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Thursday, October 1, 2026

भारतीय साहित्य-संस्कृति की महत्त्वपूर्ण संख्याएँ

तीन टिकट, महा विकट

भारतीय संस्कृति में तीन की संख्या को अमंगलसूचक माना गया है। एक लोकप्रचलित कहावत भी है-'तीन टिकट, महा विकट'। इस तीन की विकटता आज नई नहीं है। प्राचीन ज़माने में तो तीसरी शादी तक को अमंगलसूचक ठहराया गया है। इसीलिए तीसरा विवाह करनेवाले पुरुष के लिए पहले मदार से विवाह करने का विधान किया गया है, ताकि तीसरी पत्नी चौथी हो जाए। 'चतुर्थादि-विवाहार्थं तृतीये$र्कम् समद्वहेत् (आप्टे, संस्कृत हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 110) राजा दशरथ की तीन रानियां थीं। तीसरी से पहले दशरथ की मदार से शादी हुई थी अथवा नहीं, नहीं मालूम लेकिन उनके जीवन में बड़ा ही अमंगल रहा। आज के 'दशरथ' सबक लें तो भला हो।

किन्तु तीन की संख्या को अमंगलसूचक मानने की परंपरा की शुरुआत अवैदिक लगती है क्योंकि वेद तीन हैं और 'वेदत्रयी' कहलाते हैं। वैदिक साहित्य में अग्नि के तीन जन्म, तीन सिर, तीन शरीर एवं स्थान हैं। अतः यह भारतीय त्रयी का प्राचीनतम रूप है। (देवराज चानना (संपादक), ऋग्भाष्यसंग्रह:, मुंशी मनोहरलाल, पृष्ठ 291) अग्नि एक दिन में तीन बार खाता है। (वही, पृष्ठ 292)

वैदिक देवता अश्विनीकुमार का तीन की संख्या से खास सम्बन्ध है। ऋग्वेद के प्रथम मंडल, सूक्त 34, मन्त्र 1-9 में अश्विनीकुमार को तीन के साथ संबद्ध दिखाया गया है। उनसे तीन बार (प्रातः, मध्यान्ह, सायं) आने की प्रार्थना की गई है। अश्विनीकुमार के रथ में तीन पहिये लगे हैं। रथ में अवलम्बन के लिये तीन खम्भे लगे हैं। वे उस रथ से तीन बार रात्रि में और तीन बार दिन में गमन करते हैं। उनसे यह भी प्रार्थना है कि वे यज्ञ में दिन में तीन बार मधुर रसों से सिंचन करें तथा प्रातः, मध्यान्ह एवं सायं तीन प्रकार के पुष्टिवर्धक अन्न प्रदान करें, अनुयायी जनों को तीन बार सुरक्षित करें, उन्हें तीन बार तीन विशिष्ट ज्ञान कराएं। सुखप्रद पदार्थों को तीन बार हमारी ओर पहुंचायें। यह भी कि हमारी बुद्धि को तीन बार देवों की स्तुति में प्रेरित करें, तीन बार सौभाग्य और तीन बार यश प्रदान करें। अश्विनीकुमार को स्मरण कराया गया कि उन्होंने तीन बार दिव्य औषधियां, तीन बार पार्थिव औषधियां तथा तीन बार जल औषधियां प्रदान की हैं। तीन धातुओं (वात, पित्त, कफ) से मिलनेवाला सुख, आरोग्य एवं ऐश्वर्य भी प्रदान किया है। अश्विनीकुमार तीन बार यजन करने योग्य हैं, अतः उनसे यज्ञों में तीन बार आने और तीन ओर आसनों पर बैठने का आग्रह है। उनके निमित्त जलों से तीन बार तीन पात्र भर दिये गये हैं, हवियों को भी तीन भागों में विभाजित किया गया है। अश्विनीकुमार तीनों लोकों की रक्षा करते हैं। इसलिए 'हे अश्विनीकुमारो! आपके तीन छोरवाले रथ के तीन चक्र और एक ही आधार पर स्थापित होनेवाले तीन स्तम्भ कहाँ हैं?'

अष्टादश पुराणेषु...

यद्यपि सम संख्या को अशुभ माना गया है, किंतु अठारह की संज्ञा/संख्या भारतीय साहित्य-संस्कृति में काफी लोकप्रिय है। पुराण अठारह हैं, स्मृतियां अठारह हैं, महाभारत में अठारह पर्व हैं, और गीता में अठारह अध्याय हैं। महाभारत की लड़ाई भी अठारह दिनों तक अठारह अक्षोहिणियों के बीच चली। ब्राह्मणों के गोत्र भी अठारह ही कहे जाते हैं। (डी डी कोसांबी, मिथक और यथार्थ, पृष्ठ 20)। 'ईश उपनिषद भी अठारह पद्यों का एक छोटा-सा संग्रह है।' (राहुल सांकृत्यायन, दर्शन दिग्दर्शन, पृष्ठ 391) ज्योतिष के प्रवर्तक अठारह आचार्य हैं। अन्य विषयों के भी अठारह आचार्यों का उल्लेख मिल जाया करता है। राजशेखर ने 'काव्य-मीमांसा' के आरंभ में काव्य-विद्या के अठारह अंग और उसके अठारह आचार्य बताये हैं। राजशेखर ने इस वृहद ग्रंथ को अठारह अध्यायों में पूरा किया था। एकमात्र उपलब्ध प्रथम खंड 'कविरहस्य' के भी अठारह अध्याय ही कहे जाते हैं। (हजारीप्रसाद द्विवेदी, मध्यकालीन बोध का स्वरूप, पंजाब यूनिवर्सिटी, मार्च 1970, पृष्ठ 89) कभी-कभी जातियों और प्रकृतियों की संख्या भी 18 बतलाई जाती है। विद्याओं की संख्या भी अठारह मानी जाती है। महाकवि श्रीहर्ष ने राजा नल के बारे में लिखा है कि इन्होंने अठारह विद्याओं का अध्ययन किया था। (डॉक्टर कृष्णदेव उपाध्याय, भारतीय लोक-विश्वास, हिन्दुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद, 1991, पृष्ठ 239)

इस तरह 18 एक पारंपरिक पद है जिसका प्रयोग कई संदर्भों में होता है। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, पृष्ठ 33)

Tuesday, September 15, 2026

भारत की गाय संस्कृति

वैदिक काल में गाय का आर्थिक महत्त्व था। यह वस्तु की कीमत भी व्यक्त करती थी, इसलिए वस्तु विनिमय पद्धति के दौर में गाय विनिमय का भी साधन थी। गाय आरंभिक दौर में पालतू बनाये गए पशुओं में से एक है। जिस तरह आज किसी 'विशिष्ट'अतिथि के आगमन पर मुर्गा, खस्सी आदि का मांस खिलाते हैं, वैदिक काल में 'ब्राह्मण' अथवा 'विशिष्ट' अतिथि के स्वागत में गायें मारी जाती थीं। (ब्लूमफील्ड, अमेरिकन जर्नल ऑव फिलोलॉजी, पृष्ठ 17, 426; वेदिक इंडेक्स, पृष्ठ 15) ये विशिष्ट अतिथि प्रायः ब्राह्मण और देवता होते थे, क्योंकि गोमांस-भक्षण के साथ किसी की सामाजिक हैसियत जुड़ी हुई थी। आप कह ले सकते हैं कि गोमांस-भक्षण पर एक तरह से ब्राह्मणों का एकाधिकार था। 'ऋग्वेद' में देवताओं के लिए बैल का माँस पकाने की ओर कई संकेत किये गये हैं; उदाहरणार्थ, इंद्र कहता है-'मेरे लिए 15+20 बैल पकाते हैं।' (ऋग्वेद 10/86/14, 10/27/2)। 'ऋग्वेद' में आया है कि अग्नि के लिए घोड़ों, बैलों, सांडों, बांझ गायों एवं भेड़ों की बलि दी गयी है- 'यस्मिन्नश्वास ऋषभास उक्षणो वशा मेषा अव सृष्टास आहुताः। कीलालपे सोमपृष्ठाय वेधसे हृदा मतिं जनये चारुमग्नये।।' (ऋग्वेद, 10/91/14) याज्ञवल्क्यस्मृति (1/109) ने ब्राह्मण अतिथि के लिए एक बड़े बैल एवं बकरे को काटने की व्यवस्था दी है। फिर यह श्रुतिवाक्य है कि मित्र एवं वरुण के लिए अनुबंध्या (बांझ गाय) काटी जानी चाहिए। (पी वी काणे, धर्मशास्त्र का इतिहास, द्वितीय भाग, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, 1992, पृष्ठ 873) 'अतिथि' को ऋग्वेद में 'गोघ्न' अर्थात 'गाय की हत्या करनेवाला' कहा गया है। ठीक इसी तरह की बात आज हमारे गांव-घर में भी सुनने को मिलती है। मेरे आसपास एक कहावत मशहूर है-'मांस-भात घरैता खाय, हत्या लेले पाहुन जाय'। 

कहने की जरूरत नहीं कि गोमांस को लेकर वैदिक संस्कृति के आचार्यों के बीच लंबी बहस चली है। कुछ ने तो इसकी पाबंदी को अनिष्टकारी तक बताया है। खैर, तो वैदिक काल में आर्थिक महत्त्व के चलते गाय को न मारे जाने की बात भी मिलती है। गौ को 'अघ्न्या' (ऋग्वेद 1/164/27 एवं 40, 4/1/6, 5/83/8, 8/69/21, 10/87/16) भी कहा गया है, जिसका अर्थ निरुक्त (10/43) ने यों लगाया है-'अघ्न्या अहन्तव्या भवति अघघ्नी इति वा', अर्थात 'वह जो मारे जाने योग्य नहीं है।' कभी-कभी अघ्न्या शब्द धेनु के विरोध में भी प्रयुक्त हुआ है (ऋग्वेद 4/1/6, 8/69/2), अतः यह तर्क उपस्थित किया जा सकता है कि ऋग्वेद के काल में दूध देनेवाली गायें काटे जाने योग्य नहीं मानी जाती थीं। इसी तर्क के आधार पर गायों के प्रति प्रशंसात्मक सूक्तों का भी अर्थ लगा सकते हैं। (यथा ऋग्वेद 6/28/1-8 एवं 8/101/15 एवं 16)।

'ऋग्वेद' (8/101/15-16) में गाय को रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, आदित्यों की बहिन एवं अमृत का केंद्र माना गया है और ऋषि ने अंत में कहा है-'गाय की हत्या न करो, यह निर्दोष है और स्वयं अदिति है।' ऋग्वेद (8/101/16) में गाय को देवी भी कहा गया है। इससे प्रकट होता है कि गाय क्रमशः देवत्व को प्राप्त होती जा रही थी। दूध के विषय में गाय की अत्यधिक महत्ता, कृषि में बैलों की उपयोगिता तथा परिवार में आदान-प्रदान एवं विनिमय संबंधी अर्थनीतिक उपयोगिता एवं महत्ता के कारण गाय को देवत्व प्राप्त हो गया। अथर्ववेद (12/4) में भी गाय की पूतता (पवित्रता) मानी गयी है। ब्राह्मण ग्रन्थों से पता चलता है कि तब तक गाय की बलि दी जाती थी।

ऋग्वेद में 16 बार गाय को 'अघ्न्या' अर्थात 'न मारे जाने योग्य' कहा गया है। स्वाभाविक है कि लाभकारी गाय को कौन मारना चाहेगा? अलाभकारी अर्थात बच्चा न देनेवाली गायें मारी जाती थीं। जैसे आज अलाभकारी गायों को किसान पंडिजी को दान में दे देते हैं अथवा हल जोतने के काम में लगा दिया जाता है। किसानों के पास इसके तर्क हैं। बताते हैं कि हल में लगाने से 'नाठी' गायें भी बच्चे जनने लगती हैं। अपने गांव के इन किसानों की बुद्धि मुझे भाजपा नेताओं की बुद्धि से ज्यादा व्यावहारिक लगती है।

गाय का आर्थिक महत्त्व होने की वजह से संस्कृत भाषा के अधिकतर शब्द भी 'गो' शब्द से बने मिलते हैं। बौद्ध काल में चूकि गहन खेती होने लगी, पशुधन की जरूरत महसूस हुई। इसलिए बौद्ध धर्म के प्रवर्तक बुद्ध ने 'युग की मांग' को देखते हुए अहिंसा पर जोर देना शुरू किया। बुद्ध की अहिंसा में भी गाय ही की प्रधानता रही क्योंकि बैल उसी से प्राप्त हो सकते थे। अहिंसा में बुद्ध का विवेक शामिल था। उसने मरे हुए जानवर का मांस खाने से लोगों को कभी नहीं रोका। बुद्ध एवं बौद्ध भिक्षा में मांस भी स्वीकार करते थे। सूअर का मांस खाकर बुद्ध के मरने की बात हम जानते हैं। यह अहिंसा बाद में रूढ़ि बन गई और गाय को पूजने की 'अविवेकी परम्परा' ने जन्म लिया। आज गाय माता- पिता से ज्यादा पूज्य हो गयी है। माता-पिता वृद्धाश्रम खदेड़ दिये गये हैं और गोमाता हमारे ड्राइंग रूम, हमारे दिमाग में बैठी हैं। हमें समय रहते समझना होगा कि मनुष्य से पशु को श्रेष्ठ बताना पशुता है, मनुष्यता नहीं।

गाय का महत्त्व हमारे धर्मग्रंथों में भी वर्णित है। भैंस आदि जानवरों से हमारे धार्मिक साहित्य के लेखक परिचित नहीं थे, इसलिए वह महत्त्व उन्हें न मिल सका। आर्य घोड़े से परिचित थे, इसलिए घोड़ा भी महत्त्व का हुआ। घोड़े भी खाए जाते हैं। गाय चूँकि ब्राह्मणों को दानस्वरूप भी दी जाती थी, गाय और ब्राह्मण एक हो गए। दोनों ही 'अवध्य' हैं, पूज्य हैं। जो धर्मग्रन्थ बौद्ध धर्म के बाद लिखे गए, ऐसा कहते हैं। वेद आदि में ऐसा नहीं है। यह सब बौद्ध प्रभाव में, और मुसलमानों के आगमन के बाद 'इस्लाम की प्रतिक्रिया' में हुआ। आज भी जो गोमाता की राजनीति हो रही है, उसमें 'प्रेम' नहीं, 'घृणा' ही है।

गाय की चिंता किसे है?

पांडेय बेचन शर्मा उग्र की एक कहानी है जिसका शीर्षक 'मूर्खा' है। कहानी में गुलाबो अम्मा हैं जिनके तीन बेटे हैं-रामेश्वर कांग्रेसी, कामेश्वर कम्युनिस्ट और दामोदर हिन्दूसभाई। कम्युनिस्ट लड़के कामेश्वर ने कभी तीस रुपये में एक गाय खरीदी थी। बूढ़ी हो जाने पर 'अर्थ-पिशाच-युग के प्राणी' अर्थात कम्युनिस्ट को गाय अनुपयोगी लगने लगती है। अतः वह उसे कसाई के हाथों बेच देने की गुलाबो अम्मा से अनुमति चाहता है। कांग्रेसी बेटा रामेश्वर भी अम्मा को समझाता है, 'अम्मा, जमाना महंगाई का है और इस गाय पर रुपया-सवा रुपया रोज़ सर्फ़ा पड़ जाता है।' (श्रेष्ठ रचनाएं, पृष्ठ 32) हिंदूसभाई दामोदर सबसे चपड़ निकला। 'उसने तय किया गुलाबो अम्मा के सो जाने पर, आधी रात में गाय को नगर की सीमा से बाहर हाँक आने का।' (पृष्ठ 32) हिंदूसभाई लड़का सब पर बीस पड़ा। उसने खीझ भरे स्वर में कहा, 'उसके (गाय के) मारे सारे घर में गंदगी, जिधर देखो गोबर ही गोबर। सीधे से तुम इसे कभी न निकालतीं, सो मैंने सोचा रातोंरात बाहर हाँक आऊँ।' (वही) (हिंदूसभाई बेटे की बात से 'स्वच्छता अभियान' चला रहे भाजपाई की याद आती है।) उस घर में केवल गुलाबो अम्मा ही है जो लाभ-हानि, उपयोगिता-अनुपयोगिता के तराजू पर तौले बगैर संबंधों को जीना जानती है। कहानी में गाय प्रतीक भर हो सकती है, असली कथा तो बूढ़ी हो चली गुलाबो अम्मा की ही लगती है। अम्मा कहती है, 'यह भी परिवार का प्राणी है, काल-गति से वैसे ही कमजोर बनी हुई, जैसे कि मैं हूँ।' (वही)

फेसबुकिया गोभक्ति

मेरे पड़ोस में एक राय जी रहते हैं। पटने की चालू जुबान में दूध बेचनेवाले को लोग राय जी कहते हैं। राय जी के पास देशी-विदेशी मिलाकर छह गाय हैं। सुबह चार बजे से ही गायों की सेवा से उनकी दिनचर्या शुरू होती है और रात दस बजे के बाद समाप्त होती है जब वे सो चुके होते हैं। उनका उठना-बैठना, सोना-जागना सब गाय ही के हिसाब से होता है। गाय से ज्यादा वे गाय के गोबर से घिरे होते हैं। सड़े गोबर और गोमूत्र की दुर्गन्ध से पड़ोसी हिंदुओं की नाक फटी जाती है। सब राय जी से चिढ़े रहते हैं। वे इनके दूध का भी सेवन नहीं करते। सुधा और राज का पाउच खरीदकर लाते हैं। ग्राहक बिना बच्चेवाली गाय का दूध लेना पसंद नहीं करते और बच्चे राय जी के लिए साक्षात विपत्ति हैं। गाय अगर बछिया जनमती है तब तो ठीक। साल दो साल की सेवा के बाद राय जी को एक अतिरिक्त गाय हाथ आ जाती है। लेकिन गोमाता ने अगर बछड़े को जन्म दिया तो राय जी की परेशानी बढ़ जाती है। एक ग्राहक का दूध तो बछड़ा ही गटक जाता है। खुद के बच्चे को दूध के लाले पड़ जायेंगे। गाय के बच्चे के मुंह में नहीं, राय जी के बच्चे के मुंह में जाब लगेंगे। इसलिए राय जी 'फेसबुकिया गोभक्ति' भूलकर जीवन का बीजगणित अपनाने को बाध्य होते हैं। बछड़े को दूध के बदले माड़ मिलना शुरू हो जाता है। एक तो अब के भात में माड़ के यूँ ही दर्शन नहीं होते। फिर एक से अधिक बछड़े रहे तो गौपुत्र को हवा पीकर ही जीवन गुजारना पड़ता है। हवा पीकर कोई कितने दिन जीवन की नैया खे सकता है? गौपुत्र बेचारे असमय ही जीवनलीला समाप्त कर लेते हैं।

Saturday, September 12, 2026

हिंदी संस्कृति की जमीन

वागर्थ (सितंबर, 2025) पलटना शुरू किया तो संपादकीय लेख पर नजर गयी। शीर्षक है-'हिंदी संस्कृति की जमीन'। पत्रिका के संपादक और इस लेख के लेखक शंभुनाथ हैं। वे भारतीय नवजागरण पर 'साधिकार' विचार करते रहे हैं। पत्रिका में लिखते हैं : "1857 की घटना के बाद अंग्रेजों ने भारत में समाज सुधार को प्रोत्साहन देना बंद कर दिया। विधवा पुनर्विवाह (1856) उनका आखिरी सुधार था। उन्हें भय था कि सामाजिक सुधार से भारत के लोग पुरानी खाइयों से मुक्त हो जाएंगे तो वे एक होकर औपनिवेशिक सत्ता के लिए खतरा बन जाएंगे।" (पृ. 9) 

उपर्युक्त पंक्तियों में उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध के भारत की बड़ी सतही समझ है। भारत में अंग्रेज व्यापारिक कंपनी के रूप में आए थे। सामाजिक चेतना में ये इंग्लैंड के सबसे पिछड़े तबके के प्रतिनिधि थे, इसलिए हमें इस भ्रम से मुक्त रहना होगा कि इनके द्वारा भारत में किये जा रहे परिवर्तन समाज-सुधार की उदात्त भावना से प्रेरित थे। दरअसल, उनके परिवर्तन बाजार-निर्माण से प्रेरित थे। अठारहवीं-उन्नीसवीं शती का भारत अंग्रेजी माल का बेहतर उपभोक्ता नहीं था। एक जड़ समाज बेहतर उपभोक्ता हो भी नहीं सकता। जिस उन्नीसवीं शती के नवजागरण/हिंदी नवजागरण की हम बात करते हैं, किसी भी हिंदी पत्र के ग्राहक सौ की संख्या तक नहीं पहुंच पाये। पत्र की बिक्री सरकारी खरीद और संपादकों की इस गारंटी पर निर्भर थी कि वे घर-घर जाकर पत्र बांच आया करेंगे। एक उन्मुक्त या उदार समाज ही बाजार की वकालत कर सकता है। जातियों में बंटे समाज का व्यक्ति अव्वल तो बाजार/शहर से दूर ही रहता है, अगर किसी मुसीबत में आ भी गया तो अपना सत्तू लेकर आता है, ताकि बाजार की चीज खाकर उसे जाति-धर्म गँवाने की नौबत न आये। आरम्भ ही से हिन्दू धर्म बाजार विरोधी रहा है। इतिहास में झांकें तो प्राचीन भारत में बौद्ध धर्म का उद्भव और विकास बाजार के लिए समाज को खोलने का संघर्ष है। अकारण नहीं है कि बुद्ध, अम्बपाली (आज की भाषा में बाजारू स्त्री) का आतिथ्य स्वीकार करते हैं। इतना ही नहीं, बुद्ध शहरों की यात्रा करते हैं और नोट करने लायक बात है कि किसी शहर ही में उन्होंने अपनी मृत्यु की कल्पना/इच्छा की थी। अंग्रेज भी इसी बाजार के घोड़े पर सवार थे। यह अर्थहीन बात है कि उनके समाज-सुधार से भारतीय समाज की खाइयां कम हो रही थीं। इस तथाकथित सुधार ने जिस शिक्षित वर्ग/समाज का निर्माण किया था, वह अंग्रेजी राज का समर्थक था। बंगाल का मध्यवर्ग 1857 में अंग्रेजों के पक्ष में तो था ही, हिंदी का लेखक भी महारानी की प्रशस्ति और 'शोक-प्रकाश' लिख रहा था।

Monday, October 11, 2010

गंगा , गंगा-स्नान और भारतीय संस्कृति


गंगा पवित्रता का पर्याय समझी जाती रही है। गंगा को पवित्र मानकर पूजा करने अथवा उसमें स्नान करने की प्रथा की कब शुरुआत हुई, इसका ठीक-ठीक विवरण देना एक मुश्किल काम है। ऋग्वेद में गंगा की सिर्फ एक बार चर्चा है। ऋग्वेद की ‘गंगा’ सरस्वती है। फिर भी हम यह मान सकते हैं कि लगभग उत्तर वैदिक काल में गंगा महत्त्वपूर्ण हो चली थी। पवित्रता की यह पूर्वपीठिका थी। निश्चित रूप से गंगा में स्नान करने की प्रथा को एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में मान्यता इसके बाद ही प्राप्त हुई होगी।

गंगा जीवन का पर्याय है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में लिखा है कि ‘अकाल के दिनों में लोगों को गंगा की पूजा करनी चाहिए।’ महाभारत में गंगा-जल की महिमा का वर्णन इस तरह किया गया है-‘सभी पवित्र जलों में गंगा जल सबसे पवित्र है, देवताओं के लिए जैसे अमृत है मनुष्यों के लिए गंगा-जल का वही महत्त्व है।’ इतिहासकार डेरियन ने ‘गंगा-मिथक और इतिहास’ में लिखा है कि नील नदी को छोड़कर विश्व में और कोई नदी नहीं है जो गंगा जैसी महत्त्वपूर्ण स्थिति को प्राप्त कर सकी हो। इसकी ख्याति न सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में भी फैल चुकी थी। सिकंदर महान गंगा को ही पृथ्वी का अंत मानता था। गंगा ही के आकर्षण ने उसे हिन्दुस्तान की धरती तक खींचकर लाया।

हमारी संस्कृति में गंगा का इतना महत्त्व है कि इसने भारतीय कला के विविध रूपों को भी प्रभावित किया, क्या साहित्य और क्या मूर्तिशिल्प-सब इससे प्रभावित हुए हैं। बंगाल में ढेर सारी कविताएं गंगा को आधार बनाकर लिखी गई हैं। वहां के जीवन में गंगा को विशेष महत्त्व प्राप्त है। जीवन से लेकर मृत्यु तक हर पल गंगा उनके काम आती है। बंगाल में बच्चों का जब उपनयन संस्कार किया जाता है तो उसे तीन दिनों तक अपने घर से बाहर नहीं निकलना होता है तथा रोटी एवं गंगा-जल के सहारे ही जीना पड़ता है। आधुनिक काल में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने के पर लोग गंगा के किनारे पहुंचकर बाल-दाढ़ी बनवाते हैं, स्नानादि एवं अन्य कर्म करते हैं। ऐसा करना मृतक की मोक्ष-सिद्धि हेतु अत्यावश्यक माना जाता है।

गंगा का ‘मिथक’ एवं ‘इतिहास’ दोनों में बराबर का हिस्सा है। जिन दिनों हिन्दुस्तान की धरती पर अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ बड़ी-बड़ी लड़ाइयां लड़ी जा रही थीं, गंगा ‘मिथक से इतिहास’ और ‘इतिहास से मिथक ' का रूपांतरण झेल रही थी। आंदोलनकारी आंदोलन शुरू करने से पहले गंगा में स्नान करते थे, उससे एक तरह का नैतिक बल एवं आत्मविश्वास अर्जित करते थे।

भारतीय दर्शन-प्रणाली में आस्था एवं भक्ति का एक सबल पक्ष रहा है। हमारी आस्था धर्मग्रंथों में वर्णित ‘पुराण कथाओं’ एवं मिथकों के आधार पर निर्मित होती रही है। यहां सिर्फ हिन्दू धर्मग्रंथों ही की बात नहीं है बल्कि बौद्ध अथवा जैन साहित्य का भी अगर अध्ययन करें तो पायेंगे कि गंगा के प्रति एक अजीब आस्था है लोगों के मन में। हिन्दू धर्म में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की अवधारणा है। हमारा धर्म इन्हीं की बदौलत शासित होता है। मोक्ष की कामना और उसकी प्राप्ति प्रत्येक मनुष्य का धर्म है, अगर उसकी अप्राप्ति हाथ लगी तो मनुष्य तन में जन्म लेना सर्वथा बेकार गया। गंगा-जल में स्नान करना एवं दान-दक्षिणा देना दुनिया के मायाजाल से ऊपर उठने अथवा कहें कि मोक्ष-प्राप्ति का एक उत्तम साधन है।

इस संसार में जन्म लेकर मनुष्यों को भगवत-स्मरण और स्नान-दानादिक करना, यही मुख्य धर्म है क्योंकि बड़े-बड़े पर्वों में स्नान-पूजा-व्रत दानादिक करने से पाप नष्ट होते हैं और मुक्ति मिलती है। पर्व और व्रत इत्यादि तो अनेक हैं और नित्य ही स्नानादिक का बड़ा फल है परंतु मार्गशीर्ष, कार्तिक, माघ, वैशाख, सब महीनों में उत्तम गिने जाते हैं। इसमें भी कार्तिक स्नान का विशेष महत्त्व है। हिन्दी पुनर्जागरण के कवि भारतेंदु ने इसकी महत्ता का बखान कुछ इस तरह किया है-

‘माधव कातिक माघ की पूनो परम सुनीत।
ता दिन गंगा न्हाइयै करि केशव सों प्रीति।।’

आश्विन शुक्ल एकादशी से आरंभ करके जो कार्तिक में जितेन्द्रिय होकर व्रतादिक कर गंगा में प्रातःस्नान करता है वह मुक्तिभागी होता है और उसको यमराज का भय नहीं होता। दूसरी ओर जो लोग कार्तिक में स्नान व्रतादिक नहीं करते वे मंदबुद्धि हैं, उन्हें किसी पुण्य का फल नहीं मिलता। कार्तिक में गंगा-स्नान के समान न कोई धर्म है, न अर्थ है, न काम है, न मोक्ष है, न दान है। इसीलिए जो लोग दूर से चलकर गंगा-स्नान करने आते हैं उनको कदम-कदम पर ‘अश्वमेध’ एवं ‘वाजपेय’ (वैदिक यज्ञ) का फल मिलता है।

गंगा की पवित्रता को ध्यान में रखते हुए स्कंद-पुराण में लिखा है कि इसमें तेरह प्रकार के कर्म नहीं करने चाहिए। शौच, कुल्ला, जूठा फेंकना, मल-मूत्र त्याग करना, तेल लगाना, निन्दा, प्रतिग्रह, रति, दूसरे तीर्थ की इच्छा तथा दूसरे तीर्थ की प्रशंसा, वस्त्र धोना, उपद्रव आदि सारे कर्म नहीं करना है। अगहन मास की पूर्णिमा के समान दूसरा कोई पर्व नहीं है। यह बात स्कंद-पुराण के ‘मार्गशीर्ष माहात्म्य ' में लिखी है। अगहन की पूर्णमासी को जो स्नानादि नहीं करते वे साठ हजार बरस तक रौरव वास करते हैं। गहड़वाल नरेश गोविन्द चन्द्र देव के कमौली ताम्र-पत्र में ‘श्रीमद् वाराणस्यां गंगायां स्नात्वा’ वाक्य मिलता है। तात्पर्य यह है कि दान करने से पूर्व गंगा नदी में स्नान करना आवश्यक था। निम्नलिखित उद्धरण इसे और भी स्पष्ट करते हैं-

‘विधिवत् स्नात्वा देव मनुज मुनि भूत पितृ
गणास्तपंयित्वा; वासुदेवस्य पूजां विधाय
कुशलता पूत करतलोदक पूर्वम’ (इंडियन एंटीक्वेरी 15, पृष्ठ 8)

और भी-

‘पुण्य तीर्थोदकेन विधिवत् स्नात्वा देव मनुज
पितृन् संतर्प्य भास्कर पूजा पुर सर-
भवानी पतिमभ्यर्च हुतभुज हुत्वा राहुग्रस्ते
दिवाकरे नाना गोत्रेभ्योः नाना प्रवरेभ्यो नाना
नामेभ्यो ब्राह्मणेभ्यः कुशलता पूतेन
हस्तोदकेन स्वस्ति वाचन पूर्वम संकल्पित
भूमः सम्बन्धे शासनी कृता प्रदताः ’ (वही, भाग 4, पृष्ठ 158)

भारत में गंगा नदी की भी देवकोटि में गणना कर ली गयी है। विद्यापति ने गंगा को पवित्र, सुन्दर एवं मनोरम माना है। उन्होंने गंगा की स्तुति में कुछ पदों की रचना की है। अकबरी दरबार के प्रमुख कवि गंग ने गंगा की स्तुति की है। रहीम का गंगा- भक्ति संबंधी निम्नलिखित दोहा बहुत ही प्रसिद्ध है-

‘अच्युत चरण तरंगिनी, शिव सिर मालति माल।
हरि न बनायो सूरसरि, कीजौं इन्दव भाल।। '

गोस्वामी तुलसीदास ने मानस के बन्दना प्रकरण में सरस्वती के साथ ही सुरसरिता की भी बन्दना की है-

‘पुनि बन्दौ शारद सुरसरिता, युगल पुनीत मनोहर चरिता।
मज्जन पान पाप हर एका, कहत सुनत हर एक अविवेका।। '

रीति काव्य के प्रमुख कवि पद्माकर ने ‘गंगालहरी ' नामक एक स्वतंत्र काव्य की रचना की थी। इसमें 56 कवित्तों में गंगा की महिमा का गान किया गया है। इसमें ब्रजभाषा के लालित्य और अलंकार सौष्ठव का सुंदर सामंजस्य मिलता है। पद्माकर के बाद कुशल मिश्र, अखैराम, रसिक सुन्दर, लेखराज आदि अनेक कवियों ने गंगा की महिमा का गान किया है, किंतु आधुनिक काल के दो प्रमुख कवियों-भारतेंदु हरिश्चन्द्र और जगन्नाथदास रत्नाकर ने देव नदी के विविध रूपों का जिस रोचक शैली में वर्णन किया है वह निश्चय ही श्लाघ्य है। भारतेंदु ने दास्य भाव से गंगा का स्मरण किया है। उन्होंने सत्य हरिश्चन्द्र नाटक में काशी की गंगा का यथार्थपरक वर्णन किया है।

पद्माकर और भारतेंदु की ही परंपरा में रत्नाकर ने ‘गंगावतरण’ और ‘गंगा लहरी’ नामक काव्यों की रचना की। ‘गंगावतरण’ का कथानक वाल्मीकि रामायण पर आधारित है। ब्रह्मलोक से पृथ्वी पर गंगा के उद्भव का रोला छन्द में बहुत सरस वर्णन मिलता है। ‘गंगा लहरी’ एक मुक्तक काव्य है जिसमें गंगा की महिमा का उल्लेख किया गया है।

दूसरी ओर कबीर हैं-

‘चली कुलबोरनी गंगा न्हाय।
सतुवा कराइन बहुरी भुंजाइन, घूंघट ओटे भसकत जाय।
गठरी बांधिन मोटरी बांधिन, खसम के मूंडे दिहिन धराय।
विछुवा पहिरिन औंठा पहिरिन, लात खसम के मारिन धाय।
गंगा न्हाइन जमुना न्हाइन, नौ मन मैल लिहिन चढ़ाय।
पांच पच्चीस के धक्का खाइन, घरहूं की पूंजी आइ गंवाय।’

कबीर की रुक्षता भिखारी ठाकुर के यहां मिठास बनकर आती है। गंगा-स्नान का एक दृश्य यहां भी-

‘चलऽ गोरिया करे गंगा असननवाँ।।
सारी चोली पेन्हऽ करऽ सब अभरनबाँ,
तेही पर सोभी सोना चाँदी के गहनवाँ।।
गते गते बोलऽ ना तऽ सुनी मरदनवाँ।।
खाये खातिर बान्धऽ नून सतुआ पिसनवाँ।
बने त बनालऽ तू झटपट पकवनवाँ,
मिठरस चाहीं कछू राह के भोजनवाँ।
सुरसरि जल भरि हरि दरसनवाँ,
करिके भिखारी कहे घुरे के मकनवाँ।। '

समकालीन कविता के एक महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर ज्ञानेन्द्र पति ने तो अपने संग्रह का नाम ही रखा है- गंगा - तट ।
गंगा सचमुच हिन्दुस्तानी तहजीब का हिस्सा बन चुकी है। इसीलिए नेहरु की ‘अंतिम अभिलाषा ' थी कि उनके अस्थि-भस्म को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाये ताकि वे संपूर्ण भारत का हिस्सा बन सकें। गंगा ने भारत की धरती पर हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच कोई भेद नहीं किया है। गंगा सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल है। गंगा हिंदुस्तान में हिंदुस्तानी तहजीब की खास हिस्सा है जिसको निर्मित करने में सारे धर्मों के लोगों का साझा सहयोग है। ऐसे वक्त में राही मासूम रजा की ‘गंगा और महादेव ' कविता की याद आ रही है जिसमें उन्होंने लिखा है-

‘मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझको कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो
लेकिन मेरी रग-रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है
मेरे लहू से चुल्लू भरकर महादेव के मंुह पर फेंको
और उस योगी से कह दो-
महादेव !
अब इस गंगा को वापस ले लो
यह ज़लील तुर्कों के बदन में गढ़ा गया
लहू बनकर दौड़ रही है। '

Friday, August 13, 2010

कवि का चेहरा

देवी प्रसाद मिश्र
आलोचना के अंक 91 में युवा कवि देवीप्रसाद मिश्र की ‘मुसलमान’ नामक कविता छपी है जिसकी कुछ खास स्थापनाओं पर आपत्ति करके शानी ने नवभारत टाइम्स में उसे राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दिया। असद जैदी ने भी विरोधपूर्ण बात कही है। कुछ ने इसे ‘साम्प्रदायिक’ कविता की संज्ञा दी है। किन अर्थों में लिया जाए, यह कविता पर पूरी बहस के बाद ही तय होगा। फिलहाल इतना तय है कि यह न तो इतिहास की सच्चाइयों को उद्घाटित करती है और न ही साम्प्रदायिकता के विरोध में मोर्चाबंदी कर पाती है।

कविता में जो द्वंद्व उभरकर आया है वह व्यक्ति का-खुद कवि का अंतर्विरोध है। कवि को न तो इतिहास की कोई स्पष्ट समझ है न तो समाज को देखने का सही नजरिया है। इसलिए इतिहास में वर्णित मिथकों का जिक्र करके प्रगतिशीलता का मुखौटा लगाने की कोशिश में वह असफल हो जाता है। बजाए इसकी, प्रगतिशीलता के आइने में उनका रोबीला साम्प्रदायिक चेहरा बेपर्द हो आता है। कवि इतिहास के मिथकों में फंसकर खुद नये मिथक गढ़ने शुरु कर देता है। कविता की पंक्ति एक बड़े झूठ को स्थापित करने की कोशिश से प्रारंभ होती है। कवि ने लिखा है-‘उन्होंने अपने घोड़े सिंधु में उतारे/और पुकारते रहे हिंदू! हिंदू!! हिंदू!!!/बड़ी जाति को उन्होंने बड़ा नाम दिया।’ कवि को शायद यह मालूम नहीं कि सिर्फ सिंधु प्रदेश को मुसलमानों ने हिंदू कहा। किसी बड़ी जाति या समुदाय को उन्होंने हिंदू से संबोधित नहीं किया था।

हिंदुस्तान में जब मुसलमानों का आगमन (आक्रमण नहीं क्योंकि इसी अंदाज में आर्य भी आए थे) हुआ तो यहां के निवासियों के साथ बेशक उनकी झड़पें हुईं जिनमें लोगों को अपनी जानें भी गंवानी पड़ीं। हत्या उनका कहीं से भी लक्ष्य नहीं था। असलियत तो यह है कि ‘वे मृत्यु के लिए नहीं लड़ते थे।’ वे निर्माण के लिए बेचैन थे। पीछे की पंक्ति को अगर इसके साथ मिलाकर देखा जाए तो थोड़ी रोशनी मिल सकती है। ‘उनकी मुट्ठियों में घोड़ों की लगामें/और म्यानों में सभ्यता के/नक्शे होते थे।’ सवाल उसके निर्माण की चाहत से है। इस सवाल के उठते ही कवि उनके आगे ‘वे मुसलमान थे’ का पर्दा टांग देता है और अंधेरे में सब कुछ रफा-दफा हो जाता है। कवि ने उन्हें निर्माण की प्रक्रिया से अलग काटकर मुसलमान बने रहने के सार्वकालिक सत्य के साथ जोड़ दिया। यह कवि की जाग्रत चेतना है जो कभी अनजाने में नहीं हो रहा।

भारत में आगमन के बाद मुसलमान हिन्दुस्तानी तहजीब के एक अंग बन चुके थे। आपस में लोग इतने घुल-मिल गए थे कि प्रायः उन्हें पता ही नहीं लगता था कि वे मुसलमान थे या नहीं थे। अजीब बात है, जिसने भारत पर आक्रमण करके मंदिरों को लूटा, सोना-चांदी अपने देश उठा के ले गए, जो इतिहास के पूरे कालखंड में एक मुसलमान की तरह रहे वे अपने वंश एवं अतीत को भूल क्यों गए ? उनके अलग एवं स्वतंत्र अस्तित्त्व को किसने खतरा पहुंचाया ? भारत पर आक्रमण उन्होंने मुसलमान की हैसियत से किया था। कुछ दिनों बाद उनकी वह पहचान लोप होती नजर आई (कवि को)। किसी का इतिहास खत्म न हो जाए इसलिए कवि उसके अतीत की ओर ध्यान देता है, उसे गौरवान्वित करता है। फिर कवि को अपनी ईमानदारी एवं साफगोई का गुमान भी है। उनका ऐलान है-‘यदि सच को सच की तरह कहा जा सकता है/तो सच को सच की तरह सुना जाना चाहिए।’ इसलिए वे हिंदू-मुसलमान यानी जनमानस की भावना के विरुद्ध यह घोषणा करते हैं कि ‘वे मुसलमान थे।’

कवि को इतिहास का कितना पुख्ता ज्ञान है वह कवि की खास चिंता से आपको मालूम हो जाएगा। उनका मानना है कि ‘वे न होते तो उपमहाद्वीप के संगीत को सुननेवाला खुसरो न होता/वे न होते तो पूरे देश के गुस्से से बेचैन होनेवाला कबीर न होता/वे न होते /तो भारतीय प्रायद्वीप के दुख को कहनेवाला गालिब न होता।’ यह तो ठीक उसी तरह की बात हुई जैसे अंग्रेज न होते तो हम आजाद न होते। इस देश में मुसलमान क्यों आए ? कवि का जवाब है क्योंकि वे आ सकते थे। क्या यह नियम कबीर या गालिब के होने के साथ लागू नहीं होता ? मुसलमानों के आगमन से ही कबीर, गालिब पैदा हुए यह इतिहास की कौन-सी व्याख्या है ? असलियत तो ये है कि ये सारे लोग सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की उपज थे। मार्क्सवादी अंदाज में कहा जाए तो ‘हिस्टॉरिकल डेवलपमेंट’ की नियति थे।

कवि के पास एक घटिया दर्जे की सोच है कि मुसलमानों में मुसलमान होने की वजह से डर है। कवि की अजीब कल्पना है कि मुसलमान रहते हिंदुस्तान में हैं और भाई-बंदे तथा रिश्तेदार पाकिस्तान में खोजते हैं। कविश्री की नजरों में में वे डरते कम अकड़ते ज्यादा हैं। यह कवि का साम्प्रदायिक दुराग्रह है। ध्यान रहे कि कवि ने बार-बार अपनी तरफ से पाठक को स्मरण कराने की यह कोशिश की है कि ‘वे मुसलमान थे।’ इसके प्रति एक जबर्दस्त आग्रह है उनमें। दूसरी ओर कवि ने यह भी स्वीकारा है कि ‘वे चट्टान और ऊन की तरह सच थे/वे सभ्यता का अनिवार्य नियम थे।’ ऐसे में कवि से हमारी अर्ज हो सकती है, ‘वे मुसलमान थे’-इसके बाद भी वे किसी सभ्यता के अनिवार्य अंग बने हुए थे ? क्या वह मुसलमानी सभ्यता थी ? अगर यही सच है तो इस सभ्यता का नियम नहीं नियंता थे। और अगर वे हिंदुस्तानी तहजीब के अंग थे तो क्या बेशक मुसलमान भी थे ?

पंडित जवाहरलाल नेहरु ने ‘हिंदुस्तान की खोज’ में लिखा है कि हिंदुस्तानी तहजीब के निर्माण में मुसलमानों का महत्त्वपूर्ण योगदान था। मुगलकाल में अकबर ने राजपूतों के साथ विवाह-संबंध स्थापित करके यह साबित कर दिया था कि वे अब मुसलमान नहीं हैं। वे हिंदुस्तानी हैं। प्रेमचंद अपने जमाने में हिंदुओं एवं मुसलमानों की संस्कृति में कोई स्पष्ट विरोधाभास खोजने में असमर्थ रहे, बल्कि उन्होंने ‘साझी संस्कृति’ की बात की। उन्होंने लिखा कि दोनों की समस्या एक-सी है। दोनों ही अशिक्षा, भुखमरी और गरीबी से एक तरह से पीड़ित थे। दोनों की संस्कृति भूख की संस्कृति है।

कविता के अंत में कवि का जयनाद है कि ‘वे मुसलमान हैं।’ यानी हिंदुस्तान की भूमि पर अब भी वे विदेशी ही बने हैं। जिसने हिंदुस्तानी तहजीब के निर्माण में पूरा सहयोग दिया हो वो विदेशी कैसे हो सकता है ? विदेशी होने के लिए बाहर से आगमन ही काफी है तो आर्य को भी, जो मूल निवासी होने का दावा करते हैं, इसी कोटि में रखा जाना चाहिए। कवि ने यह घोषित करके कि ‘वे मुसलमान हैं’, जनवादी एवं प्रजातांत्रिक ताकतों पर करारी चोट की है। सारा इतिहास क्षण भर में लुप्त हो जाता है।

कहना न होगा कि जहां लोग राष्ट्रीय संस्कृति के निर्माण की ओर अग्रसर होने की बात करते हैं वहीं देवीप्रसाद मिश्र जैसे तथाकथित प्रगतिशील कवियों के साम्प्रदायिक मंसूबे से सारे किए पर पानी फिर जाने जैसा होता है। यह गजब का विरोधाभास है।
प्रकाशन: नवभारत टाइम्स, (पत्रों का कॉलम गांधी मैदान में) पटना, 16 नवंबर 1990। 

Wednesday, July 7, 2010

संस्कृति और इतिहास बोध

संस्कृति पर विमर्श प्रकारांतर से मानवजाति पर विमर्श है, क्योंकि इसके केन्द्र में वही है। अपने व्यापकतम अर्थ में संस्कृति वह सब कुछ है, जिसका निर्माण मानवजाति ने किया है और कर रही है-श्रम के औजारों से लेकर घर-गृहस्थी की वस्तुओं तक, रीति-रिवाजों और रहन-सहन के ढंग, तौर-तरीकों से लेकर विज्ञान और कला, धर्म और अनीश्वरवाद, नैतिकता और दर्शन तक। किंतु केवल इतना ही कहें तो संस्कृति की हमारी अवधारणा अथवा परिभाषा एकांगी और साथ ही भ्रामक भी होगी। इसलिए इतना भर याद रखना जरूरी है कि मानव संस्कृति का रचयिता है और साथ ही उसकी रचना भी। ऐसा कहते अथवा मानते हुए हम अपना इतिहास बोध जाग्रत कर रहे होते हैं। अर्थात् यह इतिहास का विवेक है जो हमें बताता है कि मानवजाति संस्कृति का केवल रचयिता ही नहीं है बल्कि वह खुद भी उसी की निर्मिति है। और कह लें कि हमारा इतिहास बोध भी ठीक-ठीक इसी रूप में संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।

अगर संस्कृति शब्द की व्युत्पत्ति पर गौर करें तो यह संस्कृत के बहुत पास का निकलेगा। संस्कृत का शाब्दिक अर्थ है शिष्ट और सभ्य। जो शिष्ट अथवा सभ्य नहीं है, प्राकृत है, जंगली है। बर्बरता संस्कृति की परिधि से बाहर की चीज है। जांगल युग हमारी संस्कति का पोषक नहीं, क्योंकि संस्कृति इस युग को अथवा बर्बरता की एक खास अवस्था को पारकर ही सृजित होती है। संस्कृत शब्द में संस्कार, संशोधन अथवा परिष्कार का भाव जुड़ा हुआ है। एक दूसरे तरीके से कहें तो अलगाव का भाव लिए हुए है। संस्कृत को प्राकृत से अलग करने की मुहिम शुरू हो चुकी है। भाषा के क्षेत्र में भी इसके गणित बिठाये जा रहे हैं। संस्कृत सिर्फ सभ्य और शिष्ट लोगों की भाषा बनी।

लोग अक्सर कहते पाये जाते हैं कि संस्कृत नाटकों में शूद्र और स्त्री समान रूप् से प्राकृत भाषा का प्रयोग करते पाये जाते हैं। संस्कृत केवल संभ्रांत वर्ग के लोग ही बोल पाते थे। वे इस तथ्य का हवाला भर देकर शांत हो लेते हैं। वे कभी नहीं कहते (अज्ञानतावश या भयवश ?) कि निम्न वर्ण (शूद्र) तथा स्त्रियों के संस्कृत भाषा का व्यवहार सिद्धांत रूप में भी वर्जित था। (इस विषय पर विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें ‘प्राचीन भारत में वर्ण व्यवस्था और भाषा’, जन विकल्प,)। नाट्यशास्त्र का लेखक भरतमुनि इसका प्रमुख सिद्धांतकार है। (संभव है, पंचम् वेद कहे जाने का यह भी एक आधार बनता हो।) प्राचीन भारत के इतिहास में यह वह काल है जब वर्चस्व की संस्कृति अपनी जड़ें जमा रही थीं। यहां हम अपनी सुविधा के लिए यह भी कह ले सकते हैं कि संस्कृत (संस्कृति एवं भाषा दोनों ही अर्थों में) वर्चस्व का भाव रहा है। वरना जिस देश में कुत्ता, सियार एवं हाथी तक के लिए संस्कृत संबोधन हैं वहां मनुष्य जाति के संभवतः सबसे बड़े वर्ग को संस्कृत बोलने से क्योंकर रोका जा रहा है ? आज भी महावत हाथी के साथ गच्छ, तिष्ठ जैसे संस्कृत क्रिया-रूपों के ही सहारे संवाद कायम कर पाता है। आज हमारे कुत्तों के नाम भले ही अंग्रेजी भाषा के हों लेकिन उनके संबोधन में उच्चरित शब्द अत्तु संस्कृत ही का है। संस्कृत भाषा के जानकार को पता है कि यह आदरार्थ प्रयुक्त है। अर्थात् आदर (सम्मान) में कहा गया शब्द जिसका भाषिक अर्थ है-‘आइए खाइए।’

संस्कृति के क्षेत्र में इस तरह के अलगाव की प्रक्रिया तब शुरू होती है जब विकास की एक खास अवस्था हम तय कर चुके होते हैं। उससे पहले ऐसा करना शायद संभव भी नहीं होता। हम अपने इतिहास के अनुभवों के आधार पर देखें तो साफ होगा कि जिस आर्य अथवा वैदिक संस्कृति पर हम गर्व करते हैं (इतिहास पर गर्व करने का हमें पूरा हक है), वह अपने प्रारंभिक दिनों में ऐसी कुछ भी नहीं थी। बल्कि कहना होगा कि आर्यों का भारत आगमन यहां के मूल निवासियों की संस्कृति की तुलना में एक पिछड़ा कदम था। इसलिए अपने आरंभिक दिनों में आर्यों को जहां-कहीं भी (भाषा तक में) बेहतर और अनुकरणीय हाथ लगता, उसे वे अपनाने में तनिक संकोच न करते। यहां तक कि दूसरों की पत्नियों और देवता तक को हड़प् ले जाने में कोई कोताही न बरतते। निस्संदेह आर्यों को भारतीय प्रदेशों में औरतों की कमी महसूस हुई होगी। नतीजतन आर्यों के कई देवता तक को बगैर पत्नी के जीवन गुजारने को अभिशप्त होना पड़ा। संभवतः इसी कारण गोरे आर्यों की काली संतानें पैदा हो रही हैं। काले वर्ण के ऋषियों की उस दौर में बाढ़ है। इन्हीं सब बातों को लिखने के लिए मुक्तिबोध की पुस्तक ‘भारत: इतिहास और संस्कृति ’ की प्रतियां जला दी गई थीं। आर्य-रक्त की शुद्धता का दावा करनेवाले लोगों को भारतीय संस्कृति का यह विमर्श अच्छा नहीं लगता। इससे श्रेष्ठता और शिष्टता वाला भाव जाता रहता है। वे संस्कृति को एक अत्यंत गोल-मटोल अर्थ में लेना चाहते हैं, जबकि इसकी अनंत परतें हैं। एक साथ कई रूपों और धाराओं में संस्कृति प्रवहमान रहती है। इन धाराओं की आपसी टकराहट और सम्मिलन की प्रक्रिया में ही संस्कृति जीवंत बनती और सवंर्धित होती चलती है। जिस संस्कृति और कौम में टक्कर और आत्मसातीकरण की द्वैत प्रक्रिया नहीं चल रही होती अथवा ठप पड़ जाती है, उसका नष्ट होना तय है। इतिहास बोध से संपन्न व्यक्ति को मालूम है कि मानवजाति द्वारा निर्मित ऐसी कितनी ही संस्कृतियां काल के गर्भ में विलीन हो गईं, क्योकि समय की धारा को अपने अंदर समाहित नहीं कर सकीं।

संस्कृति अपने को कई रूपों में व्यक्त करती है। परंपरा और रीति-रिवाज इनमें प्रमुख हैं। जिस तरह एक बहुलतावादी समाज में संस्कृतियों की बहुलता होती है, उसी तरह परंपरा की भी बहुलता होती है। कई परंपराएं एक ही कालखं डमें साथ-साथ जीवित होती हैं। इनकी आपसी टकराहट से ही नवीनता का उन्मेष होता है। संस्कृति को एक एंतिहासिक संदर्भ में, एक निश्चित ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखने का मतलब एक स्वस्थ और समग्र दृष्टिकोण पैदा करना होता है। यानी किसी देश अथवा जाति की संस्कृति का अध्ययन अथवा उसकी आलोचना प्रस्तुत करते हुए हमें मुख्य रूप से दो बातें-निरंतरता और परिवर्तन को रेखांकित करने का प्रयास करना होता है। निरंतरता और परिवर्तन की इस विछिन्न/अविछिन्न प्रक्रिया में परंपरा संस्कृति की स्मृति होती है। जिस तरह प्रत्येक राष्ट्र और जाति की अपनी स्मृति है, ठीक उसी तरह संस्कृति अपनी परंपराओं में बसती है। मनुष्य की स्मृति में सब कुछ कैद नहीं होता। बहुत कुछ छोड़ते जाते हैं और नया ग्रहण करते जाते हैं। ठीक जैसे आदमी पुराना भूलता और नया सीखता चलता है। लेकिन सब कुछ नहीं भूलता, जबकि भूलना भी काफी अर्थवान है। मनुष्य भूलने की क्षमता खो दे तो शायद सबसे बड़ा अनर्थ हो। संस्कृति भी परंपरा का त्याग करती चलती है और नवीनता का अंगीकार। यहां इतिहास बोध यह निर्णय देता है कि परंपरा हमेशा न तो त्याज्य है और न ही नवीनता हमेशा ग्राह्य। कालिदास जब मालविकाग्निमित्र में कहते हैं कि जो पुराना है वह सभी सुंदर नहीं है और न नया मात्र नया होने से ही निन्द्य है, तो इसी बात को वे भिन्न तरीके से कह रहे होते हैं। यह कालिदास का इतिहास जनित विवेक ही है जो परंपरा और नवीनता के बीच फर्क की पहचान करता है। किसी देश अथवा जाति के इतिहास में क्या ग्राह्य है और क्या अग्राह्य-इसका सम्यक फैसला हमारी इतिहास दृष्टि करती है। संस्कृति के अंदर सब कुछ बचा लेने लायक नहीं होता। बहुत कुछ समय की मार खाकर बेजान हो जाता है, इसलिए ग्राह्य-अग्राह्य का प्रश्न महत्वपूर्ण हो उठता है। परंपरा का वह हिस्सा जो जो वर्तमान के लिए अनुपयोगी और बेजान हो गया हो, त्याज्य है। परंपरा की ताबीज बनाकर रखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि न तो संपूर्ण सुंदर है, न नितांत असुंदर ही। उसमें सक्रियता भी है, प्रमाद भी, स्वार्थ भी है परमार्थ भी, संकीर्णता भी है, उदारता भी। इसलिए कालिदास का यह उद्गार कि पुराणमित्येव न साधु सर्व-जो समय के बोध में सना है, हमेशा याद रखने लायक है। परंपरावादियों के लिए तो और भी, क्योंकि अतीत का उनका यह कथन हमारी परंपरा का अभिन्न हिस्सा हो चुका है, और जो वर्तमान समय में भी उतना ही सटीक है।

किंतु कहना होगा कि अपनी ही उक्ति से कालिदास ने कोई खास नसीहत नहीं ली। उन्होंने उन्हीं वर्णाश्रम अर्थों की कीर्ति बखानी जो भारतीय संस्कृति पर कालिमा का टीका सिद्ध हो चुके थे। अलबत्ता कहीं-कहीं रोष अवश्य प्रकट किया है। उनकी शकुंतला पुरुष के अधिकारों पर व्यंग्य करती है, उनकी सीता वाच्यं त्वया मदवचनात्स राजा कहकर राम को संदेश भेजती है। परंतु वास्तव में यह विद्रोह नहीं, विद्रोह की विडंबना है। शूद्र तपस्वी शम्बूक के राम द्वारा रघुवंश में मारे जाने पर महाकवि की लेखनी में बल तक नहीं पड़ता, वह स्वयं उस तपस्वी को उसके अनाचार पर धिक्कारता है। कालिदास का इतिहास-बोध-विरोध कई बार आत्म-प्रताड़ना तक को जन्म देता प्रतीत होता है। धूत कहो अवधूत कहो जैसी पंक्ति वही लिख सकता है जिसने अपने नथूनों में वर्ण व्यवस्था की संड़ांध महसूस की हो।

अज्ञेय ने शम्बूक -वध का एक नया पाठ तैयार किया-‘मैंने शम्बूक की कथा पढ़ी है। मैं उसे कभी उस अर्थ में ग्रहण नहीं कर पाया, जिस अर्थ में मुझे समझायी जाती रही है। शम्बूक वेदाध्ययन करने जा रहा था कि यज्ञ करने जा रहा था, वर्णांतर कर्म का यह छोटा-सा अपराध (छोटा ही सही, अपराध तो है न ?) कदापि उस दंड का भागी नहीं था जो उसे मिला। इतना ही क्यों, यह प्रश्न कोई क्यों नहीं पूछता कि शूद्र की तपस्या में इतना बल था कि ब्राह्मण का बेटा मर जाये, तो ब्राह्मण का ब्राह्मणत्व का बल कहां चल गया था? क्या उसकी सीमा यही थी कि राजा के सामने जाकर रिरिया ले? क्यों नहीं राम ने भी उस ब्राह्मण से यह पूछा कि वह क्यों इतना हीनतेज हुआ? ’ अज्ञेय के लिए राम की तुलना में शम्बूक ज्यादा ग्राह्य है, क्योंकि शम्बूक स्थिति को, स्थितिशीलता को, परिवेश को बदलना चाहता है और राम उसे बनाये रखना चाहते हैं। संस्कृति की यह गतिशील व्याख्या इतिहास बोध और काल की मर्यादा से प्रेरित है। अत्यंत सपाट शब्दों में कह सकते हैं कि तात्कालिकता का दबाव है यह।

Saturday, March 14, 2009

भारतीय संस्कृति और दिनकर की आर्य दृष्टि


"आर्यत्व" अगर कुछ है...


बीसवीं शती पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत में भी प्रति-औपनिवेशिक चेतना अथवा प्रत्याख्यान रचने और विकसित करने की सदी रही है। इस सदी में भारत दो तरह के महायुद्ध में शामिल था। एक का स्वरूप सांस्कृतिक था तो दूसरे का राजनीतिक। दोनों एक दूसरे को पुष्ट करते अथवा जल प्रदान करते थे। सांस्कृतिक चेतना के उन्मेष-काल में भारतीयता की खोज जोर-शोर से शुरू हो चुकी थी। पूर्वी और पाश्चात्य दोनों ही ओर के विद्वान इस गंभीर कर्म को अंजाम देने में लगे थे। इस क्रम में भारत की जो तस्वीर बन रही थी वह काफी कुछ मिश्रित किस्म की थी। विदेशी लेखकों में ऐसे कई थे जिनके दिमाग में यह राष्ट्र अजीब-सी चीजों का मिश्रण था- सपेरों, नटों और रहस्यवादियों का देश। इनकी राय में भारत की सामान्य जनता घोर आध्यात्मिक जीव थी जो पेड़ की पत्तियां चबा कर और हवा पीकर गुजारा करती थी। विद्वानों का एक दूसरा वर्ग भी था जो इसकी प्रति-छवि रचने में रत था। विदेशी विद्वानों के साथ कई देशी विद्वान भी इस कर्म में लीन थे। नेहरू, निराला, दिनकर सभी भारत की खोज की रोमांचक यात्रा पर निकल चुके थे। लेखकों में नेहरू और दिनकर ने भारत को समग्रता में देखने की कोशिश की परंतु कहना होगा कि भारत को सबसे अधिक समग्रता में और स्पष्टता के साथ अकेले नेहरू ही देख सके।


दिनकर ने भारतीय इतिहास और संस्कृति को चार अध्यायों में बाँटकर देखा है जो भारतीय संस्कृति के चार अध्याय हैं। उन्हीं के शब्दों में लगभग दो वर्षो के अध्ययन के पश्चात् मेरे सामने यह सत्य उद्भासित हो उठा कि भारतीय संस्कृति में चार बड़ी क्रांतियाँ हुई है और हमारी संस्कृति का इतिहास उन्हीं चार क्रांतियों या इतिहास है। पहली क्रांति तब हुई, जब आर्य भारतवर्ष में आये अथवा जब भारतवर्ष में उनका आर्येतर जातियो से संपर्क हुआ। आर्यो ने आर्येतर जातियों से मिलकर जिस समाज की रचना की वही आर्यो अथवा हिन्दुओं का बुनियादी समाज हुआ और आर्य तथा आर्येतर संस्कृतियों के मिलन से जो संस्कृति उत्पन्न हुई वही भारत की बुनियादी संस्कृति बनी। इस बुनियादी भारतीय संस्कृति के लगभग आधे उपकरण आर्यो के दिए हुए हैं और उसका दूसरा आधा आर्येतर जातियों का अंशदान है। दिनकर का "आर्यत्व" (अगर ऐसा कुछ होता हो) इतना ही कहने से संतुष्ट न हुआ। इसलिए आगे वे और बढ़-चढ़कर लिखते हैं, असल में, भारतीय जनता की रचना आर्यो के आगमन के बाद ही पूरी हो गई और जिसे हम आर्य या हिन्दू सभ्यता कहते हैं, उसकी नींव भी तभी बाँध दी गयी। आर्यो ने भारत में जातियों और संस्कृतियों का समन्वय किया, उसी से हमारे हिन्दू समाज और हिन्दू संस्कृति का निर्माण हुआ।


दिनकर का भारतीय समाज-संस्कृति विषयक मूल्यांकन कई कारणों से गड़बड़ हुआ जान पड़ता है। अब्बल तो भारतीय संस्कृति का सत्य उद्भासित होने के लिए दो वर्षो का अध्ययन पर्याप्त नहीं माना जा सकता। मतलब यह कि अपने अत्यंत गंभीर कर्म के लिए दिनकर ने यथोचित ‘होमवर्क’ नहीं किया। दूसरे, जब वे हमारे हिन्दू समाज और हिन्दू संस्कृति कहते हैं तो आर्यो अथवा हिन्दूओं के साथ उनका एकात्मक संबंा जाहिर होता है। यही कारण है कि हिन्दू सभ्यता और विशेशकर आर्यो पर बात करते हुए वे एक संस्कृति चिंतक कम, उसके पैरोकार ज्यादा हो जाते हैं। यह दूहराना अनावश्यक सा प्रतीत होगा कि इतिहास वस्तुनिष्ठता और उससे भी ज्यादा निर्ममता की माँग करता है। सदास्था के लिए शायद यहाँ कोई जगह नहीं होती। अपने आरंभिक दिनों में दिनकर इतिहास के विधिवत छात्र रहे थे इसलिए उन्हें इतिहास की क्रूरता का अंदाजा तो होगा ही। अलबŸाा उससे सीख नहीं ली। हीगेल का कोई अप्रत्यक्ष प्रभाव रहा हो।


शुद्धता की चिंता और काले होते आर्य...


प्रस्थान बिन्दु यह है कि भारत में आर्यो का आगमन कई दृष्टियो से एक पिछड़ा हुआ कदम था। वे भारत में अर्थ-विचरणशील पशुचारियों के रूप में आये थे। उनका निर्वाह मुख्यतः पशु-उत्पादनां से होता था और कुछ समय तक पशुपालन ही उनका मुख्य व्यवसाय रहा। अतएव पशुओं के लिए चारागाह की खोज में वे भ्रमणशील होते। एक जगह टिककर जीने की आर्यो ने न तो अबतक कला सीखी थी और न ही उसने इसकी कभी जरूरत महसूस की थी। कृषि-कर्म के अभाव ने एक जगह जमने की उनकी बाध्यता ही समाप्त कर रखी थी, बल्कि शहरें, दुर्गो और स्थायी बनी बस्तियों को वे नष्ट कर रहे थे। आर्य संस्कृति की बात करते हुए हमें ध्यान में रखना चाहिए कि संस्कृति का शहर से कोई रिश्ता बनता है अथवा नहीं। भारतीय इतिहास में हुए शोधों-गवेषणाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि ऋग्वैदिक जमाने के आर्यो की कोई समरूप संस्कृति विकसित न हो सकी थी। पुरातत्व विज्ञान की भाषा में कहें तो उनके अपने कोई विशिष्ट प्रकार के वर्तन, औजार अथवा हथियार न थे। ऐसा कुछ भी न था जिसे आर्यो के साथ जोड़ा जा सके। भारत की भूमि पर आने के बाद आर्यो को जो कुछ भी हाथ लगता गया, उसे अपना बनाते गये।


सबसे दुखद और हास्यास्पद बात तो यह है कि उनकी अपने कहलाने वाली औरतें की आबादी में बहुत थोड़ी ही थीं। वैदिक देवताओं में कई ऐसे हैं जिन्हें आजीवन अविवाहित रहने का अभिशाप झेलना पड़ा है। आर्य देवता भी अधिकतर पुरुष हीं हैं, पर कुछ देवियाँ पहले के युगों से और पहले के लोगों से ली गई जान पड़ती है। यह बात भी मतलब से खाली नहीं है कि आर्यो के जीवन में झगड़े का अवसर मुख्य रूप से गायों एवं स्त्रियों की चोरी के कारण पैदा होता है। रामायण में सीता-हरण और महाभारत में भीष्म द्वारा तीन-तीन औरतों को उठा ले जाने की बात वैदिककालीन परिस्थितियों की स्मृति रही होगी। हमारे प्राचीन महाकाव्यों के ‘वीर’ स्त्रियों को उठाये अथवा चुराये बगैर ‘नायक’ घोषित नहीं हो सकते थे। जो ‘स्वंयवर’ की प्रथा के बहाने स्त्रियों की आजादी की बात करते हैं वे बताएँ कि एक स्त्री को प्राप्त करने के लिए हजारों की भीड़ में जो आपसी कठिन प्रतिदृंदिता होती थी वह किस बात की तरफ इशारा करती है। वर्णश्रम नियमों की सख्ती के बावजूद अनुलोम विवाह की सुविधा छोड़ रखी गई थी। रक्त की शुद्वता की तमाम चिंता एवं दावों के बावजूद गोरे आर्य काले होते जा रहे थे। आर्यो का यह भारतीयकरण अथवा अनार्यीकरण दिनकर को आर्य संस्कृति का फैलाव नजर आता है।


कहना होगा कि यह अकेले दिनकर की परेशानी नही है। दरअसल, भारत एवं यूरोप दोनो ही जगहों पर आर्यों को केन्द्र मे रखकर इतिहास लेखक का काम होता रहा है। इसमें यह भावकी काम करता रहा है कि हम आर्य जाति की संतान हैं। इसका स्वाभाविक नतीजा यह हुआ कि आर्यो से ताल्लुक रखनेवाली प्रत्येंक चीज को महिमा मजिल करने का रिवाज चल पड़ा। उदाहरण के तौर पर स्वयं आर्य शब्द को लिया जा सकता है। इस शब्द का सबसे पुराना अर्थ धुमन्तू अथवा पशुचारी या कि खानाबदोश रहा होगा। आर्य शब्द की व्यूत्यपित विद्वान तर धातु से बताते हैं और गमनार्थक/गत्यर्थक प्रयोग करते है। आर्य जब खेती करना सीख गये होगे तो पुरानी व्यत्पति से काम चलाना मुश्किल हो रहा होगा अतएव अट् धातु से इसे व्युप्तन्न बताया जाने लगा। अट् धातु का मतलब खेती करने से लिया गया। तब भी आर्य शब्द में "श्रेष्ठ" का भाव नही आया था। यह निश्चित रूप से आर्यो के विकासक्रम में अगले चरण का कमाल रहा होगा। इस चरण में आकर आर्य श्रेष्ठता बोध से भर गया। निश्चित रूप से यह वह काल रहा होगा जब सामाजिक स्तरीकरण तीखा और वर्ग-विभेद की जड़े गहरी हो रही होगी। इन तथाकथित श्रेष्ठ जनों की भाषा भी संस्कृत कहलायी "प्राकृत" अथवा "अपभ्रंश" नही। समाज में जब श्रेष्ठ और "हीन" लोगों का बँटवारा हो गया तो भाषा की दुनिया में भी एक लकीर खींच दी गई। संस्कृत को श्रेष्ठ भाषा का दर्जा दिया गया और प्राकृत को हीन भाषा का। यहाँ इस बात का रखने और विस्तार में जनों की शायद जरूरत नही है कि दोनों ही श्रेणी के लोगों के लिए सख्त हिदायत भी दी गई कि वे भासक अपनी ही भाषा का प्रयोग करें।


आर्य संस्कृति और दिनकर का अवैज्ञानिक बोध...


मजे की बात है कि आर्य केवल भारत में नही श्रेष्ठ घोषित हुए, बल्कि दुनिया के अधिकतर देशों में जिन्हें प्रथम दर्जे का नागरिक बनाया गया क्योंकि उन देशों में उनकी संतानों मौजूद थी। आर्यो के एक बडे़ उद्वारक मैक्स मूलर हुए। वे जर्मनी के रहनेवाले थे। वहाँ प्राचीन आर्य चिह्नों की पूजा होती रही है। हिटलर उसी का दम भरता था। इरान को तो सीधे-सीधे आर्य शब्द से जोड़ ही दिया गया है। बताया जाता है कि इरान की उत्पति "आर्यानामा" अर्थात आर्यों का देश से हुई है। क्या यह महज संयोग है कि मनुष्यों में आर्य श्रेष्ठ हुए और भाषाओं में आर्यमय भाषा-परिवार! यह एक स्थापित तथ्य है कि भारत के चारों भाषा परिवारों में सबसे ज्यादा काम आर्य भाषा-परिवार पर हुआ है।


आर्य संस्कृत बोलते थे कह सकते है कि संस्कृत बोलने वाले लोग आर्य (श्रेष्ठ) कहे जाते थे। इसलिए अकारण नही है कि आर्यों के साथ-साथ उसके द्वारा बोली जानेवाली भाषा संस्कृत के मामले में भी विद्धानों के बीच मुग्द्यता की स्थिति बनी रही है। इस भाषा की समृ़ित के गीत गाते विद्धान कभी नही थकते। खासकर वेदों की भाषा का वर्णन वे इस अंदाज में करते हैं मानो उसने विकास सारी मंजिले पार कर ली हों। दुनिया की किसी भी भाषा के क्रमिक विकास के चरणों एवं चिह्नों को स्पष्टता के साथ देखा-दिखाया जा सकता है। दुनिया की अन्य सभी भाषाओं की तरह संस्कृत का विकास बोल-चाल की भाषा से हुआ हैं इसके पर्याप्त संकेत वेदों की भाषा में देखने को मिलेगें। अगर आप गौर करें तो तो पायेंगे कि संस्कृत भाषा का विकास सामान्य से विशेष अर्थ की ओर, अनिश्चिता और व्यापक अर्थ से निश्चित और सीमित अर्थ की ओर हुआ हैं। उदाहरण के बतौर मृग शब्द को लिया जा सकता है जिसका मूल अर्थ पशु था जो मलमालम में आज भी सुरक्षित है, लेकिन संस्कृत में सामान्य अर्थ से विशेष अर्थ की ओर भाषा की प्रगति को कारण इसका अर्थ एक विशेष पशु हो गया।


वास्तव में मृग का मूल अर्थ का जिसे ढूँढा जाता था इसलिए उनकी संज्ञा मृग पड़ गई थी। मृगया में शिकार संबंधी अर्थ और मृगेन्द्र, मृगराज (पशुओं का राजा, सिंह) शाखा मृग में पशुमात्र का अर्थ अब भी सुरक्षित है। इस बात की संभावना है कि बर्बरता, वीरता या साहस के शिथिल हो जाने के कारण मनुष्यों ने भयंकर पशुओं की अपेक्षा हरिणों का शिकार करना आरंभ कर दिया हो। शिकार में अब केवल हरिण को ही ढूँढने के कारण मृग संज्ञा उनके लिए रूढ़ हो गई। यहाँ हमारा जोर इस बात पर है कि वैदिक संस्कृति अथवा आर्यों का संस्कृति की जो भौतिक एवं भाषिक संपदा है वह अपने विकास के शैशवकाल में हैं, निर्माण के क्रम में है। कहना होगा कि आर्य जिन-जिन चीजों के और जैसे-जैसे संपर्क में आ रहे है, उसकी अलग से पहचान कर रहे हैं और सबकों एक नया शब्द और नया अर्थ दे रहे है। एक समय था जब लगभग शताधिक चीजों के लिए महज एक शब्द ‘गो’ से काम चलाया जाता था। हैंरत अंग्रेज बात तो यह कि संस्कृति के पुरोधा अर्थात स्वयं मनुष्य के लिए भी कभी-कभी मृगशब्द ही से काम चलाया जा रहा है।


सार यह है कि भारत में आर्यो के आगमन से क्रांतिकारी परिवर्तन इस वजह से संभव न हुआ कि वे अपने साथ एक अंत्यत विकसित भाषा एवं भौतिक संस्कृति साथ लाए थे। ऐतिहासिक तथ्य तो यह है कि तुलना में आर्य लोग ईसा पूर्व की तीसरी सहस्त्राब्दी की उन महान नगरी में संस्कृति से श्रेष्ठ नही थे जिनपर उन्होने हमला किया और जिन्हें प्रायः नष्ट कर डाला। वस्तृतः जिस बात के लिए के लिए इन लोगों को विश्व इतिहास कि में इतना महत्व मिला है, वह थी इनकी बेजोड़ गतिशील, जो इन्हें मवेशियों के चल खाद्य-भंडार के रूप में, युद्ध में अश्व-रथ के रूप में और भारी माल ढोने के लिए बैलगाड़ी के रूप में प्राप्त हुई थी। इनकी मुख्य उपलब्धि यह थी कि इन्होंने ईसा पूर्व तीसरी सहस्त्राब्दी की महान नदी घाटी सभ्यताओं से दूर बसी हुई, अवरूद्ध तथा प्रायः पतनोन्मुख कृषक बिरादरियों के बीच के अवरोधों को बड़ी निर्ममता से नष्ट कर डाला।


साधारणतः आर्य और आर्य-पूर्व लोगों के मेल-जोल से नई आर्य भाषा के साथ, नई बिरादरियाँ बनीं। आर्यो में नया सीखने की अदम्य लालसा की जो उनके बड़ी काम आई। आरंभिक आर्यो में आर्य-पूर्व लोगों की भौतिक एवं भाषिक संस्कृति को अपनाने में न तो कोई हिचक है न झिझक। भाषा में इसके प्रमाण है आर्यो द्वारा दूसरी भारतीय भाषाओं से लिए गए शब्द। लेकिन आर्य संस्कृति के बारे में दिनकर की जो अवधारणा है उसके मूल में यह अवैज्ञानिक बोध है कि आर्य एक उन्नत एवं समृद्ध संस्कृति व भाषा के साथ आए और भारत की अन्य भाषाओं-संस्कृतियों को अधीन कर गये। अंग्रेजी उपनिवेशवाद से लड़ते हुए दिनकर लगता है जाने-अनजाने आर्य अथवा हिन्दुत्व का उपनिवेशवाद रचने की सीमा तक चले गये थे। आज विमर्श के इस नये दौर में ऐसी तमाम चीजों पर एक वस्तुनिष्ठ दृष्टि रखनी होगी तभी हम इतिहास की क्रूरता से किसी राष्ट्र अथवा जाति को बचा सकेंगे।