Tuesday, September 8, 2026

वाचिक परंपरा के निहितार्थ

बीसवीं-इक्कीसवीं शताब्दी में, जहां लिखित शब्दों की दुनिया का अपना एक अलग ही सम्मोहन है, वहां भाषा और साहित्य का एक बड़ा आलोचक/समीक्षक वाचिक परंपरा का चुनाव क्यों करता है? क्या यह ज्ञान की सामूहिकता के विरुद्ध व्यक्तिकेन्द्रित कोई राजनीति अथवा रणनीति है? आइए, जरा हम पीछे इतिहास में चलें और वहां ज्ञान के वर्चस्व की राजनीति को समझने की कोशिश करें।

अगर प्राचीन भारत का इतिहास देखें तो आधी से अधिक आबादी, अर्थात स्त्री और शूद्र को शिक्षा से दूर रखा गया। कहा गया कि इन्हें वेदपाठ आदि करने का कोई अधिकार नहीं है, ये शब्दों को बिगाड़कर कहते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि तब हम लेखनकला से परिचित नहीं थे, साहित्य/ज्ञान और ज्ञान का वर्चस्व केवल मौखिक परंपरा में जीवित और अक्षुण्ण रह सकता था। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक साहित्य/ज्ञान अपने 'अपरिवर्तित' और 'सीमित' रूप में जाय, इसके लिए अगर एक ओर भाषा में 'शुद्धता', 'उच्चारण' आदि पर एक हद तक 'अनावश्यक जोर' की आवश्यकता थी तो दूसरी ओर वाचिक/मौखिक परंपरा की अनिवार्यता और महत्ता सिद्ध करनी थी। अकारण नहीं है कि 'पुस्तक से पढ़नेवाले को निकृष्ट पाठक कहा गया है।' (पाणिनीय शिक्षा, 32) यह वह दौर था जब गुरु ही शास्त्र/टेक्स्ट हुआ करता था। प्राचीन काल में एक ही ग्रंथ के कई टेक्स्ट्स मिलने और गुरु के गोविंद होने के इस सम्भव कारण से इनकार नहीं किया जा सकता।

ज्ञान की 'मौलिकता' और 'वर्चस्व' की रक्षा का दायित्व ब्राह्मणों के पास था। उसने लोगों में डर पैदा किया कि मंत्रों के गलत उच्चारण के कुप्रभाव से यजमान को अनिष्ट भोगना पड़ सकता है। तैत्तिरीय संहिता (2/4/12/1) एवं शतपथ ब्राह्मण (1/6/3/8) त्वष्टा की एक गाथा का वर्णन है जो इस विषय में हमारी मदद कर सकता है। गाथा है कि त्वष्टा 'इंद्रशत्रु' (जिसका अर्थ है इंद्र का नाशक) शब्द का उच्चारण तत्पुरुष समास में करना चाहता था (जिसमें समास के अंतिम अंश में उदात्त स्वर लगाना चाहिए), किन्तु उसने बहुव्रीहि समास के रूप में ही (इंद्र होगा शत्रु जिसका) उच्चारण कर दिया (यहां समास के प्रथम शब्द में उदात्त स्वर आ गया) और फल उलटा हो गया अर्थात 'इंद्र के शत्रु' के स्थान पर इंद्र ही को प्रधानता मिल गई और त्वष्टा की कामना पूर्ण नहीं हो सकी। (पाणिनि 6/1/223, 6/2/1; धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 241)

हालांकि इस डर का भी एक सीमा तक ही प्रभाव रहा होगा क्योंकि पाणिनि कई तरह के उच्चारण की बात करता है। उच्चारण की इतनी गड़बड़ी थी कि कई शब्दों के स्रोत, अर्थ और निर्माण/विकास प्रक्रिया उन्हें भी अज्ञात थे। इस समस्या को दूर करने के उद्देश्य से उन्होंने एक 'व्याकरण' तैयार किया। उनके चेलों ने कुछ इतनी सख्ती से सूत्रों को लागू किया कि इस व्याकरण से इधर-उधर होने का मतलब 'अपाणिनीय' अर्थात अशुद्ध/गलत होना था, ये और बात है कि भाषा की नदी में आई बाढ़ को व्याकरण का बांध कब रोक पाया है!

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