Thursday, September 10, 2026

भारत में बौद्धिकता और श्रम

भारतीय आर्यों के आरंभिक समाज-परिवार को समझने के क्रम में ऋग्वेद (9.112.3) के इस कथन को अक्सर उद्धृत किया जाता है कि 'मैं कवि हूँ, मेरे पिता वैद्य हैं और मेरी माँ अनाज पीसनेवाली है।' 90 के दशक के एक लेखक ने अपनी किताब में पत्नी के योगदान/श्रम को इन शब्दों में याद किया, 'पत्नी ने मुझे घरेलू झंझटों से मुक्त रखा। एक स्कॉलर को अपनी पत्नी से इससे ज्यादा और क्या अपेक्षा/उम्मीद हो सकती है!' अब ऋग्वेद के उपर्युक्त कथन को 'और' की जगह 'किन्तु' के साथ पढ़ें तो कहना होगा कि 'मैं कवि हूँ, मेरे पिता वैद्य हैं किन्तु मेरी माँ अनाज पीसनेवाली है।' इतिहास का यह पहला श्रम-विभाजन है जो स्त्री पुरुष के बीच का है। यह पुरुष-वर्चस्व का भी उदाहरण है जो इतिहास के एक लंबे कालखंड के बीत जाने के बाद भी बहुत-कुछ यथावत है। मदन कश्यप की 'चूल्हे के पास' कविता स्त्री जाति के अधीनीकरण के इस इतिहास को बखूबी रखती है : 'गीली लकड़ियों को फूँक मारती/आँसू और पसीने से लथपथ/ चूल्हे के पास बैठी है औरत/ हज़ारों-हज़ार बरसों से/ धुएँ में डूबी हुई/ चूल्हे के पास बैठी है औरत/ जब पहली बार जली थी आग धरती पर/ तभी से राख की परतों में दबाकर आग ज़िंदा रखे हुई है औरत!'

आप कह ले सकते हैं कि भारत का आम बुद्धिजीवी पत्नी को एक श्रमिक से ज्यादा नहीं देख पाता। दूसरे शब्दों में आप कह ले सकते हैं कि भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग का निर्माण स्त्री के गुलाम श्रम की बदौलत हुआ है। मुझे मदन कश्यप की कविता 'जब तुम आओगी' की याद आती है। कविता कुछ इस तरह है: 'नहीं खुली है चटाई/जिसे लपेटकर रख गयी हो कोने में/एकबार भी नहीं बिछी है वह चटाई/तुम्हारे जाने के बाद/जिसे बिछाकर धूप सेंकते थे हम/जो अंगीठी तुमने जलायी थी/चूल्हे में उसी की राख भरी है/चीजें यथावत पड़ी हैं अप्रयुक्त/तुम्हारे जाने के साथ ही/मेरे भीतर का एक बहुत बड़ा हिस्सा/जहाँ का तहाँ ठहर गया है/मैं तभी से भूखा हूँ/जब तुम आओगी/तुम्हारे साथ आये/मिकी-मिकू की बेखौफ हंसी की उष्मा से/मेरे अकेले की बर्फ पिघल जायेगी/जब तुम आओगी/तुम्हारे हाथ की बनी अच्छी चाय पिऊँगा/और बढ़िया खाना खाऊंगा/जब तुम आओगी/मौसम कोई भी हो अच्छा लगेगा/जब तुम आओगी/सिर्फ तभी/आंखों की भाषा का उपयोग करूँगा/जब तुम आओगी/और चीजों पर पड़ी महीनों की गर्द/झाड़ोगी/चीजें मुस्कुराकर तुम्हारा स्वागत करेंगी।'

मदन कश्यप की एक और कविता है 'फाव' शीर्षक से। संभवतः नंदकिशोर नवल द्वारा संपादित 'कसौटी' पत्रिका में मैंने पढ़ी थी। मुफ्त में मिलना फाव है। कवि को फाव पसंद है। बचपन में मुझे भी पसंद था। बनिये की दूकान का खास आकर्षण होता था। मूल वस्तु की बजाय कई बार इसपर ज्यादा ध्यान होता था। किंतु आज मुझे मालूम है कि बिना श्रम लगे किसी वस्तु का उत्पादन सम्भव नहीं। श्रम अपना मूल्य पैदा करेगा इसलिए फाव का 'सृजन' बाजार का धोखा है और 'फाव' के प्रति हमारी ललक कायम होने का मतलब है कि श्रम/श्रमिक के प्रति हमारा नजरिया दोषपूर्ण है।

भारतीय बुद्धिजीवियों का श्रम के प्रति हिकारत की भावना कोई नई परिघटना नहीं है। ऋग्वैदिक समाज में अगर श्रम के प्रति कोई तीव्र घृणा-भाव नहीं है तो इसका कारण है कि समाज में तीखा वर्ग-विभाजन नहीं है। स्त्री-पुरुष के बीच का श्रम-विभाजन तीखा अवश्य है। पुरुष कवि और वैद्य इसीलिए हो पा रहे हैं कि अनाज पीसने का काम अर्थात भूख की चिंता औरतें कर रही हैं। इन स्त्रियों ने पुरुषों को अवकाश के अवसर प्रदान किये। दुनिया की सारी कला, सारे दर्शन का जन्म अवकाश के क्षणों में हुआ है। इसी बात को सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता 'पोस्टमार्टम की रिपोर्ट' कुछ यूं रखती है :

गोली खाकर/ एक के मुँह से निकला-

'राम'।

दूसरे के मुँह से निकला-

'माओ'।

लेकिन तीसरे के मुंह से निकला-'आलू'।

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है

कि पहले दो के पेट भरे हुए थे।'

उपनिषदों के काल में जब अतिरिक्त उत्पादन के फलस्वरूप अधिशेष का उत्पादन शुरू हुआ तो समाज में न केवल वर्ग-विभाजन हुआ बल्कि श्रम-विभाजन भी हुआ। वर्ग-विभाजन हमेशा श्रम-विभाजन भी हुआ करता है। समाज में चार वर्ण बने-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। वर्ण चार थे किंतु वर्ग दो ही थे। पहले वर्ग में ब्राह्मण और क्षत्रिय थे तो दूसरे वर्ग में वैश्य और शूद्र थे। ब्राह्मण-क्षत्रिय का उत्पादन में श्रम नहीं लगता था इसलिए वे मालिक/सम्मानित थे। वैश्य और शूद्र उत्पादन से सीधे तौर पर जुड़े हुए थे। उनके श्रम के बिना उत्पादन सम्भव नहीं था। वे श्रमिक थे इसलिए उनकी हैसियत ब्राह्मण-क्षत्रिय के मुकाबले हीन थी। समाज में तो तरह के लोग थे। पहले श्रम करनेवाले तो दूसरे श्रम नहीं करनेवाले-सुविधाभोगी और भुक्तभोगी। श्रम से दूर रहनेवाले दार्शनिकों, संन्यासियों की महिमा समाज में बढ़ी और मजदूरों की घटी। सुविधाभोगी/अवकाशभोगी वर्ग कलाकार और दार्शनिक कहलाया तो श्रम करनेवाला मजदूर।

एक वर्ण/वर्ग विभाजित समाज में मनुष्य के क्रियाकलापों का भी एक नियत सामाजिक दर्जा होता है। संभवतः इसीलिए ऐसा जान पड़ता है कि हमारे यहाँ पुराने जमाने से ही विद्या और कला के दो अलग-अलग क्षेत्र स्वीकार कर लिए गए थे। वेदों और ब्रह्मविद्या का अध्ययन-अध्यापन विद्या या ज्ञान के रूप में था और लिखना-पढ़ना, हिसाब लगाना तथा जीवन-यात्रा में उपयोगी अन्यान्य बातें कला का विषय समझी जाती थीं। विद्या का क्षेत्र ब्राह्मणों के हाथ में रहा और कला का क्षेत्र क्षत्रियों, राजकुमारों, राजकुमारियों तथा वैश्यों के लिए नियत था। (हजारीप्रसाद द्विवेदी, प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद, पृष्ठ 32) विद्या का संबंध चूंकि ब्राह्मण से था और कला का ब्राह्मणेतर वर्णों से, इसलिए विद्या की तुलना में कला हेय रही।

प्राचीन भारत के ग्रंथकार प्रायः 64 कलाओं का जिक्र करते हैं। ये ग्रंथकार अपनी रुचि, वक्तव्य, वस्तु और संस्कार के अनुसार 64 भेद कर लिया करते थे। कालक्रम से कला का रूप कौशल ने ले लिया। सुप्रसिद्ध कश्मीरी पंडित क्षेमेन्द्र ने 'कलाविलास' नाम की एक छोटी-सी पुस्तिका लिखी थी। इस पुस्तक में वेश्याओं की 64 कलाएं हैं, जिनमें अधिकतर लोककर्षक और धनापहरण के कौशल हैं। कायस्थों की 16 कलाएं जिनमें लिखने के कौशल से लोगों को धोखा देना आदि बातें ही प्रमुख हैं; गानेवालों की अनेक प्रकार की धनापहरण की कलाएं हैं, सोना चुरानेवाले सुनारों की 64 कलाएं हैं, गणकों या ज्योतिषियों की बहुविध धूर्तताएँ हैं। (हजारीप्रसाद द्विवेदी, प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद, पृष्ठ 18) 

प्राचीन भारत में चोरी करना भी एक कला है, एक शास्त्र है। मृच्छकटिक के शर्विलक ने उसका अच्छा अध्ययन किया था। कैसे सेंध मारना होता है, दीपक बुझा देने के लिए कीट को कैसे उड़ाया जाता है, दरवाजे पर पानी छिड़क के उसे कैसे निःशब्द खोला जा सकता है, आदि सारी बातें उसने सीखी थीं। (हजारीप्रसाद द्विवेदी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 30) शर्विलक के चौरकर्म का ज्ञान इतना गहन है कि देखते बनता है। उन्होंने ब्राह्मण के जनेऊ का जो गुण-वर्णन किया है वह ध्यान देने योग्य है-"एतेन मापयति भित्तिषु कर्म मार्गम" अर्थात 'इस यज्ञोपवीत से सेंध मारने की जगह पाई जा सकती है।' (मृच्छकटिक 3-17)

उन दिनों देह दबाना भी कला की श्रेणी में शुमार था। मृच्छकटिक नाटक के नायक चारुदत्त का एक उत्तम संवाहक था। चारुदत्त की प्रेमिका वसंतसेना से जब उसका परिचय हुआ तो वसंतसेना ने उसकी कला की दाद देते हुए कहा कि 'भाई, तुमने तो बहुत उत्तम कला सीखी है।' इस पर उसने जवाब दिया कि 'आर्य, कला समझकर ही सीखी थी, पर अब तो यह जीविका हो गई है।' (हजारीप्रसाद द्विवेदी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 35)

भारतीय विचारकों का एक वर्ग ऐसा है, (जो सदा अल्पसंख्यक ही रहा है) जिसने सौंदर्य को अपमूल्य माना है। इस वर्ग में निवृत्तिवादी दार्शनिक और कुछ स्मृतिकार आते हैं। अथर्ववेद के 'गोपथ' नामक ब्राह्मण में विप्रों के लिए संगीत सर्वथा निषिद्ध माना गया है: "तस्माद् ब्राह्मणो नैव गायेन्न नृत्येत  माम्लागृधः" (2.21)। मनुस्मृति में संगीत (तौर्यत्रिक) अथवा नृत्य, गीत और काव्य की गणना कामज व्यसनों के अंतर्गत की गयी है और उन्हें वर्जनीय माना गया है-"मृगयाक्षो दिवास्वप्नः परिवादः स्त्रियो मदः। तौर्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः।।" (मनु., 7-47; नगेन्द्र, 'सौंदर्य -मूल्य तथा अन्य जीवन -मूल्य', मन्नू भंडारी/अजित कुमार(संपादक), संकल्प का सौंदर्य शास्त्र, राधाकृष्ण, दिल्ली, पहला संस्करण:1997, पृष्ठ 75)

इस चेतना के फलस्वरूप भारत में यांत्रिकी और भौतिकी की प्रगति नहीं के बराबर हुई। ऐसा संभवतः श्रम के प्रति घृणा की वजह से हुआ। इस विषय पर प्रफुल्ल चंद्र राय ने सविस्तार लिखा है। आस्तीन चढ़ाकर, हाथ काले करके, पसीना बहाये बिना जिस विज्ञान की रत्ती भर भी प्रगति नहीं हो सकती, वह है यांत्रिकी और भौतिकी। और जिन विज्ञानों की प्रगति के लिए सबसे कम शारीरिक श्रम करने पढ़ते हैं वह हैं गणित और ज्योतिष। निरीक्षण और तात्विक चिंतन-ये दो गुण यदि भरपूर हों तो गणित और ज्योतिष की प्रगति हो सकती है और इस बात में संदेह नहीं कि ये गुण ‘हमारे’ ब्राह्मणों में भरपूर थे।

चिकित्सा और आरंभिक अवस्था के रसायन की कितनी भी जीवन के लिए कितनी भी जरूरत क्यों न हो, तो भी ब्राह्मणों/धर्मरक्षकों के लिए 'अशौच' ही थीं क्योंकि दस्त लगे आदमी का उपचार करने का अर्थ है भंगी का भी काम करना। शव-विच्छेदन भी हीन जाति का काम; और चमड़ा कमाने की रासायनिक प्रक्रिया का अध्ययन करने का अर्थ है चमार का काम। चरक और सुश्रुत को वेदान्तवादी ब्राह्मणों का रोष सहना पड़ा तो इसमें ताज्जुब की कोई बात नहीं है। (एस. जी. सरदेसाई, भारतीय दर्शन : वैचारिक और सामाजिक संघर्ष, पी. पी. एच., नई दिल्ली, हिन्दी: प्रथम संस्करण: अगस्त 1979, पृष्ठ 109-10) इन चिकित्सको को कौटिल्य का भी विरोध झेलना पड़ा है। ऋग्वैदिक अश्विनकुमारों के सचमुच अब बुरे दिन आ चुके थे।

श्रम के प्रति घृणा का भाव लिए हम आधुनिकता की दहलीज भी लांघ गये। अकारण नहीं है कि रवींद्रनाथ के 'गोरा' उपन्यास में जो पुनर्जागरणकालीन बंगाल की सांस्कृतिक दुनिया का सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक मूल्यांकन माना जा सकता है, कोई भी चरित्र अपनी रोजी-रोटी के लिए श्रम करता नहीं लगता : इसके ठीक विपरीत, मिसाल के लिए, चार्ल्स डिकेन्स के उपन्यासों में जीवन के प्रति 'पात्रों' की अभिवृत्ति के निर्माण में श्रम की अहम भूमिका है। (हम्फ्रे हाउस, दि डिकेन्स वर्ल्ड, 1961, पृष्ठ 55; के एन पणिक्कर, 'आधुनिक भारत का सामाजिक और बौद्धिक इतिहास', आधुनिक भारत (सं.-बिपन चंद्र), अनामिका पब्लिशर्स, दिल्ली, 2000, पृष्ठ 135)

एक पुरानी कहावत है-'खेती, खसम सेती' अर्थात खेती का स्वामी किसान जब स्वयं अपने हाथों से खेती करता है, तभी सुख से जीवन बिता सकता है। दूसरी कहावत है कि 'खेती क्यारी बीनती, और घोड़ा कौ तंग। अपने हाथ सँवारियौ, लाख लोग होइ सँग।' सीख है कि खेती-क्यारी, विनती और घोड़े का तंग अपने हाथों से संभालो, चाहे कितने ही मनुष्य उसे करने के लिए तैयार हों। (डॉक्टर अम्बाप्रसाद 'सुमन', ब्रजभाषा-शब्दावली, प्रथम खंड, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण : 1960, पृष्ठ 1) बाबा तुलसीदासदास भी खुद से खेतों की निराई करनेवाले को चतुर किसान कह गये हैं, किन्तु ये सब बातें किताबी हैं। पढ़ा-लिखा स्वाधीन नागरिक तो किसानी की गंध तक से परहेज करता प्रतीत होता है। पुरखों में अगर कोई हुआ भी तो वह किसान या 'फार्मर' कहते हुए सकुचाता है। वह रूसी लेखक तुर्गनेव के 'पिता और पुत्र' उपन्यास का बजारोव नहीं जो अपने दादा के हलवाहे होने की बात स्वीकार ले। इसलिए वह भाषा में भी सावधानी बरतेगा। हाँ, एग्रिकल्चरिस्ट में वह गंध नहीं है! 

प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों में किसान को भूमिहीन खेतिहर मजदूर बनते देखा तो फणीश्वरनाथ रेणु की 'ठेस' कहानी में एक कलाकार/शिल्पकार को मजदूर में परिणत होने का चित्र देखा। बचपन में पढ़ी इस कहानी के दो पात्र-सिरचन और मानू अब भी याद को कारुणिक बना जाते हैं। इतिहास सामाजिक परिवर्तन का इतिहास है। समाज का परिवर्तन साँप का केंचुल उतारने जैसा है। सुना है, साँप को अपना केंचुल उतारते/छोड़ते गहरी पीड़ा होती है। समाज की इस पीड़ा को होरी, गोबर और सिरचन जैसे लोग व्यक्त कर पाते हैं। आज हम बात-बात में सामंती समाज की मूल्यहीनता की बात कर लें, किन्तु कला का मूल्य उसी समाज में था। सामंती समाज के ध्वंस के बाद सिरचन एक कलाकार/शिल्पकार से मजदूर बनता है। परिवर्तन की त्रासदी यह है कि वह पूरा मजदूर भी कहाँ बन सका है। मन और मिजाज तो उसका अब भी कलाकार वाला है लेकिन गांव के लोग मजदूर भी नहीं बेगार समझते हैं। मजदूर अपने उत्पादन के जरिए मूल्य सृजित करने की क्षमता रखता है। बेगार कोई मूल्य सृजित नहीं करता। हमारी तरफ अर्थात मगही में एक कहावत चलती है-'बइठल से बेगारी भल'। बेगारी को श्रम की कोटि में नहीं रखा गया है। सिरचन इसी कोटि का है। जब गाँव में किसी को कोई मजदूर नहीं मिलता तो सिरचन को याद करता है। सिरचन कोई मूल्य सृजित नहीं करता इसलिए पेट-भर भोजन का भी अब हकदार नहीं। पेट-भर खाना पर भी उससे काम कराना अब घाटे का सौदा करना है। सिरचन का मन-मिजाज चूँकि अब भी नहीं बदला है, इसलिए घाटे-लाभ का बीजगणित उसे नहीं मालूम। अब भी उसके अंदर एक कलाकार का स्वाभिमान फन काढ़े बैठा रहता है। एक समय था जब उसकी कारीगरी के देश-विदेश में चर्चे थे। महानगरों में उसकी कला की पूछ थी। उसकी बनाई शीतलपाटी कलाप्रेमियों के ड्राइंगरूम की शान बनती थी। मिथिला-क्षेत्र में इस शीतलपाटी जैसी कला-शिल्प की कितनी ही नायाब वस्तुएं बनती थीं। उस जमाने के एक लेखक ने तो यहां तक बयान किया है कि शीतलपाटी भारत ही नहीं बल्कि यूरोपीय घरों की भी शोभा बढ़ाती थी। यह इतनी चिकनी और मुलायम होती कि थोड़ी भी असावधानी से कोई इस पर फिसलकर गिर सकता था। रेणु ने इस कला की और कलाकार की मृत्यु देखी थी।

Wednesday, September 9, 2026

वह श्रद्धा कहाँ से लाऊँ कॉमरेड?

सन 84 में मैं पटना आया और बी. एन. कॉलेज में दाखिला लेकर पढ़ने लगा। पटना तब सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था। अपने अग्रज मित्रों से और शहर की दीवारों पर लिखी इबारत से पटना में काम कर रहे छात्र संगठनों का एक मोटा मोटी अंदाजा हो चुका था। बड़े भाई के आत्मीय मित्र और कथाकार हंसकुमार पांडेय जी की साहित्यिक चर्चाओं से यह मालूम हो चुका था कि पटना में प्रगतिशील लेखक संघ के नाम से लेखकों का एक संगठन भी है। नाम के अलावा इस लेखक संगठन के बारे में कुछ न जानता था।

हंसकुमार पांडेय की प्रगतिशील लेखक संघ वाली इन चर्चाओं में नंदकिशोर नवल, अरुण कमल, तरुण कुमार और अपूर्वानंद हमेशा मौजूद रहते। हाँ, खगेन्द्र ठाकुर का नाम मैंने तब तक न सुना था। वे पांडेय जी की चर्चाओं में शायद ही कभी आए हों। खगेन्द्र जी का नाम मैंने 87-88 में सुना जब 'जनशक्ति' दैनिक में लिखना शुरू किया। लेकिन तब भी केवल नाम ही सुना था, मिला न था। नवल जी से हुई एक प्यारी मुठभेड़ के बाद ही खगेन्द्र जी से मिलने की चाह बढ़ी। वर्ष 89 में नंदकिशोर नवल 'जनशक्ति' में वातायन कॉलम में साहित्यिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर नियमित लिख रहे थे। नवल जी से कुछ बिंदुओं पर तनिक असहमत होते हुए 'आलोचना की राजनीति' शीर्षक से मैंने भी एक लेख लिखा जो 'वातायन पर दस्तक' के तहत प्रकाशित हुआ। नवल जी को मेरे इस लेख से कम, मुझे इस तरह महत्त्व देकर छापे जाने से अधिक पीड़ा पहुंची थी। इसका नतीजा हुआ कि नवल जी ने 'जनशक्ति' में लिखना बंद कर दिया। शायद हमेशा के लिए। उन्हें यह विश्वास था कि मैं खगेन्द्र ठाकुर के पाले का आदमी था। कुछ दिनों बाद की एक मुलाकात में उन्होंने खगेन्द्र ठाकुर के साथ मेरे संबंधों के बारे में पूछा भी था और तब मैंने यही कहा था कि इस लेख के लिखने तक आपसे और खगेन्द्र ठाकुर से बराबर का अपरिचय रहा है। सच है कि खगेन्द्र ठाकुर से मेरी पहली मुलाकात सन 91 में सायन्स कॉलेज में हुई थी। संभवतः प्रेमचंद की जयंती का अवसर था, और जहाँ तक याद है, उपस्थित लोगों में खगेन्द्र ठाकुर के अलावा अरुण कमल, गोपेश्वर सिंह, कुमार मुकुल, दीपक कुमार गुप्ता तथा अमरेंद्र कुमार आदि थे।

धारा-विवाद और खगेन्द्र ठाकुर

कभी पटना प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से 'धारा' नाम से एक बुलेटिन जारी हुई थी जिसमें अपूर्वानंद जी का चर्चित और विवादास्पद लेख 'नागार्जुन की राजनीति' छापा गया था। कहने की जरुरत नहीं कि इस लेख में नागार्जुन को सोवियत-विरोधी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विरोधी साबित किया गया था। बौद्धिक जगत में इस लेख को लेकर काफी प्रतिक्रिया हुई थी। 

यह लेख 1985 में आया था। खगेन्द्र ठाकुर ने उसके लेखक और भूमिका-लेखक (बाद में ससुर-दामाद) दोनों को निजी तौर पर बता दिया था कि यह लेख उचित नहीं है। बिहार प्रगतिशील लेखक संघ ने भी अपने को उससे अलग बताया। इस विवाद में भीष्म साहनी जी ने एक पत्र लिखा और स्पष्ट कहा कि 'लेखक को लिखने की आजादी है, लेकिन उसे प्रगतिशील लेखक संघ से नहीं छापना चाहिए था।' (खगेन्द्र ठाकुर, प्रगतिशील आंदोलन के इतिहास-पुरुष, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ 92)

उसके कुछ दिनों के बाद जमशेदपुर में प्रगतिशील लेखक संघ का राज्य सम्मेलन हुआ। नामवर जी उद्घाटन करने पहुंचे थे। जब नामवर जी जमशेदपुर पहुँच गये, तो उनसे मिलने खगेन्द्र ठाकुर होटल में गये। मिलते ही उन्होंने पूछा, 'खगेन जी यह सब क्या हो रहा है?' खगेन्द्र जी ने पहले समझा नहीं, इसलिए पूछा, क्या हो रहा है? अरे यह 'नागार्जुन की राजनीति' का मामला! "ओह, वह, मैंने भी छपने पर उसे देखा और पढ़ा।" "ऐसा है?" खगेन्द्र जी ने कहा, "जी हां"। वे बोले, "समझ गया"। नामवर जी को अध्यक्षीय भाषण करना था। उन्होंने समकालीन कविता और उसके मूल्यांकन की समस्या पर बोलते हुए उग्र स्वर में कहा, "आज नागार्जुन की राजनीति पर संदेह किया जा रहा है, उन पर प्रश्न उठाया जा रहा है। मुझे भी कुछ लोगों ने पिछले बीस-पच्चीस वर्षों से संशोधनवादी घोषित कर रखा है। लेकिन मैं जो काम तब कर रहा था, वही आज भी कर रहा हूँ। कुछ लोग लगे हैं प्रगतिशील लेखक संघ को झाड़ू से बुहारकर साफ कर देने को, गोया यह लेखक संघ न हुआ मेहतरों का संघ हो गया। ...हमारे बीच कुछ लोग हैं जिनके हाथ में खून की प्यासी तलवार है, उन्हें जब दुश्मन नहीं मिलता तो अपने घर में ही तलवार भांजने लगते हैं।" (देखें, खगेन्द्र ठाकुर, प्रगतिशील आंदोलन के इतिहास-पुरुष, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ 116-17)

कठिन है भगवतशरण पर लिख पाना

डा. खगेन्द्र ठाकुर की इस स्वीकारोक्ति से कि ‘भगवतशरण उपाध्याय पर लिख पाना एक कठिन काम है’, अधिकतर विद्वान सहमत होंगे। हालांकि खगेन्द जी के लिए, ‘यह आश्चर्यजनक है कि जिस भगवतशरण उपाध्याय ने इतना विशाल साहित्य रचा, उनके बारे में प्रायः नहीं लिखा गया है’, किंतु मेरे लिए इसमें आश्चर्य करने जैसी कोई बात नहीं है। दरअसल, उपाध्याय जी का ‘विशाल साहित्य’ ही उन पर लिखे जाने में बाधा उपस्थित करता है। आज के उत्तर-आधुनिक समय में सब कुछ पढ़ने और विशाल साहित्य रचने को प्रतिभा नहीं माना जाता। इस विशेषीकरण के दौर में ऐसे विद्वानों के लिए कोई ‘खाना’ नहीं बना होता जिसमें उन्हें डालकर ‘खपाया’ जा सके। आज के समय का पहला सवाल होता है कि आप साहित्यकार हैं, इतिहासकार हैं अथवा कोई समाजशास्त्री हैं। अगर आपका ज्ञान इस तरह के खानों में बंटा है तब तो ठीक वरना ‘अनुपयोगी’ और ‘अप्रासंगिक’ हैं। आज के पाठक सुकरात, चाणक्य या मार्क्स के जमाने के ‘पिछड़े’ दिमागवाले नहीं हैं कि आप अपना सारा ज्ञान उन्हीं के सम्मुख झाड़ दें। अगर आप ‘हिन्दी साहित्य’ के विद्यार्थी हैं और अगर संस्कृत एवं अंग्रेजी के लेखकों को पढ़ लिया तो माफी मांगनी पड़ सकती है। खगेन्द्र ठाकुर ने ‘साहित्य अकादमी’ के लिए भगवतशरण उपाध्याय पर विनिबंध लिखकर निश्चय ही परंपरा की लीक छोड़ी है। शायद दूसरे ‘धर्मभ्रष्टों’ को भी इससे बल मिले।

लेखक ने इस छोटी-सी पुस्तिका (वैसे पुस्तिका छोटी ही होती है!) में भगवतशरण उपाध्याय के विशाल साहित्य को भरसक समेटने की कोशिश की है। मूल्यांकन बहुत ही यथार्थपरक और आलोचकीय दृष्टि से संपन्न है। उपाध्याय जी की जीवनी से लेकर इतिहास, संस्कृति एवं आलोचना के प्रतिमान तक पर रोशनी डाली गई है। यहां तक कि संस्कृत साहित्य में उपाध्याय जी का जो अवदान है, उसकी भी समीक्षा उन्होंने प्रस्तुत की है। कुछ स्थापनाओं को, स्थानाभाव की वजह से छोड़ देना पड़ा होगा। विशेषकर भाषा विज्ञान का क्षेत्र-जिसमें गंभीर काम के लिए रामविलास शर्मा पढ़े और जाने जाते हैं, उपाध्याय जी कई सूत्र छोड़ गए हैं। डा. रामविलास शर्मा को पढ़ते हुए दृष्टि अगर उपाध्याय जी तक फैलाई जाए तो हिन्दी में भाषा-विज्ञान के विकास को समझने में आसानी हो सकती है। खासकर, भाषा-विज्ञान में मार्क्सवाद की जो भूमिका है, उसे पहचानने तथा रेखांकित करने में सहूलियत हो सकती है। संस्कृत और प्राकृत की जो बहस है उसमें उपाध्याय जी पूरी प्रामाणिकता के साथ प्राकृत को मूल भाषा सिद्ध करते हैं और संस्कृत को उसका ‘विकसित’ रूप मानते हैं

समाज विज्ञान और विशेषकर इतिहास लेखन के क्षेत्र में ‘नीचे से इतिहास’ (हिस्ट्री फ्रॉम बिलो) का जो राग अलापा जाता है, खगेन्द्र ठाकुर ने ठीक ही उसका श्रेय उपाध्याय जी को दिया है। फर्क सिर्फ इतना है कि इतिहासकार स्थितियों का चित्रण कर अपना दायित्व पूरा हुआ मान बैठता है जबकि उपाध्याय जी आज के शोषितों, पीड़ितों एवं दलितों और वंचितों को नया जीवन पाने के लिए संघर्ष करने की चेतना भी देते हैं। इस तरह इतिहास के अध्ययन और साहित्य के लेखन की प्रक्रिया में मानवीय संवेदना को केन्द्र में रखना उपाध्याय जी की विशिष्टता है।

उपाध्याय जी की तरह खगेन्द्र ठाकुर की द्वन्द्वात्मक इतिहास दृष्टि कहीं-कहीं मलिन हो जाती है। एक जगह वे लिखते हैं ‘मनुष्य अतीत का पुनर्निर्माण नहीं कर सकता है।’ सच्चाई यह है कि इतिहास दृष्टि में बदलाव के साथ-साथ अतीत के बारे में हमारी धारणाएं भी बदलती हैं और प्रत्येक बार एक दूसरा ही अतीत हमारी आंखों के सामने जीवित होता रहा। अतीत लगातार बदलता रहा, क्योंकि बदले हुए वर्तमान के उद्येश्य दूसरे थे, बिल्कुल नये प्रयोजन थे। खगेन्द्र जी की सम्प्रदायिकता संबंधी समझ भी उलझी हुई थी। बहुत हाल तक वे मानते रहे थे कि 'सांप्रदायिकता, आधुनिक युग की नहीं मध्यकाल की चीज है।' (आलोचना -59)। दरअसल, राष्ट्रीयता एवं सांप्रदायिकता दोनों ही आधुनिक भारत की उपज हैं। इस तरह की गलती का मूल कारण है कि लोग सांप्रदायिकता एवं सांप्रदायिक तनाव दोनों को एक ही चीज मान बैठते हैं। सांप्रदायिकता औपनिवेशिक भारत की देन है जबकि सांप्रदायिक तनाव अथवा संघर्ष मध्य युग में भी था। (डा. अखिलेश कुमार, कम्युनल रॉयट्स इन मॉडर्न इंडिया)।

लेख की चोरी और खगेन्द्र ठाकुर

मैं अक्सर कहता कि स्वातंत्र्योत्तर बिहार में 'ठाकुर' दो ही हुए-विजय कुमार ठाकुर और खगेन्द्र ठाकुर बाकी के सब 'ठक्कुर' हैं. इन दोनों के घर एक नियमित अंतराल पर जाता रहता। इनके प्रति श्रद्धा खींच ले जाती लेकिन दुखद कि इधर कई सालों से जाना बंद हो गया था। दरअसल घटना हुई कि ब्रजकुमार पांडेय ने मेरे एक लेख की चोरी की। 11 फरवरी, 2013 को मैंने फेसबुक पर लिखा, "क्या ही दुखद है कि मुझे अपने पूर्व प्रकाशित लेख 'बुद्ध और स्त्री विमर्श' को सी.पी.आई. का साप्ताहिक पत्र 'जनशक्ति', पटना (10-16 फरवरी, 2013) के अंक में प्रगतिशील लेखक संघ, पटना के एक शीर्ष पदाधिकारी के नाम से हू-ब-हू पढ़ना पड़ रहा है ! लेखक हैं ब्रजकुमार पाण्डेय. वे इस कुकृत्य के लिए सार्वजानिक रूप से लिखित माफ़ी मांगे अन्यथा मैं क़ानूनी नोटिस भेजने की तैयारी में हूँ."

16 अप्रैल, 2015 को मैंने पुनः फेसबुक पर लिखा : "बीते साल मैंने लिखा था कि 'प्रगतिशील लेखक संघ' के एक पदाधिकारी ब्रजकुमार पाण्डेय ने मेरे लेख 'बुद्ध का स्त्री विमर्श' को अपने नाम से छपा लेने का अपराध किया है. 'प्रगतिशीलता' के कुछ दलालों ने मेरे इस वक्तव्य का यह कहते हुए विरोध किया था कि ब्रजकुमार पाण्डेय का प्रगतिशील लेखक संघ से कुछ भी लेना-देना नहीं है. कल के अख़बार में पढ़ा कि उक्त ब्रजकुमार पाण्डेय को प्रगतिशील लेखक संघ, पटना का अध्यक्ष बनाया गया है. अगर यह खबर सही है, तो प्रगतिशील लेखक संघ ने एक वैसे लेखक को, जिस पर लेख-चोरी का आरोप है, दण्डित करने की बजाय सम्मानित करने का पाप किया है. इस सांगठनिक-अपराध से मुझे गहरी पीड़ा पहुंची है. इसलिए  प्रगतिशील लेखक संघ से मेरी मांग है कि वह अध्यक्ष को अविलम्ब बर्खाश्त करे और इस अपराध के लिए सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगे." जब किसी प्रत्युत्तर की आशा खत्म हुई तो मैंने सीधे प्रगतिशील लेखक संघ ही को मेल करना मुनासिब समझा और पूछा "प्रगतिशील लेखक संघ चुप क्यों है ?"

"ब्रजकुमार पाण्डेय पर लेख-चोरी का आरोप  

Add star  Dr Raju Ranjan prasad<rajooranjan@gmail.com> Mon, Apr 20, 2015 at 7:50 AM

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महाशय,

बीते साल मैंने अपने फेसबुक स्टेटस में लिखा था कि 'प्रगतिशील लेखक संघ' के एक पदाधिकारी ब्रजकुमार पाण्डेय ने मेरे लेख 'बुद्ध का स्त्री विमर्श' को अपने नाम से छपा लेने का अपराध किया है तो 'प्रगतिशीलता' के कुछ दलालों ने मेरे इस वक्तव्य का यह कहते हुए विरोध किया था कि ब्रजकुमार पाण्डेय का प्रगतिशील लेखक संघ से कुछ भी लेना-देना नहीं है. दो-तीन दिन पहले

अख़बार (प्रभात खबर) में पढ़ा कि उक्त ब्रजकुमार पाण्डेय को बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का अध्यक्ष बनाया गया है. अगर यह खबर सही है, तो प्रगतिशील लेखक संघ ने एक वैसे लेखक को, जिस पर लेख-चोरी का आरोप है, दण्डित करने की बजाय सम्मानित करने का पाप किया है. इस सांगठनिक-अपराध से मुझे गहरी पीड़ा पहुंची है. इसलिए प्रगतिशील लेखक संघ से मेरी मांग है कि वह अध्यक्ष को अविलम्ब बर्खाश्त करे और इस अपराध के लिए सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगे.

उत्तर की आशा में,

राजू रंजन प्रसाद"

मुझे विश्वास था कि कोई कुछ बोले या न बोले किन्तु खगेन्द्र ठाकुर मामले को अवश्य नोटिस में लेंगे लेकिन जब एक दिन अखबार में पढ़ने को मिला कि चोर को दंडित करने की बजाय पुरस्कृत किया गया और श्रीमान ठाकुर ने कोई स्टैंड तो नहीं ही लिया उल्टे चोर को बचाने में रुचि दिखाई तो निराशा तो हुई ही साथ ही उस नाम के साथ जो श्रद्धा जुड़ी थी वह खत्म हो गई। इस प्रसंग के बाद मैंने उनके घर जाना बंद कर दिया। बीच-बीच में मेरे ससुर जी की गोष्ठियों में उनसे मुलाकात होती तो मेरी खोज करते किन्तु अफसोस कि पुरानी श्रद्धा को पुनः जीवित नहीं कर सका। पहलेवाली वह श्रद्धा कहाँ से लाऊँ, कामरेड?

भारतीय संस्कृति में पिता एवं पितृसत्ता

एक समय था जब विवाह नाम की संस्था नहीं थी। यौन स्वच्छंदता थी। आदिम साम्यवाद की तर्ज पर आप उसे 'यौन साम्यवाद' का युग कह ले सकते हैं। पुत्र, पिता का नहीं होता था बल्कि उसकी पहचान मां से होती थी। पिता अज्ञात थे। यह व्यक्तिगत/निजी संपत्ति के उदय से पहले का काल था जब पिता और पुत्र सभी कबीले की संपत्ति थे। 

महाभारत के शांतिपर्व में गौतम के पुत्र चिरकारी की कथा है। एक बार अपनी पत्नी को व्यभिचार लिप्ता देखकर उन्होंने पुत्र से उसको मार डालने को कहा। पुत्र ने यह सोचकर कि पति ही जब स्त्री का रक्षक है तो उसके चरित्र-भ्रंश का दोष भी रक्षक का ही है, स्त्री का नहीं (265/40), माता को मार नहीं डाला। बाद में गौतम को अपनी 'साध्वी' पत्नी को इस प्रकार मार डालने के आदेश से बड़ा कष्ट हुआ। पर तपःस्थान से लौटकर जब देखा कि पत्नी मार नहीं डाली गई तो संतुष्ट ही हुए। गौतम की पत्नी ही अहल्या थी। अहल्या की कहानी नाना स्थानों में नाना भाव से वर्णित है। पर यहाँ (महाभारत में) जिस प्रकार कही गई है वही अधिक संगत जान पड़ती है। यहाँ न तो अहल्या के पत्थर होने का अभिशाप है न राम के चरणस्पर्श से पुनर्जीवन- लाभ। गौतम ने यहाँ बाद में ठीक ही समझा है कि राग, दर्प, मान, द्रोह, पाप और अप्रिय कार्य में देर से (धैर्यपूर्वक) काम करनेवाला (चिरकारी) ही प्रशस्त है और बंधु,  सुहृद, भृत्य और स्त्री के अव्यक्त अपराध के मामलों में (सोच-समझकर धैर्यपूर्वक) देर से काम करनेवाला ही प्रशस्त है। (शांतिपर्व 265/70-71) चिरकारी यहाँ कहते हैं कि स्त्री अपराध नहीं करती, अपराध पुरुष करता है। (वही, 40) फिर संतान के लिए माता ही गुरु है, पिता नहीं; क्योंकि असल में तो माता ही जानती है कि संतान का असली पिता कौन है और उसका गोत्र क्या है (वही, 35)। (आचार्य क्षितिमोहन सेन, संस्कृति संगम, पृष्ठ 72-73 पर उद्धृत)

निजी संपत्ति के उदय के परिणामस्वरूप मां धीरे-धीरे नेपथ्य में गई और पिता सामने आया। अब भारतीय संस्कृति में पिता को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। धर्मग्रंथों में पितृऋण की चर्चा है। पिता बनकर ही इस ऋण से मुक्त हुआ जा सकता है। पिता ने पुत्र पर असीमित अधिकार प्राप्त कर लिया था। कठोपनिषद में वाजश्रवा और नचिकेता की कहानी के माध्यम से पिता-पुत्र संबंध में पिता की श्रेष्ठता, उसके वर्चस्व को दिखाया गया है। वाजश्रवा ने पुत्र नचिकेता को मृत्यु के देवता यम को दानस्वरूप दे डाला। मजेदार है कि नचिकेता ने मृत्यु के देवता यम से तो सवाल किया किन्तु एक पिता के इस असीमित अधिकार पर कोई सवाल खड़ा नहीं किया। 

कालक्रम से पिता प्रभुत्वशाली होता गया। रामचरितमानस में भी एक पिता (दशरथ) के द्वारा वनगमन का अनुलंघ्य आदेश दिया जाता है। माता कौसल्या कहती हैं कि पिता की आज्ञा का पालन करना ही सब धर्मों का शिरोमणि धर्म है-"पितु आयसु सब धरमक टीका"। राम पिता की अवज्ञा करेंगे, यह बात कल्पना में भी नहीं आती। इस बात की कल्पना भी तुलसी के राम कर पाते हैं। वह भी भाई लक्ष्मण की मूर्छा को ढाल बनाकर। यहाँ राम कहते हैं कि अगर यह जानता कि वन में भाई से बिछड़ना होगा तो पिता की उस बात को नहीं मानता। कहने की जरूरत नहीं कि दशरथ द्वारा राम को वनगमन का दिया गया आदेश राजा से ज्यादा पिता का आदेश है। 

मातृहन्ता परशुराम की कथा भी पिता के असीमित अधिकार ही की कहानी है। कहानी है कि जमदग्नि की पत्नी रेणुका एक दिन स्नान करने के लिए नदी-तट गई तो वहां उसने किसी गन्धर्वदंपति को जल में क्रीड़ा करते देखा। उस मनोहर दृश्य को देखकर उसके मन में ईर्ष्या जागी और वह उन दूषित विचारों से कलुषित हो गई। जब वह वापिस घर आई तो क्रोध के अवतार जमदग्नि ने उसे 'सतीत्व की कांति से हीन' देखकर बड़ा धमकाया और अपने पुत्रों को उसका सिर काट देने की आज्ञा दी। पहले चारों पुत्रों ने ऐसा क्रूर दुष्कृत्य करने में आनाकानी की। परशुराम उनका 'सबसे छोटा पुत्र' था। उसने तुरंत पिता की आज्ञा का पालन किया और कुल्हाड़े से अपनी माता का सिर काट डाला। (आप्टे, संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 438) तुलसीदास ने भी लिखा है, "परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी।। तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ।।" बल्कि तुलसी तो पुत्र को उचित-अनुचित देखने का न अवकाश देना चाहते हैं न अधिकार। कहते हैं कि जो अनुचित और उचित का विचार छोड़कर पिता के वचनों का पालन करते हैं, वे सुख और सुयश का पात्र होकर अंत में इंद्रपुरी में निवास करते हैं : "अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन। ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन।।" (रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा संख्या 174)

मौर्य शासकों की घोषणा है कि 'सारी प्रजा उसकी संतान है।' इसमें प्रजा के कल्याण की चिंता कम, पिता के असीमित अधिकार की घोषणा ज्यादा है। यह असीमित अधिकार प्राचीन भारतीय समाज में पिताओं को स्वेच्छा से अपनी पत्नी और बच्चों को बेचने तक का अधिकार प्रदान करता था। वह उन्हें दासों के रूप में भी बेच सकता था। पालि साहित्य में इसका सर्वोत्तम उदाहरण राजा वेस्सन्तर का है, जिसने अपनी पत्नी मद्दी और दो बच्चों को दासों के रूप में दे दिया। (जातक 6-456; देवराज चानना, प्राचीन भारत में दास प्रथा, पृष्ठ 101 में उद्धृत) राजा हरिश्चंद्र की कहानी भी है जिसने काशी नगरी में अपनी पत्नी और बच्चे को बेच दिया। पिता के इस असीमित अधिकार को कानूनी आवरण उस प्रसिद्ध स्मृतिश्लोक से मिलता है, जिसमें यह विधान है कि बेटे, पत्नी और दास का सम्पत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता। जो कुछ भी उनके पास होता है वह भी उनके स्वामी का अर्थात पिता, पति या स्वामी का अधिकार होता है। हमें राजा सोमक का और भी प्राचीनतर उदाहरण मिलता है जिसने अपना एकमात्र बेटा यज्ञार्थ दे दिया और राजा शिवि का उदाहरण भी जिसने अपने बेटे के मांस से तैयार एक थाल भोजन एक ऋषि को दिया।

प्यारे हरीचंद की कहानी रह जायगी

राजा शिवप्रसाद 'सितारेहिंद' की प्रतिक्रिया में सन 1880 ईस्वी के 'सारसुधानिधि' में एक प्रस्ताव-लेख छपा कि हरिश्चन्द्र को 'भारतेन्दु' की पदवी मिलनी चाहिए, इसको एक स्वर से सारे देश ने स्वीकार कर लिया और सब लोग इन्हें भारतेन्दु लिखने लगे, यहाँ तक कि भारतेन्दु जी इनका उपनाम ही हो गया। इस पदवी को न केवल इस देश के लोगों ने स्वीकार किया, वरंच यूरोप के लोग भी इन्हें बराबर भारतेन्दु लिखने लगे। (राधाकृष्ण दास, भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र का जीवन चरित्र, पृष्ठ 85-86) आइए, इस भारतेन्दु को जानें।

भारतेन्दु की इतिहास दृष्टि

इतिहास पर भारतेन्दु ने कई किताबें लिखीं। (हेमंत शर्मा (संपादक), भारतेन्दु समग्र, वाराणसी, 1987, पृष्ठ 583-803; मुंशी विनायक प्रसाद, तवारीख़-ए-उज्जैनिया, नवल किशोर प्रेस, लखनऊ, वॉल्यूम 1, पृष्ठ 5; सुरेन्द्र गोपाल, उर्दू हिस्ट्रियोग्राफी इन बिहार इन द नाइंटीटिन्थ सेंचुरी, के पी जायसवाल रिसर्च इंस्टीट्यूट, नवंबर, 2000, पृष्ठ 79) 'तवारीख़-ए-उज्जैनिया' लिखने के पहले लेखक मुंशी विनायक प्रसाद ने कई विद्वानों को विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित किया था। भारतेन्दु भी इतिहास लेखक के बतौर उपस्थित हुए थे। विनायक प्रसाद ने लिखा है कि भारतेन्दु ने मौखिक इतिहास के उपयोग के बारे में 18 महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जोर दिया था। भारतेन्दु के लिए मौखिक स्रोत स्थानीय इतिहास लेखन के लिए सबसे भरोसेमंद हैं। स्थानीय परंपरा को जानने-समझने के लिए उन्होंने गांवों के भ्रमण की बात कही। और इन अवसरों पर महत्वपूर्ण भवनों, बगीचों, तालाबों आदि को सूचीबद्ध करने की आवश्यकता पर बल दिया। भवन-मंदिर तथा दूसरे किसी स्थापत्य के नमूने के निर्माता, उसकी शैली आदि के बारे में भी जानकारी लिपिबद्ध हो जाये तो क्या कहने। गांव के नाम के साथ-साथ इसके संस्थापक के नाम व अन्य जानकारियां इकट्ठी की जाएं। आसपास के धनी तथा प्रसिद्ध लोग व गांव के बारे में पूर्वप्रचलित किस्से-कहानियां भी टांक ली जाएं। भारतेन्दु ने स्थानीय अर्थव्यवस्था, कृषि एवं शिल्प के दस्तावेजीकरण पर भी बल दिया। भारतेन्दु की स्पष्ट राय थी कि इतिहास सिर्फ उज्जैनिया सरदारों की वंशावली, उनके युद्ध और जय-पराजय के किस्से न हों, बल्कि दर्पण की भांति दिखा सके कि आम जन अतीत में कैसे रहते थे। (भारतेन्दु समग्र, पृष्ठ 5-7; सुरेन्द्र गोपाल, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 79)

भारतेंदु और विवाह-गीत में गाली

बाबू शिवनंदन सहाय ने लिखा है-'यह (भारतेंदु) विवाह आदि में बुरे गीत गाना पसंद नहीं करते थे वरन मई 1880 में जब इनकी कन्या का विवाह हुआ तो उस समय इन्होंने अपने घर गाली का गाना बन्द कर दिया।' (बाबू शिवनंदन सहाय, हरिश्चंद्र, पृष्ठ 251-52; चंदन कुमार श्रीवास्तव, 'हिन्दी नवजागरण और नारी नर सम होंहिं', परिषद पत्रिका (स्त्री विमर्श विशेषांक), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, अप्रैल 2003-मार्च 2004) 'कविवचनसुधा' में यह बात प्रकाशित हुई और भारतेंदु के मित्र ठाकुर जाहर सिंह ने आगरे से इनको पत्र लिखकर धन्यवाद दिया कि "आपने यह अच्छा प्रबंध किया कि विवाह में जो स्त्री बुरा-बुरा गीत गाती थीं तिस की रीति उठा दी।" (शिवनंदन सहाय, पूर्वोद्धृत) इस पत्र में भारतेंदु से कहा गया कि हमारी जाति की स्त्रियां अच्छा गीत नहीं जानतीं अतः "आपसे मेरी प्रार्थना है कि कोई पुस्तक ऐसी बने जिसमें हर समय के गीत अच्छे-अच्छे और सरल भाषा में होंय जो स्त्रियां उनको पढ़कर बुरी चाल के गीत आदि को छोड़ दें।" (वही)  विवाह में गाली-गीत से परहेज रखनेवाले भारतेन्दु हरिश्चंद्र विधवा समस्या पर लिखते हुए 'भ्रूणहत्या' शीर्षक लेख में कहते हैं कि 'स्त्री सती तभी तक है, जब तक मौका नहीं मिला' अर्थात स्त्रियों को स्वतंत्र रहने का कोई अधिकार नहीं है। (डा. पूर्णिमा मौर्या, 'नवजागरणकालीन पत्रिकाएं और आरंभिक नारीवाद', नमन (अर्धवार्षिक), वर्ष 6, अंक 8)

ध्यान रहे, रामविलास जी द्वारा बतायी गयी 'हिन्दी जाति' के एक महाकवि जो किसान चेतना के कवि हैं-वे तुलसीदास, विवाह के बुरे गीतों से परेशान नहीं हैं। वहाँ जनकपुर में जब विवाह संपन्न होता है तो स्त्रियां गाती हैं-'जेंवत देहि मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी'। आखिर अपनी परंपरा से प्रेरणा लेनेवाले भारतेंदु जो उसी 'हिन्दी जाति' के संस्थापक और 'राष्ट्रीय संस्कृति' की नींव रखने वाले हैं-यहां विवाह के बुरे गीत क्यों रोक रहे हैं? (चंदन कुमार श्रीवास्तव, पूर्वोद्धृत)

भाषा के बारे में इस तरह का ख्याल रखने वाले अकेले भारतेन्दु ही नहीं थे। जिक्र है कि फैलन ने एक पढ़े-लिखे आदमी से लोकगीत इकट्ठा करने को कहा। उसने लोकगीत इकट्ठे किये पर लिखा-'इसकी भाषा बहुत अशुद्ध है; उसे सुधारकर भेजने में कुछ समय लगेगा।' (रामविलास शर्मा, भारतेन्दु-युग और हिन्दी भाषा की विकास-परंपरा, राजकमल प्रकाशन, 1975, पृष्ठ 266-67) एक अन्य अंग्रेजी तथा प्राच्य भाषाओं के विद्वान ने फैलन से कहा कि 'नजीर के उद्धरणों से अपने कोश को भ्रष्ट न करें।' (वही, पृष्ठ 267) फैलन का विचार था कि 'सबसे स्वाभाविक और जोरदार मुहावरे लिखित भाषा में नहीं, बोलचाल की भाषा में देखने को मिलते हैं।' (वही, पृष्ठ 264) उन्होंने उत्सवों-त्योहारों में बिहार के अपढ़ जनों को अश्लील गीत गाते और अनुरूप मुद्राएं बनाते देखा था। उनका स्पष्ट मानना था कि ये लोग ऊपर से देखने में अश्लील किन्तु व्यवहार में उन लोगों से कहीं ज्यादा ईमानदार थे जो अपनी नैतिकता की चादर के नीचे हर तरह की बेईमानी छिपाये हुए थे। जीवन में यह सब भी है; उसे छिपाया क्यो जाय? (वही, पृष्ठ 260)

भारतेन्दु और हिन्दी पत्रकारिता

भारतेन्दु जिस दौर के पत्रकार हैं वह हिंदी पत्रकारिता का आरंभिक काल है। तब अखबार का सारा दारोमदार संपादक के ऊपर होता था। संपादक को अखबार की ज्यादातर सामग्री खुद ही तैयार करनी होती थी। कभी-कभी तो पूरा का पूरा अखबार एक अकेला संपादक ही लिख मारता था। डा. राजेन्द्र लाल मित्र स्वयं भारतेन्दु बाबू को 'लिखने की मशीन' कहा करते थे। 'आनन्दकादम्बिनी' के संपादक बद्रीनारायण चौधरी लगभग पूरा अखबार खुद ही रंग डालते थे। 1904-5 के दिनों तक 'सरस्वती' 'मासिक पुस्तक' ही बनी रहती है और जिसका अभिप्रेत था कि जरूरत पड़ने पर एक अकेला आदमी अर्थात संपादक ही सारे लेख लिख डाले। भारतेन्दु इसे पत्रकार-कला के विरुद्ध मानते थे, इसलिए 'आनन्दकादम्बिनी' के संपादक को लिखा था : 'जनाब यह किताब नहीं है कि जो आप इकेले ही इकराम करते हैं बल्कि अखबार है कि जिसमें अनेक-जन-लिखित लेख होना आवश्यक है और यह भी जरूरत नहीं कि सब एक ही तरह के लिखक्कड़ हो।' (रामरतन भटनागर, भारतेन्दु हरिश्चंद्र : एक अध्ययन, किताब महल, इलाहाबाद, 1947, पृष्ठ 106-7)

भारतेन्दु जी ने सन 1873 में 'हरिश्चंद्र मैगजीन' नामक प्रथम मासिक पत्रिका निकाली और यही आठ संख्याओं के अनन्तर 'हरिश्चंद्र चंद्रिका' हो गई। इसी में हिन्दी गद्य का वह परिष्कृत रूप पहिले-पहिल दिखलाई पड़ा जिसे देश की हिंदीभाषी जनता ने उत्कण्ठापूर्वक अपनाया। भारतेन्दु जी ने स्वरचित 'कालचक्र' में लिखा भी है कि 'हिंदी नई चाल में ढली, सन 1873 ईस्वी'। (ब्रजरत्नदास, भूमिका, भारतेन्दु के निबंध, पृष्ठ 6) 'नए चाल में हिन्दी ढली' के संबंध में भारतेन्दु का जीवन-चरित लिखने वाले एक विद्वान का कहना है कि उन्होंने इसके साथ 'हरिश्चन्द्री (हिंदी)' शब्द भी लिखा था, पर छापनेवाले की असावधानी से वह छूट गया और न छप सका। (केसरीनारायण शुक्ल, भारतेन्दु के निबंध, प्राक्कथन, पृष्ठ 11)

1880 तक हरिश्चंद्र ने बड़े उत्साह से प्रकाशित किया। इस पर अंग्रेजी में लिखा रहता था : "A monthly journal published in connection with Kavi Vachan Sudha, contain articles on literary scientific and religious subjects, antiquity reviews, dramas, history, novels, political selections, gosits, human wit." (भारतेंदु  : एक अध्ययन, पृष्ठ 104 में उद्धृत)। स्पष्ट है कि भारतेन्दु इस पत्र को सार्वविषयक (Miscellany) बना रहे थे। इतने विषयों की एक साथ कल्पना ही अभी के लिए बड़ी बात थी। एक तरह से यह द्विवेदी जी की 'सरस्वती' के पहले सरस्वती की कल्पना थी। (भारतेन्दु एक अध्ययन, पृष्ठ 104) 

1880 ईस्वी में मोहनलाल विष्णुलाल पांड्या इसे उदयपुर से प्रकाशित करने लगे तब इसका नाम बदलकर 'हरिश्चन्द्रचंद्रिका और मोहनचंद्रिका' हो गया। भारतेन्दु अपने पत्र की प्रगति से बहुत असंतुष्ट थे इसलिए 1884 ईस्वी से उन्होंने रिक्तहस्त होते हुए भी इसे पुनः 'नवोदिता हरिश्चंद्र चंद्रिका' के नाम से काशी से प्रकाशित करना शुरू किया। दो संख्या ही निकल पाई थी कि उनकी मृत्यु हो गई। आपके छोटे भाई गोपालचंद ने इसकी तीसरी संख्या निकाली। पांड्या जी ने कहा कि भारतेन्दु ने पत्रिका उन्हें सौंपी थी इसलिए कानूनी पचड़े के भय से प्रकाशन बन्द कर दिया गया। (भारतेन्दु एक अध्ययन, पृष्ठ 105) 

'हरिश्चंद्र चंद्रिका' की अंतिम संख्याओं में प्रकाशित शान्तरस की कविता सब मृत्यु के समय की बनी हुई है। उनका अंतिम पद था : "डंका कूच का बज रहा मुसाफिर जागो रे भाई।/देखो लाद चले पन्थी सब तुम क्यों रहे भुलाई।।/जब चलना ही निहचै है तो लै किन माल लदाई।/हरीचंद हरि पद बिनु नहिं तौ रहि जैहौ मुँह बाई।।" (भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र का जीवन चरित्र, पृष्ठ 93)

'हरिश्चंद्र चंद्रिका' की पत्रकारिता के बारे में डॉ. रामविलास शर्मा का मानना है कि साहित्य और पत्रकारिता के माध्यम से भारतेन्दु ने राष्ट्रीय सम्मान की भावना जाग्रत की, साहित्यिक रुचि का संवर्द्धन किया और हिन्दी भाषा को देश के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन में ऊंचा स्थान दिलाने के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया। (डा.  रामविलास शर्मा, पूर्वोक्त, पृष्ठ 104)

'कविवचन सुधा' के सिद्धांत वाक्य या 'मोटो' के लिए भारतेन्दु ने निम्नलिखित छंद की रचना की थी-'खल गगन सो सज्जन दुखी/मति होहिं, हरिपद मति रहै।/उपधर्म छूटै, स्वत्व निज/भारत गहै, कर दुख बहै।।/बुध तजहिं मत्सर, नारि नर/सम होहिं, जग आनंद लहै।/तजि ग्राम कविता सुकवि जन/की अमृतबानी सब कहैं।।' (राधाकृष्ण दास, पूर्वोद्धृत, अमृतलाल नागर की टिप्पणी, पृष्ठ 'छ') राधाकृष्ण दास ने ठीक ही लिखा है कि "यद्यपि इन बातों का कहना कुछ कठिन प्रतीत नहीं होता है परंतु उस अंधपरंपरा के समय में इनका प्रकाश्य रूप में इस प्रकार कहना सहज न था। नव्य शिक्षित समाज को 'हरिपद मति रहै' कहना जैसा अरुचिकर था, उससे बढ़कर लकीर के फकीरों को 'उपधर्म छूटै' कहना क्रोधोन्नमत करना था। जैसा ही अंग्रेज हाकिमों को 'स्वत्व निज भारत गहै, कर (टैक्स) दुख बहै' कहना कर्णकटु था, उससे अधिक 'नारि नर सम होंहिं' कहना हिंदुस्तानी भद्र समाज को चिढ़ाना था। परंतु वीर हरिश्चंद्र ने जो जी में ठाना उसे कह ही डाला और जो कहा उसे आजन्म निभाया भी।" (राधाकृष्ण दास, पूर्वोक्त, अमृतलाल नागर की टिप्पणी, पृष्ठ 'छ')

23 मार्च 1874 की 'कविवचन सुधा' में भारतेन्दु ने एक प्रतिज्ञा-पत्र प्रकाशित किया था : 'हम लोग सर्वांतदासी सब स्थल में वर्तमान सर्वद्रष्टा और नित्य सत्य परमेश्वर को साक्षी देकर यह नियम मानते हैं और लिखते हैं कि हम लोग आज के दिन से कोई विलायती कपड़ा नहीं पहिनेंगे और जो कपड़ा पहिले से मोल ले चुके हैं और आज की मिती तक हमारे पास है उनको तो उनके जीर्ण हो जाने तक काम में लावेंगे पर नवीन मोल लेकर किसी भांति का भी विलायती कपड़ा न पहिरेंगे हिंदुस्तान का ही बना कपड़ा पहिरेंगे हम आशा रखते हैं कि इसको बहुत ही क्या प्रायः सब लोग स्वीकार करेंगे और अपना नाम इस श्रेणी में होने के लिए श्रीयुत बाबू हरिश्चंद्र को अपनी मनीषा प्रकाशित करेंगे और सब देशहितैषी इस उपाय के वृद्धि में अवश्य उद्योग करेंगे।" (डॉ. रामविलास शर्मा, भारतेन्दु युग; डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र, हिन्दी पत्रकारिता : जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण-भूमि, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, पृष्ठ 92 में उद्धृत)। डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि 'कांग्रेस ने अभी स्वदेशी आंदोलन विधिपूर्वक न आरम्भ किया था, न बंगभंग आंदोलन ने जन्म लिया था। केवल हिन्दी में भारतेन्दु ने स्वदेशी आंदोलन का सूत्रपात बहुत पहले कर दिया था।' (रामविलास शर्मा, भारतेन्दु युग)

भारतेन्दु की पत्रकारिता और स्त्री-चेतना

9 जनवरी, 1874 को भारतेन्दु ने बालाबोधिनी पत्रिका निकाली। यह महिलाओं की मासिक पत्रिका थी। इसके प्रथम अंक के प्रथम पृष्ठ पर जो निवेदन प्रकाशित हुआ था वह नारी जागरण की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही भाषा-शैली और अभिव्यक्ति की दृष्टि से भी उल्लेखनीय है : "मेरी प्यारी बहिनो! मैं तुम्हारी एक नयी बहन 'बालाबोधिनी' आज तुमसे मिलने आयी हूँ और मेरी यही इच्छा है कि तुम लोगों से, सब बहिनों से, सब महिनों में एक बार मिलूँ, मैं तुम लोगों से अवस्था में कितनी छोटी हूँ और इस नाते से तुम सबकी छोटी बहिन हूँ पर मैं तुम लोगों में हिलमिल कर सहेलियों-संगिनी की भांति रहना चाहती हूँ, इससे मैं तुम लोगों से हाथ जोड़कर और आँचल खोलकर यही माँगती हूँ कि मैं जो कभी कोई भली-बुरी, कड़ी-नरम, कहनी-अनकहनी, कहूँ उसे मुझे अपनी समझकर क्षमा करना क्योंकि मैं जो कुछ भी कहूँगी सो तुम्हारे हित की कहूँगी.....।" (डा. सुशीला जोशी, हिन्दी पत्रकारिता : विकास और विविध आयाम, राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर, द्वितीय संस्करण : 1991, पृष्ठ 32-33)

भारतेन्दु हरिश्चंद्र स्त्री विषयक पत्रिका तो निकालते हैं, किन्तु उसमें स्त्रियों को वही परंपरागत शिक्षा दी जाती है, जिसमें उन्हें एक 'अच्छा गुलाम' बनने के 'गुर' सिखाये जाते थे। दो वर्षों तक प्रकाशित इस मासिक पत्रिका के किसी भी अंक में स्त्रियों के अधिकार के सवाल नहीं उठाये गये, न ही उन्हें नये ज्ञान-विज्ञान की रौशनी में अपने जीवन के बारे में खुद सोचने की कोई प्रेरणा दी गई। 'नारि नर सम होहिं' का नारा देनेवाले भारतेन्दु अपने बलिया वाले प्रसिद्ध व्याख्यान 'भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है' में कहते हैं-'लड़कियों को पढ़ाइए, किन्तु उस चाल से नहीं; जैसे आजकल पढ़ाई जाती है, जिससे उपकार के बदले बुराई होती है। ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल-धर्म सीखें, पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज शिक्षा दें।' (केसरीनारायण शुक्ल, भारतेन्दु के निबंध, पृष्ठ 45) (यह बलिया में ददरी के मेले के समय आर्य देशोपकरिणी सभा में दिया गया भाषण है। इसे भारतेन्दु के सेक्रेटरी इंदिरायन उपाध्याय ने पढ़ा था जो बाद में नवोदिता हरिश्चंद्र चंद्रिका के दिसंबर, 1884 के अंक में प्रकाशित हुआ।  (केसरीनारायण शुक्ल, भारतेन्दु के निबंध, पृष्ठ 41) 

'बालाबोधिनी' में व्यक्त स्त्रियोद्धार के संदर्भ में वीर भारत तलवार लिखते हैं कि 'इस मासिक पत्रिका में स्त्रियों की हालत सुधारने के बजाय खुद स्त्रियों को ही सुधारने का इरादा दिखाई देता है। इसमें उनके अधिकारों की नहीं, उनके कर्तव्यों की चर्चा की गई है।' (डॉ. पूर्णिमा मौर्या, पूर्वोक्त लेख में उद्धृत) इस पत्रिका में स्त्रियों से संबंधित सबसे लंबी रचना 'बाला प्रबोध' थी, जो 1857 की जनवरी से शुरू होकर अगले तीन-चार अंकों तक छपी। बिजनौर (पीलीभीत) के पास सिकंदराबाद के निवासी हीरालाल ने इसे सरकारी स्कूलों में लड़कियों के पाठ्यक्रम में लगवाने के मकसद से लिखा था। यह ठीक वैसा ही था, जैसा पाठ्यक्रम भारतेन्दु चाहते थे। "इसमें सास-ससुर, देवर-ननद, जेठ-जिठानी, शिशु आदि के प्रति और रस्म-रिवाजों तथा त्यौहारों के वक्त घर की बहू को कैसा सुंदर और योग्य वर्ताव करना चाहिए, इसका बखान किया गया है।" (पूर्णिमा मौर्या, पूर्वोक्त लेख में उद्धृत) पूरी रचना 1870 में छप चुकी डिप्टी नजीर अहमद की किताब 'मिरात-उल-उरूस' के ढर्रे पर बनी है। नजीर अहमद ने अपनी इस बेहद लोकप्रिय किताब में स्त्री-शिक्षा की जबरदस्त हिमायत की है, लेकिन साथ ही उन्होंने चेतावनी भी दी है कि 'वे मर्दों की बराबरी करने की बात अपने दिमाग में हर्गिज न लाएं।' (पूर्णिमा मौर्या, पूर्वोक्त लेख में उद्धृत)

भारतेन्दु मंडल और भारतेन्दु का हिन्दू-मन

भारतेन्दु मंडल के लेखकों में 'सुकवि' अम्बिकादत्त व्यास (1858-1900) नाम के एक बड़े विद्वान हुए हैं। 'सुकवि' की उपाधि उन्हें भारतेंदु की अनुशंसा पर कवितावर्धिनी सभा काशी से मिली थी। भारतेन्दु ने विक्टोरिया रानी की प्रशंसा में 'चिरजीवी रहो विक्टोरिया रानी' समस्यापूर्ति का आयोजन किया था। 'सामवतम' (म हलयुक्त), 'गोसंकट', 'भारत सौभाग्य', 'कलियुग और घी' आदि उनके नाटक काफी चर्चित हुए हैं। इनके अधिकतर नाटकों में मुसलमानों का विरोध, स्त्रियों की हीनता, प्राचीन भारत और अंग्रेजी राज पर समान रूप से गर्व आदि अभिव्यक्त हैं। 'सामवतम' नाटक में दुर्वासा मुनि अपने मित्रपुत्र सामवान (न हलयुक्त) को 'स्त्री हो जाने का शाप देते हैं'। उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध का हिंदी लेखक 'स्त्री-जीवन' को शाप की तरह लेता है।

'गोसंकट' नाटक का जोर इस बात पर है कि मुसलमान गोहत्या को तत्पर रहते हैं जबकि हिंदू उसे माता मानते हुए रक्षार्थ प्रतिरोध करते हैं। व्यास जी के अधिकतर नाटक भारतेन्दु की प्रेरणा से लिखे गये हैं और लगभग सब में मुस्लिम विरोध/घृणा अभिव्यक्त है। मुस्लिम विरोध भारतेन्दु मंडल के अधिकतर लेखकों में है। भारतेंदु में भी है। बकरीद के मौके पर मुसलमानों ने गोहत्या की तो भारतेंदु ने पटने से प्रकाशित 'क्षत्रिय पत्रिका' के संपादक बाबू रामदीन सिंह को लिखा, 'भागलपुर, मिर्जापुर, काशी इत्यादि कई स्थानों में प्रकाश्यरूप से केवल हमारा जी दुखाने के हॉको-ठोक यह अत्याचार हुआ है जो किसी-किसी समाचार-पत्र में प्रकाश भी हुआ है। आप भी अपने पत्र में इस विषय का भली भांति आंदोलन कीजिए। सब पत्र एक साथ कोलाहल करेंगे। तब काम चलेगा। हिन्दी, उर्दू, बंगाली, मराठी, अंग्रेजी सब भाषाओं के पत्रों में जिनके संपादक हिन्दू हों एक बेर बड़े धूम से इसका आन्दोलन होना आवश्यक है आशा है कि अपने शक्य भर आप इस विषय में कोई बात उठा न रक्खेंगे।'

भारतेन्दु और हिंदी व्याकरण

बहुत कम लोगों को पता है कि भारतेन्दु और उनके गुरु शिवप्रसाद 'सितारेहिंद' की एक ही साल अर्थात 1875 में हिन्दी व्याकरण की पुस्तक छपी थी, लेकिन हिन्दी जगत में सर्वत्र भारतेंदु की किताब का प्रकाशन-वर्ष 1883 तथा 1884 छपा मिलता है। अंग्रेजी में लिखी तेज के भाटिया की किताब में इसका प्रकाशन वर्ष 1875 दर्ज है। ब्रिटिश म्यूजियम से प्रकाशित कैटलॉग में इसका प्रकाशन वर्ष 1875 ही अंकित है।

भारतेन्दु के निधन के बाद उनकी व्याकरण-पुस्तिका की हिंदी जगत में बहुत कम चर्चा हुई है। डॉ. धीरेन्द्रनाथ सिंह ने आधुनिक हिंदी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका में इस किताब की चर्चा की है। रामनिरंजन परिमलेंदु की किताब भातेन्दु काल के भूले बिसरे कवि (नागरी प्रचारिणी सभा, अकादमी, पटना) में तनिक अधिक जानकारी है। किंतु, दुखद है कि भारतेन्दु के जीवनीकारों ने इस किताब का उल्लेख नहीं किया है। और तो और, हेमन्त शर्मा द्वारा, संपादित भारतेन्दु समग्र (हिंदी प्रचारक संस्थान, वाराणसी, 1987) में भी भारतेन्दु की उक्त व्याकरण-पुस्तिका को शामिल नहीं किया गया है।

भारतीय साहित्य में पर्यावरण

पर्यावरण शब्द ‘परि’ और ‘आवरण’ से मिलकर बना है जिसका अर्थ हुआ हमारे ‘चारों ओर का आवरण’। मनुष्य प्रकृति में हवा, पहाड़, नदी, झरना, पेड़-पौधे और जीव-जंतुओं से घिरा हुआ है। सभ्यता और संस्कृति के आरंभिक दिनों में वह प्रकृति की गोद में बसता था। प्रकृति से अलग उसके जीवन की कल्पना भी असंभव थी। धीरे-धीरे वह इससे विलग होता गया। संस्कृति की हमारी कहानी इसी विलग होते जाने की अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो संस्कृति, प्रकृति के स्मृति में बदलते जाने की कहानी है। इस स्मृति को हमने भाषा और साहित्य में जीवित रखा है। 

संस्कृत हमारी सबसे पुरानी भाषा है इसलिए उसके साहित्य में पर्यावरण की स्मृति का सबसे आदिम रूप है। अकारण नहीं कि हमारे आरंभिक साहित्य का एक बड़ा हिस्सा ‘आरण्यक’ है। तब पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी परिवार के अंग जैसे लगते हैं। ये मनुष्य के लिए जितने आवश्यक हैं मनुष्य भी उनके लिए उतने ही अपरिहार्य हैं। संस्कृत साहित्य से परिचय रखनेवाले ‘कवि-समय’, ‘कवि प्रसिद्धि’ और ‘दोहद’ से परिचित होंगे। ‘दोहद’ शब्द का अर्थ ‘गर्भवती की इच्छा’ है अथवा जिन द्रव्यों और क्रियाओं से अकाल में ही पुष्पोद्गम कराया जाता है, उसे ‘दोहद’ कहते हैं। जिस प्रकार वृक्षदेवता स्त्रियों में ‘दोहद’ का संचार करते थे, उसी प्रकार सुंदरी स्त्रियों की अधिष्ठात्री यक्षिणियाँ स्त्री-अंग के स्पर्श से वृक्षों में भी ‘दोहद’ का संचार करती थीं। 

संस्कृत काव्य में स्त्रियों के पदाघात से वृक्षों के पुष्पित होने की बहुत चर्चा है। मेघदूत में स्त्री के विभिन्न अंगों और क्रियाओं के संस्पर्श से प्रियंगु, बकुल, अशोक, तिलक, कुरबक, मंदार, चम्पक, आम, नमेरु तथा कर्णिकार आदि वृक्षों के पुष्पित होने की बात है। ‘कवि-प्रसिद्धि’ है कि सुंदरियों के पदाघात से अशोक में पुष्प खिल आते हैं। मालविकाग्निमित्र के तृतीय अंक की सारी कथा मालविका के पदाघात से अशोक के वृक्ष को पुष्पित कर देने की क्रिया को केंद्र करके रचित हुई थी। मेघदूत के यक्ष ने मेघ से अपने उद्यान के अशोक वृक्ष के वर्णन के सिलसिले में कहा है कि वह तुम्हारी सखी (यक्षिणी) के वामपाद का अभिलाषी है। ‘राजनिघंटु’ के अनुसार अशोक का एक नाम ‘वामांघ्रिघातन’ भी है जिसका अर्थ ‘स्त्री का चरण’ है। संस्कृत में स्त्री को अँगना भी कहा जाता है और अँगनाप्रिय का मतलब है ‘अशोक का पेड़’। प्राचीन भारत का ‘मदनोत्सव’ अशोक वृक्ष से खास तौर से जुड़ा है। अंतःपुर में इसी वृक्ष के नीचे मदनदेव की पूजा संपन्न होती थी और तदुपरांत रानी ‘दोहद’ उत्पन्न करती थी। स्त्रियों की मुख-मदिरा से सिंचकर बकुल पुष्पित हो जाता है। कर्णिकार वृक्ष के आगे स्त्रियां अगर नृत्य करे तो वह पुष्पित हो जाता है। कुरबक स्त्रियों के आलिंगन से पुष्पित हो जाता है।

अशोक वृक्षों में दोहद-संचार करती हुई स्त्रियों की मूर्तियां भारतीय शिल्पकला की अति परिचित बात है। मथुरा म्यूजियम में एक ऐसी उत्कीर्ण मूर्ति है जिसमें एक यक्षिणी अशोक वृक्ष की शाखा पकड़े खड़ी है और पदाघात से अशोक को कुसुमित कर रही है। तंजोर के सुब्रह्मण्यम मंदिर के द्वार पर एक यक्षिणी मूर्ति अशोक में दोहद उत्पन्न करती हुई उत्कीर्ण है। मथुरा की मकरवाहना यक्षिणी मूर्ति अशोक वृक्ष में दोहद संचार करती हुई उत्कीर्ण है। अशोकषष्ठी और अशोकाष्टमी व्रत में अशोक वृक्ष की पूजा संतान-कामिनी होकर करने का विधान है। ‘निर्णयसिंधु’ एवं ‘तिथितत्त्व’ के अनुसार चैत्र शुक्ल अष्टमी को अशोक की आठ कोमल पत्तियाँ भक्षण करने से दोहद-संचार होना सिद्ध है। 

प्राचीन साहित्य में सर्वत्र जलाशयों में जल और जीवन के प्रतीक कमल का वर्णन किया गया है। जलाशयों में हंसों का वर्णन भी ‘कवि प्रसिद्धि’ है, क्योंकि हंस-मिथुन उर्वरता के प्रतीक हैं। इसीलिए प्राचीन काल में नववधू के परिधान-दुकूल पर हंस-मिथुन अंकित हुआ करते थे। भारतीय भाषाओं के काव्यग्रंथ इस चक्रवाक पक्षी के प्रणयाख्यान से भरे पड़े हैं। ‘कवि प्रसिद्धि’ यह भी है कि इस जोड़े की सारी रात वियोग में कटती है। अग्निवेश रामायण की कथा है कि स्त्री-वियोग में कातर राम को देखकर चक्रवाकों ने हंसी उड़ाई थी जिसके परिणामस्वरूप उन्हें इस प्रकार वियुक्त होने का अभिशाप-भागी होना पड़ा। 

प्राचीन काल में पक्षी को जीवन का अनिवार्य अंग माना जाता था। वात्स्यायन ने कामसूत्र में नागरकों को भोजन के बाद शुक-सारिका आलाप तथा लाव, कुक्कुट और मेषों के युद्ध देखने की व्यवस्था की है। भोजन के बाद प्रत्येक प्रतिष्ठित नागरक इन क्रीड़ाओं को अपने मित्रों के साथ देखता था। शुभ-अशुभ जानने के लिए भी पक्षियों की गतिविधि पर विशेष ध्यान दिया जाता था। वस्तुतः हिन्दी का ‘सगुन’ संस्कृत ‘शकुन’ शब्द से बना है जिसका अर्थ पक्षी है। वराहमिहिर की वृहत्संहिता में श्यामा, श्येन, शशघ्न, वंजल, मयूर, श्रीकर्ण, चक्रवाक, चाष, भाण्डीरक, खंजन, शुक, काक, कपोत, भारद्वाज, कुलाल, कुक्कुट, खर, हारीत, गृद्ध, पूर्णकूट और चटक आदि को शकुनसूचक पक्षियों की श्रेणी में रखा गया है। संस्कृत साहित्य से इन पक्षियों के शकुन के कारण बड़ी-बड़ी घटनाओं के होने का साक्ष्य मिलता है। कभी-कभी शकुन मात्र से भावी राज्यक्रांति का अनुमान कर लिया जाता और तदनुसार रणनति बनती। 

काग और कउआ जीवन के आगामी वृत्तांत बतलाने में भी निपुण माने गये हैं। तुलसीदास तक ने इस विद्या को पढ़ने की कोशिश की है। रामचरितमानस में वर्णन है कि ननिहाल से अयोध्या लौटने के क्रम में भरत जी जब नगर में प्रवेश करते हैं तो गलत जगह बैठे कौओं का बोलना अपशकुन हो गया-’असगुन होहिं नगर पैठारा।/रटहिं कुभाँति कुखेत करारा।।’  काग अगर दाहिनी ओर खेत में शोभायमान हो तो समझिए कि सब मंगल है-’दाहिन काग सुखेत सुहावा’। ऐसा प्रतीत होता है कि भविष्यवाणी कहने के वांछनीय गुण से प्रेरित होकर ही कुल-ललनाओं ने अपने कोमल हृदय में इन्हें स्थान दिया है। जायसी ने भी ’पद्मावत’ में नागमती के विलाप में काग को स्मरण किया है-’होइ खर बान विरह तनु लागा,/जो पिऊ आवै उड़ै तो कागा।’ 

मनुष्य के सुख-दुख के साथ इन शुक-सारिकाओं का सुख-दुख इस प्रकार गुंथा हुआ था कि एक को दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। खासकर स्त्रियों के दुखी जीवन की कहानी इन पक्षियों के बगैर अधूरी है। अमरुकशतक में एक मर्मस्पर्शी दृश्य है कि जब मानवती गृहदेवी के दुख से दुखी होकर प्रिय बाहर नख से जमीन कुरेद रहा है, सखियों ने खाना बंद कर दिया है, रोते-रोते उनकी आंखें सूज गई हैं और पिंजड़े के सुग्गे अज्ञात वेदना के कारण हँसना-पढ़ना बन्द किए सारे व्यापार को समझने की चेष्टा कर रहे हैं। 

उत्तरी बिहार के एक लोकगीत में विरहिणी के अंतस्तल से करुण आवाज आती है-’कागा सब तन खाइयो, चुन चुन खइयो मास,/दो नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस।/कागा नैन निकास दूँ, पिया पास ले जाय,/पहिले दरस दिखाइ कै, पीछे लीजौ खाय।’ एक मैथिल लोकगीत में विरहिणी ने गाया है, ’रे काग, तू नित्य यही बोल कि मेरे प्रियतम आयेंगे। यदि आज मेरे प्राणनाथ मेरे उर-आँगन में आये तो कनक-कटोरे में खीर और पकवान भरकर मैं तुझे खाने को दूँगी। सोने में तेरी चोंच संवारूंगी, और तेरे चरण मढ़ाऊंगी। आगे कहती है कि मेरी बाईं आँख फड़क रही है और दाईं आँख रोती है। उन्हीं आंखों से तुझे नित्य निहारूँगी, और पहले से भी दूने प्रेम से तेरा प्रतिपाल करूँगी।’ फिर कहती है, ‘रे काग, तू भगवान श्रीकृष्ण की तरह मन को हरनेवाला है। तेरी बोली अत्यंत मीठी है। आज मेरी सारी अभिलाषाएं पूरी हो गईं।’ 

अपभ्रंश साहित्य में एक प्रसंग है कि विरहिणी ग्राम-वधू काक के शकुन पर अब विश्वास नहीं करती। सुनते-सुनते कान पक गए, पर प्रिय का आना नहीं हुआ और यह काग है कि बोलता ही जा रहा है। उसने इस मिथ्याभाषी काग को हाथ उठाकर उड़ाना चाहा। विरह के मारे दुबली हुई कलाइयों से चूड़ी निकलकर पृथ्वी पर गिरी लेकिन कागा की बात ठीक ही थी। अचानक प्रिय दिख गया। आधी चूड़ियां धरती पर गिर गई थीं। पर सहसा प्रियदर्शन से खुशी की लहर दौड़ी, दुबली कलाई फूलकर मोटी हुई और आधी चूड़ियां तड़ाक से टूटकर बिखर गईं। अमरुकशतक में एक प्रसंग है कि रात को दंपति ने जो प्रेमालाप किया उसे नासमझ शुक ज्यों का त्यों प्रातःकाल गुरुजनों के सामने दुहराने लगा। बेचारी बहू लाजों गड़ गई और कोई उपाय न देखकर उसने अपने कर्णफूल में लगे लाल पद्मराग मणि को ही शुक के सामने रख दिया और वह उसे पका दाड़िम समझकर उसी में उलझ गया। इस भांति उसकी लाज बची। 

प्राचीनकाल में ऋषियों के आश्रम में भी शुक-सारिकाओं का वास था। किसी वृक्ष के नीचे शुक-शावक के मुख से गिरे नीवार (वन्य धान) को देखकर ही दुष्यंत को यह समझने में देर नहीं लगी थी कि यहाँ किसी ऋषि का आश्रम है। शुक-सारिकाएँ विलासी नागरकों के बहिर्द्वार पर ही नहीं बल्कि पंडितों के अंतःपुर की भी शोभा बढ़ाती थीं। शंकराचार्य को मंडन मिश्र के घर का मार्ग बताते समय स्थानीय परिचारिका ने कहा था, जहाँ शुक-सारिकाएँ ‘स्वतः प्रमाणं परतः प्रमाणं’ का शास्त्रार्थ कर रही हों, वही मंडन मिश्र का घर है। कवि वाणभट्ट ने अपने पूर्व-पुरुष कुबेरभट्ट का परिचय देते हुए बड़े गर्व से लिखा है कि उनके घर के शुकों और सारिकाओं ने समस्त वांग्मय का अभ्यास कर लिया था, और यजुर्वेद और सामवेद का पाठ करते समय पद-पद पर ये पक्षी विद्यार्थियों की गलती पकड़ा करते थे। 

औद्योगिक क्रांति से उपजे मनुष्य ने पर्यावरण के बगैर जीवन को गले लगाने की भूल की है। ‘प्रकृति के सुकुमार कवि’ की घोषणा है-‘छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया, बाले, तेरे बाल-जाल में, कैसे उलझा दूं लोचन।’ प्रकृति से माया टूटी नहीं कि साहित्य ‘कंक्रीट का जंगल’ हो गया है। आधुनिकता विलुप्त होे चुके पर्यावरण की स्मृति से आक्रांत है। आधुनिक साहित्य का बहुलांश ‘शोकगीत’ और ‘विदागीत’ से भरा है। अब किताबों के शीर्षक ‘यहां थी वह नदी’ और ‘घटती हुई ऑक्सीजन’ तथा ‘गौरैया नहीं आती अब’ हैं। कविताओं के शीर्षक भी ठीक-ठीक ‘शोकगीत’ और ‘विदागीत’ से बनते हैं, मसलन ‘बचे हुओं के लिए शोकगीत’। आज पर्यावरण और जीवन दोनों को खतरे में डाल दिया गया है-‘कंक्रीट के इस जंगल में/मौसम की निर्जनता/मुझे ही नहीं/इस घरेलू चिड़िया को भी खलेगी।’  

सुखद है कि समकालीन कविता में पर्यावरण और जीवन की चिंता समान रूप से मुखर हुई है। ‘इतने दिनों से कोई फूल नहीं देखा’, ‘नदी मां का दुलार’, ‘चुपचाप’, ‘बचाओ’ तथा ‘पेड़’ आदि कविताओं में मनुष्य के एकाकीपन की पीड़ा को अत्यंत ही मार्मिक, आत्मीय और संवेदनशील तरीके से अभिव्यक्त करने की कोशिश की गई है। इस अभिव्यक्ति में एक अजीब छटपटाहट और बेचैनी भी शामिल है-‘किस ऋतु का फूल सुंघूं/किस हवा में सांस लूं/किस डाली का सेब खाऊं/किस सोते का जल पीऊं/पर्यावरण वैज्ञानिको!/कि बच जाऊं।’ ‘कुएं सूखते चले गए’ के बाद ही हमें ‘पानी का मतलब’ समझ आया है। इसलिए समकालीन कविता में सर्वत्र बचाओ, बचाओ का करुण क्रन्दन है-‘बचा लो मेरी नानी का पहियों वाला काठ का नीला घोड़ा/संभाल कर रखो अपने लट्टू/पतंगे छुपा दो किसी सुरक्षित जगह पर/देखो, हिलता है पृथ्वी पर/अमरूद का अंतिम पेड़/उड़ते हैं आकाश में पृथ्वी के अंतिम तोते।’ जो ‘नदियों का पानी’ नहीं बचा सके अब ‘आंखों का पानी’ बचाने को अभिशप्त हैं। समकालीन कवि को इस बात का बोध हो चला है कि फूल, पेड़, चिडियां और कुएं का गायब होना महज पर्यावरण का संकट नहीं है। यह हमारी संवेदना के नष्ट होने के भी सबूत हैं। पर्यावरण का संकट अंततः संवेदना का संकट भी है। सब के धागे आपस में एक-दूसरे से गूंथे हुए हैं। इसलिए मनुष्य की संवेदना को अगर समय रहते नहीं बचाया जा सका तो ‘कविता का अंत’ अब सिर्फ नारा नहीं रहेगा। कविता में अब भी थोड़ी-बहुत संवेदना बची हुई है। इसलिए कवि कविता को बचाने की कोशिश में है-‘इधर मैं एक बार फिर करता हूं प्रयत्न/कि बच सके तो बच जाये हिंदी में समकालीन कविता।’ आज के कवि के पास न तो कोई ‘दुविधा’ है, न सवाल करने की ‘सुविधा’ ही कि ‘जैसे चिड़ियों की उड़ान में/शामिल होते हैं पेड़/क्या मुसीबत में/कविताएं होंगी हमारे साथ’। स्पष्ट निर्णय लेने का वक्त है यह। जो अनिर्णय में होंगे, मारे जाएंगे।

डाउन टू अर्थ, अक्टूबर 2021

बाबा नागार्जुन : कुछ टिप्पणियां

मैं निराला के गोत्र का नहीं हूं

नागार्जुन कहते थे कि 'मैं निराला के गोत्र का आदमी नहीं हूँ। निराला में बहुत कुछ ऐसा है जो अभिजातों के ड्राइंग रूम में सजाने लायक हैं, मुझमें नहीं। मेरा गोत्र औघड़ों का है। मुझे करीब बिठाने में बहुत हिम्मत की जरूरत पड़ेगी। निराला भी साहसिक हैं पर उनके साहस में सांस्कृतिक परिष्कार भी है। मुझमें इस तुलना में थोड़ा फूहड़पन और भदेसपन है। ...मैं सीधे-सीधे गाली बक सकता हूँ नाम लेकर। निराला यही सब प्रतीकों के जरिए करेंगे। मैं इस सीमा के बाहर भी चला जाता हूँ।' (विजय बहादुर सिंह, 'बातचीत आसान नहीं थी नागार्जुन से', परिषद-पत्रिका, वर्ष 38, अंक 1-4, दिसंबर 1999)

नागार्जुन जनकवि थे और जनकवि हकलाते नहीं-'जन-कवि हूँ मैं, साफ कहूँगा/क्यों हकलाऊँ।' जनकवि जन से जुड़ने के उत्साह में कविता के नाम पर कभी-कभी 'सीमा के बाहर जाकर' अण्डबण्ड (ट्रैश) भी लिख दिया करते थे। (डॉक्टर कुमार विमल, परिषद-पत्रिका, वर्ष : 38, अंक 1-4) नागार्जुन अश्लील या भदेस शब्दों के प्रयोग में संकोच नहीं करते-एक-दूसरे के गुह्य अंगों को सूंघने का निर्लज्ज चित्रण भी कर देते और ऐसी भद्दी भाषा लिखने में भी उन्हें कोई हिचक नहीं होती-'कोई ससुर आपकी झांट नहीं उखाड़ सकता'। (भूल जाओ पुराने सपने, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1994, पृष्ठ 11; डॉक्टर विमल कुमार, पूर्वोद्धृत, पादटिप्पणी संख्या 26, 27)

दिनकर अपने समय के सूर्य रहे होंगे इस बात में संदेह का कोई कारण नहीं दिखता बल्कि 'जनकवि' की ईर्ष्या उसके प्रखर ताप का सबूत देती है। नागार्जुन के मन में दिनकर के प्रति एक खुन्नस रहती थी। 'तिकड़म के ताऊ' शीर्षक कविता में नागार्जुन ने लिखा है--

'नये पुराने लेखों के संकलन छपाना।

आप लगाना फेरी खा खा उन्हें छपाना।

पास मिलेगा अब पहले दर्जे का तुमको

पार्ल में रहो सूंघते नील कुसुम को

नेहरू छींके, मौलाना को हो खुजलाहट

मिल जायेगी तुमको घर बैठे ही आहट।' 

(डॉक्टर कुमार विमल, नागार्जुन : 'एक-एक दाने की खातिर सौ-सौ पापड़ बेले', परिषद पत्रिका, वर्ष 38, अंक 1-4, पृष्ठ 46, पादटिप्पणी संख्या 23 में उद्धृत) राममनोहर लोहिया पटना आते ही कवि नागार्जुन की खोज करते थे क्योंकि उन्होंने नेहरू की आलोचना करते हुए कविता लिखी थी। (परिषद पत्रिका, वर्ष 38, अंक 1-4, दिसम्बर 1999, पृष्ठ 198)

'नागार्जुन जीवन के व्यावहारिक धरातल पर बहुत ही चतुर-चालाक थे और लाभकारी प्रसंगों में बेदारमग्जी से काम लेते थे। यह कहना, शायद, अनुचित नहीं होगा कि नागार्जुन 'निरे साहित्यकार' नहीं थे-लक्ष्मी को अपमानित करनेवाले कवि नहीं थे।' (डॉक्टर कुमार विमल, परिषद पत्रिका, वर्ष : 38, अंक : 4, पृष्ठ 35)

आपातकाल और सम्पूर्ण क्रांति के दिनों में नागार्जुन, लोकनायक के साथ थे। कविता से लेकर जेल तक। फिर साथ छोड़ दिया। जेल से छूटने के बाद बाबा नागार्जुन लोगों को एक कविता सुनाते थे-'कदमकुआं, हुआँ, हुआँ, हुआँ', यानी सियार लोग जहाँ जमा थे, वही कदमकुआं था। कहने की जरूरत नहीं कि पटना के कदमकुआं मुहल्ले में जयप्रकाश बाबू रहते थे!

जब नागार्जुन पर चली थी अपूर्वानंद की तलवार

कभी पटना प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से 'धारा' नाम से एक बुलेटिन जारी हुई थी जिसमें अपूर्वानंद जी का चर्चित और विवादास्पद लेख 'नागार्जुन की राजनीति' छापा गया था। कहने की जरुरत नहीं कि इस लेख में नागार्जुन को सोवियत-विरोधी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विरोधी साबित किया गया था। बौद्धिक जगत में इस लेख को लेकर काफी प्रतिक्रिया हुई थी। 

यह लेख 1985 में आया था। खगेन्द्र ठाकुर ने उसके लेखक और भूमिका लेखक (बाद में ससुर-दामाद) दोनों को निजी तौर पर बता दिया था कि यह लेख उचित नहीं है। बिहार प्रगतिशील लेखक संघ ने भी अपने को उससे अलग बताया। इस विवाद में भीष्म साहनी जी ने एक पत्र लिखा और स्पष्ट कहा कि लेखक को लिखने की आजादी है, लेकिन उसे प्रगतिशील लेखक संघ से नहीं छापना चाहिए था। (देखें, खगेन्द्र ठाकुर, प्रगतिशील आंदोलन के इतिहास-पुरुष, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ 92)

उसके कुछ दिनों के बाद जमशेदपुर में प्रगतिशील लेखक संघ का राज्य सम्मेलन हुआ। नामवर जी उद्घाटन करने पहुंचे थे। जब नामवर जी जमशेदपुर पहुँच गये, तो उनसे मिलने खगेन्द्र ठाकुर होटल में गये। मिलते ही उन्होंने पूछा, 'खगेन जी यह सब क्या हो रहा है?' खगेन्द्र जी ने पहले समझा नहीं, इसलिए पूछा, क्या हो रहा है? अरे यह 'नागार्जुन की राजनीति' का मामला! "ओह, वह, मैंने भी छपने पर उसे देखा और पढ़ा।" "ऐसा है?" खगेन्द्र जी ने कहा, "जी हां"। वे बोले, "समझ गया"। नामवर जी को अध्यक्षीय भाषण करना था। उन्होंने समकालीन कविता और उसके मूल्यांकन की समस्या पर बोलते हुए उग्र स्वर में कहा, "आज नागार्जुन की राजनीति पर संदेह किया जा रहा है, उन पर प्रश्न उठाया जा रहा है। मुझे भी कुछ लोगों ने पिछले बीस-पच्चीस वर्षों से संशोधनवादी घोषित कर रखा है। लेकिन मैं जो काम तब कर रहा था, वही आज भी कर रहा हूँ। कुछ लोग लगे हैं प्रगतिशील लेखक संघ को झाड़ू से बुहारकर साफ कर देने को, गोया यह लेखक संघ न हुआ मेहतरों का संघ हो गया। ...हमारे बीच कुछ लोग हैं जिनके हाथ में खून की प्यासी तलवार है, उन्हें जब दुश्मन नहीं मिलता तो अपने घर में ही तलवार भांजने लगते हैं।" (देखें, खगेन्द्र ठाकुर, प्रगतिशील आंदोलन के इतिहास-पुरुष, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ 116-17)

गद्य लिखो बेटा गद्य

नागार्जुन पत्र खूब लिखा करते थे। कहा जाता है कि उनका झोला पोस्टकार्ड और अंतर्देशीय से भरा होता था। कुछ पत्र उन्होंने नंदकिशोर नवल को भी लिखे थे। नवल जी तब युवा थे और गीत-नवगीत लिखा करते थे। नागार्जुन को मालूम था कि गीत-गवनई में लड़के का भविष्य उज्ज्वल नहीं है। इसलिए एक डांटभरी चिट्ठी नवल जी को पकड़ा दी। लिखा-गद्य लिखो बेटा गद्य नहीं तो साहित्य की दुनिया से बाहर कर दिये जाओगे!

साहित्य, संस्कृति और राजनीति

बाइबिल में प्रार्थना है कि 'हे प्रभु! मुझे आज की रोटी दो' किन्तु 'मनुष्य सिर्फ रोटी के सहारे जीवित नहीं रह सकता'। इस कथन का सरलार्थ है कि मनुष्य अन्य पशुओं की तरह सिर्फ शारीरिक क्षुधा को तृप्त करने का प्रयास नहीं करता बल्कि वह अपनी मानसिक क्षुधा को भी तृप्त करता है। मनुष्य अन्य पशुओं से अलग इसलिए भी पहचाना गया कि इसके पास एक सोचनेवाला दिमाग था। सोचने के लिए अवकाश चाहिए। यह अवकाश उसने जानवरों को पालतू/गुलाम बनाकर अर्जित किया। अवकाश के बगैर संस्कृति की रचना नहीं हो सकती, साहित्य का सृजन नहीं हो सकता। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक छोटी-सी कविता है। संस्कृति निर्माण को समझने के लिहाज से बड़ी ही अर्थवान कविता है। कविता की पंक्ति है : 'गोली खाकर/पहले के मुंह से निकला राम/दूसरे के मुंह से निकला माओ/लेकिन तीसरे के मुंह से निकला आलू/पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है/कि पहले दो के पेट भरे हुए थे।' आप कह ले सकते हैं कि इतिहास, दर्शन, धर्म और समग्रतः संस्कृति बैठे-ठाले अर्थात अवकाशभोगी वर्ग की सृष्टि है। मनुष्य जबतक 'पशु' रहा, संस्कृति से लगभग अपरिचित रहा। 'पशु' से यहां मतलब उसके खाद्य संग्राहक होने से है। जब तक वह अपनी आजीविका के लिए शिकार और खाद्य संग्रह पर आश्रित रहा, तब तक वह लगभग 'असभ्य' रहा। तब सभी लोग शिकार करने में समान रूप से शामिल होते थे। बंटवारा भी सबके बीच समान रूप से होता था। फिर धीरे-धीरे समूह का एक नायक/सरदार उभरा जो अन्य से 'श्रेष्ठ' माना-समझा जाने लगा। कहने को तो 'आदिम साम्यवाद' का युग था लेकिन गैर-बराबरी की भावना का बीजारोपण हो चुका था। अब सरदार या कबीले के नायक का विशेष महत्त्व स्थापित हो चुका था। युद्ध के दौरान जो कुछ भी हाथ लगता, उसमें उसका विशेष हिस्सा होता। युद्ध में हासिल औरतों पर पहला 'अधिकार' उनका ही घोषित होता। तब लेखन-कला का आविष्कार नहीं हो सका था कि उनके 'श्रेष्ठता बोध' को स्थापित और चुनौती देनेवाला साहित्य हमें उपलब्ध हो सके। हाँ, तब वे पहाड़ की गुफाओं में कुछ आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचना जान चुके थे। कभी-कभी ऐसी ही रेखाएं और जानवरों, पौधों के चित्र वे अपने शरीर पर भी खींचते। यह गोदना कला का आदिम रूप है। इस कला में यह ध्यान रखा जाता कि सरदार के लिए खास रंग और डिजाइन विशेष रूप से सुरक्षित होंगे जिनका प्रयोग कबीले के दूसरे लोग नहीं करेंगे। इस तरह आप कह सकते हैं कला, साहित्य और संस्कृति के मूल में 'श्रेष्ठता बोध' और 'गैर-बराबरी' की भावना है। समाज में जो 'श्रेष्ठ' हुए 'सभ्य' और 'संस्कृत' कहलाए जो निम्न हैसियत वाले लोग थे वे 'असभ्य', 'असंस्कृत' और 'प्राकृत' कहे गए। भाषा में भी जो श्रेष्ठ थी संस्कृत हुई और जो हीनतर रही प्राकृत कहलाई। हाल तक दार्शनिकों का एक समूह मानता रहा था कि संस्कृति सिर्फ कुलीनों की होती है। कहने की जरूरत नहीं कि आरंभ काल से ही यह सब कुछ एक खास राजनीति के तहत हुआ जिसे आप 'संस्कृति की राजनीति' कह सकते हैं। संस्कृति के साथ राजनीति का संबंध पहले से है। साहित्य का जुड़ाव थोड़ा बाद का है।

एक विद्वान ने कहा है कि आधुनिक काल का धर्म राजनीति है जबकि इसके पहले के समाजों में धर्म राजनीति का रोल अदा करता है। साहित्य इस खेल के औजार/उपकरण रहे हैं। समाज में प्रभुत्व/वर्चस्व की स्थापना और स्थापित सत्ता को चुनौती देने का संघर्ष ही सांस्कृतिक विकास का उत्स है। भारतीय संस्कृति के संदर्भ में बात करें तो वेद हमारे सबसे आरंभिक साहित्यिक दस्तावेज हैं। ऋग्वेद के दशम मंडल में पुरुष सूक्त की रचना है, जिसमें समाज को चार वर्णों में बंटा बताया गया है। सबसे पहले तो वेद को 'अपौरुषेय' अर्थात ईश्वरीय बताया गया। इसी अपौरुषेय वेद ने चार वर्णों को शरीर के चार भिन्न अंगों से उत्पन्न बताया। जो अंग जितना महत्त्वपूर्ण था उससे जन्म लेनेवाला वर्ण भी उसी अनुपात में महत्त्वपूर्ण हुआ। मुख से जन्म लेनेवाला वर्ण ब्राह्मण हुआ। मुख शरीर के सभी अंगों में प्रधान है। 'मुख' से ही मुखिया शब्द बना है जिसका अर्थ सरदार है। इसलिए अकारण नहीं है कि मुख से जन्म लेनेवाला ब्राह्मण समाज का सरदार/माथा बना। भुजा से जन्म लेनेवाला क्षत्रिय, जांघ से जन्म लेनेवाला वैश्य और पैर जैसे उपेक्षित अंग से जन्म लेनेवाले शूद्र हुए। ऐसा नहीं है कि ऋग्वेद का यह पुरुषसूक्त बिना किसी राजनीति के यूं ही तुलसीदास की तरह 'स्वान्तः सुखाय' लिख दिया गया। आप सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य को उलटने-पलटने की कोशिश करें तो यही वर्णक्रम देखने को मिलेगा। ब्राह्मण पहले नंबर का 'नागरिक' है, क्षत्रिय दूसरे नंबर का, वैश्य तीसरे नंबर का और शूद्र चौथे नंबर का। थोड़ा सरल करते हुए आप ब्राह्मण-क्षत्रिय को एक ओर तो वैश्य-शूद्र को दूसरी ओर रख सकते हैं। और बात है कि ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच एक नम्बर के स्थान को लेकर संघर्ष होते रहे हैं। बौद्ध साहित्य जिसे आमतौर पर क्षत्रिय वर्ण का प्रतिनिधि साहित्य माना जाता रहा है, क्षत्रिय को आद्योपांत वर्णक्रम में पहला स्थान प्रदान करता रहा है। किन्तु कई स्थानों पर यह 'आम सहमति' व्यक्त हुई है कि ब्राह्मण-क्षत्रिय का मसला इनका 'आपसी मसला' है। ये दोनों मिलकर वैश्यों और शूद्रों का शोषण करते हैं। निचले दोनों वर्ण ऊपर के दोनों वर्णों की सामूहिक संपत्ति हैं। संस्कृत भाषा में वैश्य और वेश्या एक ही मूल शब्द 'विश्' से बने हैं और दोनों ही सामूहिक संपत्ति माने जाते हैं।

ब्राह्मणों ने पहले वे वेद को 'अपौरुषेय' कहा फिर क्षत्रिय अर्थात राजा को दैवी शक्ति से मंडित किया। राजा पृथ्वी पर ईश्वर का भेजा हुआ दूत हुआ और फिर ब्राह्मण साक्षात ईश्वर अर्थात 'भूसुर' कहलाया। यह ब्राह्मण-क्षत्रिय गंठजोड़ की राजनीति थी। यह सारा का सारा आयोजन साहित्य के खोल में हुआ। इस साहित्य से वैश्यों, शूद्रों और स्त्रियों को दूर रखा गया। स्त्रियों और शूद्रों को वेदपाठ से दूर रखा गया। वेदपाठ से मतलब यहाँ महज धर्म और उसके कर्मकांड से नहीं है। वेद से वंचित करने का मतलब ज्ञान के स्रोत से वंचित करना था। वेद 'विद' धातु से निष्पन्न है जिसका अर्थ ज्ञान और जानना है। वेद अपने समय का संचित ज्ञान हैं। ज्ञान के स्रोत से वंचित करने के लिए धर्म की राजनीति की गई। स्त्रियों और शूद्रों को समान रूप से 'अमंत्रक' कहा गया जिसका तात्पर्य था कि ये मंत्र-पाठ के योग्य नहीं हैं। इनमें शब्दों को बिगाड़कर बोलने की सहज प्रवृत्ति है। इसी 'भय' से संस्कृत वैयाकरण पाणिनी ने संस्कृत भाषा का मानकीकरण किया। विद्वानों के बीच इस पाणिनी का इतना दबदबा था कि कोई पाणिनी के व्याकरण से जौ भर भी इधर-उधर होने का माद्दा नहीं रखता था। बड़े से बड़े विद्वान और धुरंधर सिर्फ पाणिनी के दिये सूत्रों का औचित्य साबित करते रह गये। कहने को तो 'महाभाष्य' तक लिखे गए लेकिन वे सब टीका ही रहे। सब पाणिनी के आगे नतशिर थे। अपाणिनीय होने का मतलब गलत होना हो गया।

चूँकि स्त्री और शूद्र शब्दों को 'बिगाड़कर' बोलते थे इसलिए संस्कृत नाटकों में उनके लिए प्राकृत भाषा का विधान कर दिया गया। शूद्रों और स्त्रियों को छोड़कर सभी संस्कृत बोलते-समझते हैं। आज इक्कीसवीं शताब्दी में भी हाथी संस्कृत भाषा का 'गच्छ', 'तिष्ठ' और 'उतिष्ठ' ही समझता है। कुत्ता आज भी 'अत्तु' कहने के बाद पूंछ डुलाता आता है और खाने लगता है। संस्कृत का सामान्य ज्ञान रखनेवाला विद्यार्थी भी जानता हैं कि अत्तु का मतलब है 'आइए, खाइए' और यह आदरार्थ प्रयुक्त है। बाघ वाली कहानी बचपन में हम सब ने पढ़ी होगी जिसमें बूढ़ा बाघ राह जाते ब्राह्मण से संस्कृत में संवाद करता है-'भो, भो पान्थः'। इस बूढ़े बाघ को भी मालूम है कि ब्राह्मण 'भोवादी' है! 'भो' शब्द का प्रयोग राजन्य या वैश्य के संबोधन के लिए होता था, शूद्र के संबोधन के लिए नहीं-'भो राजन्य विशां वा'। तो क्या हम मान लें कि यह साहित्य जो कुत्तों, सियारों तक को संस्कृत बोलने की छूट देता है और स्त्री, शूद्रों पर बंदिशें लगता है, राजनीति से प्रेरित नहीं होगा?