मोबाइल और नेट क्रांति ने औरतों की दुनिया को असीम विस्तार दिया है। घर की चहारदीवारी में कैद स्त्री अब अपनी सुबह की शुरुआत नेट की खिड़की से झांकती हुई करती है। एक समय था जब घर की खिड़की से औरतों का झांकना और आँगन में औरतों का हंसना भी गुनाह माना जाता था। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने अपने घर की औरतों की दारुण दशा का बयान किया है कि उनकी भौजाई जीरादेई में एक कमरे में रहती थीं। कभी ओसारे में भी निकलने की इजाजत नहीं थी। (आत्मकथा, सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2002, पृष्ठ 46) जब तक राजेंद्र प्रसाद की माँ जीवित रहीं तब तक न तो उनकी भौजाई और न उनकी स्त्री ही कभी अपने कमरे से निकलकर आजादी के साथ आंगन में घूम-फिर सकीं या बैठ सकीं। (पृष्ठ 47)
घोर एकांत के इन क्षणों में स्त्री अगर कउआ और मैना से अपने संबंध जोड़ती है तो क्या आश्चर्य! तब स्त्रियों के हिस्से में चिट्ठियां भी बहुत कम ही पड़ती थीं। भरे-पूरे गांव में कोई-कोई स्त्री ही चिट्ठियां पढ़ना-लिखना जानतीं। इन चिट्ठियों को पढ़ना स्त्रियों का दुःख बांचना था। जिनके घर ये चिट्ठियां तक नदारद होतीं उनके हिस्से का दुःख खपड़ैल छत की मुंडेर पर बैठ कौवे बांच जाते। एक हारी हुई स्त्री को कौवे ही तब ढाढ़स बंधाते। स्त्री को कौवे की पहचान होती कि कौन उसके मायके से है और कौन उसकी ससुराल से। मायके का कउआ देखते ही स्त्री रोटी या किसी पकवान (पक्वान्न) का टुकड़ा हवा में उछाल देती और 'एक स्त्री का दुःख' समझ कउआ उसे निगल जाता, ठीक जैसे शंकर ने हलाहल गटक लिया था। ये कौवे स्त्री जाति के लिए किसी शंकर से कम नहीं थे।
मिथिला वाले इतना मीठा बोलते हैं कि कर्कश काग, कउआ का क्या काम! वहाँ के लोग उन्हें क्रूर मान उनसे नफरत करते हैं। उनकी इस क्रूरता से चाणक्य को भी खासी परेशानी थी इसलिए उन्होंने इसे पक्षियों में चांडाल कहा है। (रामइकबाल सिंह 'राकेश', मैथिली लोकगीत) इस क्रूरता के बावजूद उत्तरी बिहार के एक लोकगीत में एक विरहिणी के अंतस्तल से करुण आवाज आती है-'कागा सब तन खाइयो, चुन चुन खइयो मास,/दो नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस।/कागा नैन निकास दूँ, पिया पास ले जाय,/पहिले दरस दिखाइ कै, पीछे लीजौ खाय।' (रामइकबाल सिंह राकेश, वही) एक मैथिल लोकगीत में विरहिणी ने गाया है, 'रे काग, तू नित्य यही बोल कि मेरे प्रियतम आयेंगे। यदि आज मेरे प्राणनाथ मेरे उर-आँगन में आये तो कनक-कटोरे में खीर और पकवान भरकर मैं तुझे खाने को दूँगी। सोने में तेरी चोंच संवारूंगी, और तेरे चरण मढ़ाऊंगी। आगे कहती है कि मेरी बाईं आँख फड़क रही है और दाईं आँख रोती है। उन्हीं आंखों से तुझे नित्य निहारूँगी, और पहले से भी दूने प्रेम से तेरा प्रतिपाल करूँगी। फिर कहती है, रे काग, तू भगवान श्रीकृष्ण की तरह मन को हरनेवाला है। तेरी बोली अत्यंत मीठी है। आज मेरी सारी अभिलाषाएं पूरी हो गईं।' (रामइकबाल सिह राकेश, वही)
अपभ्रंश साहित्य में एक प्रसंग है कि विरहिणी ग्राम-वधू काक के शकुन पर अब विश्वास नहीं करती। सुनते-सुनते कान पक गए, पर प्रिय का आना नहीं हुआ और यह काग है कि बोलता ही जा रहा है। उसने इस मिथ्याभाषी काग को हाथ उठाकर उड़ाना चाहा। विरह के मारे दुबली हुई कलाइयों से चूड़ी निकलकर पृथ्वी पर गिरी लेकिन कागा की बात ठीक ही थी। अचानक प्रिय दिख गया। आधी चूड़ियां धरती पर गिर गई थीं। पर सहसा प्रियदर्शन से खुशी की लहर दौड़ी, दुबली कलाई फूलकर मोटी हुई, आधी चूड़ियां तड़ाक से टूट बिखरीं-'वायस उडावंतिए पिअ दिट्ठइ सहसत्ति।। अद्धा वलअ महिहिंगअ अद्धा फुट्ट तड़त्ति।।' (हजारी प्रसाद द्विवेदी, मध्यकालीन बोध का स्वरूप, पृष्ठ 117-18 में उद्धृत)
काग और कउआ जीवन के आगामी वृत्तांत बतलाने में भी निपुण माने गये हैं। बाबा तुलसीदास तक ने इस विद्या को पढ़ने की कोशिश की है। 'रामचरितमानस' में वर्णन है कि ननिहाल से अयोध्या लौटने के क्रम में भरत जी जब नगर में प्रवेश करते हैं तो गलत जगह बैठे कौओं का बोलना अपशकुन हो गया-'असगुन होहिं नगर पैठारा।/रटहिं कुभाँति कुखेत करारा।।' (रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, गीता प्रेस, पृष्ठ 431) कागा अगर दाहिनी ओर खेत में शोभायमान हो तो समझिए कि सब मंगल है-'दाहिन काग सुखेत सुहावा'। (वही) ऐसा प्रतीत होता है कि भविष्यवाणी कहने के वांछनीय गुण से प्रेरित होकर ही कुल-ललनाओं ने अपने कोमल हृदय में इन्हें स्थान दिया है। जायसी ने भी अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'पद्मावत' में नागमती के विलाप में काग को स्मरण किया है-'होइ खर बान विरह तनु लागा,/जो पिऊ आवै उड़ै तो कागा।' (रामइकबाल सिंह 'राकेश', मैथिली लोकगीत)
पुरुष के जीवन में न कउआ का मान रहा न स्त्री का। बचपन से सुनता आ रहा हूँ कि 'एक स्त्री के लिए मायके का कउआ तक प्यारा होता है'। एक पत्नी ने अपने मायके के शहर से आनेवाले कवि की तारीफ क्या कर दी कि पति ने उक्त कवि को कउआ ही घोषित कर दिया। कहा, औरत को मायके का कउआ भी अच्छा लगता है। स्त्री से संबंधित हर चीज पुरुष की नजर में ओछी है चाहे वह कउआ हो या मायका।
किसी औरत को बहुत दिनों पर कहीं कोई नैहर की स्त्री, कोई सखी या कोई रिश्ते की औरत मिल जाय, तो वह जार-बेजार रोने लगेगी। यह उनके आदर-सत्कार का ढंग है। न रोए तो शिकायत हो। अगर कोई लड़की नैहर के किसी व्यक्ति को देखकर न रोए, तो मतलब यह हुआ कि ससुराल में वह खूब सुखी है-औरत के लिए यह एक बड़ी शर्मनाक बात है। (विभूतिभूषण वंद्योपाध्याय, आरण्यक (हिंदी अनुवाद : हंसकुमार तिवारी), साहित्य अकादमी, दिल्ली, 1957, पृष्ठ 66) स्त्री के लिए सुखी दिखना भी गुनाह है। दुख ही जीवन की कथा रही...।
परभुजी के मैया हे बेदरदी......
बचपन से पढ़ता-सुनता आ रहा हूँ कि गौतम बुद्ध का जन्म कपिलवस्तु के लुम्बिनी वन में हुआ था, किन्तु कभी ठहरकर विचार नहीं कर सका कि बुद्ध का जन्म आखिर वन में क्यों हुआ? आज सासुमाता से बात करते अचानक ध्यान आया कि गर्भावस्था में स्त्रियों का मायके जाना हमारी परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहा है। गौतम की माता की मायके जानेवाली बात मैंने पढ़ रखी थी। बौद्ध ग्रंथों में जिक्र है कि गर्भ धारण किए जब दस मास होने को आए तो रानी महामाया ने अपने मायके जाने की इच्छा प्रकट की। राजा की अनुमति मिलने पर देवी महामाया मायके जाने की सुखद कल्पना से अत्यंत प्रसन्न हो गईं। देवी ने मंगल वेला/शुभ मुहूर्त में राज कुलोत्पन्न मनोज्ञ सुंदरियों, कुलांगनाओं और देवस्वरूप राजपुरुषों के साथ राजकीय शोभा के बीच देवदह के लिए प्रस्थान किया। देवदह और कपिलवस्तु के बीच लुम्बिनी की भूमि थी। इस भूमि पर देवदह और कपिलवस्तु दोनों ओर के लोगों की समान ममता थी। यहां पहुंचते ही देवी को अकस्मात प्रसव वेदना हुई। देवी का संकेत पाकर लोगों ने वहां की भूमि को वस्त्र वितान से घेर दिया। तभी बच्चे ने माता के गर्भ का त्याग किया।
स्त्रियों की आदिम इच्छा है कि प्रसव के दौरान वह और कहीं नहीं, बस अपने मायके में हो। उस्की यह चाह उनके द्वारा रचित गीतों में भी अभिव्यक्त हुई है। एक गर्भवती स्त्री पतिगृह आने से दुखी है। सोचती है कि शादी के बाद भी अगर अपनी माँ के घर रहती, तो मेरे दुख को मेरी मां अपने अथक परिश्रम और सेवा-शुश्रूषा से कम कर देती, जबकि उसे अपनी सास के व्यवहार से दुःख है : "अपन मैया रहतिऐ, दरदियो हरी लेतिऐ हो लाल। परभुजी के मैया हे बेदरदी, दरदो नहीं हरी लिय हो लाल।।"
ससुराल गेंदाफूल
स्त्रियों का इतिहास केवल कविता, कहानी और गीत को आधार बनाकर लिखा जाना असंभव है। पहले, महिलाएं अपने मायके से रोजमर्रा की चीजें यथा शीतलपाटी, रुमाल, तकिया का खोल आदि बना-बनवाकर लाती रही हैं। उन पर कभी चित्र बने होते थे तो कभी शब्द। इनमें सिर्फ कला नहीं थी, मन का दर्द भी था। एक-एक शब्द अपने में इतिहास लपेटे होता। तब लड़कियां तकिए के खोल पर मायके के लिए 'आजादघर' लिखतीं और ससुराल के लिए 'जेलघर'। पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' ने अपनी कहानी 'आँखों में आँसू' में जैसाकि लिखा है, "पिता के घर 'सोलह वर्षों' तक लड़की की तरह रहने के अभ्यास के आगे ससुर के घर 'पतोहू' की तरह रहने का अभ्यास कारावास मालूम पड़ने लगा। जेल तो, सुना है, इतना बुरा नहीं होता। फिर, वहाँ के जीवन की अवधि होती है-साल, दो साल, दस साल। पतोहू का जेल-उफ़! उसकी कड़ी सजा की कोई अवधि नहीं।" (पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र', आँखों में आँसू', श्रेष्ठ रचनाएँ-1, पृष्ठ 75)
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