Friday, October 2, 2026

बिहार में बापू

चंपारण में गांधी की सौवीं बरसी

1917 का चंपारण सत्याग्रह 2017 में अपनी 100वीं बरसी मनाने जा रहा है। सरकारी और गैर सरकारी संगठनों द्वारा उत्सव के आयोजन होंगे। एक बार फिर ’गांधी’ और उनके ’चेले’ ’महात्मा’ और ’देशभक्त’ घोषित होंगे और राजकुमार शुक्ल इतिहास से बाहर किये जायेंगे। क्या इस सौंवीं बरसी पर चंपारण आंदोलन के इतिहास का पुनर्मूल्यांकन नहीं करेंगे आप? क्या इस बात के सूत्र तलाशे जायेंगे कि गांधी के चंपारण आगमन के साथ ही स्थानीय नेतृत्व गायब क्यों हो गया? गांधी को लाया राजकुमार शुक्ल ने लेकिन उनके कर्ताधर्ता और सिपाही/सलाहकार बने डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, राजकिशोर बाबू और रामनवमी बाबू सरीखे लोग जो बगैर फीस के किसानों की बात नहीं रखते थे। क्या यह भी कहा जा सकता है कि चंपारण के किसान आंदोलन को गांधी के व्यक्तिगत सत्याग्रह में बदल दिया गया? क्या इस सत्याग्रह के बाद किसानों की समस्याएं खत्म हो गयी थीं? क्या कारण थे कि गांधी ने इस आंदोलन से कांग्रेस और पत्रकारों को दूर रखा? क्या कारण है कि किसानों की चिंता कर के आये गांधी ’रचनात्मक कार्य’ में लग गए? क्या वह सचमुच ’रचनात्मक’ थे या गांधी की ’शरणस्थली’? चंपारण सत्याग्रह की 100वीं बरसी पर ये सवाल मुझे बार-बार घेरते हैं।

चंपारण के गांधी

चंपारण आने से पहले गांधी इस जगह से परिचित न थे, किन्तु गांधी से यहाँ के लोग परिचित थे। गांधी से पहले तिलक, मालवीय जैसे कई प्रखर नेताओं को यहां लाने की कोशिश हुई थी, किन्तु यहाँ के गरीब किसानों के लिए किसी के पास समय नहीं था। किसान, कांग्रेस के एजेंडे में नहीं थे इसलिए गांधी यहां के लोगों के लिए अंतिम सहारा थे। चंपारण के किसान नेताओं की यह स्थिति भी नहीं थी कि कांग्रेस के मंच पर वे अपनी समस्या को रख सकें इसलिए उस समय के नामी-गिरामी वकील ब्रजकिशोर बाबू को किसानों ने अपनी बात कांग्रेस और गांधीजी तक पहुंचाने के लिए ’हायर’ किया। मरता क्या न करता! उम्मीद की जाती है कि इस कार्य हेतु ब्रजकिशोर बाबू ने किसान प्रतिनिधियों से मोटी रकम ली होगी। इस उम्मीद भरी अटकल की वजह गांधी की आत्मकथा है। गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि चंपारण में बिहारी वकीलों द्वारा किसानों से ली जानेवाली फीस की रकम सुनकर वे सन्न रह गये थे। कहने की जरूरत नहीं कि ये वे किसान थे जिनके घरों की औरतों की देह पर पूरे कपड़े भी नहीं होते थे। गांधीजी ने इस तरह के एक अनुभव का जिक्र किया है। आसपास के लोगों से मिलने के सिलसिले में वे एक घर के अंदर गये। मर्द लोग तो सामने आये। बातें करने। किन्तु घर की औरतें पर्दे की ओट से ही बातें सुनती रहीं। गांधी को मालूम था कि औरतों की भागीदारी के बगैर किसी आंदोलन की बात बेमानी है। इसलिए घर के मुखिया से उन्होंने घर की औरतों को भी बातचीत में शामिल करने का आग्रह किया। दो ही औरत सामने आ सकी। गांधी के पूछने पर कि ’क्या इस घर में दो ही महिला है’, उन्हें बताया गया कि साड़ी दो ही है। इसलिए एकबार में दो ही औरत सामने आ सकती है। बाकी स्त्रियां गमछी लपेटकर घर के अंदर गुजारा करती हैं। गांधी को चरखा की प्रेरणा इन्हीं घटनाओं से मिली होगी। आज 21वीं शती के व्यक्ति को जो कपड़ों में डूबा हुआ है, उसे चरखा का मर्म समझ में आने से रहा। उन्हें तो यह भी नहीं पता कि एक समय था जब आम भारतीय के लिए वस्त्र विलास की वस्तु समझा जाता था। इसे ’वस्त्राभूषण’ यूं ही नहीं कहा गया!

गांधीजी ने चंपारण को अपना ठिकाना बनाया। बिहार के कई प्रबुद्ध लोग (अधिकतर वकील) मदद के लिए आकर साथ रहने लगे। सबके नौकर-चाकर भी साथ थे। सबके अपने-अपने चूल्हे-चौके थे। ’तीन कनौजिया तेरह चूल्हा’ चरितार्थ करते ’स्वदेशी देशभक्त’ थे। एक अकेले गांधी थे जिसका कोई अमला-फैला नहीं था। बाकी सब नौकरों की चतुरंगिणी सेना के साथ थे। पैर दबाने के लिए अलग नौकर तो खाना बनाने के लिए अलग। गांधी पेशोपेश में थे कि किन साहबों से पहले निबटा जाये? इन काले साहबों से या गोरे निलहों से? शांतिनिकेतन का अनुभव काम आया। सारे नौकरों को छुट्टी दे दी। अब सबका खाना एक चौके में बनता। सब मिलकर बनाते। गांधी ने सबकी साहबी खत्म कर दी। गांधी ने सबको गांधी बनना सिखाया। लेकिन यह बीमारी इतनी जल्दी जानेवाली नहीं थी। गांधी जैसे ही अनुपस्थित होते कि नौकरों की फौज बुला ली जाती। फिर जैसे ही गांधी के आने का होता नौकरों को हटा दिया जाता। गांधी ने धीरे-धीरे सबको बिना नौकर का मालिक बनने को मजबूर किया। सबका मालिक एक है-और वह अकेला आदमी गांधी था!

बिहार में गांधी-1

बिहार राज्य अभिलेखागार, पटना में 1947 के दिनों की गांधी की एक दुर्लभ ऐतिहासिक तस्वीर सुरक्षित है। इस तस्वीर में एक कोने में दुबके गांधीजी हैं। मुँह को मास्क से ढंक रखा है। किसी कोरोना के भय से नहीं, बल्कि अस्पताल के ऑपरेशन थियेटर में होने की वजह से। मनु को दिल्ली, नोआखाली के दिनों से ही पेट मे लगातार दर्द हो रहा था किंतु समयाभाव की वजह से गांधी अपेंडिसाइटिस के इस ऑपरेशन को टालते आ रहे थे। बिहार आने के बाद उनके पास 10 दिनों का समय था इसलिए डॉक्टरों की सलाह को उन्होंने मंजूरी दे दी। मनु का ऑपरेशन हुआ और वह स्वस्थ हुई।

उन दिनों की घटनाओं का हाल मनु ने डायरी में नोट किया है। यह डायरी ‘बिहार के कौमी आग में’ शीर्षक से पुस्तकाकार छप चुकी है। मनु को बहुत सवेरे जगना और देर रात को सोना पड़ता था। गांधीजी के आराम करने का समय तय होता लेकिन मनु के सोने का कोई निर्धारित समय नहीं था। कभी-कभी तो काम करते और फंड के रुपये गिनते, हिसाब लिखते रात के एक तक बज जाते। कभी-कभी उसे भारी ऊब और तनाव महसूस होता। 5/3/47 की डायरी का समापन मनु ने इस तरह किया है, ‘बापू जी 11 बजे बिस्तर पर लेटे। उनके पैर दबाकर, सिर में तेल मलकर और मच्छरदानी बन्द करके मैं यहां आयी (घर से सोने की जगह थोड़ी दूर है)। बापूजी के कागजात ठीक से जमा कर रखे, सवेरे के लिए बैठक जमायी। डायरी लिखी। अब साढ़े बारह हो गये हैं। आंखों में नींद खूब भर गई है।’ (बिहार के कौमी आग में, पृष्ठ 8) मनु की मदद के लिए जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती देवी आ जाया करती थीं। मनु ने डायरी में नोट किया, ‘प्रभावती बहन ने उनके (गांधी के) पैरों में घी मला। प्रभा बहन के होने से मैं बड़ी निश्चिंत हूँ। वे स्वभाव की भी बहुत मीठी हैं। मुझे कहने लगीं, ‘‘तुम्हें कोई कुछ भी कहे, परन्तु तुम बापूजी को कभी न छोड़ना।’’ आगा खाँ महल से जुदा होने के बाद वे पहली ही बार यहाँ आयीं, अतः नयी-पुरानी बहुत बातें हुईं।’ (बिहार के कौमी आग में, पृष्ठ 3)

गांधीजी के बिहार आने की कोई योजना नहीं थी। बिहार को वे ‘अपना बिहार’ मानते थे क्योंकि चंपारण ने उन्हें गांधी बनाया था। उन्हें लगता था कि नोआखाली में बैठे-बैठे वे बिहार को संभाल लेंगे। लेकिन मामला गंभीर था। बिहारी हिन्दू ने नोआखाली का हिसाब बिहार के मुसलमानों के साथ कर लेने की ठानी थी। हिन्दू ही क्यों, गांधी को सूचना थी कि ‘इस कुकृत्य में बिहार के कांग्रेसी नेताओं का भी हाथ था।’ इस सूचना ने गांधी को अंदर तक मथ डाला। वे नोआखाली से सीधे पटना पहुंचे। स्थिति बहुत बिगड़ी हुई थी। गांधी ने अपील की ‘मेरे पास ऐसी बातें भी आई हैं कि अभी भी मुसलमान स्त्रियों को हिंदुओं के घरों में कैद करके रखा गया है। यह बात सच है तो मैं विनयपूर्वक कहता हूं कि ऐसा न कीजिए, उन सब बहनों को मेरे पास या राजेन्द्र बाबू के पास पहुंचा दीजिए।’ (वही, पृष्ठ 10)

बिहार में गांधी-2

1947 के दंगे में बापू नोआखाली से सीधे बिहार आये थे। पटना आने के तीसरे ही दिन सुबह की सैर के दौरान बापू की भेंट एक भिखारी से हुई। वह अंधा था इसलिए बापू को देख तो नहीं सकता था किन्तु उनके चरण का स्पर्श पाकर वह धन्य और पवित्र हो जाना चाहता था। कहने को वह हिन्दू था किन्तु आसपास के गांवों से भीख मांगकर जमा की गई चार आने की रकम उसने मुस्लिम-सहायता-कोष को सुपुर्द कर दी। हर्ष और उल्लास से गांधीजी की आंखों में चमक आ गई। उन्होंने भिखारी की पीठ थपथपायी और कहा कि आज से भीख माँगना छोड़ दो; अंधा आदमी भी बहुत काम कर सकता है। सूत तो कात ही सकता है। गांधीजी ने मनु को कहकर उसे तकली दिलवाई और स्वयंसेवकों से कहा कि सदाकत आश्रम में ऐसे लोगों का सदुपयोग हो।’ अपनी पीठ पर बापू का हाथ फिरा पाकर भिखारी काफी आनंद में था। एक ‘रॉयल बेगर’ ने एक सचमुच के भिखारी का उद्धार किया।

अपने ठिकाने पर लौटकर बापू ने मनु को समझाया, ‘तुमने देख लिया न, भिखारी जैसे ने भी पैसा अपने पेट में न डालकर खास नाम लेकर मुस्लिम-सहायता-कोष के लिए दिया। उसके चार आने की कीमत मेरी दृष्टि में तो चार करोड़ से भी अधिक है। इसका नाम है सच्चा दान! यह है बिहार की जनता! बिहार में कदम रखे आज तीसरा ही दिन है। इतने में ही यह जो छोटी-सी घटना हो गयी उसका मेरे मन पर बहुत अद्भुत असर हुआ है। ईश्वर ने यहाँ तक मेरी आवाज पहुंचायी है, यह उसकी महान कृपा है। हम जितने सच्चे होते हैं, निर्मल होते हैं, उतना उन गुणों का प्रतिबिंब ईश्वर हमें दिखाता ही है।’

बिहार में गांधी-3

बापू 5 मार्च, 1947 को कलकत्ता-पटना ट्रेन में सवार हुए। पटना जंक्शन पर भीड़ होने की आशंका से उन्होंने फतुहा स्टेशन पर उतर जाना ही मुनासिब समझा। इस बात की जानकारी कुछ ही लोगों को थी। इसलिए फतुहा स्टेशन पर बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह, विकास मंत्री डॉ. सैयद महमूद, अर्थमंत्री अनुग्रह नारायण सिंह तथा अब्दुल बारी कुछ चुनिंदा कार्यकर्ताओं एवं स्वयंसेवकों के साथ स्वागत एवं अगवानी के लिए वहां पहुंचे। किन्तु पत्रकारों को इस बात की खबर लग चुकी थी इसलिए वे लोग भी अपने लटकते कैमरों के साथ वहां प्रकट हो चुके थे। गाड़ी से उतरते ही बापू ने डॉ. सैयद महमूद से मजाक किया, ‘क्यों, आप तो अभी जिन्दे हैं न?’ श्रीकृष्ण सिंह की गाड़ी से बापू सैयद महमूद के आवास पर पहुंचे और उसे ही अपना ठिकाना बनाया। गांधी तक दंगे की जो खबर पहुंची थी उसके अनुसार बिहार के हिंदुओं ने बंगाल का बदला लिया था। कांग्रेसियों की भूमिका भी असंदिग्ध नहीं रही थी। इसलिए गांधी के इन दोनों से खिन्न होने के कारण थे। गांधी ने कहा कि ‘बिहार ने हिंदुस्तान का नाम डुबो दिया। नोआखाली के जंगली कृत्यों का अनुकरण करना न सीखना और बदले का विचार किये बिना मृत्यु का आलिंगन करके मानवोचित ढंग से जंगलीपन का सामना करना ही नोआखाली का बदला लेने का उचित मार्ग है।’ इस भाषण के बाद बापू को एक ‘तार’ प्राप्त हुआ जिसमें लिखा था, ‘बिहार के हिंदुओं को आप जरा भी उलाहना न दीजिए। उन्होंने जो कुछ किया है, वह कर्तव्यपालन की दृष्टि से ही किया है।’

'कबीर' में गांधी

स्वतंत्रता आंदोलन के समय बिहार में हर आदमी एक सर्जक था। होली हो या सोहर-सब में कबीर ही के बोल थे। बात जब ‘कबीर’ की हो तो क्या कहने। उस समय का एक प्रचलित ‘कबीर’:

‘अर रर, अर रर सुन लेहु मोर कबीर

दौरे में परजा के दुख की तनिक न पूछें बात

पकरि बेगारी गरिबन मारे जूता, घूंसा, लात

भला रे भला...

ये हाकिम नमक हराम बड़े।

चपरासिन से भले आदमिन के उखड़ावें मूंछ

अइसे अफसर ना सुधरेंगे जइसे कुकुर पूंछ

भला रे भला ...

इनके नस नस में जुलुम भरा।

धनवानन की डाली खा के सोवे पैर पसार

नील गाय, कुकुर, हिरनन का बिन बिन करे सिकार

भला रे भला...

इ बा लीला अफसरनन की।’ (नंदकिशोर शुक्ल, महात्मा गांधी की आंधी, 1920; मृत्युंजय सूरज नारायण सिंह, जायसवाल शोध संस्थान, पृष्ठ 38)

Thursday, October 1, 2026

भारतीय साहित्य-संस्कृति की महत्त्वपूर्ण संख्याएँ

तीन टिकट, महा विकट

भारतीय संस्कृति में तीन की संख्या को अमंगलसूचक माना गया है। एक लोकप्रचलित कहावत भी है-'तीन टिकट, महा विकट'। इस तीन की विकटता आज नई नहीं है। प्राचीन ज़माने में तो तीसरी शादी तक को अमंगलसूचक ठहराया गया है। इसीलिए तीसरा विवाह करनेवाले पुरुष के लिए पहले मदार से विवाह करने का विधान किया गया है, ताकि तीसरी पत्नी चौथी हो जाए। 'चतुर्थादि-विवाहार्थं तृतीये$र्कम् समद्वहेत् (आप्टे, संस्कृत हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 110) राजा दशरथ की तीन रानियां थीं। तीसरी से पहले दशरथ की मदार से शादी हुई थी अथवा नहीं, नहीं मालूम लेकिन उनके जीवन में बड़ा ही अमंगल रहा। आज के 'दशरथ' सबक लें तो भला हो।

किन्तु तीन की संख्या को अमंगलसूचक मानने की परंपरा की शुरुआत अवैदिक लगती है क्योंकि वेद तीन हैं और 'वेदत्रयी' कहलाते हैं। वैदिक साहित्य में अग्नि के तीन जन्म, तीन सिर, तीन शरीर एवं स्थान हैं। अतः यह भारतीय त्रयी का प्राचीनतम रूप है। (देवराज चानना (संपादक), ऋग्भाष्यसंग्रह:, मुंशी मनोहरलाल, पृष्ठ 291) अग्नि एक दिन में तीन बार खाता है। (वही, पृष्ठ 292)

वैदिक देवता अश्विनीकुमार का तीन की संख्या से खास सम्बन्ध है। ऋग्वेद के प्रथम मंडल, सूक्त 34, मन्त्र 1-9 में अश्विनीकुमार को तीन के साथ संबद्ध दिखाया गया है। उनसे तीन बार (प्रातः, मध्यान्ह, सायं) आने की प्रार्थना की गई है। अश्विनीकुमार के रथ में तीन पहिये लगे हैं। रथ में अवलम्बन के लिये तीन खम्भे लगे हैं। वे उस रथ से तीन बार रात्रि में और तीन बार दिन में गमन करते हैं। उनसे यह भी प्रार्थना है कि वे यज्ञ में दिन में तीन बार मधुर रसों से सिंचन करें तथा प्रातः, मध्यान्ह एवं सायं तीन प्रकार के पुष्टिवर्धक अन्न प्रदान करें, अनुयायी जनों को तीन बार सुरक्षित करें, उन्हें तीन बार तीन विशिष्ट ज्ञान कराएं। सुखप्रद पदार्थों को तीन बार हमारी ओर पहुंचायें। यह भी कि हमारी बुद्धि को तीन बार देवों की स्तुति में प्रेरित करें, तीन बार सौभाग्य और तीन बार यश प्रदान करें। अश्विनीकुमार को स्मरण कराया गया कि उन्होंने तीन बार दिव्य औषधियां, तीन बार पार्थिव औषधियां तथा तीन बार जल औषधियां प्रदान की हैं। तीन धातुओं (वात, पित्त, कफ) से मिलनेवाला सुख, आरोग्य एवं ऐश्वर्य भी प्रदान किया है। अश्विनीकुमार तीन बार यजन करने योग्य हैं, अतः उनसे यज्ञों में तीन बार आने और तीन ओर आसनों पर बैठने का आग्रह है। उनके निमित्त जलों से तीन बार तीन पात्र भर दिये गये हैं, हवियों को भी तीन भागों में विभाजित किया गया है। अश्विनीकुमार तीनों लोकों की रक्षा करते हैं। इसलिए 'हे अश्विनीकुमारो! आपके तीन छोरवाले रथ के तीन चक्र और एक ही आधार पर स्थापित होनेवाले तीन स्तम्भ कहाँ हैं?'

अष्टादश पुराणेषु...

यद्यपि सम संख्या को अशुभ माना गया है, किंतु अठारह की संज्ञा/संख्या भारतीय साहित्य-संस्कृति में काफी लोकप्रिय है। पुराण अठारह हैं, स्मृतियां अठारह हैं, महाभारत में अठारह पर्व हैं, और गीता में अठारह अध्याय हैं। महाभारत की लड़ाई भी अठारह दिनों तक अठारह अक्षोहिणियों के बीच चली। ब्राह्मणों के गोत्र भी अठारह ही कहे जाते हैं। (डी डी कोसांबी, मिथक और यथार्थ, पृष्ठ 20)। 'ईश उपनिषद भी अठारह पद्यों का एक छोटा-सा संग्रह है।' (राहुल सांकृत्यायन, दर्शन दिग्दर्शन, पृष्ठ 391) ज्योतिष के प्रवर्तक अठारह आचार्य हैं। अन्य विषयों के भी अठारह आचार्यों का उल्लेख मिल जाया करता है। राजशेखर ने 'काव्य-मीमांसा' के आरंभ में काव्य-विद्या के अठारह अंग और उसके अठारह आचार्य बताये हैं। राजशेखर ने इस वृहद ग्रंथ को अठारह अध्यायों में पूरा किया था। एकमात्र उपलब्ध प्रथम खंड 'कविरहस्य' के भी अठारह अध्याय ही कहे जाते हैं। (हजारीप्रसाद द्विवेदी, मध्यकालीन बोध का स्वरूप, पंजाब यूनिवर्सिटी, मार्च 1970, पृष्ठ 89) कभी-कभी जातियों और प्रकृतियों की संख्या भी 18 बतलाई जाती है। विद्याओं की संख्या भी अठारह मानी जाती है। महाकवि श्रीहर्ष ने राजा नल के बारे में लिखा है कि इन्होंने अठारह विद्याओं का अध्ययन किया था। (डॉक्टर कृष्णदेव उपाध्याय, भारतीय लोक-विश्वास, हिन्दुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद, 1991, पृष्ठ 239)

इस तरह 18 एक पारंपरिक पद है जिसका प्रयोग कई संदर्भों में होता है। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, पृष्ठ 33)

स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो हि भयावह:

दुनिया की हरेक भाषा में देश, काल और परिस्थिति के हिसाब से शब्द के अर्थ बदलते रहे हैं। कहना न होगा कि धर्म शब्द भी अपना अर्थ बदलता रहा है। यह शब्द 'धृ' धातु से बना है जिसका तात्पर्य है धारण करना, आलंबन देना, पालन करना आदि। यात्रा की अपनी आरंभिक अवस्था में वस्तु की प्रकृति धर्म है। इस धर्म को कहीं-कहीं ऋत शब्द से भी द्योतित करने की कोशिश की गई है। इस समय प्रकृति और मानव समाज की अत्यंत सहज और बालसुलभ समझ थी। इस दृष्टिकोण के हिसाब से विश्व की वह हर वस्तु जो प्रकृति के अनुसार कार्य करती है, ऋत कहलाती है। यह प्रकृति यानी ऋत ही थी कि सूर्य प्रातःकाल उदित होता है और सायंकाल अस्त हो जाता है। इसी के साथ ऋत एक ऐसी सत्ता भी थी जो सूर्य को अविचलित भाव से उसके निर्धारित क्रम से संचालित रखती थी। यदि सूर्य अपने मार्ग से विचलित होता तो ऋत का देवता वरुण उसे दंडित कर सकता था। यही बात समस्त मानवीय क्रियाकलाप पर भी लागू होती थी। यह धर्म की ऋग्वैदिक/पूर्ववैदिक पृष्ठभूमि थी। 

ऋग्वेद (5/76/2) में संस्कृत शब्द 'धर्म' बरतन के लिए प्रयुक्त हुआ है। (धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 176) अथर्ववेद में धर्म शब्द का प्रयोग 'धार्मिक क्रिया संस्कार करने से अर्जित गुण' के अर्थ में हुआ है। ऐतरेय ब्राह्मण में धर्म शब्द सकल धार्मिक कर्तव्यों के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। छान्दोग्य उपनिषद में धर्म का एक महत्त्वपूर्ण अर्थ मिलता है जिसके अनुसार धर्म की धर्म की तीन शाखाएँ मानी गई हैं-(1) यज्ञ, अध्ययन एवं दान अर्थात गृहस्थधर्म (2) तपस्या अर्थात तापस धर्म तथा (3) ब्रह्मचारित्व अर्थात आचार्य के गृह में अंत तक रहना। यहां से धर्म आश्रम धर्मों/कर्तव्यों की ओर संकेत करता हुआ विशिष्ट अर्थ ग्रहण करना शुरू करता है। यहां आकर धर्म मानव के विशेषाधिकारों, कर्तव्यों, बंधनों, वर्णाश्रम तथा वर्ण की योग्यता/अयोग्यता में परिणत हो गया। तैत्तिरीयोपनिषद में छात्रों को 'सत्यं वद' और 'धर्मं चर' का जो पाठ पढ़ाया जा रहा है, इसी वर्णाश्रम धर्म की बात करता है। भगवद्गीता के 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः' में धर्म और कुछ नहीं, वर्णधर्म है।

यह 'धर्म' से 'स्वधर्म' तक की यात्रा है। 'स्वधर्म' की रक्षा की भावना का विकास राजसत्ता के लिए बड़ी ही उपयोगी है। कहा भी गया है कि राजधर्म सर्वोपरि है। राजधर्म वर्णाश्रम धर्म के अनुपालन को सुनिश्चित करना है। गीता में 'स्वधर्म' का पालन न होने से उत्पन्न परिस्थितियों का बड़ा ही भयावह चित्र खींचा गया है। कहा गया है कि 'जब अधर्म फैल जाता है तब परिवारों की स्त्रियां भ्रष्ट हो जाती हैं। और जब स्त्रियां भ्रष्ट हो जाती हैं तब वर्णसंकर पैदा होता है अर्थात विभिन्न जातियों का मिश्रण हो जाता है।' कहने की जरूरत नहीं कि सामाजिक व्यवस्था सामान्यतया सत्ता के प्रति आज्ञापालन पर निर्भर रहती है। तभी सुकरात ने भी क्रिटो से कहा था कि 'वह एथेंस के उन कानूनों को नहीं तोड़ेगा जिन्होंने उसका पालन-पोषण किया है, उसकी रक्षा की है और सदा उसका ध्यान रखा है।'

प्रसंगवश, महाभारत के शांतिपर्व में उल्लिखित एक तथ्योद्घाटक अनुच्छेद का उल्लेख मात्र करूँगा। इस अनुच्छेद में ब्राह्मणों और क्षत्रियों में संबद्धता और एकता पर बल देने की बात करते हुए शिकायत की गई है कि शूद्रों और वैश्यों ने एक स्तर पर, स्वेच्छा से ब्राह्मणों की पत्नियों के साथ अपने संबंध स्थापित करना आरंभ कर दिया है। अतः इससे जान पड़ता है कि उनकी (शूद्रों की) स्थिति कीड़ों-मकोड़ों जैसी होने के बावजूद (जघन्य अपराध के होते हुए) उन्होंने ब्राह्मणों की पावन ‘संपदा’ ब्राह्मण पत्नियों को अपने वश में कर लिया था। 

'वर्णधर्म' अथवा 'स्वधर्म' का पालन मनुष्य का सर्वोत्तम कर्त्तव्य माना गया है। वर्णधर्म पालन से मुकर जाना अधर्म है। शम्बूक वध की कथा हम सब जानते हैं। यह कथा रामायण में बड़े विस्तार से कही गई है। कुछ सौम्य रूप देकर भवभूति ने इस प्रसंग को उत्तररामचरित में भी ले लिया है. बेचारा शम्बूक मर्यादापुरुषोत्तम राम के हाथों सिर्फ इसलिए मारा गया कि उसने भगवान को याद किया था। शम्बूक का वध करना राजा राम का राजधर्म था। यह वह समय था जब शूद्रों को वेदपाठ तक करने से रोक दिया गया था। पढ़ना तो दूर अगर भूल कर भी शूद्र वेद सुन लें तो उसके कानों शीशा पिघला कर डाल देने का सख्त से सख्त प्रावधान था। ऐसा था हमारा प्रगतिशील हिंदू धर्म, जिसमें अपने ही धर्मावलंबियों को अपना धर्मशास्त्र पढ़ने का अधिकार नही था। शूद्रों के लिए धर्म के सारे रास्ते बंद थे किन्तु सत्ता के नियामक ब्राह्मणों की तो बात निराली थी। वे तो धर्म का निर्माण करने वाले थे। जरूरत पड़ने पर वे धर्म को ठेंगा भी दिखा सकते थे, उसमें आवश्यक संशोधन करने में समर्थ थे। मनुस्मृति में लिखा है- “आपत्तिकाल में ब्राह्मण गर्हित जनों को, जिन्हें वेद पढ़ने का अधिकार नहीं हैं, उन्हें पढ़ाएं, उनसे यज्ञ कराएं और दान लें तो उन्हें (ब्राह्मणों को) दोष नहीं है क्योंकि वे जल और अग्नि के समान पवित्र हैं।”

बेचारा शंबूक मर्यादा पुरुषोत्तम राम के हाथों सिर्फ इसलिए मारा गया कि उसने भगवान को याद किया था। परन्तु ऐसी घटना बुद्ध से पहले या बौद्ध धर्म के हिंदुस्तान में रहते हुए कभी घटी हो, इसका प्रमाण कहीं भी नही मिलता। इस कहानी के रचयिता का हेतु केवल यही दिखाना होगा कि राजा को ऐसा बर्ताव करना चाहिए। इसकी ऐतिहासिकता चाहे जो रही हो, शम्बूक का अपराध था कि उसने मुक्ति के लिए भक्ति का मार्ग पकड़ना चाहा था जबकि शूद्र वर्ण की मुक्ति तीन उच्च वर्णों की सेवा से ही सम्भव है।

हिन्दू धर्मग्रंथों की तरह प्राचीन बौद्ध धर्म में समता के सिद्धांत का आलंबन रहने पर भी अभिजात तंत्र की ओर विशेष झुकाव था। बौद्धों ने वर्ण व्यवस्था के आधारभूत तथ्यों का शायद ही कभी खुलकर विरोध किया, जिसके अनुसार शूद्रों को सेवि वर्ग के अंतर्गत रखा गया था। ब्राह्मणों का यह दावा था कि वे अन्य तीन वर्णों से श्रेष्ठ हैं, किंतु गौतम बुद्ध ने इसका खंडन करते हुए बताया कि जहाँ तक उद्गम का प्रश्न है, क्षत्रिय उच्च हैं और ब्राह्मण निम्न। पर ये वैश्यों या शूद्रों की अपेक्षा न तो ब्राह्मणों और न क्षत्रियों की ही श्रेष्ठता पर आपत्ति करते हैं। बौद्ध धर्म केवल यह बताने का प्रयास करता है कि मुक्ति की खोज में जाति का कोई महत्त्व नहीं। 

ईसाई धर्म की ही तरह बौद्ध धर्म ने भी दासता की बुनियाद पर कभी कोई आघात नहीं किया। उन्होंने शूद्रों की आर्थिक एवं राजनैतिक अशक्तताओं को भी दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया। उलटे बौद्ध संघ का दरवाजा गुलामों और कर्जखोरों के लिए बंद था, और बौद्ध धर्म कर्ज की अदायगी पर जोर देता था। ध्यान देने की बात है कि बुद्ध ने समाज की व्यवस्था के उल्लंघन का कभी समर्थन नहीं किया और उन्होंने भागे हुए दासों को अपने धर्म में दीक्षित करने से इनकार कर दिया। बौद्ध धर्म के प्रचलित नियमों के अनुसार कोई भिक्षु सम्बद्ध साहूकार की अनुमति के बिना किसी कर्जदार/दास को दीक्षित करता है तो वह (धर्म के विरुद्ध आचरण का) अपराधी है।

धम्म अट्ठकथा में एक जगह वर्णन है, "एक दासी अपनी रोटी बुद्ध को भेंट करके अपने आप से कहती है कि बुद्ध ने इसे सौजन्य से स्वीकार किया है और थोड़ा-सा आगे जाकर वे इसे किसी कौवे या कुत्ते को डाल देंगे।"

भारतीय समाज राजसत्ता की असहिष्णुता से लड़ने की अपनी तरकीब विकसित करता रहा है। धर्मांतरण को इसी प्रकाश में देखे जाने की जरूरत है। इतिहासकार रामशरण शर्मा ने लिखा है, 'विचार करने की बात है कि भारत में धर्म के रूप में इस्लाम केवल उन क्षेत्रों में ही पैर जमा सका जो बौद्ध धर्म के मजबूत गढ़ थे. यह बात कश्मीर, उत्तर-पश्चिमी सीमांत क्षेत्र, पंजाब और सिंध के बारे में सच लगाती है. उसी तरह नालंदा (बिहार शरीफ़), भागलपुर (चम्पानगर) और बंगलादेश में, जहाँ बौद्ध काफी संख्या में रहते थे, मुस्लिम आबादी है.' (रामशरण शर्मा, सांप्रदायिक इतिहास और राम की अयोध्या, पृष्ठ 13) स्पष्ट है कि कुछ सालों पहले देश की राजधानी दिल्ली में जो व्यापक धर्मांतरण हुआ वह हमारे इतिहास की पहली अप्रत्याशित घटना नहीं है बल्कि कहिए कि अम्बेदकर के बाद पहली बार इसने हिन्दुत्व की रीढ़ सीधी की। धर्मांतरण की इस घटना से सहिष्णु होने का हमारा दंभ भाप बनकर उड़ गया। धर्मांतरण को शोषित जनता ने पहली बार बौद्ध-काल में अपना हथियार बनाया। तब से आज तक उसकी एक जीवित परंपरा है।

बौद्ध धर्म : असंबद्ध टिप्पणियां

बौद्ध धर्म और बुद्धिजीवी

मैं सालों से समझने की कोशिश में हूँ कि बौद्ध धर्म पर दलित बुद्धिजीवी से लेकर कुछ मार्क्सवादी तक क्यों लट्टू हैं? आंबेडकर से लेकर राहुल सांकृत्यायन तक। सांकृत्यायन ने तो यहाँ तक लिखा कि बौद्ध धर्म 'हैब्स और हैवनॉट्स' का संघर्ष था। (देखें पीपीएच से प्रकाशित 'बुद्धिज्म : ए मार्क्सिस्ट एप्रोच' में राहुल सांकृत्यायन का लेख) आज भी यह हमारे बुद्धिजीवियों के लिए एक कमजोरी बना हुआ है। हमारे समय के कई 'क्रन्तिकारी' विचारक आंबेडकर में 'सर्वहारा क्रांति' की दार्शनिक पृष्ठभूमि खोजने में लगे हैं। उनकी बौद्धिक मेधा की तुलना कभी बुद्ध और मार्क्स तो कभी भगत सिंह से करते हैं। यह सही है कि भारतीय मार्क्सवादी विचारकों ने उन सवालों को कमतर महत्त्व दिया जिनको बाबा साहब उठा गये हैं। लेकिन 'प्रायश्चित' का मतलब यह तो नहीं होता कि हम मार्क्सवाद को भूलकर आंबेडकर की राह चलना शुरू कर दें। एक मार्क्सवादी को भारत-जापान संस्कृति परिषद् के सम्मान में  आयोजित समारोह में दिया गया आंबेडकर का वक्तव्य स्मरण रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि 'वर्तमान और भावी पीढ़ी को अंततोगत्वा बुद्ध या मार्क्स दोनों में से एक के सिद्धांत को चुनना पड़ेगा। यदि बुद्ध के उपदेशों को स्वीकार नहीं किया गया तो एशिया में भी यूरोप की भांति संघर्षों का दौर शुरू हो जायेगा।' और हमारे मार्क्सवादी मित्र हैं कि कभी बुद्ध पकड़ते हैं तो कभी आंबेडकर। इस आपाधापी में बेचारे मार्क्स ही हमसे किनारा होते जाते हैं।

सच है कि प्राचीन बौद्ध धर्म में समता के सिद्धांत का आलंबन रहने पर भी अभिजात तंत्र की ओर विशेष झुकाव था। (ओल्डेनबर्ग, 'बुद्ध', पृष्ठ 155-9) बौद्धों ने वर्ण व्यवस्था के आधारभूत तथ्यों का शायद ही कभी खुलकर विरोध किया, जिसके अनुसार शूद्रों को सेवि वर्ग के अंतर्गत रखा गया था। ब्राह्मणों का यह दावा था कि वे अन्य तीन वर्णों से श्रेष्ठ हैं, किंतु गौतम बुद्ध ने इसका खंडन करते हुए बताया कि जहाँ तक उद्गम का प्रश्न है, क्षत्रिय उच्च हैं और ब्राह्मण निम्न। पर ये वैश्यों या शूद्रों की अपेक्षा न तो ब्राह्मणों और न क्षत्रियों की ही श्रेष्ठता पर आपत्ति करते हैं। (दीघ निकाय, I, पृष्ठ 91-98) बौद्ध धर्म केवल यह बताने का प्रयास करता है कि मुक्ति की खोज में जाति का कोई महत्त्व नहीं। (फिक, दि सोशल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ नॉर्थ ईस्टर्न इंडिया, पृष्ठ 31) 

ईसाई धर्म की ही तरह इस काल के धार्मिक-सुधार आंदोलनों ने भी दासता की बुनियाद पर कभी कोई आघात नहीं किया। उन्होंने शूद्रों की आर्थिक एवं राजनैतिक अशक्तताओं को भी दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया। उलटे बौद्ध संघ का दरवाजा गुलामों और कर्जखोरों के लिए बंद था, और बौद्ध धर्म कर्ज की अदायगी पर जोर देता था। (रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, पृष्ठ 127) ध्यान देने की बात है कि बुद्ध ने समाज की व्यवस्था के उल्लंघन का कभी समर्थन नहीं किया और उन्होंने भागे हुए दासों को अपने धर्म में दीक्षित करने से इनकार कर दिया। (देवराज चानना, प्राचीन भारत में दास प्रथा, पृष्ठ 95, पादटिप्पणी संख्या 191) बौद्ध धर्म के प्रचलित नियमों के अनुसार कोई भिक्षु सम्बद्ध साहूकार की अनुमति के बिना किसी कर्जदार/दास को दीक्षित करता है तो वह (धर्म के विरुद्ध आचरण का) अपराधी है। (समंतपासादिका, पृष्ठ 999; देवराज चानना, प्राचीन भारत में दास प्रथा, पृष्ठ 152 में उद्धृत) 

"एक दासी अपनी रोटी बुद्ध को भेंट करके अपने आप से कहती है कि बुद्ध ने इसे सौजन्य से स्वीकार किया है और थोड़ा-सा आगे जाकर वे इसे किसी कौवे या कुत्ते को डाल देंगे।" (धम्म अट्ठकथा 3/121; चानना, पूर्वोक्त, पृष्ठ 130, पादटिप्पणी संख्या 141 में उद्धृत)

क्या है बुद्ध का ज्ञान?

सिद्धार्थ गौतम को ज्ञान प्राप्त हुआ, यह प्राचीन भारतीय इतिहास की सर्वाधिक प्रचारित परिघटना है। ज्ञान था कि दुःख है, दुःख का कारण है और उसके निवारण के उपाय हैं। बुद्ध का ज्ञान जब कहता है कि दुख का कारण इच्छा है, तो उन्होंने सामाजिक संस्थाओं से, सामाजिक वातावरण से उत्पन्न दुख पर विचार नहीं किया ।(जयप्रकाश नारायण, समाजवाद सर्वोदय और लोकतंत्र, बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, जून 1988, पृष्ठ 116) किन्तु सत्य है कि यह भारतीय इतिहास में कार्य-कारण संबंध की खोज या प्रस्थापना है। इस रूप में बुद्ध का यह ज्ञान महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी अवश्य है लेकिन जिस तरीके से वे ज्ञान प्राप्त करते हैं, उसकी कहानी बड़ी दिलचस्प है। कहानी है कि बुद्ध ने बीमार आदमी को देखा, वृद्ध को देखा और फिर मृतक को देखा। ये सारे दुख के दृश्य हैं। मजेदार है कि दुःख के इन दृश्यों में सामाजिक समस्या से जुड़ा एक भी दृश्य नहीं है। मसलन किसानों का दुख, दासों का दुख आदि आदि। आप यह भी कह सकते हैं कि बुद्ध के दुःख का सामाजिक सरोकार नहीं है।

ज्ञान-प्राप्ति की एक दूसरी कहानी भी है। बुद्ध कई दिनों से अन्न त्यागे हुए हैं। कभी-कभी अखाद्य खा लेते हैं। तभी सुजाता खीर के साथ प्रकट होती है। जंगल में आकाशवाणी भी होती है कि 'वीणा के तार को इतना न कसो कि टूट जाए, न इतना ढीला रखो कि आवाज ही न निकले।' बुद्ध को ज्ञान मिला कि 'बीच का रास्ता ही रास्ता है'। तब हमारे प्रिय कवि पाश नहीं थे कि कहते, बीच का रास्ता, रास्ता नहीं होता।

बुद्ध ने मध्यम मार्ग अपनाया। इस मध्यम मार्ग का एक ऐतिहासिक सन्दर्भ है। उनके समय में समाज में उथल-पुथल था। किसानों का शोषण इतना बढ़ चुका था कि वे खेती और गांव छोड़कर भाग रहे थे। प्राचीन काल में पलायन किसान विद्रोह का सबसे प्रकट रूप है। बुद्ध ने भूपतियों/ शासक वर्ग से आग्रह किया कि वे किसानों को हल, बैल तथा बीज आदि की व्यवस्था करें। इधर संघ में दास/दासियों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया ताकि प्रभु वर्ग को मुफ्त श्रमिक उपलब्ध हो सके। यह बुद्ध के मध्यम मार्ग का केवल एक उदाहरण है। इसी मध्यम मार्ग से बुद्ध को राज्याश्रय प्राप्त होते थे।

बुद्ध, बौद्ध साहित्य और स्त्री-विमर्श

कथा है कि 'प्राचीन भारत में सड़कों पर यात्रियों के आराम के लिए धर्मशालाएं होती थीं। ऐसी एक शाला बनवाने के संबंध में एक जातक में एक मजेदार कहानी आई है। बोधिसत्त्व और उसके एक बढ़ई साथी ने एक चौमुहानी पर एक सभा बनवाई, पर उन्होंने यह निश्चय किया कि वे उस धर्मकार्य में किसी स्त्री की सहायता नहीं लेंगे, पर स्त्रियां इस तरह प्रण से भला कहाँ धोखा खानेवाली थीं। उनमें से एक स्त्री बढ़ई के पास पहुंची और उसने शिखर बनाने के लिए कहा। बढ़ई के पास शिखर बनाने के लिए सूखी लकड़ी तैयार थी, जिससे उसने खरादकर शिखर तैयार कर दिया। जब सभा का बनना समाप्त हो गया, तब बनानेवालों को पता लगा कि शिखर नदारत था, उसके लिए बढ़ई से कहा गया। बढ़ई ने उन्हें बतलाया कि शिखर एक स्त्री के पास है। स्त्री से उनलोगों ने शिखर मांगा, पर उसने उन्हें वह तबतक देने से इनकार किया, जबतक कि वे उसे अपने पुण्यकार्य में साझी बनाने को तैयार न हों। झख मारकर स्त्री-विरोधियों को उसी शर्त पर शिखर लेना पड़ा।' (जातक, 1, 201; डॉक्टर मोतीचंद्र, सार्थवाह, बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद, पटना, द्वितीय संशोधित संस्करण : 1966, पृष्ठ 54)

एक दूसरी कथा है कि देवी महामाया को स्वप्न आया कि 'उज्ज्वल वर्ण हाथी के रूप में बोधिसत्त्व ने शयनकक्ष में प्रवेश किया। तीन बार प्रदक्षिणा की। फिर देवी की कुक्षि में प्रवेश किया।' स्वप्न का रहस्य पूछे जाने पर ब्राह्मणों ने उत्तर दिया, 'राजन! देवी ने गर्भ धारण किया है।' राजन के लिए उत्तर अपर्याप्त था, अतः मृदु स्वर में पूछा, 'महात्मन का रूप क्या होगा!' प्रश्न का 'तात्पर्य' जानकर ब्राह्मणों ने उत्तर दिया-'देवी की कुक्षि में स्थित गर्भ पुत्र है, कन्या नहीं है।' राजा का कमल मुख खिल गया। (रघुनाथ सिंह, बुद्धकथा, हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी, 1990, पृष्ठ 4)

सिद्धार्थ का मन असार संसार में न रमता था। इसलिए उन्हें खुश करने को कमिनियाँ छोड़ी गईं। कमनीय कामिनियों को राजाज्ञा थी राजकुमार को प्रसन्न करने की। आगे-पीछे 'काम-पुतलियां' चलीं। 'कोई पुष्पित तरु छाया में पालना झूलने चली। जानकर कोई गिर गयी। आशा से-उसे उठा लेंगे। कोई पुष्पसज्जिता उनके सम्मुख पुष्प गिराती चली। कोई कटाक्ष करती समीप से निकल गयी। उनके कंठ में माला डालने के व्याज से किसी ने अपने पीन पयोधर का स्पर्श उनके वक्षस्थल से करा दिया।'

'एक मदोद्धत उत्तुंग पीनपयोधरा रूपसी ने उनका स्पर्श किया। मुस्कुराई। उनके स्कंध प्रदेश पर अपना कपोल रख दबाया।'

'मृदुबाहुलता बाला ने गिरने का बहाना कर उनका आलिंगन कर लिया। मदिर गंध युक्त मुख उनके श्रवणों के पास ले जाकर, कुछ कहने के व्याज से अपना अधर उनके कपोल से लगा दिया।'

'एक मुखर कामिनी की स्वर्ण मेखला कटि प्रदेश से जंघा पर फिसल आयी थी। मेखला ठीक करती हुई, उसने सूक्ष्माम्बर से अपना स्थूल नितंब प्रदर्शित कर दिया।'

'मंजरी-पूर्ण आम्र शाखा से झूलकर एक गौरांगना ने अपना सुवर्ण-कलश सदृश सुंदर स्तन-युगल और अनावृत वक्ष दिखा दिया।' (रघुनाथ सिंह, बुद्धकथा, पृष्ठ 19)

ऊपर की पंक्तियों से बुद्धकालीन समाज और बौद्ध साहित्य का 'स्त्री-विमर्श' समझा जा सकता है।

जीवेत शरदः शतम

आजकल का कोई भद्र व्यक्ति किसी सभा-सोसायटी में छींकता है तो शिष्टाचार की मर्यादा का ध्यान देते हुए वह अंग्रेजी का 'सॉरी' शब्द कहता है, लेकिन बचपन का अनुभव है कि अगर हम बच्चे कभी छींकते तो घर की बड़ी-बूढ़ियाँ तुरत 'छत्तन जी' कहकर उसका प्रतिकार करतीं। बहुत दिनों तक तो यह पता ही नहीं चला कि ये 'छत्तन जी' कौन बला हैं। तभी गाँव में आर्यसमाजियों की एक टोली पहुंची। उनकी किसी शाम की सभा से रहस्योद्घाटन हुआ कि  'छत्तन जी' दरअसल संस्कृत का 'शतम जीवेत' है।

प्राचीन भारत में किसी को आशीर्वाद देते समय 'जीवेत शरदः शतम/पश्येम शरदः शतम' अर्थात सौ शरद जीने और सौ शरद देखने की बात कही जाती थी। तब आज के जैसा ठाकुर प्रसाद का छपा हुआ कैलेंडर नहीं था, इसलिए लोग एक बरसात से दूसरी बरसात की अवधि को वर्ष मान लेते थे। बरसात में नदियों में नियमित बाढ़ आती थी। प्राकृतिक अवलोकन एवं अनुभव से उन्हें मालूम हो चला था कि दो बरसात/बाढ़ के बीच की अवधि सालभर की है। भाषाविज्ञान भी बताता है कि वर्ष का संबंध वर्षा से है। बरसात के ठीक बाद शरद ऋतु है। वर्ष की गिनती शरद से भी होती रही है। इसीलिए वर्ष और साल का एक पर्यायवाची शब्द शरद भी है। (संस्कृत शब्द कौस्तुभ, पृष्ठ 830; भोलानाथ तिवारी, शब्दों का जीवन, पृष्ठ 111) 

वनस्पति विज्ञान की बात करें तो बरसात की ऋतु में पौधे में वृद्धि होती है और शरदकाल में वलय (रिंग) का निर्माण होता है। एक वलय से दूसरे वलय तक पहुंचने में पौधे को सालभर का समय लगता है। शायद इसलिए भी वर्ष की माप शरद से शरद तक की जाती रही है, लेकिन अब के लोग शरद नहीं वसन्त देखने की बात करते है। शरद को वसन्त ने कब पदच्युत किया, यह शोध का विषय हो सकता है!

कविता, संस्कृति का हिस्सा है

कविता, संस्कृति का एक हिस्सा है और निरंतर कविता, संस्कृति को बढ़ाने का भी काम करती है जिसका मनुष्य एक अहम हिस्सा है। इसलिए कह ले सकते हैं कि कविता सबसे पहले रचनाकार को बदलती है। कविता लिखने के बाद या लिखते हुए कवि एक सामान्य आदमी से ऊपर उठा होता है। अगर कविता यह करने में असफल हो तो रचनाकार की भी असफलता मानी जा सकती है। समाज भी व्यक्तियों से बना है। इस हिसाब से कविता समाज को बदलने का काम करती है लेकिन यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है। इतनी लंबी कि कभी-कभी हम बदलने या बदले जाने की आशा खो बैठते हैं। कविता और समाज परस्पर एक-दूसरे को बदलने की चेष्टा करते हैं, ऐसा नहीं कि सिर्फ कविताएं ही समाज को बदलती हैं। बल्कि समाज भी कविता पर अपना असर छोड़ते चलता है तभी तो कोई कविता किसी समय में ज्यादा मूल्यवान होती है और कभी अपना अस्तित्व खो बैठती है। यह सभ्यता और संस्कृति का विराट संघर्ष है। कविता समाज को बदलने में उस तरह का औजार कभी नहीं होती, जिस तरह से समाज को उत्पादन के औजार और तकनीकी विकास बदलते हैं।

 समय भी कविता को प्रभावित करते चलता है। कविता ही नहीं, हमारी फिल्मों में जो वाक्य संरचना है, वह छोटी होती जा रही है। संस्कृत से प्रभावित वाक्य लंबे हुआ करते थे। यह आधुनिकता की एक पहचान भी हो सकती है। हमारे पास आज वैसे नायक नहीं हैं जैसे सामंती युगों में हुआ करते थे। इसलिए महाकाव्य भी नहीं रहे। लंबी कविता के संदर्भ में देखें, तो निराला, मुक्तिबोध के बाद आलोकधन्वा ही लंबी कविता को साध पाते हैं। वजह यह भी हो सकती है कि निराला और मुक्तिबोध की कविताओं में जो एक व्यापक, विश्वजनीन (वैश्विक) दृष्टि है वह हिन्दी के कई कवियों के पास अनुपलब्ध है। तकनीकी विकास ने हमारे समय और समाज को संक्रमणशील बना दिया है। हमारे मूल्य स्थायी भाव लेकर नहीं आते। रोजमर्रा के सामान अब लिखो-फेंको की शैली में आते हैं। यानी हमारी जीवन दृष्टि बदल गई है। हिन्दी कविता इन कारणों की व्यापक जड़ की तलाश में कई अलग-अलग कहानियां गढ़ती है। इन कहानियों को एकसूत्र किये बगैर लंबी कविता लगभग असंभव है।

इन दिनों कविता के सामने नयी चुनौतियां आयी हैं। हमारा वर्तमान समय तकनीकी परिवर्तन का समय है। यह समय आउटडेटेड होने का भी है। कविता हमारी समस्याओं का बहुत ठोस रूप में समाधान नहीं कर सकती। कविता न रोटी पैदा कर सकती है न गरीबी की आग ही बुझा सकती है। यह हमारे अंदर सौंदर्य बोध पैदा कर सकती है जिससे अप्रत्यक्ष रूप से हम मनुष्य विरोधी होने से बच सकते हैं। इसी संदर्भ में कविता की भूमिका जांची जा सकती है। हमारे समय की कविता अपना काम बखूबी कर रही है।

 मुझे लगता है कि आज लेखक आम आदमी हो गया है। लेखक की सामाजिक हैसियत आम आदमी से अलग नहीं है। तब तो आम आदमी का विस्तार आप कह सकते हैं जिसमें एक बहुत बड़ी फौज वैसी है जिसका शब्दों की दुनिया से कोई बना-बनाया रिश्ता नहीं है। आम आदमी की कविता कहते हुए अक्सर हम भ्रम के शिकार होते हैं। निराला की कविता अपने ही समानधर्मा को समझ में नहीं आ रही थी। मुक्तिबोध भी कम कठिन कवि नहीं हैं। दुनिया को बदलने का मार्क्स ने जो घोषणा पत्र तैयार किया वह अर्थशास्त्र के पंडितों को भी समझ में नहीं आता। लेकिन एक समय आता है जब एक अपढ़ व्यक्ति भी मार्क्सवाद के पक्ष में खड़ा दिखता है। आम जन की कविताएं और लोकप्रिय कविताएं दो अलग चीज हैं। साहित्य में लोकप्रियतावाद सबसे घटिया चीज है जिसके शिकार लेखक बनते रहे हैं। एक समय में कोई कविता लोगों की जुबान पर होती है, जैसे होली में कीचड। फिर साल भर हम उससे अलग रहते हैं। दिनकर और बच्चन लोकप्रिय रहे हैं, किन्तु हिन्दी साहित्य या संकीर्णता में कहें तो आम जन के साहित्य में इनकी बहुत थोड़ी भूमिका रही है।

 आलोचक नंदकिशोर नवल ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि एक असफल कवि आलोचक हो जाता है। नवल जी शायद अपनी बात कर रहे हैं, यद्यपि उनका मानना है कि वे तो आलोचक भी नहीं हो सके। यह एक बुझौअल की तरह है कि असफल कवि आलोचक हो जाता है। एक असफल मनुष्य भेड़-बकरी नहीं होता। इस तरह के कथन का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। बचपन में पढ़ते हुए ऐसा लगा था कि प्रेमचंद गणित में फेल करते थे, इसलिए उपन्यासकार हो गए। कविता लिखने और आलोचना करने को मैं अलग करके नहीं देखता। कविता भी संस्कृति की आलोचना ही है। अलबत्ता दोनों के फॉर्म में फर्क है। इधर प्रेमकुमार मणि ने एक अखबार (शिखर भारतेन्दु) में कहा कि कविता सामंती समाज की विधा है। ऐसा कहते हुए कई तरह के अर्थ संप्रेषित किये जा सकते हैं, अर्थात् कविता सामंती समाज की उपज है अथवा कविता अपने चरित्र में सामंती है। दोनों ही अर्थ सही नहीं लगते। हमारे यहां कविता ऋग्वेद से शुरू होती है जहां समाज कबीलाई है। बराबरी का हक और दावा है। समाज में अभी चौधरी नहीं बने हैं। यहां से हटकर सामंती समाज में भी कविता विद्रोह की कविता है। कल्पना करें तुलसीदास के समाज की जिसमें पिता की आज्ञा अकाट्य है, वहां भी लक्ष्मण के बेहोश होने पर राम पिता की आज्ञा के विरुद्ध जाते वक्तव्य देते हैं। बगीचे में राम और सीता के बीच प्रेम का पैदा होना सामंती मूल्यों के विरुद्ध ही जाता है। तुलसीदास का यह कहना कि धूत कहो अवधूत कहो, रजपूत या जोलहा जो चाहो, कह लो, क्या सामंती और मनुवादी मिजाज की कविता है ? पाठक कई बार पूर्वाग्रहों का शिकार होता है। एक अच्छा पाठक और लेखक इससे बचने की कोशिश करता है। जो जितना बच पायेगा वह उतना ही बड़ा व्यक्ति, लेखक और पाठक होगा। सत्ता पर बैठा हुआ व्यक्ति भी जब कविता की सोचता है तो सत्ता-विरोधी हो जाता है। तभी तो अशोक वाजपेयी जैसा कवि कई बार 'क्रांतिकारी' लगने लगता है।                                                                                

शिखर भारतेन्दु, शिमला, 7 जून, 2003

पाणिनि की सांस्कृतिक विरासत

इतिहास और साहित्य के विद्यार्थी इस बात से वाकिफ हैं कि किसी ने 'परंपरा का मूल्यांकन' किया तो किसी ने 'दूसरी परंपरा की खोज' कर डाली और हम विवाद में उलझे-फंसे रहे कि यह परंपरा कि वह परंपरा। इन बहसों से जो बात छनकर आ रही थी कि अतीत में कोई एक परंपरा नहीं होती बल्कि परंपराएं होती हैं, उसको हमलोगों ने यथोचित ग्रहण नहीं किया। यह हमारी सांस्कृतिक अनुदारता है। फिराक गोरखपुरी साहब अक्सर कहा करते थे कि पाणिनि के समय में संस्कृत के 90 तरह के रूप लोक में प्रचलित थे। इसीलिए फिराक इस संस्कृत को 'संस्कृत' न कह 'संस्कृतियां' कहते थे। पाणिनि ने इन 90 रूपों के बीच से संस्कृत का एक मानक रूप गढ़ा और कहा कि यही संस्कृत है। (विश्वनाथ त्रिपाठी, फिराक वार्ता, 'तद्भव', अप्रैल, 2002, पृष्ठ 135) उनके चेलों समेत कई और परवर्ती विद्वानों ने मान लिया कि जो पाणिनि कहे वही मान्य है। इस तरह से पाणिनि के नाम पर संस्कृत भाषा के साथ ज्यादती हुई उससे हम सभी परिचित हैं। इसके दुष्परिणामों से और भी ज्यादा परिचित हैं। एक समय 'पाणिनीय' होना प्रमाण माना जाता था और 'अपाणिनीय' गलत का पर्याय। मेरी जानकारी में पाणिनि के नाम का जो आतंक है उसका जोड़ दुनिया के शायद ही किसी भाषा और साहित्य में हो।

आज जरूरत इस बात की है कि हम सांस्कृतिक उदारता का परिचय देते हुए संस्कृति की जगह संस्कृतियां और परंपरा की जगह परंपराएं मानकर बहस करें और भिन्न परंपरा और संस्कृति के लिए स्पेस छोड़ते हुए जो समय की मांग है उस अनुरूप उससे ग्रहण करें। इस कार्य में परंपरा, संस्कृति और इतिहास का विवेक हमारी मदद करेगा।

अगर प्राचीन भारत का इतिहास देखें तो आधी से अधिक आबादी, अर्थात स्त्री और शूद्र को शिक्षा से दूर रखा गया। कहा गया कि इन्हें वेदपाठ आदि करने का कोई अधिकार नहीं है, ये शब्दों को बिगाड़कर कहते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि तब हम लेखनकला से परिचित नहीं थे, साहित्य केवल मौखिक परंपरा में जीवित रह सकता था। पाणिनि ने कहीं लिखा है कि पुस्तकों के सहारे पढ़नेवाले छात्र निकृष्ट कोटि के माने जाते हैं। वैयाकरण का यह कथन प्राचीन भारत में ज्ञान की समृद्ध वाचिक परंपरा की स्वीकृति/सहमति से ज्यादा कुछ नहीं लगता। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक साहित्य/ज्ञान अपने अपरिवर्तित रूप में जाये, इसके लिए भाषा में शुद्धता, उच्चारण आदि पर एक हद तक 'अनावश्यक जोर' की आवश्यकता थी। ज्ञान की मौलिकता की रक्षा का दायित्व ब्राह्मणों के पास था। उसने लोगों में डर पैदा किया कि मंत्रों के गलत उच्चारण के कुप्रभाव से यजमान को अनिष्ट भोगना पड़ सकता है। इस डर का भी एक सीमा तक ही प्रभाव रहा होगा क्योंकि पाणिनि कई तरह के उच्चारण की बात करता है। उच्चारण की इतनी गड़बड़ी थी कि कई शब्दों के स्रोत, अर्थ और निर्माण/विकास प्रक्रिया उन्हें भी अज्ञात थे। इस समस्या को दूर करने के उद्देश्य से उन्होंने एक 'व्याकरण' तैयार किया। इस व्याकरण से इधर-उधर होने का मतलब 'अपाणिनीय' अर्थात अशुद्ध/गलत होना था।

पाणिनीय व्याकरण की प्रतिष्ठा इतनी अधिक हो चली थी कि बहुत से कवि व्याकरण की पटुता की वजह से ख्याति अर्जित करने लगे थे। कभी-कभी पाणिनी के कहे हुए अप्रचलित प्रयोगों के व्यवहार के कारण कवि की खूब प्रशंसा हुई। राजा भोज ने किसी ग्रामीण ब्राह्मण से पूछा 'नद्यां कियज्जलं विप्र' (नदी में कितना पानी है, ब्राह्मण देवता)? उसने तपाक से उत्तर दिया 'जानुदघ्नं नराधिप' (जंघे तक महाराज)। यहाँ दघ्नच (च हलयुक्त) प्रत्यय का प्रयोग है, जो केवल व्याकरण की पोथी में ही सुरक्षित है। इस अप्रचलित प्रत्यय के प्रयोग के कारण ही राजा भोज प्रसन्न हुए थे और गरीब ब्राह्मण प्रचुर पुरस्कार पाने में समर्थ हुआ था। (हजारीप्रसाद द्विवेदी, मध्यकालीन बोध का स्वरूप, पृष्ठ 78)

संस्कृत भाषा का प्रकाण्ड विद्वान पाणिनि पाठान था और शलातुर (त्रिनेल के उत्तरपश्चिम लाह/लाहुल ग्राम इसे आजकल बताते हैं-नन्दलाल दे) का रहनेवाला था। इसकी माता का नाम दाक्षी था। ह्वेनत्सांग इसकी मूर्ति का शलातुर में उल्लेख करता है। पतंजलि के अनुसार कौत्स इसका शिष्य था। इस पाठान ने 'अष्टाध्यायी' (यह तमिल भाषा के प्रथम व्याकरण तोलक्कपियम की पथ प्रदर्शिका रही। देखें, आर. एच. राॅबिन्स, ‘लिंग्विस्टिक्स इन इंडिया’, आस्पेक्ट्स ऑफ इंगलिश प्रोज (संपा.-के. एम. तिवारी, आर. सी. पी. सिन्हा) विकास पब्लिशिंग हाउस, 1988, पुनर्मुद्रण: 2000, पृष्ठ 14) गणपाठ, धातुपाठ, लिंगानुशासन और शिक्षा लिखी जिसकी समता आज तक किसी अन्य भारतीय ने नहीं की। इसने अपने पूर्व वैयाकरण पिशलि, काश्यप, गार्ग्य, गालव, चक्रवर्मा, भारद्वाज, शाकटायन, शाकल्य, सोनक एवं स्फोटायन सभी को मात कर दिया।

इस पाठान वैयाकरण का काल विवादास्पद है। गोल्डस्टूकर इसे संहिता-निर्माण के समीप का बतलाता है। सत्यव्रत भट्टाचार्य तो इसे यास्क से पूर्व मानते हैं। कौटिल्य केवल 63 अक्षर एवं चार पदों का वर्णन करता है। पाणिनि 64 एवं सुबन्त-तिडन्त दो ही पदों का उल्लेख करता है। सायण अपने तैत्तिरीय ब्राह्मण भाष्य में कहता है कि नाम, आख्यात, उपसर्ग, निपात और चतुष्पद व्याख्या श्रौत है, जिनका यास्क भी अनुसरण करता है, यद्यपि वे पाणिनि विहित नहीं हैं। कौटिल्य ने पाणिनि का अनुसरण न किया, इससे सिद्ध है कि पाणिनि की तब तक जड़ नहीं जमी थी, जिसे इन्हें प्राचीन और प्रामाणिक माना जाता। अपितु पाणिनि, बुद्ध के समकालीन मस्करी (पाणिनि) का उल्लेख करता है। 'आर्यमंजुश्रीमूलकल्प' (जायसवाल, इम्पिरियल हिस्ट्री, पृष्ठ 15) कहता है कि वररुचि, नंद का मंत्री था तथा पाणिनि इसका प्रेमभाजन था। बौद्ध साहित्य में इसे बौद्ध बतलाया गया है। (देवसहाय त्रिवेद, प्राकमौर्य, पृष्ठ 163)

पाणिनि  की पुस्तक को केवल व्याकरण न समझना चाहिए। लेनिनग्राद के सोवियत प्रोफेसर टी. शेरबात्स्की ने उसका बयान करते हुए उसे ‘इन्सानी दिमाग की सबसे बड़ी रचनाओं में से एक’ बताया है। आज भी पाणिनि संस्कृत व्याकरण पर प्रमाण माना जाता है, हालांकि बाद के वैयाकरणों ने उसमें और बातें जोड़ी हैं और उसकी अपने ढंग से व्याख्याएं की हैं। यह एक दिलचस्प बात है कि पाणिनि ने यूनानी लिपि की चर्चा की है। इससे पता चलता है कि हिन्दुस्तान और यूनान के बीच सिकंदर के पूरब जाने से पहले ही किसी-न-किसी तरह का संपर्क हो चुका था। (जवाहरलाल नेहरू, हिंदुस्तान की कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, 1988, पृष्ठ 153) 

कहा जाता है कि पिंगल ने छंदःशास्त्र के लिए जो काम किया वही काम पाणिनि ने व्याकरण के लिए किया। उन्होंने पिंगल-छंदः-सूत्र की रचना की है। उसे चन्द्रगुप्त एवं बिन्दुसार का समकालीन बताया गया है। (सुरेश चन्द्र बनर्जी, कंट्रिब्यूशन ऑफ बिहार टु संस्कृत लिटरेचर, के. पी. जायसवाल शोध संस्थान, पटना, 1973, पृष्ठ 2) यदि 'अशोकावदान'  विश्वस्त माना जाय तो बिन्दुसार ने अपने पुत्र अशोक को पिंगल नाग के आश्रम में शिक्षा के लिए भेजा था। (देवसहाय त्रिवेद, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 163) सूत्र की रचना इसलिए नहीं हो रही है कि शब्द-भण्डार की कमी है, बल्कि इसलिए भी कि कई पीढ़ियों से प्राप्त और संचित ज्ञान को आगे की पीढ़ी को सौंप देना है। इस पूरी प्रक्रिया की सफलता के लिए आवश्यक था कि कम से कम शब्दों का इस्तेमाल हो। वैयाकरणों के संबंध में तो परंपरा से यह अनुश्रुति चली ही आ रही है कि आधी मात्रा भर कम कर देने से वह उतना ही हर्ष मनाता है, जितना कि पुत्रोत्सव के उपलक्ष्य में : 'अर्धमात्रालाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणाः'। वैयाकरण पाणिनि की महत्ता इस बात में भी है कि उन्होंने बहुत छोटे-छोटे सूत्रों के माध्यम से अपनी बात कही है। वे इतने छोटे हैं कि एक मात्रा तक निकाले नहीं जा सकते।

व्याडि (व्याडि नाम से दो विद्वान का पता चलता है। इनमें से प्रथम को सौनक का शिष्य एवं विकृतिवलि का लेखक बताया जाता है। उसका काल पाणिनि से पहले, अर्थात् करीब चैथी शती बताया गया है। इस व्याडि ने 'व्याडिय-संग्रह' की रचना की थी जिसे व्याडि द्वितीय ने पाणिनि के व्याकरण की रोशनी में इसे संशोधित किया। व्याडि द्वितीय को दो पुस्तकों-व्याडिय कोष एवं व्याडिय लिंगानुशासन का लेखक होने का श्रेय प्राप्त है। (सुरेश चन्द्र बनर्जी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 2) पाठान था और अपने मामा पाणिनि के वंश का प्रमाता था, क्योंकि इसे भी दाक्षोयण कहा गया है। इसने लक्षश्लोकों का संग्रह तैयार किया, जिसे पतंजलि (यह निश्चय नहीं हो पाया है कि वैयाकरण पतंजलि और ‘योगसूत्र’ को रचनेवाले पतंजलि एक ही हैं कि दो हैं। वैयाकरण की तिथि तो निश्चित रूप से मालूम है कि ईसा से पहले की दूसरी सदी है। कुछ लोगों की राय है कि योगसूत्र का रचयिता दूसरा ही है, जो इसके दो-तीन साल बाद हुआ है। (जवाहरलाल नेहरू, हिंदुस्तान की कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, 1988, पृष्ठ 247-248, पादटिप्पणी संख्या-1) अत्यंत आदर और श्रद्धा की दृष्टि से देखता है। (पाणिनि 2. 3. 66) भर्तृहरि के 'वाक्यपदीय' में भी कहा गया है कि संग्रह में 14,000 पदों में व्याकरण है। कुछ विद्वानों का मत है कि पतंजलि ने संग्रह के ऊपर ही भाष्य किया, क्योंकि प्रथम सूत्र ‘अथशब्दानुशासनम्’ जिस पर पतंजलि भाष्य करता है, न तो पाणिनि का ही प्रथम सूत्र है और न वार्तिक का ही। 

वररुचि कात्यायन गोत्र का था। इन्हें कात्यायन भी कहा जाता है। इन्होंने पाणिनि सूत्रों पर वार्तिक लिखा। वार्तिकों की कुल संख्या 5032 है, जो 'महाभाष्य' में पाये जाते हैं। वार्तिककार कात्यायन न केवल 'अष्टाध्यायी' का प्राश्निक था वरन् पाणिनि की क्षत्रिय पोषक नीति का शत्रु भी था। (भगवतशरण उपाध्याय, भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, पी. पी. एच., नई दिल्ली, 1973, पृष्ठ 24) कैयट अपनी महाभाष्य टीका में 34 और वार्तिकों का उल्लेख करता है। पाणिनि पश्चिम का था और कात्यायन पूर्व का। अतः भाषा की विषमता को दूर करने के लिए वार्तिक की आवश्यकता हुई। नन्द की सभा में दोनों का विवाद हुआ था। 

पतंजलि को 'महाभाष्य' का लेखक तथा पाटलिपुत्र के आसपास का निवासी बताया गया है। 'महाभाष्य' में पाटलिपुत्र का इतना अधिक उल्लेख है कि कोई सहज ही निष्कर्ष निकाल सकता है कि उक्त पुस्तक का सम्पूर्ण नहीं भी तो अधिकांश भाग इसी शहर की धरती पर रचा गया था। (जे. एन. समादार, ग्लोरिज ऑफ मगध, के. पी. जायसवाल रिसर्च इंस्टीट्यूट, मार्च 1990, पृष्ठ 24, पाद टिप्पणी संख्या 13) 'महाभाष्य' में हमें ‘चन्द्रगुप्त-सभा’ एवं ‘पुष्यमित्र-सभा’ जैसे पद के उल्लेख प्राप्त होते हैं। यह भी जानकारी मिलती है कि प्रसिद्ध नगर महिष्मती से भी वह परिचित था। (सुरेश चन्द्र बनर्जी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 2) वह पुष्यमित्र शुंग का समकालीन था। (देवसहाय त्रिवेद, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 134) पतंजलि व्याकरण में ही नहीं राजनीति में भी वार्तिककार कात्यायन का विरोधी था। वह क्षत्रिय-शत्रु (इस विषय पर विस्तृत अध्ययन के लिए देखें, राजू रंजन प्रसाद, प्राचीन भारत में प्रभुत्व की खोज : ब्राह्मण-क्षत्रिय संघर्ष के विशेष संदर्भ में, पीएच. डी. थीसिस, पटना विश्वविद्यालय, पटना, 2006, अप्रकाशित।) और पुष्यमित्र का स्रष्टा था, इससे वह पाणिनि और कात्यायन दोनों का विरोधी था। (भगवतशरण उपाध्याय, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 24)

पतंजलि ने पाणिनि के संस्कृत व्याकरण की टीका लिखी। यह टीका, जो ‘महाभाष्य’ के नाम से मशहूर है, उतनी ही प्रामाणिक मानी जाती है, जितना कि पाणिनि का ग्रंथ। शेरबात्स्की ने लिखा है कि हिन्दुस्तान की आदर्श वैज्ञानिक कृति पाणिनि का व्याकरण और पतंजलि का ‘महाभाष्य’ है। (जवाहरलाल नेहरू, हिंदुस्तान की कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, 1988, पृष्ठ 247) महाभाष्य पद-योजना तथा शब्दों के विकास का एक प्रभावशाली अध्ययन ही नहीं है, अपितु वह, अप्रासंगिक रूप से, उस समय के इतिहास पर उपयोगी सामग्री भी प्रस्तुत करता है। (रोमिला थापर, भारत का इतिहास (हिंदी), राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, चतुर्थ संस्करण : 1985, पृष्ठ 93)