Monday, September 28, 2026

अइसन दुरंगी नीति से समाजवाद न अतौ जयप्रकाशजी

कुछ लोग जीते जी किंवदंती बन जाते हैं। नक्षत्र मालाकार ऐसे ही महापुरुष हैं जो इतिहास की प्रचलित किताबों से ज्यादा मिथकों और किंवदंतियों में बसते हैं। कहा जाता है कि "मोमेंट के समय गोरा मलेटरी इसके नाम को सुनते ही पेसाब करने लगता था। ... जितने सरकारी गवाह बने थे, सबों के नाक-कान काट लिए थे चलित्तर ने। बहादुर है। कभी पकड़ाया नहीं। कितने सी आई डी को जान से खतम किया। धरमपुर के बड़े-बड़े लोग इसके नाम से थर-थर काँपते थे। ज्यों ही चलित्तर का घोड़ा दरवाजे पर पहुंचा कि 'सीसी सटक'। दीजिए चंदा। पचास! नहीं, पाँच सौ से कम एक पैसा नहीं लेंगे। नहीं है? चाबी लाइए तिजोरी की। नहीं? ठाएँ! ठाएँ!" (फणीश्वरनाथ रेणु, मैला आँचल, राजकमल पेपरबैक्स, संस्करण : 1992, पुनर्मुद्रण : 1996, पृष्ठ 121)

नक्षत्र मालाकार गांव में चरवाही किया करते थे। 1930 में नमक बनाने हेतु कांग्रेस की ओर से सत्याग्रहियों की भर्ती का अभियान चलाया जा रहा था। पूर्णियां के प्रख्यात गांधीवादी नेता वैजनाथ चौधरी कांग्रेस की एक मीटिंग में सत्याग्रहियों का नाम लिख रहे थे। युवा नक्षत्र ने अपना नाम सत्याग्रहियों में दर्ज कराया। तब से वैजनाथ चौधरी के संपर्क में उन्होंने नमक सत्याग्रह, विदेशी वस्त्रों की बिक्री के विरुद्ध धरना तथा व्यक्तिगत सत्याग्रह आदि में नेतृत्व प्रदान किया। किन्तु दो घटनाओं की वजह से कांग्रेस से उनका मन उचट गया। पहली घटना है कि किसी गांव में कांग्रेसी नेतागण अंग्रेजी शोषण और गुलामी से मुक्ति हेतु तैयार कर रहे थे। तभी एक जमींदार के खेत में एक गरीब की बकरी चली गयी। जमींदार ने बकरी वाले को बांधकर पीटा। नक्षत्र को लगा कि इसका प्रतिकार होना चाहिए। कांग्रेसी नेताओं के कैम्प में जाकर उन्होंने यह बात रखी, परंतु सभी नेताओं ने एक स्वर में कहा कि 'ऐसे कामों में हस्तक्षेप करना कांग्रेस का काम नहीं है। कांग्रेस का काम रचनात्मक एवं सृजनात्मक काम करना है।' (अकेला रमाकांत, 'कौन थे नक्षत्र मालाकार?', कम्युनिस्ट संदेश, वर्ष 30, अंक 11/12, नवंबर-दिसम्बर 2001) नक्षत्र ने 'नेतृत्व की भावना' के विरुद्ध जाकर इस घटना का न केवल प्रतिकार किया बल्कि जमींदार के यहाँ से उस गरीब को मुक्त भी कराया। (वही) दूसरी घटना यह घटी कि एक बार नक्षत्र मालाकार ने 'जनयुग' नामक अखबार खरीदा। अखबार लेकर जब कांग्रेस कार्यालय गये तो कांग्रेसी नेता पंडित रामनंदन मिश्र ने कहा कि 'जनयुग तो कम्युनिस्टों का अखबार है, इसे फाड़कर फेंको।' (वही) उनके कहने पर जनयुग तो फाड़कर फेंक दिया गया, किन्तु यह बात अंदर गांठ बन गयी।

नक्षत्र मालाकार अपने बचपन में नछत्तर माली थे। 1936 में सोनपुर में समाजवादियों का शिविर आयोजित हुआ था जिसमें जयप्रकाश नारायण ने प्रभावित होकर नाम बदल दिया था। उनका जन्म पुराना पूर्णियां जिले के समैली (अकेला रमाकांत कोढ़ा लिखते हैं) नामक स्थान में हुआ जो वर्तमान में कटिहार जिले में है। (अकेला रमाकांत, 'कौन थे नक्षत्र मालाकार?', कम्युनिस्ट संदेश, वर्ष 30, अंक 11-12, नवंबर-दिसंबर 2001)

नक्षत्र मालाकार 1936 में बिहार सोशलिस्ट पार्टी का सदस्य बने। (मालाकार की डायरी, न्यूजब्रेक, 31 अगस्त 2001) बिहार सोशलिस्ट पार्टी की पूर्णियां शाखा की एक बैठक समैली गांव में हुई। इसमें इक्यावन साथियों ने हिस्सा लिया। बैठक में मदन मोहन झा ने प्रस्ताव लाया कि जिला नेतृत्व का भार नक्षत्र मालाकार के हाथ में सौंप दिया जाये जिसका समर्थन महाराज मंडल ने किया। (वही)

सन 1936 में सोनपुर में समाजवादियों का शिविर आयोजित था. नक्षत्र मालाकार भी शामिल थे. जयप्रकाश नारायण उस शिविर के प्रिंसिपल थे. एक दिन उन्होंने (नक्षत्र मालाकार) देखा कि शिविर के अंतर्गत दो तरह की भोजन-व्यवस्था चल रही है. उन्हें यह सब अच्छा नहीं लगा. उन्होंने जयप्रकाश नारायण जी से इस दोहरी व्यवस्था का कारण पुच दिया. जयप्रकाश जी ने उत्तर दिया-‘यहाँ नेताओं के अलग और कार्यकर्ताओं के लिए अलग भोजन-व्यवस्था है.’ नक्षत्र मालाकार को इस उत्तर से घोर ‘रिएक्शन’ हुआ. उन्होंने कहा- ‘अइसन दुरंगी नीति से समाजवाद न अतौ जयप्रकाशजी.’ उन्होंने गाँधी टोपी माथे से उतारी और उनकी ओर फेंकते हुए हमेशा के लिए शिविर से बाहर चलते बने. तब से जीवनपर्यंत कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े रहे.

नक्षत्र मालाकार पूर्णियां में 1942 के हीरो हैं। उनकी लोकप्रियता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि 42 के आंदोलन में उनपर पचासों केस हुए लेकिन एक भी केस में एक भी गवाह नहीं मिल सका। सरकार को उन्हें छोड़ देने को मजबूर होना पड़ा। 1942 में नक्षत्र मालाकार जेल में बंद थे। जेल ही में उनकी कम्युनिस्ट पार्टी पूर्णियां जिला सचिव कामरेड अनिल दास गुप्ता तथा साथी चंद्रमा सिंह से भेंट हुई थी। पार्टी के प्रति उनका झुकाव वहीं हो गया था। इनलोगों से प्रभावित होकर नक्षत्र मालाकार ने वचन दिया कि जेल से निकलते ही वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हो जायेंगे। जेल से छूटते ही उन्होंने भागलपुर जिले के साथियों से संपर्क किया। (रामावतार शर्मा, भागलपुर जिले में कम्युनिस्ट पार्टी का विकास, कम्युनिस्ट संदेश, वर्ष : 3, अंक : 11/12, नवंबर-दिसंबर, 2001; अकेला रमाकांत, पूर्वोद्धृत)

1944 के आसपास जेल से रिहा होने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने अपील की कि हिंदुस्तान के अंदर जो साथी क्रांतिकारी इधर-उधर भटक रहे हैं, हाजिर हो जायें या कहीं छिपने की जगह नहीं हो तो वे सीधे इलाहाबाद आनन्द भवन में आ जायें। पंडित जवाहरलाल नेहरु के कहने का हिंदुस्तान के क्रांतिकारियों पर अच्छा असर पड़ा। कुछ तो हाजिर हो गए और कुछ इलाहाबाद आनन्द भवन पहुंच गए। नक्षत्र मालाकार ने भी हथियार रख देने का मन बनाया। वे अपने कुछ साथियों (लालगंज का विट्ठल, चंदन का भीम सिंह तथा पुनावा का पुलिस यादव) के साथ वैद्यनाथ प्रसाद चौधरी से मिलने टीकापट्टी कालीस्थान पहुंचे। मालाकार ने जब चौधरी जी से उक्त संबंध में कहा तो उन्होंने कहा कि 'आपलोगों को एस डी ओ के सामने हाजिर हो जाना चाहिए।' मालाकार ने पूछा, 'लेकिन जब अंग्रेजी हुकूमत की ओर से पुलिस केस चार्ज करेगी तो आप वकील-मुख्तार के द्वारा या खुद पैरवी करेंगे?' वे बोले, 'मैं पैरवी नहीं करूंगा। हिंसक प्रवृत्ति वाले की मुझसे पैरवी नहीं हो सकेगी।' (मालाकार की डायरी, न्यूजब्रेक, 30 सितंबर 2001)

1969 के विधानसभा चुनाव में पुराने पूर्णिया जिले के कटिहार विधानसभा क्षेत्र में कम्युनिस्ट पार्टी कम वोटों से हार गई थी। इससे साथियों में बहुत मायूसी थी। उन दिनों राजकिशोर सिंह वहां के नेता थे और वही उम्मीदवार भी थे। 42 के आंदोलन के हीरो नक्षत्र मालाकार भी उसी क्षेत्र में कार्यरत थे। इस मायूसी को दूर करने के लिए पूरे जिले के पार्टी सदस्यों की जी. बी. बैठक बरारी में बुलाई गई थी। उस बैठक में उस क्षेत्र के किसानों की भुभना झील से संबंधित मांग को प्रमुखता दी गई। राजकिशोर सिंह के साथ नक्षत्र मालाकार ने गांव-गांव तक इस पार्टी संदेश को पहुंचाया कि भुभना झील के पानी की निकासी के लिए किसान स्वयं श्रमदान करे। श्रमदान के साथ-साथ किसानों ने चंदा भी दिया ताकि श्रमदान करनेवालों के भोजन का इंतजाम किया जा सके। लगभग दो महीने के श्रमदान से भुभना झील के पानी निकासी का काम पूरा हो गया। लगभग तेरह हजार बीघा जमीन पानी निकासी से खाली हुआ। इसमें कुछ मध्यम किसानों की जमीन थी जो उन्हें दी गई और करीब छः हजार बीघा जमीन जो बिहार सरकार की थी, उसे भूमिहीन किसानों के बीच वितरित कर दी गई। 1972 आते-आते उस विधानसभा चुनाव से पार्टी उम्मीदवार राजकिशोर सिंह विजयी हो गये। कहने की जरूरत नहीं कि इसी भुभना झील से पानी निकासी के लिए उन दिनों पूर्णिया के कांग्रेसी नेता बाबू वैजनाथ चौधरी ने बिहार सरकार के मुख्यमंत्री बाबू श्रीकृष्ण सिंह से अपील की थी। सरकार ने उसे असंभव बताया था जबकि नक्षत्र मालाकार जैसे कम्युनिस्ट नेताओं और श्रमदानियों ने उसे सम्भव कर दिखाया था। (रामावतार शर्मा, 'चाँद भाई को सच्ची श्रद्धांजलि मिहनतकशों की खुशहाली में', जन प्रवाह, वर्ष 2, अंक 10, पृष्ठ 31)

Friday, September 18, 2026

भारतीय राष्ट्रवाद और हिन्दी लेखकों का स्त्री विमर्श

बिहार राज्य अभिलेखागार की पत्रिका ‘अभिलेख बिहार’ (अंक 6) में शारदा शरण का एक लेख प्रकाशित है, जिसका शीर्षक है-‘स्वतंत्रता संग्राम के दौरान की वीर गाथाएं: बक्सर जिला के संदर्भ में’। इस लेख में आजादी की लड़ाई के दौरान बिहार के बक्सर में प्रचलित गीतों का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इन गीतों में लगभग सभी स्थलों पर पुरुषों को ‘मर्द हो मर्दानगी के साथ, मरना सीख लो’, ‘चल भइया’, ‘शाहाबाद के वीर सपूतों’ तथा ‘अब चले झुण्ड मर्दानों का’ आदि संबोधनों से संबोधित किया गया है। अकारण नहीं है कि सुभद्राकुमारी चैहान जैसी कवयित्री भी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के लिए ‘खूब लड़ी मर्दानी’ लिख रही है। आजादी के दौर के इन गीतों में स्त्रियों का आह्वान नहीं है। एक गीत में चर्चा भी है तो बाधा के रूप में। कहा गया है-‘हम मातृभूमि के सैनिक हैं/अब प्राणों का है मोह कहाँ/केसरिया बाना पहन लिया/नारी बच्चों का छोह कहाँ।’ सन् 1931 ई. में भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव को फांसी दिये जाने के विरोध में प्रभुनारायण मिश्र द्वारा संपादित लाहौर की सूली अर्थात् सरदार भगत सिंह मस्ताना नामक कविताओं का एक संग्रह गया से प्रकाशित हुआ। इस संकलन में एक भोजपुरी कविता छपी थी जिसमें राट्रवाद के विरोधियों पर किस तरह व्यंग्य किया गया था : ‘मउगान्हि के मरद बनावे के परी।...गांव में मिटिंग सुनि घर में लुकात बाड़े।/ओकरा के चूड़ी पहिरावे के परी।।/आपुस में बइठी के गांधी के सिकायत करे।/तवना के मुंहे कारीख पोते के परी।।’ महावीरप्रसाद द्विवेदी की भाषा में भी स्त्रियों के प्रति ऐसी ही संकीर्ण धारणा का असर दिखलाई पड़ता है। उन्होंने युद्धरत लक्ष्मीबाई के स्वरूप के बारे में लिखा-"एक कोमलांगी अबला, नंगी तलवार हाथ में लिए हुए और बड़े-बड़े वीर योद्धाओं को उसके आघात से भूतलशायी करते हुए, सुरक्षित निकल गईं।" (स्नेह सुधा, 'हिंदी का भाषिक विवाद : आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के पत्रों के विशेष संदर्भ में', गवेषणा, अक्टूबर-दिसंबर 2025; भारत यायावर, महावीरप्रसाद द्विवेदी रचनावली, खंड 5, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृष्ठ 139) लक्ष्मीबाई के संदर्भ में एक और पंक्ति मिलती है जहाँ 'युद्धरत वीरांगना' भी हाय 'अबला' ही रह गई। महावीरप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है-"परंतु एक कोमल और अल्पव्यस्क अबला अनेक वीरों के बीच कब तक सजीव रह सकती है?" (भारत यायावर, पृष्ठ 141) इसी तरह महावीरप्रसाद द्विवेदी ने रानी की मृत्यु पर ह्यूरोज के कथन में आए 'lady' शब्द का अनुवाद (भद्र) महिला न करके 'अबला' किया है। कहना अनावश्यक है कि यहाँ लक्ष्मीबाई के लिए 'अबला' शब्द का प्रयोग स्त्रियों के प्रति द्विवेदी जी के संकीर्ण दृष्टिकोण को प्रकट करता है। (स्नेह सुधा, पूर्वोद्धृत) इसी तरह का भाषिक प्रयोग कुमारी कारने लिया सोहराबजी के चरित चित्रण में भी द्रष्टव्य है- बी.ए. की परीक्षा में डेकन कॉलेज में प्रथम और विश्वविद्यालय में प्रथम चार में रहने पर द्विवेदी जी ने लिखा- "अपने से अधिक दृढ़, अधिक साहसी, अधिक बलवान और अधिक संकोची युवा लड़कों का इस कोमलांगी अबला कुमारी के द्वारा परास्त किया जाना आश्चर्य की बात है।" (भारत यायावर, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 73) इसी तरह अध्यापिका के रूप में उनका चित्रण करते हुए द्विवेदी जी लिखते हैं-"विचार करने की बात है कि एक थोड़ी उम्र की अबला सबल पुरुषों को पढ़ाने बैठी !" (भारत यायावर, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 73) यह कथन अनौचित्यपूर्ण है क्योंकि ज्ञान के क्षेत्र में शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक बल की बात की जानी चाहिए थी। कहना अनावश्यक है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा पुरुष वर्चस्व की भाषा है। 

श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की ‘आई फॉलो गांधीजी’ शीर्षक से एक किताब छपी थी। दादाभाई नौरोजी की पौत्री खुरशैद नौरोजी ने किताब पर ‘फॉलो’ को काटकर ‘स्वॉलो’ बना दिया। गांधीजी ने ठठाकर हँसते हुए कहा, ‘अरे, लड़कियों की अक्ल ही कितनी होती है? तुम मुंशी को क्या समझोगी?’ खुरशैद ने विषाद-भरे स्वर में कहा-‘बापूजी, आपके तथाकथित गांधीवादी भक्त लोग आपको और गांधीवाद को निगल जायेंगे।’ (रामनंदन मिश्र, महात्मा गांधी और मैं, जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान, 2020, पृष्ठ 26) भगत सिंह बम केस में क्रांतिकारी पार्टी का एक सदस्य फणीन्द्र मुकर्जी पुलिस का भेदिया हो गया था। पार्टी की गोपनीयता के लिए खतरा उत्पन्न होते देख यह निश्चय हुआ कि उसे गोली मार दी जाय। उपयुक्त व्यक्ति की खोज शुरू हुई। बिहार में कहीं पार्टी की मीटिंग हुई। मीटिंग में पार्टी के नेता किशोरी प्रसन्न सिंह अपनी पत्नी सुनीति देवी के साथ उपस्थित थे। सुनीति देवी ने प्रार्थना की: ‘यह काम मुझे सौंपा जाय’, किन्तु किशोरी बाबू ने ‘आदेश’ के इशारे से उन्हें बैठा दिया। सलाह-मशविरे के बाद यह काम एक दूसरे सदस्य को सौंप दिया गया। इस घटना के कुछ वर्ष बाद सुनीति देवी को तपेदिक हो गया। लाख प्रयत्न हुए, पर मृत्यु का पंजा ढीला न पड़ा। मृत्यु से कुछ घड़ी पहले किशोरी बाबू से कहा : ‘मेरी विदाई का समय अब दूर नहीं, इसलिए मुझे आपसे एक बात कहनी है कि जब किसी आदमी को आदमी की तरह मरने का मौका मिल रहा हो, तो उसे कभी रोकना मत।’ (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, जिंदगी मुस्करायी, भारतीय ज्ञानपीठ, नौवां संस्करण: 2000, पृष्ठ 39-40) 

शारदा कुमारी देवी द्वारा छपरा से निकाला गया ‘महिला दर्पण’ नामक हिन्दी मासिक किसी महिला द्वारा संपादित अपने ढंग का पहला पत्र है। इसकी संपादिका को सलाह देते हुए तृतीय बिहार-प्रादेशिक साहित्य-सम्मेलन के सभापति शिवनंदन सहाय ने कहा था : ‘हमारे विचार में तो कौंसिलों में पुरुषो की प्रतिद्वन्द्विनी बनने की अपेक्षा गृहलक्ष्मी और गृहदेवियां बनने ही में आर्या महिलाओं की अधिकतर शोभा है। अपनी भगिनियों को ऐसी ही शिक्षा और उपदेश देना सम्पादिका के लिये उत्तम होगा।’ (बिहार का साहित्य, पहला खण्ड, पुस्तक भंडार, पृष्ठ 112) 

'चाँद' पत्रिका के 29 जनवरी, 1925 के अंक में ‘सती’ की दो सूचनाएँ प्रकाशित हैं। एक छिंदवाड़ा की और दूसरी छपरा (बिहार) की। छपरा की घटना का स्रोत ‘वॉयस और इंडिया’ नामक पत्र है। उसमें ‘पटना के सुप्रसिद्ध देशभक्त बाबू राजेन्द्र प्रसाद जी’ ने उक्त आशय का एक पत्र प्रकाशित कराया था। छपरा के बाबू बब्बन सिंह असहयोग आन्दोलन से जुड़े थे। वे स्त्रियों को सूत कातने और कपड़े बुनने की शिक्षा देते थे। खादी के प्रचार में उन्होंने अपनी जमीन भी रेहन रख दी। इन्हीं बाबू बच्चन सिंह के निधन के बाद उनकी पत्नी ने भी स्वयं को आग लगा ली। राजेन्द्र प्रसाद के पत्र की अन्तिम पंक्तियां ध्यान देने लायक हैं, ‘‘आस-पास के मुहल्ले में बिजली की तरह यह खबर फैल गई कि रामसूरत सती हो गई और हजारों लोग दर्शन के लिए एकत्र होने लगे। जिन दोनों प्राणियों ने खादी के लिए अपना सर्वस्व समर्पण कर दिया था उनका इस तरह अन्त हो गया। रामसूरत उस सच्ची सती का उदाहरण छोड़ गई जिसके विषय में हम लोग पुस्तकों में तो बहुत कुछ पढ़ते हैं पर प्रत्यक्ष उदाहरण किंचित ही देखते हैं।’’ (आशुतोष पार्थेश्वर, चाँद की ‘राजनीति’ (सन्दर्भ : भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन), अनुसंधान, अंक 17-18 जनवरी-दिसम्बर 2021) ‘सती’ का आकर्षण इतना बड़ा है कि प्रेमचन्द भी अपनी कई आरम्भिक कहानियों में उसका उत्फुल्ल अंकन करते मिलते हैं। ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ (1908) और ‘गुनाह का अगनकुंड’ (1910) शीर्षक कहानियों में यह देखा जा सकता है। (आशुतोष पार्थेश्वर, पूवोक्त) पितृसत्तात्मक समाज का एक अत्यंत सहृदय पुरुष भी, अगर बहुत सचेत न हो तो, पुरुष-वर्चस्व अथवा स्त्री-विरोध की भाषा का प्रयोग करेगा। टैगोर एक जगह लिखते हैं : ‘सती जैसे अपने पति के सिवा दूसरे को नहीं देखती, अच्छी कविता सहृदय के सिवा और किसी की अपेक्षा नहीं रखती।’ (अमृतराय, नयी समीक्षा, हिंदुस्तानी पब्लिशिंग हाउस, बनारस, 1950, पृष्ठ 207) 8 नवंबर, 1945 को कुसुम को लिखे पत्र में गांधीजी कहते हैं-‘सच्ची विधवा मानती ही नहीं है कि अपना पति का देह छुट गया इसलिये देहधारी आत्मा भी छुट गया। विवाह होता है वह कुछ पुतले के साथ नहीं लेकिन पुतले में भी आत्मा रहती है उसके साथ। विधवा का पुनर्लग्न निषिद्ध माना जाता है, इसका कारण भी यही है। इस कारण सिर पटकना, आत्मघात करना आदि विचार आते हैं वह सब धर्म और नीति के विरुद्ध है।’ (गांधी संपूर्ण वांग्मय, 82, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली, नवंबर 1991, पृष्ठ 51) 

1926 ई. में गांधीजी बिहार के दरभंगा आए हुए थे। उन्होंने देखा कि स्त्रियों के बैठने के स्थान पर चिक का पर्दा डाला हुआ था। यह स्थिति गांधीजी को ठीक नहीं लगी। उन्होंने विरोधस्वरूप अपने द्वारा संपादित पत्र ‘नवजीवन’ में एक तीव्र टिप्पणी लिखी। (रामनंदन मिश्र, महात्मा गांधी और मैं, जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान, पटना, 2020, पृष्ठ 6) रामनंदन मिश्र ने जब 1928 में पर्दा प्रथा के विरुद्ध संघर्ष का आरंभ किया तो गांधीजी ने 28 जून, 1928 के ‘यंग इंडिया’ में एक अग्रलेख लिखकर इसका स्वागत किया। कहा कि ‘पर्दा प्रथा बिहार की आधी मानवता को सामाजिक सेवा से ही नहीं, बल्कि बहुत स्थानों पर उन्हें प्रकाश और हवा से भी वंचित रखती है। जितना जल्द लोग समझ जायें कि बहुत-सी सामाजिक बुराइयां हमें स्वराज की ओर बढ़ने नहीं देतीं, उतनी ही ज्यादा लक्ष्य की ओर हमारी प्रगति होगी। (रामनंदन मिश्र, पूर्वोक्त) 

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने अपने घर की औरतों का हाल लिखा है-‘हमारे यहाँ पर्दा बहुत सख्त होता है। मैंने देखा है कि जब मेरी भौजाई आईं तो उनके साथ दो दाइयां आई थीं और वह केवल उन दोनों से ही बातें कर सकती थीं! जीरादेई में एक कमरे में रहती थीं। कभी ओसारे में भी निकलने की इजाजत नहीं थी।’ (आत्मकथा, सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2002, पृष्ठ 46) ‘मेरी भौजाई तो कमरे से बाहर निकलती ही न थीं। हाँ, नित्य-क्रिया के लिए जाने के समय पहले सब लोग हटा दिये जाते। लोगों में दूसरा कोई आंगन में रहता ही न था। अगर कोई छोटा लड़का होता तो वह भी हटा दिया जाता। इतने से भी काफी पर्दा नहीं होता और उनके नैहर की दाइयां कपड़े का पर्दा लगाकर उनको ले जातीं।’ ....‘मेरी माँ, चाची और बहन भी जब उनके कमरे में जाती तो वह घूँघट तान के बैठ जातीं। जीरादेई की कोई दाई भी वहां जाने न पाती।’ ......‘जबतक मेरी माँ जीवित रहीं तबतक न तो मेरी भौजाई और न मेरी स्त्री ही कभी अपने कमरे से निकलकर आजादी के साथ आंगन में घूम-फिर सकीं या बैठ सकीं।’ (वही, पृष्ठ 47) ...‘इस प्रकार घर में बराबर बंद रहते-रहते मेरी भौजाई और मेरी स्त्री दोनों का स्वास्थ्य खराब हो जाना स्वाभाविक था। ऐसा ही हुआ भी। दोनों ही कुछ दिनों तक, एक के बाद दूसरी, गठिया से तकलीफ पाती रहीं, जो, बहुत दिनों के बाद, जब वे आँगन में खूब घूमने-फिरने लगीं, तभी छूटी।’ (वही, पृष्ठ 60) श्री धर्मलाल सिंह ने ‘राजेन्द्र अभिनन्दन ग्रन्थ’ में ‘मिथिला की महारानियां’ शीर्षक लेख की पाद-टिप्पणी में लिखा है कि ‘‘दरभंगा-राज-परिचार में पर्दा प्रथा बड़ी कड़ाई से बरती जाती है। ‘असूर्यंपश्या सा तु राजदारा' की कहावत चरितार्थ होती है। अतः उनका छायाचित्र लेना एकदम वर्जित था। इसीलिए, उनके चित्र दुर्लभ हैं।’’ (राजेन्द्र अभिनन्दन ग्रन्थ, पृष्ठ 377)

आजादी की लड़ाई के दौर के अधिकतर हिंदी लेखक अपने-अपने कारणों से ‘स्त्री की आजादी’ से चिंतित लगते हैं। फिलहाल ‘मतवाला-मंडल’ के ‘मनोरंजन-मूर्ति’ तथा शिवपूजन सहाय के ‘साहित्यिक गुरु’ ईश्वरीप्रसाद शर्मा की ‘सुधरी हुई स्त्रियाँ’ कविता के व्यंग्य का ‘आनंद’ लें-‘न कहना सास का माने, न स्वामी का कहा करती।/है मन में जिस तरह आता, उसी ढंग से रहा करती।।/है परदा दूर कर डाला, सभा में बोलती फिरती।/है छोड़ा काम घर का, देश के हित है फिरा करती।।/न भाती पाकशाला औ न भाता कूटना-पिसना।/है भाता पाठ ‘नावेल’ का, कलम का रातदिन घिसना।।/है सुधरी नारियों ने अब सजायी मेम-सी सज्जा।।/पुरुष से लड़ रही अधिकार के हित नारियाँ जग की।/भला क्यों चुप रहेंगी देवियाँ इस वृद्ध भारत की?/हटाकर जाल घुँघट का, मिटाकर आँख की लज्जा।/इसी से भूलकर प्राचीनता आदर्श की अपने।/यहाँ भी देवियाँ हैं देखती यूरोप के सपने।।/मगर भारत का रुतबा क्या बढ़ेगा ऐसे करतब से।/हमारी देवियों का मान बढ़कर है जगत भर से।।/हमारे ढंग निराले हैं, हमारी रीति न्यारी है।/हमें लखकर चकित होता सदा संसार भारी है।/हमारा तो भला होगा, न भूलें रूप यदि अपना।/न छोडें रीति को अपनी, न देखें और का सपना।/पढ़ें सब नारियाँ, विदुषी बनें, कर्तव्य को पालें।/न सीखें किन्तु यूरप की निराले ढंग की चालें।।/बनें गृह-देवियाँ वे तो, कभी मत ‘लेडियां’ होवें।/किसी दिन भूलकर प्राचीन मर्यादा नहीं खोवें।।’ (बिहार के नवयुवक हृदय, पृष्ठ 37-38)

श्रीयुत माधव शुक्ल (लखनऊ) की ‘स्त्री दर्पण’ (पृष्ठ 48-49) में ‘स्त्री-धर्म’ कविता छपी थी, यहां उसे भी उद्धृत करना दिलचस्प होगा: ‘हे अबला गन! धर्म गहो, नहिं बोर नर्क में जाओगी।/कब तक रह इस नीच दशा में अपना समय गंवाओगी।।/घर, दुआर, धन, भाई, बन्धु नहिं अन्त काम कोइ आता है।/केवल एक धर्म मरने पर साथ जीव के जाता है।।1।।/कुल मरजादा, देश बड़ाई, बनी तभी तक रहती है।/जब तक धर्म सत्य की धारा लोगों के हिय बहती है।।/पति चरणों पर ध्यान सदा, यहि केवल धर्म तुम्हारा है।/इसको छोड़ अधर्म महा नहिं जिसका पारावारा है।।2।।/जिस नारी का देव, पितृ, गुरु, जप तप, सबही स्वामी है।/है पतिव्रता वही, अन्त में स्वर्ग लोक की गामी है।।/जो विवाह के पति वचनों को सदा ध्यान में धरती हैं।/नहीं यथोचित धर्म ग्रन्थ का अपने आदर करती हैं।।3।।/वे नारी गन जो अभाग्य वश हो जाती हैं पति से हीन।/तिनको धर्म ग्रन्थ अवलोकन सदा उचित शृंगार विहीन।।/जो गृहस्थ निज कर धर्म का करती हैं श्रम कर प्रतिपाल।/शिक्षा दे पुत्री पुत्रों को सदा सिखाती उत्तम चाल।।4।।/सुख में कभी नहीं आपे से जो बाहर हो जाती हैं।/महा दुःख पड़ने पर भी जो नहीं कभी अकुलाती हैं।।/बड़े धैर्य के साथ सदा जो घर का काज चलाती हैं।/पति का सुयश बढ़ाने के हित जो कर्म सरसाती हैं।।5।।/ऐसे कामों का करना ही है गृहस्थ नारी का धर्म।/अहो देवियो! तिस्से छोड़ो जेते निंदित नीच कुकर्म।।/सुनो तुम्हारे बिना गृहस्थी बन सकती है कभी नहीं।/केवल पुरुष बना लेता है ऐसा भी है सुना कहीं ?।।6।।/मानों एक शरीर गृहस्थी हाथ पांव जिसके हैं नर।/भीतर की अवयव नारी हैं रहता तन जिसके बलपर।।/हाथ उठाकर मुख देता है भीतर अग्नि पचाती है।/और बनाकर रक्त देह की दिन दिन शक्ति बढ़ाती है।।7।।/तो फिर सोंचो यदि हो जावे भीतर रोग ही का वास।/यह शरीर तब धीरे धीरे हो जावेगा सत्यानास।।/जिससे इसकी सब प्रकार से रजा करना है तब धर्म।/सुयश बढ़ानेवाला बढ़कर नहीं कोई सत्कर्म।।8।।’ (श्रीयुत माधव शुक्ल (लखनऊ), ‘स्त्री दर्पण’, प्रयाग, भाग 2, अंक 1, 1 जनवरी, 1910, पृष्ठ 48-49)

‘स्त्री-धर्म’ पर अगर जोर है तो इसका कारण है कि ‘‘एक कुल में यदि कोई पुरुष व्यभिचारी बन जाये, तो उस कुल में वर्णसंकरता नहीं हो सकती; परन्तु उस कुल में यदि कोई स्त्री व्यभिचारिणी बन जाय, तो उसमें अवश्य ही वर्णसंकर पैदा होने लगेंगे। गीता में देख सकते हैं, कि पुरुषों के बिगड़ने से वर्णसंकर पैदा होंगे, ऐसा नहीं कहा गया है। वहाँ लिखा है कि-‘स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय! जायते वर्णसंकरः’ अर्थात् स्त्रियों के बिगड़ जाने से कुल में वर्णसंकर पैदा होते हैं। जिस जाति में वर्णसंकरता आ जाती है, वह जाति अवश्यमेव नष्ट हो जाती है।’’ (विन्ध्येश्वरीप्रसाद शास्त्री, आर्यमहिला, मासिक, भाग 10, संख्या 5-6, भाद्रपद-आश्विन, संवत 1984 विक्रम, पृष्ठ 133; हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ 566-567।) क्योंकि ‘जिस जाति में यह वर्णाश्रम रूपी बन्धन नहीं है, वह जाति चिरकाल तक जीवन धारण नहीं कर सकती। इस विषय में संसार की अनेक जातियों का उदाहरण इतिहास स्वयं दे रहा है। प्राचीन ग्रीक, रोमन, बेबीलोनियन, इजिप्सियन आदि अनेक जातियों का पता तक नहीं रहा है। दुनिया के इतिहास में चार हजार वर्ष के पहले की कोई जाति नहीं है; किन्तु अनन्तकाल से लेकर आज पर्यंत सनातन धर्मावलम्बिनी आर्य जाति जीवित है और भविष्य में भी इस वर्णाश्रम बन्धन की रक्षा करनेवाली हमारी सतीशिरोमणि आर्यमातायें हैं। यदि इनके अन्तःकरण से सतीत्व का संस्कार नष्ट हो जाये तो वह आर्यजाति जीवित नहीं रह सकती।’ (वही) किन्तु, भारतीय पितृसत्तात्मक समाज की मान्यता है कि ‘कुलीन स्त्रियां विपत्ति में भी सती-चरित्र का परित्याग नहीं करतीं।’ (कथासरित्सागर, प्रथम लम्बक, 13-14)

उर्दू के प्रसिद्ध साहित्यकार इम्तयाज अली ‘ताज’ को 14 सितंबर, 1920 के अपने खत में प्रेमचंद ने लिखा था : ‘‘मैं लिटरेचर को मैस्कुलिन देखना चाहता हूँ, फेमिनिज्म, ख्वाह वह किसी सूरत में हो, मुझे पसन्द नहीं। इसी वजह से मुझे टैगोर की अक्सर नज्में नहीं भातीं। यह मेरा भीतरी नुक्स है, क्या करूँ। अशआर भी मुझे वही अपील करते हैं जिनमें कोई जिद्दत (मौलिक सूझ) हो। ‘गालिब’ के रंग का मैं आशिक हूँ। अजीज लखनवी के ‘गुलकदे’ की खूब सैर की थी मगर बदकिस्मती से आज तक एक शेर भी मौजूँ नहीं कर सका। न जी चाहता है। गालिबन शायराना हिस (संवेदनशीलता) दिल में है ही नहीं।’’ (कलम का सिपाही, पृष्ठ 56) इस खत के कई बरस बाद इन्द्रनाथ मदान के एक सवाल का जवाब देते हुए भी कि बंगला साहित्य क्यों दिल को ज्यादा छूता है, उन्होंने लगभग यही बात कही थी-‘‘उसमें एक स्त्रियोचित गुण पाया जाता है, जिसे मैं अपने स्वभाव के प्रतिकूल पाता हूँ।’’ (कलम का सिपाही, पृष्ठ 56) एक बार जैनेन्द्र ने भी चर्चा की थी कि ‘बंगाली साहित्य हृदय को अधिक छूता है’, तो प्रेमचंद ने कहा था कि ‘उसमें स्त्री-भावना अधिक है’। (जैनेन्द्र, ‘प्रेमचंद : मैंने क्या जाना और पाया’, प्रेमचंद स्मृति अंक, प्रेमचंद रचनावली, खंड 20 में संकलित, पृष्ठ 21)

'स्त्री-भावना’ अथवा ‘स्त्रियोचित गुण’ अस्पष्ट नहीं है। आनंदी के बारे में अमृतराय लिखते हैं : ‘उन्हें कभी किसी से झगड़ा करते नहीं देखा गया और न वह दूसरी औरतों की तरह इधर की बात उधर लगाने में या टोले-पडोसवाले की निंदा में ही रस लेती थीं।’ (कलम का सिपाही, पृष्ठ 10) महताब राय को 'स्त्रियोचित गुण' से तनिक सावधान करते प्रेमचंद लिखते हैं : 'एक और बात याद रक्खो। तुम्हारा दिल मैं जानता हूँ, बहुत साफ है, लेकिन औरतों का दिल अक्सर तंगखयाल होता है।(महताब राय को प्रेमचंद का पत्र, चिट्ठी-पत्री 2, हंस प्रकाशन, पृष्ठ 154) एक बार 'पर-निन्दा' पर प्रवचन करते हुए महात्मा गांधी ने कहा था : 'पर-निन्दा करना एक बहुत बड़ा दोष है, जो स्त्री-जाति में विशेषकर पाया जाता है। (ब्रजकृष्ण चाँदीवाला, बापू के चरणों में, सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली, 1949, पृष्ठ 21)

कहा जाता है कि खुद ‘मुंशी प्रेमचंद छोटे भाइयों की पत्नियों को घूँघट में ही देखना पसंद करते थे। घर में घुसने से पहले अपने आने की सूचना खांसकर दिया करते थे।’ (आजकल, दिसंबर 2010, पृष्ठ 12) प्रेमचंद कहते हैं, ‘आज काफी स्त्रियां नौकरी करने लगी हैं, मगर वह अच्छा नहीं है, मैं इसको अच्छा नहीं समझता। अब इसका नतीजा क्या हो रहा है? अब पुरुष और स्त्री दोनों नौकरियां करने लगे, तब इसके माने क्या हैं? रुपए ज्यादा आ जाएंगे। उसी का तो यह फल है कि पुरुषों की बेकारी बढ़ रही है।’ आगे, ‘स्त्रियों की कमाई एक पैसा नहीं होती थी, और स्त्रियां काफी दबदबे के साथ घर पर शासन करती थीं, तब क्या वह कमाई करती थीं?’ (शिवरानी देवी, प्रेमचंद : घर में, आत्माराम एंड संस, 2008, पृष्ठ 217)

प्रेमचंद का बालविवाह हुआ था, लेकिन वह ऐसा ‘बालक’ था जिसकी आँख में पत्नी का उम्र में बड़ा होना सबसे ज्यादा चुभा था। शिवरानी देवी की लिखी किताब का भरोसा करें तो ‘बालक प्रेमचंद’ को सबसे पहले पत्नी की उम्र दिखी, सुंदरता-कुरूपता इसके बाद ही आती है। इस शादी की सारी बात प्रेमचंद ने शिवरानी देवी से गुप्त रखी थी। उनके घर के लोग भी इस योजना से वाकिफ नहीं थे। आशंका थी कि बात प्रकट करने पर उनके ब्याहता होने की चर्चा होगी और दूसरी शादी में विघ्न उपस्थित होगा। शिवरानी देवी लिखती हैं, ‘एक की मिट्टी पलीद कर दी जिसकी कुरेदन मुझे हमेशा होती है। जिसे मैं बुरा समझती हूँ, वह हमारे ही यहाँ हो और हमारे हाथों हो। मैं स्वयं तकलीफ सहने को तैयार हूँ, परन्तु स्त्री जाति की तकलीफ मैं नहीं देख सकती। उसी का प्रायश्चित शायद मुझे भी करना पड़ेगा, हालांकि मैं बेगुनाह हूँ। मेरे पिता को मालूम होता तो आपके साथ मेरी शादी हर्गिज न करते।’ (प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 10) आगे, ‘आप पुरुष थे, आप मुझे ब्याह लाये, वे तो घर में बैठी हैं। यह क्या स्त्रियों के साथ अन्याय नहीं है? मैं भी बदसूरत होती, तो आप मुझे भी छोड़ देते। अगर मेरा बस होता तो मैं सब जगह ढिंढोरा पिटवाती कि कोई भी तुम्हारे साथ शादी न करे।’ (प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 10-11) प्रेमचंद झेंपते हुए कहते हैं, ‘इसीलिए तो तुम्हें मालूम न हुआ’। (प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 11) प्रेमचंद का तीन स्त्रियों के साथ संबंध रहा। पहली स्त्री के जीवनकाल ही में आपने एक और स्त्री के साथ संबंध बनाया। शिवरानी देवी के साथ शादी के बाद भी प्रेमचंद का उस स्त्री के साथ संबंध बरकरार रहा। सवाल है कि उस स्त्री के रहते प्रेमचंद ने शिवरानी देवी के साथ शादी क्यों की? सवाल यह भी है कि वह स्त्री प्रेमचंद की पत्नी क्यों नहीं बन सकी? 

‘हिन्द स्वराज’ में गांधीजी मशीनीकरण का विरोध करते हैं। विरोध के कई कारण हैं। एक प्रमुख कारण यह हो सकता है कि यंत्रों की वजह से ‘जो स्त्रियां घर की रानियां होनी चाहिए, उन्हें गलियों में भटकना पड़ता है, या कोई मजदूरी करनी पड़ती है।’ (हिन्द स्वराज, सर्व सेवा संघ-प्रकाशन, वाराणसी, जून 2016, पृष्ठ 10-11) स्त्री का ‘मालिक’ उसका पति है। यह ‘मालिक’ स्त्री को ‘घर की रानी’ बनाता है, अन्यथा वह ‘वेश्या’ है। गांधीजी ने पार्लियामेंट को ‘वेश्या’ कहा। वेश्या कहने के पीछे गांधीजी का तर्क है : ‘पार्लियामेंट को मैंने बेसवा (वेश्या) कहा वह भी ठीक है। उसका कोई मालिक नहीं है। उसका कोई एक मालिक नहीं हो सकता।’ (हिन्द स्वराज, पृष्ठ 34) व्युुत्पत्ति विज्ञान कहता है कि ‘विश्’ (कुल) से दो शब्द व्युत्पन्न हुए-‘वैश्य’ और ‘वेश्या’। (भगवतशरण उपाध्याय, खून के छींटे इतिहास के पन्नों पर, पृष्ठ 77) विश् की वर्णविषयक संज्ञा ‘वैश्य’ हुई और उससे सेवित सामूहिक संपत्ति-सी नारी ‘वेश्या’ कहलाई। (भगवतशरण उपाध्याय, भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, पृष्ठ 105) कहना अनावश्यक है कि वैश्य भी ब्राह्मण-क्षत्रिय की सामूहिक संपत्ति थे। पालि भाषा में वैश्य शब्द का स्त्रीलिंग ‘वेसी’, ‘वेसिया’ या ‘वेस्सी’ है, जिसका अनुवाद ‘एक निम्न जाति की औरत’, ‘वेश्या’ दिया गया है। शिवरानी देवी की पुस्तक ‘प्रेमचंद : घर में’ का समर्पण कुछ इस तरह है: ‘स्वामी,/तुम्हारी ही चीज/तुम्हारे चरणों में चढ़ाती हूँ/इस तुच्छ सेवा को अपनाना/तुम्हारी दासी या रानी’।

परंपरागत पितृसत्तात्मक भारतीय समाज ने स्त्रियों की कई कोटियां बना रखी है-पत्नी, प्रेमिका, वेश्या आदि। यहां सहज ही ‘आलोकधन्वा याद आते हैं। कितनी प्रासंगिक हैं उनकी कविता ‘भागी हुई लड़कियां’ की ये पंक्तियां ‘तुम/जो पत्नियों को अलग रखते हो/वेश्याओं से/और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो/पत्नियों से। 1920 के दशक के भारतीय परिवार-समाज के बारे में लिखती हुई मृणाल पांडे बताती हैं कि ‘घरों के भीतर मर्दाने अलग होते थे, जहाँ समय-समय पर घर के मर्दों की महफिलें जमती और कभी-कभार उसमें ‘‘वैसी’’ औरतें मुजरे को बुलवाई भी जाती थीं। पुरुषों के सन्दर्भ में यह सर्वस्वीकृत था, कि उनकी उद्दाम मर्दानगी सिर्फ घरेलू स्त्रियों के सहवास से तृप्त नहीं होती थी। अतः युवा औरतों ने भी दूसरी किस्म की स्त्रियों की बात चुपचाप स्वीकार कर ली थी। इन औरतों के दुखों की अभिव्यक्ति गीतों में होती थी, वास्तविक जीवन में नहीं। प्रसंगवश, वाराणसी की कचौड़ी गली से अनेक रसज्ञ ‘कजली’ का रसास्वादन करने मिर्जापुर पधारते थे। इस पर उनकी पत्नियां उन्हें उलाहने देकर गाती थीं- ‘मिर्जापुर कइल गुलजार/कचैड़ी गली सून कइल बलमू।’ (सुरेश चंद्र वर्मा, ‘ऋतु एवं क्रीड़ा गीत : कजली, आजकल, अगस्त 2012) और बड़ी-बूढ़ियाँ तो इस स्वैराचार को सगर्व अपने खानदान की हैसियत का प्रमाण मानतीं, बखानती थीं। पत्नी से रोमांस या अपनी घरवाली से खुला बनाव-लगाव अच्छी नजर से नहीं देखे जाते थे। लेखिका ने खुद अपने श्वसुर-कुल की बुजुर्ग महिलाओं से एक अधपगली महिला रिश्तेदार के बारे में सुना है, जो घर की युवा बहुओं द्वारा शाम को सिंगार-पटार करने पर बेतरह खफा हो उठती थीं-‘कुछ तो उन दूसरियों के लिए छोड़ो!’ वे कहती थीं, घर-गिरस्तवालियों का, आँचल चिकना होवै है, उन लोगों मैं। तुम लोग उनकी राह पकड़ोगी, तो उन बेचारियों की कमाई धमाई का क्या होगा ? (मृणाल पांडे, स्त्री : देह की राजनीति से देश की राजनीति तक, पृष्ठ 43)

एक बार रामानन्द चट्टोपाध्याय के ‘विशाल भारत’ में नाटक में काम करनेवाली नर्तकियों के चित्र छप गये तो उन्होंने संपादक बनारसीदास चतुर्वेदी जी को बुलाया और सख्त हिदायत दी-‘मैं आपकी स्वाधीनता में बाधक नही हो सकता, पर चूंकि मेरा अनुभव आपसे कुछ अधिक है, इसलिए यह सुझाव दे सकता हूँ कि नर्तकियों के चित्र आप ‘विशाल भारत’ मे न छापें। वे प्रायः चरित्रहीन होती हैं।’ चतुर्वेदी जी ने तर्क करने की धृष्टता की-‘कोई सम्पादक किस-किस के चरित्र की खोज-बीन कर सकता है? चरित्र तो बहुत से लीडरों और लीडरानियों के भी शायद अच्छे नही है।’ इस पर ‘बड़े बाबू’ (रामानन्द चट्टोपाध्याय) ने केवल इतना ही कहा, ‘नेता और नेत्री मंच पर चढकर अपने हाव-भाव से जनता को पथभ्रष्ट तो नहीं करते, जबकि नर्तकियां वैसा करती हैं।’ (बनारसीदास चतुर्वेदी, महापुरुषों की खोज में, पृष्ठ 35) एक और दिलचस्प किस्सा है। कुछ ही दिनो बाद कहीं से घूमते हुए श्री राखालदास बनर्जी (सुप्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता) ‘विशाल भारत’ के कार्यालय में पधारे और जब चतुर्वेदी जी ने उन्हें ‘बडे बाबू’ की उक्त बात सुनाई तो उन्होंने हँसकर कहा, ‘मैं भी अपना एक किस्सा सुना दूं। प्रयाग में मैं एक बार केदार बाबू से मिलने गया हुआ था। वह भी विद्यार्थी थे और मैं भी। गलती से एक ऐक्ट्रेस का चित्र, जो मेरे पास था, बड़े बाबू की मेज पर ही छूट गया। दूसरे दिन जब मैं वहाँ पहुंचा तो वह चित्र चार टुकडो में बंटा हुआ, जहाँ का तहाँ रक्खा दीख पडा। मैंने केदार बाबू से पूछा कि क्या मामला है? उन्होने कहा, ‘यह शिक्षा आपको बडे बाबू ने ही दी है। बडे बाबू प्राचीनतावादी विचारो के हैं। आपको उनसे बहस नही करनी चाहिए।’ तथ्य है कि ‘बडे बाबू ने अपने जीवन में न कोई नाटक देखा था, न कोई फिल्म। हाँ, शान्तिनिकेतन मे विद्याथियो के नाटक उन्होने अवश्य देखे थे।’ (वही) स्मरण रहे कि महात्मा गांधी के लिए रामानन्द बाबू ‘ऋषि’ थे तो महावीरप्रसाद द्विवेदी उन्हें ‘गुरुतुल्य’ मानते थे। रोमा रोला को तोलस्तोय से कुछ अधिक ही ‘करुण’ मालूम पड़े थे।

एक दृष्टांत और : ‘कई वर्षों की पुरानी बात है। हमें एक आवश्यक कार्यवश स्वर्गीय डाॅक्टर गंगानाथजी झा के आवास-स्थान पर जाना पड़ा। हमलोग वार्तालाप कर ही रहे थे कि प्रयाग विश्वविद्यालय के कतिपय छात्र भी वहां आ पहुंचे। आने का कारण पूछने पर छात्रों ने कहा-‘‘हम विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर की लड़की के नृत्य का कार्यक्रम बनाना चाहते हैं। अतः हमें इसके लिये अनुमति प्रदान की जाय।’’ डाॅक्टर साहब ने उन छात्रों की बात सुन लेने पर एक जिज्ञासाभरी दृष्टि हमपर डाली। डाॅक्टर साहब का आंतरिक अभिप्राय जान लेने में हमें कठिनाई नहीं हुई। हमने कहा-‘‘आप विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर हैं और ये आपके विश्वविद्यालय के छात्र हैं। अतः उपस्थित विषय पर हमारा कुछ कहना सर्वथा अनुचित और अप्रासंगिक है।’’ इसपर डाॅक्टर साहब ने मुस्कराकर कहा-वह तो आप ठीक कहते हैं; किंतु ऐसे नृृत्य के संबंध में आपके व्यक्तिगत विचार क्या हैं, हम यही जानना चाहते हैं।’’ उत्तर में हमने कहा-हम तो सनातनधर्मी हैं। हमारे निज के विचार कुछ नहीं; प्रत्युत हमारे विचार तो वे ही हैं, जो हमारे नीतिकारों के अनुभूत विचार हैं। यह कहकर हमने नीति का एक श्लोकार्ध पढ़ा-‘सलज्जा गणिका नष्टा निर्लजास्तु (निर्लज्जाश्च) कुलांगनाः’ अर्थात् ‘जो युवती हया-शर्म को तलाक दे युवकों के बीच नाचे वह क्या कुलांगना कही जा सकती है?’ इसे सुन डाॅक्टर साहब ने उन छात्रों को अनुमति देना अस्वीकृत कर दिया। इस पर स्थानीय दैनिक ‘लीडर’ में डाॅक्टर साहब के विरुद्ध आंदोलन भी उठाया गया; किंतु प्रौढ़ विचार रखनेवाले डाॅक्टर साहब के मन के ऊपर उस अवांछनीय आंदोलन का कुछ भी प्रभाव न पड़ा। इतना ही नहीं, डाॅक्टर साहब ने ‘को-एडुकेशन’ को भी अपने विश्वविद्यालय में पनपने नहीं दिया।’’ (श्री द्वारिकाप्रसाद चतुर्वेदी, ‘आधुनिक नारी’, कल्याण, नारी अंक, पृष्ठ 145-46)

इस चेतना का बीज पुनर्जागरणकालीन साहित्य में है। 1874 ईस्वी में भारतेन्दु हरिश्चंद्र ’बालाबोधिनी’ नाम से एक स्त्री विषयक पत्रिका निकालते हैं, किन्तु उसमें स्त्रियों को वही परंपरागत शिक्षा दी जाती है, जिसमें उन्हें एक ’अच्छा गुलाम’ बनने के ’गुर’ सिखाये जाते थे। दो वर्ष तक प्रकाशित इस मासिक पत्रिका के किसी भी अंक में स्त्रियों के अधिकार के सवाल नहीं उठाये गये, न ही उन्हें नये ज्ञान-विज्ञान की रौशनी में अपने जीवन के बारे में खुद सोचने की कोई प्रेरणा दी गई। ’नारि नर सम होहिं’ का नारा देनेवाले भारतेन्दु अपने बलिया वाले प्रसिद्ध व्याख्यान ’भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ में कहते हैं-’लड़कियों को पढ़ाइए, किन्तु उस चाल से नहीं जैसे आजकल पढ़ाई जाती है, जिससे उपकार के बदले बुराई होती है। ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल धर्म सीखें, पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज शिक्षा दें।’ यह बलिया में ददरी के मेले के समय ‘आर्य देशोपकरिणी सभा’ में दिया गया भाषण है। इसे भारतेन्दु के सेक्रेटरी इंदिरायन उपाध्याय ने पढ़ा था जो बाद में ‘नवोदिता हरिश्चंद्र चंद्रिका’ के दिसंबर, 1884 के अंक में प्रकाशित हुआ।  

’बालाबोधिनी’ में व्यक्त ‘स्त्रियोद्धार’ के संदर्भ में वीर भारत तलवार लिखते हैं कि ’इस मासिक पत्रिका में स्त्रियों की हालत सुधारने के बजाय खुद स्त्रियों को ही सुधारने का इरादा दिखाई देता है। इसमें उनके अधिकारों की नहीं, उनके कर्तव्यों की चर्चा की गई है।’ इस पत्रिका में स्त्रियों से संबंधित सबसे लंबी रचना ’बाला प्रबोध’ थी, जो 1857 की जनवरी से शुरू होकर अगले तीन-चार अंकों तक छपी। बिजनौर (पीलीभीत) के पास सिकंदराबाद के निवासी हीरालाल ने इसे सरकारी स्कूलों में लड़कियों के पाठ्यक्रम में लगवाने के मकसद से लिखा था। यह ठीक वैसा ही था, जैसा पाठ्यक्रम भारतेन्दु चाहते थे। “इसमें सास-ससुर, देवर-ननद, जेठ-जिठानी, शिशु आदि के प्रति और रस्म-रिवाजों तथा त्यौहारों के वक्त घर की बहू को कैसा सुंदर और योग्य वर्ताव करना चाहिए, इसका बखान किया गया है।“ पूरी रचना 1870 में छप चुकी डिप्टी नजीर अहमद की किताब ’मिरात-उल-उरूस’ के ढर्रे पर बनी है। नजीर अहमद ने अपनी इस बेहद लोकप्रिय किताब में स्त्री-शिक्षा की जबरदस्त हिमायत की है, लेकिन साथ ही उन्होंने चेतावनी भी दी है कि ’वे मर्दों की बराबरी करने की बात अपने दिमाग में हर्गिज न लाएं।’ 

भारतेंदु के मित्र रामदीन सिंह के खड्गविलास प्रेस के मैनेजर बाबू साहिबप्रसाद सिंह उन दिनों स्कूली पाठ्यक्रम के लिए किताबें लिखनेवाले प्रमुख लेखक थे। उन्होंने भारतेंदु की सहायता से तीन जिल्दों में स्त्रीशिक्षा की किताब तैयार की। उनकी ‘स्त्रीशिक्षा की पहली किताब’ खड्गविलास प्रेस से 1883 में छपी। इसमें एक पाठ है-शीलवती। इस पाठ में शीलवती नामक स्त्री के जीवन के बारे में लिखा गया है कि वह “घर या बाहर के सब कामों को पति से पूछकर करती और पति जब किसी विषय में कुछ पूछता तो अपनी बुद्धि के अनुसार बड़ी सावधानता से अच्छा और हितकारी मंत्र कहती, पर यह भी कह देती कि नाथ! मैं क्या जानूँ। मेरी स्त्री की बुद्धि कितनी। अपने पति के भोजन इत्यादि किसी काम में विलंब न (रस्साकशी, पृष्ठ 194) करती, नित्य बड़े सवेरे पति के पहले उठती और स्नानादिक करके गृहस्थी के काम में लगती, जो कोई वस्तु बाहर से मँगवाना होता वह मंगवा रखती, पति के भोजन के पीछे आप खाती। भोजन के पीछे वह सीना-पिरोना करती या और जो कुछ घर का काम निकलता करती या कोई पुस्तक अवलोकन करती या कुछ लिखती।’ (बाबू साहिबप्रसाद सिंह, स्त्रीशिक्षा की पहली किताब, खड्गविलास प्रेस, 1883, बांकीपुर, पृष्ठ 46; रस्साकशी, पृष्ठ 194-95 पर उद्धृत) दूसरी पुस्तक की अधिकांश सामग्री ‘बालाबोधिनी’ से संकलित है। लज्जा, पवित्रता, सास, ससुर, जिठानी, देवर, देवरानी आदि से किस ढंग का व्यवहार करना चाहिए-इन सभी विषयों पर विशेष रूप से इस पुस्तक में विचार किया गया है। (आधुनिक हिन्दी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका, पृष्ठ 144)

1907 तक ‘सरस्वती’ में छपे लेखों में स्त्रियों के ‘हिमायती लेखक’ न तो उसे बराबरी का हक देना उचित समझते हैं न स्वतंत्रता देना चाहते हैं। इस पत्रिका के लेखक प्रकारांतर से मनु का समर्थन करते लगते हैं। उदाहरण के लिए यहां जनवरी, 1907 के अंक से उद्धृत है, ’लोग मनु का इस बात में विरोध करते हैं कि वे स्त्रियों को स्वतंत्रता दिए जाने के विरोधी हैं...अच्छा, जरा देर के लिए मान लीजिए कि मनु के इस अन्याय से स्त्रियों को बचाने के लिए गवर्नमेंट ने एक कानून बनाकर स्त्रियों और पुरुषों के अधिकार बराबर कर दिए-उनके अनुसार स्त्रियों को मनमाना काम करने की आज्ञा मिल गई। इस दशा में यदि कोई कानूनदां स्त्री पति से कहने लगे-“सुनिए जनाब! मेरे और आपके अधिकार बराबर हैं-मैं भी स्वाधीन, आप भी स्वाधीन। एक दिन मैं चूल्हा-चैका और झाड़ू-बुहारू करूँ, एक दिन आप। एक दिन मैं आपकी सेवा करूँ, एक दिन आप मेरी सेवा करें, अथवा यदि वह कह बैठे ’मुझे संतान पैदा करने से इंकार है’ तो बताइए ऐसी स्वाधीनता का क्या नतीजा होगा। ...समाज को एक शृंखला में बंधा रखने के लिए व्यक्ति विशेष की स्वाधीनता को एक निर्दिष्ट सीमा के भीतर रखने की बड़ी जरूरत है।“ 

भारतेंदु ने लडकियों के पाठ्यक्रम की आलोचना करते हुए कहा कि 'ये पाठ्यपुस्तकें कई कारणों से आपत्तिजनक हैं। मैं मिस रोज ग्रीनफील्ड से पूरी तरह सहमत हूं कि बड़ी लड़कियों को प्रेमसागर (लल्लूलाल का बनाया) ग्रंथ पढ़ने के लिए नहीं देना चाहिए। विद्यांकुर और इतिहासतिमिरनाशक उनके नैतिक चरित्र का विकास नहीं कर सकते। चरित्र निर्माण (मोरालिटी) और घरेलू प्रबंध वगैरह के बारे में बतानेवाली अच्छी पाठ्यपुस्तकें उनके पाठ्यक्रम में लगानी चाहिए।' कहना अनावश्यक है कि प्रेमसागर अगर आपत्तिजनक ग्रंथ था तो वह लड़कों के लिए भी आपत्तिजनक होना चाहिए था। (वीरभारत तलवार, रस्साकशी, पृष्ठ 34)

'बालाबोधिनी’ में स्त्री को एक इनसान के रूप में देखने और उसकी समस्याओं को समझने का कोई प्रयत्न नहीं दिखता। चार साल तक निकली इस पत्रिका के किसी भी अंक में स्त्रियों के किसी भी अधिकार का सवाल नहीं उठाया गया, न उन्हें नए ज्ञान-विज्ञान की रोशनी में अपने जीवन के बारे में खुद सोचने की कोई प्रेरणा दी गई। भारतेंदु ने ब्रजभाषा में शृंगारिक कविताएं लिखी हैं। अपनी दोनों प्रेमिकाओं के लिए पद लिखे थे। 'अंधेर नगरी' में उस समय की प्रसिद्ध गानेवाली कई वेश्याओं के नाम दिये गये हैं। ये सभी भारतेन्दु के दरबार में आती-जाती थी। इन्हीं में से किसी के हाव-भाव पर भारतेन्दु को कोई नई उक्ति सूझी थी जिसपर कविता बनाकर उपस्थित सज्जनों को सुनाते हुए उन्होंने कहा था कि ‘हम इन सबों (वेश्याओं) का सहवास विशेषकर इसलिए करते हैं। कहिए! यह सच्चा मजमून कैसे हो सकता था।' लेकिन सच है कि चार वर्षों तक छपी 'बालाबोधिनी' में शृंगार रस की दूर-दूर तक कोई गंध नहीं मिलती। (रस्साकशी, पृष्ठ 38)


Thursday, September 17, 2026

दिनकर को पढ़ते हुए

दसवीं कक्षा की हिंदी पाठ्य-पुस्तक में काका साहब कालेलकर का कोई निबंध पढ़ना था। इसलिए कायदे से लेखक-परिचय के लिए जगह तो बनती ही थी। काका कितना कुछ पढ़ते थे यह बताने के लिए मेरे हिंदी शिक्षक के पास एक किस्सा होता। वे कहते, एक दिन कालेलकर तांगे पर बैठे पुस्तक पढ़ते हुए कहीं जा रहे थे। रास्ते में अचानक तांगा टूट गया और सारे यात्री इधर-उधर बिखर गये। तांगेवाले ने तांगे की मरम्मत कर चुकने के बाद यात्रियों को बिठाया। गिनती की तो एक आदमी कम पड़ जा रहा था। इधर-उधर बहुत नजर दौड़ाने के बाद कालेलकर एक गड्ढे में किताब पढ़ते दिखे। तांगेवाले ने आवाज दी, ‘साहब, तांगे पर नहीं चलेंगे ?’ ‘तो क्या मैं तांगे पर नहीं हूं?’, कालेलकर ने अत्यंत सहजता से पूछा। बहुत समझाने के बाद काका यह मानने को राजी हुए कि वे तांगे पर नहीं किसी गड्ढे में गिरे समाधिस्थ बैठे हैं। अब वे तनिक मुस्कुराये और तांगे पर आकर बैठ गये। कालेलकर के बारे में सुनाया उनका यह किस्सा मैं भी अपने छात्रों को ‘अविश्वसनीय’ मानकर सुना चुका हूं। 

इधर अपने स्कूल की लाइब्रेरी में दिनकर की 'संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ' किताब दिखी। इसमें ‘काका साहब कालेलकर’ एक अध्याय है। दिनकर ने भी कालेलकर से संबंधित एक किस्सा सुनाया है। किस्सा कुछ इस तरह है-‘जब काका साहब की भतीजी का ब्याह हुआ, कन्यादान का कर्म काका साहब ने ही किया था। विवाह के कुछ दिनों बाद काका साहब के नये भतीजदामाद काका साहब से मिलने को वर्धा पहुंचे; किंतु काका साहब ने उन्हें पहचाना ही नहीं, न दामाद साहब ने अपना परिचय देने की उदारता दिखायी। वे काका साहब के घर से लौट गये और उन्होंने काका साहब के बड़े भाई साहब को एक अप्रसन्नता-सूचक पत्र लिखा। यह पत्र काका साहब के भाई ने काका साहब को भेज दिया और साथ में कुछ ऐसी बातें भी लिख भेजीं, जो उलाहने की मुद्रा में लिखी जा सकती थीं। अब काका साहब क्या करते? उन्होंने आदमी भेजकर दामाद को बुलवाया, कई दिनों तक पुत्रवत् स्नेह से उन्हें अपने पास रखा और जाने के समय उनकी अच्छी बिदाई की। जब दामाद जाने लगे, काका साहब ने हंसते-हंसते कहा, ‘‘बेटा, तुम्हें नहीं पहचान सका, उसका दंड मैंने भर दिया। चाहो तो मेरे कान भी मल दो। लेकिन यह वादा नहीं करूंगा कि आगे तुम्हें जरूर पहचान लूंगा।’’ (पृष्ठ 63) 

एक दूसरी किताब आधुनिक भारत के निर्माता (प्रकाशन विभाग) श्रृंखला की है। किताब का नाम है 'काका साहब कालेलकर' और इसके लेखक रवीन्द्र केलेकर हैं। वे लिखते हैं कि 'चूँकि बड़े भाई गुजर चुके थे, इसलिए कन्यादान का काम दत्तोपंत (बचपन का नाम) को करना पड़ा था। कुछ समय बाद दत्तोपंत बेलगाँव में किसी से मिलने जा रहे थे। रास्ते में सामने की ओर से एक सज्जन आते दिखाई दिए। सामनेवाले ने दत्तोपंत को नमस्कार किया। बदले में दत्तोपंत ने भी उन्हें नमस्कार किया। वे पहचान नहीं पाये थे कि जिनको उन्होंने नमस्कार किया वे उनके दामाद थे।' (रवींद्र केलकर, काका साहब कालेलकर, प्रकाशन विभाग, पृष्ठ 180)

इस कहानी के बाद मेरी समझ में नहीं आ रहा कि अपने शिक्षक को ‘अविश्वसनीय’ मानूं या दिनकर अथवा स्वयं काका को ? इस किताब में इसी तरह के और भी कई दिलचस्प संस्मरण हैं। 

भाषा और साहित्य का डॉक्टर लोहिया हूँ!

दिनकर ने लिखा है कि 'समाजवादी नेताओं में से कुछ को अध्यात्म ने खींचा तो कुछ को व्यक्तिवाद ने। (दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1987, पृष्ठ 153) लोहिया का वे विस्तार से वर्णन करते हैं-'1934 का लोहिया युवक होते हुए भी विनयी और सुशील था किन्तु बुढ़ापे के समीप पहुंचकर वे उग्र हो गये थे। जवाहरलाल नेहरू को लेकर संभवतः एक ग्रंथि विकसित हो गयी थी। उनका विचार बन गया था कि जवाहरलाल जी से बढ़कर इस देश का अहित और किसी ने नहीं किया है तथा जब तक देश में कांग्रेस का राज है, तब तक देश की हालत बिगड़ती ही जायेगी। अतः उन्होंने निर्द्वन्द्व और सीधी राय बना ली थी कि जवाहरलाल जी का जितना भी विरोध किया जाय, वह कम है और कांग्रेस को उखाड़ने के लिए जो भी रास्ते दिखायी पड़ें, उन्हें जरूर आजमाना चाहिए।' (दिनकर, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 154)

आजाद भारत में भी लोहिया को कई बार जेल जाना पड़ा था। एक बार वे जिस जेल में कैद किये गये थे, जवाहरलाल नेहरू की एक प्रतिमा स्थापित थी। जेल से छूटने पर लोहिया के मित्रों ने उनसे पूछा, "कहिए, इस बार का कारावास कैसा रहा?" लोहिया ने कहा, "कुछ मत पूछो। मैं जिस कोठरी में कैद था, उसी के सामने नेहरू की मूर्ति खड़ी थी और हर वक्त मेरी नजर उसी पर पड़ जाती थी। जल्दी रिहाई हो गयी, नहीं तो उस मूर्ति को देखते-देखते मैं पागल हो जाता।" (दिनकर, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 154)

सन 1962 ईस्वी के अक्टूबर में, चीनी आक्रमण से पूर्व दिनकर ने 'एनार्की' नामक व्यंग्य-काव्य लिखा था, जिसकी पंक्तियां हैं-"तब कहो, लोहिया महान है,/एक ही तो वीर यहां सीना रहा तान है।" ये दो पंक्तियां लोहिया को बहुत पसंद थीं। कभी-कभी वे दिनकर से पूछते कि 'ये पंक्तियां कहीं तुमने व्यंग्य में तो नहीं लिखी हैं' तो कवि का जवाब होता-"वैसे तो पूरी कविता ही व्यंग्य की कविता है, मगर व्यंग्य होने पर भी आपके 'सीना तानने' की बड़ाई ही होती है।" एक दिन मजाक-मजाक में लोहिया ने यह भी कहा, "महाकवि, ये छिट-पुट पंक्तियां काफी नहीं हैं। तुम्हें मुझ पर कोई वैसी कविता लिखनी चाहिए, जैसी तुमने मेरे दोस्त जयप्रकाशजी पर लिखी थी।" "जिस दिन आप मुझे उस तरह प्रेरित कर देंगे, जिस तरह मैं जयप्रकाशजी से प्रेरित हुआ था, उस दिन कविता आपसे-आप निकल पड़ेगी।" (वही, पृष्ठ 155) जवाब तो दिनकर ने भी हँसते-हँसते दिया था लेकिन बात बड़ी ही गंभीर और चोट करनेवाली थी।

लोहिया जब आखिरी बार अमरीका गये थे, उन्हें लेखकों ने कुछ किताबें भेंट की थीं। उनमें से एक किताब कविता की किताब थी। कवयित्री थीं रूथ स्टीफेन। रूथ स्टीफेन ने अपनी पुस्तक इस टिप्पणी के साथ भेंट की थी : "For Ram, who rips shadows into rags." रूथ की नजर में लोहिया ऐसा आदमी है जो 'बाल की खाल उधेड़ता है और काल्पनिक छायाओं के चिथड़े उड़ा देता है।' सचमुच, कभी-कभी ऐसा लगता है कि जिस शत्रु पर लोहिया बाण चला रहे हैं, वह वास्तविक कम, काल्पनिक अधिक है। (वही)

दिनकर का विश्वास करें तो पंडित किशोरीदास बाजपेयी कहा करते थे : 'असल में मैं हिन्दी भाषा और साहित्य का डॉक्टर लोहिया हूँ।' (दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 88) 'डॉक्टर लोहिया राजनीति में धक्कामार भाषा का प्रयोग करते थे। बाजपेयी जी की भी भक्ति धक्कामार भाषा पर है। लोहिया स्थापित व्यक्तित्वों का विरोध करके आगे बढ़े थे। बाजपेयी जी भी साहित्याचार्य शालिग्राम शास्त्री और पंडित पद्मसिंह शर्मा का विरोध करके प्रसिद्ध हुए। डॉक्टर लोहिया के ही समान बाजपेयी जी भी अन्याय को नहीं सह सकते और जहां-जहां कीर्ति की पूंजी जमा है, उस दिशा की ओर जरा वक्र दृष्टि से देखते हैं।' (वही, पृष्ठ 88)

निराला की विक्षिप्तता

'1947 ईस्वी में काशी में निराला जी की स्वर्ण-जयंती मनायी गयी थी। अभिनंदन-पत्र के साथ निराला जी के हाथ में बांस की एक खोली भी दी गयी और सार्वजनिक रूप से कहा गया कि इस खोली के भीतर दस हजार रुपये हैं। सभा ने बड़े ही उत्साह से तालियां बजायीं। कवि आनंद से खिल उठे। उन्होंने सारी राशि नवजादिकलाल के परिवार, रामकृष्ण मिशन, सिस्टर निवेदिता के स्मारक आदि कामों के लिए वितरित कर दी। ...किन्त यह बांस की खोली बिल्कुल खाली थी। कहीं उनकी विक्षिप्तता के पीछे ऐसी घटनाओं का भी तो हाथ नहीं था?' (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 47)

गुप्त का पुनरुत्थानवाद!

दिनकर ने मैथिलीशरण गुप्त पर पुनरुत्थानवाद का असर देखा है। वे लिखते हैं कि जब पटना विश्वविद्यालय की रजत-जयंती के अवसर पर जो कवि सम्मेलन हुआ था, उसमें मैथिलीशरण जी भी पधारे हुए थे। कवि सम्मेलन में थोड़ा शोर होने लगा। यहां तक कि शोर उस समय भी होता रहा, जब सुभद्रा कुमारी चौहान काव्य-पाठ कर रही थीं। इससे मैथिलीशरण जी को गुस्सा आ गया और माइक पर जाकर उन्होंने गरजकर कहा, "आपने एक हजार वर्ष की गुलामी बर्दाश्त की है। क्या दो-एक कविताएं भी आप बर्दाश्त नहीं कर सकते?" (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 33)

उनके अनुसार श्री मैथिलीशरण जी हिंदी और उर्दू को एक करने के पक्ष में नहीं थे। वे हिंदी में, विशेषतः हिंदी काव्य में उर्दू शब्द लाने का विरोध करते थे। मेरी 'नर्तकी' नामक कविता का संपादन नवीन जी ने राष्ट्रकवि के साथ बैठकर किया था और हर जगह अगर को काटकर यदि तथा चीज को काटकर वस्तु बना दिया था। मेरा ख्याल है, दिल्ली आने के पूर्व मैथिलीशरण जी भाषा के मामले में इतने कठोर नहीं थे। उनकी 'इस शरीर की सकल शिराएं हों तेरी तंत्री के तार' वाली कविता में पहले 'प्रस्तुत हूं, मैं हूं तैयार' आता था। दिल्ली आने के बाद जब भी वे यह कविता पढ़ते थे, तब 'प्रस्तुत हूं मैं सभी प्रकार' कर देते थे। श्री बालस्वरूप राही को जब मैंने राष्ट्रकवि से मिलाया, वे बोल उठे, 'अब यही गड़बड़ है। आपने अपना उपनाम राही क्यों चुना, बटोही क्यों नहीं?' (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 36)

मैथिलीशरण गुप्त केवल वैष्णव ही नहीं, खांटी हिंदुत्व के कवि थे। अपनी हिन्दू भावना को अक्षुण्ण रखते हुए ही उन्होंने अपने राष्ट्रकवि-पद को संभाल रखा था। वैदिक आर्य गोमांस खाते थे, यह विचार उन्हें मान्य नहीं था। खान-पान में उचित से अधिक उदारता उन्हें असह्य थी। जब महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपने खान-पान संबंधी अद्भुत विचार जनता के सामने रखने शुरू किये, श्री मैथिलीशरण जी क्रोध से जल उठे और उसी मनोदशा में उन्होंने एक पद लिख दिया, जो संकलित न होने पर भी अमर हो गया है : 'गंगा गयी, वोलगा का दुख-/दर्द तनिक हम महसूसें,/बुद्ध बाप जी मरे मांस खा,/हाड़ पूत राहुल चूसें।' (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, पृष्ठ 36)

इतिहासविद काशी प्रसाद जायसवाल के साथ दिनकर की बैठकी खूब जमती थी। उनसे जुड़े कई रोचक संस्मरण हैं। एक शाम के पी जायसवाल और दिनकर 'गप्प-शप्प' के मूड में बैठे थे। जायसवाल जी ने शुरुआत की, 'हिंदी में केवल दोय कवि भये।' दिनकर ने पूछा, 'वे कौन हैं भला?' उन्होंने कहा, 'एक तो वही चंद, और दूसरा यही हरिचंद।' दिनकर ने अकचकाकर पूछा, 'और तुलसीदास?' वे बोले, 'अरे, तुलसिया भी कौनो कवि रहा? उसकी तो बंदरवा न सुधार देता रहा जैसे गुप्तवा की महविरवा।' कहावत है कि तुलसीदास की अधूरी कविताओं को हनुमान जी पूर्ण कर देते थे। और इधर तो सर्वविदित ही है कि मैथिलीशरण जी की कविताओं का संशोधन पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी किया करते थे। (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, पृष्ठ 8

"स्वर्ग से फतवा आया है"

जब 'भारत-भारती' पहले-पहल प्रकाशित हुई, द्विवेदी जी ने सरस्वती में उस पर एक लेख लिखा था जो प्रशंसात्मक और अत्यंत प्रभावपूर्ण था। लेख के अंत में द्विवेदी जी ने मैथिलीशरण जी के साथ अपनी मैत्री का भी जिक्र किया था और लिखा था, "लेकिन मैंने इसका कोई खयाल नहीं रखा है। सत्य, इसके साक्षी तुम हो।" जायसवाल जी जब पाटलिपुत्र में इसकी समीक्षा करने लगे, उन्होंने पुस्तक और लेखक तथा प्रकाशक के नाम एवं मूल्यादि लिखकर केवल एक वाक्य लिखा, "स्वर्ग से फतवा आया है।" और उसके बाद द्विवेदी जी का पूरा-का-पूरा लेख उद्धृत कर दिया। (दिनकर, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 10)

संस्कृत, मुसलमान और दिनकर

जिस साल हजारीप्रसाद जी द्विवेदी को लखनऊ विश्वविद्यालय ने डॉक्टरेट दिया, उस साल दीक्षांत-समारोह के अवसर पर होने वाले कवि-सम्मेलन में भाग लेने दिनकर भी गये। वे टंडन जी के पास नहीं ठहरकर कहीं अन्यत्र ठहरे, किन्तु रात में वे उन्हीं के साथ भोजन करने वाले थे। कुछ ऐसा संयोग हुआ कि टंडन जी के घर पहुंचते-पहुंचते दिनकर को काफी देर हो गयी। यह देखकर दिनकर शर्म से गड़ गये कि लोग उनकी प्रतीक्षा में बैठे हुए थे; किन्तु इससे भी बड़ी शर्म की बात  एक और हो गयी। टंडन जी का कमरा मित्रों से भरा हुआ था। दिनकर, हजारीप्रसाद जी के पास जा बैठे और बात-चीत में भाग लेने लगे। न जाने वे चालू प्रसंग में बोल रहा थे या उन्होंने कोई नया तराना छेड़ दिया था, उन्होंने कहा, "बाबू जी, मुसलमान तो संस्कृत का सही उच्चारण कर ही नहीं सकते। अभी मौलाना आजाद पटने आये थे और वाल्मीकि तथा कालिदास का हवाला देते हुए उन्होंने बड़ा ही विद्वतापूर्ण भाषण दिया, मगर वे बदस्तूर संस्कृत को 'संसकिरत' और ब्राह्मण को 'बिरहमन' कहते रहे। आज तक मुझे एक भी मुसलमान नहीं मिला, जो संस्कृत को संस्कृत और ब्राह्मण को ब्राह्मण कह सके।" दिनकर जी अपनी बात जरा जोर से बोल गये थे। उन्हें क्या जानता था कि गोष्ठी में एक मुसलमान सज्जन भी विद्यमान हैं! उनकी इस बेवकूफी को आगे बढ़ने से रोकने के लिए हजारीप्रसाद जी बोल उठे, "अरे, एक मुसलमान तो यहीं सामने बैठे हैं जो उपनिषदों के विद्वान हैं।" यह बात सुनते ही दिनकर हतप्रभ हो गये, फिर भी अपनी लाज छिपाने की कोशिश करता हुआ उन्होंने कहा, तो यही संस्कृत और ब्राह्मण का सही-सही उच्चारण कर दें। जो मुसलमान सज्जन पास बैठे थे, उन्होंने संस्कृत और ब्राह्मण शब्दों का ही सही उच्चारण नहीं किया, बल्कि संस्कृत श्लोकों की वृष्टि से दिनकर को 'तोप' दिया। उनके संस्कृत-ज्ञान से वे इतना अभिभूत हो उठे कि उन्होंने अपनी अभद्रता और मूर्खता के लिए उनसे क्षमा मांगी और कहा कि "अब मैं यह बात स्वीकार करता हूँ कि भारत में एक मुस्लिम विद्वान हैं, जो संस्कृत का सही उच्चारण कर सकते हैं।" - (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 24-25)

किया तो अंग्रेजी में 

जब दिनकर जी भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति पद का 'चार्ज' लेकर सुधांशु जी से मिलने आए तो छूटते ही सुधांशु जी ने दिनकर जी से पूछा कि 'हस्ताक्षर हिंदी में किया या अंग्रेजी में?' इस तीखे प्रश्न पर दिनकर जी का चेहरा उतर गया और वे ग्लानिभरे शब्दों में धीमे से बोले-'किया तो अंग्रेजी में'। (भुवनेश्वर नाथ मिश्र माधव, 'गंगा की तरह पवित्र', परिषद पत्रिका, वर्ष 40, अंक 3, अक्तूबर-दिसंबर 2000, पृष्ठ 15)

दिनकर की लोकप्रियता

दिनकर अपने समय के सूर्य रहे होंगे इस बात में संदेह का कोई कारण नहीं दिखता बल्कि 'महाकवि' और 'जनकवि' की ईर्ष्या उसके प्रखर ताप का सबूत देती है। 

लोगों को लगा, जानकीवल्लभ शास्त्री, निराला के 'शिष्यवत' हैं। निराला ने स्पष्ट किया, 'आपको जो लोग मेरा चेला समझते हैं, वे गलती करते हैं।' (जानकीवल्लभ शास्त्री को निराला का पत्र (19/4/39); नंदकिशोर नवल, निराला रचनावली, 8) निराला, दिनकर के विरुद्ध एक बिहारी कवि को खड़ा करने का भरोसा देते हुए : 'जिन बिहारियों का डंका पीटा जा रहा है, मैं बहुत जल्द उनके समक्ष आपको भिड़ाता हूँ-खासतौर से दिनकर के मुकाबले देखा जाय। एक आंदोलन बिहारियों के काव्य-ज्ञान का खड़ा करके देखना चाहता हूं, डंका पीटनेवाले बाजदार ही हैं या समझदार भी।' (जानकीवल्लभ शास्त्री को लिखा निराला का पत्र (11/2/36); नंदकिशोर नवल, निराला रचनावली, 8 में उद्धृत)

दिनकर की 'हुंकार' छपी तो 'बिहारी शिष्य' को निराला ने अपने मनोभाव से अवगत कराया : 'आपने पत्र में हुँकार (श्री रामधारी सिंह "दिनकर") की तारीफ लिखी थी; किताब मैंने पढ़ी, पढ़ने पर बहुत दिन का पढ़ा "हुं-हुं करोति" याद आया; अब सोचता हूँ, अगर कोई बिहारी भाई डकार लिखते!' (जानकीवल्लभ शास्त्री को निराला का पत्र (7/6/39); नंदकिशोर नवल, निराला रचनावली, 8)

निराला ने दिनकर की 'हुंकार' की वजह ढूंढ ली थी : 'बंगालियों के पड़ोसी होने के कारण शायद बिहारियों में ओज की मात्रा अधिक है। मुर्दों में जान फूंकना बुरी बात नहीं लेकिन जो जिंदा हैं उनके लिये क्या होगा? क्या वे गुलगपाड़ा पसंद करेंगे?' (जानकीवल्लभ शास्त्री को निराला का पत्र (7/6/39); नंदकिशोर नवल, निराला रचनावली, 8)

बिहारी मुर्दे क्यों थे, निराला से जानिए : 'बांकीपुर, पटने में मेरी अनामिका+तुलसीदास नहीं मिली। बिहार में मेरी किताबों की कम खपत है, अर्थात लोकप्रियता नहीं, यह मेरी कामियाबी है।' (जानकीवल्लभ शास्त्री को निराला का पत्र (7/6/39); नंदकिशोर नवल, निराला रचनावली, 8)

नागार्जुन के मन में भी दिनकर के प्रति एक खुनस रहती थी। 'तिकड़म के ताऊ' शीर्षक कविता में नागार्जुन ने लिखा है--

'नये पुराने लेखों के संकलन छपाना।

आप लगाना फेरी खा खा उन्हें छपाना।

पास मिलेगा अब पहले दर्जे का तुमको

पार्ल में रहो सूंघते नील कुसुम को

नेहरू छींके, मौलाना को हो खुजलाहट

मिल जायेगी तुमको घर बैठे ही आहट।' 

(डॉक्टर कुमार विमल, नागार्जुन : 'एक-एक दाने की खातिर सौ-सौ पापड़ बेले', परिषद पत्रिका, वर्ष 38, अंक 1-4, पृष्ठ 46, पादटिप्पणी संख्या 23 में उद्धृत)

संस्कृति के चार अध्याय

'संस्कृति के चार अध्याय’ पुस्तक के लिए दिनकरजी को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान करते हुए देश के प्रथम प्रधानमंत्री श्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विनोदपूर्वक कहा, 'इसमें आधा मेरा है’. ‘पूरा आपही का है’-राष्ट्रकवि ने तुरंत उत्तर दिया और दोनों महापुरुष हंसने लगे. 

अमिताभ देव का दुष्ट-कर्म

बेनीपुरी जी के संपादन में निकलनेवाली साप्ताहिक पत्रिका 'जनता' से सरकार नाराज थी। 'जनता' ने बिहार में ऐसी लोकप्रियता प्राप्त की कि वह क्रांतिकारी विचारों का वाहन बन गयी। सरकार ने मुकदमा 'युवक' पत्र पर भी चलाया था, किन्तु 'जनता' पर मुकदमे कई बार चले और बेनीपुरी जी को जेल जाना पड़ा। इन्हीं दिनों दिनकर ने 'जनता' के सहायक संपादक पं. मथुराप्रसाद मिश्र को पत्रिका के एक विशेष अंक के लिए 'ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल' नामक कविता भेजी। दिनकर तब सरकारी नौकर थे और कविता सरकार के विरुद्ध थी, इसलिए उन्होंने कविता में अपना नाम देना ठीक नहीं समझा और चिट्ठी के तौर पर मथुरा बाबू को लिख दिया कि 'यह तो दिनकर की सृष्टि नहीं, अमिताभ देव का दुष्ट कर्म है !

Wednesday, September 16, 2026

नेहरू-स्मरण

औपनिवेशिक काल में जो अंग्रेज यहाँ आते थे, अधिकतर की आर्थिक, सांस्कृतिक स्थिति अच्छी नहीं होती थी। वे मूलतः क्लर्क थे। हां, भारत में रहकर उनकी स्थिति बदल जाती थी। नेहरू की हैसियत इन अंग्रेजों से बीस थी। पूरे शहर में अकेला उनका घर था जिसके अंदर स्विमिंग पुल था, जिसमें अंग्रेज और भारतीय स्नान करने आते थे। तेजबहादुर सप्रू को पुल में उतरते डर लगता था इसलिए किनारे ही हाथ-पाँव मारते। इंग्लैंड में पढ़ते हुए नेहरू खर्चीले अवश्य थे, किन्तु इनके बारे में कई तरह के दुष्प्रचार थे। पैरिस से कपड़े धुलवाने की बात दुष्प्रचार ही थी। नेहरू जब कांग्रेस में काम करने लगे तो इनके पास आय का कोई स्रोत नहीं था और कांग्रेस के काम के लिए पिता से पैसे ले नहीं सकते थे। नेहरू इस बात को लेकर काफी परेशान रहे तो गांधी ने कहा कि आपको एक नियत राशि कांग्रेस से लेनी चाहिए। ('कुछ पुरानी चिट्ठियां' में बापू के पत्र संकलित) नेहरू समेत तब के नेताओं के साथ इस तरह के संकट भी उपस्थित होते थे, इस बात की समझ आज के नेताओं की शैली से नहीं हो सकती।

जो लोग नेहरू की आर्थिक हैसियत का अंदाजा लगाना चाहते हैं, वे सी. आर. दास की कमाई से लगा लें। डुमराँव के जमींदार का केस लड़ने सी. आर. दास आरा (बिहार) आए थे। उनकी फीस में डेढ़ हजार रुपये रोजाना, जूनियर वकील की फीस तथा रोज का खर्च शामिल था अर्थात होटल में ठहरना, खाना-पीना तथा अन्य व्यय आदि। मोतीलाल नेहरू भी इस केस के सिलसिले में 1920 में आरा आये थे। आरा से जवाहर को लिखे मोतीलाल नेहरू के पत्र 'कुछ पुरानी चिट्ठियां' (सस्ता साहित्य मंडल) में भी संकलित हैं। अनुग्रह नारायण सिंह की किताब 'मेरे संस्मरण' में सारा हाल अंकित है।

Tuesday, September 15, 2026

भारत की गाय संस्कृति

वैदिक काल में गाय का आर्थिक महत्त्व था। यह वस्तु की कीमत भी व्यक्त करती थी, इसलिए वस्तु विनिमय पद्धति के दौर में गाय विनिमय का भी साधन थी। गाय आरंभिक दौर में पालतू बनाये गए पशुओं में से एक है। जिस तरह आज किसी 'विशिष्ट'अतिथि के आगमन पर मुर्गा, खस्सी आदि का मांस खिलाते हैं, वैदिक काल में 'ब्राह्मण' अथवा 'विशिष्ट' अतिथि के स्वागत में गायें मारी जाती थीं। (ब्लूमफील्ड, अमेरिकन जर्नल ऑव फिलोलॉजी, पृष्ठ 17, 426; वेदिक इंडेक्स, पृष्ठ 15) ये विशिष्ट अतिथि प्रायः ब्राह्मण और देवता होते थे, क्योंकि गोमांस-भक्षण के साथ किसी की सामाजिक हैसियत जुड़ी हुई थी। आप कह ले सकते हैं कि गोमांस-भक्षण पर एक तरह से ब्राह्मणों का एकाधिकार था। 'ऋग्वेद' में देवताओं के लिए बैल का माँस पकाने की ओर कई संकेत किये गये हैं; उदाहरणार्थ, इंद्र कहता है-'मेरे लिए 15+20 बैल पकाते हैं।' (ऋग्वेद 10/86/14, 10/27/2)। 'ऋग्वेद' में आया है कि अग्नि के लिए घोड़ों, बैलों, सांडों, बांझ गायों एवं भेड़ों की बलि दी गयी है- 'यस्मिन्नश्वास ऋषभास उक्षणो वशा मेषा अव सृष्टास आहुताः। कीलालपे सोमपृष्ठाय वेधसे हृदा मतिं जनये चारुमग्नये।।' (ऋग्वेद, 10/91/14) याज्ञवल्क्यस्मृति (1/109) ने ब्राह्मण अतिथि के लिए एक बड़े बैल एवं बकरे को काटने की व्यवस्था दी है। फिर यह श्रुतिवाक्य है कि मित्र एवं वरुण के लिए अनुबंध्या (बांझ गाय) काटी जानी चाहिए। (पी वी काणे, धर्मशास्त्र का इतिहास, द्वितीय भाग, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, 1992, पृष्ठ 873) 'अतिथि' को ऋग्वेद में 'गोघ्न' अर्थात 'गाय की हत्या करनेवाला' कहा गया है। ठीक इसी तरह की बात आज हमारे गांव-घर में भी सुनने को मिलती है। मेरे आसपास एक कहावत मशहूर है-'मांस-भात घरैता खाय, हत्या लेले पाहुन जाय'। 

कहने की जरूरत नहीं कि गोमांस को लेकर वैदिक संस्कृति के आचार्यों के बीच लंबी बहस चली है। कुछ ने तो इसकी पाबंदी को अनिष्टकारी तक बताया है। खैर, तो वैदिक काल में आर्थिक महत्त्व के चलते गाय को न मारे जाने की बात भी मिलती है। गौ को 'अघ्न्या' (ऋग्वेद 1/164/27 एवं 40, 4/1/6, 5/83/8, 8/69/21, 10/87/16) भी कहा गया है, जिसका अर्थ निरुक्त (10/43) ने यों लगाया है-'अघ्न्या अहन्तव्या भवति अघघ्नी इति वा', अर्थात 'वह जो मारे जाने योग्य नहीं है।' कभी-कभी अघ्न्या शब्द धेनु के विरोध में भी प्रयुक्त हुआ है (ऋग्वेद 4/1/6, 8/69/2), अतः यह तर्क उपस्थित किया जा सकता है कि ऋग्वेद के काल में दूध देनेवाली गायें काटे जाने योग्य नहीं मानी जाती थीं। इसी तर्क के आधार पर गायों के प्रति प्रशंसात्मक सूक्तों का भी अर्थ लगा सकते हैं। (यथा ऋग्वेद 6/28/1-8 एवं 8/101/15 एवं 16)।

'ऋग्वेद' (8/101/15-16) में गाय को रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, आदित्यों की बहिन एवं अमृत का केंद्र माना गया है और ऋषि ने अंत में कहा है-'गाय की हत्या न करो, यह निर्दोष है और स्वयं अदिति है।' ऋग्वेद (8/101/16) में गाय को देवी भी कहा गया है। इससे प्रकट होता है कि गाय क्रमशः देवत्व को प्राप्त होती जा रही थी। दूध के विषय में गाय की अत्यधिक महत्ता, कृषि में बैलों की उपयोगिता तथा परिवार में आदान-प्रदान एवं विनिमय संबंधी अर्थनीतिक उपयोगिता एवं महत्ता के कारण गाय को देवत्व प्राप्त हो गया। अथर्ववेद (12/4) में भी गाय की पूतता (पवित्रता) मानी गयी है। ब्राह्मण ग्रन्थों से पता चलता है कि तब तक गाय की बलि दी जाती थी।

ऋग्वेद में 16 बार गाय को 'अघ्न्या' अर्थात 'न मारे जाने योग्य' कहा गया है। स्वाभाविक है कि लाभकारी गाय को कौन मारना चाहेगा? अलाभकारी अर्थात बच्चा न देनेवाली गायें मारी जाती थीं। जैसे आज अलाभकारी गायों को किसान पंडिजी को दान में दे देते हैं अथवा हल जोतने के काम में लगा दिया जाता है। किसानों के पास इसके तर्क हैं। बताते हैं कि हल में लगाने से 'नाठी' गायें भी बच्चे जनने लगती हैं। अपने गांव के इन किसानों की बुद्धि मुझे भाजपा नेताओं की बुद्धि से ज्यादा व्यावहारिक लगती है।

गाय का आर्थिक महत्त्व होने की वजह से संस्कृत भाषा के अधिकतर शब्द भी 'गो' शब्द से बने मिलते हैं। बौद्ध काल में चूकि गहन खेती होने लगी, पशुधन की जरूरत महसूस हुई। इसलिए बौद्ध धर्म के प्रवर्तक बुद्ध ने 'युग की मांग' को देखते हुए अहिंसा पर जोर देना शुरू किया। बुद्ध की अहिंसा में भी गाय ही की प्रधानता रही क्योंकि बैल उसी से प्राप्त हो सकते थे। अहिंसा में बुद्ध का विवेक शामिल था। उसने मरे हुए जानवर का मांस खाने से लोगों को कभी नहीं रोका। बुद्ध एवं बौद्ध भिक्षा में मांस भी स्वीकार करते थे। सूअर का मांस खाकर बुद्ध के मरने की बात हम जानते हैं। यह अहिंसा बाद में रूढ़ि बन गई और गाय को पूजने की 'अविवेकी परम्परा' ने जन्म लिया। आज गाय माता- पिता से ज्यादा पूज्य हो गयी है। माता-पिता वृद्धाश्रम खदेड़ दिये गये हैं और गोमाता हमारे ड्राइंग रूम, हमारे दिमाग में बैठी हैं। हमें समय रहते समझना होगा कि मनुष्य से पशु को श्रेष्ठ बताना पशुता है, मनुष्यता नहीं।

गाय का महत्त्व हमारे धर्मग्रंथों में भी वर्णित है। भैंस आदि जानवरों से हमारे धार्मिक साहित्य के लेखक परिचित नहीं थे, इसलिए वह महत्त्व उन्हें न मिल सका। आर्य घोड़े से परिचित थे, इसलिए घोड़ा भी महत्त्व का हुआ। घोड़े भी खाए जाते हैं। गाय चूँकि ब्राह्मणों को दानस्वरूप भी दी जाती थी, गाय और ब्राह्मण एक हो गए। दोनों ही 'अवध्य' हैं, पूज्य हैं। जो धर्मग्रन्थ बौद्ध धर्म के बाद लिखे गए, ऐसा कहते हैं। वेद आदि में ऐसा नहीं है। यह सब बौद्ध प्रभाव में, और मुसलमानों के आगमन के बाद 'इस्लाम की प्रतिक्रिया' में हुआ। आज भी जो गोमाता की राजनीति हो रही है, उसमें 'प्रेम' नहीं, 'घृणा' ही है।

गाय की चिंता किसे है?

पांडेय बेचन शर्मा उग्र की एक कहानी है जिसका शीर्षक 'मूर्खा' है। कहानी में गुलाबो अम्मा हैं जिनके तीन बेटे हैं-रामेश्वर कांग्रेसी, कामेश्वर कम्युनिस्ट और दामोदर हिन्दूसभाई। कम्युनिस्ट लड़के कामेश्वर ने कभी तीस रुपये में एक गाय खरीदी थी। बूढ़ी हो जाने पर 'अर्थ-पिशाच-युग के प्राणी' अर्थात कम्युनिस्ट को गाय अनुपयोगी लगने लगती है। अतः वह उसे कसाई के हाथों बेच देने की गुलाबो अम्मा से अनुमति चाहता है। कांग्रेसी बेटा रामेश्वर भी अम्मा को समझाता है, 'अम्मा, जमाना महंगाई का है और इस गाय पर रुपया-सवा रुपया रोज़ सर्फ़ा पड़ जाता है।' (श्रेष्ठ रचनाएं, पृष्ठ 32) हिंदूसभाई दामोदर सबसे चपड़ निकला। 'उसने तय किया गुलाबो अम्मा के सो जाने पर, आधी रात में गाय को नगर की सीमा से बाहर हाँक आने का।' (पृष्ठ 32) हिंदूसभाई लड़का सब पर बीस पड़ा। उसने खीझ भरे स्वर में कहा, 'उसके (गाय के) मारे सारे घर में गंदगी, जिधर देखो गोबर ही गोबर। सीधे से तुम इसे कभी न निकालतीं, सो मैंने सोचा रातोंरात बाहर हाँक आऊँ।' (वही) (हिंदूसभाई बेटे की बात से 'स्वच्छता अभियान' चला रहे भाजपाई की याद आती है।) उस घर में केवल गुलाबो अम्मा ही है जो लाभ-हानि, उपयोगिता-अनुपयोगिता के तराजू पर तौले बगैर संबंधों को जीना जानती है। कहानी में गाय प्रतीक भर हो सकती है, असली कथा तो बूढ़ी हो चली गुलाबो अम्मा की ही लगती है। अम्मा कहती है, 'यह भी परिवार का प्राणी है, काल-गति से वैसे ही कमजोर बनी हुई, जैसे कि मैं हूँ।' (वही)

फेसबुकिया गोभक्ति

मेरे पड़ोस में एक राय जी रहते हैं। पटने की चालू जुबान में दूध बेचनेवाले को लोग राय जी कहते हैं। राय जी के पास देशी-विदेशी मिलाकर छह गाय हैं। सुबह चार बजे से ही गायों की सेवा से उनकी दिनचर्या शुरू होती है और रात दस बजे के बाद समाप्त होती है जब वे सो चुके होते हैं। उनका उठना-बैठना, सोना-जागना सब गाय ही के हिसाब से होता है। गाय से ज्यादा वे गाय के गोबर से घिरे होते हैं। सड़े गोबर और गोमूत्र की दुर्गन्ध से पड़ोसी हिंदुओं की नाक फटी जाती है। सब राय जी से चिढ़े रहते हैं। वे इनके दूध का भी सेवन नहीं करते। सुधा और राज का पाउच खरीदकर लाते हैं। ग्राहक बिना बच्चेवाली गाय का दूध लेना पसंद नहीं करते और बच्चे राय जी के लिए साक्षात विपत्ति हैं। गाय अगर बछिया जनमती है तब तो ठीक। साल दो साल की सेवा के बाद राय जी को एक अतिरिक्त गाय हाथ आ जाती है। लेकिन गोमाता ने अगर बछड़े को जन्म दिया तो राय जी की परेशानी बढ़ जाती है। एक ग्राहक का दूध तो बछड़ा ही गटक जाता है। खुद के बच्चे को दूध के लाले पड़ जायेंगे। गाय के बच्चे के मुंह में नहीं, राय जी के बच्चे के मुंह में जाब लगेंगे। इसलिए राय जी 'फेसबुकिया गोभक्ति' भूलकर जीवन का बीजगणित अपनाने को बाध्य होते हैं। बछड़े को दूध के बदले माड़ मिलना शुरू हो जाता है। एक तो अब के भात में माड़ के यूँ ही दर्शन नहीं होते। फिर एक से अधिक बछड़े रहे तो गौपुत्र को हवा पीकर ही जीवन गुजारना पड़ता है। हवा पीकर कोई कितने दिन जीवन की नैया खे सकता है? गौपुत्र बेचारे असमय ही जीवनलीला समाप्त कर लेते हैं।

Monday, September 14, 2026

संपादक की यात्रा

आप भारत में हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास देखेंगे तो कल और आज का अंतर समझ में आएगा। एक समय था जब अखबार का सारा दारोमदार संपादक के ऊपर होता था। साक्षरता कम होने की वजह से लेखक और पाठक दोनों का मिलना मुश्किल था। पाठकों की कमी का रोना नया नहीं है। एक संपादक को अखबार की ज्यादातर सामग्री खुद ही तैयार करनी होती थी। कभी-कभी तो पूरा का पूरा अखबार एक अकेला संपादक ही लिख मारता था। आनन्दकादम्बिनी के संपादक बद्रीनारायण चैधरी लगभग पूरा अखबार खुद ही रंग डालते थे। 1904-5 के दिनों तक 'सरस्वती' ’मासिक पुस्तक’ ही बनी रहती है और जिसका अभिप्रेत था कि जरूरत पड़ने पर एक अकेला आदमी अर्थात् संपादक नाम का जीव ही सारे लेख लिख डाले। भारतेन्दु इसे पत्रकार-कला के विरुद्ध मानते थे, इसलिए 'आनन्दकादम्बिनी' के संपादक को लिखा था : ’जनाब यह किताब नहीं है कि जो आप इकेले ही इकराम करते हैं बल्कि अखबार है कि जिसमें अनेक-जन-लिखित लेख होना आवश्यक है और यह भी जरूरत नहीं कि सब एक ही तरह के लिखक्कड़ हो।’ (रामरतन भटनागर, भारतेन्दु हरिश्चंद्र : एक अध्ययन, किताब महल, इलाहाबाद, 1947, पृष्ठ 106-7)

अखबार में तब संपादक के कई नाम चलते थे। अलग-अलग नामों से संपादक अपने अखबार में लिखने को अभिशप्त होता था। महावीर प्रसाद द्विवेदी 'सरस्वती' छोड़ने के बाद भी भिन्न नाम से लेख लिखा करते थे। बिहार के 'बिहार बन्धु' के संपादक केशव राम भट्ट ने तब की मुश्किलों का वर्णन करते लिखा है कि लेख, विज्ञापन और समाचार लिखने से लेकर प्रूफ देखने तक का सारा काम संपादक का होता था। इस स्थिति को बिहार बन्धु की एक टिप्पणी से बेहतर समझा जा सकता है। 'बिहार बन्धु' ने 'लक्ष्मी उपदेश लहरी' का स्वागत करते हुए लिखा था : ‘‘जून की संख्या हमारे हाथ में है। ...एक बात इसमें देखकर हमें आश्चर्य हुआ। जब टाइटिल पेज पर सम्पादक का नाम बाबू शब्द के साथ लिखा ही हुआ है तब हर सम्पादकीय लेख के नीचे ‘सम्पादक’ या ‘सम्पादक महाशय’ का उपनाम ‘दीन’ लिखने की क्या जरूरत है? क्या एक जगह नाम रहने से सम्पादक महाशय को सन्तोष नहीं होता?’’ (बिहार बन्धु, 6 जुलाई, 1907, पृष्ठ 3; पंडित रामजी मिश्र मनोहर, बिहार में हिन्दी पत्रकारिता का विकास, के पी जायसवाल शोध संस्थान, पटना, पृष्ठ 126)

1995 के दिनों में भी पटना से कुछ अखबार ऐसे ही निकलते थे। इन दिनों 'अमृतवर्षा' नाम का दैनिक अखबार यहाँ से निकला करता था। एक दिन वहां गया तो देखा कि एक आदमी कुर्सी पर बैठा धांय-धांय लिखे जा रहा है। नाम था प्रह्लाद भगत। बाद में ये एकलव्य एड्यूकेशनल काम्प्लेक्स में हिंदी शिक्षक हुए। बाद में मैं भी वहां काम करने लगा तो अमृतवर्षा के उनके अनुभव को जानने का मौका मिला। वे जबतक वहां रहे, लगभग अकेले ही अखबार निकालते रहे।

लेखक पैदा करनेवाले पहले संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी थे। कैसे-कैसे लोगों को और किस विधि से उन्होंने 'सरस्वती' के लिए एक लेखक-समूह पैदा किया, जगजाहिर है। मैथिलीशरण गुप्त का किस्सा तो मशहूर है ही। इतिहासविद् काशी प्रसाद जायसवाल के साथ दिनकर की बैठकी खूब जमती थी। उनसे जुड़े कई रोचक संस्मरण हैं। एक शाम जायसवाल जी और दिनकर ‘गप्प-शप्प’ के मूड में बैठे थे। जायसवाल जी ने शुरुआत की, ‘हिंदी में केवल दोय कवि भये।’ दिनकर ने पूछा, ‘वे कौन हैं भला?’ उन्होंने कहा, ‘एक तो वही चंद, और दूसरा यही हरिचंद।’ दिनकर ने अकचकाकर पूछा, ‘और तुलसीदास?’ वे बोले, ‘अरे, तुलसिया भी कौनो कवि रहा? उसकी तो बंदरवा न सुधार देता रहा जैसे गुप्तवा की महविरवा।’ प्रसिद्ध है कि तुलसीदास की अधूरी कविताओं को हनुमान जी पूर्ण कर देते थे और इधर तो सर्वविदित ही है कि मैथिलीशरण जी की कविताओं का संशोधन पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी किया करते थे। (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 8)

पद्मसिंह शर्मा ने महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पत्र में लिखा था, ’आजकल के संपादकों के संपादन से जब आपके संपादन की तुलना करता हूँ तो अंतरम् महदन्तरम् प्रतीत होता है। एक बार आपने स्वामी सत्यदेव के प्रसंग में कहा था कि कच्चा माल मांगकर उसे व्यवहारोपयुक्त बनाना पड़ता है। बात बिल्कुल ठीक थी। आजकल तो हिन्दी के अनेक संपादक कच्चे माल में भी कूड़ा-करकट मिलाकर उसे भद्दा बना देते हैं। शब्द-शुद्धि की ओर तो ध्यान नहीं देते, या ज्ञान ही नहीं रखते।’ (पद्मसिंह शर्मा के पत्र, आत्माराम एन्ड संस, 1956, पृष्ठ 221) एक बार सरस्वती में कवि विशाखदत्त-प्रणीत 'मुद्राराक्षस' नाटक पर एक लेख छपने को आया था। उसे देखकर द्विवेदी जी ने छापना स्वीकार कर लिया था। उसमें जहाँ-तहाँ पेंसिल से उन्होंने संशोधन भी किया था। लेख के अंत में पेंसिल से एक नया वाक्य लिखा हुआ था। कंपोज होने से पहले उसे देखने का अवसर उक्त लेख के लेखक को मिल गया। उन्होंने द्विवेदी जी की संपादन-पटुता की प्रशंसा कर कहा कि इस अंतिम वाक्य से लेख में सजीवता आ गई है, संशोधन से लेख की श्रीवृद्धि हुई है। (द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ, पृष्ठ 547) इसी प्रकार एक बार 'सरस्वती' की एक कविता में, कंपोज होने से पूर्व, एक प्रसिद्ध कवि की रचना में से साढ़े तीन पद्य साफ निकाल दिए हैं और अपनी ओर से आधा पद्य जोड़कर रचना के प्रवाह को यथापूर्व कर दिया है। (वही)

अखबार निकल जाने के बाद ग्राहक और पाठक बनाना भी संपादक ही का काम होता। आचार्य शुक्ल ने लिखा है: ‘‘उस समय हिंदी संवाद-पत्र पढ़नेवाले थे ही नहीं। पाठक उत्पन्न करने के लिए बाबू कार्तिकप्रसाद ने बहुत दौड़-धूप की थी। लोगों के घर जा-जाकर वे पत्र सुना तक आते थे। इतना सब करने पर भी उनका पत्र थोड़े दिन चलकर बन्द हो गया।’’ (रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ 457) तब 'भारतमित्र' नामक अखबार निकला करता था। इसके ग्राहकों ने शर्त रखी कि वे अखबार तभी लेना शुरू करेंगे जब उसके संपादक उसके घर आकर उसे बांच भी दें। मरता क्या न करता। भारत मित्र की चर्चा करते हुए संपादकाचार्य पंडित अंबिकाप्रसाद वाजपेयी ने लिखा है कि ‘‘उन दिनों हिन्दी पाठक बहुत कम थे, इसलिए ग्राहक तो लोग बन जाते थे, पर पत्र न पढ़ सकते थे। यह समस्या इस तरह हल की गयी कि पंडित दुर्गाप्रसाद कई गदिद्यों पर जाकर भारत मित्र पढ़कर सुना आया करते थे।’’ (पंडित अंबिकाप्रसाद वाजपेयी, विशाल भारत, मई 1931) 

आज ए.सी. में बैठकर गूगल बाबा के सहारे अखबार निकालने वाले बहुतेरे संपादकों को इस कठिन यात्रा का आभास तक न होगा। वे तो अपना ’संपादकीय’ भी ’टीमवर्क’ समझते हैं! ऐसे ही दौर के लिए पत्रकार-शिरोमणि बाबूराव विष्णु पराड़कर ने 1925 में वृन्दावन हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद से कहा था-‘‘पत्र सर्वांग सुन्दर होंगे। आकार बड़े होंगे। छपाई अच्छी होगी। मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे। लेखों में विविधता होगी, कल्पक्ता होगी, गम्भीर गवेषण की झलक होगी और मनोहारिणी शक्ति भी होगी। ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जायेगी। यह सब होगा, पर पत्र प्राणहीन होंगे। पत्रों की नीति देशभक्त, धर्मभक्त अथवा मानवता के उपासक महाप्राण सम्पादकों की नीति न होगी-इन गुणों से सम्पन्न लेखक विकृत मस्तिष्क समझे जायेंगे। सम्पादक की कुरसी तक उनकी पहुंच भी न होगी। वेतनभोगी सम्पादक मालिक का काम करेंगे। वे हम लोगों से अच्छे होंगे। पर आज भी हमें जो स्वतन्त्रता प्राप्त है, वह उन्हें न होगी।’’ (राजकिशोर, पत्रकारिता के नये परिप्रेक्ष्य, वाणी प्रकाशन, द्वितीय संस्करण: 2005, पृष्ठ 53)

बल्कि अब तो स्थिति है कि अखबार के संपादक बाल्टी-मग बेच रहे हैं। जी हां, आज सुबह मैंने अपने हाॅकर मनोज कुमार को अखबार की जगह हाथ में बाल्टी-मग लटकाए देखा तो तनिक अतिरिक्त जिज्ञासु हो उठा। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि दरअसल बिहार का नंबर वन अखबार दैनिक हिन्दुस्तान का अभी एक आॅफर चल रहा है। अगर आप 'प्रभात खबर', 'दैनिक जागरण' अथवा 'दैनिक भास्कर' में से कोई भी एक अखबार लेते हों तो आप उसे बंद कर तथा 500 रुपये देकर दैनिक हिन्दुस्तान की बुकिंग करवा सकते हैं। इस 500 रुपये की एवज में लगातार पांच महीने आपको हिन्दुस्तान उपलब्ध कराया जायगा। एक बाल्टी के साथ एक मग आपको तत्काल उपलब्ध कराया जायगा। अब हाॅकर आपको अखबार की जगह बाल्टी-मग टांगे मिलेंगे और संपादक बाल्टीवाले संपादक कहे जाएंगे।

Saturday, September 12, 2026

मिथक और इतिहास बोध

मुझे धार्मिक देवी-देवताओं से कोई सहानुभूति नहीं है लेकिन अगर कोई इसका विरोध यह कहते हुए करे कि "पिता ब्रह्मा से बलात्कृता सरस्वती आज हर जगह पूजी जा रही है", तो मुझे घोर आपत्ति है। प्रथमतया, यह कथन स्त्री विरोधी है और बलात्कार के लिए सरस्वती को दोषी ठहराता है। दूसरे, ऐसे कथन इतिहास और मिथकों की अनैतिहासिक समझ से जन्म लेते हैं। मुझे नहीं लगता कि सरस्वती और ब्रह्मा के बीच का यह यौन संबंध कोई बलात्कार की घटना है। हमें अन्य कई देवताओं के जीवन में भी यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। कहा जाता है कि पुषन ने अपनी माता से प्रेम याचना की। बेबिलोनिया में भी स्त्री देवता के साथ पुरुष देवता का संबंध मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण की एक पुरानी गाथा बताती है कि पुत्र प्राप्ति के लिए पुरुषों ने माताओं और बहनों के साथ पत्नी की तरह संभोग किया। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, पृष्ठ57)

ब्रह्मा-सरस्वती का सम्बंध पिता-पुत्री का वैध यौन संबंध है। 'जन्हु ने भी अपनी पुत्री जाह्नवी से विवाह किया था।' (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, पृष्ठ 161) अवेस्ता के यिम, यिमे, ऋग्वेद के यम-यमी का संवाद भाई-बहन के बीच यौन संबंध के अस्तित्व को ध्वनित करते हैं। सर्वदमन सिंह के मतानुसार मातृनामों से, जिनमें ऋग्वेद के 'मामतेय' का उदाहरण भी है, बहुपतित्व, बहुपत्नीत्व अथवा स्वच्छंद संभोग के संकेत मिलते हैं। (पोलिएंड्री इन एनशिएंट इंडिया, 1978, पृष्ठ 68)

प्राचीन मिस्र में भाई-बहन के बीच शादी होती थी क्योंकि संपत्ति का हस्तांतरण मां से पुत्री को होता था। आइसिस ओसिरिस की बहन तथा पत्नी थी। अथर्ववेद में उल्लिखित है कि असुरों में बाप-बेटी के बीच विवाह की प्रथा थी। महाभारत के कर्ण पर्व में मद्र देश के लोगों के विषय में ऐसी अनेक परम्पराओं का उल्लेख है। कहा गया है कि मद्र देश में शाकल की बाह्लीक स्त्रियां नंगी नाचती और हंसती हैं तथा स्वैरणी और स्वेच्छाचारिणी होती हैं और खुले मैदान में मैथुन का आनंद लेती हैं। (कर्ण पर्व, कुंभकोनम प्रकाशन, 37, 22-23) राजतरंगिणी में भी उल्लेख है कि गांधार के ब्राह्मणों में कौटुम्बिक मैथुन प्रचलित था। (राजतरंगिणी, 1.308)

कहने की जरूरत नहीं कि विवाह और परिवार रूपी संस्था के अभ्युदय के पहले पिता, पुत्र सभी यौन संबंध कायम कर सकते थे। एंगेल्स ने ठीक ही इसे 'यौन साम्यवाद' की संज्ञा दी है। भारतीय विद्वानों में काशीनाथ राजवाड़े ने भी काफी कुछ लिखा है इस विषय पर। तो यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति पर बंदिश रातोंरात नहीं लगी है। इतिहास के कई युगों और पीढ़ियों को गुजरना पड़ा है। पांच भाइयों के साथ द्रौपदी की शादी को औचित्य प्रदान करते हुए युधिष्ठिर ने महाभारत में परंपरा की ओर ध्यान दिलाया है। युधिष्ठिर ने इसी परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि गौतम-नन्दिनी जटिला ने सात ऋषियों के साथ ब्याह किया था। स्त्री-पुरुष के स्वच्छंद मैथुन के मामले में महाभारत की उक्तियाँ निर्णयात्मक हैं। पाण्डु उस युग की चर्चा करते हैं जिसमें स्त्रियां अनियंत्रित, स्वैरिणी, स्वेच्छाचारिणी और स्वतंत्र होती थीं। स्त्रियां विवाह के पहले भी पुरुषों की ओर आकृष्ट होती थीं लेकिन यह उनके लिए पाप नहीं माना जाता था। (आदि पर्व, 128. 4-5) ऋग्वैदिक समाज में भी प्रत्येक स्त्री को विवाह करने की आवश्यकता नहीं थी। इसलिए कुमारी से उत्पन्न बच्चे अधम पतित नहीं समझे जाते थे। (कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, लोपामुद्रा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1949, पृष्ठ 9) यह कहना अनावश्यक है कि ऋषि रूपवती स्त्रियों के आकर्षण के लिए मंत्र की रचना करते थे। (वही, पृष्ठ 8)

स्वच्छंद यौन संबंध का सबसे महत्वपूर्ण संकेत उद्दालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु की कथा में मिलता है। श्वेतकेतु ने अपने सामने देखा कि एक ब्राह्मण ने उसकी माता को हाथ पकड़कर खींच लिया है। इससे वह अत्यंत क्रोधित हुआ पर उसके पिता ने श्वेतकेतु से कहा कि इसमें क्रोधित होने की कोई बात नहीं है क्योंकि संसार की सभी स्त्रियां स्वच्छंद विचरण करती हैं और यह प्रथा अति प्राचीन काल से सनातन धर्म के रूप में चली आ रही है। (आदि पर्व, 128. 9-15) श्वेतकेतु के आख्यान से मिलती-जुलती अन्य अनेक परंपराएं हैं अतः कल्पित कथा कहकर इस आख्यान का तिरस्कार नहीं किया जा सकता है। (डी एन मित्तर, पोजीशन ऑफ वीमेन इन हिन्दू लॉ, पृष्ठ 203)

ऐसे ही मुनिकन्या वार्क्षी का ब्याह एक नाम वाले दस प्रचेताओं के साथ हुआ था। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 252) अहिल्या की कथा से भी इतना ही प्रकट होता है कि इंद्र प्राचीन परंपरा का द्योतक है। किसी पुरुष ने स्त्री को स्वतंत्र समझकर अहिल्या से संबंध किया, किन्तु अब सामाजिक परिस्थिति बदल चुकी थी। पितृसत्तात्मक समाज में यह सर्वमान्य नहीं रही थी। राम ने उसी प्राचीन परंपरा में अहिल्या को निर्दोष माना और समाज में जीवित माना। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 201)

हमारा इतिहास-विवेक इस बात को समझने में है कि यह प्रवृत्ति महाभारत के समय मुख्य प्रवृत्ति न होकर मरणासन्न है। दम तोड़ती इस प्रवृत्ति को स्मृति भर ही जगह मिली है हमारे शास्त्रों में। द्रौपदी की सास कुंती स्वयं सूर्य के साथ संभोग करती है। सूर्य ने यहां कुंती को जो समझाया है वह इस संदर्भ के लिए अर्थवान है। सूर्य कहता है कि 'स्वभाव से सभी स्त्री और पुरुष, अपनी इच्छा के अनुसार काम करने के लिए स्वाधीन हैं। वैवाहिक नियम का बंधन स्वभाव के विकार से उत्पन्न हुआ है।' (रांगेय राघव, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 279) किंतु सच है कि उसकी संतान को सामाजिक मान्यता नहीं मिलती। ये सारी कहानियां बस इसी बात की ओर संकेत हैं कि ये नये जमाने की बात नहीं है, जुज़रे जमाने की याद भर हैं।

मातृसत्ता के ध्वंस पर पितृसत्ता को स्थापित करती कहानियां भी रची जा रही थीं। कहानी है कि जमदग्नि, सत्यवती और ऋचीक के पुत्र तथा विख्यात भृगुवंशी परशुराम के पिता थे। उसकी पत्नी रेणुका थी। एक दिन रेणुका स्नान करने के लिए नदी-तट गई तो वहां उसने किसी गन्धर्वदंपति को जल में क्रीड़ा करते देखा। उस मनोहर दृश्य को देखकर उसके मन में ईर्ष्या जागी और वह उन दूषित विचारों से कलुषित हो गई। जब वह वापिस घर आई तो क्रोध के अवतार जमदग्नि ने उसे 'सतीत्व की कांति से हीन' देखकर बड़ा धमकाया और अपने पुत्रों को उसका सिर काट देने की आज्ञा दी। पहले चारों पुत्रों ने ऐसा क्रूर दुष्कृत्य करने में आनाकानी की। परशुराम उनका 'सबसे छोटा पुत्र' था। उसने तुरंत पिता की आज्ञा का पालन किया और कुल्हाड़े से अपनी माता का सिर काट डाला। शांत और प्रसन्न जमदग्नि ने परशुराम से वरदान मांगने के लिए आग्रह किया। परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की जो अविलंब स्वीकार की गई। (आप्टे, संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 438) यह कहानी हमें बताती है कि मातृसत्ता की कब्र पर पितृसत्ता के अंकुर फूटे हैं।

लोक में लाठी

प्रकृति से आदमी दो टाँगोंवाला प्राणी है। 'तीसरी टाँग' उसे इस भूलोक (मर्त्यलोक) में अर्जित करनी होती है। यह तीसरी टाँग 'बुढ़ापे की लाठी' है। यह लाठी इतनी अपरिहार्य है कि हमारे मुहावरों तक में आ घुसी है। इसे आप भाषा में 'बुढ़ापे की लाठी' का 'टाँग अड़ाना' भी कह सकते हैं। 

लाठी की महत्ता का अनुमान इसके पर्यायवाची शब्दों की भरमार से भी होता है। इसके लट्ठ, लऊर, लऊरि, लबेद, पटकन, बोंग, गोजी, बासमती, लोहबाना (लोहबंद), डंटा, पैना, छड़ी, सोंटा, ठेंगा, दुखहरन, दुखभंजन आदि कई नाम हैं। (दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह, भोजपुरी के कवि और काव्य, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, 1958, 'भूमिका', पृष्ठ 21) 

लाठी से बने 'लठैत', 'लठधर' शब्द की भी भारतीय संस्कृति में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। बिहार के जमींदारों के इन लठैतों की करतूत से भला कौन अपिरिचित होगा। अमवारी किसान आंदोलन के दौरान राहुल का सिर इन्हीं लठैतों ने लहूलुहान कर दिया था। महाकवि निराला का 'लंठ' (लेखकों में लंठ जैसे खुशनसीब) इसी का गोतिया लगता है। 'डोमाजी उस्ताद' के कहने ही क्या!

पहलवानों की लाठियां प्रसिद्ध रही हैं। औपनिवेशिक बिहार के दिनों में मथुरा सिंह (जयकिसुन बिगहा, जहानाबाद) की लाठी के किस्से यहाँ की हवा में होते। कहा जाता है कि उनकी लाठी इतनी बड़ी होती कि उसके सहारे वे दोमंजिले मकान की छत पर आसानी से छलांग लगाकर पहुंच जाते। तब के हिन्दू-मुस्लिम दंगों में इनकी लाठी की भी भूमिका रही। 

मेरे गांव में मनियामा (जहानाबाद) के सीताराम सिंह आते। खुद तो पांच फुट के जवान थे लेकिन लाठी सात फुट की रखते। बड़ी लाठी उनके पहलवान होने का भ्रम रचती। 'कलाकारों की रिलीफ पार्टी' में कथाशिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु ने एक ऐसे ही 'लाठीधारी' की तस्वीर खींची है : "आज सुबह से ही 'अपने लोग' स्वजन-सनेही, मित्र और प्रीतिभाजन-जन हमारी सुधि लेने आ रहे हैं। कोई खाली हाथ नहीं आता। एक हाथ में लट्ठ और दूसरे में हमारे लिए कोई-न-कोई आवश्यक सामान। सभी एक अभूतपूर्व 'मेकअप' में लूंगी या धोती लपेटे, गंजी पहने। डाक्टर रामवचन राय आये,- तो उनके हाथ में जो लाठी थी वह उनसे भी वजनी रही होगी। मैंने हँसकर कहा था-'आचार्यजी, लाठी में गुण बहुत हैं, सदा राखिये संग।" (फणीश्वरनाथ रेणु : चुनी हुई रचनाएं, भाग 3, पृष्ठ 114) 

कहना अनावश्यक है कि रेणु ने अपनी बात कहने के लिए गिरिधर कविराय का सहारा लिया है। कविराय की पूरी बात कुछ इस तरह है : "लाठी में गुण बहुत हैं, सदा राखिये संग/ गहरी नदी, नारा जहां, तहां बचावै अंग/ तहां बचावै अंग, झपटि कुत्ता को मारै/ दुशमन दावागीर, होय तिनहूं को झारै/ कह गिरिधर कविराय, सुनो हो धूर के बाठी/ सब हथियारन छांड़ि, हाथ में लीजै लाठी।" (डॉक्टर आशीष वशिष्ठ एवं योगिता वशिष्ठ, बृहद सूक्ति कोश, भाग 2, कल्पना प्रकाशन, 2021, पृष्ठ 208 में उद्धृत) गिरिधर कविराय कहते हैं कि हमेशा अपने पास लाठी रखें, अगर राह में गहरी नदी, नाला आ जाता है तो लाठी सहारा देती है, अगर कोई कुत्ता पीछे पड़ जाता है तब भी लाठी उससे बचाती है, अगर कोई दुश्मन हमला कर दे तो लाठी उसे भगा देती है। इसलिए कवि बार-बार यही कहते हैं कि सारे हथियार छोड़कर अपने पास बस लाठी रखो ।

भोजपुरवासियों ने अपने मन-मिजाज से कविराय का कहा माना है। इस मिजाज को सबसे पहले ग्रियर्सन ने पकड़ा। वे कहा करते थे कि बंगालियों ने कलम से जो किया, उसे भोजपुरियों ने लाठी से! शायद इसीलिए लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया में भोजपुरी भाषा पर अध्याय की शुरुआत उन्होंने गिरिधर कविराय की इस लाठी-चर्चा से की है। (दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह, भोजपुरी के कवि और काव्य, पृष्ठ 5) भोजपुरी में लाठी की अमोघ शक्ति को लेकर कई कहावतें प्रचलित हैं। कहा जाता है कि 'सइ पूरा चरन नु एक हूरा चरन' अर्थात सौ बार निहोरा करने से भी जो काम नहीं होता लाठी से हो जाता है। 

लाठी ही का असर कहिए कि उन्होंने बेद का तुक लबेद से मिला दिया। एक कहावत प्रचलित है : 'चार बेद और पांचवां लबेद' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 113)। मेरे गांव में इसको 'लाठीकोट' (कोर्ट) कहा जाता है। 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' तो आपने भी सुनी होगी। 'लबेद' का मतलब 'लाठी' ही है। पहले गांवों में 'लाठीकोट' का फैसला 'अंतिम' माना जाता था। जिसका परिवार बड़ा होता वह लाठीकोट में केस जीता हुआ समझा जाता। मेरे बाबा (दादाजी) एक पढ़ुआ पढ़ते थे-'जेकरा पाले चार धुरहिया, मारे लाठी छीने रुपइया'! इसी बात को दूसरे शब्दों में कहा गया है : 'जिसके चार भैय्या, मारें धौल छीन लें रुपैया'। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 140)

लाठी सिर्फ 'झपटि कुत्ते को मारै' ही नहीं है बल्कि यह सौंदर्य की भी खान है। हिंदी के रीतिकालीन कवियों ने 'कनक छड़ी सी कामिनी' कहकर वर्णन किया है तो बिरहा गीत में अत्यंत मोहक अंदाज में लाठी के हुर्रे की प्रशंसा निबद्ध है :

'हुरवा नियर तोर जुरवा ए गोरिया,

पुअवा नियर तोर गाल।

पनवा नियर तू त पातर बाड़ू गोरिया,

लोटवा नियर तोर भाल।।' (राहुल सांकृत्यायन, हिन्दी साहित्य का बृहत इतिहास, भाग 16, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, पृष्ठ 151)

वर्ण और दंड

स्मृतियों में आश्रम और वर्ण के अनुसार दंड धारण करने की व्यवस्था है। उपनयन संस्कार के समय मेखला आदि के साथ ब्रह्मचारी को दंड भी धारण कराया जाता है। प्रत्येक वर्ण के ब्रह्मचारी के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के दंडों की व्यवस्था है। ब्राह्मण को बेल या पलाश का दंड केशांत तक ऊँचा, क्षत्रिय को बरगद या खैर का दंड नाक तक ऊँचा धारण करना चाहिए। गृहस्थों के लिए मनु ने बाँस का डंडा या छड़ी रखने का आदेश दिया है। संन्यासियों में कुटीचक और बहूदक को त्रिदंड (तीन दंड), हंस को एक वेणुदण्ड और परमहंस को भी एक दंड धारण करना चाहिए, ऐसा निर्णयसिंधु में उल्लेख है। किसी-किसी ग्रंथ में यह भी लिखा है कि परमहंस परम ज्ञान को पहुंचा हुआ होता है, अतः उसे दंड आदि धारण करने की कोई आवश्यकता नहीं। राजा लोग शासन और प्रतापसूचक एक प्रकार का राजदंड धारण करते थे। (हिंदी शब्दसागर, चतुर्थ भाग, नागरी प्रचारिणी सभा, 1995, पृष्ठ 2188)

सच्चिदानंद सिन्हा : एक जन्मजात चक्रवर्ती

दसवीं की हिंदी की किताब में जगदीश चंद्र माथुर का एक पाठ पढ़ना होता था। शीर्षक था-'एक जन्मजात चक्रवर्ती'। इस शीर्षक से किसी को एतराज नहीं हो सकता। सच्चिदानंद सिन्हा के पूर्वज के नामों में 'बख्शी' लिखे होने का मतलब है कि वे मुग़लों के बड़े ओहदे वाले मुलाजिम रहते आये थे। वैसे उनका जन्म तो बिहार के आरा के पास मुरार गांव (बक्सर जिला के चौगाई प्रखंड) में हुआ था, किन्तु उनके पूर्वज लखनऊ के आसपास के रहे होंगे। अकारण नहीं है कि मुरार गांव का इनका टोला 'लखनौआ टोला' के नाम से जाना जाता है। कायस्थ तो वे थे ही। अब बख्शी, लखनऊ और बिहार के कायस्थ को मिला दीजिए तो चक्रवर्ती से कम क्या बनेगा भला!

तब कायस्थों की पढ़ाई अरबी-फ़ारसी से शुरू होती और विलायत की बैरिस्टरी पर खत्म होती। डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद हों या प्रेमचंद-सब मकतब और मदरसा के विद्यार्थी थे। हमलोग बचपन में एक कहावत सुनते थे-'पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, देखो रे किस्मत का खेल'! मर्म है कि कहावत बनने से पहले फारसीदाँ ही को नौकरी मिलती थी। अरबी-फ़ारसी-अंग्रेजी से पढ़ाई आरम्भ कर सच्चिदानंद विलायत पढ़ने गये। बैरिस्टरी की पढ़ाई कर चुकने के बाद तक वे अपना नाम अशुद्ध लिखा करते थे। 1890 में उनकी मुलाकात मैक्समूलर से हुई। मैक्समूलर को भारतविद और संस्कृतज्ञ दिखने की इतनी प्रबल चाह थी कि वह 'मोक्षमूलर' कहलवाना ज्यादा पसंद करता था। नाम बदलने की यह प्रवृत्ति यूरोप के कई अन्य विद्वानों में देखी गई है। मुजफ्फरपुर (बिहार) में जन्मे वेद-विद्वान मैकडॉनेल ने अपना संस्कृत नाम 'मुग्धानलाचार्य' रख छोड़ा था। भारतीय विद्वानों ने इन नामों के संस्कृत अनुवाद को लेकर काफी हास-परिहास किया है। महावीरप्रसाद द्विवेदी और चंद्रधर शर्मा गुलेरी तो खूब ही चुटकी लेते हैं! उसी मोक्षमूलर ने सच्चिदानंद को बताया कि आप अपना नाम गलत लिखते हो और शुद्ध रूप से परिचय कराया।

सिन्हा साहब जब विलायत से पढ़कर लौटे तो उनके चचेरे बड़े भाई ने उन्हें इलाहाबाद ठहरकर पाप का प्रायश्चित करने को कहा। तब का यही लोकाचार था। गांधीजी के प्रायश्चित भोज के बारे में हम सब जानते हैं। बिहार में डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के एक रिश्तेदार अभी-अभी पढ़कर लौटे थे। किशोरवयप्राप्त राजेन्द्र ने उस घटना से उत्पन्न विवाद को नजदीक से देखा था। आत्मकथा में लिखा भी है। के. पी. जायसवाल जब विलायत पढ़ने गये थे तो इनकी रसोई का सारा सामान भारत से गया था। अलग से क्या कहना कि इसमें ईंधन का कोयला तक शामिल था। सिन्हा साहब ने इस सामाजिक माहौल में प्रायश्चित करने और भोज करने से बड़े भाई को साफ मना कर दिया। किन्तु वे अपनी ताबीज लाना न भूले थे। तथ्य है कि बालक सच्चिदानंद का जब जन्म हुआ तो उन्हें एक मुसलमान संत के पास ले जाया गया। उस संत ने अपनी मूंछ के बाल उखाड़े और सच्चिदानंद के चाचा को इस हिदायत के साथ दिये कि इसे ताबीज बनाकर वह आजन्म साथ रखे। इस हिदायत का सच्चिदानंद ने आजन्म पालन किया।

1893 में जब वे स्वदेश लौटे तो देखे कि नौकरियों पर बंगाली कुंडली मारे बैठे हैं। महेशनारायण के बड़े भाई गोविंदनारायण बिहार के पहले ग्रेजुएट थे लेकिन बंगालियों के आगे इनकी एक न चल रही थी फलतः बेरोजगार थे। इससे महेशनारायण काफी क्षुब्ध और व्यथित थे। रोजगार एवं अवसर की तलाश की इस 'मध्यवर्गीय लड़ाई' को सच्चिदानंद सिन्हा ने एक व्यापक आधार प्रदान करने हेतु 'बिहारी पहचान' एवं 'बिहारी नवजागरण' की बात 'गढ़ी'। उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा है, 'सिर्फ खुद बिहारियों को छोड़कर बाकी लोगों में बिहार का नाम भी लगभग अनजान था।' आगे उन्होंने लिखा, 'पिछली सदी के 90 के दशक के प्रारंभ में मैं जब एक छात्र के रूप में लंदन में था, तब मुझे जबरन इस ओर ध्यान दिलाया गया। तभी मैंने यह दर्दनाक और शर्मनाक खोज की कि आम बर्ताव के लिए तो बिहार एक अनजान जगह है ही, और यहां तक कि अवकाशप्राप्त आंग्ल-भारतीयों के बहुमत के लिए भी बिहार अनजाना ही है।... मेरे लिए आज के बिहारियों को यह बताना बड़ा कठिन है कि उस वक्त मुझे और कुछ दूसरे उतने ही संवेदनशील बिहारी मित्रों को कितनी शर्मिंदगी और हीनता महसूस हुई जब हमें महसूस हुआ कि हम ऐसे लोग हैं जिनकी अपनी कोई अलग पहचान नहीं है, कोई प्रांत नहीं है जिसको वे अपना होने का दावा करें, दरअसल उनकी कोई स्थानीय वासभूमि नहीं है जिसका कोई नाम हो। यह पीड़ादायक भावना उस वक्त और टीस बन गई जब सन् 1893 में स्वदेश लौटने पर बिहार में प्रवेश करते-करते पहले ही रेलवे स्टेशन पर एक लंबे-तगड़े बिहारी सिपाही के बैज पर 'बंगाल पुलिस' अंकित देखा । घर लौटने की खुशियां गायब हो गईं और मन खट्टा हो गया। ... पर सहसा ख्याल आया कि बिहार को एक अलग और सम्मानजनक इकाई का दर्जा दिलाने के लिए, जिसकी देश के अन्य महत्वपूर्ण प्रांतों की तरह अपनी एक अलग पहचान हो, मैं सब कुछ करने का संकल्प लूं जो करना मेरे बूते में है। एक शब्द में कहूं तो यही मेरे जीवन का मिशन बन गया और इसको हासिल करना मेरे सार्वजनिक क्रियाकलापों की प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत।'

बिहार में बंगाली हितों का प्रवक्ता गुरुप्रसाद सेन का 'बिहार हेरल्ड' (1875) तब मौजूद था। बंगाली हितों के विरुद्ध बिहारी हितों की वकालत करनेवाला भी एक अखबार चाहिए था। अतएव, 1893 में विलायत से पढ़कर लौटे सच्चिदानंद सिन्हा ने पत्र शुरू करने के ख्याल से एक मीटिंग आयोजित की। उक्त मीटिंग में पत्र का नाम 'बिहारी' प्रस्तावित किया गया, किन्तु अंतत: साल भर के अंदर 1894 में 'बिहार टाइम्स' नाम से अंग्रेजी पत्र शुरू किया और 'कायस्थ समाचार' में काम कर रहे महेशनारायण को इसका संपादक बनाया। 1906 ही में इन दोनों ने मिलकर बंगाल से बिहार के पृथक्करण पर एक पुस्तिका जारी की। इसी वर्ष अखबार का पुराना प्रस्तावित नाम 'बिहारी' कर दिया गया किन्तु 1907 में महेश बाबू का निधन हो गया और वे अकेले पड़ गये। बंगाल से बिहार को पृथक किये जाने की इस लड़ाई में उन्होंने कायस्थ बुद्धिजीवियों को एक मंच पर ला दिया। अंग्रेजों के प्रति 'राजभक्ति' और राष्ट्रीय आंदोलन से 'विरक्ति' ने 1912 में बिहार को बंगाल से पृथक होना संभव बनाया।

सच्चिदानंद सिन्हा को किताब पढ़ने और उसे लाल-पीले रंगों में रंगने अर्थात स्केच से 'अंडरलाइन' करने का गहरा शौक था। उनकी इन्हीं किताबों के संग्रह से बाद में प्रसिद्ध सिन्हा लाइब्रेरी की स्थापना हुई। सिन्हा साहब पाठक के साथ-साथ पत्रकार और लेखक भी थे। उन्होंने बिहार और भारत के अपने समकालीनों के ऊपर विद्वतापूर्ण टिप्पणियां की हैं। टिप्पणियां पुस्तकाकार प्रकाशित हैं। अखिल भारतीय स्तर के नेताओं और बुद्धिजीवियों वाली किताब जानकी प्रकाशन, पटना से छपी तो बिहार के समकालीनों के ऊपर लिखी गई जीवनीपरक टिप्पणियां हिमालय प्रेस, पटना के मैनेजर पंडित जयनाथ मिश्र के आग्रह पर 1944 में छपी थीं। कहने की आवश्यकता नहीं कि हिमालय प्रेस बिहार में टेक्स्टबुक लेखन के प्रणेता रामलोचनशरण बिहारी के प्रसिद्ध पुस्तक भण्डार (लहेरियासराय, दरभंगा) का पटना ब्रांच था। इस किताब में बीसियों लोगों की जीवनियों के साथ-साथ लगभग चालीस पृष्ठों की एक लंबी भूमिका भी है जिसमें 1893 से 1912 तक के बंगाल से बिहार के पृथक्करण का जो संघर्ष चला उसका संक्षिप्त किन्तु ऐतिहासिक महत्त्व का विवरण लिखा है। आज किताब का 'ब्लर्ब' या 'आमुख' किसी वरिष्ठ लेखक से लिखाने का चलन है, किन्तु सच्चिदानंद सिन्हा ने अपनी किताब 'सम एमिनेंट बिहार कंटेम्प्रेरीज' का 'आमुख' उम्र में काफी छोटे किन्तु उद्भट विद्वान अमरनाथ झा से लिखवाया था! अमरनाथ झा के बारे में कहा जाता है कि अगर शेक्सपियर का सम्पूर्ण साहित्य भी खो जाय तो उनकी सहायता से एक-एक बात फिर से लिख ली जा सकती है। अमरनाथ झा के पिता सर गंगानाथ झा उनके गहरे मित्र थे और इस किताब में उनकी जीवनी भी संकलित है।

सच्चिदानंद सिन्हा का मानना है कि चूंकि 1894 में 'बिहार टाइम्स' के प्रकाशन से बिहार की पत्रकारिता और पृथक बिहार की मांग शुरू हुई, इसलिए इस वर्ष को बिहार में रेनेसां की शुरुआत का वर्ष माना जा सकता है। अगर अखबार के प्रकाशन से बिहार के रिनेसाँ को जोड़ा जा सकता है तो हिन्दी अखबार 'बिहार बन्धु' को यह श्रेय क्यों नहीं दिया जा सकता जो बंगाल से बिहार को अलग करने के मुद्दे को उठाता रहा था। फिर 'अनीश' और 'कासिद' जैसे उर्दू रिसाले तो बहुत पहले से ये मांग रखते आ रहे थे।

आश्चर्यजनक है कि किताब में महेशनारायण पर एक स्वतंत्र अध्याय है किंतु हिन्दी पत्र 'बिहार बन्धु' से उनके जुड़ाव की कोई चर्चा नहीं है। हो सकता है कि इसका कारण उनका हिंदी विरोधी रुझान रहा हो। सिन्हा साहब हिंदी के हिमायती तो नहीं ही थे, समय-बेसमय वे उस पर व्यंग्य भी किया करते थे। (राधिकारमण स्मृति अंक, नई धारा, पृष्ठ 317) 'बिहार बन्धु' से जुड़े महेशनारायण नाम के एक कवि भी थे जिनकी बिहार बन्धु प्रेस से 'स्वप्न' नाम की मुक्तछंद की लंबी कविता छपी थी। वे खड़ी बोली के बिहार के आरंभिक कवि हैं। सिन्हा साहब द्वारा उनकी इस उपलब्धि की चर्चा न किया जाना मेरे इस संदेह को और गहरा करता रहा है कि 'बिहार टाइम्स' के महेशनारायण और 'बिहार बन्धु' में खड़ी बोली की कविताएं लिखने वाला महेशनारायण अलग-अलग व्यक्तित्व तो नहीं? श्री जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी जी को भी इस बात को लेकर शक हुआ था। किन्तु, श्री रामलोचनशरण बिहारी द्वारा संपादित एवं संवत 1883 वि. में हिन्दी-पुस्तक भंडार, लहेरियासराय से प्रकाशित किताब 'बिहार का साहित्य' (पहला भाग) की पृष्ठ संख्या 6 पर जो संपादकीय टिप्पणी है, उससे स्पष्ट है कि दोनों एक ही आदमी थे।

हिंदी संस्कृति की जमीन

वागर्थ (सितंबर, 2025) पलटना शुरू किया तो संपादकीय लेख पर नजर गयी। शीर्षक है-'हिंदी संस्कृति की जमीन'। पत्रिका के संपादक और इस लेख के लेखक शंभुनाथ हैं। वे भारतीय नवजागरण पर 'साधिकार' विचार करते रहे हैं। पत्रिका में लिखते हैं : "1857 की घटना के बाद अंग्रेजों ने भारत में समाज सुधार को प्रोत्साहन देना बंद कर दिया। विधवा पुनर्विवाह (1856) उनका आखिरी सुधार था। उन्हें भय था कि सामाजिक सुधार से भारत के लोग पुरानी खाइयों से मुक्त हो जाएंगे तो वे एक होकर औपनिवेशिक सत्ता के लिए खतरा बन जाएंगे।" (पृ. 9) 

उपर्युक्त पंक्तियों में उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध के भारत की बड़ी सतही समझ है। भारत में अंग्रेज व्यापारिक कंपनी के रूप में आए थे। सामाजिक चेतना में ये इंग्लैंड के सबसे पिछड़े तबके के प्रतिनिधि थे, इसलिए हमें इस भ्रम से मुक्त रहना होगा कि इनके द्वारा भारत में किये जा रहे परिवर्तन समाज-सुधार की उदात्त भावना से प्रेरित थे। दरअसल, उनके परिवर्तन बाजार-निर्माण से प्रेरित थे। अठारहवीं-उन्नीसवीं शती का भारत अंग्रेजी माल का बेहतर उपभोक्ता नहीं था। एक जड़ समाज बेहतर उपभोक्ता हो भी नहीं सकता। जिस उन्नीसवीं शती के नवजागरण/हिंदी नवजागरण की हम बात करते हैं, किसी भी हिंदी पत्र के ग्राहक सौ की संख्या तक नहीं पहुंच पाये। पत्र की बिक्री सरकारी खरीद और संपादकों की इस गारंटी पर निर्भर थी कि वे घर-घर जाकर पत्र बांच आया करेंगे। एक उन्मुक्त या उदार समाज ही बाजार की वकालत कर सकता है। जातियों में बंटे समाज का व्यक्ति अव्वल तो बाजार/शहर से दूर ही रहता है, अगर किसी मुसीबत में आ भी गया तो अपना सत्तू लेकर आता है, ताकि बाजार की चीज खाकर उसे जाति-धर्म गँवाने की नौबत न आये। आरम्भ ही से हिन्दू धर्म बाजार विरोधी रहा है। इतिहास में झांकें तो प्राचीन भारत में बौद्ध धर्म का उद्भव और विकास बाजार के लिए समाज को खोलने का संघर्ष है। अकारण नहीं है कि बुद्ध, अम्बपाली (आज की भाषा में बाजारू स्त्री) का आतिथ्य स्वीकार करते हैं। इतना ही नहीं, बुद्ध शहरों की यात्रा करते हैं और नोट करने लायक बात है कि किसी शहर ही में उन्होंने अपनी मृत्यु की कल्पना/इच्छा की थी। अंग्रेज भी इसी बाजार के घोड़े पर सवार थे। यह अर्थहीन बात है कि उनके समाज-सुधार से भारतीय समाज की खाइयां कम हो रही थीं। इस तथाकथित सुधार ने जिस शिक्षित वर्ग/समाज का निर्माण किया था, वह अंग्रेजी राज का समर्थक था। बंगाल का मध्यवर्ग 1857 में अंग्रेजों के पक्ष में तो था ही, हिंदी का लेखक भी महारानी की प्रशस्ति और 'शोक-प्रकाश' लिख रहा था।

मनुस्मृति-दहन-दिवस

मित्र आज (2021) मनुस्मृति-दहन-दिवस मना रहे हैं। मैं उनके इस उत्सव का साझीदार नहीं हो सकता। इसलिए नहीं कि मैं मनुस्मृति के नियमों का पैरोकार हूँ। पैरोकार हो भी नहीं सकता। किन्तु वह हमारे समाज का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। उसे नष्ट करना इतिहास को, उसके एक महत्त्वपूर्ण स्रोत को नष्ट करना है। ऐसा करना या करने की सोचना मुझे बचकाना लगता है। बच्चा उटपटांग सोचने के लिए आजाद है!

डार्विन के विकासवाद की खोज के बाद यह साबित हो गया है कि मनुष्य, बंदरों की संतान है। आज विज्ञान के इस निष्कर्ष को मनुष्य जाति पर लगा एक 'कलंक' मान बंदरों को समूल नष्ट कर देने की मूर्खता नहीं कर सकते!

अंग्रेजों ने हम पर बड़े जुल्म किये। इसका मतलब यह नहीं कि आज हिंदुस्तान में उनके नाम पर खड़ी इमारतें ढहाते चलें। सारी अंग्रेजी किताबें जला डालें। नहीं, आज वे हमारी विरासत हैं। उन्हें सहेजकर रखना हमारा सरोकार होना चाहिए। ऐसा विवेक हम पैदा कर सकें।

मनु को हमने 'विलेन' गढ़ा है, जबकि अधिकतर लोग कमोबेश वही बात अपने-अपने तरीके से कह गये हैं। जिस बात के लिए मनु सबसे ज्यादा कोसे जाते हैं, 'आदिकवि' उसके स्रोत बनते हैं। मनु की अधिकतर बातें अपने पूर्ववर्ती कवियों और विधि-निर्माताओं की हैं। वाल्मीकि के मत में "नारी सदैव पुरुष के आश्रित रहनी चाहिए। कन्या के रूप में पिता, पत्नी के रूप में पति तथा माता के रूप में पुत्र उनके संरक्षक हुआ करते हैं।" (रामायण, 1/32/21, 1/33/3, 2/61/24; राधावल्लभ त्रिपाठी, संस्कृत कवियों के व्यक्तित्व का विकास, संस्कृत परिषद, सागर विश्वविद्यालय, सागर, 1976, पृष्ठ 13 में उद्धृत) महाभारत के शांति पर्व में बहुत से ऐसे श्लोक मिलते हैं जो अक्षरशः मनुस्मृति में पाए जाते हैं। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली, 1993, पृष्ठ 34) 

मनुस्मृति का महाभारत के साथ विलक्षण सम्बन्ध है। इसके 260 श्लोक ऐसे हैं जो अक्षरशः महाभारत में पाये जाते हैं। विद्वानों का मानना है कि इन दोनों ग्रंथों ने एक-दूसरे से इन श्लोकों को नहीं लिया है, बल्कि दोनों ग्रंथों का कोई एक मूल है। वशिष्ठ और विष्णुस्मृति में भी 160 श्लोक ऐसे हैं जो मनुस्मृति के हैं। (गंगानाथ झा, हिन्दू लॉ इन इट्स सोर्सेज, पटना विश्वविद्यालय, पटना, 1931, पृष्ठ 59)

जिसे हम 'लोकसाहित्य' कहते उल्लसित होते हैं, वहां भी तथ्य को प्रभुत्वशाली ताकतों ने अधिकाधिक रूप से अपने पक्ष में करने की कोशिश की है। एक कहावत है, 'औरत रहे तो आप से, नहीं तो जाय सगे बाप से' अर्थात 'स्त्री यदि स्वयं सच्चरित्रा है, तब तो वह रहेगी, अन्यथा अपने बाप के साथ भी निकल जाती है।' (फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 56) स्त्री को 'कामातुर' साबित करनेवाली कहावत देखिए : 'कातक कुतिया, माघ (कोश में 'माघ' की जगह माह लिखा है।) बिलाई, चैत चिड़िया, सदा लुगाई।' (पृष्ठ 68) और आगे, 'कौड़ी गांठ की, जोरू साथ की' अर्थात 'अपना पैसा हमेशा अपनी गांठ में और स्त्री को अपने साथ रखना चाहिए। अथवा पैसा गांठ का ही काम आता है और स्त्री तभी काबू में रहती है, जब अपने साथ रखी जाए।' (पृष्ठ 78)

मनुस्मृति का मूल्यांकन करते हुए हम ज्यादती करते हैं जब उसको ऐतिहासिक संदर्भ से काट देते हैं।

हिन्दी के पाणिनि

किशोरीदास वाजपेयी संस्कृत के छात्र रहे थे, हिंदी साहित्य में उनका प्रवेश सन 1916 में हुआ माना जा सकता है जब किशोरीलाल गोस्वामी के मासिक पत्र 'वैष्णव-सर्वस्व' में 'दशधा भक्ति' शीर्षक लेख छपा। किशोरीलाल गोस्वामी ने इस लेख में 'दश' को गलत बताकर 'दस' कर दिया। इस बात पर वाजपेयी जी की भृकुटि तन गई। झगड़ बैठा कि 'दश प्रकार की भक्ति के दश को काटकर दस गलत क्यों कर दिया!' (साहित्यिक जीवन के अनुभव और संस्मरण) उस समय गोस्वामी जी ने मुस्कुराते हुए केवल इतना कहा था कि "हिन्दी में 'दश' की जगह 'दस' ही चलता है और क्यों चलता है, यह सब आगे मालूम हो जाएगा।" (वही) और आगे चलकर वाजपेयी जी को कुछ इस तरह मालूम हुआ कि वे हिन्दी के पाणिनि माने गये।

आरम्भ में किशोरीदास वाजपेयी को हिन्दी के आचार्य लोग बहुत हल्के में ले रहे थे तभी राहुल सांकृत्यायन ने लोगों को बताया कि जिस परीक्षा में वे अनुत्तीर्ण रहे किशोरीदास जी उसके टॉपर थे! दरअसल, वाजपेयी जी ने शास्त्री की परीक्षा दी थी। उस परीक्षा में राहुल भी बैठे थे। परीक्षा का परिणाम देखा गया तो राहुल फेल थे और वाजपेयी जी का नाम सूची में सबसे ऊपर था। राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी शब्दानुशासन की प्रस्तावना में ग्रंथ की महत्ता बताने के लिए इस बात की चर्चा कर देना आवश्यक समझा। 17 दिसम्बर उनका जन्मदिन था, लेकिन चतुर्दिक सन्नाटा पसरा रहा। लगता है, आज फिर वे चर्चा से बाहर कर दिये गये हैं। कृतघ्न हिंदी जगत को आज फिर किसी 'राहुल' की डांट का इंतजार हो शायद!

स्त्री-गीत में स्त्री-छवि

वर्षों से पढ़ते-सुनते आ रहे हैं कि अबतक का सारा इतिहास पुरुषों का, पुरुषों द्वारा लिखा गया इतिहास है। अर्थात पुरुष अपराधी और जज दोनों की भूमिका निभाता रहा है और मनोनुकूल फैसले लेता रहा है। इतिहास के इन फैसलों की वस्तुनिष्ठता जाँचने के लिए जरूरी है कि प्रतिपक्ष को भी सुना जाय। इतिहास की इस पहल से उन नये साक्ष्यों की खोज शुरू हुई है जिन्हें पुरुष प्रभावित कर पाने में लगभग असमर्थ रहे हैं। स्त्री-गीत इतिहास के ऐसे ही साक्ष्य हैं जिनके बारे में लगभग विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि वे मूलतया स्त्रियों द्वारा रचित एवं संरक्षित हैं। प्रेमचंद कहा करते थे कि "पुरुष इतना भावुक नहीं हो सकता कि स्त्रियों के अंदर के दर्द को महसूस कर सके। यह तो स्त्रियों ही के बनाए हुए हैं। स्त्रियों का दर्द स्त्रियां ही जान सकती हैं, और उन्हीं के बनाए यह गाने हैं।" (शिवरानी देवी, प्रेमचंद : घर में, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 222) इसलिए स्त्रियों का कोई भी वास्तविक और प्रामाणिक इतिहास स्त्री-गीतों से गुजरे बगैर नहीं लिखा जा सकता।

औरतों के बारे में कहा जाता है कि वे सब कुछ बर्दाश्त कर लेती हैं, किंतु सौत नहीं। एक कहावत भी है कि 'सौतिन काठो के न अच्छा।' इसी को 'सौतिया डाह' कहा गया है। हमारे प्राचीनतम लिखित साक्ष्य वैदिक साहित्य के दिनों से ही हमें स्त्री-मन में सौतों से डर तथा घृणा के उल्लेख प्राप्त होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋग्वैदिक काल के अंत तक एकपत्नीत्व की प्रथा जड़ जमा चुकी थी। दशम् मंडल की सूक्त संख्या 33 में इंद्र को संबोधित मन्त्र में कहा गया है कि 'सपत्नियों की तरह मेरे पार्श्व पीड़ा देते है।' दिलचस्प बात है क़ि इसी दशम् मंडल का सूक्त 145 सपत्नीबाधन अथवा उत्पीड़न के भाव से भरा है। इस सूक्त की ऋषिका इन्द्राणी हैं। इन्हें शची भी कहते हैं। देवता हैं सपत्नीबाधन। सूक्त के प्रथम मन्त्र में कहा गया है कि इस लता रूपिणी बलवती औषधि को हम खोदकर निकालते हैं, इससे सपत्नी को पीड़ित किया जाता है। दूसरे मन्त्र में कहा गया है कि आप मेरी सपत्नी को दूर करें तथा मेरे स्वामी को मात्र मेरे लिए प्रीतियुक्त करें। तीसरे मन्त्र में है कि हमारी सपत्नी निकृष्टों में भी अति निकृष्ट स्थिति को प्राप्त करें। चौथे मन्त्र में है कि मैं इन्द्राणी, सपत्नी का नाम तक लेना उचित नहीं समझती हूँ। सपत्नी सभी के लिए अप्रिय होती है। सपत्नी को मैं दूर से भी अति दूर देश में भेज देना चाहती हूँ। 5वें मन्त्र में, 'हे औषधे! मैं आपके सहयोग से सपत्नी को पराजित करनेवाली हूँ। आप भी इस कार्य में समर्थ हैं। हम दोनों शक्ति संपन्न बनकर सपत्नी को शक्तिहीन करें।' और अंत में, मन्त्र संख्या 6 में पति से प्रार्थना है क़ि मैं आपके सिर के स्थान सिरहाने के समीप सपत्नी को पराभूत करनेवाली इस औषधि को स्थापित करती हूँ। रामचरितमानस की मंथरा, कैकेयी से कहती है कि पुत्र को राज्य और राम को वनवास दो और 'सौत का सारा 

आनंद तुम ले लो'-'देहु लेहु सब सवति हुलासू'। (रामचरितमानस, गीता प्रेस, गोरखपुर, पृष्ठ 

324) कैकेयी भी दृढ़प्रतिज्ञ है कि 'मैं भले ही नैहर जाकर वहीं जीवन बिता दूंगी; पर जीते-जी सौत की चाकरी नहीं करूंगी'-"नैहर जनमु भरब बरु जाई। जिअत न करबि सवति सेवकाई।" (वही, पृष्ठ 323) पुत्र के मुख से वनगमन का दुःसंवाद सुनकर कौसल्या कहती है-'विप्रकारं सपत्नीनामेबं जीर्णपि राघव।' अर्थात 'हे राम, बुढ़ापे में सौतों का अनादर मुझसे अब सहा न जायगा।' (2/20/47; शिवबालक राय, वाल्मीकि- रामायण : काव्यानुशीलन, मोतीलाल बनारसीदास, 1988, पृष्ठ 292)

पितृसत्तात्मक समाज में सौत स्त्रियों की स्थायी पीड़ा रही है, इसलिए उससे संबंधित कई मुहावरे भाषा में दर्ज हैं। एक कहावत है 'सेज की मक्खी भी बुरी'। (एस. डब्ल्यू. फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 344) फिर सौत के संबंध में अलग से कहा ही क्या जाय? एक दूसरी कहावत है, 'सौकन चून की भी बुरी है' (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 348) इसी बात को एक अन्य कहावत में कुछ इस तरह कहा गया है- 'सौकन बुरी चून की और साझे का काम/कांटा बुरा करील का और बदरी का घाम।' (वही)

यह डर लोक और लोकगीतों में भी मुखर है। कई दफा इस डर को हथियार बनाकर परिवार के सदस्यों, खासकर ननद और पति के द्वारा स्त्री को काबू में करने की कोशिश की गई है। अंगिका में इस आशय का एक गीत है। पति अपनी पत्नी के लिए कंगन खरीदकर लाता है। उसकी ननद उसे पहने हुए देख लेती है और वह निश्चय कर लेती है कि भाभी के पुत्र होने पर मैं यह कंगन ही बधाई में लूँगी-'कँगना पहिर भौजो ठाढ़ भेलै, अँगनमा से ठाढ़ भेलै हे। ललना रे, परि गेल ननदो मुँह दीठ, कँगनमा भौजो पहिरल हे।। तोहें ननदो मनाव$ गोसाईं, औरू भगमानजी सें हे। ललना रे, जौं घर बबुआ जनम लेल, कँगनमा पहिराई देब हे।।' भाभी पुत्रवती होती है और ननद उससे बधाई में कँगन की माँग करती है। भाभी सौरगृह से कँगन की चोरी हो जाने का बहाना बनाती है। ननद, माता-पिता तथा भाई से कँगन दिलवाने का अनुरोध करती है। सब से वही चोरी का बहाना। अंत में भाई अपनी बहन से कहता है कि जाने दो, मैं दूसरा विवाह कर लूंगा और तुम्हारी नई भाभी से तुम्हें कँगन दिलवा दूंगा। इस खबर को पाकर जच्चे का सारा गर्व टूट जाता है और वह कँगन अपनी ननद को दे देती है तथा अपने पति से दूसरा विवाह न करने की प्रार्थना करने लगती है। 'चुप रहु चुप रहु बहनियां कि बहिनियां, से अरज करियो हे। ललना रे, करबौ में दोसरो बिअहबा, कि कँगनमां तोरा पेन्हाइ देबौ हे।। गोड़ लागियों पैयाँ परियो परभुजी, अब अरजिया करियो हे। ललना रे, जनि करिहो दोसरो बिआह, कँगनमां ननदो देइ देब न हे।।'

एक अन्य गीत में वर्णन है कि पुत्रोत्पत्ति की ख़ुशी में जच्चे के नैहर से 'पियरी' में जड़ीदार साड़ी आई है। ननद बधावे में 'पियरी' ही की मांग करती है। ननद अपने माता-पिता और अपने प्यारे भाई से पियरी दिलाने का अनुरोध करती है, लेकिन जच्चा सबके अनुरोध को ठुकरा देती है। अंत में भाई अपने बहन को सांत्वना देते हुए कहता है- 'बहन, अधीर मत हो। मैं दूसरी शादी करूँगा, तो उससे पुत्र होने पर मैं उसकी पियरी तुम्हें दिला दूंगा। पति की इस बात से मानिनी जच्चे का गर्व चूर हो जाता है और वह सौत के डर से अपनी पिटारी से पियरी निकालकर ननद के आगे फेंक देती है। 'चुप रहु, चुप रहु बहिनी, त बहिनी सें अरज करी हे। ए बहिनी, करबै हम दोसर बियाह, पियरिया तू बधावा लिहें हे।। एतना बचनिया जब सुनल, त सुनहु न पाओल हे। ए ललना, झाँपी से काढ़ली पियरिया, अँगनमा धय बजारी देल हे। ए ननदो, लेहो छिनरिया पियरिया, त सौतिन मंगाबे लागल हे।।'

शिव द्वारा अपनी साली से ही दूसरा विवाह कर लेने पर गौरी रुष्ट होकर शाप देती है। 'मरियो गे संझा भाइ रे भतिजबा, आरो होइहो कोखिया बिनास हे। तीनि भुवन बर कतहुँ न मिललौ, भै गेलै सौतनी हमार हे।' संध्या, जो सौत बनकर आयी है, बड़े ही मार्मिक शब्दों में कहती है, बहन, भला-बुरा क्यों कहती हो तथा शाप क्यों देती हो? मेरे लिए तो कार्तिकेय और गणपति दो बालक हैं, उनको मैं खेलाऊँगी। 'मतु पढ़अ गारी गौरा, भाइ रे भतीजा लाइ, जनि करिह$ कोखिया बिनास हे। कारतिक गनपति, दोइ रे बालक, गोदी के खेलाइबअ होइबअ में दासी तोहार हे।।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 195)

मगही लोककथाओं में भाभी के प्रति ननद की कटुता परिलक्षित होती है। सोभानायका बनजारा लोक-गाथा में ननद की कटुता जसोमती के प्रति ऐसी है कि ननद के प्रति घृणा उत्पन्न हो जाती है। (डॉक्टर एनामुल हक, मगही लोक-गाथाओं का साहित्यिक अनुशीलन, विशाल पब्लिकेशन, प्रथम संस्करण : 2007, पृष्ठ 267) भाभी की कटुता भी छिपी नहीं रहती- "ये नन्दो राँड़ का काम होगा-वही तायी से कराय के घर गई है।" (बूँद और समुद्र, अध्याय 6; भारतेन्दु-युग और हिन्दी-भाषा की विकास-परंपरा, पृष्ठ 149 में उद्धृत)

लोकगीत में सास-बहू प्रसंग

एक नेपाली गीत में बहुओं के प्रति निर्दयी सासों का अत्याचार कुछ इस तरह चित्रित किया गया है :

'सास कहती है-बहू! बहू कहती है-जी!

'काठ की हांडी में रखा हुआ घी किसने खाया?'

'न देखा न सुना, मैंने कहाँ खाया।'

तेरे होंठ चिकने हैं, मैंने थाह पा ली।

जितने द्वार हैं बंद किये देती हूँ, जितनी खिड़कियां हैं खोले देती हूँ।

तू घी-चोर बहू है, तेरे होंठों को दाग दूंगी।'

सास के अत्याचारों का कहीं अंत नजर नहीं आता-

'मैं इस परदेस में मर जाऊंगी,

मेरे लिए आंसू बहाने वाला कोई नहीं।'

और अंत में,

'नारी का जन्म एक पराजित कर्म है,

सदैव दूसरों की परतंत्रता!' (देवेंद्र सत्यार्थी, धरती गाती है, पृष्ठ 154-155)

सास-बहू के बीच मतभेद नया नहीं पुराना है। गीतों में स्त्री अपनी मां के लिए प्रेम दिखाती है तो सास के लिए स्वाभाविक घृणा। एक गर्भवती स्त्री पतिगृह आने से दुखी है। सोचती है कि शादी के बाद भी अगर अपनी मां के घर रहती, तो मेरे दुःख को मेरी मां अपने अथक परिश्रम और सेवा-शुश्रुषा से कम कर देती, जबकि उसे अपनी सास के व्यवहार से दुःख है। 'अपन मैया रहतिऐ, दरदियो हरी लेतिऐ हो लाल। परभुजी के मैया हे बेदरदी, दरदो नहीं हरी लिय हो लाल।।' सास को भी बहू से कुछ कम शिकायत नहीं है। फिर बात अगर बहू की संतानहीनता की हो तो वह बहू के पद से भी उतार दी जाती है। 'सासू मन टूटल ननदी मन, औरु सभै के मन रे।' वंश परंपरा को कायम रखने की सबसे अधिक चिंता सास को सताती है, इसलिए निःसंतान बहू सास के लिए बहू न रहकर 'बाँझिन' हो जाती है। सास द्वारा बहू की इस प्रताड़ना में प्रायः ननदें भी शामिल रहती हैं। 'सासु मोरी कहले  बँझिनियाँ, ननद मोरी बाँझिन हे।' सास बहू के बीच प्रेमपूर्ण सम्बन्ध न होने से सास मायके जाकर बैठी है। बहू जब प्रसव वेदना से परेशान हो उठती है तब बेटा अपनी माँ को मनाने जाता है। माँ आने को तैयार नहीं है; क्योंकि उसे अपनी बहू की बातें सह्य नहीं होतीं। 'ललना रे तोरि धनि क बोली न सोहाय, हुआँ रे कैसे जायब हे।' फिर, किसी तरह मानती है। सौरगृह में प्रवेश करते ही वह बच्चे को देखकर समय पर अनुपस्थित रहने के लिए पश्चाताप करने लगती है। लेकिन, बहू ऐसे अवसर पर भी उसे अपमानित करने से बाज नहीं आती। कहती है, 'बबुआ, मामा के देहुन धकिआई, केहुनि फुटि जैतेन कि ठेहुनि फुटि जैतेन हे।...दरद बेर न आएल हे।।'

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने जैसाकि अपनी 'आत्मकथा' में लिखा है, 'मेरी हालत यह थी कि मैं जब कभी गांव पर छुट्टियों में आता, बाहर ही सोता। रात के समय जब सबलोग सो जाते तो मां दाई को भेजतीं कि जगा लाओ और वह जगाकर मुझे ले जाती और उस कमरे में छोड़ देती, जिसमें मेरी पत्नी रहतीं। नींद के मारे मुझे उस वक्त रात को जागना कठिन हो जाता। अक्सर मैं, कितनी भी कोशिश होती, जागता ही नहीं। दूसरे दिन माँ या चाची डांटती कि रात को जागते नहीं और बुलाने पर भी नहीं आते। सवेरे जब सब लोग सोये ही रहते उठकर चला आना होता और बाहर की चारपाई पर सो जाता, जिसमें किसी को यह पता न चले कि रात को कहीं दूसरी जगह गया था! यहाँ तक कि साथ के नौकर को भी इसका पता कम ही लगता।' (पृष्ठ 47-48) इसी आशय का एक गीत देखें, 'चुनरी पहरि मैं ओलयों ओसरवाँ/पियवा के मन ललचाय, हो गोरिया!/चोर की नैयां पिया लुकि लुकि आवै/जेकरे मैं बियाही तेउ पख फोरबा, हो गोरिया!' अर्थात 'चुनरी पहनकर मैं ओसारे में सोई/पिया का मन ललचा उठा, ओ गोरी!/चोर के समान पिया छिप-छिपकर आते हैं,/वही मानो सेंध लगाते हैं, ओ गोरी!' (देवेंद्र सत्यार्थी, बेला फूले आधी रात, पृष्ठ 7-8)

ऐसी स्थिति भी सास के लिए बहू के विरुद्ध हथियार ही बनती है। बहू के गर्भवती हो जाने पर सास को शंका हुई कि मेरा लड़का तो घर के बाहर बँगले पर सोता है, फिर यह गर्भवती कैसे हो गयी? उसे उसके चरित्र पर शंका होने लगी। उसकी पुत्रवधू ने शंका-निवारण के लिए मेघ से प्रार्थना की। वर्षा होने लगी। उसका पति छिपकर उसके पास आया। उपयुक्त अवसर पर उस स्त्री ने सास को उसके पुत्र को दिखलाकर उसकी शंका का निवारण किया-'बेटा मोरा सुतै बंगलवा, पुतहुआ मनहर घर हे। ललना रे, कौने रे रसिकवा से लोभायल, त पुतहू गरभ सैं हे।। बरिसहु हे मेघ बरिसहु, बरिसहु सोने बूंद हे। ललना रे, ओते ओते ऐतन बलमुआ, कि सिर के कलंक मेटत हे।। मंचिया बैठल मोरी सासु छेकी हे, कि सासु छेकी हे। ललना रे, चिन्ही लिअ$ सासु अपन बेटवा, कलंक मोर मेटि दिअऊ हे।।'

देवकी की ऑंखें और शरीर का रंग देखकर उसकी सास शंका करने लगती है; क्योंकि उसका बेटा तो गोकुल में रहता है, वह गर्भवती कैसे हो गयी? सास को शंका है कि उसकी बहू को किसी से अवैध संबंध हो गया है। 'मोर पूत बसै दूर देस, नगर गोखुला में रे। ललना रे, कौन पुरुखबा से रिझली, रहली गरभ सैं रे।।' बहू पटेवा से जाल बनाने का अनुरोध करती है; क्योंकि रात में छिपकर आये हुए अपने पति को वह फंसाकर अपनी सास की शंका दूर करना चाहती है। 'घर पछुअरबा में बसै पटेबा भैया, तोहिं मोरा हितबन रे। ललना रे, पाट सूत जाल बुनि देहो, कि पिआ के बझायब रे। ललना रे, पिआ के बझाई हम राखब, सासु पतियायब।।'

लोकगीत की पत्नी

लोकगीत वैसा संग्रहालय है जहाँ हमारा समाज अपनी संपूर्णता में देखा जा सकता है। समाज की एक एक चीज यहाँ करीने से धरी मिलेंगी आपको जिन्हें आप अपने समय और सुविधा के हिसाब से उलट- पलट सकते हैं। इन गीतों में स्त्रियों ने सिर्फ सोहर ही नहीं गाया है, बल्कि अपने पतियों के स्वछंद यौनाचार और उसके प्रतिरोध के गीत भी रचा है। अंगिका भाषा में एक ऐसा ही गीत दर्ज है-'गर्भवती नारी, जिसे अभी अपने गर्भ का अंदाज नहीं है, अपने पति के पास जाती है। पति उस समय मालिन के साथ घर के अंदर है। वह दरवाजा खोलने को तैयार नहीं है। उसने अपनी सास से इसकी शिकायत की। सास ने बहू को समझाया कि जाने दो, अभी तुम अपने महल में आराम करो, तुम्हारी गोद भरनेवाली है। 'धीरहि धीरहि अयलै चौकठिया धरि ठाढ़ि, केवड़िया धरि ठाढ़ि हे। खोलू राजा खोलू केवड़िया, महलिया जा के सोइब, माथा मोर पिराबै हे।। मालिन संग हमें सूतब, जाहो रानी रंग महलिया, जाके सोइ रह$ हे।।' पितृसत्तात्मक समाज में चूँकि पुरुष के यौनाचार को समाज से लगभग मान्यता प्राप्त है, इसलिए सास उसे समझाकर लौटा देती है। 'मचिया बइठली तोहे सासु, से ठकुराइन सासु, राउर पूता मलिनिया संगे हे। पुतहू, तोहरा क होतै नन्दलाल, मलिनिया संगे सूते देहू, तुहूँ महलिया सोइ रह हे।।' जब सास भी पितृसत्ता के पक्ष में खड़ी नजर आती है तो उसका अंतिम सहारा भी उसके हाथ से निकल जाता है। डूबती पत्नी के लिए चौकठ तिनके का सहारा बनता है-'धीरहिं धीरहिं अयलै चौकठिया धरि ठाढ़, केवड़िया धरि ठाढ़ रे।' किंतु भारतीय पत्नी पितृसत्ता को अपने तरीके से चुनौती देती है। पति के बार बार के आग्रह के बाद भी वह किवाड़ नहीं खोलती- 'खोलू रानी खोलू सोने के केबड़िया, महलिया में सोबे देहू हे।' पत्नी के हथियार देखें, 'राजा, माथा मोर पिराबे, बलकवा मोर रोबइ हे। राजा, मूठि एक लेहू भुसबा, भुसघरवा जा के सोइ रहू हे।।' सीता के गृहनिकाला का पत्नी यहाँ अपने 'राम' से बदला लेती है। पति को पत्नी के इस 'बदले तेवर' का भान होता है-'रानी बहै के पुरबैया बहै पछिया, भूसा उड़ि मुख पड़ै हे।' इस लोकगीत की ताकत यही है कि 'सीता' के समक्ष 'राम' को अपनी पराजय स्वीकार किये बगैर घर वापसी की अनुमति नहीं मिलती-'रानी हे, खोलू आजु खोलू केबड़िया, महलिया में सोबे देहू हे। तोहि आज जीतल हम हारलें, महलिया में सोबे देहू हे।।'

एक अंगिका सोहर में राम द्वारा जंगल में निर्वासित सीता नाई को बुलवाकर लोचन पहुँचाने के लिए उसे अयोध्या भेजती हैं। कहती हैं, 'पुत्रोत्पत्ति की खबर दशरथ, कौशल्या और लक्ष्मण को देना, लेकिन किसी प्रकार राम इसे जानने न पायें।' 'पहिली लोचन राजा दसरथ, तब कय कोसिलेआ रानी हे। ललना, दोसरी लोचन देवरा लछुमन, राम नहीं जानै हे।।' हजाम अयोध्या पहुँचता है तो उसे सबसे पहले राम ही से भेंट होती है। राम हजाम को विदाई के समय सीता के नाम से एक पत्र लिखकर देते हैं। सीता उस पत्र को पाकर मुस्कराती तो हैं, लेकिन राम को भला-बुरा भी कहती हैं। एक परित्यक्ता का अपने निष्ठुर पति के प्रति ऐसा भाव उचित/ यथार्थ चित्रण है। 'चिठिया लिखिये राम देलन, औरो राम देलन हे। ललना रे, दय दिहें सीता के हाथ, त राम चली आबै हे।। चिठिया में बाँची बाँची सीता, त मन मुसुकाबै हे। ललना रे, कौने कुलबोरना, चिठी लिखल लिखी के पठाबल हे।।'

इन गीतों से रामायण की सीता की बरबस याद आती है। राम जब सीता को वन में साथ चलने की अनुमति नहीं देते तो क्षत्राणी का छिपा तेज लहक उठता है। वे कहती हैं, 'हे राम, यदि मेरे पिता मिथिलापति विदेह यह जानते कि तुम पुरुष के रूप में स्त्री हो, तो वे तुम्हें अपना जामाता कदापि न बनाते।' (किं त्वामन्यत वैदेह: पिता मे मिथिलाधिपः। राम जामातरं प्राप्य स्त्रियं पुरुषविग्रहम्।। 2/30/3; शिवबालक राय, वाल्मीकि रामायण : काव्यानुशीलन, मोतीलाल बनारसीदास, 1988, पृष्ठ 327)  'आह, जनक ने पुरुष वेश में एक स्त्री को (धोखे में) अपना जमाई बना लिया। खेद है, अज्ञानवश लोग झूठा ही कहने लगे कि राम सूर्य के समान तेजस्वी हैं; किंतु, (सच तो यह है) इनमें तेज है ही नहीं--'अनृतं वत लोको$यमज्ञानाद् यदि वक्ष्यति। तेजो नास्ति परं रामे तपतीव दिवाकरे।।' (2/30/34; शिवबालक राय, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 327)

लोकगीत की पत्नियां पति के फैसलों को चुपचाप नियति मानकर स्वीकार करनेवाली नहीं हैं, न पति हमेशा परमेश्वर। फैसला अगर अनुचित हुआ तो पत्नियां मंसूबे पर पानी फेर देने में सक्षम हैं। एक गीत में पति दूसरा विवाह करने निकलता है। उसकी पत्नी ने उसे रोका और पूछा-'आप तो विवाह करने जा रहे हैं, परंतु मुझे किसे सौंप रहे हैं?' पति ने उत्तर दिया-'मैं तुम्हें अपनी मां और बहन को सौंप जाऊंगा तथा तुम्हारे लिए बहुत-सा धन दे जाऊंगा।' पति चला गया। पत्नी ने मनौती मानी कि विवाह करने के लिए जाते समय जोरों से आँधी-पानी आ जाए। पानी में भींगता हुआ पति लौट आया और पत्नी से किवाड़ खोलने का अनुरोध करने लगा। 'देबौ रे कागा तोंहे खसिया ओ पठिया, जौं परभु जैता बिआह करे हे। आन्ही पानी सूप, नेवोति रखिहें हे।। आन्ही अछकाल कैने, पानी छछकाल कैने हे। हे खोलु धानि सोबरन केबरिया, सोहामन मौरिया भींगी जैतो हे।।' (अंगिका संस्कार गीत, पृष्ठ 223)

लोकगीत में भाभी-ननद प्रसंग

हिंदी का ननद शब्द संस्कृत का ननान्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है आनंद न देनेवाली। लोकगीतों में भी ननद ज्यादातर भाभी के समक्ष इसी रूप में प्रकट होती रही है। सास-बहू की लड़ाई में तो यह अपनी मां का साथ देती ही है, इसकी नजर भाभी के वस्त्राभूषणों पर भी होती है। अकारण नहीं है कि ननद लोकगीतों में अक्सर भाभी पर उपहार देने का दवाब बनाती चित्रित है। अंगिका के एक मुण्डन-संबंधी गीत में वर्णन है कि मुण्डन के अवसर पर बहू ननद को इसलिए निमंत्रित नहीं करना चाहती कि उसे बधैया देना पड़ेगा। 'ललना रे, एक नहीं नेतब ननद दाइ, जिनि रे बधैया मांगे रे।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 95)

एक गीत में वर्णन है कि पुत्रोत्पत्ति की ख़ुशी में भाई के दरवाजे पर बधावे बज रहे हैं। बाजा बजानेवाले को धीरे-धीरे बजाने का आदेश दिया जाता है, क्योंकि बाजे की आवाज सुनकर बहन के आ जाने का भय है। 'घर पिछुअरबा चमरबा भैया, चमरबा भैया हितबा हो लाल। नीचा कय ठोकिहे ढोलकबा, बहिनी जनु सुनै हो लाल।।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 42) बहन नैहर आ धमकती है और भाभी से बधावे से उसका नगर ही मांगती है। 'भौजो, नहिं हमें पैर धोबै, नहिं हमें जेमबै हो लाल। भौजो, बाबा के नगर अजोधा, बधैया हमें लेबो हो लाल।।' (वही, पृष्ठ 43) भाभी उसका अपमान करती हुई कहती है, 'यह नगर न तुम्हारे बाप का अर्जित किया हुआ है और न तुम्हारी माँ के छिपाकर रखे हुए रुपये का है। तुम भागो यहाँ से। मैं बधैया नहीं देती।' 'नहिं तोरा बाप के अरजल, माई के कोसल हो लाल। नहिं मिलतो नगर अजोधा, रोबैते घरबा जाहो हो लाल।।' (वही, पृष्ठ 43)

एक अन्य गीत में भी बच्चे की माँ नाचने-गानेवाले को चुप रहने को कहती है; क्योंकि उसे भय है कि इन लोगों की आवाज को सुनकर ननद बधावा लेने आ जायेगी। 'चुप रहू नाच नचनियां, ढोलक बजनियां रे। ललना, सुनि पैती ननद गोसावनि, बधैया माँगे आयती रे।।' (वही, पृष्ठ 43) फिर भी ननद पहुँच जाती है। भाभी उससे भोजन करने का आग्रह करती है, किंतु ननद कहती है कि मैं तो अपने भतीजे का बधावा लेने आई हूँ। भाभी कहती है कि मां-बाप के बिना नैहर में बेटी की इज्जत नहीं होती। ननद भी इतनी जल्दी अपना अधिकार नहीं छोड़नेवाली। कहती है, मैं तो अपनी मां की पिटारी, जिसमें चीजें संजोकर रखी है, खोलने आई थी। 'मति जनिह$ ए भौजो, मति जनिह$, तोरे भनि आयल रे। भौजो, अम्माँ के साँठल पेटरिया, बह खोले आयली रे।।' (पृष्ठ 44) बधावा न मिलने पर ननद रोते हुए, भगिना ठुनकते हुए और ननदोसी बिहँसते हुए जाता है। पति खुश है कि नैहर का उसका घमंड तो टुटा। 'कनैत जाय ननदिया, ठुनकैत भगिनमा रे। हँसैत जाय ननदोसिया, भले रे मग तोरल रे।।' (पृष्ठ 44) पति सांत्वना देता है कि अधीर मत हो। मैं नौकरी करूँगा और तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति कर दूंगा। तुम अपने नैहर को भूल जाओ। 'तोरा लय आनबौ चुनरिया, बबुआ गले हँसुलिया रे। अपना लय चढ़न के घोड़बा, नैहरबा तोहिं बिसरहो रे।।' (पृष्ठ 44) उसकी पत्नी इन चीजों को लात मारने के लिए तैयार है, परंतु अपमानित होकर भी वह अपने नैहर से सम्बन्ध तोड़ना नहीं चाहती क्योंकि वहां उसकी जड़ होती है। अपनी जड़ों से कटना हवा में होना है। 'अगिया लगैबो चुनरिया, बालक गले हँसुलिया रे। ललना रे, नदिये भंसैबो चढ़न के घोड़बा, नैहर केना बिसरब रे।।' (पृष्ठ 45)

एक गीत में सीता का अपनी भाभी के व्यवहार से दुखी होने का वर्णन प्राप्त होता है। इस गीत में सीता के विवाह के बाद की स्थिति का वर्णन है। सीता नैहर से विदा हो रही है। सभी परिजन दुखी हैं। 'अम्माँ के काननें गँगा बहि गेलै, बाबा के भींजल पटोर हे। भैया के काननें जमुना बाढ़ि आयल भौजो के हिरदा कठोर हे।।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 205) अतः सीता भाई को तो आशीर्वाद देती है किंतु भाभी को शाप। 'दूधें नहैह भैया पूत भरैहअ, नित उठि करिह काज हे। सात सौतिनियाँ भैया भौजी सेज धरिहअ, घूरि न आयब भौजी राज हे।।' (वही, पृष्ठ 205) इसी आशय का एक पंजाबी गीत है जो यहाँ द्रष्टव्य है। गीत का अंश है: 'आले ते जाले बाबल गुड्डियाँ, मेरे नई खेड्डन ते चाह होये। माँ रोंदी दी अँगिया भिज्ज गयी, प्यू रोये दरया बहे। मेरा बीर रोये, सारा जग रोये, मेरी भाभियाँ मन चाव होये।' (वही, पृष्ठ 205, पादटिप्पणी में उद्धृत) गीत का भावार्थ है: 'हे पिता, मैं तो अभी नन्हीं हूँ। घर के कोनों में, दीवारों के आलों में, सभी जगह मेरी गुड़ियाँ रखी हैं। अभी मेरा गुड़िया खेलने का चाव कहाँ पूरा हुआ? मुझे अभी क्यों घर से निकाल दे रहे हो? मैं घर छोड़कर जा रही हूँ। रोते-रोते मां की अँगिया भींग गई, पिता के रोने से नदियां बह गईं, भाई को रोता देखकर संसार रो रहा है, परंतु भाभियों के मन प्रसन्न हैं!'

लोक गीतों में भाभी-ननद प्रसंग हमेशा कटुतापूर्ण ही नहीं प्राप्त होते बल्कि परस्पर प्रेम और विश्वास से भरे भी हैं। ब्रज में प्रचलित 'विजयरानी का गीत' इसका बेहतर उदहारण है। विजयरानी असाधारण सुंदरी थी-'डाबरनैनी' (बड़ी और सुन्दर आँखोंवाली स्त्री को डाबरनैनी कहा गया है)। उसके पति ने बिरादरी के किसी अन्य पुरुष से हँसते देखकर उसके चरित्र पर संदेह किया। इसी मनोमालिन्य के कारण वह विजयरानी को हाथ में दिया थामे आते देखकर 'बजर केबार' बंद कर लेता है। भला हो विजयरानी की ननद का जिसने अपने भैया को समझाया कि विजयरानी निर्दोष है क्योंकि हँसकर बोलना डाबरनैनी के स्वभाव में सम्मिलित है। झट 'बजर केबार' खोले जाते हैं और विजयरानी अपने पति से मिल सकती है और ननद को पहनने के लिए दक्षिण का चीर और खाने के लिए गिरी छुआरे पुरस्कार-स्वरूप देने की बात सोच रही है। (देवेंद्र सत्यार्थी, बेला फूले आधी रात, पृष्ठ 29) भाभी-ननद के बीच प्रेम का एक और गीत है। वर्णन है कि भाई के घर में पुत्र होने पर  बहन बधैया माँगने पहुँचती है। उसे मुँहमाँगी चीजें बधावे में मिलती हैं। बधावे की चीजों को लेकर वह अपनी भाभी और बच्चे को आशीर्वाद देती हुई जाती है। 'जैसें जैसें फूलत, माली फुलबरिया हे। वैसें फूलत मोर भौजो, कि आहो लाल।।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 89)

सोहर और पुत्री का जन्म

संतान के जन्म के उपरांत जो मंगल गीत गाये जाते हैं, 'सोहर' कहलाते हैं। इन सोहरों में बलवती पुत्रकामना, पुत्रप्राप्ति से परिवार में व्याप्त हो जानेवाली प्रसन्नता की लहर, पुत्रवती के सम्मान की वृद्धि आदि की बड़ी ही मार्मिक व्यंजना मिलती है। पुत्र की अपेक्षा पुत्री के जन्म को कम महत्त्व देने की प्रवृत्ति भी इन गीतों में सहज भाव से प्रकट है। इसका कारण वह सामाजिक व्यवस्था है जिसमें स्त्री-पुरुष के समानाधिकार को स्वीकार नहीं किया गया है। इन गीतों में पुत्रहीना के प्रति पति एवं परिवार के अन्य सदस्यों की उपेक्षा, प्रसव-पीड़ा के समय सास की उपेक्षा और निर्दय पति का जुए एवं अन्य व्यसनों में व्यस्त रहने का वर्णन पुत्री के कमतर महत्त्व को ही रेखांकित करते हैं। एक गीत में तो साफ-साफ स्वीकार किया गया है कि सौरगृह बिना पुत्र के नहीं सुहाता-'सोइर न होरिला बिनु रे'।(अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 73)

एक निमाड़ी लोकगीत में पति अपनी गर्भवती पत्नी को छोड़कर चला गया था। गांव के समीप पहुँचते हुए उसे ढोल की आवाज सुनाई देती है और वह झट समझ जाता है कि उसकी पत्नी ने पुत्र को जन्म दिया है। पत्नी कहती है, 'हम तो हारया पियाजी तुम जीतिया/बोल्या ते बचन समालो/पियाजी हमन लाल हो जायो।' (हम हार गये, पियाजी, तुम जीत गये/अब अपना दिया हुआ वचन सँभालो/पियाजी, मैंने लाल को जन्म दिया।) कदाचित पति ने घर से जाते समय पत्नी को वचन दिया था कि यदि गोरी ने लाल को जन्म दिया तो उसे बड़े-बड़े उपहार मिलेंगे। (देवेंद्र सत्यार्थी, बाजत आवे ढोल, पृष्ठ 12)

बहन पुत्रोत्सव सुनकर नैहर आती है। भाई उसे मुँहमाँगी चीजें देकर खुश करता है। बहन अपने भाई और भाभी के लिए शुभकामना प्रकट करती है और कहती है कि भाभी, तुम दूधों नहाओ, पूतों फलो-'दूधे लहैंहें हे भौजो पुतर बियैहें हे'। (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 82)

पितृसत्तात्मक समाज में जहाँ पुत्र का जन्म उत्सव का कारण बनता है, वहीँ पुत्री के जन्म से घर में विषाद के बादल छा जाते हैं। 'जहे दिन अगे बेटी तोहर$ जनम भेल, धरती उठल हहकार हे।' परिवार के दूसरे सदस्य के बारे में क्या कहा जाय, स्वयं माता-पिता का ह्रदय अपनी संतान के प्रति बदल जाता है। 'सास ननद बेटी मुखहुँ न बोलै, हरिजी के जियरा उदास हे।' ...जौ हमें जानतें धिया जनम लेती, खैते में मरीच पचास हे। मरिच के झांसे झूँसे धिया मरी जैती, छूटी जैत जीब के जंजाल हे।।' (अंगिका संस्कार गीत, पृष्ठ 152) बेटी के जन्म पर परिवार का दुखी होना एक सार्वभौम घटना प्रतीत होता है। पंजाब की पुत्री के जन्म का चित्रण आप यहाँ देख सकते हैं। जिस दिन कन्या ने जन्म लिया सारा परिवार दुखी हो गया, 'जिस दिन बाली बेटी ने जन्म लिया/सोच पई सब परिवारजी/तुसीं क्यों रे बाबल सीस नमाया।' 

बहन किसी योगी के साथ प्रेम कर बैठती है। भाई उसे ऐसा करने से रोकता है। बहन-भाई  का यहाँ जो संवाद है, उससे समाज में लड़की की वास्तविक स्थिति का पता चलता है। बहन कहती है, 'भैया, जो होना था, हो गया। मेरे लिए योगी ही अब सब कुछ है। आपके भाग्य में तो पिता की सारी संपत्ति लिखी हुई है। मेरे भाग्य में भिखारी का भाग्य ही वदा है। हम दोनों के जन्म के साथ ही दो तरह के व्यवहार किये गये। आपके जन्म के समय नार काटने के लिए सोने की छुरी का उपयोग किया गया, लेकिन मेरे जन्म के समय खुरपी काम में लाई गई। 'जहि दिन आहो भैया तोहर जनम छल, भै गेल चाँननी रात हे। हँसुआ खोजैते भैया सोना छूरी भेंटल, ओहि से छिलाय तोहर नार हे। जाहि दिन आहो भैया हमरो जनम छल, भै गेल अन्हारी रात हे। हँसुआ खोजैते भैया पसनी भेंटल, ओहि से अम्मा छिलल नार हे। तोहरा के लिखल भैया बाबा के सम्पतिया, हमरा के जोगिया भिखारी हे।।' (वही, पृष्ठ 134)

दान-दहेज की प्रथा और दुलहा खोजने की परेशानी से ऊबकर पिता का यह कहना कितना मार्मिक है कि विधाता बेटी का जन्म कभी नहीं देना। 'धिया के जलम जनु देहु बिधाता, सेहो देइय बड़ जे संताफ हे।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 149) विवाह के बाद राम सीता को लेकर घर चलते हैं। लड़की पराई हो जाने पर सीता की माँ रोने लगी कि अगर मैं जानती कि बेटी पैदा होगी, तो मैं पहले ही मिर्च खा लेती, जिसकी झांस से यह मर जाती। 'जौ हमें जनितौं माई हे सीता जनमती, खइतौं में मरीच पचास।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 199) रास्ते में राम ने सीता से परिचय पूछा। सीता ने परिचय में कहा-'मैं राजा जनक की बेटी और राजा दशरथ की पतोहू हूँ। कौशल्या मेरी सास हैं तथा श्रीराम मेरे पति हैं।' 'राजा जनक जी के बारी कुमारी, राजा दसरथ के पुतोह हे। आहे रानी कोसिलेआ के अलख दुलरुआ, सामी के नाम सिरी राम हे।।' (वही, पृष्ठ 206)  राम परिचय पाकर 'हँसने' लगे, परंतु सीता मन ही मन दुखी होने लगी कि अब मेरे मायके का खेल, सखी-सहेलियों का साथ तथा मेरी माता की गोद सब कुछ छूट गया। 'कोठियहिं छूटल सुपती मौनियाँ, मड़बहिं सखि सब लोग हे। आहे मंदिरहिं छूटल सुनैना रानी, जिनि कोखि भेल अवतार हे।।' (वही, पृष्ठ 206) 'राम' की खुशी का कारण कहीं यही तो नहीं कि 'सीता' अपनी जड़, अपने अतीत से कट चुकी है! मगही लोक-गाथा में गोपीचंद की माँ उससे कहती है, 'तीन मुल्क भिक्षा मांगना, पर बहन के देश मत जाना। तुम्हारी बहन छह मास रोएगी और प्राण त्याग देगी, क्योंकि तुम्हारे योगी बन जाने से जो उसे नैहर की आशा थी वह भी टूट गयी।' (डॉक्टर एनामुल हक, मगही लोक-गाथाओं का साहित्यिक अनुशीलन, विशाल पब्लिकेशन, प्रथम संस्करण : 2007, पृष्ठ 132) अंततः बहन के दुख से धरती फट गयी और गोपीचंद की बहन वीरम उसी फटी धरती में प्रविष्ट कर गयी। सदा के लिए भाई-बहन-नैहर का नाता टूट गया। (वही, पृष्ठ 133) लेकिन एक स्त्री के मन से नैहर की याद कहाँ जा पाती है। एक संताली विदाई गीत में बेटी अपनी माँ से कहती है-"हे माँ! तुम्हारी टूटी झाड़ू अंगना में है, तुम्हारा गोबर फेंकने की टोकरी गोहाल में है, तुम्हारा पीतल के घड़ा 'गंड़सादी' के ऊपर है, हे मेरी कल्पतरु! मैं तुमको छोड़कर जा रही हूँ।" (झारखण्ड एनसाइक्लोपीडिया, खण्ड 4, पृष्ठ 446) ये तमाम चीजें अब उसकी स्मृति में हैं। उससे कैसे पीछा छूटे?