Saturday, September 12, 2026

मिथक और इतिहास बोध

मुझे धार्मिक देवी-देवताओं से कोई सहानुभूति नहीं है लेकिन अगर कोई इसका विरोध यह कहते हुए करे कि "पिता ब्रह्मा से बलात्कृता सरस्वती आज हर जगह पूजी जा रही है", तो मुझे घोर आपत्ति है। प्रथमतया, यह कथन स्त्री विरोधी है और बलात्कार के लिए सरस्वती को दोषी ठहराता है। दूसरे, ऐसे कथन इतिहास और मिथकों की अनैतिहासिक समझ से जन्म लेते हैं। मुझे नहीं लगता कि सरस्वती और ब्रह्मा के बीच का यह यौन संबंध कोई बलात्कार की घटना है। हमें अन्य कई देवताओं के जीवन में भी यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। कहा जाता है कि पुषन ने अपनी माता से प्रेम याचना की। बेबिलोनिया में भी स्त्री देवता के साथ पुरुष देवता का संबंध मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण की एक पुरानी गाथा बताती है कि पुत्र प्राप्ति के लिए पुरुषों ने माताओं और बहनों के साथ पत्नी की तरह संभोग किया। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, पृष्ठ57)

ब्रह्मा-सरस्वती का सम्बंध पिता-पुत्री का वैध यौन संबंध है। 'जन्हु ने भी अपनी पुत्री जाह्नवी से विवाह किया था।' (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, पृष्ठ 161) अवेस्ता के यिम, यिमे, ऋग्वेद के यम-यमी का संवाद भाई-बहन के बीच यौन संबंध के अस्तित्व को ध्वनित करते हैं। सर्वदमन सिंह के मतानुसार मातृनामों से, जिनमें ऋग्वेद के 'मामतेय' का उदाहरण भी है, बहुपतित्व, बहुपत्नीत्व अथवा स्वच्छंद संभोग के संकेत मिलते हैं। (पोलिएंड्री इन एनशिएंट इंडिया, 1978, पृष्ठ 68)

प्राचीन मिस्र में भाई-बहन के बीच शादी होती थी क्योंकि संपत्ति का हस्तांतरण मां से पुत्री को होता था। आइसिस ओसिरिस की बहन तथा पत्नी थी। अथर्ववेद में उल्लिखित है कि असुरों में बाप-बेटी के बीच विवाह की प्रथा थी। महाभारत के कर्ण पर्व में मद्र देश के लोगों के विषय में ऐसी अनेक परम्पराओं का उल्लेख है। कहा गया है कि मद्र देश में शाकल की बाह्लीक स्त्रियां नंगी नाचती और हंसती हैं तथा स्वैरणी और स्वेच्छाचारिणी होती हैं और खुले मैदान में मैथुन का आनंद लेती हैं। (कर्ण पर्व, कुंभकोनम प्रकाशन, 37, 22-23) राजतरंगिणी में भी उल्लेख है कि गांधार के ब्राह्मणों में कौटुम्बिक मैथुन प्रचलित था। (राजतरंगिणी, 1.308)

कहने की जरूरत नहीं कि विवाह और परिवार रूपी संस्था के अभ्युदय के पहले पिता, पुत्र सभी यौन संबंध कायम कर सकते थे। एंगेल्स ने ठीक ही इसे 'यौन साम्यवाद' की संज्ञा दी है। भारतीय विद्वानों में काशीनाथ राजवाड़े ने भी काफी कुछ लिखा है इस विषय पर। तो यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति पर बंदिश रातोंरात नहीं लगी है। इतिहास के कई युगों और पीढ़ियों को गुजरना पड़ा है। पांच भाइयों के साथ द्रौपदी की शादी को औचित्य प्रदान करते हुए युधिष्ठिर ने महाभारत में परंपरा की ओर ध्यान दिलाया है। युधिष्ठिर ने इसी परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि गौतम-नन्दिनी जटिला ने सात ऋषियों के साथ ब्याह किया था। स्त्री-पुरुष के स्वच्छंद मैथुन के मामले में महाभारत की उक्तियाँ निर्णयात्मक हैं। पाण्डु उस युग की चर्चा करते हैं जिसमें स्त्रियां अनियंत्रित, स्वैरिणी, स्वेच्छाचारिणी और स्वतंत्र होती थीं। स्त्रियां विवाह के पहले भी पुरुषों की ओर आकृष्ट होती थीं लेकिन यह उनके लिए पाप नहीं माना जाता था। (आदि पर्व, 128. 4-5) ऋग्वैदिक समाज में भी प्रत्येक स्त्री को विवाह करने की आवश्यकता नहीं थी। इसलिए कुमारी से उत्पन्न बच्चे अधम पतित नहीं समझे जाते थे। (कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, लोपामुद्रा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1949, पृष्ठ 9) यह कहना अनावश्यक है कि ऋषि रूपवती स्त्रियों के आकर्षण के लिए मंत्र की रचना करते थे। (वही, पृष्ठ 8)

स्वच्छंद यौन संबंध का सबसे महत्वपूर्ण संकेत उद्दालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु की कथा में मिलता है। श्वेतकेतु ने अपने सामने देखा कि एक ब्राह्मण ने उसकी माता को हाथ पकड़कर खींच लिया है। इससे वह अत्यंत क्रोधित हुआ पर उसके पिता ने श्वेतकेतु से कहा कि इसमें क्रोधित होने की कोई बात नहीं है क्योंकि संसार की सभी स्त्रियां स्वच्छंद विचरण करती हैं और यह प्रथा अति प्राचीन काल से सनातन धर्म के रूप में चली आ रही है। (आदि पर्व, 128. 9-15) श्वेतकेतु के आख्यान से मिलती-जुलती अन्य अनेक परंपराएं हैं अतः कल्पित कथा कहकर इस आख्यान का तिरस्कार नहीं किया जा सकता है। (डी एन मित्तर, पोजीशन ऑफ वीमेन इन हिन्दू लॉ, पृष्ठ 203)

ऐसे ही मुनिकन्या वार्क्षी का ब्याह एक नाम वाले दस प्रचेताओं के साथ हुआ था। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 252) अहिल्या की कथा से भी इतना ही प्रकट होता है कि इंद्र प्राचीन परंपरा का द्योतक है। किसी पुरुष ने स्त्री को स्वतंत्र समझकर अहिल्या से संबंध किया, किन्तु अब सामाजिक परिस्थिति बदल चुकी थी। पितृसत्तात्मक समाज में यह सर्वमान्य नहीं रही थी। राम ने उसी प्राचीन परंपरा में अहिल्या को निर्दोष माना और समाज में जीवित माना। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 201)

हमारा इतिहास-विवेक इस बात को समझने में है कि यह प्रवृत्ति महाभारत के समय मुख्य प्रवृत्ति न होकर मरणासन्न है। दम तोड़ती इस प्रवृत्ति को स्मृति भर ही जगह मिली है हमारे शास्त्रों में। द्रौपदी की सास कुंती स्वयं सूर्य के साथ संभोग करती है। सूर्य ने यहां कुंती को जो समझाया है वह इस संदर्भ के लिए अर्थवान है। सूर्य कहता है कि 'स्वभाव से सभी स्त्री और पुरुष, अपनी इच्छा के अनुसार काम करने के लिए स्वाधीन हैं। वैवाहिक नियम का बंधन स्वभाव के विकार से उत्पन्न हुआ है।' (रांगेय राघव, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 279) किंतु सच है कि उसकी संतान को सामाजिक मान्यता नहीं मिलती। ये सारी कहानियां बस इसी बात की ओर संकेत हैं कि ये नये जमाने की बात नहीं है, जुज़रे जमाने की याद भर हैं।

मातृसत्ता के ध्वंस पर पितृसत्ता को स्थापित करती कहानियां भी रची जा रही थीं। कहानी है कि जमदग्नि, सत्यवती और ऋचीक के पुत्र तथा विख्यात भृगुवंशी परशुराम के पिता थे। उसकी पत्नी रेणुका थी। एक दिन रेणुका स्नान करने के लिए नदी-तट गई तो वहां उसने किसी गन्धर्वदंपति को जल में क्रीड़ा करते देखा। उस मनोहर दृश्य को देखकर उसके मन में ईर्ष्या जागी और वह उन दूषित विचारों से कलुषित हो गई। जब वह वापिस घर आई तो क्रोध के अवतार जमदग्नि ने उसे 'सतीत्व की कांति से हीन' देखकर बड़ा धमकाया और अपने पुत्रों को उसका सिर काट देने की आज्ञा दी। पहले चारों पुत्रों ने ऐसा क्रूर दुष्कृत्य करने में आनाकानी की। परशुराम उनका 'सबसे छोटा पुत्र' था। उसने तुरंत पिता की आज्ञा का पालन किया और कुल्हाड़े से अपनी माता का सिर काट डाला। शांत और प्रसन्न जमदग्नि ने परशुराम से वरदान मांगने के लिए आग्रह किया। परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की जो अविलंब स्वीकार की गई। (आप्टे, संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 438) यह कहानी हमें बताती है कि मातृसत्ता की कब्र पर पितृसत्ता के अंकुर फूटे हैं।

लोक में लाठी

प्रकृति से आदमी दो टाँगोंवाला प्राणी है। 'तीसरी टाँग' उसे इस भूलोक (मर्त्यलोक) में अर्जित करनी होती है। यह तीसरी टाँग 'बुढ़ापे की लाठी' है। यह लाठी इतनी अपरिहार्य है कि हमारे मुहावरों तक में आ घुसी है। इसे आप भाषा में 'बुढ़ापे की लाठी' का 'टाँग अड़ाना' भी कह सकते हैं। 

लाठी की महत्ता का अनुमान इसके पर्यायवाची शब्दों की भरमार से भी होता है। इसके लट्ठ, लऊर, लऊरि, लबेद, पटकन, बोंग, गोजी, बासमती, लोहबाना (लोहबंद), डंटा, पैना, छड़ी, सोंटा, ठेंगा, दुखहरन, दुखभंजन आदि कई नाम हैं। (दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह, भोजपुरी के कवि और काव्य, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, 1958, 'भूमिका', पृष्ठ 21) 

लाठी से बने 'लठैत', 'लठधर' शब्द की भी भारतीय संस्कृति में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। बिहार के जमींदारों के इन लठैतों की करतूत से भला कौन अपिरिचित होगा। अमवारी किसान आंदोलन के दौरान राहुल का सिर इन्हीं लठैतों ने लहूलुहान कर दिया था। महाकवि निराला का 'लंठ' (लेखकों में लंठ जैसे खुशनसीब) इसी का गोतिया लगता है। 'डोमाजी उस्ताद' के कहने ही क्या!

पहलवानों की लाठियां प्रसिद्ध रही हैं। औपनिवेशिक बिहार के दिनों में मथुरा सिंह (जयकिसुन बिगहा, जहानाबाद) की लाठी के किस्से यहाँ की हवा में होते। कहा जाता है कि उनकी लाठी इतनी बड़ी होती कि उसके सहारे वे दोमंजिले मकान की छत पर आसानी से छलांग लगाकर पहुंच जाते। तब के हिन्दू-मुस्लिम दंगों में इनकी लाठी की भी भूमिका रही। 

मेरे गांव में मनियामा (जहानाबाद) के सीताराम सिंह आते। खुद तो पांच फुट के जवान थे लेकिन लाठी सात फुट की रखते। बड़ी लाठी उनके पहलवान होने का भ्रम रचती। 'कलाकारों की रिलीफ पार्टी' में कथाशिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु ने एक ऐसे ही 'लाठीधारी' की तस्वीर खींची है : "आज सुबह से ही 'अपने लोग' स्वजन-सनेही, मित्र और प्रीतिभाजन-जन हमारी सुधि लेने आ रहे हैं। कोई खाली हाथ नहीं आता। एक हाथ में लट्ठ और दूसरे में हमारे लिए कोई-न-कोई आवश्यक सामान। सभी एक अभूतपूर्व 'मेकअप' में लूंगी या धोती लपेटे, गंजी पहने। डाक्टर रामवचन राय आये,- तो उनके हाथ में जो लाठी थी वह उनसे भी वजनी रही होगी। मैंने हँसकर कहा था-'आचार्यजी, लाठी में गुण बहुत हैं, सदा राखिये संग।" (फणीश्वरनाथ रेणु : चुनी हुई रचनाएं, भाग 3, पृष्ठ 114) 

कहना अनावश्यक है कि रेणु ने अपनी बात कहने के लिए गिरिधर कविराय का सहारा लिया है। कविराय की पूरी बात कुछ इस तरह है : "लाठी में गुण बहुत हैं, सदा राखिये संग/ गहरी नदी, नारा जहां, तहां बचावै अंग/ तहां बचावै अंग, झपटि कुत्ता को मारै/ दुशमन दावागीर, होय तिनहूं को झारै/ कह गिरिधर कविराय, सुनो हो धूर के बाठी/ सब हथियारन छांड़ि, हाथ में लीजै लाठी।" (डॉक्टर आशीष वशिष्ठ एवं योगिता वशिष्ठ, बृहद सूक्ति कोश, भाग 2, कल्पना प्रकाशन, 2021, पृष्ठ 208 में उद्धृत) गिरिधर कविराय कहते हैं कि हमेशा अपने पास लाठी रखें, अगर राह में गहरी नदी, नाला आ जाता है तो लाठी सहारा देती है, अगर कोई कुत्ता पीछे पड़ जाता है तब भी लाठी उससे बचाती है, अगर कोई दुश्मन हमला कर दे तो लाठी उसे भगा देती है। इसलिए कवि बार-बार यही कहते हैं कि सारे हथियार छोड़कर अपने पास बस लाठी रखो ।

भोजपुरवासियों ने अपने मन-मिजाज से कविराय का कहा माना है। इस मिजाज को सबसे पहले ग्रियर्सन ने पकड़ा। वे कहा करते थे कि बंगालियों ने कलम से जो किया, उसे भोजपुरियों ने लाठी से! शायद इसीलिए लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया में भोजपुरी भाषा पर अध्याय की शुरुआत उन्होंने गिरिधर कविराय की इस लाठी-चर्चा से की है। (दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह, भोजपुरी के कवि और काव्य, पृष्ठ 5) भोजपुरी में लाठी की अमोघ शक्ति को लेकर कई कहावतें प्रचलित हैं। कहा जाता है कि 'सइ पूरा चरन नु एक हूरा चरन' अर्थात सौ बार निहोरा करने से भी जो काम नहीं होता लाठी से हो जाता है। 

लाठी ही का असर कहिए कि उन्होंने बेद का तुक लबेद से मिला दिया। एक कहावत प्रचलित है : 'चार बेद और पांचवां लबेद' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 113)। मेरे गांव में इसको 'लाठीकोट' (कोर्ट) कहा जाता है। 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' तो आपने भी सुनी होगी। 'लबेद' का मतलब 'लाठी' ही है। पहले गांवों में 'लाठीकोट' का फैसला 'अंतिम' माना जाता था। जिसका परिवार बड़ा होता वह लाठीकोट में केस जीता हुआ समझा जाता। मेरे बाबा (दादाजी) एक पढ़ुआ पढ़ते थे-'जेकरा पाले चार धुरहिया, मारे लाठी छीने रुपइया'! इसी बात को दूसरे शब्दों में कहा गया है : 'जिसके चार भैय्या, मारें धौल छीन लें रुपैया'। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 140)

लाठी सिर्फ 'झपटि कुत्ते को मारै' ही नहीं है बल्कि यह सौंदर्य की भी खान है। हिंदी के रीतिकालीन कवियों ने 'कनक छड़ी सी कामिनी' कहकर वर्णन किया है तो बिरहा गीत में अत्यंत मोहक अंदाज में लाठी के हुर्रे की प्रशंसा निबद्ध है :

'हुरवा नियर तोर जुरवा ए गोरिया,

पुअवा नियर तोर गाल।

पनवा नियर तू त पातर बाड़ू गोरिया,

लोटवा नियर तोर भाल।।' (राहुल सांकृत्यायन, हिन्दी साहित्य का बृहत इतिहास, भाग 16, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, पृष्ठ 151)

वर्ण और दंड

स्मृतियों में आश्रम और वर्ण के अनुसार दंड धारण करने की व्यवस्था है। उपनयन संस्कार के समय मेखला आदि के साथ ब्रह्मचारी को दंड भी धारण कराया जाता है। प्रत्येक वर्ण के ब्रह्मचारी के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के दंडों की व्यवस्था है। ब्राह्मण को बेल या पलाश का दंड केशांत तक ऊँचा, क्षत्रिय को बरगद या खैर का दंड नाक तक ऊँचा धारण करना चाहिए। गृहस्थों के लिए मनु ने बाँस का डंडा या छड़ी रखने का आदेश दिया है। संन्यासियों में कुटीचक और बहूदक को त्रिदंड (तीन दंड), हंस को एक वेणुदण्ड और परमहंस को भी एक दंड धारण करना चाहिए, ऐसा निर्णयसिंधु में उल्लेख है। किसी-किसी ग्रंथ में यह भी लिखा है कि परमहंस परम ज्ञान को पहुंचा हुआ होता है, अतः उसे दंड आदि धारण करने की कोई आवश्यकता नहीं। राजा लोग शासन और प्रतापसूचक एक प्रकार का राजदंड धारण करते थे। (हिंदी शब्दसागर, चतुर्थ भाग, नागरी प्रचारिणी सभा, 1995, पृष्ठ 2188)

सच्चिदानंद सिन्हा : एक जन्मजात चक्रवर्ती

दसवीं की हिंदी की किताब में जगदीश चंद्र माथुर का एक पाठ पढ़ना होता था। शीर्षक था-'एक जन्मजात चक्रवर्ती'। इस शीर्षक से किसी को एतराज नहीं हो सकता। सच्चिदानंद सिन्हा के पूर्वज के नामों में 'बख्शी' लिखे होने का मतलब है कि वे मुग़लों के बड़े ओहदे वाले मुलाजिम रहते आये थे। वैसे उनका जन्म तो बिहार के आरा के पास मुरार गांव (बक्सर जिला के चौगाई प्रखंड) में हुआ था, किन्तु उनके पूर्वज लखनऊ के आसपास के रहे होंगे। अकारण नहीं है कि मुरार गांव का इनका टोला 'लखनौआ टोला' के नाम से जाना जाता है। कायस्थ तो वे थे ही। अब बख्शी, लखनऊ और बिहार के कायस्थ को मिला दीजिए तो चक्रवर्ती से कम क्या बनेगा भला!

तब कायस्थों की पढ़ाई अरबी-फ़ारसी से शुरू होती और विलायत की बैरिस्टरी पर खत्म होती। डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद हों या प्रेमचंद-सब मकतब और मदरसा के विद्यार्थी थे। हमलोग बचपन में एक कहावत सुनते थे-'पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, देखो रे किस्मत का खेल'! मर्म है कि कहावत बनने से पहले फारसीदाँ ही को नौकरी मिलती थी। अरबी-फ़ारसी-अंग्रेजी से पढ़ाई आरम्भ कर सच्चिदानंद विलायत पढ़ने गये। बैरिस्टरी की पढ़ाई कर चुकने के बाद तक वे अपना नाम अशुद्ध लिखा करते थे। 1890 में उनकी मुलाकात मैक्समूलर से हुई। मैक्समूलर को भारतविद और संस्कृतज्ञ दिखने की इतनी प्रबल चाह थी कि वह 'मोक्षमूलर' कहलवाना ज्यादा पसंद करता था। नाम बदलने की यह प्रवृत्ति यूरोप के कई अन्य विद्वानों में देखी गई है। मुजफ्फरपुर (बिहार) में जन्मे वेद-विद्वान मैकडॉनेल ने अपना संस्कृत नाम 'मुग्धानलाचार्य' रख छोड़ा था। भारतीय विद्वानों ने इन नामों के संस्कृत अनुवाद को लेकर काफी हास-परिहास किया है। महावीरप्रसाद द्विवेदी और चंद्रधर शर्मा गुलेरी तो खूब ही चुटकी लेते हैं! उसी मोक्षमूलर ने सच्चिदानंद को बताया कि आप अपना नाम गलत लिखते हो और शुद्ध रूप से परिचय कराया।

सिन्हा साहब जब विलायत से पढ़कर लौटे तो उनके चचेरे बड़े भाई ने उन्हें इलाहाबाद ठहरकर पाप का प्रायश्चित करने को कहा। तब का यही लोकाचार था। गांधीजी के प्रायश्चित भोज के बारे में हम सब जानते हैं। बिहार में डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के एक रिश्तेदार अभी-अभी पढ़कर लौटे थे। किशोरवयप्राप्त राजेन्द्र ने उस घटना से उत्पन्न विवाद को नजदीक से देखा था। आत्मकथा में लिखा भी है। के. पी. जायसवाल जब विलायत पढ़ने गये थे तो इनकी रसोई का सारा सामान भारत से गया था। अलग से क्या कहना कि इसमें ईंधन का कोयला तक शामिल था। सिन्हा साहब ने इस सामाजिक माहौल में प्रायश्चित करने और भोज करने से बड़े भाई को साफ मना कर दिया। किन्तु वे अपनी ताबीज लाना न भूले थे। तथ्य है कि बालक सच्चिदानंद का जब जन्म हुआ तो उन्हें एक मुसलमान संत के पास ले जाया गया। उस संत ने अपनी मूंछ के बाल उखाड़े और सच्चिदानंद के चाचा को इस हिदायत के साथ दिये कि इसे ताबीज बनाकर वह आजन्म साथ रखे। इस हिदायत का सच्चिदानंद ने आजन्म पालन किया।

1893 में जब वे स्वदेश लौटे तो देखे कि नौकरियों पर बंगाली कुंडली मारे बैठे हैं। महेशनारायण के बड़े भाई गोविंदनारायण बिहार के पहले ग्रेजुएट थे लेकिन बंगालियों के आगे इनकी एक न चल रही थी फलतः बेरोजगार थे। इससे महेशनारायण काफी क्षुब्ध और व्यथित थे। रोजगार एवं अवसर की तलाश की इस 'मध्यवर्गीय लड़ाई' को सच्चिदानंद सिन्हा ने एक व्यापक आधार प्रदान करने हेतु 'बिहारी पहचान' एवं 'बिहारी नवजागरण' की बात 'गढ़ी'। उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा है, 'सिर्फ खुद बिहारियों को छोड़कर बाकी लोगों में बिहार का नाम भी लगभग अनजान था।' आगे उन्होंने लिखा, 'पिछली सदी के 90 के दशक के प्रारंभ में मैं जब एक छात्र के रूप में लंदन में था, तब मुझे जबरन इस ओर ध्यान दिलाया गया। तभी मैंने यह दर्दनाक और शर्मनाक खोज की कि आम बर्ताव के लिए तो बिहार एक अनजान जगह है ही, और यहां तक कि अवकाशप्राप्त आंग्ल-भारतीयों के बहुमत के लिए भी बिहार अनजाना ही है।... मेरे लिए आज के बिहारियों को यह बताना बड़ा कठिन है कि उस वक्त मुझे और कुछ दूसरे उतने ही संवेदनशील बिहारी मित्रों को कितनी शर्मिंदगी और हीनता महसूस हुई जब हमें महसूस हुआ कि हम ऐसे लोग हैं जिनकी अपनी कोई अलग पहचान नहीं है, कोई प्रांत नहीं है जिसको वे अपना होने का दावा करें, दरअसल उनकी कोई स्थानीय वासभूमि नहीं है जिसका कोई नाम हो। यह पीड़ादायक भावना उस वक्त और टीस बन गई जब सन् 1893 में स्वदेश लौटने पर बिहार में प्रवेश करते-करते पहले ही रेलवे स्टेशन पर एक लंबे-तगड़े बिहारी सिपाही के बैज पर 'बंगाल पुलिस' अंकित देखा । घर लौटने की खुशियां गायब हो गईं और मन खट्टा हो गया। ... पर सहसा ख्याल आया कि बिहार को एक अलग और सम्मानजनक इकाई का दर्जा दिलाने के लिए, जिसकी देश के अन्य महत्वपूर्ण प्रांतों की तरह अपनी एक अलग पहचान हो, मैं सब कुछ करने का संकल्प लूं जो करना मेरे बूते में है। एक शब्द में कहूं तो यही मेरे जीवन का मिशन बन गया और इसको हासिल करना मेरे सार्वजनिक क्रियाकलापों की प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत।'

बिहार में बंगाली हितों का प्रवक्ता गुरुप्रसाद सेन का 'बिहार हेरल्ड' (1875) तब मौजूद था। बंगाली हितों के विरुद्ध बिहारी हितों की वकालत करनेवाला भी एक अखबार चाहिए था। अतएव, 1893 में विलायत से पढ़कर लौटे सच्चिदानंद सिन्हा ने पत्र शुरू करने के ख्याल से एक मीटिंग आयोजित की। उक्त मीटिंग में पत्र का नाम 'बिहारी' प्रस्तावित किया गया, किन्तु अंतत: साल भर के अंदर 1894 में 'बिहार टाइम्स' नाम से अंग्रेजी पत्र शुरू किया और 'कायस्थ समाचार' में काम कर रहे महेशनारायण को इसका संपादक बनाया। 1906 ही में इन दोनों ने मिलकर बंगाल से बिहार के पृथक्करण पर एक पुस्तिका जारी की। इसी वर्ष अखबार का पुराना प्रस्तावित नाम 'बिहारी' कर दिया गया किन्तु 1907 में महेश बाबू का निधन हो गया और वे अकेले पड़ गये। बंगाल से बिहार को पृथक किये जाने की इस लड़ाई में उन्होंने कायस्थ बुद्धिजीवियों को एक मंच पर ला दिया। अंग्रेजों के प्रति 'राजभक्ति' और राष्ट्रीय आंदोलन से 'विरक्ति' ने 1912 में बिहार को बंगाल से पृथक होना संभव बनाया।

सच्चिदानंद सिन्हा को किताब पढ़ने और उसे लाल-पीले रंगों में रंगने अर्थात स्केच से 'अंडरलाइन' करने का गहरा शौक था। उनकी इन्हीं किताबों के संग्रह से बाद में प्रसिद्ध सिन्हा लाइब्रेरी की स्थापना हुई। सिन्हा साहब पाठक के साथ-साथ पत्रकार और लेखक भी थे। उन्होंने बिहार और भारत के अपने समकालीनों के ऊपर विद्वतापूर्ण टिप्पणियां की हैं। टिप्पणियां पुस्तकाकार प्रकाशित हैं। अखिल भारतीय स्तर के नेताओं और बुद्धिजीवियों वाली किताब जानकी प्रकाशन, पटना से छपी तो बिहार के समकालीनों के ऊपर लिखी गई जीवनीपरक टिप्पणियां हिमालय प्रेस, पटना के मैनेजर पंडित जयनाथ मिश्र के आग्रह पर 1944 में छपी थीं। कहने की आवश्यकता नहीं कि हिमालय प्रेस बिहार में टेक्स्टबुक लेखन के प्रणेता रामलोचनशरण बिहारी के प्रसिद्ध पुस्तक भण्डार (लहेरियासराय, दरभंगा) का पटना ब्रांच था। इस किताब में बीसियों लोगों की जीवनियों के साथ-साथ लगभग चालीस पृष्ठों की एक लंबी भूमिका भी है जिसमें 1893 से 1912 तक के बंगाल से बिहार के पृथक्करण का जो संघर्ष चला उसका संक्षिप्त किन्तु ऐतिहासिक महत्त्व का विवरण लिखा है। आज किताब का 'ब्लर्ब' या 'आमुख' किसी वरिष्ठ लेखक से लिखाने का चलन है, किन्तु सच्चिदानंद सिन्हा ने अपनी किताब 'सम एमिनेंट बिहार कंटेम्प्रेरीज' का 'आमुख' उम्र में काफी छोटे किन्तु उद्भट विद्वान अमरनाथ झा से लिखवाया था! अमरनाथ झा के बारे में कहा जाता है कि अगर शेक्सपियर का सम्पूर्ण साहित्य भी खो जाय तो उनकी सहायता से एक-एक बात फिर से लिख ली जा सकती है। अमरनाथ झा के पिता सर गंगानाथ झा उनके गहरे मित्र थे और इस किताब में उनकी जीवनी भी संकलित है।

सच्चिदानंद सिन्हा का मानना है कि चूंकि 1894 में 'बिहार टाइम्स' के प्रकाशन से बिहार की पत्रकारिता और पृथक बिहार की मांग शुरू हुई, इसलिए इस वर्ष को बिहार में रेनेसां की शुरुआत का वर्ष माना जा सकता है। अगर अखबार के प्रकाशन से बिहार के रिनेसाँ को जोड़ा जा सकता है तो हिन्दी अखबार 'बिहार बन्धु' को यह श्रेय क्यों नहीं दिया जा सकता जो बंगाल से बिहार को अलग करने के मुद्दे को उठाता रहा था। फिर 'अनीश' और 'कासिद' जैसे उर्दू रिसाले तो बहुत पहले से ये मांग रखते आ रहे थे।

आश्चर्यजनक है कि किताब में महेशनारायण पर एक स्वतंत्र अध्याय है किंतु हिन्दी पत्र 'बिहार बन्धु' से उनके जुड़ाव की कोई चर्चा नहीं है। हो सकता है कि इसका कारण उनका हिंदी विरोधी रुझान रहा हो। सिन्हा साहब हिंदी के हिमायती तो नहीं ही थे, समय-बेसमय वे उस पर व्यंग्य भी किया करते थे। (राधिकारमण स्मृति अंक, नई धारा, पृष्ठ 317) 'बिहार बन्धु' से जुड़े महेशनारायण नाम के एक कवि भी थे जिनकी बिहार बन्धु प्रेस से 'स्वप्न' नाम की मुक्तछंद की लंबी कविता छपी थी। वे खड़ी बोली के बिहार के आरंभिक कवि हैं। सिन्हा साहब द्वारा उनकी इस उपलब्धि की चर्चा न किया जाना मेरे इस संदेह को और गहरा करता रहा है कि 'बिहार टाइम्स' के महेशनारायण और 'बिहार बन्धु' में खड़ी बोली की कविताएं लिखने वाला महेशनारायण अलग-अलग व्यक्तित्व तो नहीं? श्री जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी जी को भी इस बात को लेकर शक हुआ था। किन्तु, श्री रामलोचनशरण बिहारी द्वारा संपादित एवं संवत 1883 वि. में हिन्दी-पुस्तक भंडार, लहेरियासराय से प्रकाशित किताब 'बिहार का साहित्य' (पहला भाग) की पृष्ठ संख्या 6 पर जो संपादकीय टिप्पणी है, उससे स्पष्ट है कि दोनों एक ही आदमी थे।

हिंदी संस्कृति की जमीन

वागर्थ (सितंबर, 2025) पलटना शुरू किया तो संपादकीय लेख पर नजर गयी। शीर्षक है-'हिंदी संस्कृति की जमीन'। पत्रिका के संपादक और इस लेख के लेखक शंभुनाथ हैं। वे भारतीय नवजागरण पर 'साधिकार' विचार करते रहे हैं। पत्रिका में लिखते हैं : "1857 की घटना के बाद अंग्रेजों ने भारत में समाज सुधार को प्रोत्साहन देना बंद कर दिया। विधवा पुनर्विवाह (1856) उनका आखिरी सुधार था। उन्हें भय था कि सामाजिक सुधार से भारत के लोग पुरानी खाइयों से मुक्त हो जाएंगे तो वे एक होकर औपनिवेशिक सत्ता के लिए खतरा बन जाएंगे।" (पृ. 9) 

उपर्युक्त पंक्तियों में उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध के भारत की बड़ी सतही समझ है। भारत में अंग्रेज व्यापारिक कंपनी के रूप में आए थे। सामाजिक चेतना में ये इंग्लैंड के सबसे पिछड़े तबके के प्रतिनिधि थे, इसलिए हमें इस भ्रम से मुक्त रहना होगा कि इनके द्वारा भारत में किये जा रहे परिवर्तन समाज-सुधार की उदात्त भावना से प्रेरित थे। दरअसल, उनके परिवर्तन बाजार-निर्माण से प्रेरित थे। अठारहवीं-उन्नीसवीं शती का भारत अंग्रेजी माल का बेहतर उपभोक्ता नहीं था। एक जड़ समाज बेहतर उपभोक्ता हो भी नहीं सकता। जिस उन्नीसवीं शती के नवजागरण/हिंदी नवजागरण की हम बात करते हैं, किसी भी हिंदी पत्र के ग्राहक सौ की संख्या तक नहीं पहुंच पाये। पत्र की बिक्री सरकारी खरीद और संपादकों की इस गारंटी पर निर्भर थी कि वे घर-घर जाकर पत्र बांच आया करेंगे। एक उन्मुक्त या उदार समाज ही बाजार की वकालत कर सकता है। जातियों में बंटे समाज का व्यक्ति अव्वल तो बाजार/शहर से दूर ही रहता है, अगर किसी मुसीबत में आ भी गया तो अपना सत्तू लेकर आता है, ताकि बाजार की चीज खाकर उसे जाति-धर्म गँवाने की नौबत न आये। आरम्भ ही से हिन्दू धर्म बाजार विरोधी रहा है। इतिहास में झांकें तो प्राचीन भारत में बौद्ध धर्म का उद्भव और विकास बाजार के लिए समाज को खोलने का संघर्ष है। अकारण नहीं है कि बुद्ध, अम्बपाली (आज की भाषा में बाजारू स्त्री) का आतिथ्य स्वीकार करते हैं। इतना ही नहीं, बुद्ध शहरों की यात्रा करते हैं और नोट करने लायक बात है कि किसी शहर ही में उन्होंने अपनी मृत्यु की कल्पना/इच्छा की थी। अंग्रेज भी इसी बाजार के घोड़े पर सवार थे। यह अर्थहीन बात है कि उनके समाज-सुधार से भारतीय समाज की खाइयां कम हो रही थीं। इस तथाकथित सुधार ने जिस शिक्षित वर्ग/समाज का निर्माण किया था, वह अंग्रेजी राज का समर्थक था। बंगाल का मध्यवर्ग 1857 में अंग्रेजों के पक्ष में तो था ही, हिंदी का लेखक भी महारानी की प्रशस्ति और 'शोक-प्रकाश' लिख रहा था।

मनुस्मृति-दहन-दिवस

मित्र आज (2021) मनुस्मृति-दहन-दिवस मना रहे हैं। मैं उनके इस उत्सव का साझीदार नहीं हो सकता। इसलिए नहीं कि मैं मनुस्मृति के नियमों का पैरोकार हूँ। पैरोकार हो भी नहीं सकता। किन्तु वह हमारे समाज का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। उसे नष्ट करना इतिहास को, उसके एक महत्त्वपूर्ण स्रोत को नष्ट करना है। ऐसा करना या करने की सोचना मुझे बचकाना लगता है। बच्चा उटपटांग सोचने के लिए आजाद है!

डार्विन के विकासवाद की खोज के बाद यह साबित हो गया है कि मनुष्य, बंदरों की संतान है। आज विज्ञान के इस निष्कर्ष को मनुष्य जाति पर लगा एक 'कलंक' मान बंदरों को समूल नष्ट कर देने की मूर्खता नहीं कर सकते!

अंग्रेजों ने हम पर बड़े जुल्म किये। इसका मतलब यह नहीं कि आज हिंदुस्तान में उनके नाम पर खड़ी इमारतें ढहाते चलें। सारी अंग्रेजी किताबें जला डालें। नहीं, आज वे हमारी विरासत हैं। उन्हें सहेजकर रखना हमारा सरोकार होना चाहिए। ऐसा विवेक हम पैदा कर सकें।

मनु को हमने 'विलेन' गढ़ा है, जबकि अधिकतर लोग कमोबेश वही बात अपने-अपने तरीके से कह गये हैं। जिस बात के लिए मनु सबसे ज्यादा कोसे जाते हैं, 'आदिकवि' उसके स्रोत बनते हैं। मनु की अधिकतर बातें अपने पूर्ववर्ती कवियों और विधि-निर्माताओं की हैं। वाल्मीकि के मत में "नारी सदैव पुरुष के आश्रित रहनी चाहिए। कन्या के रूप में पिता, पत्नी के रूप में पति तथा माता के रूप में पुत्र उनके संरक्षक हुआ करते हैं।" (रामायण, 1/32/21, 1/33/3, 2/61/24; राधावल्लभ त्रिपाठी, संस्कृत कवियों के व्यक्तित्व का विकास, संस्कृत परिषद, सागर विश्वविद्यालय, सागर, 1976, पृष्ठ 13 में उद्धृत) महाभारत के शांति पर्व में बहुत से ऐसे श्लोक मिलते हैं जो अक्षरशः मनुस्मृति में पाए जाते हैं। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली, 1993, पृष्ठ 34) 

मनुस्मृति का महाभारत के साथ विलक्षण सम्बन्ध है। इसके 260 श्लोक ऐसे हैं जो अक्षरशः महाभारत में पाये जाते हैं। विद्वानों का मानना है कि इन दोनों ग्रंथों ने एक-दूसरे से इन श्लोकों को नहीं लिया है, बल्कि दोनों ग्रंथों का कोई एक मूल है। वशिष्ठ और विष्णुस्मृति में भी 160 श्लोक ऐसे हैं जो मनुस्मृति के हैं। (गंगानाथ झा, हिन्दू लॉ इन इट्स सोर्सेज, पटना विश्वविद्यालय, पटना, 1931, पृष्ठ 59)

जिसे हम 'लोकसाहित्य' कहते उल्लसित होते हैं, वहां भी तथ्य को प्रभुत्वशाली ताकतों ने अधिकाधिक रूप से अपने पक्ष में करने की कोशिश की है। एक कहावत है, 'औरत रहे तो आप से, नहीं तो जाय सगे बाप से' अर्थात 'स्त्री यदि स्वयं सच्चरित्रा है, तब तो वह रहेगी, अन्यथा अपने बाप के साथ भी निकल जाती है।' (फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 56) स्त्री को 'कामातुर' साबित करनेवाली कहावत देखिए : 'कातक कुतिया, माघ (कोश में 'माघ' की जगह माह लिखा है।) बिलाई, चैत चिड़िया, सदा लुगाई।' (पृष्ठ 68) और आगे, 'कौड़ी गांठ की, जोरू साथ की' अर्थात 'अपना पैसा हमेशा अपनी गांठ में और स्त्री को अपने साथ रखना चाहिए। अथवा पैसा गांठ का ही काम आता है और स्त्री तभी काबू में रहती है, जब अपने साथ रखी जाए।' (पृष्ठ 78)

मनुस्मृति का मूल्यांकन करते हुए हम ज्यादती करते हैं जब उसको ऐतिहासिक संदर्भ से काट देते हैं।

हिन्दी के पाणिनि

किशोरीदास वाजपेयी संस्कृत के छात्र रहे थे, हिंदी साहित्य में उनका प्रवेश सन 1916 में हुआ माना जा सकता है जब किशोरीलाल गोस्वामी के मासिक पत्र 'वैष्णव-सर्वस्व' में 'दशधा भक्ति' शीर्षक लेख छपा। किशोरीलाल गोस्वामी ने इस लेख में 'दश' को गलत बताकर 'दस' कर दिया। इस बात पर वाजपेयी जी की भृकुटि तन गई। झगड़ बैठा कि 'दश प्रकार की भक्ति के दश को काटकर दस गलत क्यों कर दिया!' (साहित्यिक जीवन के अनुभव और संस्मरण) उस समय गोस्वामी जी ने मुस्कुराते हुए केवल इतना कहा था कि "हिन्दी में 'दश' की जगह 'दस' ही चलता है और क्यों चलता है, यह सब आगे मालूम हो जाएगा।" (वही) और आगे चलकर वाजपेयी जी को कुछ इस तरह मालूम हुआ कि वे हिन्दी के पाणिनि माने गये।

आरम्भ में किशोरीदास वाजपेयी को हिन्दी के आचार्य लोग बहुत हल्के में ले रहे थे तभी राहुल सांकृत्यायन ने लोगों को बताया कि जिस परीक्षा में वे अनुत्तीर्ण रहे किशोरीदास जी उसके टॉपर थे! दरअसल, वाजपेयी जी ने शास्त्री की परीक्षा दी थी। उस परीक्षा में राहुल भी बैठे थे। परीक्षा का परिणाम देखा गया तो राहुल फेल थे और वाजपेयी जी का नाम सूची में सबसे ऊपर था। राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी शब्दानुशासन की प्रस्तावना में ग्रंथ की महत्ता बताने के लिए इस बात की चर्चा कर देना आवश्यक समझा। 17 दिसम्बर उनका जन्मदिन था, लेकिन चतुर्दिक सन्नाटा पसरा रहा। लगता है, आज फिर वे चर्चा से बाहर कर दिये गये हैं। कृतघ्न हिंदी जगत को आज फिर किसी 'राहुल' की डांट का इंतजार हो शायद!

स्त्री-गीत में स्त्री-छवि

वर्षों से पढ़ते-सुनते आ रहे हैं कि अबतक का सारा इतिहास पुरुषों का, पुरुषों द्वारा लिखा गया इतिहास है। अर्थात पुरुष अपराधी और जज दोनों की भूमिका निभाता रहा है और मनोनुकूल फैसले लेता रहा है। इतिहास के इन फैसलों की वस्तुनिष्ठता जाँचने के लिए जरूरी है कि प्रतिपक्ष को भी सुना जाय। इतिहास की इस पहल से उन नये साक्ष्यों की खोज शुरू हुई है जिन्हें पुरुष प्रभावित कर पाने में लगभग असमर्थ रहे हैं। स्त्री-गीत इतिहास के ऐसे ही साक्ष्य हैं जिनके बारे में लगभग विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि वे मूलतया स्त्रियों द्वारा रचित एवं संरक्षित हैं। प्रेमचंद कहा करते थे कि "पुरुष इतना भावुक नहीं हो सकता कि स्त्रियों के अंदर के दर्द को महसूस कर सके। यह तो स्त्रियों ही के बनाए हुए हैं। स्त्रियों का दर्द स्त्रियां ही जान सकती हैं, और उन्हीं के बनाए यह गाने हैं।" (शिवरानी देवी, प्रेमचंद : घर में, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 222) इसलिए स्त्रियों का कोई भी वास्तविक और प्रामाणिक इतिहास स्त्री-गीतों से गुजरे बगैर नहीं लिखा जा सकता।

औरतों के बारे में कहा जाता है कि वे सब कुछ बर्दाश्त कर लेती हैं, किंतु सौत नहीं। एक कहावत भी है कि 'सौतिन काठो के न अच्छा।' इसी को 'सौतिया डाह' कहा गया है। हमारे प्राचीनतम लिखित साक्ष्य वैदिक साहित्य के दिनों से ही हमें स्त्री-मन में सौतों से डर तथा घृणा के उल्लेख प्राप्त होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋग्वैदिक काल के अंत तक एकपत्नीत्व की प्रथा जड़ जमा चुकी थी। दशम् मंडल की सूक्त संख्या 33 में इंद्र को संबोधित मन्त्र में कहा गया है कि 'सपत्नियों की तरह मेरे पार्श्व पीड़ा देते है।' दिलचस्प बात है क़ि इसी दशम् मंडल का सूक्त 145 सपत्नीबाधन अथवा उत्पीड़न के भाव से भरा है। इस सूक्त की ऋषिका इन्द्राणी हैं। इन्हें शची भी कहते हैं। देवता हैं सपत्नीबाधन। सूक्त के प्रथम मन्त्र में कहा गया है कि इस लता रूपिणी बलवती औषधि को हम खोदकर निकालते हैं, इससे सपत्नी को पीड़ित किया जाता है। दूसरे मन्त्र में कहा गया है कि आप मेरी सपत्नी को दूर करें तथा मेरे स्वामी को मात्र मेरे लिए प्रीतियुक्त करें। तीसरे मन्त्र में है कि हमारी सपत्नी निकृष्टों में भी अति निकृष्ट स्थिति को प्राप्त करें। चौथे मन्त्र में है कि मैं इन्द्राणी, सपत्नी का नाम तक लेना उचित नहीं समझती हूँ। सपत्नी सभी के लिए अप्रिय होती है। सपत्नी को मैं दूर से भी अति दूर देश में भेज देना चाहती हूँ। 5वें मन्त्र में, 'हे औषधे! मैं आपके सहयोग से सपत्नी को पराजित करनेवाली हूँ। आप भी इस कार्य में समर्थ हैं। हम दोनों शक्ति संपन्न बनकर सपत्नी को शक्तिहीन करें।' और अंत में, मन्त्र संख्या 6 में पति से प्रार्थना है क़ि मैं आपके सिर के स्थान सिरहाने के समीप सपत्नी को पराभूत करनेवाली इस औषधि को स्थापित करती हूँ। रामचरितमानस की मंथरा, कैकेयी से कहती है कि पुत्र को राज्य और राम को वनवास दो और 'सौत का सारा 

आनंद तुम ले लो'-'देहु लेहु सब सवति हुलासू'। (रामचरितमानस, गीता प्रेस, गोरखपुर, पृष्ठ 

324) कैकेयी भी दृढ़प्रतिज्ञ है कि 'मैं भले ही नैहर जाकर वहीं जीवन बिता दूंगी; पर जीते-जी सौत की चाकरी नहीं करूंगी'-"नैहर जनमु भरब बरु जाई। जिअत न करबि सवति सेवकाई।" (वही, पृष्ठ 323) पुत्र के मुख से वनगमन का दुःसंवाद सुनकर कौसल्या कहती है-'विप्रकारं सपत्नीनामेबं जीर्णपि राघव।' अर्थात 'हे राम, बुढ़ापे में सौतों का अनादर मुझसे अब सहा न जायगा।' (2/20/47; शिवबालक राय, वाल्मीकि- रामायण : काव्यानुशीलन, मोतीलाल बनारसीदास, 1988, पृष्ठ 292)

पितृसत्तात्मक समाज में सौत स्त्रियों की स्थायी पीड़ा रही है, इसलिए उससे संबंधित कई मुहावरे भाषा में दर्ज हैं। एक कहावत है 'सेज की मक्खी भी बुरी'। (एस. डब्ल्यू. फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 344) फिर सौत के संबंध में अलग से कहा ही क्या जाय? एक दूसरी कहावत है, 'सौकन चून की भी बुरी है' (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 348) इसी बात को एक अन्य कहावत में कुछ इस तरह कहा गया है- 'सौकन बुरी चून की और साझे का काम/कांटा बुरा करील का और बदरी का घाम।' (वही)

यह डर लोक और लोकगीतों में भी मुखर है। कई दफा इस डर को हथियार बनाकर परिवार के सदस्यों, खासकर ननद और पति के द्वारा स्त्री को काबू में करने की कोशिश की गई है। अंगिका में इस आशय का एक गीत है। पति अपनी पत्नी के लिए कंगन खरीदकर लाता है। उसकी ननद उसे पहने हुए देख लेती है और वह निश्चय कर लेती है कि भाभी के पुत्र होने पर मैं यह कंगन ही बधाई में लूँगी-'कँगना पहिर भौजो ठाढ़ भेलै, अँगनमा से ठाढ़ भेलै हे। ललना रे, परि गेल ननदो मुँह दीठ, कँगनमा भौजो पहिरल हे।। तोहें ननदो मनाव$ गोसाईं, औरू भगमानजी सें हे। ललना रे, जौं घर बबुआ जनम लेल, कँगनमा पहिराई देब हे।।' भाभी पुत्रवती होती है और ननद उससे बधाई में कँगन की माँग करती है। भाभी सौरगृह से कँगन की चोरी हो जाने का बहाना बनाती है। ननद, माता-पिता तथा भाई से कँगन दिलवाने का अनुरोध करती है। सब से वही चोरी का बहाना। अंत में भाई अपनी बहन से कहता है कि जाने दो, मैं दूसरा विवाह कर लूंगा और तुम्हारी नई भाभी से तुम्हें कँगन दिलवा दूंगा। इस खबर को पाकर जच्चे का सारा गर्व टूट जाता है और वह कँगन अपनी ननद को दे देती है तथा अपने पति से दूसरा विवाह न करने की प्रार्थना करने लगती है। 'चुप रहु चुप रहु बहनियां कि बहिनियां, से अरज करियो हे। ललना रे, करबौ में दोसरो बिअहबा, कि कँगनमां तोरा पेन्हाइ देबौ हे।। गोड़ लागियों पैयाँ परियो परभुजी, अब अरजिया करियो हे। ललना रे, जनि करिहो दोसरो बिआह, कँगनमां ननदो देइ देब न हे।।'

एक अन्य गीत में वर्णन है कि पुत्रोत्पत्ति की ख़ुशी में जच्चे के नैहर से 'पियरी' में जड़ीदार साड़ी आई है। ननद बधावे में 'पियरी' ही की मांग करती है। ननद अपने माता-पिता और अपने प्यारे भाई से पियरी दिलाने का अनुरोध करती है, लेकिन जच्चा सबके अनुरोध को ठुकरा देती है। अंत में भाई अपने बहन को सांत्वना देते हुए कहता है- 'बहन, अधीर मत हो। मैं दूसरी शादी करूँगा, तो उससे पुत्र होने पर मैं उसकी पियरी तुम्हें दिला दूंगा। पति की इस बात से मानिनी जच्चे का गर्व चूर हो जाता है और वह सौत के डर से अपनी पिटारी से पियरी निकालकर ननद के आगे फेंक देती है। 'चुप रहु, चुप रहु बहिनी, त बहिनी सें अरज करी हे। ए बहिनी, करबै हम दोसर बियाह, पियरिया तू बधावा लिहें हे।। एतना बचनिया जब सुनल, त सुनहु न पाओल हे। ए ललना, झाँपी से काढ़ली पियरिया, अँगनमा धय बजारी देल हे। ए ननदो, लेहो छिनरिया पियरिया, त सौतिन मंगाबे लागल हे।।'

शिव द्वारा अपनी साली से ही दूसरा विवाह कर लेने पर गौरी रुष्ट होकर शाप देती है। 'मरियो गे संझा भाइ रे भतिजबा, आरो होइहो कोखिया बिनास हे। तीनि भुवन बर कतहुँ न मिललौ, भै गेलै सौतनी हमार हे।' संध्या, जो सौत बनकर आयी है, बड़े ही मार्मिक शब्दों में कहती है, बहन, भला-बुरा क्यों कहती हो तथा शाप क्यों देती हो? मेरे लिए तो कार्तिकेय और गणपति दो बालक हैं, उनको मैं खेलाऊँगी। 'मतु पढ़अ गारी गौरा, भाइ रे भतीजा लाइ, जनि करिह$ कोखिया बिनास हे। कारतिक गनपति, दोइ रे बालक, गोदी के खेलाइबअ होइबअ में दासी तोहार हे।।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 195)

मगही लोककथाओं में भाभी के प्रति ननद की कटुता परिलक्षित होती है। सोभानायका बनजारा लोक-गाथा में ननद की कटुता जसोमती के प्रति ऐसी है कि ननद के प्रति घृणा उत्पन्न हो जाती है। (डॉक्टर एनामुल हक, मगही लोक-गाथाओं का साहित्यिक अनुशीलन, विशाल पब्लिकेशन, प्रथम संस्करण : 2007, पृष्ठ 267) भाभी की कटुता भी छिपी नहीं रहती- "ये नन्दो राँड़ का काम होगा-वही तायी से कराय के घर गई है।" (बूँद और समुद्र, अध्याय 6; भारतेन्दु-युग और हिन्दी-भाषा की विकास-परंपरा, पृष्ठ 149 में उद्धृत)

लोकगीत में सास-बहू प्रसंग

एक नेपाली गीत में बहुओं के प्रति निर्दयी सासों का अत्याचार कुछ इस तरह चित्रित किया गया है :

'सास कहती है-बहू! बहू कहती है-जी!

'काठ की हांडी में रखा हुआ घी किसने खाया?'

'न देखा न सुना, मैंने कहाँ खाया।'

तेरे होंठ चिकने हैं, मैंने थाह पा ली।

जितने द्वार हैं बंद किये देती हूँ, जितनी खिड़कियां हैं खोले देती हूँ।

तू घी-चोर बहू है, तेरे होंठों को दाग दूंगी।'

सास के अत्याचारों का कहीं अंत नजर नहीं आता-

'मैं इस परदेस में मर जाऊंगी,

मेरे लिए आंसू बहाने वाला कोई नहीं।'

और अंत में,

'नारी का जन्म एक पराजित कर्म है,

सदैव दूसरों की परतंत्रता!' (देवेंद्र सत्यार्थी, धरती गाती है, पृष्ठ 154-155)

सास-बहू के बीच मतभेद नया नहीं पुराना है। गीतों में स्त्री अपनी मां के लिए प्रेम दिखाती है तो सास के लिए स्वाभाविक घृणा। एक गर्भवती स्त्री पतिगृह आने से दुखी है। सोचती है कि शादी के बाद भी अगर अपनी मां के घर रहती, तो मेरे दुःख को मेरी मां अपने अथक परिश्रम और सेवा-शुश्रुषा से कम कर देती, जबकि उसे अपनी सास के व्यवहार से दुःख है। 'अपन मैया रहतिऐ, दरदियो हरी लेतिऐ हो लाल। परभुजी के मैया हे बेदरदी, दरदो नहीं हरी लिय हो लाल।।' सास को भी बहू से कुछ कम शिकायत नहीं है। फिर बात अगर बहू की संतानहीनता की हो तो वह बहू के पद से भी उतार दी जाती है। 'सासू मन टूटल ननदी मन, औरु सभै के मन रे।' वंश परंपरा को कायम रखने की सबसे अधिक चिंता सास को सताती है, इसलिए निःसंतान बहू सास के लिए बहू न रहकर 'बाँझिन' हो जाती है। सास द्वारा बहू की इस प्रताड़ना में प्रायः ननदें भी शामिल रहती हैं। 'सासु मोरी कहले  बँझिनियाँ, ननद मोरी बाँझिन हे।' सास बहू के बीच प्रेमपूर्ण सम्बन्ध न होने से सास मायके जाकर बैठी है। बहू जब प्रसव वेदना से परेशान हो उठती है तब बेटा अपनी माँ को मनाने जाता है। माँ आने को तैयार नहीं है; क्योंकि उसे अपनी बहू की बातें सह्य नहीं होतीं। 'ललना रे तोरि धनि क बोली न सोहाय, हुआँ रे कैसे जायब हे।' फिर, किसी तरह मानती है। सौरगृह में प्रवेश करते ही वह बच्चे को देखकर समय पर अनुपस्थित रहने के लिए पश्चाताप करने लगती है। लेकिन, बहू ऐसे अवसर पर भी उसे अपमानित करने से बाज नहीं आती। कहती है, 'बबुआ, मामा के देहुन धकिआई, केहुनि फुटि जैतेन कि ठेहुनि फुटि जैतेन हे।...दरद बेर न आएल हे।।'

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने जैसाकि अपनी 'आत्मकथा' में लिखा है, 'मेरी हालत यह थी कि मैं जब कभी गांव पर छुट्टियों में आता, बाहर ही सोता। रात के समय जब सबलोग सो जाते तो मां दाई को भेजतीं कि जगा लाओ और वह जगाकर मुझे ले जाती और उस कमरे में छोड़ देती, जिसमें मेरी पत्नी रहतीं। नींद के मारे मुझे उस वक्त रात को जागना कठिन हो जाता। अक्सर मैं, कितनी भी कोशिश होती, जागता ही नहीं। दूसरे दिन माँ या चाची डांटती कि रात को जागते नहीं और बुलाने पर भी नहीं आते। सवेरे जब सब लोग सोये ही रहते उठकर चला आना होता और बाहर की चारपाई पर सो जाता, जिसमें किसी को यह पता न चले कि रात को कहीं दूसरी जगह गया था! यहाँ तक कि साथ के नौकर को भी इसका पता कम ही लगता।' (पृष्ठ 47-48) इसी आशय का एक गीत देखें, 'चुनरी पहरि मैं ओलयों ओसरवाँ/पियवा के मन ललचाय, हो गोरिया!/चोर की नैयां पिया लुकि लुकि आवै/जेकरे मैं बियाही तेउ पख फोरबा, हो गोरिया!' अर्थात 'चुनरी पहनकर मैं ओसारे में सोई/पिया का मन ललचा उठा, ओ गोरी!/चोर के समान पिया छिप-छिपकर आते हैं,/वही मानो सेंध लगाते हैं, ओ गोरी!' (देवेंद्र सत्यार्थी, बेला फूले आधी रात, पृष्ठ 7-8)

ऐसी स्थिति भी सास के लिए बहू के विरुद्ध हथियार ही बनती है। बहू के गर्भवती हो जाने पर सास को शंका हुई कि मेरा लड़का तो घर के बाहर बँगले पर सोता है, फिर यह गर्भवती कैसे हो गयी? उसे उसके चरित्र पर शंका होने लगी। उसकी पुत्रवधू ने शंका-निवारण के लिए मेघ से प्रार्थना की। वर्षा होने लगी। उसका पति छिपकर उसके पास आया। उपयुक्त अवसर पर उस स्त्री ने सास को उसके पुत्र को दिखलाकर उसकी शंका का निवारण किया-'बेटा मोरा सुतै बंगलवा, पुतहुआ मनहर घर हे। ललना रे, कौने रे रसिकवा से लोभायल, त पुतहू गरभ सैं हे।। बरिसहु हे मेघ बरिसहु, बरिसहु सोने बूंद हे। ललना रे, ओते ओते ऐतन बलमुआ, कि सिर के कलंक मेटत हे।। मंचिया बैठल मोरी सासु छेकी हे, कि सासु छेकी हे। ललना रे, चिन्ही लिअ$ सासु अपन बेटवा, कलंक मोर मेटि दिअऊ हे।।'

देवकी की ऑंखें और शरीर का रंग देखकर उसकी सास शंका करने लगती है; क्योंकि उसका बेटा तो गोकुल में रहता है, वह गर्भवती कैसे हो गयी? सास को शंका है कि उसकी बहू को किसी से अवैध संबंध हो गया है। 'मोर पूत बसै दूर देस, नगर गोखुला में रे। ललना रे, कौन पुरुखबा से रिझली, रहली गरभ सैं रे।।' बहू पटेवा से जाल बनाने का अनुरोध करती है; क्योंकि रात में छिपकर आये हुए अपने पति को वह फंसाकर अपनी सास की शंका दूर करना चाहती है। 'घर पछुअरबा में बसै पटेबा भैया, तोहिं मोरा हितबन रे। ललना रे, पाट सूत जाल बुनि देहो, कि पिआ के बझायब रे। ललना रे, पिआ के बझाई हम राखब, सासु पतियायब।।'

लोकगीत की पत्नी

लोकगीत वैसा संग्रहालय है जहाँ हमारा समाज अपनी संपूर्णता में देखा जा सकता है। समाज की एक एक चीज यहाँ करीने से धरी मिलेंगी आपको जिन्हें आप अपने समय और सुविधा के हिसाब से उलट- पलट सकते हैं। इन गीतों में स्त्रियों ने सिर्फ सोहर ही नहीं गाया है, बल्कि अपने पतियों के स्वछंद यौनाचार और उसके प्रतिरोध के गीत भी रचा है। अंगिका भाषा में एक ऐसा ही गीत दर्ज है-'गर्भवती नारी, जिसे अभी अपने गर्भ का अंदाज नहीं है, अपने पति के पास जाती है। पति उस समय मालिन के साथ घर के अंदर है। वह दरवाजा खोलने को तैयार नहीं है। उसने अपनी सास से इसकी शिकायत की। सास ने बहू को समझाया कि जाने दो, अभी तुम अपने महल में आराम करो, तुम्हारी गोद भरनेवाली है। 'धीरहि धीरहि अयलै चौकठिया धरि ठाढ़ि, केवड़िया धरि ठाढ़ि हे। खोलू राजा खोलू केवड़िया, महलिया जा के सोइब, माथा मोर पिराबै हे।। मालिन संग हमें सूतब, जाहो रानी रंग महलिया, जाके सोइ रह$ हे।।' पितृसत्तात्मक समाज में चूँकि पुरुष के यौनाचार को समाज से लगभग मान्यता प्राप्त है, इसलिए सास उसे समझाकर लौटा देती है। 'मचिया बइठली तोहे सासु, से ठकुराइन सासु, राउर पूता मलिनिया संगे हे। पुतहू, तोहरा क होतै नन्दलाल, मलिनिया संगे सूते देहू, तुहूँ महलिया सोइ रह हे।।' जब सास भी पितृसत्ता के पक्ष में खड़ी नजर आती है तो उसका अंतिम सहारा भी उसके हाथ से निकल जाता है। डूबती पत्नी के लिए चौकठ तिनके का सहारा बनता है-'धीरहिं धीरहिं अयलै चौकठिया धरि ठाढ़, केवड़िया धरि ठाढ़ रे।' किंतु भारतीय पत्नी पितृसत्ता को अपने तरीके से चुनौती देती है। पति के बार बार के आग्रह के बाद भी वह किवाड़ नहीं खोलती- 'खोलू रानी खोलू सोने के केबड़िया, महलिया में सोबे देहू हे।' पत्नी के हथियार देखें, 'राजा, माथा मोर पिराबे, बलकवा मोर रोबइ हे। राजा, मूठि एक लेहू भुसबा, भुसघरवा जा के सोइ रहू हे।।' सीता के गृहनिकाला का पत्नी यहाँ अपने 'राम' से बदला लेती है। पति को पत्नी के इस 'बदले तेवर' का भान होता है-'रानी बहै के पुरबैया बहै पछिया, भूसा उड़ि मुख पड़ै हे।' इस लोकगीत की ताकत यही है कि 'सीता' के समक्ष 'राम' को अपनी पराजय स्वीकार किये बगैर घर वापसी की अनुमति नहीं मिलती-'रानी हे, खोलू आजु खोलू केबड़िया, महलिया में सोबे देहू हे। तोहि आज जीतल हम हारलें, महलिया में सोबे देहू हे।।'

एक अंगिका सोहर में राम द्वारा जंगल में निर्वासित सीता नाई को बुलवाकर लोचन पहुँचाने के लिए उसे अयोध्या भेजती हैं। कहती हैं, 'पुत्रोत्पत्ति की खबर दशरथ, कौशल्या और लक्ष्मण को देना, लेकिन किसी प्रकार राम इसे जानने न पायें।' 'पहिली लोचन राजा दसरथ, तब कय कोसिलेआ रानी हे। ललना, दोसरी लोचन देवरा लछुमन, राम नहीं जानै हे।।' हजाम अयोध्या पहुँचता है तो उसे सबसे पहले राम ही से भेंट होती है। राम हजाम को विदाई के समय सीता के नाम से एक पत्र लिखकर देते हैं। सीता उस पत्र को पाकर मुस्कराती तो हैं, लेकिन राम को भला-बुरा भी कहती हैं। एक परित्यक्ता का अपने निष्ठुर पति के प्रति ऐसा भाव उचित/ यथार्थ चित्रण है। 'चिठिया लिखिये राम देलन, औरो राम देलन हे। ललना रे, दय दिहें सीता के हाथ, त राम चली आबै हे।। चिठिया में बाँची बाँची सीता, त मन मुसुकाबै हे। ललना रे, कौने कुलबोरना, चिठी लिखल लिखी के पठाबल हे।।'

इन गीतों से रामायण की सीता की बरबस याद आती है। राम जब सीता को वन में साथ चलने की अनुमति नहीं देते तो क्षत्राणी का छिपा तेज लहक उठता है। वे कहती हैं, 'हे राम, यदि मेरे पिता मिथिलापति विदेह यह जानते कि तुम पुरुष के रूप में स्त्री हो, तो वे तुम्हें अपना जामाता कदापि न बनाते।' (किं त्वामन्यत वैदेह: पिता मे मिथिलाधिपः। राम जामातरं प्राप्य स्त्रियं पुरुषविग्रहम्।। 2/30/3; शिवबालक राय, वाल्मीकि रामायण : काव्यानुशीलन, मोतीलाल बनारसीदास, 1988, पृष्ठ 327)  'आह, जनक ने पुरुष वेश में एक स्त्री को (धोखे में) अपना जमाई बना लिया। खेद है, अज्ञानवश लोग झूठा ही कहने लगे कि राम सूर्य के समान तेजस्वी हैं; किंतु, (सच तो यह है) इनमें तेज है ही नहीं--'अनृतं वत लोको$यमज्ञानाद् यदि वक्ष्यति। तेजो नास्ति परं रामे तपतीव दिवाकरे।।' (2/30/34; शिवबालक राय, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 327)

लोकगीत की पत्नियां पति के फैसलों को चुपचाप नियति मानकर स्वीकार करनेवाली नहीं हैं, न पति हमेशा परमेश्वर। फैसला अगर अनुचित हुआ तो पत्नियां मंसूबे पर पानी फेर देने में सक्षम हैं। एक गीत में पति दूसरा विवाह करने निकलता है। उसकी पत्नी ने उसे रोका और पूछा-'आप तो विवाह करने जा रहे हैं, परंतु मुझे किसे सौंप रहे हैं?' पति ने उत्तर दिया-'मैं तुम्हें अपनी मां और बहन को सौंप जाऊंगा तथा तुम्हारे लिए बहुत-सा धन दे जाऊंगा।' पति चला गया। पत्नी ने मनौती मानी कि विवाह करने के लिए जाते समय जोरों से आँधी-पानी आ जाए। पानी में भींगता हुआ पति लौट आया और पत्नी से किवाड़ खोलने का अनुरोध करने लगा। 'देबौ रे कागा तोंहे खसिया ओ पठिया, जौं परभु जैता बिआह करे हे। आन्ही पानी सूप, नेवोति रखिहें हे।। आन्ही अछकाल कैने, पानी छछकाल कैने हे। हे खोलु धानि सोबरन केबरिया, सोहामन मौरिया भींगी जैतो हे।।' (अंगिका संस्कार गीत, पृष्ठ 223)

लोकगीत में भाभी-ननद प्रसंग

हिंदी का ननद शब्द संस्कृत का ननान्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है आनंद न देनेवाली। लोकगीतों में भी ननद ज्यादातर भाभी के समक्ष इसी रूप में प्रकट होती रही है। सास-बहू की लड़ाई में तो यह अपनी मां का साथ देती ही है, इसकी नजर भाभी के वस्त्राभूषणों पर भी होती है। अकारण नहीं है कि ननद लोकगीतों में अक्सर भाभी पर उपहार देने का दवाब बनाती चित्रित है। अंगिका के एक मुण्डन-संबंधी गीत में वर्णन है कि मुण्डन के अवसर पर बहू ननद को इसलिए निमंत्रित नहीं करना चाहती कि उसे बधैया देना पड़ेगा। 'ललना रे, एक नहीं नेतब ननद दाइ, जिनि रे बधैया मांगे रे।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 95)

एक गीत में वर्णन है कि पुत्रोत्पत्ति की ख़ुशी में भाई के दरवाजे पर बधावे बज रहे हैं। बाजा बजानेवाले को धीरे-धीरे बजाने का आदेश दिया जाता है, क्योंकि बाजे की आवाज सुनकर बहन के आ जाने का भय है। 'घर पिछुअरबा चमरबा भैया, चमरबा भैया हितबा हो लाल। नीचा कय ठोकिहे ढोलकबा, बहिनी जनु सुनै हो लाल।।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 42) बहन नैहर आ धमकती है और भाभी से बधावे से उसका नगर ही मांगती है। 'भौजो, नहिं हमें पैर धोबै, नहिं हमें जेमबै हो लाल। भौजो, बाबा के नगर अजोधा, बधैया हमें लेबो हो लाल।।' (वही, पृष्ठ 43) भाभी उसका अपमान करती हुई कहती है, 'यह नगर न तुम्हारे बाप का अर्जित किया हुआ है और न तुम्हारी माँ के छिपाकर रखे हुए रुपये का है। तुम भागो यहाँ से। मैं बधैया नहीं देती।' 'नहिं तोरा बाप के अरजल, माई के कोसल हो लाल। नहिं मिलतो नगर अजोधा, रोबैते घरबा जाहो हो लाल।।' (वही, पृष्ठ 43)

एक अन्य गीत में भी बच्चे की माँ नाचने-गानेवाले को चुप रहने को कहती है; क्योंकि उसे भय है कि इन लोगों की आवाज को सुनकर ननद बधावा लेने आ जायेगी। 'चुप रहू नाच नचनियां, ढोलक बजनियां रे। ललना, सुनि पैती ननद गोसावनि, बधैया माँगे आयती रे।।' (वही, पृष्ठ 43) फिर भी ननद पहुँच जाती है। भाभी उससे भोजन करने का आग्रह करती है, किंतु ननद कहती है कि मैं तो अपने भतीजे का बधावा लेने आई हूँ। भाभी कहती है कि मां-बाप के बिना नैहर में बेटी की इज्जत नहीं होती। ननद भी इतनी जल्दी अपना अधिकार नहीं छोड़नेवाली। कहती है, मैं तो अपनी मां की पिटारी, जिसमें चीजें संजोकर रखी है, खोलने आई थी। 'मति जनिह$ ए भौजो, मति जनिह$, तोरे भनि आयल रे। भौजो, अम्माँ के साँठल पेटरिया, बह खोले आयली रे।।' (पृष्ठ 44) बधावा न मिलने पर ननद रोते हुए, भगिना ठुनकते हुए और ननदोसी बिहँसते हुए जाता है। पति खुश है कि नैहर का उसका घमंड तो टुटा। 'कनैत जाय ननदिया, ठुनकैत भगिनमा रे। हँसैत जाय ननदोसिया, भले रे मग तोरल रे।।' (पृष्ठ 44) पति सांत्वना देता है कि अधीर मत हो। मैं नौकरी करूँगा और तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति कर दूंगा। तुम अपने नैहर को भूल जाओ। 'तोरा लय आनबौ चुनरिया, बबुआ गले हँसुलिया रे। अपना लय चढ़न के घोड़बा, नैहरबा तोहिं बिसरहो रे।।' (पृष्ठ 44) उसकी पत्नी इन चीजों को लात मारने के लिए तैयार है, परंतु अपमानित होकर भी वह अपने नैहर से सम्बन्ध तोड़ना नहीं चाहती क्योंकि वहां उसकी जड़ होती है। अपनी जड़ों से कटना हवा में होना है। 'अगिया लगैबो चुनरिया, बालक गले हँसुलिया रे। ललना रे, नदिये भंसैबो चढ़न के घोड़बा, नैहर केना बिसरब रे।।' (पृष्ठ 45)

एक गीत में सीता का अपनी भाभी के व्यवहार से दुखी होने का वर्णन प्राप्त होता है। इस गीत में सीता के विवाह के बाद की स्थिति का वर्णन है। सीता नैहर से विदा हो रही है। सभी परिजन दुखी हैं। 'अम्माँ के काननें गँगा बहि गेलै, बाबा के भींजल पटोर हे। भैया के काननें जमुना बाढ़ि आयल भौजो के हिरदा कठोर हे।।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 205) अतः सीता भाई को तो आशीर्वाद देती है किंतु भाभी को शाप। 'दूधें नहैह भैया पूत भरैहअ, नित उठि करिह काज हे। सात सौतिनियाँ भैया भौजी सेज धरिहअ, घूरि न आयब भौजी राज हे।।' (वही, पृष्ठ 205) इसी आशय का एक पंजाबी गीत है जो यहाँ द्रष्टव्य है। गीत का अंश है: 'आले ते जाले बाबल गुड्डियाँ, मेरे नई खेड्डन ते चाह होये। माँ रोंदी दी अँगिया भिज्ज गयी, प्यू रोये दरया बहे। मेरा बीर रोये, सारा जग रोये, मेरी भाभियाँ मन चाव होये।' (वही, पृष्ठ 205, पादटिप्पणी में उद्धृत) गीत का भावार्थ है: 'हे पिता, मैं तो अभी नन्हीं हूँ। घर के कोनों में, दीवारों के आलों में, सभी जगह मेरी गुड़ियाँ रखी हैं। अभी मेरा गुड़िया खेलने का चाव कहाँ पूरा हुआ? मुझे अभी क्यों घर से निकाल दे रहे हो? मैं घर छोड़कर जा रही हूँ। रोते-रोते मां की अँगिया भींग गई, पिता के रोने से नदियां बह गईं, भाई को रोता देखकर संसार रो रहा है, परंतु भाभियों के मन प्रसन्न हैं!'

लोक गीतों में भाभी-ननद प्रसंग हमेशा कटुतापूर्ण ही नहीं प्राप्त होते बल्कि परस्पर प्रेम और विश्वास से भरे भी हैं। ब्रज में प्रचलित 'विजयरानी का गीत' इसका बेहतर उदहारण है। विजयरानी असाधारण सुंदरी थी-'डाबरनैनी' (बड़ी और सुन्दर आँखोंवाली स्त्री को डाबरनैनी कहा गया है)। उसके पति ने बिरादरी के किसी अन्य पुरुष से हँसते देखकर उसके चरित्र पर संदेह किया। इसी मनोमालिन्य के कारण वह विजयरानी को हाथ में दिया थामे आते देखकर 'बजर केबार' बंद कर लेता है। भला हो विजयरानी की ननद का जिसने अपने भैया को समझाया कि विजयरानी निर्दोष है क्योंकि हँसकर बोलना डाबरनैनी के स्वभाव में सम्मिलित है। झट 'बजर केबार' खोले जाते हैं और विजयरानी अपने पति से मिल सकती है और ननद को पहनने के लिए दक्षिण का चीर और खाने के लिए गिरी छुआरे पुरस्कार-स्वरूप देने की बात सोच रही है। (देवेंद्र सत्यार्थी, बेला फूले आधी रात, पृष्ठ 29) भाभी-ननद के बीच प्रेम का एक और गीत है। वर्णन है कि भाई के घर में पुत्र होने पर  बहन बधैया माँगने पहुँचती है। उसे मुँहमाँगी चीजें बधावे में मिलती हैं। बधावे की चीजों को लेकर वह अपनी भाभी और बच्चे को आशीर्वाद देती हुई जाती है। 'जैसें जैसें फूलत, माली फुलबरिया हे। वैसें फूलत मोर भौजो, कि आहो लाल।।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 89)

सोहर और पुत्री का जन्म

संतान के जन्म के उपरांत जो मंगल गीत गाये जाते हैं, 'सोहर' कहलाते हैं। इन सोहरों में बलवती पुत्रकामना, पुत्रप्राप्ति से परिवार में व्याप्त हो जानेवाली प्रसन्नता की लहर, पुत्रवती के सम्मान की वृद्धि आदि की बड़ी ही मार्मिक व्यंजना मिलती है। पुत्र की अपेक्षा पुत्री के जन्म को कम महत्त्व देने की प्रवृत्ति भी इन गीतों में सहज भाव से प्रकट है। इसका कारण वह सामाजिक व्यवस्था है जिसमें स्त्री-पुरुष के समानाधिकार को स्वीकार नहीं किया गया है। इन गीतों में पुत्रहीना के प्रति पति एवं परिवार के अन्य सदस्यों की उपेक्षा, प्रसव-पीड़ा के समय सास की उपेक्षा और निर्दय पति का जुए एवं अन्य व्यसनों में व्यस्त रहने का वर्णन पुत्री के कमतर महत्त्व को ही रेखांकित करते हैं। एक गीत में तो साफ-साफ स्वीकार किया गया है कि सौरगृह बिना पुत्र के नहीं सुहाता-'सोइर न होरिला बिनु रे'।(अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 73)

एक निमाड़ी लोकगीत में पति अपनी गर्भवती पत्नी को छोड़कर चला गया था। गांव के समीप पहुँचते हुए उसे ढोल की आवाज सुनाई देती है और वह झट समझ जाता है कि उसकी पत्नी ने पुत्र को जन्म दिया है। पत्नी कहती है, 'हम तो हारया पियाजी तुम जीतिया/बोल्या ते बचन समालो/पियाजी हमन लाल हो जायो।' (हम हार गये, पियाजी, तुम जीत गये/अब अपना दिया हुआ वचन सँभालो/पियाजी, मैंने लाल को जन्म दिया।) कदाचित पति ने घर से जाते समय पत्नी को वचन दिया था कि यदि गोरी ने लाल को जन्म दिया तो उसे बड़े-बड़े उपहार मिलेंगे। (देवेंद्र सत्यार्थी, बाजत आवे ढोल, पृष्ठ 12)

बहन पुत्रोत्सव सुनकर नैहर आती है। भाई उसे मुँहमाँगी चीजें देकर खुश करता है। बहन अपने भाई और भाभी के लिए शुभकामना प्रकट करती है और कहती है कि भाभी, तुम दूधों नहाओ, पूतों फलो-'दूधे लहैंहें हे भौजो पुतर बियैहें हे'। (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 82)

पितृसत्तात्मक समाज में जहाँ पुत्र का जन्म उत्सव का कारण बनता है, वहीँ पुत्री के जन्म से घर में विषाद के बादल छा जाते हैं। 'जहे दिन अगे बेटी तोहर$ जनम भेल, धरती उठल हहकार हे।' परिवार के दूसरे सदस्य के बारे में क्या कहा जाय, स्वयं माता-पिता का ह्रदय अपनी संतान के प्रति बदल जाता है। 'सास ननद बेटी मुखहुँ न बोलै, हरिजी के जियरा उदास हे।' ...जौ हमें जानतें धिया जनम लेती, खैते में मरीच पचास हे। मरिच के झांसे झूँसे धिया मरी जैती, छूटी जैत जीब के जंजाल हे।।' (अंगिका संस्कार गीत, पृष्ठ 152) बेटी के जन्म पर परिवार का दुखी होना एक सार्वभौम घटना प्रतीत होता है। पंजाब की पुत्री के जन्म का चित्रण आप यहाँ देख सकते हैं। जिस दिन कन्या ने जन्म लिया सारा परिवार दुखी हो गया, 'जिस दिन बाली बेटी ने जन्म लिया/सोच पई सब परिवारजी/तुसीं क्यों रे बाबल सीस नमाया।' 

बहन किसी योगी के साथ प्रेम कर बैठती है। भाई उसे ऐसा करने से रोकता है। बहन-भाई  का यहाँ जो संवाद है, उससे समाज में लड़की की वास्तविक स्थिति का पता चलता है। बहन कहती है, 'भैया, जो होना था, हो गया। मेरे लिए योगी ही अब सब कुछ है। आपके भाग्य में तो पिता की सारी संपत्ति लिखी हुई है। मेरे भाग्य में भिखारी का भाग्य ही वदा है। हम दोनों के जन्म के साथ ही दो तरह के व्यवहार किये गये। आपके जन्म के समय नार काटने के लिए सोने की छुरी का उपयोग किया गया, लेकिन मेरे जन्म के समय खुरपी काम में लाई गई। 'जहि दिन आहो भैया तोहर जनम छल, भै गेल चाँननी रात हे। हँसुआ खोजैते भैया सोना छूरी भेंटल, ओहि से छिलाय तोहर नार हे। जाहि दिन आहो भैया हमरो जनम छल, भै गेल अन्हारी रात हे। हँसुआ खोजैते भैया पसनी भेंटल, ओहि से अम्मा छिलल नार हे। तोहरा के लिखल भैया बाबा के सम्पतिया, हमरा के जोगिया भिखारी हे।।' (वही, पृष्ठ 134)

दान-दहेज की प्रथा और दुलहा खोजने की परेशानी से ऊबकर पिता का यह कहना कितना मार्मिक है कि विधाता बेटी का जन्म कभी नहीं देना। 'धिया के जलम जनु देहु बिधाता, सेहो देइय बड़ जे संताफ हे।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 149) विवाह के बाद राम सीता को लेकर घर चलते हैं। लड़की पराई हो जाने पर सीता की माँ रोने लगी कि अगर मैं जानती कि बेटी पैदा होगी, तो मैं पहले ही मिर्च खा लेती, जिसकी झांस से यह मर जाती। 'जौ हमें जनितौं माई हे सीता जनमती, खइतौं में मरीच पचास।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 199) रास्ते में राम ने सीता से परिचय पूछा। सीता ने परिचय में कहा-'मैं राजा जनक की बेटी और राजा दशरथ की पतोहू हूँ। कौशल्या मेरी सास हैं तथा श्रीराम मेरे पति हैं।' 'राजा जनक जी के बारी कुमारी, राजा दसरथ के पुतोह हे। आहे रानी कोसिलेआ के अलख दुलरुआ, सामी के नाम सिरी राम हे।।' (वही, पृष्ठ 206)  राम परिचय पाकर 'हँसने' लगे, परंतु सीता मन ही मन दुखी होने लगी कि अब मेरे मायके का खेल, सखी-सहेलियों का साथ तथा मेरी माता की गोद सब कुछ छूट गया। 'कोठियहिं छूटल सुपती मौनियाँ, मड़बहिं सखि सब लोग हे। आहे मंदिरहिं छूटल सुनैना रानी, जिनि कोखि भेल अवतार हे।।' (वही, पृष्ठ 206) 'राम' की खुशी का कारण कहीं यही तो नहीं कि 'सीता' अपनी जड़, अपने अतीत से कट चुकी है! मगही लोक-गाथा में गोपीचंद की माँ उससे कहती है, 'तीन मुल्क भिक्षा मांगना, पर बहन के देश मत जाना। तुम्हारी बहन छह मास रोएगी और प्राण त्याग देगी, क्योंकि तुम्हारे योगी बन जाने से जो उसे नैहर की आशा थी वह भी टूट गयी।' (डॉक्टर एनामुल हक, मगही लोक-गाथाओं का साहित्यिक अनुशीलन, विशाल पब्लिकेशन, प्रथम संस्करण : 2007, पृष्ठ 132) अंततः बहन के दुख से धरती फट गयी और गोपीचंद की बहन वीरम उसी फटी धरती में प्रविष्ट कर गयी। सदा के लिए भाई-बहन-नैहर का नाता टूट गया। (वही, पृष्ठ 133) लेकिन एक स्त्री के मन से नैहर की याद कहाँ जा पाती है। एक संताली विदाई गीत में बेटी अपनी माँ से कहती है-"हे माँ! तुम्हारी टूटी झाड़ू अंगना में है, तुम्हारा गोबर फेंकने की टोकरी गोहाल में है, तुम्हारा पीतल के घड़ा 'गंड़सादी' के ऊपर है, हे मेरी कल्पतरु! मैं तुमको छोड़कर जा रही हूँ।" (झारखण्ड एनसाइक्लोपीडिया, खण्ड 4, पृष्ठ 446) ये तमाम चीजें अब उसकी स्मृति में हैं। उससे कैसे पीछा छूटे?