Friday, November 21, 2008

विचार जड़ता के खिलाफ जंग है- 2

विचार जितने छिपे हों, लेखक के लिए उतना अच्छा...

इन्हीं दिनों एंगेल्स की पंक्ति- "विचार जितने छिपे हों, लेखक के लिए उतना ही अच्छा है"- ने मेरे विवेक को जागृत कर दिया। आज मैं कह सकने की स्थिति में हूं कि विचारधारा और सामाजिक यथार्थ का बेहतर समन्वय ही किसी रचना को बेहतर बना सकता है। विचारधारा की ठूंस-ठांस से कोई कालजयी कृति तैयार नहीं की जा सकती। शायद इसलिए मुझे गोर्की की "मां" की तुलना में जो दोनों आत्मकथात्मक उपन्यास हैं, कहीं अधिक भारी और मूल्यवान लगते हैं। तोलस्तोय का "पुनरुत्थान" मुझे महान रचना लगती है, क्योंकि उसमें "युद्ध और शांति" वाली दार्शनिक मुद्रा का अभाव पाता हूं। हावर्ड फास्ट का हिंदी में "आदि विद्रोही" नाम से अनूदित उपन्यास आज भी मेरे लिए एक चमत्कार की तरह है।

शायद कुछ मार्क्सवादी मित्र नेहरू की "डिस्कवरी ऑफ इंडिया" के प्रशंसक होने पर उंगली उठा दें। ये सभी विश्व साहित्य की "दुर्लभ" कृतियां हैं, क्योंकि विचारधारा की अपेक्षा "विजन" का फलक यहां ज्यादा बड़ा है। कलाकार बनने के लिए जीवन दर्शन से अधिक मार्मिक, सहानुभूति आवश्यक है। दृष्टिकोण से अधिक वह दृष्टि आवश्यक है, जो जीवन के हर पहलू को देख सके। राहुल सांकृत्यायन की यह पंक्ति, जो शायद अपने मूल में बुद्ध की है, "बेड़े की तरह पार करने के लिए मैंने विचारों को स्वीकार किया, न कि उन्हें सिर पर उठाए फिरने के लिए"- आज कहीं ज्यादा आश्वस्त करती है।

हालांकि दुनिया भर में वैसे लेखकों की भी एक परंपरा रही है जो विचारों को पास भी फटकने नहीं देना चाहते। उनका सारा श्रम इसी "कसरत" में लग जाता है और रचना निस्तेज हो जाती है। ये वही लोग हैं जो खुलेपन के नाम पर विचारहीनता की फसल काटना चाहते हैं। निस्संकोच कह सकता हूं कि मैं खाली दिमाग का नहीं, खुले दिमाग का कायल हूं।

कला की सभी विधाओं में विचारधारा का महत्त्व समान रूप से नहीं होता। भाषा के बिना विचारों की व्यंजना नहीं होती। इसलिए जिन ललित कलाओं में भाषा का प्रयोग नहीं होता, उनमें विचारों का अभाव होना भी अनिवार्य है। इसीलिए चित्रकला की तुलना में संगीत और रंगमंच साहित्य से ज्यादा गहरे जुड़े हैं। संगीत की शक्ति उसके विचारों, संकल्पनाओं और सामान्यीकरण में है। उसकी शक्ति सबसे उतकट रूप में जीवन के आंतरिक आत्मिक सारतत्त्व के उद्घाटन में प्रकट होती है।

संगीत का यह गुण उसे साहित्य के निकट ले आता है। इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते मुझे कहना चाहिए कि रंगमंच का विकसित स्टेज साहित्य है। वैसे भी देखें तो रंगमंच में आंशिक अभिव्यक्ति की ही प्रमुखता है जो शायद मानव अभिव्यक्ति की पहली प्रविधि रही है। अभिव्यक्ति का आदिम रूप होने की वजह से ही कलाकार मंच पर तटस्थ तो रह सकता है, निष्क्रिय नहीं। रूसी कलाकार शोस्ताकोविच ने ठीक ही कहा था कि "आज का रंगमंच दार्शनिक चिंतन के बिना, विश्व दृष्टिकोण के बिना नहीं रह सकता। स्वांग किया जा सकता है, गुदगुदी पैदा की जा सकती है, लेकिन वह निरर्थक ही होगा।"

खासतौर से सांप्रदायिकता और आतंकवाद औपनिवेशिक भारत की देन हैं। धर्मनिरपेक्षता भारत की मूल संस्कृति रही है। अशोक के अभिलेख में- जो भारतीय इतिहास के सबसे पुराने लिखित रूप में है- धार्मिक सहिष्णुता पर जोर दिया गया है। और हमें कहना चाहिए कि वह अकेला शासक नहीं है। यह और बात है कि धर्मनिरपेक्षता, जो हिंदी में सेक्युलरिज्म शब्द का तर्जुमा है, आधुनिक यूरोप की अवधारणा है और राष्ट्र-राज्यों के अभ्युदय के साथ पैदा हुई है। सांप्रदायिकता के खिलाफ हिंदीसाहित्य में भारतेंदु, प्रेमचंद और यशपाल से लेकर आज तक एक मुकम्मल लड़ाई जारी है।

जारी...

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