Thursday, December 8, 2011

औपनिवेशिक बिहार में शिक्षा : पाठशाला में दंड के कुछ संदर्भ

‘पाठशाला में दंड के मुख्य रूप तीन होते: मोगली, घोड़न और खजूर की छड़ी। हाथ-पैर रस्सी से बांध, उसमें गर्दन फंसाकर ओधरा दिया-यह मोगली कसना था। आम की टहनियों में लाल चीटियों के बने खोतों को लाकर नंगे बदन पर झाड़ देना घोड़न लगाना था और खजूर की छड़ी तो खजूर की छड़ी ही होती है। ये तीनों सजायें स्वतंत्र होतीं, अलग-अलग दी जातीं, पर अक्सर दो मिलाकर एक ही साथ दी जाती: मोगली और घोड़न: मोगली और छड़ी। हम दोनों का प्रबंध पहले से तैयार रखते। गुरुजी के कहने पर नहीं अपने ‘उत्साह’ से। छड़ी मैं पहले से ही बना-सोनाकर रखता और लंबी-लंबी छड़ियां ताकि गुरुजी को अपनी जगह से उठने का कष्ट नहीं करना पड़े। ...गुरुजी यदि किसी हमारे विद्यार्थी साथी पर रंज हुए तो मैंने छड़ी हाजिर की। गुरुजी के मुह से निकलना था: ‘झाड़ दो इसके बदन पर घोड़न के खोते’ और मैं कह उठता ‘गुरुजी रखले हतीं।’’ (किशोरी प्रसन्न सिंह, राह की खोज में, अन्वेषा प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण, फरवरी 2002, पृष्ठ 52)

...‘और उसके बाद जो होता वह हमारी उम्र के बहुत लोगों को मालूम होगा जिनकी पढ़ाई बचपन में किसी देहात के गुरुजी के यहां हुई है। विद्यार्थी छटपटा रहे हैं ‘बाबू हो जान गेल, गुरुजी अब न’। पर यहां कौन मानता है घोड़न झाड़े चले जा रहे हैं।’ (वही)

...‘गुरुजी क्यों इन साधनों का इस्तेमाल करते हैं और मैं क्यों ऐसा करता, यह उस समय थोड़े कभी पूछा था, सोचा, विचारा। लगभग 15-16 वर्षों बाद एक बार गुरुजी से पूछा: वह ऐसा क्यों करते थे। पता चला, अररा गांव जहां गुरुजी का घर था, (तीन-चार मील ही पड़ता है) वहां के श्यामनन्दन सहाय जमींदार हैं, बहुत बड़े जमींदार, पढ़े-लिखे भी बहुत और आधुनिक दुनिया के जमींदार। इनकी ‘कचहरी’ में ये सारी चीजें बड़े पैमाने पर व्यवहार की जाती थीं। गुरुजी ने देखा था ये साधन, कितने कारगर होते थे, तगड़े किसान भी आसानी से मान लेते थे और दुरुस्त हो जाते थे। वहीं से गुरुजी ने यह दवा सीखी थी।’ (वही)

...‘यह तो हुई गुरुजी की बात। मैं क्यों घोड़न और छड़ी तैयार रखता ? इसका पता और भी देर से लगा। संस्कार का बहुत बड़ा असर होता है। पर यह संस्कार ऐसा नहीं होता जो जनमने के पहले से ही होता हो। यदि कुछ ऐसा होता भी होगा तो वह हम नहीं जानते। जिस संस्कार को हमने देखा है उसको कह सकता हूं।’ (वही, पृष्ठ 53)

...‘एक बार गुरुजी से हमारी भी हुई, पर वह मोगली, घोड़न और छड़ी-तीनों में कोई नहीं, एक अलग चीज हुई खेदा-खेदी। गुरुजी ने कहा-तुम दोनों (हम और चन्द्रदेव) चतुर्भुज को बुला लाओ। हम दोनों चले। चतुर्भुज का घर वहां से चार सौ गज से अधिक ही होगा। यह सबेरे की ही बात थी। बाहर आ रहा था। नून नदी छिछली नदी है। बाढ़ आयी तो कई घंटों में ही सारा इलाका जलमग्न हो जाता है। चतुर्भुज के दरवाजे पर अभी-अभी छिप-छाप पहुचा था, हमदोनों कई दूसरों के साथ, जिसमें चतुर्भुज भी था, चेंगा और गरचुन्नी पकड़ने में लग गये। मछली पकड़ने के सूर में जब भूख-प्यास ही भूल गया तो गुरुजी की आज्ञा का क्या पूछना। दोपहर को किसी से गुरुजी को पता चला कि हमलोग मछली मार रहे हैं।' (वही)

'गुरुजी और नायब गुरुजी, दोनों अपना-अपना सोंटा लिये दीख पड़े। हमलोगों ने समझ लिया कि आत्मसमर्पण का क्या अर्थ होगा। बस उत्तर की ओर भागे। पानी आ गया था, डगर (गांव की सड़क) एक जगह नीची पड़ती थी, वहां पानी भर कमर हो गया था। हमलोगों के तो गर्दन से भी अधिक था। उसे पार करने में गुरुजी और नायब गुरुजी की धोती भी भींग गयी, इसलिए चाहे जहां कहीं भी हो पकड़ने का ही निश्चय किया। बाहा (नून नदी का छाड़ना) के किनारे-किनारे हमलोग भागे जा रहे थे और गुरुजी रगेदे जा रहे थे। चन्द्रदेव तैरने में हमसे सेसर था। वह बाहा में कूद गया और उस पार। गुरुजी कुछ देर धमसाये कि क्या किया जाये, अब किसका पीछा किया जाय। इस अनिश्चितता में उनकी चाल कुछ धीमी हो गयी और हमारी उनकी दूरी लम्बी हो गयी। इतने में ही मैं भी उस पार चला गया। मकई के खेते-खेते घर पर जाकर किल्ली ठोक ली, और तबतक नहीं निकला, जबतक घर की औरतों ने किरिया खा-खाकर यह विश्वास नहीं दिलाया कि वे हमें गुरुजी से बचायेंगी। और उनलोगों ने ईमानदारी के साथ अपना किरिया निभाया। उस दिन हम दोनों अपने बल पर चम्पत हो गये। हमलोगों ने अपने साथियों से कहा: ‘गुरुजी के हरा देली।’ (वही, पृष्ठ 54)

‘मेंरे हेडमास्टर हरेक विद्यार्थी के चाल-चलन पर हमेशा कड़ी निगाह रखते थे। खराब चाल-चलन के कारण कभी-कभी करीब-करीब हर हफ्ते दो-चार बार बेंतबाजी होती थी। हेडमास्टर खुद बेंत मारते थे। बेंतों की कोई गिनती नहीं हो सकती थी। देह पर नीली साटें उखड़ आती थी। सयाने लड़कों की तो दुर्गति हो जाती थी। बदचलन लड़कों के लिए हेडमास्टर यमराज से कम न थे। उनकी कड़ाई और पढ़ाई सारे शहर में मशहूर थी। बहुत अच्छा पढ़ाते और बड़ी बेदर्दी से मारते-पीटते थे। उनका नाम श्री विश्वनाथ गुप्त था। वे बंगाली थे। हिन्दी में प्रसिद्ध लेखक पंडित ईश्वरी प्रसाद शर्मा के बड़े भाई पंडित गुरुदेव प्रसाद शर्मा भी मेरे ही स्कूल में मास्टर थे। वे भी बदमाशों के काल कहे जाते थे। उनसे भी लड़के थर्राते थे। बेंतबाजी में वे भी बड़ी सख्ती करते थे। हेडमास्टर की तरह हीं वे भी एक आदर्श शिक्षक माने जाते थे। इन दोनों के पढ़ाने का तरीका इतना अच्छा था कि विद्यार्थी इनके भक्त बने रहते थे। ये दोनों ही बहुत सुन्दर अक्षर लिखते थे। खराब अक्षर लिखने वाले लड़के इनसे जरूर दंड पाते थे।’ (शिवपूजन सहाय, संस्मरण)

...'शारीरिक दंड की कठोरता से आतंक छाया रहता था। मास्टरों से गुस्ताखी करने की हिम्मत लड़कों में नहीं थी। किन्तु पढ़ाकू लड़कों को प्यार और पुरस्कार भी मिलता था। सुशील और परिश्रमी लड़कों की पहुंच हेडमास्टर तक बेधड़क होती थी। बड़े-बड़े बिगड़ैल भी स्कूल में भीगी बिल्ली बने रहते थे।’ (वही)

...'गुरु में चेलों की श्रद्धा हृदय से थी, केवल डर से नहीं। कारण, आदर्श चरित्र शिक्षकों की संख्या ही अधिक थी।’ (वही)

‘शिक्षा के बारे में एक छोटा सा वाकया कह देता हूं क्योंकि आमतौर से लोग समझते हैं पहले शिक्षक अच्छे थे, शिक्षा अच्छी थी, मेरा यह अनुभव नहीं है। किसी भी क्षेत्र में मेरे जीवनकाल में समाज आज से अच्छा नहीं था। इससे बदतर था। आबादी बढ़ गई है, बड़े पैमाने पर। जब मैं दूसरे दर्जे में था, 6 आने में एक पुस्तक होती थी ‘आमोद-पाठ’ और उस समय 6 आने बहुत कठिन था, रुपए मन धान बिकता था। मेरी मां एक रुपए में डेढ़ सेर घी बेचकर पढ़ने के लिए पैसा देती थी। आप अंदाज कर लीजिए। मेरे पिता और चाचा में पारिवारिक बंटवारा हुआ था, 6 आने की किताब नहीं खरीदी जा सकी। मेरे शिक्षक मेरे ही गांव के थे, वो कुछ किताबें लाए थे बोले-6-6 आने में ले लो। क्लास में सुना कि फर्स्ट कर गया, शिक्षक अड़ गये कि आगे क्लास में नहीं जाने देंगे, क्योंकि किताब नहीं खरीदी है। मेरे चाचा गए, पंचायती हुई और सभी पंचों ने फैसला किया कि मुझको नहीं जाना चाहिए अगले क्लास में, हमलोग बेवकूफ हैं क्या? हमने 6-6 आने पैसे खर्च किए और वह बिना पैसे दिए फर्स्ट कर गया। पैसे की दिक्कत तो सब दिन रही ही लेकिन एक जिद में आ गया कि बिना किताब के ही पढ़ूंगा, जो होगा सो होगा। दूसरे लड़के मदद लेने आते थे, इसी बहाने उनकी किताब से पढ़कर काम चलाता था।’ (भोगेन्द्र झा, क्रांति-योग, मातृभाषा प्रकाशन, दरभंगा, 2002, पृष्ठ 15).

Tuesday, November 15, 2011

औपनिवेशिक बिहार में शिक्षक : एक बानगी

‘बेचारे प्राइमरी स्कूल के शिक्षक, जो रात-दिन छोटे-छोटे बच्चों को लेकर रटाते रहते हैं और उन्हें पढ़ने योग्य बनाते हैं। लेकिन उन्हें केवल दस रुपया मासिक मिलते हैं। कितने गुरुओं को मैंने तीन-तीन रुपए में जिंदगी खत्म करते देखा है।...बेचारे उन गुरुओं और किसानों की एक ही हालत है। ये दोनों राष्ट्र के निर्माता ठहरे, पर इनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाता। फिर क्यों नहीं देश रसातल में जाए ? ...लेकिन समझ में नहीं आता कि गुरुजी के साथ ऐसी बेरहमी क्यों की जाती है, जो शिक्षा की जड़ हैं और जिन पर राष्ट्र की उन्नति बहुत कुछ निर्भर करती है ?' (देखें, त्रिवेणी संघ का बिगुल , और देखें, पी. के. चैधरीश्रीकांत, बिहार में सामाजिक परिवर्तन के दस्तावेज, विद्या विहार, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण: 2010, पृष्ठ 173).

गुरुजी की मुख्य आमदनी चटियों के महीने से थी, लेकिन इसकी गारंटी भी क्या थी ? ‘कभी-कभी किसी लड़के का बाप आकर कहने लगता था-गुरुजी, इस साल पैदा बहुत नरम है। भदई और अगहनी ने कमर तोड़ दी। चैती का भरोसा है। खेत कमाते-कमाते तो पीठ की रीढ़ धनुही हो गई, मगर करम गवाही नहीं देता तो क्या करूँ ? और कोई धंधा भी तो नहीं है! आप तो घर के आदमी हैं, हालत देखते ही हैं। आपसे क्या परदा है ? आप तो सब रत्ती-रत्ती जानते हैं। मगर चैत में सब बाकी बेबाक कर दूँगा। दाम-दाम जोड़कर ले लीजिएगा। भगवान की दया से क्या हरदम सूखा ही पड़ेगा ? अपने ऊपर चाहे लाख बीते, मगर मैं किसी का खदुक रहना नहीं चाहता। किसी का मेरे यहाँ कौड़ी का एक दाँत भी बाकी नहीं है। पेट काटकर तो मालिक की कौड़ी देता हूँ। आपकी दया से यह लड़का अगर कुछ पढ़ जायगा, तो मेरा दुख छूट जायगा। आपका नाम लेता रहूँगा। आपकी एक निसानी रह जायगी। मेरे यहाँ आपका नकद डेढ़ रुपया और साढ़े बारह सेर सीधा बाकी है। कहीं पुरजे पर टाँक लीजिए।’ (देहाती दुनिया से, शिवपूजन रचनावली, खण्ड 1, पृष्ठ 134-35)। अक्सर यह कागज पर टंका ही रह जाता।

गुरुजी की आमदनी ‘शनिचरा’ से भी होती। ‘प्रत्येक शनिवार को अक्षत और तिल से लड़के गणेश जी की पूजा करते, उन पर पैसे चढ़ाते। यह पैसा गुरुजी का होता।’ (किशोरी प्रसन्न सिंह, राह की खोज में, अन्वेषा प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण, फरवरी 2002, पृष्ठ 50) लेकिन यह सौभाग्य अक्सर सोया ही रहता, क्योंकि ‘बहुत-से लड़के ऐसे थे, जो कभी चावल लाते थे तो गुड़ और पैसा नहीं, कभी पैसा तो चावल और गुड़ नहीं, कभी गुड़ तो चावल और पैसा नहीं। उनके यहां गुरुजी का दरमाहा और सीधा भी बाकी पड़ा रहता था।' (देहाती दुनिया से, शिवपूजन रचनावली, खण्ड 1, पृष्ठ 134-35). ये और बात है कि संपन्न घरों के कुछ बच्चे कभी फेल नहीं करते, ‘बल्कि किसी-किसी दिन एक पैसे के बदले गणेश जी पर दो पैसे चढ़ाते। गुरुजी हमारी (किशोरी प्रसन्न सिंह) या चन्द्रदेव (किशोरी जी के सहपाठी-मित्र) की भक्ति से बहुत प्रसन्न होते। गुरुजी हमलोगों का अधिक ख्याल रखते, इन्हीं कारणों से क्योंकि हमलोग सुसंपन्न घर के थे।’ (राह की खोज में, पृष्ठ 51)

अब पेट-पूजा का ही एकमात्र आसरा होता-‘गुरुजी भांज लगाकर पारी-पारी से अपने विद्यार्थियों के घर खाते थे, जो परिवार में बनता था, वही उनको भी मिलता था। बहुत परिवार ऐसे भी थे जहां वह नहीं खाते क्योंकि ऐसे परिवार खिला ही नहीं सकते। हमारे घर में गुरुजी के लिए अच्छा भोजन भी बनता और पारी भी जल्दी-जल्दी पड़ती।’ (किशोरी प्रसन्न सिंह, राह की खोज में, अन्वेषा प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण, फरवरी 2002, पृष्ठ 50).

‘मैं गुरुजी की शिकायत नहीं कर रहा हूं। बचपन में जो देखा और भोगा है, उसे ही लिख रहा हूं।’ (वही, पृष्ठ 51) जिन्हें किशोरी जी की इस ‘शिकायत’ पर विश्वास नहीं है वे जनकवि नागार्जुन की कविता ‘प्रेत का बयान’ देखें-

‘ओ रे प्रेत-’’

कड़क कर बोले नरक के मालिक यमराज

-‘‘सच सच बतला!’’

कैसे मरा तू ?

भूख से, अकाल से ?

बुखार कालाजार से ?

पेचिस बदहजमी, प्लेग महामारी से ?

कैसे मरा तू, सच सच बतला!’’

खड़ खड़ खड़ खड़ हड़ हड़ हड़ हड़

काँपा कुछ हाड़ो का मानवीय ढाँचा

नचाकर लम्बी चमचों-सा पंचगुरा हाथ

रूखी-पतली किट-किट आवाज में

प्रेत ने जबाव दिया-

‘‘महाराज !

सच सच कहूँगा

झूठ नहीं बोलूँगा

नागरिक हैं हम स्वाधीन भारत के....

पूर्णिया जिला है, सूबा बिहार के सीवान पर

थाना धमदाहा, बस्ती रूपउली

जाति का कायथ

उमर है लगभग पचपन साल की

पेशा से प्राइमरी स्कूल का मास्टर था

तनखा थी तीस, सो भी नहीं मिली

मुश्किल से काटे हैं

एक नहीं, दो नहीं, नौ नौ महीने !

घरनी थी, माँ थी, बच्चे थे चार

आ चुके हैं वे भी दया सागर करुणा के अवतार

आपकी ही छाया में !

मैं ही था बाकी

क्योंकि करमी की पत्तियाँ अभी कुछ शेष थीं

हमारे अपने पुस्तैनी पोखर में

मनोबल शेष था, सूखे शरीर में....’’

‘‘अरे वाह-’’

भभाकर हँस पड़ा नरक का राजा

दमक उठीं झालरें कम्पमान सिर के मुकुट थी

फर्श पर ठोककर सुनहला लौह दण्ड

अविश्वास की हँसी हँसा दंडपाणि महाकाल

‘‘-बड़े अच्छे मास्टर हो:

आये हो मुझको भी पढ़ाने !!

मैं भी तो बच्चा हूँ ....

वाह भाई वाह !

तो तुम भूख से नहीं मरे ?’’

हद से ज्यादा डालकर जोर

होकर कठोर

प्रेत फिर बोला

‘‘अचरज की बात है

यकीन नहीं आता है मेरी बात पर आपको ?

कीजिए न कीजिए आप चाहे विश्वास

साक्षी है धरती, साक्षी है आकाश

और और और भले व्याधियाँ हों भारत में ..किन्तु..’’

उठाकर दोनों बाँह

किट किट करने लगा जोरों से प्रेत

-‘‘किंतु भूख या क्षुधा नाम हो जिसका

ऐसी किसी व्याधि का पता नहीं हमको

सावधान महाराज

नाम नहीं लीजिएगा

हमारे सामने फिर कभी भूख का ’’

निकल गया भाफ आवेग का

शांत स्तिमित स्वर में प्रेत फिर बोला-

‘‘ जहाँ तक मेरी अपनी बात है

तनिक भी पीर नहीं

दुख नहीं, दुविधा नहीं

सरलता पूर्वक निकले थे प्राण

सह नहीं सकी आंत जब पेचिश का हमला ....

सुनकर दहाड़

स्वाधीन भारतीय प्राइमरी स्कूल के

भुखमरे स्वाभिमानी सुशिक्षित प्रेत की

रह गये निरुत्तर

महामहिम नरकेश्वर ! !

Thursday, June 9, 2011

भ्रष्टाचार पर राजनीति

४ जून २०११ को दिल्ली के रामलीला मैदान में योग-गुरु रामदेव जी तथा उनके सहयोगियों के द्वारा आहुत सत्याग्रह का प्रत्यक्षदर्शी होने का सौभाग्य या दुर्भाग्य मुझे प्राप्त हुआ. रामदेव जी का संकल्प कि ‘देश से भ्रष्टाचार को समाप्त कर देना है’, ‘इसमें उनकी जान भी चली जाये तो उन्हें कोई गम नहीं’-मुझे रामदेव जी के इस अबोध या नासमझ कथन से खेद होता है. यह इसलिए कि रामदेव जी की इस उक्ति में अर्थव्यवस्था की सही जानकारी का अभाव झलकता है. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में ‘उत्पादन के साधनों पर व्यक्ति विशेष का स्वामित्व होता है’, ‘कम से कम लोगों के हाथों में अधिक से अधिक धन इकठ्ठा होता है’ तथा रुपया भगवान से भी बड़ा हो जाता है. बेकारी, भूखमरी, गरीबी, भ्रष्टाचार, अत्याचार आदि सभी इस पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के अंतर्विरोध हैं. जबतक यह अर्थव्यवस्था अस्तित्व में होगी तबतक उपर्युक्त सारे लक्षण मौजूद रहेंगे. खुद रामदेव चिकित्साशास्त्र पर अपनी टिप्पणियों में यह कहते पाए जाते हैं कि महज लक्षणों का निदान रोग का उपचार नहीं है बल्कि अनावश्यक दवाओं के असर से और कई दूसरे रोग भी हो जाते हैं. रामदेव जी, काश आप भ्रष्टाचार के मूल में पूंजीवाद जैसे रोग को ‘डायग्नोज’ कर पाते तो शायद स्वयं तथा अपने अनुयायियों को भी भ्रम से बचा पाते. भ्रष्टाचार तो उस पौधे की पत्तियां है और पत्तियों को नष्ट करने से पौधे समाप्त नहीं होते. दूसरी ओर, आपके सारे क्रियाकलाप पूंजीवादी संस्कृति के पक्ष में हैं क्योंकि धन और धर्म का गंठजोड ही योग है जिसे लेकर आप जनता को गुमराह कर रहे हैं. पता नहीं आप अर्थव्यवस्था की सही समझ के अभाव में ऐसा कर रहे हैं या कि इसका कोई राजनितिक निहितार्थ है क्योंकि ‘रातों रात आपने भगवा वस्त्र बदलकर सलवार-सूट और दुपट्टा पहन लिया’-जाने क्या मज़बूरी थी ? एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री, प्रूधों ने ‘व्यक्तिगत संपत्ति’ को चोरी कहा था. अतः उस लिहाज से पैसे की संस्कृति ‘करप्शन’ है. ये दोनों ही परिघटनाएं मानव जीवन के विकास के क्रम में जुडी हैं और इनमें उत्तरोत्तर प्रगति होती रही है. मुझे याद है- जब मैं कॉलेज का विद्यार्थी हुआ करता था तो पटने में आयकर चौराहे के पास एक बड़ा-सा होर्डिंग लगा था जिसपर करप्शन के सम्बन्ध में अंग्रेजी में एक सूत्र लिखा था जिसका हिंदी तर्जुमा है कि ‘भ्रष्टाचार कोई नई चीज नहीं है और यह सार्वभौम है’. मेरे तार्किक मन ने इसे इस रूप में लिया कि सार्वभौम और सर्वव्यापी तो सिर्फ भगवान हैं-तो फिर उस वक्त से यह जोड़ लिया कि ‘भगवान और भ्रष्टाचार सार्वभौम और सर्वव्यापी हैं’. उसी दरम्यान मुझे प्राचीन भारतीय अर्थशास्त्री कौटिल्य का यह सूत्र भी मिला कि ‘यदि किसी की जिह्वा पर मधु की दो बूंद रख दी जाएँ तो यह संभव नहीं कि वह व्यक्ति उसके रस का आनंद न लेगा.’ इन तथ्यों से मेरा अभिप्राय भ्रष्टाचार का पक्षपोषण करना नहीं है बल्कि उस ओर इशारा करना है कि यह तो पूंजीवादी संस्कृति का मात्र ‘बाई प्रोडक्ट’ है. असल हथौड़ा तो उस संस्कृति के ऊपर पड़ना चाहिए जिसका कि अबतक किसी ने प्रयास नहीं किया है बल्कि इस नाम पर सरकार गिराने, सत्ता पलट करने तथा सत्ता हथियाने का काम अवश्य हुआ है.


इस सन्दर्भ में भारत के राजनीतिक इतिहास (स्वातंत्र्योत्तर) पर थोड़ी चर्चा अपरिहार्य है. सन १९७४-७५ में जयप्रकाश नारायण ने ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान कर देश के मध्यवर्ग के बीच नई आशाओं का संचार किया तथा मुख्य रूप से छात्रों को अगुवा बनाकर केन्द्र में स्थापित कॉंग्रेस शासन का विरोध किया था. परिणाम के रूप में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ, सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण हुआ. उलटे, उस वक्त जनता के बीच जो घोर हताशा, निराशा और आक्रोश पल रहा था, जिसकी परिणति व्यवस्था परिवर्तन में हो सकता था, किन्तु जयप्रकाश नारायण ने उस पलते-बढ़ते आक्रोश की हवा निकाल दी और भारत में कुछ भी न बदला. चेहरे अवश्य बदले, किन्तु गरीबी, भूखमरी, बेकारी एवं भ्रष्टाचार पूर्व की भांति फलता-फूलता रहा.


नब्बे के दशक में विश्वनाथ सिंह ने पुनः भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर कांग्रेसी एकाधिकार का विरोध किया. मध्यवर्ग के लोग उसके पीछे गोलबंद हुए क्योंकि यह वर्ग अति महत्वाकांक्षी तथा स्वप्नदर्शी वर्ग है. यह वर्ग कतई व्यवस्था परिवर्तन का पक्षधर नहीं है बल्कि उसी व्यवस्था में कामचलाऊ परिवर्तन कर उसे बनाये रखने का पक्षधर है. मार्क्स के शब्दों में यह वर्ग प्रतिक्रांतिकारी की भूमिका में होता है. भ्रष्टाचार का विरोध इस वर्ग में एक नई आशा का संचार करता है, इसलिए नहीं कि वह भ्रष्टाचार विरोधी है बल्कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को अपदस्थ करके वह अपने लिए जगह की मांग रखता है. अतः इनका विरोध इसलिए होता है कि ‘यदि उन्हें भी मौका मिला तो लूट के रख देंगे.’ विश्वनाथ सिंह को मध्यवर्ग का समर्थन प्राप्त हुआ. सत्ता में परिवर्तन हुआ. असंतुष्ट एवं विक्षुब्धों को सत्ता सुख प्राप्त हुआ किन्तु आम जनता ठगी गई. उनकी तक़दीर न बदली. अतः पूंजीवाद के संकट जब-जब गहरे होते हैं और इस कारण से उपजे आक्रोश के बवंडर को ऐसे चालाक लोग एक खास ‘ट्विस्ट’ देकर जनता को गुमराह करते हैं और क्रांति की संभावनाओं को लंबे समय तक टाल देते हैं. अतः इस लिहाज से जयप्रकाश नारायण तथा विश्वनाथ सिंह-दोनों ही को जनता की अदालत में खड़ा कर मुकदमा चलना चाहिए. उसी श्रृंखला में यदि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी प्रलाप पर विचार करें तो यह कहना गलत न होगा कि ये भी जनता की पीठ में छुरा भोंकने का काम कर रहे हैं. अतः बाबाजी, आपसे अनुरोध है कि जनता के बीच जो अकुलाहट है उसे बढ़ने दें, उसके आक्रोश को पक जाने दें, उसकी एकजुटता को कामयाब होने दें-तभी सही वक्त पर कोई क्रांतिकारी कदम कामयाब हो सकता है. पत्तियां नोचने से पेड़ समाप्त नहीं होता, बुखार की दवा से पीलिया रोग ठीक नहीं हो सकता. ये तो रोग के लक्षण मात्र हैं, हमें रोग पर आक्रमण करना होगा. बाबा रामदेव, आप समझें. क्या आपको प्रधानमंत्री बना दिया जाये तो आप महंगाई रोक देंगे, बेकारी भगा देंगे, गरीबी मिटा देंगे, भ्रष्टाचार एवं अनाचार का अंत कर देंगे ? प्रधानमंत्री अपने वक्तव्य में बिल्कुल ईमानदार हैं यदि वे मानते हैं कि ‘उनके पास कोई जादुई छड़ी’ नहीं है. आपको यदि ऐसी छड़ी उपलब्ध हो तो आप जनता के सामने इसी वायदे के साथ खड़े हों न कि सत्याग्रह और अनशन रूपी अस्त्र के इस्तेमाल से अनावश्यक हिंसा एवं भ्रम का माहौल पैदा करके.


डॉक्टर अखिलेश कुमार

सेवासदन, श्रीनगर, ए. जी. कॉलोनी, पटना-२५.

मोबाईल-९२३४४२२४१३


Monday, May 16, 2011

कबीर को पढ़ते हुए--अर्थात कबीर का स्त्री पाठ


भक्तिकाल के सर्वाधिक 'क्रांतिकारी' समझे जानेवाले कवि कबीरदास ने ज्यादा काम नारी–जाति को गलियाने का ही किया. सतवंती या पतिव्रता की उन्होंने जरूर प्रशंसा की, किन्तु ‘नारी नदी अथाह जल, बूड़ि मुआ संसार’, ‘नागिन के तो दोय फन, नारी के फन बीस’, ‘नारी की झाईं परत अंधा होत भुजंग’, ‘नारी बड़ा विकार’ आदि कहकर उन्होंने नारी–जाति की घनघोर निंदा की है और ‘चली कुलबोरनी गंगा नहाय’-जैसी व्यंगोक्ति से उसका उपहास किया है. (श्री भगवान सिंह, पद्मावत : नारी-श्रेष्ठता का प्रथम काव्य, कसौटी, अंक-८, पृष्ठ १२९). इस तरह औरतों के प्रति कबीरदास ने कितना विषवमन किया है–ध्यान, समाधि, उपासना आदि के लिए स्त्री को व्यवधान बताकर उन्होंने उसकी आध्यात्मिक और बौद्धिक शक्ति की घनघोर अवमानना की है (वही, पृष्ठ १३७). ‘ज्ञातव्य है कि कबीर ने विस्तार से स्त्री-विरोधी विचार ही नहीं प्रकट किये हैं, भले भक्त होने के कारण, सती-प्रथा को भी गौरवान्वित किया है, भले प्रतीक रूप में उसका इस्तेमाल करते हुए’ (नंदकिशोर नवल, कबीर की वाणी : एक निजी पाठ, कसौटी-४, पृष्ठ ६).

कबीर के यहाँ गुस्सा एक स्थायी भाव की तरह है. कबीर का यह गुस्सा गंगा–स्नान को जाती स्त्रियों के प्रति देखने लायक है-

‘चली कुलबोरनी गंगा न्हाय।

सतुवा कराइन बहुरी भुंजाइन, घूंघट ओटे भसकत जाय।

गठरी बांधिन मोटरी बांधिन, खसम के मूंडे दिहिन धराय।

विछुवा पहिरिन औंठा पहिरिन, लात खसम के मारिन धाय।

गंगा न्हाइन जमुना न्हाइन, नौ मन मैल लिहिन चढ़ाय।

पांच पच्चीस के धक्का खाइन, घरहूं की पूंजी आइ गंवाय।’

कबीर साहब यह नहीं देख सके कि कम से कम गंगा-स्नान आदि के बहाने औरतों को घर की चहारदीवारी से बाहर निकलने का मौका मिलता था. इसे समझा जायसी ने. तभी उनकी पद्मावती और उसकी सखियाँ मानसरोबर–स्नान को अपने लिए स्वतंत्र क्रीडाओं का एक अवसर मानती हैं. मानसरोवर स्नान के बहाने ही तो पद्मवती को सात खंड के धवल गृह या अन्तःपुर के एकांत से बाहर निकलने का अवसर मिलता है. वस्तुतः जायसी ने यहाँ लोकजीवन का बड़ा ही सच्चा चित्र प्रस्तुत किया है. गांवों में जवान लड़कियां पर्व–त्यौहार के अवसर पर झुण्ड में आस-पास के तालाब या नदी आदि में स्नान करने जाती हैं–गाती हुई, चहलकदमी करती हुई और उन्मुक्तता की सांसें लेती हुई. ऐसे अवसरों का महत्त्व उनके लिए स्वतंत्रता दिवस जैसा ही होता है. जायसी ने ऐसे स्नानों के महत्त्व को पहचाना, किन्तु ‘बुद्धिवादी’ कबीर को यहाँ भी पाखंड या कर्मकांड ही नजर आया. (देखें, श्री भगवान सिंह, पूर्वोधृत , पृष्ठ १२९-३०).

स्त्री जाति के प्रति कबीर के इस गुस्से को उनकी भक्ति की अवधारणा में ढूंढा जा सकता है. उनकी भक्ति की जो अवधारणा है, वह मध्यकालीन पितृसत्तात्मक मूल्यों से प्रभावित लगती है. संभवतः इसीलिए प्रकृति ‘स्त्री’ मानी जाती है और परमात्मा ‘पुरुष’. कबीर के अनुसार स्त्री प्रकृति में आसक्त जीवात्मा स्त्रीलिंग तथा पुरुष परमात्मा में तल्लीन जीवात्मा पुल्लिंग से संबोधित होने के योग्य है, यथा–

‘समधी के संग नाहीं आई, सहज भई घरबारी.

कहैं कबीर सुनो हो संतो, पुर्ख जनम भौ नारी’ ..

जबतक सुरत प्रकृति में स्थित थी या प्रकृति–मंडल में रहकर उसके द्वारा भक्ति की जा रही थी या जबतक वह पूर्णरूपेण प्रकृति मंडल का त्याग नहीं कर सकी थी, तबतक उसके लिए स्त्रीलिंग का प्रयोग हुआ और जब ‘लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल’ की स्थिति हुई, प्रभु में समाकर प्रभु से एकाकार हो गई, तब वह पुरुषत्व प्राप्त कर ली और उसके लिए ‘ताते रहेउ अकेला’ पुल्लिंग शब्द का प्रयोग हुआ. माया में आबद्ध स्त्री है–चाहे वह स्त्री शरीर में हो या पुरुष शरीर में. जब पुरुष परमात्मा को प्राप्त कर लिया जाता है, तब वह पुरुष कहे जाने योग्य है, चाहे वह स्त्री शरीर में ही क्यों न हो। ( देखें, साध्वी ज्ञानानंद जी, अध्यात्म का आश्चर्य, श्री कबीर ज्ञान प्रकाशन केन्द्र, गिरिडीह, प्रथम संस्करण, २०००, पृष्ठ १७-१८).

स्त्री भक्ति-मार्ग में एक स्थायी बाधा (महाविकार) भी है. स्वयं कबीर की आत्मस्वीकारोक्ति देखें-

‘नारी तो हमहुं करी, तब ना किया विचार,

जब जानी तब परिहरी, नारी महाविकर’. (देखें, रामधारी सिंह दिनकर, संस्कृति के चार अध्याय , लोकभारती प्रकाशन, नवीन संस्करण २००६, पृष्ठ ४९४).

कबीर की अनेक ऐसी कविताएँ हैं जिनको लोक–परलोक, वैवाहिक प्रेम और विवाह सम्बन्धी कुरीतियों (यथा बाल-विवाह, बेमेल विवाह आदि) से सम्बंधित करके व्याख्यायित किया जाता रहा है, जबकि असलियत में उन पदों में कुछ और ही बात है. हमारा पितृपक्ष हमें लगातार भरमाकर इस तथ्य से दूर ले जाता रहा है. प्रसिद्ध पद ‘दुलहिनि मोरी गावहु मंगलाचर’ को ‘मंगलाचार’ शब्द पर जोर देकर सीधे–सीधे विवाह-उत्सव का गीत व्याख्यायित किया गया, लेकिन विवाह में ‘सरोवर के किनारे वेदी’ बनाने का विधान तो है नहीं. और यह भी कि राजस्थान में सती के गीतों को ‘मंगलाचार’ कहते हैं.

‘सरोवर’ पर जोर देते ही अर्थ-विधान ‘दुल्हन’ को ‘सती’ के लिए लाई गई स्त्री में बदल देता है. तत्कालीन दौर के घुमक्कड़ इब्नबतूता ने अपने यात्रा- वृत्तांत में लिखा है, ‘तीन कोस चलने के बाद हम एक ऐसी जगह पहुंचे जहां जल की बहुतायत थी और वृक्षों की सघनता के कारण अंधकार छाया हुआ था. वहां चार गुम्बद (मंदिर) बने हुए थे और चारों में एक देवता की मूर्ति प्रतिष्ठित थी. इन चारों के मध्य एक एक ऐसा सरोवर था जहां वृक्षों की सघन छाया होने के कारण धूप नाम को भी न थी. इस कुंड के पास नीचे स्थल में अग्नि दहकाई गई. पन्द्रह पुरुषों के हाथों में लकड़ियों के गट्ठे बांधे हुए थे और दस पुरुष अपने हाथ में बड़े –बड़े कुंदे लिए खड़े थे. नगाड़े, नौबत और शहनाई बजानेवाले स्त्रियों की प्रतीक्षा में खड़े थे ...इतना कहकर वह प्रणाम कर तुरंत उसमें कूद पड़ी. बस नगाड़े, ढोल, शहनाई और नौबत बजने लगी. उपस्थित जनता भी चिल्लाने लगी (देखें, इब्नबतूता की भारतयात्रा , सती वृत्तांत, पृष्ठ २४-२५).

सती होने की घटनाओं का मध्यकाल में आँखों देखा हाल जानना है तो कबीर की कविता सुनाती है:

‘सती जलन कूं नीकसी, पिउ का सुमिर सनेह.

सबद सुनत जिउ नीकल्या भूली गई सब देह.’

घर से सती होने को निकली वह पति के प्रेम की तथाकथित प्रतिज्ञा में भूली हुई थी. ढोल नगाडों की आवाज और सती के जयघोषों की भयावह आवाज से ही दम निकल रहा है. अब देह की सुध भला कैसे आ सकती है. जिउ निकालना कोई साधारण क्रिया नहीं है. पीड़ा का गंभीर संकेन्द्रण यहाँ है. पूरे काव्य व्यापार का बलाघात इसी एक बिंदु पर है. (अनुराधा, सती प्रथा, भक्ति काव्य और हिंदी मानसिकता , हंस, फरवरी २००८, पृष्ठ४०)। कबीर की कविता पर सती प्रकरण को लेकर बात करना इसलिए भी जरूरी है कि अबतक का सोच विचार का पितृपक्षीय दायरा मध्ययुगीन साहित्य में अधिक से अधिक श्रृंगार और मात्र कुछ धार्मिक आडम्बरों के विरोध भर को ही देख पता है. ‘धर्म के वाह्याडम्बर और शास्त्रीय जकडबंदी के प्रति संवेदनशील मन का विद्रोह ही भक्ति है.’ (देखें, मुजीब रिज्बी, मध्यकालीन धर्मसाधना , इन्द्रप्रस्थ भारती, कबीर विशेषांक, पेज१०). उनके लिए भक्ति की शक्ति प्रेम की बराबरी और सघनता तक सिमटी है. वे यह नहीं देख पाते कि आधी आबादी कहाँ गई. कबीर की कविता सती प्रसंगों को सामने लाकर यह दिखाती है कि देखो, आधी आबादी जल रही है या जलाई जा रही है:

‘विरह जलाई हौं जलूं, जलती जलहर जाऊं

मो देख्या जलहर जले, संतो कहां बुझाऊं...’ (अनुराधा, पृष्ठ ४१)

लेकिन कबीर की कविता को सती विरोध की कविता नहीं माना जा सकता. वे भी अन्य कवियों की तरह अनेक बार सती का महिमामंडन पूरे मनोयोग से करते हैं. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यदि सती की व्यथा का कोई अनुभव करता-कराता है तो भक्तिकाल में वे अकेले कवि हैं. यदि इन कविताओं का कालक्रम निर्धारित होता तो सती के प्रति उनके विचार के विकास को रेखांकित किया जा सकता था. बहुत संभव है कि किसी काल में उनके लिए सती एक आदर्श रही हो और किसी अन्य समय में सती- घटनाओं को आँखों से देखने के बाद वे अपने इस आदर्श पर कायम न रह पाए हों. (अनुराधा, पृष्ठ ४१)

मालवा में पान के बीड़े से शुरू होता है सती का मृत्यु-उत्सव. मालवा का एक लोकगीत है, ‘बावड लो नी बीड़ो पान को’. पान का बीड़ा लेने के बाद ‘स्त्री’ के लिए सती का प्रश्न प्रतिष्ठा का सवाल बन जाता है. विवाह के साथ घूँघट धारण करनेवाली स्त्री का घूँघट सती का बीड़ा लेते ही हट जाता है (सिर उघड़ जाता है). कबीर जब कहते हैं, ‘तोको पीव मिलेंगे घूँघट के पट खोल रे...कहैं कबीर आनंद भयो है, बाजत अनहद ढोल रे’ तो सती प्रकरण उनके ध्यान में है. एक पद है ‘मैं अपने साहब संग चली, हाथ में नरियल मुख में बीड़ा, मोतियन मांग भरी. लिल्ली घोड़ी जरद बछेड़ी, तापै चढ़ि के भली’. यह सती होने के लिए ले जाई जाती स्त्री का चित्र है. (अनुराधा, ४२ ).

Tuesday, April 12, 2011

जनगणना की शुरुआत, नौकरी की बरसात


वर्ष २०११ की जनगणना के आरंभिक आंकड़ों से मिले-जुले निष्कर्ष निकले जा रहे हैं. साक्षरता में वृद्धि,जनसँख्या की वृद्धि दर में कमी आदि के बहाने कहा जा रहा है कि २१ वीं सदी का भारत अपने भविष्य के बारे में सचेत हो रहा है. लेकिन जिस जनगणना रिपोर्ट के आधार पर ऐसे निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं उसे ही अगर कागजी आंकड़ेबाजी का पुलिंदा कहें तो गलत न होगा। जनगणना प्रभारी और चार्ज अधिकारियों की रिपोर्ट में कार्य पूरा हो चुका है, जबकि असंख्य नागरिक ऐसे हैं, जो जनगणना से अब भी वंचित हैं। जिन तथ्यों पर स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर रचनात्मक कार्य होने हैं, वोटरकार्ड की तरह सरकारी अमलों ने उन्हीं आंकड़ों को ड्रामा बना दिया है। जनगणना के दूसरे चरण में गंभीरता और सक्रियता बरतने की हिदायतों के बावजूद अफसरानों ने बेहद हल्कापन दिखाया।

जाहिर है कि हर दस वर्ष पूरे होने पर देश में भारत सरकार द्वारा जनगणना कराई जाती है ताकि देश के विभिन्न राज्यों में रहनेवाले नागरिकों की संख्या के आंकड़े मिले सके। इसके आधार पर भविष्य में आवासीय, खाद्यान्य और मूलभूत सुविधाओं की विकास योजनाओं का खाका तैयार किया जाता है, जिसमें जनगणना की संख्या के आधार पर गरीब योजनाओं में गरीबों को लाभ मिलने की बात होती है. लेकिन जनगणना कर्मियों द्वारा जिस प्रकार से जनगणना को कागजों में निपटाया गया है, ऐसे में भविष्य की योजनाओं में देशवासियों को योजनाओं का वो लाभ नहीं मिल सकेगा, जिसके वे हकदार हैं।

कहना न होगा कि गणना उन्हीं लोगों की करनी थी जो ९ से २८ फरवरी के बीच जनगणना स्थल पर पाये गये हों. लेकिन ऐसा शायद ही हो सका. उन तमाम लोगों की गणना कर ली गई जो उक्त अवधि के बीच वहां नहीं रहे. इसके साथ ही एक-एक आदमी की गणना टिन या उससे अधिक जगहों पर हुई. जैसे अगर कोई व्यक्ति या परिवार जो भागलपुर के किसी गांव का निवासी है और कुछ दिनों/सालों तक पटना में रहने के बाद दिल्ली आदि महानगरों में रहने लगा तो उसकी गिनती इन तीनों ही जगहों पर हुई. गांव में भी उसकी गणना हुई फिर पटना और दिल्ली में भी. ऐसे लोगों की आबादी बहुत अधिक है जो एक से अधिक जगहों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे.

दूसरे, जनगणना के दूसरे चरण के अंतिम दिन अर्थात 28 फरवरी 2011 को सभी बेघरों को भी गणना होनी थी. देश के तमाम प्रगणकों को 28 फरवरी की अर्धरात्रि में अपने गणना ब्लाक में घूम घूमकर बेघर लोगों की गणना करनी थी। इसके अंतर्गत भिखारियों, घुम्मकड़ों, फेरीवालों, सामान बेचने वाले तथा सड़कों के किनारे, रेल पटरियों व प्लेट फार्मो, बस अड्डों, पार्को, पुलों व पूजा स्थलों के बाहर खूलें में सोने वाले व्यक्तियों की गणना की जानी थी. रात्रि को बेघर परिवारों की गणना के लिए विशेष प्रबंध भी किये जाने थे. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हो सका. जनगणना कर्मियों की लापरवाही से इनमें से अधिकांश की गणना नहीं हो सकी। अधिकतर जनगणना कर्मचारी रात्रि में घूमकर बेघरों की गणना करने की बजाय घरों पर सोते रहे।

अव्वल तो यह कि २८ फरवरी की अर्धरात्रि की बेघर परिवार के लोगों की गणना शहरी क्षेत्र के लिए नहीं तो कम से कम ग्रामीण क्षेत्र के लिए एकदम ही अव्यावहारिक थी. हिंदुस्तान और खासकर बिहार के कई गांव आज भी ऐसे हैं जो दिन में दुर्गम्य हैं. उन गावों में रात में पहुंचकर लोगों की गणना करना कल्पना मात्र है. प्रगणक अगर उसी गांव के होते तो इस बारे में कुछ आशा भी बंधती लेकिन ऐसा नहीं था. प्रगणक दूसरे गांव के और गणना दूसरे गांव की करनी थी उसमें भी अर्धरात्रि को. बिहार जैसे अनेक प्रान्तों में जहां के अधिकतर क्षेत्र अति संवेदनशील हों और प्रशासन तक जाने में भय खाता हो, प्रगणक से यह उम्मीद करना कि मध्यरात्रि को पहुंचकर वे गणना करेंगे, भारी भूल थी या फिर ऐसे नतीजों को वे पहले ही से नियति मानकर इत्मीनान थे. शायद इसीलिए अर्धरात्रि की गणना के लिए कोई प्रबंध नहीं किया जा सका था. नतीजतन बेघर परिवारों की गणना नहीं हो सकी. अगर कही-कहीं ये आंकड़े आए भी तो नकली. इसे घर में बैठे-बिठाये ही भर लिया गया.

५ मार्च तक पुनरीक्षण का कार्य करना था. इस बीच प्रगणक को अपने गणना ब्लौक जाकर जन्म और मृत्यु की अद्यतन जानकारी हासिल करनी थी तथा नवजात शिशु का नाम दर्ज करना था और मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति का नाम सूची से काटना था. इस तरह प्रगणक एवं पर्यवेक्षक को जनगणना की अंतिम रिपोर्ट ५ मार्च के बाद प्रस्तुत करनी थी लेकिन अपने को तनाव-मुक्त रखने के लिए चार्ज अधिकारियों ने २८ के तुरंत बाद ही जमा करा लिया. इस तरह ५ मार्च तक जो पुनरीक्षण का कार्य होना था वह नहीं हो सका. तात्पर्य यह कि अंतिम रिपोर्ट जो ५ मार्च तक की जानकारी के आधार पर तैयार करनी थी उसे २८ को ही भर लिया गया. ऐसे में जनगणना रिपोर्ट कितनी विश्वसनीय हो सकी है, सहज ही सोचा जा सकता है.

सूचनादाता से २९ सवालों की जानकारी हासिल करनी थी लेकिन कई जगहों पर ऐसा भी हुआ कि प्रगणक अपने गणना ब्लौक न जाकर घर में ही बैठे-बिठाये सारे खाने भर डाले. उम्र आदि में अंतर का भी ध्यान नहीं रखा गया. नतीजतन एक गांव के सारे लोग या तो २२ साल के दिखाए गये या ३२ साल के. इसका नतीजा यह हुआ कि वृद्ध या बच्चों के सही आंकड़े नहीं आ सके.

इसका एक हास्यास्पद पहलू यह भी रहा कि जिन कर्मियों को जनगणना कार्य के लिए नियोजित किया गया था उनमें से बहुत कम ही लोग ऐसे थे जो कार्य की महत्ता एवं गंभीरता को समझते हुए अंजाम दे सके. अधिकतर लोगों ने अपना काम दूसरे लोगों से कराया. लोग बाग के बीच यह मजाक काफी लोकप्रिय रहा कि ‘जनगणना की शुरुआत क्या हुई, नौकरी की बरसात हुई,’ बिहार में आंगनवाडी सेविकाओं/महिलाओं को इस ‘महत्वपूर्ण’ कार्य में व्यापक तौर से लगाया गया. अधिकतर सेविकाएं जो अपना हस्ताक्षर तक करना नहीं जानती, ने जनगणना फॉर्म कैसे भरा होगा आसानी से समझा जा सकता है. कुछ के पति-बेटे तो कुछ के ‘सहयोगी’ की भूमिका महत्वपूर्ण रही. कई सेविकाएं ऐसी भी हैं जिन्होंने अपना हस्ताक्षर तक नहीं किया. यह काम भी उसके पति-बेटे या सहयोगी करते रहे.

इसलिए ये आंकड़े विश्वसनीय नहीं हैं. इनके आधार पर कोई नीति निर्धारित करना हमारी ऐतिहासिक भूल हो सकती है. वैसे हमारी सरकार के पास ऐसी भूलों का भी एक इतिहास है.

Sunday, February 6, 2011

नया पाठ्यक्रम , पुरानी मानसिकता



कहना न होगा कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रुपरेखा (२००५) इस बात की प्रस्थापना करती है कि बच्चों के स्कूली जीवन को बाहर के जीवन से जोड़ा जाना चाहिए. यह प्रस्थापना किताबी ज्ञान की उस पारंपरिक विरासत के विपरीत है जिसके प्रभाववश हमारी शिक्षा-व्यवस्था आज तक स्कूल और घर के बीच ‘मर्यादा’ का अंतराल में विश्वास करती रही है. इस नई पाठ्यचर्या पर आधारित पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुसतकें उपरोक्त बुनियादी विचार पर अमल करने का प्रयास हैं. इस प्रयास में हर विषय को एक मजबूत दीवार से घेर देने और जानकारी को रटा देने की प्रवृत्ति का विरोध शामिल है. ऐसे प्रयास राष्ट्रीय शिक्षा नीति (१९८६) में वर्णित बाल-केंद्रित शिक्षा-व्यवस्था स्थापित करने की दिशा में ऐतिहासिक महत्त्व के साबित होंगे.

पुराने पाठ्यक्रम के बच्चे इतिहास विषय के प्रति अरुचि प्रदर्शित करते कहा करते थे-‘इतिहास-भूगोल है बेवफा, सुबह पढ़ो शाम को सफा’. तब इतिहास पढ़ने-पढ़ाने का मतलब तिथि और घटनाओं का रट्टा मारना होता. थोड़ी भी चूक होने पर शिक्षक या अभिभावक की कोफ़्त का शिकार होना पड़ता और मार खानी होती. अब इतिहास की धारणा बदली है. हालाँकि नेहरु काफी पहले ही अपनी दस-वर्षीया बेटी इंदु (तब इंदिरा नहीं बनी थी) को लिखे पत्रों में स्पष्ट कर चुके थे कि इतिहास का मतलब चंद तारीखों से नहीं, बल्कि समाज में परिवर्तन लानेवाली ताकतों से है. साथ यह भी कि इन्हीं ताकतों की वजह से ‘विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों में’ एक सामान्य आदमी भी नायक हो जाता है. वर्ग ८ के इतिहास के पाठ्यक्रम के माध्यम से बच्चों में इन्हीं विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों की समझ पैदा करने की कोशिश है. बच्चों में किसी भी घटना के बारे में ‘क्यों’ और ‘कैसे’ जैसे महत्वपूर्ण सवाल करने की समझ और जिज्ञासा पैदा करने का यत्न है. ‘क्यों’ और ‘कैसे’ जैसे सवाल पहली नजर में अति सामान्य प्रतीत हो सकते हैं लेकिन गंभीरता से विचार करने पर पता चलता है कि यह दरअसल इतिहास का ‘कार्य-कारणवाद’ है. मजे की बात है कि यह सब वर्ग ८ के बच्चों को बगैर किसी दार्शनिक सूत्र का सहारा लिए कथा एवं संवाद शैली के माध्यम से खेल-खेल में बताया जा रहा है.

इतिहास एक वैश्विक परिघटना है. भारत के अतीत की कहानी दुनिया के लंबे इतिहास से जुड़ी हुई है. इस बात को समझे बगैर भारत के इतिहास (अतीत) में आये परिवर्तनों को समझना आसान नहीं रह जाता. यह बात तब और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब आज वैश्वीकरण के इस दौर में तमाम अर्थव्यवस्थाएं और समाज दिनोंदिन गहरे तौर पर एक-दूसरे से जुड़ते जा रहे हैं. इतिहास को हमेशा भौगोलिक सीमाओं में बंद करके नहीं देखा जा सकता. उदहारण के तौर पर, हम भारत में मुग़ल साम्राज्य के पतन को ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन (विशेषकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी) और दोनों ताकतों के बीच के अंतर्विरोध को जाने बगैर नहीं समझ सकते. ठीक इसी तरह फ़्रांस की राज्यक्रांति को अमेरिकी स्वतंत्रता संघर्ष के बगैर नहीं समझा जा सकता. और इन तमाम यूरोपीय घटनाक्रमों को को जाने-समझे बगैर भारत में राष्ट्रवाद के उद्भव एवं विकास को जानने-समझने का दावा कितना भ्रामक और निराधार हो सकता है-आसानी से समझा जा सकता है. इसलिए फ्रांसीसी इतिहासकार फर्नांड ब्रौदेल के शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि ‘विश्व के बिना राष्ट्र की बात नहीं हो सकती’. अलग से कहने की जरूरत शायद शेष नहीं कि कक्षा ९ और १० की इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों का मुख्य जोर यही समझाने पर है.

ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि आज से पहले के पाठ्यक्रमों में विश्व इतिहास का अध्ययन अनुपस्थित/उपेक्षित रहा है. बल्कि यह कहना शायद ज्यादा उचित होगा कि नये पाठ्यक्रम में विश्व इतिहास की ‘प्रस्तुति’ एक बदले हुए अंदाज में हुई है. अब तक आधुनिक विश्व का इतिहास अक्सर पश्चिमी दुनिया के इतिहास पर ‘आश्रित’ रहा है. मानो सारे परिवर्तन और सारी तरक्की सिर्फ़ पश्चिम के देशों में ही होती रही हो, बाकी देशों के इतिहास एक समय के बाद ठहरकर रह गये हों. गतिहीन और जड़ हो गये हों. इस इतिहास में पश्चिम के लोग उद्यमशील, रचनात्मक, वैज्ञानिक मेधायुक्त, मेहनती, कुशल और बदलाव के लिए तत्पर दिखाई पड़ते हैं. दूसरी तरफ पूर्वी समाज-या अफ्रीका और दक्षिणी अमेरिका के लोगों को परम्परानिष्ठ, आलसी, अंधविश्वासी, और बदलावों से कन्नी काटनेवाला दिखाया जाता है. उपरोक्त प्रथम कोटि का इतिहास उपनिवेशवाद के दौर में प्रस्तुत किया गया था, अपने निहित स्वार्थ के तहत. भारत समेत एशियाई देशों की ऐसी अपरिवर्तनीय छवि प्रस्तुत किये बगैर यूरोप अपनी ‘नस्ली श्रेष्ठता’ घोषित नहीं कर सकता था. इसी श्रेष्ठता-बोध से यूरोप की गोरी जातियों को एशियाई देशों के लोगों को सभ्य बनाने का ‘नैतिक भार’ मिला था. नये पाठ्यक्रम ने जो विश्व इतिहास की प्रस्तुति की है उससे यूरोप की श्रेष्ठता का मिथ्या आवरण हट चुका है. अब बच्चे समझ सकते हैं कि भारत का इतिहास मात्र राजे-रजवाड़े, नटों-सपेरों का ही नहीं रहा है, बल्कि वैज्ञानिक प्रगति का भी उसमें अहम हिस्सा है.

हालाँकि कहा जा सकता है कि पाठ्यक्रम के निर्माण में कुछ अति उत्साह का भी प्रदर्शन हो गया है जिसे वर्तमान शैक्षणिक परिवेश में व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता. विहित हो कि वर्ग ९-१० के छात्रों के पाठ्यक्रम में साहित्य, क्रिकेट, पोशाक आदि विषयों का इतिहास भी शामिल किया गया है. पाठ्यक्रम निर्माता शायद इस बात से अनभिज्ञ हैं कि इसे लागू करनेवाले शिक्षक स्वयं पठन-पाठन’ के ‘मल्टी डिसिप्लिनरी एप्रोच’ के कितने कायल हैं. कहना न होगा कि इन शिक्षकों की शिक्षा-दीक्षा की जो परिपाटी रही है, उसमें हर विषय का अपना एक जबरदस्त घेरा है. सभी विषय अपनी-अपनी दीवारों से घिरे हैं. कुछ दिनों पहले तक या कहें कि पुराने पाठ्यक्रम के लिहाज से इतिहास विषय को पढ़ाते हुए अपेक्षा होती थी कि शिक्षक अथवा छात्र साहित्य आदि की चर्चा न करे. ऐसा करना विषय की मर्यादा का उल्लंघन अथवा कहें कि साफ विषयान्तर माना जाता था. कहना जरूरी नहीं कि यह शिक्षक एवं छात्र दोनों ही की विषयगत कमजोरी समझी जाती थी.

अब जबकि नये पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ाना है, उस शिक्षक से जो ‘विषय की शुचिता’ का कायल और पैरोकार रहा है, उम्मीद की जाती है कि वे क्रिकेट से लेकर फिल्म तक को अपने अध्ययन का विषय बनायें. ये वही शिक्षक हैं जो ‘खेलोगे-कूदोगे होगे खराब, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब’ जैसी ‘सूक्तियों’ का ‘मन्त्र-जाप’ करते रहे हैं. क्रिकेट और फिल्म की बात करने मात्र से छात्रों को ‘भ्रष्ट’ का खि़ताब देनेवाले शिक्षक इन चीजों की पढ़ाई करवाना किसी बड़े ‘अनर्थ’ से कम है क्या? तात्पर्य यह कि सरकार को पहले शिक्षण-प्रशिक्षण के जरिये शिक्षकों में नये पाठ्यक्रम के अनुकूल मानसिकता पैदा करने की चेष्टा करनी चाहिए थी. लेकिन दुर्भाग्यवश भारत की शिक्षा-व्यवस्था औपनिवेशिक काल से ही ‘अभिनव प्रयोग’ की शाला रही है. इतिहास के पाठ्यक्रम में पोशाक (ड्रेस) के इतिहास को शामिल करनेवाले इतिहासकारों ने यह सोचने की जहमत ही नहीं उठायी कि अपने मुल्क में इसपर अद्यतन शोध की क्या स्थिति है. जिस तरह संविधान निर्माताओं ने विश्व के तमाम दूसरे सविधनों की अच्छी बातों का ‘अजायबघर’ रच डाला. यह ध्यान ही न रहा कि भारतीय जनमानस उसके लिए सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से तैयार है भी या नहीं. यह नया पाठ्यक्रम भी कुछ मामलों में उसी की स्मृति ताजा कराता है.

Tuesday, January 11, 2011

विवेकानन्द और भारतीय नवजागरण

स्वामी विवेकानन्द उन्नीसवीं शती के महान विभूतियों में से एक थे। इनका नाम इनके गुणों के कारण इतिहास के पन्नों में सदा के लिए अमर रहेगा। सच्चे अर्थों में स्वामी जी संपूर्ण एवं अखंड राष्ट्रीयता के समर्थक थे। वे राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति थे। सत्य तो यह है कि उनका उदय आध्यात्मिक भूख के साथ हुआ, लेकिन इन्होंने जल्द ही अपने आपको राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ लिया। प्रायः ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो मुख्यधारा से जुड़ पाते हैं। स्वामी जी ने अपनी मर्यादा का पालन बखूबी किया।

स्वामी विवेकानन्द हिन्दू धर्म के समर्थक थे। हिन्दू धर्म अपनी रूढ़ियों के कारण पतन की ओर अग्रसर था। इस धर्म के क्रमशः ह्रास का कारण कट्टर वेदवाद का प्रचार था। उन्नीसवीं शती में ईसाई धर्म के व्यापक प्रचार एवं प्रसार के कारण हिन्दू धर्म बिखरता सा प्रतीत होने लगा। ऐसे में स्वामी जी ने धर्म समाज में व्याप्त रूढ़ियों एवं अंधविश्वासों का विरोध करना ज्यादा जायज समझा। यही वजह थी कि स्वामी जी केवल वेद ही नहीं बल्कि हिन्दू धर्म की सभी श्रेष्ठ परंपराओं को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। इसी दौर में इन्होंने इस बात की स्थापना की कि वेदांत केवल हिन्दुओं का धर्म नहीं है अपितु यह सभी मनुष्यों का धर्म है। इस प्रकार विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म को जाति तथा साम्प्रदायिक भावना से अलग करने की कोशिश की। स्वामी जी ने अपनी धार्मिक भावना का इजहार करते हुए कहा था-‘‘हमारे धर्म को रसोईघर में चले जाने का खतरा है। हमलोग न तो वेदांती हैं न पुरानी और न तांत्रिक ही, हमलोग महज छुआछूतवादी हैं। मेरा ईश्वर भोजन बनाने के बर्तन में है और मेरा धर्म है मुझे मत छुओ मैं पवित्र हूं। अगर अगली शताब्दी तक यही होता रहा तो हममें से प्रत्येक पागलखाने में होगा।’’ इस प्रकार विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों तथा संकीर्णताओं का विरोध करके इसे ज्यादा से ज्यादा उदार बनाने की कोशिश की। स्वामी ने स्वच्छ तथा आडंबर रहित जीवन को सच्चा सुख माना है। विवेकानन्द मानवतावादी थे।

स्वामी जी न सिर्फ धार्मिक बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महान थे। भारत में राजनीतिक चेतना को जगाने का काम भी इन्होंने काफी दिलचस्पी तथा लगन के साथ किया। उन्होंने देशवासियों को जगाने का बीड़ा अपने कंधों पर उठाया। इनका यह मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर सेल्फ कांफिडेंस जैसी भावना का विकास होना जरूरी है। इसी क्रम में इन्होंने कहा, ‘‘अगर दुनिया में पाप है तो वह दुर्बलता है। हर तरह की दुर्बलता से बचो। दुर्बलता पाप है, दुर्बलता मृत्यु है। जो भी चीज तुम्हें शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक रूप में दुर्बल बनाती है उसे जहर की तरह तिरस्कृत करो। उसमें कोई जीवन नहीं है। वह सत्य नहीं हो सकती।’’

विवेकानन्द ने अतीत के मोह का भी काफी जमकर विरोध किया। इस प्रकार विवेकानन्द भारतीय राजनीति में पहला व्यक्तित्व था जिसने अतीत की महिमा के दिवास्वप्न को भ्रम कहा और देशवासियों को इससे अलग रखा। देश के नवयुवकों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए इन्होंने कहा था, ’’हे परमेश्वर! वह समय कब आयगा जब हमारे देश के लोग निरंतर अतीत में जीने की प्रवृत्ति से मुक्त होंगे।’’ इस प्रकार खासकर युवा वर्ग को इन्होंने अलग रखने को कहा।

गौर फरमाने की चीज है कि एक तरफ विवेकानन्द ने अतीत के मोह का विरोध किया, तो दूसरी तरफ इन्होंने पश्चिमी संस्कृति की अंधाधुंध नकल पर भी आपत्ति व्यक्त की। विवेकानन्द ने सीधे तौर पर अंग्रेजी राज का विरोध किया। देश की गुलामी उनके जीवन का सबसे बड़ा कष्ट थी। यूरोपीय संस्कृति की तुलना में भारत की मूल संस्कृति की आत्मा को ज्यादा श्रेष्ठ बताया। ध्यान देने की बात है कि विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म को श्रेष्ठ साबित करके भारत में राष्ट्रीयता जगाने की कोशिश की है। विवेकानन्द पहले व्यक्ति थे जिनमें हमें इस प्रकार की देशभक्ति देखने को मिलती है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में ऐलान किया, ‘‘भारत में ....मेरा प्राण है भारत के देवता मेरा भरण-पोषण करते हैं। भारत मेरे बचपन का हिंडोला मेरे यौवन का आनंदलोक और मेरे बुढ़ापे का बैकुण्ठ है।’’ विवेकानन्द ने भारत के प्रति अपनी असीम भक्ति दिखाते हुए कहा था कि ‘तुम्हारी भक्ति और मुक्ति की परवाह किसे है और कौन इसकी परवाह करता है कि तुम्हारे धर्मग्रंथ क्या कहते हैं। मैं बड़ी खुशी से एक हजार बार नरक जाने को तैयार हूं अगर उसमें देशवासियों को ऊंचा उठा सकूं।’

विवेकानन्द सच्चे अर्थों में संत थे। इन्होंने भारत की मूल संस्कृति तथा परंपरा को हमेशा जीवित रखने की कोशिश की। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने आध्यात्मिक सूत्रों से दैनिक जीवन की समस्याओं को हल करने की कोशिश की। इस प्रकार यह कहना ज्यादा तर्कसंगत होगा कि विवेकानन्द को दैनिक जीवन के अध्यात्म में विशेष आस्था थी।
प्रकाशन: आर्यावर्त , पटना , 10 जनवरी, 1988।