Sunday, October 17, 2010

प्रेमचंद : साम्प्रदायिकता और राष्ट्रवाद


कल इस लेख की दो पंक्ति मैंने फेसबुक पर दी थी। काफी प्रतिक्रिया हुई। मित्रों ने उद्धरणों की मांग की। उनकी यह मांग स्वाभाविक है। यह लेख इस रूप में कई साल पहले लिखा गया था। इसलिए आज इसको जांचने-परखने की भी जरूरत है। इस ख्याल से भी मित्रों के बीच प्रस्तुत करना जरूरी है।

भारत एक राष्ट्र नहीं था। राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया की शुरुआत 1857 की क्रांति के बाद होती है और राष्ट्रवाद की प्रथम अभिव्यक्ति सन् 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में होती है। इससे पहले हिन्दुस्तान कई छोटे-छोटे प्रदेशों में बंटा हुआ था और सारे लोग आपस में, संघर्ष में उलझे हुए थे, फलतः हमारा देश गुलाम हुआ। लोग इस मनोदशा के शिकार थे कि कोई राजा हो हमें क्या फर्क पड़ता है। पराधीनता की इस बेड़ी को मजबूत और अकाट्य बनाये रखने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने भारतीयों को धर्म, जाति एवं संप्रदाय के नाम पर बांटना शुरू किया। ध्यान रहे कि भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना में दलितों ने मदद पहुंचाई थी। धर्म एवं जाति के नाम पर लोगों को आपस में बांटकर शासन करने की नीति साम्राज्यवादियों की बड़ी पुरानी नीति थी। सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि आयरलैंड की जनता को भी उसने धर्म के नाम पर तोड़ा था। (रामविलास शर्मा, मार्क्स और पिछड़े हुए समाज , पृष्ठ 67)। अंग्रेज शासकों ने उसी पुराने फार्मूले का भारत में भी अमल में लाने की कोशिश की और नारा दिया, ‘फूट डालो और शासन करो।’ इसके उलट अंग्रेजों ने बहुत सारे ऐसे काम किए जिनसे अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया की सुगबुगाहट तेज हुई।

हिन्दुस्तान में जैसे-जैसे राष्ट्रवाद का विकास हुआ, हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष भी उसी हिसाब से बढ़ा। अब शायद यह अतीत की बात हो गई थी कि 1857 की क्रांति में हिन्दू एवं मुसलमानों ने अंग्रेजों के खिलाफ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया था। डा. अखिलेश कुमार ने अपनी पुस्तक कम्युनल रॉयट्स इन मॉडर्न इंडिया ' में सांप्रदायिक दंगों का संबंध कांग्रेस की स्थापना से ठीक ही जोड़ा है। आप कह ले सकते हैं कि भारत में राष्ट्रवाद एवं सांप्रदायिकता के उद्भव एवं विकास की लगभग एक ही प्रक्रिया रही है। ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ जिस नवजागरण का फल है, उस नवजागरण में हिन्दू नवजागरण और मुस्लिम नवजागरण साथ-साथ घटित हुए। (नामवर सिंह, बहुमत -3, पृष्ठ 5)। राष्ट्रवाद और हिन्दू जातीयता और मुस्लिम कौमियत, ये साथ-साथ पैदा हुईं। भारत में राष्ट्रवाद एवं सांप्रदायिकता दोनों जुड़वा भाई हैं। लगता है, सांप्रदायिकता राष्ट्रवाद की ही एक अपरिपक्व धारा है और राष्ट्रवाद सांप्रदायिकता का ही एक ब्यूटीफायड (संस्कृत, संस्कारित) नाम है। (राजू रंजन प्रसाद, बहुमत -3, पृष्ठ 40)।

यह एक सामान्य ऐतिहासिक तथ्य है कि भारतीय राष्ट्रवाद, अंग्रेजी साम्राज्यवाद की प्रतिक्रिया में पैदा हुआ है। इसलिए उसमें इसके अंतर्विरोध भी शामिल है। यह भारतीय राष्ट्रवाद का अपना अंतर्विरोध है, उसके निर्माण की प्रक्रिया का दोष। इस अंतर्विरोध का असर उस जमाने की राजनीति एवं संस्कृति जैसे तमाम मोर्चों पर देखने में आता है। इसलिए हिन्दी साहित्य के लेखकों का इससे बेअसर रहना बिल्कुल ही मुमकिन तथा वैज्ञानिक नहीं था। इसके असर से हम प्रेमचंद जैसे रचनाकार को भी मुक्त नहीं पाते हैं। वे कभी तो बहुत आगे निकले हुए प्रतीत होते हैं और कभी पीछे छूट गए से लगते हैं। तत्कालीन राजनीति में भी ऐसी दिलचस्प घटनाएं घटी हैं। रजनी पाम दत्त ने ठीक ही लिखा है, ‘कभी-कभी हम बहुत आगे निकल जाते थे, लगता था मानो आंदोलन ने अपनी मंजिल को पा लिया है लेकिन दूसरे ही क्षण उसका अंत समझौते की हार में होता था।’

प्रेमचंद इस दौर के अकेले सबसे बड़े साहित्यकार हैं जिन्होंने राष्ट्रीय एकता की समस्या को सबसे ज्यादा गंभीरता के साथ हल करने की कोशिश की है। इस क्रम में उन्हें सांप्रदायिकता, जाति-व्यवस्था और अंधविश्वास जैसी भयंकर बाधाओं से जमकर लोहा लेना पड़ा है। जब हम यह कह रहे होते हैं कि प्रेमचंद ने अपने साहित्य के माध्यम से राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास लिखा है तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता कि कांगेसी नेतृत्व में चले आंदोलन का उन्होंने तर्जुमा मात्र किया है। उनको पढ़ते हुए हम भारत के किसान आंदोलन, मजदूरों में अपने देश के प्रति सजगता एवं धार्मिक-सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ संगठित हो रही ताकतों से भी परिचित होते हैं। निश्चित रूप से ऐसी ताकतें कांग्रेस के बाहर की भी होती हैं।

प्रेमचंद : सांप्रदायिकता और राष्ट्रवादविषय को चुनते हुए हम काफी सतर्क हैं। हमारा प्रयास केवल इतना भर है कि प्रेमचंद पर अब तक जो लिखा गया है, विशेषकर जड़, यांत्रिक एवं कट्टर मार्क्सवादी आलोचना, उसके जाल से निकलकर वस्तुस्थिति की जांच हो, क्योंकि समय आ गया है कि हम अपनी गलतियों पर विमर्श करें और उससे आवश्यक सबक लें।

प्रेमचंद ने जो कुछ भी कहा, प्रगतिशीलता के आग्रह में लोगों ने उसे बेहिचक सही और तर्कसंगत मान लिया। प्रस्तुत आलेख में प्रेमचंद के इन्हीं वैचारिक अंतर्विरोधों की चर्चा है। ‘प्रगतिशील’ आलोचकों को अब तो मान लेना चाहिए कि प्रेमचंद के यहां सब कुछ स्पष्ट और तर्कसंगत नहीं है।

हिन्दू होने का अहसास और फिर हिन्दू धर्म पर गौरव, प्रेमचंद के संस्कार में कहीं किसी कोने में सदा के लिए बैठ गया लगता है। 1909 प्रेमचंद के लेखन का आरंभिक दौर है। सोजे-वतनअभी-अभी प्रकाशित हुआ था। इससे पहले उनके विचारों का एक संग्रह कलम, तलवार और न्यायशीर्षक से प्रकाशित हो चुका था। इन दोनों ही पुस्तकों में राजपूतों की गौरव-गाथाओं का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन है। हिन्दू होने का उनका यह ‘अहसास’ लगभग अंत तक कायम रहा। बाद के दिनों में भी ‘हिन्दू’ शब्द के साथ उनका वैसा ही रागात्मक संबंध कायम रहा। सन् 1925 के जनवरी के माधुरीमें प्रेमचंद लिखते हैं, हिन्दू जाति यदि अपने पुरुखाओं को किसी धर्म संग्राम में आत्मोत्सर्ग करते हुए देखकर प्रसन्न हो तो सिवाय इसके और क्या कहा जा सकता है कि इसमें वीर पूजा की भावना भी नहीं रह जो किसी जाति के अधःपतन का अंतिम लक्षण है।आगे वे और लिखते हैं, जब तक हम अर्जुन, प्रताप, शिवाजी आदि वीरों की पूजा और कीर्ति पर गर्व करते हैं तब तक हमारे पुनरुद्धार की कुछ आशा हो सकती है।कहना होगा कि प्रेमचंद के देश के पुनरुद्धार में हिन्दू जाति का पुनरुद्धार आवश्यक रूप से जुड़ा हुआ है।

महाराणा प्रताप, शिवाजी आदि इतिहास पुरुषों को राष्ट्रीय नायक के रूप में चित्रित करने का मतलब होगा मुसलमानों की संपूर्ण सत्ता को विदेशी करार देना। ऐसी स्थिति में प्रेमचंद साम्राज्यवादी इतिहासकारों के काल-विभाजन यथा हिन्दू काल, मुस्लिम काल एवं आधुनिक काल को ही पुष्ट करते नजर आते हैं। यह भारतीय इतिहास की अत्यंत ही नस्लवादी एवं सांप्रदायिक व्याख्या है।

भारत के संपूर्ण इतिहास को अगर देखने की कोशिश करें तो पता चलेगा कि यहां दोनों ही तरह की परंपराएं हैं, दोनों ही तरह के आदर्श हैं। एक तरफ अगर औरंगजेब, राणा प्रताप एवं ‘वीर’ शिवाजी हैं तो दूसरी तरफ अकबर एवं अशोक की महान और उदार परंपरा भी है। भारत के इतिहास में अकबर साझी संस्कृति का प्रतीक है, फिर भी अगर प्रेमचंद , शिवाजी की ही कीर्ति पर गर्व करते हैं तो बात सचमुच मतलब से खाली नहीं है। आज सांप्रदायिकता को हवा देनेवाली ताकतें इन्हें ही अपना आदर्श मानती हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बाल गंगाधर तिलक ने भी इन्हीं वीर नायकों को अपना आदर्श बनाया था जिसके फलस्वरूप सांप्रदायिक राजनीति की जड़ें मजबूत हुईं और राष्ट्रीय आंदोलन कमजोर हुआ। कहना न होगा कि आर. एस. एस. तिलक को अपना वैचारिक गुरु मानता है। इसलिए राष्ट्रीय आंदोलन का जो अंतर्विरोध रहा या फिर इसकी जिन मोर्चों पर हार हुई, उसका कारण बहुत हद तक उस विचारधारा को माना जा सकता है जिसे तिलक स्वीकार किये बैठे थे, और जिसे प्रेमचंद भी जोश में याद कर लेते हैं।

प्रेमचंद ने सांप्रदायिकता के खिलाफ स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहासकारों में सबसे ज्यादा और बेहद मजबूती के साथ लिखा है। लेकिन इस समस्या के बारे में ऐसा लगता है, उनकी समझ बहुत स्पष्ट और वैज्ञानिक नहीं थी। प्रेमचंद मानते हैं कि राष्ट्रीयता वर्तमान का कोढ़ है, उसी तरह जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़ सांप्रदायिकता थी। मार्क्सवादी आलोचक खगेन्द्र ठाकुर बहुत हाल तक मानते रहे हैं कि सांप्रदायिकता, आधुनिक युग की नहीं मध्यकाल की चीज है। (आलोचना -59)। दरअसल, राष्ट्रीयता एवं सांप्रदायिकता दोनों ही आधुनिक भारत की उपज हैं। इस तरह की गलती का मूल कारण है कि लोग सांप्रदायिकता एवं सांप्रदायिक तनाव दोनों को एक ही चीज मान बैठते हैं। सांप्रदायिकता औपनिवेशिक भारत की देन है जबकि सांप्रदायिक तनाव अथवा संघर्ष मध्य युग में भी था। (डा. अखिलेश कुमार की कृति 'कम्युनल रॉयट्स इन मॉडर्न इंडियाइस विषय की विस्तृत जानकारी के लिए देखें)।

प्रेमचंद यह भी लिखते हैं कि ‘दोनों संप्रदायों में कशमकश और सन्देह और घृणा की जड़ें इतिहास में हैं।’ लेकिन चूंकि इतिहास का समीकरण कुछ इस तरह का है कि वे मान बैठते हैं कि ‘मुसलमान विजेता थे और हिन्दू विजित।’ (प्रेमचंद के विचार , भाग-1, पृष्ठ 353)। तब वे यह भी सोचने को बाध्य होते हैं कि ‘मुसलमानों की तरफ से हिन्दुओं पर अक्सर ज्यादतियां हुईं।’ इसलिए हिन्दुओं की दिन-प्रतिदिन घटती हुई आबादी उनकी चिंता का कारण बनी। (वही)

सामान्यतः, सांप्रदायिकता के होने में इस ‘मिथ्या चेतना’ का प्रमुख हाथ है कि समान धर्म को माननेवाले लोगों के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक हित समान होते हैं, तथा एक धर्म विशेष के माननेवालों के हित दूसरे धर्म के अनुयायियों के हितों के सर्वथा विरोधी होते हैं। संप्रदायवादी इस विचारधारा को काफी तूल देते पाये जाते हैं कि हमारा देश छोटी-छोटी धार्मिक इकाइयों में विभाजित है अर्थात् वे विभिन्न धार्मिक समुदायों के स्वतंत्र अस्तित्व को काफी जोर देकर प्रचारित करना चाहते हैं। इस संप्रदायवादी चिंतनधारा के खिलाफ प्रेमचंद के लेखन में जबर्दस्त प्रतिवाद का अभाव खटकता है। एक जगह तो प्रेमचंद हिन्दू-मुसलमान के पृथक अस्तित्व को न केवल स्वीकार करते हैं बल्कि इस बात की घोषणा भी करते हैं कि यह अस्तित्व शाश्वत है। प्रेमचंद बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में लिखते हैं, हिन्दू और मुसलमान कभी दूध और चीनी थे, होंगे और होने चाहिए। दोनों की अलग-अलग सूरतें रहनी चाहिए और बनी रहेगी।(वही, पृष्ठ 355)। आधुनिक भारत की राजनीति में इसी ख्याल ने संप्रदायवाद के उद्भव को आधार प्रदान किया है। संप्रदायवादियों का मूलमंत्र है कि हिन्दू एवं मुसलमान दो भिन्न धार्मिक इकाइयां हैं। इसे स्वीकार करने में प्रेमचंद को कोई एतराज नहीं है।

दूसरी तरफ दिसंबर 1933 के जमानामें नेहरु को उद्धृत करते हुए प्रेमचंद ने लिखा है कि आज भारत में मुस्लिम और हिन्दू जनता में कोई वंशगत या सांस्कृतिक भेद नाम को भी नहीं है। अवध या बुंदेलखंड के किसी मुस्लिम या हिन्दू किसान में ऐसा कोई अंतर मिलेगा, जो एक को दूसरे से अलग कर दे।प्रेमचंद को पढ़ते हुए हमें कई दफा हिन्दुओं एवं मुसलमानों के वंशगत या संस्कारगत भेद का अहसास होता है। हिन्दू उनके लिए उदारता एवं सादगी का प्रतीक है जबकि मुसलमानों के लिए ठीक यही भाव नहीं है। गांव के बड़े-बूढ़ों के बीच अब भी हिन्दू बढ़े नेम से मुसलमान बढ़े कुनेम सेवाली बात प्रचलित है। हिन्दुओं में मांस, मुर्गी, अंडा आदि खाना आदर्श रूप में वर्जित है। मांसाहार करना ही मुसलमान होने के लिए पर्याप्त है। प्रेमचंद की रचनाओं के माध्यम से भी यह बात उभरकर सामने आती है।

14 जुलाई 1936 को प्रेमचंद की बच्चों के लिए एक कहानी आई थी-कुत्ते की कहानी । इसमें एक पात्र डफाली है जिसका कुत्ता जकिया है। डफाली चूंकि मांस खाकर अपना गुजारा करता था, इसलिए जकिया को भी लगभग रोज ही मांस मयस्सर हो जाता था। इस भाव को स्पष्ट करने में प्रेमचंद का ‘टिपिकल’ हिन्दू संस्कार अपनी छाप छोड़ जाता है। वे लिखते हैं, मगर भाई जकिया पक्का मुसलमान था रोज मांस खाता।वहीं प्रेमचंद पंडित जी के कुत्ते के लिए लिखते हैं, चूहों को खिला-खिलाकर जान से मार डालता था, पर खाता था। इस तरह प्रेमचंद के यहां हिन्दू-मुस्लिम के वंशगत या संस्कारगत भेद का हमें तीखा अहसास होता है।

जीवनपर्यंत प्रेमचंद गहरे वैचारिक अंतर्विरोध के बीच जीते हैं। वे सांप्रदायिकता की समस्या का हल ढूंढ़ नहीं पाते। हालांकि धर्म के फरेब को वे अच्छी तरह जानते थे। हिन्दू-मुसलमानों की राजनीतिक लीला भी उनसे छिपी न थी। इसलिए सांप्रदायिकता के कारणों में वे धर्म की बजाय जनता के बीच राजनीतिकरण के अभाव को प्रमुख मानते हैं। उन्होंने लिखा था, ‘हमारा दृढ़ संकल्प है कि ज्यों-ज्यों हमारा राजनैतिक विकास होगा, सांप्रदायिकता मिटती जायगी और आर्थिक समस्याएं उसका स्थान लेती जाएंगी।’ एक जगह वे बहुत साफ शब्दों में कहते हैं, ‘कल की लड़ाई आर्थिक होगी।’

साम्प्रदायिकता संबंधी विचारों के मामले में हम प्रेमचंद के यहां चिंतन की एक दूसरी धारा भी देखते हैं, जहां अभिजातवर्गीय दृष्टिकोण खुलकर सामने आता है। गांधीजी का मानना था कि अगर हमारे नेता आपस के द्वेष को भुला दें तो सांप्रदायिकता जैसी समस्याओं का अंत संभव हो सकता है। गांधीजी सांप्रदायिकता के मूल कारणों को खोज पाने में असमर्थ हैं, इसलिए उनके समाधान भी बिल्कुल सतही और भ्रमोत्पादक हैं। प्रेमचंद को भी इन नेताओं पर कुछ जरूरत से ज्यादा ही भरोसा है। वे मानते हैं कि सांप्रदायिकता को समाप्त करने के लिए ‘जरूरत सिर्फ इस बात की है कि उनके नेताओं में परस्पर सहिष्णुता और उत्सर्ग की भावना हो।’ ऐसा ख्याल इस मान्यता को प्रमाणित कर देता है कि सचमुच हमारा समाज हिन्दू, मुसलमान एवं सिक्ख जैसी इकाइयों में बंटा है। तब हम जाने-अनजाने संप्रदायवादियों के ही सिद्धांत कि एक समुदाय के सारे लोगों के हित समान होते हैं, को समर्थन दे रहे होते हैं। इस तरह राष्ट्रवादियों और संप्रदायवादियों के बीच का भेद मिटता नजर आता है। प्रेमचंद एवं गांधीजी के विचारों के विपरीत, नेहरु का मानना था कि सांप्रदायिकता को समाप्त करने के लिए जनता के बीच एकता कायम करनी होगी।

हिन्दी में सृजनात्मक साहित्य के माध्यम से सांप्रदायिकता फैलानेवाले लेखकों की भी एक परंपरा रही है। भारतेंदु और प्रताप नारायण मिश्र के जमाने से लेकर प्रेमचंद के जमाने तक इस परंपरा को फलते-फूलते देखा जा सकता है। प्रेमचंद ने इस तरह के लेखन से लोगों को हमेशा सतर्क एवं सावधान रखने की कोशिश की है। धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की स्थापना के लिए उन्होंने संघर्ष का रास्ता अपनाया। यहां इस्लाम का विष-वृक्षकी चर्चा करना अप्रासंगिक न होगा। इसके लेखक थे श्री चतुरसेन शास्त्री इस पुस्तक में इस्लाम का इतिहास है। साथ ही इसमें सांप्रदायिकता को भड़कानेवाली बातें लिखी हुई थीं। प्रेमचंद भला इसे कब बर्दाश्त करनेवाले थे। उन्होंने शास्त्री जी को लगभग डांटते हुए लिखा, ‘हम उनसे प्रार्थना करते हैं कि ऐसी जटिल और द्रोहभरी रचनाएं लिखकर अपनी प्रतिभा को और हिन्दी को कलंकित न करें और राष्ट्र में जो द्रोह और द्वेष पहले से ही फैला हुआ है, उस बारूद में आग न लगावें।’ हिन्दी एवं उर्दू का प्रेमचंद के लेखन में कोई विरोध नहीं है। दोनों ही भाषाओं में सांप्रदायिकता का दुष्प्रचार करनेवालों को वे सबक सिखाते हैं। नियाज फतेहपुरी एक ऐसे ही पत्रकार थे जिनमें देशभक्ति के तमाम दावों के बावजूद हद दर्जे की सांप्रदायिक भावनाओं और विचारों को प्रकट करने का साहस भी था, जिसके लिए प्रेमचंद ने इनको काफी भला-बुरा लिखा था। इस तरह प्रेमचंद के लेखन की जो मुख्यधारा है, वह धर्मनिरपेक्ष मूल्यों एवं राष्ट्रवादी चेतना को प्रोत्साहित करती है।

यह और बात है कि धर्मनिरपेक्षता एवं राष्ट्रवाद की बात करते-करते अचानक प्रेमचंद का सोया हिन्दू मन जाग उठता है और यहां तक कि ‘स्वराज’, जिसमें हिन्दू-मुसलमान जैसी चीजों का न होना था, वहां भी हिन्दू रंग एक बार चढ़ जाता है। शासन में मुसलमानों की भागीदारी के नाम पर एक ‘टिपिकल हिन्दू’ के रूप में प्रेमचंद कहते हैं, ‘अव्वल तो अपने दिल से यह ख्याल निकाल देना चाहिए कि हमारे देश-भाई अब भी हम पर हुकूमत का इरादा रखते हैं क्योंकि हिन्दू संख्या में, धन-दौलत में, शक्ति में मुसलमानों में किसी तरह से कम नहीं हैं।’ (प्रेमचंद के विचार , भाग-1, पृष्ठ 414)।

प्रेमचंद के ये अंतर्विरोध भारतीय राष्ट्रवाद के अंतर्विरोध हैं। राष्ट्रवाद एक आधुनिक विचारधारा है। भारत में इसका उद्भव एवं विकास स्वाभाविक रूप से साम्राज्यवाद विरोधी विचारधारा के रूप में हुआ। अंग्रेज शासकों एवं उपनिवेशवादी इतिहासकारों का ख्याल था कि भारत का अपना कोई इतिहास नहीं है। अंग्रेजों के इस दुष्प्रचार का शिकार होकर कभी मार्क्स ने भी स्वीकार किया था कि भारत का कोई इतिहास नहीं है; इतिहास के नाम पर विदेशी आक्रमण की कुछ घटनाएं हैं। फलतः भारत में राष्ट्रीय चेतना का निर्माण औपनिवेशिक धारणाओं और आधारवाक्यों के अस्वीकार एवं आत्मसम्मान के लिए संघर्ष के बीच हुआ। इसलिए यह भी उतना ही स्पष्ट है कि भारतीय राष्ट्रवाद के विकास के प्रथम चरण में औपनिवेशिक मान्यताओं का जबर्दस्त खंडन होना था। यहां तक कि लोगों ने प्राचीन भारत में जनतंत्रात्मक शासन प्रणाली के होने की बात पर जोर देना शुरू कर दिया। कभी-कभी तो राष्ट्रवाद इस कदर हावी हो गया कि वे अपने अतीत को वर्तमान से भी अधिक सुंदर देखने लगे। इसके साथ ही पश्चिम की हर अच्छी-बुरी चीज का प्रत्याख्यान हुआ। निराला जब कहते हैं, योग्य जन जीता है। पश्चिम की उक्ति नहीं। गीता है, गीता है। स्मरण करो बार-बार ’, तो यही भाव है। डार्विन के विकासवाद को खुली चुनौती है यह। भारत की राष्ट्रीय चेतना इस चिंतनधारा से प्रभावित रही है। प्रेमचंद भी इस चेतना से अप्रभावित नहीं थे, खासकर अपने आरंभिक दौर में इस रंग में रंगे हुए थे।

राष्ट्रवाद के विकास के प्रथम चरण में शिवाजी, महाराणा प्रताप आदि क्षेत्रीय नायकों को राष्ट्रवादियों ने राष्ट्रनायक के रूप में चित्रित किया। आश्चर्य नहीं कि ‘आत्मचेता क्रांतिकारी’ (सेल्फकंशस रिवोल्यूश्नरी) नेहरु के लिए भी गुप्त साम्राज्य का उत्कर्ष राष्ट्रीयता का अभ्युदय था। सिर्फ राष्ट्रवादी चिंतकों की ही ऐसी स्थिति न थी बल्कि बहुत हद तक मार्क्सवादी विचारधारा के लोग भी चीजों को ठीक इसी रूप में देख रहे थे। पहलके इतिहास अंक के लेख ‘मार्क्सवादी इतिहास-विश्लेषण की समस्याएंकी एक पाद-टिप्पणी में इरफान हबीब ने लिखा है, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस शिवाजी को एक ऐसा ही राष्ट्रीय नायक मानता था और उनके सम्मान में उनके राज्याभिषेक के अवसर पर संस्कृत में लिखी गई एक लंबी कविता का संस्करण भी उसने निकाला था, हालांकि उसमें एक दरबारी कवि की अतिशयोक्ति के अलावा ऐतिहासिक मूल्य की दृष्टि से कुछ भी नहीं है।उन्हीं के उद्धरण का सहारा लेकर कहूं कि ‘‘सी. पी. आई के मुखपत्र न्यू एजने एक बार शिवाजी को, वे जो कुछ भी थे, अर्थात् दमनकारी कहने के लिए, मोरारजी के बारे में भला-बुरा भी लिखा था।’

प्रेमचंद का अंतर्विरोध बहुत हद तक किसी तर्कसंगत विचारधारा के अभाव की वजह से है। आपने जो दृष्टि प्राप्त की थी, वह विचारधारा की नहीं ‘ऑब्जर्वेशन’ की दृष्टि थी। लेकिन उसमें तोलस्तोय की गहराई न थी। भारतीय समाज की जटिल संरचना, खासकर सांप्रदायिकता जैसी विचारधारात्मक अवधारणाओं को स्पष्टतः समझने में इनकी दृष्टि फंस जाती है और अपनी दूरदर्शिता खो बैठती है। बहुत संभव है कि अपने अंतिम दिनों तक प्रेमचंद ने मार्क्सवाद का विधिवत अध्ययन न किया हो। कहना होगा कि उनके लेखों में मार्क्सवादी शब्दावली का, जिसका आरंभिक मार्क्सवादी लेखन में बाहुल्य है, अभाव प्रतीत होता है। प्रेमचंद के अंतर्विरोध का यह भी एक संभव कारण हो सकता है। नेहरु इसलिए भी चीजों को साफ देख पा रहे थे-खासकर विचारधारात्मक प्रश्नों को।

इस तरह के अंतर्विरोध की परंपरा साहित्य के साथ-साथ इतिहास एवं राजनीति के क्षेत्रों में भी रही है। यह बात अलग है कि सांस्कृतिक मंच से भारत के पुरातन समाज और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के इन रूपों ने राष्ट्रीय चेतना को तीव्र तो किया, पर साथ ही आलोचनात्मक सामाजिक चेतना को कुंठित भी किया। प्रेमचंद को हम इस पृष्ठभूमि से अलग काटकर नहीं देख सकते। किसी भी सामाजिक समस्या या सवाल की सही पहचान के लिए यह आवश्यक है कि उसे निश्चित ऐतिहासिक-सामाजिक सीमाओं के भीतर परखा जाये, जिसमें ये सवाल पैदा होते हैं। औपनिवेशिक काल की सीमाओं के भीतर उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन में प्रेमचंद की भूमिका महत्वपूर्ण है। और यह भी उतना ही सत्य है कि अपनी औपनिवेशिक सीमाओं के भीतर, हमारा राष्ट्रवाद एक धर्मनिरपेक्ष मूल्य था।

प्रकाशनः सहमत मुक्तनाद , अंक 35, जून 2006।

Monday, October 11, 2010

गंगा , गंगा-स्नान और भारतीय संस्कृति


गंगा पवित्रता का पर्याय समझी जाती रही है। गंगा को पवित्र मानकर पूजा करने अथवा उसमें स्नान करने की प्रथा की कब शुरुआत हुई, इसका ठीक-ठीक विवरण देना एक मुश्किल काम है। ऋग्वेद में गंगा की सिर्फ एक बार चर्चा है। ऋग्वेद की ‘गंगा’ सरस्वती है। फिर भी हम यह मान सकते हैं कि लगभग उत्तर वैदिक काल में गंगा महत्त्वपूर्ण हो चली थी। पवित्रता की यह पूर्वपीठिका थी। निश्चित रूप से गंगा में स्नान करने की प्रथा को एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में मान्यता इसके बाद ही प्राप्त हुई होगी।

गंगा जीवन का पर्याय है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में लिखा है किअकाल के दिनों में लोगों को गंगा की पूजा करनी चाहिए।महाभारत में गंगा-जल की महिमा का वर्णन इस तरह किया गया है-‘सभी पवित्र जलों में गंगा जल सबसे पवित्र है, देवताओं के लिए जैसे अमृत है मनुष्यों के लिए गंगा-जल का वही महत्त्व है।इतिहासकार डेरियन ने ‘गंगा-मिथक और इतिहास’ में लिखा है कि नील नदी को छोड़कर विश्व में और कोई नदी नहीं है जो गंगा जैसी महत्त्वपूर्ण स्थिति को प्राप्त कर सकी हो। इसकी ख्याति सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में भी फैल चुकी थी। सिकंदर महान गंगा को ही पृथ्वी का अंत मानता था। गंगा ही के आकर्षण ने उसे हिन्दुस्तान की धरती तक खींचकर लाया।

हमारी संस्कृति में गंगा का इतना महत्त्व है कि इसने भारतीय कला के विविध रूपों को भी प्रभावित किया, क्या साहित्य और क्या मूर्तिशिल्प-सब इससे प्रभावित हुए हैं। बंगाल में ढेर सारी कविताएं गंगा को आधार बनाकर लिखी गई हैं। वहां के जीवन में गंगा को विशेष महत्त्व प्राप्त है। जीवन से लेकर मृत्यु तक हर पल गंगा उनके काम आती है। बंगाल में बच्चों का जब उपनयन संस्कार किया जाता है तो उसे तीन दिनों तक अपने घर से बाहर नहीं निकलना होता है तथा रोटी एवं गंगा-जल के सहारे ही जीना पड़ता है। आधुनिक काल में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने के पर लोग गंगा के किनारे पहुंचकर बाल-दाढ़ी बनवाते हैं, स्नानादि एवं अन्य कर्म करते हैं। ऐसा करना मृतक की मोक्ष-सिद्धि हेतु अत्यावश्यक माना जाता है।

गंगा कामिथकएवंइतिहासदोनों में बराबर का हिस्सा है। जिन दिनों हिन्दुस्तान की धरती पर अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ बड़ी-बड़ी लड़ाइयां लड़ी जा रही थीं, गंगा ‘मिथक से इतिहास’ और ‘इतिहास से मिथक ' का रूपांतरण झेल रही थी। आंदोलनकारी आंदोलन शुरू करने से पहले गंगा में स्नान करते थे, उससे एक तरह का नैतिक बल एवं आत्मविश्वास अर्जित करते थे।

भारतीय दर्शन-प्रणाली में आस्था एवं भक्ति का एक सबल पक्ष रहा है। हमारी आस्था धर्मग्रंथों में वर्णितपुराण कथाओंएवं मिथकों के आधार पर निर्मित होती रही है। यहां सिर्फ हिन्दू धर्मग्रंथों ही की बात नहीं है बल्कि बौद्ध अथवा जैन साहित्य का भी अगर अध्ययन करें तो पायेंगे कि गंगा के प्रति एक अजीब आस्था है लोगों के मन में। हिन्दू धर्म में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की अवधारणा है। हमारा धर्म इन्हीं की बदौलत शासित होता है। मोक्ष की कामना और उसकी प्राप्ति प्रत्येक मनुष्य का धर्म है, अगर उसकी अप्राप्ति हाथ लगी तो मनुष्य तन में जन्म लेना सर्वथा बेकार गया। गंगा-जल में स्नान करना एवं दान-दक्षिणा देना दुनिया के मायाजाल से ऊपर उठने अथवा कहें कि मोक्ष-प्राप्ति का एक उत्तम साधन है।

इस संसार में जन्म लेकर मनुष्यों को भगवत-स्मरण और स्नान-दानादिक करना, यही मुख्य धर्म है क्योंकि बड़े-बड़े पर्वों में स्नान-पूजा-व्रत दानादिक करने से पाप नष्ट होते हैं और मुक्ति मिलती है। पर्व और व्रत इत्यादि तो अनेक हैं और नित्य ही स्नानादिक का बड़ा फल है परंतु मार्गशीर्ष, कार्तिक, माघ, वैशाख, सब महीनों में उत्तम गिने जाते हैं। इसमें भी कार्तिक स्नान का विशेष महत्त्व है। हिन्दी पुनर्जागरण के कवि भारतेंदु ने इसकी महत्ता का बखान कुछ इस तरह किया है-

‘माधव कातिक माघ की पूनो परम सुनीत।
ता दिन गंगा न्हाइयै करि केशव सों प्रीति।।’

आश्विन शुक्ल एकादशी से आरंभ करके जो कार्तिक में जितेन्द्रिय होकर व्रतादिक कर गंगा में प्रातःस्नान करता है वह मुक्तिभागी होता है और उसको यमराज का भय नहीं होता। दूसरी ओर जो लोग कार्तिक में स्नान व्रतादिक नहीं करते वे मंदबुद्धि हैं, उन्हें किसी पुण्य का फल नहीं मिलता। कार्तिक में गंगा-स्नान के समान कोई धर्म है, अर्थ है, काम है, मोक्ष है, दान है। इसीलिए जो लोग दूर से चलकर गंगा-स्नान करने आते हैं उनको कदम-कदम परअश्वमेधएवंवाजपेय’ (वैदिक यज्ञ) का फल मिलता है।

गंगा की पवित्रता को ध्यान में रखते हुए स्कंद-पुराण में लिखा है कि इसमें तेरह प्रकार के कर्म नहीं करने चाहिए। शौच, कुल्ला, जूठा फेंकना, मल-मूत्र त्याग करना, तेल लगाना, निन्दा, प्रतिग्रह, रति, दूसरे तीर्थ की इच्छा तथा दूसरे तीर्थ की प्रशंसा, वस्त्र धोना, उपद्रव आदि सारे कर्म नहीं करना है। अगहन मास की पूर्णिमा के समान दूसरा कोई पर्व नहीं है। यह बात स्कंद-पुराण के ‘मार्गशीर्ष माहात्म्य ' में लिखी है। अगहन की पूर्णमासी को जो स्नानादि नहीं करते वे साठ हजार बरस तक रौरव वास करते हैं। गहड़वाल नरेश गोविन्द चन्द्र देव के कमौली ताम्र-पत्र मेंश्रीमद् वाराणस्यां गंगायां स्नात्वावाक्य मिलता है। तात्पर्य यह है कि दान करने से पूर्व गंगा नदी में स्नान करना आवश्यक था। निम्नलिखित उद्धरण इसे और भी स्पष्ट करते हैं-

‘विधिवत् स्नात्वा देव मनुज मुनि भूत पितृ
गणास्तपंयित्वा; वासुदेवस्य पूजां विधाय
कुशलता पूत करतलोदक पूर्वम’ (इंडियन एंटीक्वेरी 15, पृष्ठ 8)

और भी-

‘पुण्य तीर्थोदकेन विधिवत् स्नात्वा देव मनुज
पितृन् संतर्प्य भास्कर पूजा पुर सर-
भवानी पतिमभ्यर्च हुतभुज हुत्वा राहुग्रस्ते
दिवाकरे नाना गोत्रेभ्योः नाना प्रवरेभ्यो नाना
नामेभ्यो ब्राह्मणेभ्यः कुशलता पूतेन
हस्तोदकेन स्वस्ति वाचन पूर्वम संकल्पित
भूमः सम्बन्धे शासनी कृता प्रदताः ’ (वही, भाग 4, पृष्ठ 158)

भारत में गंगा नदी की भी देवकोटि में गणना कर ली गयी है। विद्यापति ने गंगा को पवित्र, सुन्दर एवं मनोरम माना है। उन्होंने गंगा की स्तुति में कुछ पदों की रचना की है। अकबरी दरबार के प्रमुख कवि गंग ने गंगा की स्तुति की है। रहीम का गंगा- भक्ति संबंधी निम्नलिखित दोहा बहुत ही प्रसिद्ध है-

अच्युत चरण तरंगिनी, शिव सिर मालति माल।
हरि बनायो सूरसरि, कीजौं इन्दव भाल।। '

गोस्वामी तुलसीदास ने मानस के बन्दना प्रकरण में सरस्वती के साथ ही सुरसरिता की भी बन्दना की है-

पुनि बन्दौ शारद सुरसरिता, युगल पुनीत मनोहर चरिता।
मज्जन पान पाप हर एका, कहत सुनत हर एक अविवेका।। '

रीति काव्य के प्रमुख कवि पद्माकर ने गंगालहरी ' नामक एक स्वतंत्र काव्य की रचना की थी। इसमें 56 कवित्तों में गंगा की महिमा का गान किया गया है। इसमें ब्रजभाषा के लालित्य और अलंकार सौष्ठव का सुंदर सामंजस्य मिलता है। पद्माकर के बाद कुशल मिश्र, अखैराम, रसिक सुन्दर, लेखराज आदि अनेक कवियों ने गंगा की महिमा का गान किया है, किंतु आधुनिक काल के दो प्रमुख कवियों-भारतेंदु हरिश्चन्द्र और जगन्नाथदास रत्नाकर ने देव नदी के विविध रूपों का जिस रोचक शैली में वर्णन किया है वह निश्चय ही श्लाघ्य है। भारतेंदु ने दास्य भाव से गंगा का स्मरण किया है। उन्होंने सत्य हरिश्चन्द्र नाटक में काशी की गंगा का यथार्थपरक वर्णन किया है।

पद्माकर और भारतेंदु की ही परंपरा में रत्नाकर ने गंगावतरणऔर गंगा लहरीनामक काव्यों की रचना की।गंगावतरणका कथानक वाल्मीकि रामायण पर आधारित है। ब्रह्मलोक से पृथ्वी पर गंगा के उद्भव का रोला छन्द में बहुत सरस वर्णन मिलता है। गंगा लहरीएक मुक्तक काव्य है जिसमें गंगा की महिमा का उल्लेख किया गया है।

दूसरी ओर कबीर हैं-

चली कुलबोरनी गंगा न्हाय।
सतुवा कराइन बहुरी भुंजाइन, घूंघट ओटे भसकत जाय।
गठरी बांधिन मोटरी बांधिन, खसम के मूंडे दिहिन धराय।
विछुवा पहिरिन औंठा पहिरिन, लात खसम के मारिन धाय।
गंगा न्हाइन जमुना न्हाइन, नौ मन मैल लिहिन चढ़ाय।
पांच पच्चीस के धक्का खाइन, घरहूं की पूंजी आइ गंवाय।

कबीर की रुक्षता भिखारी ठाकुर के यहां मिठास बनकर आती है। गंगा-स्नान का एक दृश्य यहां भी-

चलऽ गोरिया करे गंगा असननवाँ।।
सारी चोली पेन्हऽ करऽ सब अभरनबाँ,
तेही पर सोभी सोना चाँदी के गहनवाँ।।
गते गते बोलऽ ना तऽ सुनी मरदनवाँ।।
खाये खातिर बान्धऽ नून सतुआ पिसनवाँ।
बने बनालऽ तू झटपट पकवनवाँ,
मिठरस चाहीं कछू राह के भोजनवाँ।
सुरसरि जल भरि हरि दरसनवाँ,
करिके भिखारी कहे घुरे के मकनवाँ।। '

समकालीन कविता के एक महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर ज्ञानेन्द्र पति ने तो अपने संग्रह का नाम ही रखा है- गंगा - तट
गंगा सचमुच हिन्दुस्तानी तहजीब का हिस्सा बन चुकी है। इसीलिए नेहरु की अंतिम अभिलाषा ' थी कि उनके अस्थि-भस्म को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाये ताकि वे संपूर्ण भारत का हिस्सा बन सकें। गंगा ने भारत की धरती पर हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच कोई भेद नहीं किया है। गंगा सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल है। गंगा हिंदुस्तान में हिंदुस्तानी तहजीब की खास हिस्सा है जिसको निर्मित करने में सारे धर्मों के लोगों का साझा सहयोग है। ऐसे वक्त में राही मासूम रजा की गंगा और महादेव ' कविता की याद रही है जिसमें उन्होंने लिखा है-

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझको कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो
लेकिन मेरी रग-रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है
मेरे लहू से चुल्लू भरकर महादेव के मंुह पर फेंको
और उस योगी से कह दो-
महादेव !
अब इस गंगा को वापस ले लो
यह ज़लील तुर्कों के बदन में गढ़ा गया
लहू बनकर दौड़ रही है। '

Monday, October 4, 2010

अतीत और इतिहास का द्वंद्व

एक सामान्य व्यक्ति अतीत और इतिहास को अलगाकर नहीं देखता; अक्सर ही दोनों का प्रयोग समानार्थी की तरह कर डालता है। लेकिन इतिहास का एक सजग पाठक ऐसी गलती से भरसक बचेगा। अतीत एक समग्र अस्तित्व का नाम है जबकि इतिहास हमेशा एक टुकड़ा से ज्यादा कुछ नहीं होता। अतीत एक संपूर्णता का नाम है जबकि इतिहास महज एक चुना हुआ अंश जो इतिहासकार की सदिच्छा, आग्रह और परिवेश की झलक देता है। अतीत की घटनाएं मनुष्य के नियंत्रण से बाहर हैं और इतिहास सदैव हमारी मुट्ठी में, क्योंकि वह इतिहासकार की अपनी रचना है; उसका अपना विवेक बोलता है उसमें। इतिहास हमेशा इतिहासकार की रुचि का दास है और इतिहासकार ठीक उसी तरह से अतीत का।  अतीत की घटनाओं में इतिहासकार कोई तब्दीली नहीं ला सकता, किंतु इतिहास की व्याख्या पर उसका पूरा अधिकार बनता है। प्रत्येक इतिहास के पीछे से इतिहासकार की आवाज आती है जिसे स्पष्टता के साथ सुना जा सकता है। ई. एच. कार ने एक बड़ी अच्छी बात कही थी कि इतिहास की किताब पढ़ते हुए उसके पीछे से आनेवाली ध्वनि को सुनो। अगर कुछ सुनाई न पड़े तो समझो या तो तुम बहरे हो या तुम्हारा इतिहासकार एकदम बोदा है। इन अर्थों में अतीत एक टेक्स्ट है और इतिहास उसका पाठ, उसकी व्याख्या। जैसे ही इतिहासकार बदलेगा, टेक्स्ट बदलेगा और बदलेगी उसकी व्याख्या। इसलिए अतीत भी कोई शाश्वत सत्य जैसी चीज न है। आपने भी गौर किया होगा जब एक इतिहासकार दूसरे इतिहासकार पर ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी करने का आरोप लगाता है! क्या है तथ्यों की अनदेखी का मतलब ? शायद अतीत का निर्मित हो रहा एक नया पाठ जो पारंपरिक पाठ से भिन्नता लिए होता है।

जिस तरह साहित्य सामाजिक यथार्थ का पुनर्सृजन है किन्हीं अर्थों में अतीत और इतिहास का भी वही संबंध है। अतीत इतिहासकार का कच्चा माल है, उसको एक निश्चित शक्ल प्रदान करना इतिहासकार का पुनीत दायित्व। अतीत की घटनाएं क्रमबद्ध हैं, उसमें कहीं क्रमभंग आपको न मिलेगा लेकिन यह मामला बिल्कुल इतिहासकार की रुचि और प्रशिक्षण का है कि किन घटनाओं का वह चुनाव करता है, कौन-सी घटनाएं उसे इतिहास-लेखन की तरफ प्रवृत्त करती हैं। यह भी उसकी इच्छा पर ही निर्भर है कि अतीत के किस विशेष कालखंड को वह अपने अध्ययन का विषय बनाता है। इसमें इतिहासकार की सामाजिक अवस्थिति और मनोदशा की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।

इतिहास लगभग खंडों में प्रस्तुत किया जाता है; कुछ चीजें अक्सर इस बीच से गायब मिलती हैं। इसलिए इतिहास को एक बड़ी आरी कहा गया है जिसके कई दांत गायब हैं। एक इतिहासकार की यह व्यावहारिक समस्या भी हो सकती है कि समग्र अतीत को वह एक ही साथ प्रस्तुत नहीं कर सकता। यह एक ऐसी समस्या है जिसके लाभ भी हमें खूब मिलते हैं। जिस प्रकार मनुष्य के जीवन के कुछ पहलू अत्यंत गोपनीय हैं और कुछ पर हम पर्दा डाले रहते हैं, ठीक उसी तरह अतीत में कुछ वैसी घटनाएं घट चुकी रहती हैं जो हमारी पकड़ में नहीं होतीं और जिनकी चर्चा अक्सर बहुत प्रीतिकर और उपयोगी भी नहीं होती। यही वह बिंदु है जहां इतिहासकार का इतिहास-बोध महत्वपूर्ण हो उठता है। अतीत के किस हिस्से पर रोशनी डालनी है, इसकी समझ एक इतिहासकार के लिए आवश्यक शर्त की तरह है। अतीत का अपना एक मोह होता है जिसमें सम्मोहन की अजीब शक्ति है! इतिहासकार को अतीत के मोह से लड़ते हुए अपना इतिहास-बोध जाग्रत करना होता है। हालांकि मुक्तिबोध ने अपनी बात एक अन्य संदर्भ में रखी है लेकिन मुझे लिखते बल मिल रहा है कि भावना बच्चा है, अगर उसे आदमी नहीं बना सकते तो उसकी हत्या कर दो। एक इतिहासकार अतीत की घटनाओं से जितना ही टकराएगा, उसकी इतिहास दृष्टि उतनी ही पैनी होगी। बहुत सही समय है एक अंग्रेजी कथन याद करने का, ‘चाइल्ड इज दि फादर ऑफ मैन।’ मनुष्य बनने की प्रक्रिया में एक व्यक्ति को कितना लड़ना होता है अपने बचपने से! जो जितना लड़ पाता है उतना ही बड़ा मनुष्य बन पाता है।

इतिहास अतीत का अध्ययन करता है और हम इतिहास का अध्ययन करते हैं अपने वर्तमान को समझने एवं भविष्य की दिशा तय करने के लिए। अतीत का ज्ञान कोई जरूरी नहीं कि वर्तमान को समझने की कुंजी दे ही। कई बार अतीत हमारे लिए मुश्किलें खड़ी करता है। अतीत एक विशाल सागर की तरह है जिसे पार पाना आसान नहीं होता। इतिहासकार लेटन स्ट्रैची ने, अगर ई. एच. कार द्वारा उद्धृत शब्दों का सहारा लेकर कहूं तो ‘खास शरारती अंदाज’ में कहा हैः ‘इतिहासकार की पहली आवश्यकता है अज्ञान, अज्ञान जो उसके लिए चीजों को स्पष्ट और सरल बनाता है। जो चुनाव करता है और छोड़ता जाता है।’ शायद इसीलिए मध्य युग के बारे में हम पढ़ते हैं तो ऐसा लगता है कि मानों वहां सब कुछ धर्म से अनुप्राणित हो रहा हो। मध्यकालीन इतिहास के तथ्य के रूप में हमें जो कुछ मिलता है उसका चुनाव ऐसे इतिहासकारों की ऐसी पीढ़ियों द्वारा किया गया था जिनके लिए धर्म का सिद्धांत और व्यवहार एक पेशा था। इसलिए उन्होंने इसे अत्यंत महत्वपूर्ण माना और इससे संबंधित प्रायः हर चीज लिख लिखे गए। इसके अतिरिक्त जो दूसरी चीजें थीं उन्हें बहुत कम छुआ। अगर अतीत की मानें तो मध्ययुगीन समाज की धार्मिक तस्वीर पर हमें विश्वास करना होगा लेकिन हमारा इतिहासकार यहां अज्ञान का सहारा लेगा और मनुष्य के दूसरे महत्वपूर्ण कार्य-व्यापारों की खोज की तरफ प्रवृत्त होगा। लेकिन इसके लिए जगह बहुत कम बचती है क्योंकि इतिहासकारों की अनेक व्यतीत पीढ़ियों के मृत हाथों ने, अज्ञात लेखकों तथा तिथिविदों ने हमारे अतीत का सांचा पूर्व-निश्चित तरीके से गढ़ लिया है, जिसके खिलाफ किसी सुनवाई की कोई संभावना नहीं है। मध्ययुगीन मनुष्य की यह धार्मिक तस्वीर सच्ची हो या झूठी, तोड़ी नहीं जा सकती। उसके बारे में आज जो भी तथ्य हमें प्राप्त हैं, हमारे लिए उसका चुनाव बहुत पहले ऐसे लोगों द्वारा किया गया जो उनमें विश्वास रखते थे और चाहते थे कि दूसरे भी उनमें विश्वास करें। यहीं एक इतिहासकार अतीत के बेजान हाथों में पड़कर विवश और लाचार हो जाता है क्योंकि तथ्य का एक बहुत बड़ा भाग, जिसमें शायद विरोधी प्रमाण मिलता, नष्ट हो चुका है और जिसे पुनः कभी पाया नहीं जा सकता। अतीत को इतिहास के निर्मम हाथों में लाचार होते देख ही इतिहासकार बैरेकलो ने कहा होगा, ‘हम जो इतिहास पढ़ते हैं-हालांकि वह तथ्यों पर आधारित है, ठीक-ठीक कहा जाए तो एकदम यथातथ्य नहीं है बल्कि स्वीकृत फैसलों का एक सिलसिला है।’

‘अतीत, जिसका इतिहासकार अध्ययन करता है, मृत अतीत नहीं होता बल्कि ऐसा अतीत होता है जो किन्हीं अर्थों में वर्तमान में भी जीवित रहता है।’ अतीत का वह हिस्सा जो वर्तमान के लिए अनुपयोगी हो चला हो, इतिहासकार के लिए किसी काम का नहीं होता। क्रोसे जब यह घोषणा करता है कि सभी इतिहास ‘समसामयिक इतिहास’ होते हैं तो उसका आग्रह आवश्यक रूप से वर्तमान की आंखों से और वर्तमान की समस्याओं के प्रकाश में देखने का है। शायद इसीलिए इतिहास निरंतर गतिशील (परिवर्तनशील) है-अतीत और वर्तमान के बीच एक अंतहीन संवाद के रूप में। और तब ‘अंतिम इतिहास’ (इतिहास का अंत नहीं) जैसी चीज के लेखन को अंजाम देना एक काल्पनिक दुःस्वप्न। इसी के आलोक में किसी देश अथवा जाति के इतिहास-लेखन की विकास-यात्रा को समझा जा सकता है। इसे आधुनिक भरतीय इतिहास लेखन के उदाहरणों से तो और भी स्पष्टता के साथ समझा जा सकता है। यह बात लगभग एक ‘टेक’ की तरह दुहरायी जाती रही है कि भारत में सुसंबद्ध रूप् से इतिहास-लेखन की शुरुआत अंग्रेजों के भारत आगमन से होती है। उसके पहले यहां इतिहास-लेखन का काम छिटपुट रूप में चलता रहा। इस बात से भी अब इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारत के अतीत की खोज का गुरुतर भार अंग्रेजों ने अपने कंधों पर लिया और भारतीयों की आध्यात्मिक समृद्धि के गीत गाए। उन्हीं तथ्यों के आलोक में जर्मनी के इतिहासकारों ने भारत की ‘भौतिक प्रगति’ पर गर्व करना सीखा और इन दोनों से अलग देशी राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने अपने को प्रजातंत्र का संस्थापक सिद्ध किया। तीनों की अतीत-व्याख्या सोद्येश्य थी। इतिहास-दृष्टि में बदलाव के साथ-साथ अतीत के बारे में हमारी धारणाएं भी बदलीं और प्रत्येक बार एक दूसरा ही अतीत हमारी आंखों के सामने जीवित होता रहा। अतीत लगातार बदलता रहा क्योंकि बदलते हुए वर्तमान के उद्येश्य दूसरे थे, बिल्कुल नये प्रयोजन थे। आज जबकि हम आजाद हैं, समय की बिल्कुल दूसरी ही मांग सामने आ चुकी है, हम इतिहास-लेखन की गलतियों को ठीक-ठाक करने में लगे हैं। आज हमारा इतिहास ज्यादा से ज्यादा वस्तुनिष्ठ होने की कोशिश में है। सत्य के करीब होने की एक अजीब छटपटाहट है उसमें। आज यह समय का दबाव ही है कि इतिहास अपने तमाम पूर्वग्रहों और अतिरेकों से अपने को उबारने में लगा है।

अतीत अजीब चीजों का एक विशाल भंडार है जिसके कई हिस्से वर्तमान के लिए अनुपयोगी और अमहत्वपूर्ण हैं। ‘अतीत-दृष्टि’ चीजों को हू-ब-हू उसी शक्ल में ग्रहण करने की सलाह देती है लेकिन इतिहासकार की दृष्टि अथवा कहें कि इतिहास-बोध उसे नये संदर्भों में ही ग्रहण करता है। ऐसा समय की फौरी जरूरतों के हिसाब से होता है। जैसे अगर राष्ट्रीय आंदोलन (भारत का स्वतंत्रता-संघर्ष)के नेताओं और लेखकों ने अतीत की अपनी सोद्येश्य व्याख्या प्रस्तुत की तो हम उसे अनैतिहासिक करार देने का हक (नैतिक) नहीं रखते क्योकि यह उस काल की एक संभव व्याख्या थी। अतीत-दृष्टि के उलट इतिहास-दृष्टि काल और परिस्थिति सापेक्ष होती है। अतीत संभव हो, हिंसा और अत्याचार से पटा हो लेकिन इतिहास-बोध एक खास तरह के ‘सेंसर’ के साथ प्रकट होगा। हम तनिक गौर करें तो पायेंगे कि उन्नीसवीं शती के भारतीय नवजागरण के दिनों में प्रतिक्रियावादी और प्रगतिशील-दोनों ही तबकों के लोग वेदों को उद्धृत कर रहे थे और मनोवांछित व्याख्या सामने ला रहे थे। प्रेमचंद की अतीत-दृष्टि अगर भारत में हिन्दुओं और मुसलमानों के पृथक अस्तित्व को स्वीकारती है तो वहीं उनका इतिहास-बोध इस बात को कहे बगैर नहीं रहता कि आम हिन्दू और मुसलमान की संस्कृति में कोई विभेद नहीं है। ‘इस्लाम का विष-वृक्ष’ के लेखक आचार्य चतुरसेन को ‘इतिहास-बोध’ से शून्य होने के चलते ही प्रेमचंद ने भला-बुरा कहा था। मार्क्स अगर कहता है कि भारतीयों का अपना कोई इतिहास नहीं है, तो निश्चित मानिए, वह इसी ‘इतिहास-बोध’ का प्रश्न खड़ा करता है। प्रेमचंद द्वारा हिन्दू-मुसलमानों के पृथक अस्तित्व की जगह उनकी साझी संस्कृति पर जोर देना ठीक-ठीक इतिहास-बोध का मामला बनता है। भारत की संस्कृति विभिन्न धर्मावलंबियों के आपसी संबंधों के आधार पर निर्मित हुई है।

आज हिन्दी के दलित-विमर्श को भी इसी रोशनी में देखे जाने की जरूरत है। हिन्दी का दलित-विमर्श अब तक के इतिहास-लेखन की ‘वैधता’ को स्वीकार करने से इनकार करता है। साथ ही समय-समय पर भारत में हुए प्रगतिशील आन्दोलनों के महत्व को भी खारिज करता है। वर्ण-व्यवस्था पर गहरी चोट करता है लेकिन उसी ‘अतीत-दृष्टि’ के साथ। किन भौतिक-सामाजिक दशाओं में वह व्यवस्था निर्मित हुई, इसकी व्याख्या उसके पास नहीं है। अतीत के प्रति अंध-श्रद्धा और अंध-विरोध दोनों ही खतरनाक हैं। कुछ लोग अक्सर कहते पाए जाते हैं कि इतिहास, अतीत को ‘जैसा था’, वैसा ही चित्रित करे। ऐसी ‘सदिच्छा’ हो सकती है, लेकिन ‘इतिहास-बोध इसको स्वीकार नहीं करेगा। अगर ठीक ऐसा ही होता तो इतिहास शैतानों की करतूतों से भरा होता और हममें से अधिकतर इसके अध्ययन को एक गैर-जरूरी चीज मानते। अतीत को हमेशा इतिहासकार वर्तमान की रौशनी में देखता है; इसलिए प्रत्येक पीढ़ी के इतिहासकार का अतीत कुछ-कुछ बदला हुआ होता है। प्रत्येक पीढ़ी को इतिहास-लेखन का कार्य-भार अपने दायित्वों में शामिल करना होता है तभी उस पीढ़ी के लिए इतिहास में जगह बन पाती है।

अतीत को समझने के साथ जो प्रक्रिया शुरू होती है उसमें हमारा वर्तमान भी पुरजोर असर ग्रहण करता है। दोनों के बीच की टक्कर और उसका संवाद ही हमारी इतिहास-दृष्टि को अतीत की प्रचलित धारणाओं के रूप में निर्धारित करता है।