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Wednesday, September 9, 2026

वह श्रद्धा कहाँ से लाऊँ कॉमरेड?

सन 84 में मैं पटना आया और बी. एन. कॉलेज में दाखिला लेकर पढ़ने लगा। पटना तब सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था। अपने अग्रज मित्रों से और शहर की दीवारों पर लिखी इबारत से पटना में काम कर रहे छात्र संगठनों का एक मोटा मोटी अंदाजा हो चुका था। बड़े भाई के आत्मीय मित्र और कथाकार हंसकुमार पांडेय जी की साहित्यिक चर्चाओं से यह मालूम हो चुका था कि पटना में प्रगतिशील लेखक संघ के नाम से लेखकों का एक संगठन भी है। नाम के अलावा इस लेखक संगठन के बारे में कुछ न जानता था।

हंसकुमार पांडेय की प्रगतिशील लेखक संघ वाली इन चर्चाओं में नंदकिशोर नवल, अरुण कमल, तरुण कुमार और अपूर्वानंद हमेशा मौजूद रहते। हाँ, खगेन्द्र ठाकुर का नाम मैंने तब तक न सुना था। वे पांडेय जी की चर्चाओं में शायद ही कभी आए हों। खगेन्द्र जी का नाम मैंने 87-88 में सुना जब 'जनशक्ति' दैनिक में लिखना शुरू किया। लेकिन तब भी केवल नाम ही सुना था, मिला न था। नवल जी से हुई एक प्यारी मुठभेड़ के बाद ही खगेन्द्र जी से मिलने की चाह बढ़ी। वर्ष 89 में नंदकिशोर नवल 'जनशक्ति' में वातायन कॉलम में साहित्यिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर नियमित लिख रहे थे। नवल जी से कुछ बिंदुओं पर तनिक असहमत होते हुए 'आलोचना की राजनीति' शीर्षक से मैंने भी एक लेख लिखा जो 'वातायन पर दस्तक' के तहत प्रकाशित हुआ। नवल जी को मेरे इस लेख से कम, मुझे इस तरह महत्त्व देकर छापे जाने से अधिक पीड़ा पहुंची थी। इसका नतीजा हुआ कि नवल जी ने 'जनशक्ति' में लिखना बंद कर दिया। शायद हमेशा के लिए। उन्हें यह विश्वास था कि मैं खगेन्द्र ठाकुर के पाले का आदमी था। कुछ दिनों बाद की एक मुलाकात में उन्होंने खगेन्द्र ठाकुर के साथ मेरे संबंधों के बारे में पूछा भी था और तब मैंने यही कहा था कि इस लेख के लिखने तक आपसे और खगेन्द्र ठाकुर से बराबर का अपरिचय रहा है। सच है कि खगेन्द्र ठाकुर से मेरी पहली मुलाकात सन 91 में सायन्स कॉलेज में हुई थी। संभवतः प्रेमचंद की जयंती का अवसर था, और जहाँ तक याद है, उपस्थित लोगों में खगेन्द्र ठाकुर के अलावा अरुण कमल, गोपेश्वर सिंह, कुमार मुकुल, दीपक कुमार गुप्ता तथा अमरेंद्र कुमार आदि थे।

धारा-विवाद और खगेन्द्र ठाकुर

कभी पटना प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से 'धारा' नाम से एक बुलेटिन जारी हुई थी जिसमें अपूर्वानंद जी का चर्चित और विवादास्पद लेख 'नागार्जुन की राजनीति' छापा गया था। कहने की जरुरत नहीं कि इस लेख में नागार्जुन को सोवियत-विरोधी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विरोधी साबित किया गया था। बौद्धिक जगत में इस लेख को लेकर काफी प्रतिक्रिया हुई थी। 

यह लेख 1985 में आया था। खगेन्द्र ठाकुर ने उसके लेखक और भूमिका-लेखक (बाद में ससुर-दामाद) दोनों को निजी तौर पर बता दिया था कि यह लेख उचित नहीं है। बिहार प्रगतिशील लेखक संघ ने भी अपने को उससे अलग बताया। इस विवाद में भीष्म साहनी जी ने एक पत्र लिखा और स्पष्ट कहा कि 'लेखक को लिखने की आजादी है, लेकिन उसे प्रगतिशील लेखक संघ से नहीं छापना चाहिए था।' (खगेन्द्र ठाकुर, प्रगतिशील आंदोलन के इतिहास-पुरुष, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ 92)

उसके कुछ दिनों के बाद जमशेदपुर में प्रगतिशील लेखक संघ का राज्य सम्मेलन हुआ। नामवर जी उद्घाटन करने पहुंचे थे। जब नामवर जी जमशेदपुर पहुँच गये, तो उनसे मिलने खगेन्द्र ठाकुर होटल में गये। मिलते ही उन्होंने पूछा, 'खगेन जी यह सब क्या हो रहा है?' खगेन्द्र जी ने पहले समझा नहीं, इसलिए पूछा, क्या हो रहा है? अरे यह 'नागार्जुन की राजनीति' का मामला! "ओह, वह, मैंने भी छपने पर उसे देखा और पढ़ा।" "ऐसा है?" खगेन्द्र जी ने कहा, "जी हां"। वे बोले, "समझ गया"। नामवर जी को अध्यक्षीय भाषण करना था। उन्होंने समकालीन कविता और उसके मूल्यांकन की समस्या पर बोलते हुए उग्र स्वर में कहा, "आज नागार्जुन की राजनीति पर संदेह किया जा रहा है, उन पर प्रश्न उठाया जा रहा है। मुझे भी कुछ लोगों ने पिछले बीस-पच्चीस वर्षों से संशोधनवादी घोषित कर रखा है। लेकिन मैं जो काम तब कर रहा था, वही आज भी कर रहा हूँ। कुछ लोग लगे हैं प्रगतिशील लेखक संघ को झाड़ू से बुहारकर साफ कर देने को, गोया यह लेखक संघ न हुआ मेहतरों का संघ हो गया। ...हमारे बीच कुछ लोग हैं जिनके हाथ में खून की प्यासी तलवार है, उन्हें जब दुश्मन नहीं मिलता तो अपने घर में ही तलवार भांजने लगते हैं।" (देखें, खगेन्द्र ठाकुर, प्रगतिशील आंदोलन के इतिहास-पुरुष, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ 116-17)

कठिन है भगवतशरण पर लिख पाना

डा. खगेन्द्र ठाकुर की इस स्वीकारोक्ति से कि ‘भगवतशरण उपाध्याय पर लिख पाना एक कठिन काम है’, अधिकतर विद्वान सहमत होंगे। हालांकि खगेन्द जी के लिए, ‘यह आश्चर्यजनक है कि जिस भगवतशरण उपाध्याय ने इतना विशाल साहित्य रचा, उनके बारे में प्रायः नहीं लिखा गया है’, किंतु मेरे लिए इसमें आश्चर्य करने जैसी कोई बात नहीं है। दरअसल, उपाध्याय जी का ‘विशाल साहित्य’ ही उन पर लिखे जाने में बाधा उपस्थित करता है। आज के उत्तर-आधुनिक समय में सब कुछ पढ़ने और विशाल साहित्य रचने को प्रतिभा नहीं माना जाता। इस विशेषीकरण के दौर में ऐसे विद्वानों के लिए कोई ‘खाना’ नहीं बना होता जिसमें उन्हें डालकर ‘खपाया’ जा सके। आज के समय का पहला सवाल होता है कि आप साहित्यकार हैं, इतिहासकार हैं अथवा कोई समाजशास्त्री हैं। अगर आपका ज्ञान इस तरह के खानों में बंटा है तब तो ठीक वरना ‘अनुपयोगी’ और ‘अप्रासंगिक’ हैं। आज के पाठक सुकरात, चाणक्य या मार्क्स के जमाने के ‘पिछड़े’ दिमागवाले नहीं हैं कि आप अपना सारा ज्ञान उन्हीं के सम्मुख झाड़ दें। अगर आप ‘हिन्दी साहित्य’ के विद्यार्थी हैं और अगर संस्कृत एवं अंग्रेजी के लेखकों को पढ़ लिया तो माफी मांगनी पड़ सकती है। खगेन्द्र ठाकुर ने ‘साहित्य अकादमी’ के लिए भगवतशरण उपाध्याय पर विनिबंध लिखकर निश्चय ही परंपरा की लीक छोड़ी है। शायद दूसरे ‘धर्मभ्रष्टों’ को भी इससे बल मिले।

लेखक ने इस छोटी-सी पुस्तिका (वैसे पुस्तिका छोटी ही होती है!) में भगवतशरण उपाध्याय के विशाल साहित्य को भरसक समेटने की कोशिश की है। मूल्यांकन बहुत ही यथार्थपरक और आलोचकीय दृष्टि से संपन्न है। उपाध्याय जी की जीवनी से लेकर इतिहास, संस्कृति एवं आलोचना के प्रतिमान तक पर रोशनी डाली गई है। यहां तक कि संस्कृत साहित्य में उपाध्याय जी का जो अवदान है, उसकी भी समीक्षा उन्होंने प्रस्तुत की है। कुछ स्थापनाओं को, स्थानाभाव की वजह से छोड़ देना पड़ा होगा। विशेषकर भाषा विज्ञान का क्षेत्र-जिसमें गंभीर काम के लिए रामविलास शर्मा पढ़े और जाने जाते हैं, उपाध्याय जी कई सूत्र छोड़ गए हैं। डा. रामविलास शर्मा को पढ़ते हुए दृष्टि अगर उपाध्याय जी तक फैलाई जाए तो हिन्दी में भाषा-विज्ञान के विकास को समझने में आसानी हो सकती है। खासकर, भाषा-विज्ञान में मार्क्सवाद की जो भूमिका है, उसे पहचानने तथा रेखांकित करने में सहूलियत हो सकती है। संस्कृत और प्राकृत की जो बहस है उसमें उपाध्याय जी पूरी प्रामाणिकता के साथ प्राकृत को मूल भाषा सिद्ध करते हैं और संस्कृत को उसका ‘विकसित’ रूप मानते हैं

समाज विज्ञान और विशेषकर इतिहास लेखन के क्षेत्र में ‘नीचे से इतिहास’ (हिस्ट्री फ्रॉम बिलो) का जो राग अलापा जाता है, खगेन्द्र ठाकुर ने ठीक ही उसका श्रेय उपाध्याय जी को दिया है। फर्क सिर्फ इतना है कि इतिहासकार स्थितियों का चित्रण कर अपना दायित्व पूरा हुआ मान बैठता है जबकि उपाध्याय जी आज के शोषितों, पीड़ितों एवं दलितों और वंचितों को नया जीवन पाने के लिए संघर्ष करने की चेतना भी देते हैं। इस तरह इतिहास के अध्ययन और साहित्य के लेखन की प्रक्रिया में मानवीय संवेदना को केन्द्र में रखना उपाध्याय जी की विशिष्टता है।

उपाध्याय जी की तरह खगेन्द्र ठाकुर की द्वन्द्वात्मक इतिहास दृष्टि कहीं-कहीं मलिन हो जाती है। एक जगह वे लिखते हैं ‘मनुष्य अतीत का पुनर्निर्माण नहीं कर सकता है।’ सच्चाई यह है कि इतिहास दृष्टि में बदलाव के साथ-साथ अतीत के बारे में हमारी धारणाएं भी बदलती हैं और प्रत्येक बार एक दूसरा ही अतीत हमारी आंखों के सामने जीवित होता रहा। अतीत लगातार बदलता रहा, क्योंकि बदले हुए वर्तमान के उद्येश्य दूसरे थे, बिल्कुल नये प्रयोजन थे। खगेन्द्र जी की सम्प्रदायिकता संबंधी समझ भी उलझी हुई थी। बहुत हाल तक वे मानते रहे थे कि 'सांप्रदायिकता, आधुनिक युग की नहीं मध्यकाल की चीज है।' (आलोचना -59)। दरअसल, राष्ट्रीयता एवं सांप्रदायिकता दोनों ही आधुनिक भारत की उपज हैं। इस तरह की गलती का मूल कारण है कि लोग सांप्रदायिकता एवं सांप्रदायिक तनाव दोनों को एक ही चीज मान बैठते हैं। सांप्रदायिकता औपनिवेशिक भारत की देन है जबकि सांप्रदायिक तनाव अथवा संघर्ष मध्य युग में भी था। (डा. अखिलेश कुमार, कम्युनल रॉयट्स इन मॉडर्न इंडिया)।

लेख की चोरी और खगेन्द्र ठाकुर

मैं अक्सर कहता कि स्वातंत्र्योत्तर बिहार में 'ठाकुर' दो ही हुए-विजय कुमार ठाकुर और खगेन्द्र ठाकुर बाकी के सब 'ठक्कुर' हैं. इन दोनों के घर एक नियमित अंतराल पर जाता रहता। इनके प्रति श्रद्धा खींच ले जाती लेकिन दुखद कि इधर कई सालों से जाना बंद हो गया था। दरअसल घटना हुई कि ब्रजकुमार पांडेय ने मेरे एक लेख की चोरी की। 11 फरवरी, 2013 को मैंने फेसबुक पर लिखा, "क्या ही दुखद है कि मुझे अपने पूर्व प्रकाशित लेख 'बुद्ध और स्त्री विमर्श' को सी.पी.आई. का साप्ताहिक पत्र 'जनशक्ति', पटना (10-16 फरवरी, 2013) के अंक में प्रगतिशील लेखक संघ, पटना के एक शीर्ष पदाधिकारी के नाम से हू-ब-हू पढ़ना पड़ रहा है ! लेखक हैं ब्रजकुमार पाण्डेय. वे इस कुकृत्य के लिए सार्वजानिक रूप से लिखित माफ़ी मांगे अन्यथा मैं क़ानूनी नोटिस भेजने की तैयारी में हूँ."

16 अप्रैल, 2015 को मैंने पुनः फेसबुक पर लिखा : "बीते साल मैंने लिखा था कि 'प्रगतिशील लेखक संघ' के एक पदाधिकारी ब्रजकुमार पाण्डेय ने मेरे लेख 'बुद्ध का स्त्री विमर्श' को अपने नाम से छपा लेने का अपराध किया है. 'प्रगतिशीलता' के कुछ दलालों ने मेरे इस वक्तव्य का यह कहते हुए विरोध किया था कि ब्रजकुमार पाण्डेय का प्रगतिशील लेखक संघ से कुछ भी लेना-देना नहीं है. कल के अख़बार में पढ़ा कि उक्त ब्रजकुमार पाण्डेय को प्रगतिशील लेखक संघ, पटना का अध्यक्ष बनाया गया है. अगर यह खबर सही है, तो प्रगतिशील लेखक संघ ने एक वैसे लेखक को, जिस पर लेख-चोरी का आरोप है, दण्डित करने की बजाय सम्मानित करने का पाप किया है. इस सांगठनिक-अपराध से मुझे गहरी पीड़ा पहुंची है. इसलिए  प्रगतिशील लेखक संघ से मेरी मांग है कि वह अध्यक्ष को अविलम्ब बर्खाश्त करे और इस अपराध के लिए सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगे." जब किसी प्रत्युत्तर की आशा खत्म हुई तो मैंने सीधे प्रगतिशील लेखक संघ ही को मेल करना मुनासिब समझा और पूछा "प्रगतिशील लेखक संघ चुप क्यों है ?"

"ब्रजकुमार पाण्डेय पर लेख-चोरी का आरोप  

Add star  Dr Raju Ranjan prasad<rajooranjan@gmail.com> Mon, Apr 20, 2015 at 7:50 AM

To: biharpwa@gmail.com

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महाशय,

बीते साल मैंने अपने फेसबुक स्टेटस में लिखा था कि 'प्रगतिशील लेखक संघ' के एक पदाधिकारी ब्रजकुमार पाण्डेय ने मेरे लेख 'बुद्ध का स्त्री विमर्श' को अपने नाम से छपा लेने का अपराध किया है तो 'प्रगतिशीलता' के कुछ दलालों ने मेरे इस वक्तव्य का यह कहते हुए विरोध किया था कि ब्रजकुमार पाण्डेय का प्रगतिशील लेखक संघ से कुछ भी लेना-देना नहीं है. दो-तीन दिन पहले

अख़बार (प्रभात खबर) में पढ़ा कि उक्त ब्रजकुमार पाण्डेय को बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का अध्यक्ष बनाया गया है. अगर यह खबर सही है, तो प्रगतिशील लेखक संघ ने एक वैसे लेखक को, जिस पर लेख-चोरी का आरोप है, दण्डित करने की बजाय सम्मानित करने का पाप किया है. इस सांगठनिक-अपराध से मुझे गहरी पीड़ा पहुंची है. इसलिए प्रगतिशील लेखक संघ से मेरी मांग है कि वह अध्यक्ष को अविलम्ब बर्खाश्त करे और इस अपराध के लिए सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगे.

उत्तर की आशा में,

राजू रंजन प्रसाद"

मुझे विश्वास था कि कोई कुछ बोले या न बोले किन्तु खगेन्द्र ठाकुर मामले को अवश्य नोटिस में लेंगे लेकिन जब एक दिन अखबार में पढ़ने को मिला कि चोर को दंडित करने की बजाय पुरस्कृत किया गया और श्रीमान ठाकुर ने कोई स्टैंड तो नहीं ही लिया उल्टे चोर को बचाने में रुचि दिखाई तो निराशा तो हुई ही साथ ही उस नाम के साथ जो श्रद्धा जुड़ी थी वह खत्म हो गई। इस प्रसंग के बाद मैंने उनके घर जाना बंद कर दिया। बीच-बीच में मेरे ससुर जी की गोष्ठियों में उनसे मुलाकात होती तो मेरी खोज करते किन्तु अफसोस कि पुरानी श्रद्धा को पुनः जीवित नहीं कर सका। पहलेवाली वह श्रद्धा कहाँ से लाऊँ, कामरेड?