Sunday, September 6, 2026

देशकाल, परिवेश और अनुवाद की समस्या

अनुवाद एक अत्यंत कठिन दायित्व है। रचनाकार किसी एक भाषा में सर्जना करता है, जबकि अनुवादक को एक ही समय में दो भिन्न भाषा और परिवेश/वातावरण को साधना होता है। परिवेश और वातावरण पर बल देते हुए राधाकृष्णन ने गीता के अनुवाद के बहाने कहा था-‘गीता के किसी भी अनुवाद में वह प्रभाव और चारुता नहीं आ सकती, जो मूल में है। इसका माधुर्य और शब्दों का जादू किसी भी अन्य माध्यम में ज्यों का त्यों ला पाना बहुत कठिन है। अनुवादक का यत्न विचार को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करने का रहता है, परन्तु वह शब्दों की आत्मा को पूरी तरह सामने नहीं ला सकता। वह पाठक में उन मनोभावों को नहीं जगा सकता, जिनमें कि वह विचार उत्पन्न हुआ था।’ (राधाकृष्णन, भगवद्गीता (हिंदी), राजपाल एंड संस, 'भूमिका', पृष्ठ 8)

एक अनुवादक के लिए स्थानीय संस्कृति, परिवेश और वातावरण का ज्ञान आवश्यक है। बात 1920 के आसपास की है, जब ‘ललाट में लाल चंदन का टीका लगाए हुए भारतीय महिला की फोटो देखकर एक अमेरिकन स्त्री ने कहा था कि यह इसके पति द्वारा मारी हुई ईंट के कारण निकला हुआ रुधिर-चिह्न है।’ (गणेशशंकर विद्यार्थी रचनावली : एक, पृष्ठ 187) महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भी एक रोचक तथ्य की ओर ध्यान दिलाया है। एक बार कलकत्ते के किसी अखबार में एक खबर छपी थी कि उसी तरफ किसी जिले के अंगरेज मजिस्ट्रेट अपने इजलास में बैठे हुए एक मुकद्दमा सुन रहे थे। उस समय मुकद्दमे वालों में से किसी ने कहा कि ‘‘इस जमीन पर चिर दिन (बहुत रोज) से कब्जा है’’। साहब ने समझा कि 'चिर दिन' किसी आदमी का नाम है। इससे आपने 'चिर दिन' के हाजिर होने का हुक्म दे दिया! (महावीरप्रसाद द्विवेदी, सहित्यालाप, खड्गविलास प्रेस, पटना, 1929, पृष्ठ 166)

यद्यपि किस्सा है, लेकिन रोचक एवं सारगर्भित है। कहानी है कि कई साल पहले एक इतिहासकार वीर कुंवर सिंह पर शोध के सिलसिले में भारत आये थे। उन्होंने एक फाइल में burhi शब्द लिखा देखा जिस पर कुंवर सिंह ने कभी एक लाख रुपये खर्च किये थे। उक्त इतिहासकार ने लिखा कि वीर कुंवर सिंह की एक बूढ़ी हो चली रखैल थी जिस पर उन्होंने रुपये खर्च किये थे। एक जमींदार के बारे में ऐसा निष्कर्ष निकालना तनिक स्वाभाविक और सुविधाजनक भी था। कुछ दिनों बाद उसी फाइल को एक बिहारी इतिहासकार ने देखा और burhi को ‘बरही’ पढ़ा। लिखा कि कुंवर सिंह ने पोते की ‘बरही’ पर लाख रुपये खर्च किये थे। 'जालहंस की सुभाषित मुक्तावली’ में चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने एक भारतीय विद्वान की खोज पर व्यंग्य किया है। उक्त विद्वान ने अंग्रेजी माध्यम से अर्जित संस्कृत ज्ञान की वजह से जल्हण को जालहंस बना दिया था। दरअसल उसने रोमन लिपि में लिखे Jalhan's को 'जालहंस' पढ़ लिया। (मस्तराम कपूर, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, साहित्य अकादेमी, द्वितीय संस्करण ; 1993, पृष्ठ 52)

रवींद्रनाथ ठाकुर ने एक बार पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी से कहा था : ‘हिन्दी मैं पढ़ लेता हूँ, सामान्यतः उसका अर्थ भी समझ लेता हूँ, किन्तु शब्दों के साथ जो वातावरण लिपटा होता है, उसे मैं नहीं समझ सकता। सच तो यह है कि शब्दों के साथ लिपटे हुए वातावरण का ज्ञान मुझे अपनी भाषा को छोड़कर और कहीं भी नहीं होता, यहां तक कि अंग्रेजी में भी नहीं।’ (दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 79) गुरुदेव से बातचीत के उपरांत चतुर्वेदी जी ने कहा, ‘दिनकर जी, रवींद्रनाथ स्वीकार करते हैं कि अँगरेजी शब्दों के साथ लिपटे हुए वातावरण को वे समझ नहीं पाते। यह एक बात है, जिसकी खबर उन सभी भारतीय लेखकों तक पहुंचा दी जानी चाहिए, जो अपनी भाषाएं छोड़कर अँगरेजी में लिख रहे हैं, विशेषतः कविताएं लिख रहे हैं।’ (वही) इसलिए, जो दोनों भाषा का ‘मर्म’ नहीं जानता, अच्छा अनुवादक नहीं हो सकता। अर्थ का अनर्थ तो कोई भी कर सकता है! अनर्थ ही कहिए कि आनंदमठ उपन्यास में एक बांग्ला कहावत का अनुवाद करते लिखा है, "गाय है तो गाड़ीवान नहीं गाड़ीवान है तो गाय नहीं!" (हिंदी अनुवाद, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 41) गाड़ी में जब बैल जुतते हैं तो कहावत में गाय क्यों? क्या बंगाल में हल या गाड़ी में गाय जोतने की परंपरा रही है?

अर्थ का अनर्थ तब ज्यादा ही होता है जब हम शब्दशः अनुवाद कर देना चाहते हैं। ‘‘कभी एक स्थानीय दैनिक में निकला था-‘जब पुलिस के बड़े अधिकारी वहां पहुंचे, तब पुलिसवालों और डाकुओं में गोलियों का आदान-प्रदान हो रहा था।’ गोलियां न हुईं मानों मिठाइयां हो गईं। अनुवादक को अंग्रेजी में ‘एक्सचेंज’ मिला; और उसने बिना समझे-बूझे उसके स्थान पर आदान-प्रदान रखकर काम चलता किया।’’ (रामचंद्र वर्मा, शब्दार्थ दर्शन, पृष्ठ 17) रामवृक्ष बेनीपुरी हजारीबाग जेल के वार्डों के अंग्रेजी नामों के हिंदी अनुवाद पर टिप्पणी करते हैं : "जुवेनाइल वार्ड के लिए 'छोकरा किता' अनुवाद वैसे ही है, जैसा विमेन्स वार्ड के लिए 'रंडी किता'। समझ में नहीं आता, ये अनुवाद किसने कब किये, किन्तु जेलों में, थोड़े दिनों पहले तक, 'रंडी किता', 'छोकरा किता' आदि शब्द ही प्रचलित थे।" (रामवृक्ष बेनीपुरी, जयप्रकाश, साहित्यालय, पटना, प्रथम संस्करण : मार्च 1947, पृष्ठ 164)

हर भाषा की अपनी एक खास प्रकृति है। इसलिए जिस भाषा में हम अनुवाद कर रहे होते हैं, उसकी प्रकृति, उसके मिजाज का रक्षण आवश्यक हो जाता है। शब्द, संस्कृति के वाहक होते हैं। यह भी कह सकते हैं कि संस्कृति बदलने से शब्द, वाक्यांश तथा मुहावरों के अर्थ बदल जाते हैं। मिसाल के तौर पर ‘दीपक तले अंधेरा’ कहावत कन्नड़ और कश्मीरी में भी है। कन्नड़ में (अन्य अर्थों के साथ-साथ) इसका अर्थ है, ‘चरित्रवान आदमी का भी दीपक की तरह अंधेरा पक्ष होता है। यानी उसमें प्रछन्न बुराइयां हो सकती हैं।’ कश्मीरी में अन्य अर्थों के साथ-साथ एक राजनीतिक अर्थ भी है। वह यह कि ‘अच्छे राजा के बुरे अनुचर हो सकते हैं’। (ए के रामानुजन, भारत की लोक कथाएँ, नेशनल बुक ट्रस्ट, 2011, 'भूमिका', पृष्ठ 21) इसलिए शब्दों और वाक्यांशों का अनुवाद अपने देश/प्रदेश की भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार होता है। जैसे अंग्रेजी में ‘वार्म रिसेप्शन’ इसलिए प्रचलित हुआ कि इंग्लैंड जैसे ठंढे देशों में इसकी (गर्मी की) आवश्यकता थी। इसी शब्द के लिए भारत जैसे सम तापमान वाले देशों में इसे ‘हृदय को शीतल करना’ कहा जा सकता है। (प्रसेनजित कुमार, 'अननुवाद्यता के चरण और शब्दावली', गवेषणा, अंक 107, वर्ष 2016) इसलिए अनुवादक को एक ही समय में स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा दोनों की भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना होता है।

शब्दशः अनुवाद एक खतरनाक बीमारी है, क्योंकि एक भाषा के शब्द के लिए हू-ब-हू दूसरी भाषा में अक्सर नहीं मिलते। कई बार शब्द महज शब्द नहीं होते, उनके साथ एक अवधारणा जुड़ी होती है। उन अवधारणाओं का अनुवाद किसी भी विदेशी भाषा में, जहां वैसी किसी अवधारणा का अस्तित्व न हो, मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव कार्य है। एक अच्छे अनुवादक को भाषा की इस सीमा की मर्यादा समझनी होगी। नहीं तो क्या आवश्यकता थी कि अंग्रेजी की किताबों अथवा शब्दकोशों के लिए ‘स्वदेशी’, ‘सत्याग्रह’ और ‘अहिंसा’ जैसे अवधारणात्मक पद ज्यों के त्यों उठा लिये जाते? हिन्दी में भी ठीक अंग्रेजी ही की तरह अनगिनत शब्द हूबहू ले लिये गये हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि आज भी हम इस बहस से मुक्त नहीं हो सके हैं कि ‘सेकुलरिज्म’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ तथा ‘धर्म’ और ‘रिलीजन’ एक ही चीज हैं कि भिन्न हैं। गुलेरी जी ने लिखा है कि ‘‘मत या सम्प्रदाय के अर्थ में धर्म शब्द का प्रयोग करना हमने विदेशियों से सीखा है, जब विदेशी भाषाओं के ‘मजहब’, ‘रिलीजन’ शब्द यहां प्रचलित हुए, तब भूल से या स्पर्धा से हम उनके स्थान में धर्म शब्द का प्रयोग करने लगे। परंतु हमारे प्राचीन ग्रंथों में, जो विदेशियों के आने के पूर्व रचे गये थे, कहीं पर भी ‘धर्म’ शब्द मत, विश्वास या सम्प्रदाय के अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ, प्रत्युत उनमें सर्वत्र स्वभाव और कर्तव्य इन दो ही अर्थों में इसका प्रयोग पाया जाता है।’’ (विश्वनाथ त्रिपाठी, हिंदी नवजागरण के अग्रदूत : चंद्रधर शर्मा गुलेरी, नेशनल बुक ट्रस्ट, 1995, पृष्ठ 81)

यह समस्या तब और विकट रूप में प्रस्तुत होती है जब हम बोली के शब्दों का अनुवाद करना चाहते हैं। बोली के शब्दों और भंगिमाओं का अनुवाद जब उसी देश की भाषा में असंभव है तो विदेशी भाषा के बारे में क्या कहा जाय। क्या रेणु का मैला आँचल उपन्यास बोली के शब्दों को छोड़कर रचा जा सकता था? देवेंद्र सत्यार्थी का विश्वास करें तो स्त्री गीतों में जो दर्द और करुणा है उसका अनुवाद दुनिया की अन्य किसी भी भाषा में असंभव है।

अनुवाद की एक समस्या श्रेष्ठताबोध और हीनताबोध से भी जुड़ी है। हम किसी भाषा को श्रेष्ठ मान लेते हैं तो किसी को हीन। हम भारतीय विदेशी भाषा के शब्दों का शुद्ध उच्चारण करने की कोशिश करते हैं। हवेनत्सांग और माओत्सेतुंग को वांगच्वांग तथा माओजेडोंग होते देर नहीं लगी। तोल्स्तोय का 'लेव' अब लेफ हो गया है तो चेखव, चेखफ। विदेशी नामों के उच्चारण को दुरुस्त करने की इतनी व्यग्रता लेकिन अपने ही देश की बांग्ला भाषा के अनेक नाम गलत वर्तनी के साथ लिखे जा रहे हैं। भूदेव मुकर्जी हिंदी में मुखर्जी बने बैठे हैं।वोमेश (womesh) कहीं व्योमेश तो कहीं उमेश। मजेदार है कि प्रकाशन विभाग की अंग्रेजी की किताब में भी उमेश (Umesh) है। इतिहासकार बिपन तो एकाध अपवाद को छोड़कर प्रायः ही बिपिन हैं। अंग्रेजी काल में मिश्र, गुप्त और मौर्य जो मिश्रा, गुप्ता, मौर्या बना वह आज भी बदस्तूर जारी है। चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ जी ने तनिक चुटकी लेते हुए लिखा भी है, ‘गीता के दर्शनशास्त्र को निचोड़ डालनेवाले लेखक भी पारसीधर्म का हाल लिखते समय जरथुश्त को ‘‘जरथुश्ता’’ और अहूर-मज्द को ‘‘अहुरामज्दा’’ लिख देते हैं।’ (वही, पृष्ठ 19) नामों को लेकर हम तनिक भी सचेत नहीं रहते। द्विवेदी जी कहीं महावीर प्रसाद अलग-थलग हैं तो कहीं साथ (महावीरप्रसाद)। हजारीप्रसाद द्विवेदी की भी यही गति है। फणीश्वरनाथ रेणु की कौन कहे! डॉक्टर सच्चिदानंद सिन्हा ने स्वीकार किया है कि जर्मनी में मैक्स मूलर के साथ मुलाकात से पहले तक वे अपने नाम की स्पेल्लिंग गलत लिखा करते थे।

इस प्रसंग में मुझे अपने काॅलेज (बी. एन. काॅलेज, पटना) के अंग्रेजी प्राध्यापक रमेश प्रसाद सिन्हा की ‘कहानी’ याद आ रही है। उनके बच्चे किसी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते थे। एक दिन उनसे पूछा : ‘पापा, आप भरता के बारे में जानते हैं?' पिता ने विश्वासपूर्वक कहा, ‘अरे! भरता तो हमलोग प्रायः ही खाते हैं। इसे भुरता या चोखा भी कहा जाता है और यह आलू, बैगन या करैला-किसी भी चीज का बनाया जा सकता है।’ बेटे ने पिता के ‘अज्ञान’ का मजाक उड़ाते कहा, ‘नहीं, नहीं पापा। भरता तो रामा का यंगर ब्रदर था।’ बेटे का ‘ज्ञान’ पिता के सिर के उपर से निकल गया। नतीजा हुआ कि मेरे अंगेजी शिक्षक ने बेटे का नाम अंग्रेजी स्कूल से कटवा दिया।

कुछ पाश्चात्य भारतविदों ने भारत के पंडितों के मध्य अपनी धाक जमाने के लिए अपने नाम तक के संस्कृत अनुवाद कर डाले थे। कहना अनावश्यक है कि वेद-विद्वान मैकडाॅनेल अपना संस्कृत नाम ‘मुग्धानलाचार्य’ सुनकर कुछ ज्यादा ही मुदित और मुग्ध थे। मैक्स मूलर भी ‘मोक्ष मूलर’ होकर कैवल्य का सुख लूटते थे। भारतीय विद्वानों ने इन नामों के संस्कृत अनुवाद को लेकर काफी हास-परिहास किया है। महावीरप्रसाद द्विवेदी और चन्द्रधर शर्मा गुलेरी तो खूब ही चुटकी लेते हैं।

समय में बदलाव के साथ शब्द के अर्थ भी बदलते रहे हैं। वेदों का अनुवाद आज की संस्कृत भाषा के प्रचलित शब्दार्थों के सहारे नहीं हो सकता ठीक जैसे शेक्सपीयर के जमाने की अंग्रेजी का अनुवाद आज के प्रचलित शब्दों और अर्थों के सहारे असंभव है। निरुक्तकार यास्क ने भी वेद से लगभग 400 ऐसे शब्द गिनाये हैं जिनके अर्थ उन्हें भी नहीं मालूम थे। लगभग चार सौ शब्द थे जिनका ओर-छोर ज्ञात नहीं हो पा रहा था। इस वैयाकरण ने उन शब्दों की एक सूची भी दी है। इसलिए एक अच्छे अनुवादक से उम्मीद की जाती है कि भाषा की समझ के साथ ही उसका इतिहास बोध भी विकसित हो।

प्रत्येक विषय की अपनी भाषा है, उसके खास पारिभाषिक शब्द हैं जिनकी बारीकी का पता उस विषय के जानकार ही को होता है। इसलिए अनुवाद की आदर्श स्थिति यह है कि कविता का अनुवाद कवि करे, कहानी का अनुवाद कहानीकार और समाज विज्ञान की पुस्तकों का अनुवाद कोई समाज विज्ञानी ही करे। तभी विषय के साथ न्याय की उम्मीद की जा सकती है।

कुछ अनुवादों ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया है। तोलस्तोय की किताब का पुनरुत्थान नाम से भीष्म साहनी का अनुवाद और नेहरू की 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' का हिंदुस्तान की कहानी नाम से सस्ता साहित्य मंडल का अनुवाद उम्दा कहा जा सकता है। नेहरू की ही लेटर्स फ्रॉम ए फादर टू हिज डॉटर के अनुवादक प्रेमचंद जी हैं। उस अनुवाद पर कौन टिप्पणी कर सकता है! हावर्ड फास्ट के 'ग्लैडिएटर' उपन्यास का अमृतराय ने आदिविद्रोही नाम से बेजोड़ अनुवाद किया है। मैं तो ई. एच. कार की 'व्हाट इज हिस्ट्री' के अनुवादक अशोक चक्रधर की भी तारीफ किये बगैर नहीं रह सकता।

तिलक को याद करते हुए

 वैसे तो तिलक कांग्रेस के गरमदली नेता थे लेकिन वे मॉडरेट नेताओं के बीच भी समादृत थे। उनके प्रशंसकों में मोतीलाल नेहरू तक थे। गांधी पर रानाडे-गोखले और तिलक का असर था। कहा जाता है कि गांधी के राजनीतिक गुरु गोखले थे तो साहित्यिक गुरु तिलक। प्रेमचंद ने भी राष्ट्रवाद की दीक्षा गोखले से पहले तिलक ही से ली। गाँधी पर तिलक के 'गीता-रहस्य' का प्रभाव अलक्षित नहीं है। तिलक के 'हिन्दू प्रतीक' भी गांधी के यहाँ हैं। 

मोतीलाल नेहरू पर तिलक के प्रभाव को स्वीकार करते हुए जवाहरलाल नेहरू लिखते हैं, '1907 और 1908 में और कुछ साल बाद तक वह बेशक माडरेटों में भी माडरेट थे और गरम दल के सख्त ख़िलाफ़ थे, हालाँकि मेरा ख़याल है कि वह तिलक की तारीफ करते थे।' (मेरी कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, पृष्ठ 47) तिलक के प्रशंसकों में प्रेमचंद जैसे लेखक भी थे।

बाल विवाह को रोकने के लिए जब एज ऑफ कंसेंट बिल आया, 1891 के आसपास, तो तिलक ने डटकर उसका विरोध किया। इसकी वजह से लोगों को उनके बारे में काफी 'गलतफहमी' भी हुई और यह समझा गया कि समाज-सुधार के मामले में तिलक का दृष्टिकोण कट्टर सनातनी हिन्दू का है। लेकिन बात यह न थी। उनके विरोध का कारण यह न था कि वह बाल-विधवा के पोषक थे बल्कि यह था कि यह सब काम खुद हम भारतीयों के करने के हैं, अंग्रेज शासकों को इस सब से क्या मतलब। (अमृतराय, प्रेमचंद : कलम का सिपाही, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 1976, पृष्ठ 79)

साप्ताहिक पत्र 'केसरी' के संपादक बाल गंगाधर तिलक को लोग जितना उनकी विद्वता के कारण जानते हैं उससे अधिक उनको उनके 'दुर्भाग्य' के कारण जानते हैं। जब 'केसरी' का जन्म हुआ था, तभी एक मान-हानि के मुकदमे में फँसने से उनको कई महीने कारागार-वास करना पड़ा था। 1897 ईस्वी में 'शिवाजी के उद्गार' शीर्षक कविता प्रकाशित करने पर उनके ऊपर जो आपत्ति आई उससे उनका नाम प्रायः सारे भारतवर्ष में ही नहीं, किन्तु विलायत तक में हुआ। इस आपत्ति में कुछ अंश से उद्धार पाने में तिलक जी की विद्वता ही सहायक हुई। (महावीर प्रसाद द्विवेदी, अतीत स्मृति, लीडर प्रेस, प्रयाग, 1930, पृष्ठ 33)

बीसवीं सदी के प्रथम दशक में लोकमान्य तिलक की राजनीतिक कार्यवाही का मूल्यांकन सरदार भगतसिंह ने इस प्रकार किया था : '1906 के कांग्रेस अधिवेशन में लोकमान्य तिलक का बोलबाला था। नवयुवक समुदाय उनकी खरी और स्पष्ट बातों के कारण उनका भक्त बन गया था। उनकी निर्भीकता, कुछ कर गुजरने की भावना और बड़े से बड़े कष्ट सहने के लिए हर क्षण तैयार रहने के कारण नवयुवक उनकी ओर खिंचे चले आ रहे थे। कांग्रेस अधिवेशन के अतिरिक्त कांग्रेस के पंडाल के बाहर भी लोकमान्य के अनेक भाषण इस अवसर पर हुए थे। (जगमोहन सिंह और चमनलाल, भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज, नयी दिल्ली, 1986, पृष्ठ 151; रामविलास शर्मा, स्वाधीनता संग्राम : बदलते परिप्रेक्ष्य, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, 1992, पृष्ठ 95)

जो नवयुवक तिलक की ओर खिंचे चले आ रहे थे, उनमें हिंदी कवि और राजनीतिक कार्यकर्ता माखनलाल चतुर्वेदी भी थे। तिलक जो क्रांतिचेता नवयुवकों के लिए आकर्षण के जबरदस्त केंद्र बने थे, उसका सशक्त वर्णन माखनलाल चतुर्वेदी ने एक कविता में किया है : 'तेरी हुंकारों का फल था, अगणित वीरों ने प्राण दिया,/राष्ट्रीय शक्ति ने तुझ से ही अमृतसर में था त्राण लिया।/तुझको अब कष्ट नहीं देंगे, हाथों में झंडा ले लेंगे,/मांडले के क्या, शूली के कष्टों को सादर झेलेंगे/इंग्लैंड नहीं नभमंडल में हम तेरे हैं, हो आवेंगे,/तूने नरसिंह बनाए हैं, अपना तिलकत्व दिखावेंगे।' (माखनलाल चतुर्वेदी रचनावली, खंड 6, दिल्ली, पृष्ठ 67; रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत)

वे युवाओं पर खास नजर और सहानुभूति रखते थे। खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल चाकी द्वारा मुजफ्फरपुर में किये गये बमप्रहार पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने मराठी 'केसरी' में लिखा, 'भारत के पूर्वी क्षितिज-मुजफ्फरपुर में स्वाधीनता का सूरज उदित हो चुका। उसे कोई बड़ी से बड़ी शक्ति रोक नहीं सकती। उनकी इस प्रतिक्रिया पर उन्हें छः वर्षों के कारावास की सजा मांडले जेल में भोगनी पड़ी। (के. के. दत्त, बिहार के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास, भाग 1, पृष्ठ 121)

यह वह समय था जब लोग लिखते हुए डरते थे कि इसे पढ़कर तिलक की क्या प्रतिक्रिया होगी। पद्मसिंह शर्मा ने द्विवेदी जी के नाम अपने पत्र में लिखा कि हाल की 'सरस्वती' में 'सभा' की 'सभ्यता' पढ़कर दुख हुआ, कांग्रेस के मौके पर आर. सी. दत्त, मिस्टर तिलक आदि महोदय नागरी प्रचारिणी सभा के भवन में एकत्र हुए थे, वे भले आदमी सभा की करतूत प्रकाश हो जाने पर अपने दिल में क्या कहेंगे। (द्विवेदी युग के साहित्यकारों के कुछ पत्र, पृष्ठ 137)

प्रसिद्ध नेता डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुंजे ने 13 अप्रैल, 1907 में 'हिंदी केसरी' पत्र को नागपुर से निकाला था। इसमें लोकमान्य तिलक के प्रसिद्ध पत्र 'केसरी' का अनुवाद होता था। इसके संपादक माधवराव सप्रे थे तथा सहायता के लिए जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल और पंडित लक्ष्मी वाजपेयी थे। यद्यपि इसके लेख कम से कम एक सप्ताह पुराने होते थे, फिर भी हिंदीसेवी इसे बड़े चाव से पढ़ते थे। यही नहीं यह हिंदी प्रान्तों में राजनीति की गीता के समान उत्सुकता तथा आदर से पढ़ा जाता था। इस पत्र ने विशेषतः उत्तर भारत के नवयुवकों में ओजस्वी देशभक्ति को जागृत करने का साहसपूर्ण कार्य किया था। कुछ दिनों में यह कई हजारों की संख्या में प्रकाशित होने लगा। उस समय गरम दल का यही प्रामाणिक पत्र था। परंतु यह अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सका क्योंकि सरकार की दमन नीति और भारतमाता और कालापानी इन दो संपादकीय टिप्पणियों के प्रकाशित होते ही 23 अगस्त 1908 में इसके संपादक सप्रे को राजद्रोह के अपराध में पकड़ लिया फलतः 1909 में यह पत्र बन्द हो गया। (डॉ. सुशीला जोशी, हिन्दी पत्रकारिता : विकास और विविध आयाम, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, द्वितीय संस्करण : 1991, पृष्ठ 37)

19 दिसंबर, 1919 को दिल्ली में स्थापित 'राजपूताना मध्यभारत सभा' की ओर से सन 1920 में वर्धा से विजय सिंह पथिक के संपादन में बाल गंगाधर तिलक के मराठा 'केसरी' के सहयात्री/सहधर्मी के रूप में 'राजस्थान केसरी' नामक पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ। (एस. एल. राठौड़, पॉलिटिकल एन्ड कॉन्स्टिट्यूशनल डेवलपमेंट इन दि प्रिंसली स्टेट्स ऑफ राजस्थान, पृष्ठ 40; डॉ. मनोहर प्रभाकर, राजस्थान में हिन्दी पत्रकारिता, पंचशील प्रकाशन, जयपुर, 1981, पृष्ठ 73) यह पत्र राजस्थान और मध्यभारत की जनता के अभाव-अभियोगों, उनकी पीड़ाओ और दमन की कथाओं को मुखर करने लगा। श्री अर्जुनलाल सेठी, केसरी सिंह बारहठ और विजय सिंह पथिक की त्रिमूर्ति इस पत्र को संघर्षों के बीच निरंतर प्राण-वायु प्रदान करती रही। श्री रामनारायण चौधरी इस पत्र के प्रकाशक और सहायक संपादक थे। ठाकुर केसरीसिंह बारहट के जामाता श्री ईश्वरीदान आसिया और सागरमल गोपा भी इस पत्र के संपादन से सम्बद्ध थे। पहले यह पत्र वर्धा से और बाद में अजमेर से निकलने लगा। (श्रमजीवी पत्रकार संघ परिचय पुस्तिका, पृष्ठ 61) पत्र की निर्भीक वाणी से घबड़ाकर ब्रिटिश सरकार और रियासती राजाओं ने अपना दमनचक्र आरम्भ कर दिया। श्री रामनारायण चौधरी को मानहानि के एक मुकदमे में तीन माह की सजा भुगतनी पड़ी। (नवज्योति दैनिक, 14 अगस्त, 1972, पृष्ठ 4) परिणामस्वरूप यह तेजस्वी पत्र स्वल्प किन्तु सार्थक जीवन बिताकर समाप्त हो गया।

27 जुलाई, 1924 को तिलक की मूर्ति का अनावरण करते हुए मोतीलाल नेहरू ने जो भाषण किया था उसका एक अंश देखें : "many and various are the glowing tributes paid to the great work of our hero by the ablest writers and speakers of the day. My contribution can be but poor. But I crave your indulgence to put before you a few thoughts on the lesson of his great life as I read it. I shall not detain you at any length over his early career or even the later achievements of his versatile genius which distinguished him as a great scholar, a vigorous writer, and a clear thinker. The Orion, the Arctic Home and the Gita Rahasya, monuments of scholarship and original thinking as they are, have been aptly described by Babu Aurobindo Ghosh as merely the by-products of the great genius of Tilak. For as he observes that these works were produced "in periods of compulsary cessation from his life-work, planned and partly, if not wholly, executed during the imprisonments which could alone enforce leisure upon this unresting worker for his country." (Selected Works of Motilal Nehru, Vol. 4, p 225.)

मात्र युद्धकथा नहीं है महाभारत

महाभारत में प्राचीन भारतीय ज्ञान का विशाल भंडार है। उसकी स्वयं की यह घोषणा है कि जो द्विज अंगों और उपनिषदों सहित चारों वेदों को जानता है, परंतु इस महाभारत-इतिहास को नहीं जानता, वह विचक्षण विद्वान नहीं है। महाभारत को बार-बार 'भारत-इतिहास', 'भारत-पुराण', 'इतिहास-शिरोमणि' आदि कहा गया है। सौति पूछते हैं कि मैं आपलोगों को क्या सुनाऊँ ? धर्मार्थ से संयुक्त पुराणों की कथा या 'इतिवृत्तं नरेन्द्राणामृशीणां च महात्मनाम्'? राजाओं और ऋषियों के इतिवृत्त आज के अर्थ में इतिहास नहीं हैं। महाभारत में पुराण का अर्थ पुरानी पुण्य-कथाएं हैं और इतिहास का अर्थ राजाओं-ऋषियों की वंशावलियों और क्रिया-कलापों का वर्णन। यों इन दोनों को प्रत्येक पुराणों में पाया जाता है। पुराण-इतिहास में अन्वय-व्यतिरेक संबंध है।

यह महाग्रंथ आख्यानों और उपाख्यानों से भरा पड़ा है। सच पूछिए तो पूरा महाभारत पीपल के पत्ते में फैली हुई नसों की तरह आख्यानों में बंधा हुआ है। कोई व्यक्ति अपनी बात आख्यानों के बिना नहीं कह पाता। ये आख्यान लोक से लिए गए हैं और जहां तहां जड़ दिए गए हैं। कभी-कभी तो इसमें ऐसी कथा का सन्निवेश किया गया है जो सारी शास्त्रीय मान्यताओं को ध्वस्त कर देती है। नेवला-कथा ऐसी ही एक कथा है। महाभारत में इतने अधिक विषयों का समावेश हुआ है कि विश्वकोष मालूम पड़ता है। कहा भी गया है, 'जो इसमें है वही अन्यत्र भी है और जो नहीं है वह अन्यत्र भी नहीं है।' किंतु, वैविध्य इसकी समस्या नहीं है। विषयों में इतने विपर्यय, अंतर्विरोध और पुनरुक्तियां हैं कि वे विद्वानों की जटिल समस्याएं बनी हुई हैं। ऐसे में महाभारत से प्राप्त सामग्री का उपयोग किसी एक काल के लिए करना कठिन है। जहां इसके आख्यानात्मक अंश से दसवीं शताब्दी ई. पू. की झांकी मिलती है, वहीं इसके उपदेशात्मक अंशों का संबंध काफी परवर्ती काल से, यानी ईसा की चौथी शताब्दी से, मालूम होता है। इस महाकाव्य में मूलतः 8,800 श्लोक थे और यह रचना 'जय' कहलाती थी। फिर वे बढ़कर 24 हजार हुए और रचना का नाम 'भारत' पड़ा। बाद में बढ़कर वे एक लाख हो गये और यह ग्रंथ 'महाभारत' कहलाया। गुप्तकालीन अभिलेखों में एक लाख का उल्लेख है। यद्यपि समीक्षित संस्करण में अभी प्रायः 82 हजार श्लोक मिलते हैं।' कहना होगा कि आज के बृहद्‌काय महाभारत में भी एक लाख श्लोक नहीं हैं। 'हरिवंश' को मिलाकर, जिसे खिलपर्व के नाम से भी जाना जाता है, श्लोकों की संख्या एक लाख तक पहुंच जाती है। किंतु, अब इसे महाभारत का अंग नहीं माना जाता।

महाभारत में तीन कथावाचक हैं-व्यास, वैशंपायन और गल्व गणकपुत्र उग्रश्रवा सौति। व्यास ने इसे वैशंपायन को सुनाया था, वैशंपायन ने जनमेजय को और उग्रश्रवा सौति ने कुलपति शौनक के नैमिषारण्य में होने वाले द्वादशवर्षीय सत्र में ब्रह्मचारी ऋषियों को। इस तरह भी महाभारत के तीन संस्करण ठहरते हैं। आज के महाकाव्य काव्य की सामग्री सौति संस्करण की ही मानी जानी चाहिए। उसके बाद भी लोगों ने बहुत कुछ जोड़ा होगा। लगता है, शौनक ने अपने द्वादशवर्षीय सत्र में महाभारत का एक नया संस्करण तैयार कराया। उनके कहने से सौति द्वारा भार्गव वंश का इतिहास भी इसमें सम्मिलत कर लिया गया। पौलोम पर्व के पांचवें अध्याय में कथा आरंभ होने के पूर्व ही शौनक कहते हैं 'उनमें से प्रथम मैं भृगुवंश का ही वर्णन सुनना चाहता हूं।' शौनक भार्गव थे। विष्णु सीताराम सुखणकर ने अपने एक प्रसिद्ध लेख 'भृगुवंश और भारत' में इस तथ्य को विस्तार से उजागृत किया है। सुकथंकर के अनुसार, यह कार्य न व्यास का था, न वैशंपायन का और न सौति का। वास्तविकता यह है कि महाभारत का एक महत्त्वपूर्ण संस्करण भार्गवों के प्रबल और साक्षात् प्रभाव के अंतर्गत तैयार किया गया है। आदिपर्व में पौर्व उपाख्यान, आरण्यक में कार्तवीर्य उपाख्यान, उद्योग में अंबा उपाख्यान, शांति में बिपुलोपाख्यान और अश्वमेध में उत्तंक उपाख्यान भार्गवों के उपाख्यान हैं। जमदग्नि और परशुराम की जन्म-कथा का भूरिषः उल्लेख है। भार्गव परशुराम द्वारा इक्कीस बार क्षत्रियों के नाश करने की कहानी दस बार कही गई है, जिसकी टेक 'त्रिसप्तकृत्वः पृथिवी कुता निःक्षत्रिया पुरा' पर टूटती है। क्षत्रियों के गर्व तोड़ने का उल्लेख तो बीस बार आया है। यही नहीं, भार्गव के देवतुल्य चरित्र कृष्ण, द्रोण, कर्ण आदि के चरित्रों से टक्कर लेते हैं। कहीं-कहीं उन्हें पीछे भी छोड़ जाते हैं। कहना पड़ेगा कि सौति संस्करण में बहुत-सी कथाएं बेतरतीब ढंग से एक कर दी गई हैं। उनमें से बहुत से आख्यान-उपाख्यान अप्रासंगिक लगते हैं।

महाभारत युद्धकथा-मात्र नहीं ठहरता। यदि यह युद्धकथा होता तो इसे शल्यपर्व पर समाप्त हो जाना चाहिए था या अधिक से अधिक सौप्तिक पर्व पर। शांतिपर्व के बाद महाभारत एक दूसरी दिशा की ओर मुड़ जाता है-त्रासदी, करुणा या शांति की ओर। स्त्रीपर्व के बाद शांतिपर्व। महाभारत में यह पर्व आकार में सबसे बड़ा है। इसमें राजधर्म, वर्णाश्रम धर्म, मोक्ष, दर्शन, पांचरात्र आदि के संबंध में विस्तृत सामग्री एकत्र कर दी गई है। यह हिन्दू-धर्म-कोश बन गया है। वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार 'इन अध्यायों में प्राचीन भारत के धार्मिक इतिहास की तीन परतें सुरक्षित हैं। पहली परत में विभिन्न तत्त्वचिंतकों के पृथक मत, उनके अनंतर दूसरी परत में सांख्य आदि दर्शनों की सामग्री और तीसरी परत में शैव एवं पंचरात्र भागवत धर्मों की सामग्री है। शांतिपर्व की शैली और शब्दावली महाभारत के अन्य सर्गों से विशिष्ट है।'

रचना की दृष्टि से सभापर्व सबसे पुराना मालूम पड़ता है, फिर भी इसके संकलन का काल ईसा पूर्व पहली शताब्दी से पहले नहीं माना जा सकता। संभवतः, अनुशासन पर्व और शांति पर्व करीब-करीब एक ही समय संकलित हुए। यह भी कह ले सकते हैं कि अनुशासन पर्व, शांतिपर्व ही का विस्तार है। इसमें कई विषयों की पुनरुक्ति है। शांतिपर्व के 'राजधर्म' प्रकरण में मनुस्मृति से मिलते-जुलते अनेक श्लोक हैं, खासकर राजा की दैवी उत्पत्ति, बाह्मणों के दावे और दंड के महत्त्व के संबंध में यह प्रकरण मुख्यतः उपदेशात्मक है, और ऐसा प्रतीत होता है कि यह शांतिपर्व में ईस्वी सन् की प्रथम और चौथी शताब्दियों के बीच किसी समय सन्निविष्ट किया गया। इसलिए, उत्तर वैदिक काल या वेदोत्तर काल की राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन के लिए शांतिपर्व की सामग्री का उपयोग करना उचित नहीं होगा। राजत्व की उत्पत्ति संबंधी परिकल्पना शांतिपर्व के 'राजधर्म' प्रकरण का सर्वाधिक उर्वर अंश है। इस परिकल्पना में ब्राह्मणवादी दृष्टि से राजपद के औचित्य को बुद्धिपूर्वक सिद्ध करने का प्रथम प्रयास किया गया है। 

महाभारत का मनुस्मृति के साथ विलक्षण संबंध है। मनुस्मृति के 260 श्लोक ऐसे हैं जो महाभारत में अक्षरशः पाये जाते हैं। कह सकते हैं कि महाभारत के शांति पर्व में बहुत से ऐसे श्लोक हैं जो अक्षरशः मनुस्मृति में मिलते हैं। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली, 1993, पृष्ठ 34) विद्वानों का मानना है कि इन दोनों ग्रंथों ने एक-दूसरे से इन श्लोकों को नहीं लिया है, बल्कि दोनों ग्रंथों का कोई एक मूल है। (गंगानाथ झा, हिन्दू लॉ इन इट्स सोर्सेज, पटना विश्वविद्यालय, पटना, 1931, पृष्ठ 59)

इसलिए महाभारत में किसी एक काल का नहीं, बल्कि कई कालखण्डों का इतिहास है।