागजात ठीक से जमा कर रखे, सवेरे के लिए बैठक जमायी। डायरी लिखी। अब साढ़े बारह हो गये हैं। आंखों में नींद खूब भर गई है।’ (बिहार के कौमी आग में, पृष्ठ 8) मनु की मदद के लिए जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती देवी आ जाया करती थीं। मनु ने डायरी में नोट किया, ‘प्रभावती बहन ने उनके (गांधी के) पैरों में घी मला। प्रभा बहन के होने से मैं बड़ी निश्चिंत हूँ। वे स्वभाव की भी बहुत मीठी हैं। मुझे कहने लगीं, ‘‘तुम्हें कोई कुछ भी कहे, परन्तु तुम बापूजी को कभी न छोड़ना।’’ आगा खाँ महल से जुदा होने के बाद वे पहली ही बार यहाँ आयीं, अतः नयी-पुरानी बहुत बातें हुईं।’ (बिहार के कौमी आग में, पृष्ठ 3)
गांधीजी के बिहार आने की कोई योजना नहीं थी। बिहार को वे ‘अपना बिहार’ मानते थे क्योंकि चंपारण ने उन्हें गांधी बनाया था। उन्हें लगता था कि नोआखाली में बैठे-बैठे वे बिहार को संभाल लेंगे। लेकिन मामला गंभीर था। बिहारी हिन्दू ने नोआखाली का हिसाब बिहार के मुसलमानों के साथ कर लेने की ठानी थी। हिन्दू ही क्यों, गांधी को सूचना थी कि ‘इस कुकृत्य में बिहार के कांग्रेसी नेताओं का भी हाथ था।’ इस सूचना ने गांधी को अंदर तक मथ डाला। वे नोआखाली से सीधे पटना पहुंचे। स्थिति बहुत बिगड़ी हुई थी। गांधी ने अपील की ‘मेरे पास ऐसी बातें भी आई हैं कि अभी भी मुसलमान स्त्रियों को हिंदुओं के घरों में कैद करके रखा गया है। यह बात सच है तो मैं विनयपूर्वक कहता हूं कि ऐसा न कीजिए, उन सब बहनों को मेरे पास या राजेन्द्र बाबू के पास पहुंचा दीजिए।’ (वही, पृष्ठ 10)
बिहार में गांधी-2
1947 के दंगे में बापू नोआखाली से सीधे बिहार आये थे। पटना आने के तीसरे ही दिन सुबह की सैर के दौरान बापू की भेंट एक भिखारी से हुई। वह अंधा था इसलिए बापू को देख तो नहीं सकता था किन्तु उनके चरण का स्पर्श पाकर वह धन्य और पवित्र हो जाना चाहता था। कहने को वह हिन्दू था किन्तु आसपास के गांवों से भीख मांगकर जमा की गई चार आने की रकम उसने मुस्लिम-सहायता-कोष को सुपुर्द कर दी। हर्ष और उल्लास से गांधीजी की आंखों में चमक आ गई। उन्होंने भिखारी की पीठ थपथपायी और कहा कि आज से भीख माँगना छोड़ दो; अंधा आदमी भी बहुत काम कर सकता है। सूत तो कात ही सकता है। गांधीजी ने मनु को कहकर उसे तकली दिलवाई और स्वयंसेवकों से कहा कि सदाकत आश्रम में ऐसे लोगों का सदुपयोग हो।’ अपनी पीठ पर बापू का हाथ फिरा पाकर भिखारी काफी आनंद में था। एक ‘रॉयल बेगर’ ने एक सचमुच के भिखारी का उद्धार किया।
अपने ठिकाने पर लौटकर बापू ने मनु को समझाया, ‘तुमने देख लिया न, भिखारी जैसे ने भी पैसा अपने पेट में न डालकर खास नाम लेकर मुस्लिम-सहायता-कोष के लिए दिया। उसके चार आने की कीमत मेरी दृष्टि में तो चार करोड़ से भी अधिक है। इसका नाम है सच्चा दान! यह है बिहार की जनता! बिहार में कदम रखे आज तीसरा ही दिन है। इतने में ही यह जो छोटी-सी घटना हो गयी उसका मेरे मन पर बहुत अद्भुत असर हुआ है। ईश्वर ने यहाँ तक मेरी आवाज पहुंचायी है, यह उसकी महान कृपा है। हम जितने सच्चे होते हैं, निर्मल होते हैं, उतना उन गुणों का प्रतिबिंब ईश्वर हमें दिखाता ही है।’
बिहार में गांधी-3
बापू 5 मार्च, 1947 को कलकत्ता-पटना ट्रेन में सवार हुए। पटना जंक्शन पर भीड़ होने की आशंका से उन्होंने फतुहा स्टेशन पर उतर जाना ही मुनासिब समझा। इस बात की जानकारी कुछ ही लोगों को थी। इसलिए फतुहा स्टेशन पर बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह, विकास मंत्री डॉ. सैयद महमूद, अर्थमंत्री अनुग्रह नारायण सिंह तथा अब्दुल बारी कुछ चुनिंदा कार्यकर्ताओं एवं स्वयंसेवकों के साथ स्वागत एवं अगवानी के लिए वहां पहुंचे। किन्तु पत्रकारों को इस बात की खबर लग चुकी थी इसलिए वे लोग भी अपने लटकते कैमरों के साथ वहां प्रकट हो चुके थे। गाड़ी से उतरते ही बापू ने डॉ. सैयद महमूद से मजाक किया, ‘क्यों, आप तो अभी जिन्दे हैं न?’ श्रीकृष्ण सिंह की गाड़ी से बापू सैयद महमूद के आवास पर पहुंचे और उसे ही अपना ठिकाना बनाया। गांधी तक दंगे की जो खबर पहुंची थी उसके अनुसार बिहार के हिंदुओं ने बंगाल का बदला लिया था। कांग्रेसियों की भूमिका भी असंदिग्ध नहीं रही थी। इसलिए गांधी के इन दोनों से खिन्न होने के कारण थे। गांधी ने कहा कि ‘बिहार ने हिंदुस्तान का नाम डुबो दिया। नोआखाली के जंगली कृत्यों का अनुकरण करना न सीखना और बदले का विचार किये बिना मृत्यु का आलिंगन करके मानवोचित ढंग से जंगलीपन का सामना करना ही नोआखाली का बदला लेने का उचित मार्ग है।’ इस भाषण के बाद बापू को एक ‘तार’ प्राप्त हुआ जिसमें लिखा था, ‘बिहार के हिंदुओं को आप जरा भी उलाहना न दीजिए। उन्होंने जो कुछ किया है, वह कर्तव्यपालन की दृष्टि से ही किया है।’
'कबीर' में गांधी
स्वतंत्रता आंदोलन के समय बिहार में हर आदमी एक सर्जक था। होली हो या सोहर-सब में कबीर ही के बोल थे। बात जब ‘कबीर’ की हो तो क्या कहने। उस समय का एक प्रचलित ‘कबीर’:
‘अर रर, अर रर सुन लेहु मोर कबीर
दौरे में परजा के दुख की तनिक न पूछें बात
पकरि बेगारी गरिबन मारे जूता, घूंसा, लात
भला रे भला...
ये हाकिम नमक हराम बड़े।
चपरासिन से भले आदमिन के उखड़ावें मूंछ
अइसे अफसर ना सुधरेंगे जइसे कुकुर पूंछ
भला रे भला ...
इनके नस नस में जुलुम भरा।
धनवानन की डाली खा के सोवे पैर पसार
नील गाय, कुकुर, हिरनन का बिन बिन करे सिकार
भला रे भला...
इ बा लीला अफसरनन की।’ (नंदकिशोर शुक्ल, महात्मा गांधी की आंधी, 1920; मृत्युंजय सूरज नारायण सिंह, जायसवाल शोध संस्थान, पृष्ठ 38)