वैसे तो तिलक कांग्रेस के गरमदली नेता थे लेकिन वे मॉडरेट नेताओं के बीच भी समादृत थे। उनके प्रशंसकों में मोतीलाल नेहरू तक थे। गांधी पर रानाडे-गोखले और तिलक का असर था। कहा जाता है कि गांधी के राजनीतिक गुरु गोखले थे तो साहित्यिक गुरु तिलक। प्रेमचंद ने भी राष्ट्रवाद की दीक्षा गोखले से पहले तिलक ही से ली। गाँधी पर तिलक के 'गीता-रहस्य' का प्रभाव अलक्षित नहीं है। तिलक के 'हिन्दू प्रतीक' भी गांधी के यहाँ हैं।
मोतीलाल नेहरू पर तिलक के प्रभाव को स्वीकार करते हुए जवाहरलाल नेहरू लिखते हैं, '1907 और 1908 में और कुछ साल बाद तक वह बेशक माडरेटों में भी माडरेट थे और गरम दल के सख्त ख़िलाफ़ थे, हालाँकि मेरा ख़याल है कि वह तिलक की तारीफ करते थे।' (मेरी कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, पृष्ठ 47) तिलक के प्रशंसकों में प्रेमचंद जैसे लेखक भी थे।
बाल विवाह को रोकने के लिए जब एज ऑफ कंसेंट बिल आया, 1891 के आसपास, तो तिलक ने डटकर उसका विरोध किया। इसकी वजह से लोगों को उनके बारे में काफी 'गलतफहमी' भी हुई और यह समझा गया कि समाज-सुधार के मामले में तिलक का दृष्टिकोण कट्टर सनातनी हिन्दू का है। लेकिन बात यह न थी। उनके विरोध का कारण यह न था कि वह बाल-विधवा के पोषक थे बल्कि यह था कि यह सब काम खुद हम भारतीयों के करने के हैं, अंग्रेज शासकों को इस सब से क्या मतलब। (अमृतराय, प्रेमचंद : कलम का सिपाही, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 1976, पृष्ठ 79)
साप्ताहिक पत्र 'केसरी' के संपादक बाल गंगाधर तिलक को लोग जितना उनकी विद्वता के कारण जानते हैं उससे अधिक उनको उनके 'दुर्भाग्य' के कारण जानते हैं। जब 'केसरी' का जन्म हुआ था, तभी एक मान-हानि के मुकदमे में फँसने से उनको कई महीने कारागार-वास करना पड़ा था। 1897 ईस्वी में 'शिवाजी के उद्गार' शीर्षक कविता प्रकाशित करने पर उनके ऊपर जो आपत्ति आई उससे उनका नाम प्रायः सारे भारतवर्ष में ही नहीं, किन्तु विलायत तक में हुआ। इस आपत्ति में कुछ अंश से उद्धार पाने में तिलक जी की विद्वता ही सहायक हुई। (महावीर प्रसाद द्विवेदी, अतीत स्मृति, लीडर प्रेस, प्रयाग, 1930, पृष्ठ 33)
बीसवीं सदी के प्रथम दशक में लोकमान्य तिलक की राजनीतिक कार्यवाही का मूल्यांकन सरदार भगतसिंह ने इस प्रकार किया था : '1906 के कांग्रेस अधिवेशन में लोकमान्य तिलक का बोलबाला था। नवयुवक समुदाय उनकी खरी और स्पष्ट बातों के कारण उनका भक्त बन गया था। उनकी निर्भीकता, कुछ कर गुजरने की भावना और बड़े से बड़े कष्ट सहने के लिए हर क्षण तैयार रहने के कारण नवयुवक उनकी ओर खिंचे चले आ रहे थे। कांग्रेस अधिवेशन के अतिरिक्त कांग्रेस के पंडाल के बाहर भी लोकमान्य के अनेक भाषण इस अवसर पर हुए थे। (जगमोहन सिंह और चमनलाल, भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज, नयी दिल्ली, 1986, पृष्ठ 151; रामविलास शर्मा, स्वाधीनता संग्राम : बदलते परिप्रेक्ष्य, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, 1992, पृष्ठ 95)
जो नवयुवक तिलक की ओर खिंचे चले आ रहे थे, उनमें हिंदी कवि और राजनीतिक कार्यकर्ता माखनलाल चतुर्वेदी भी थे। तिलक जो क्रांतिचेता नवयुवकों के लिए आकर्षण के जबरदस्त केंद्र बने थे, उसका सशक्त वर्णन माखनलाल चतुर्वेदी ने एक कविता में किया है : 'तेरी हुंकारों का फल था, अगणित वीरों ने प्राण दिया,/राष्ट्रीय शक्ति ने तुझ से ही अमृतसर में था त्राण लिया।/तुझको अब कष्ट नहीं देंगे, हाथों में झंडा ले लेंगे,/मांडले के क्या, शूली के कष्टों को सादर झेलेंगे/इंग्लैंड नहीं नभमंडल में हम तेरे हैं, हो आवेंगे,/तूने नरसिंह बनाए हैं, अपना तिलकत्व दिखावेंगे।' (माखनलाल चतुर्वेदी रचनावली, खंड 6, दिल्ली, पृष्ठ 67; रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत)
वे युवाओं पर खास नजर और सहानुभूति रखते थे। खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल चाकी द्वारा मुजफ्फरपुर में किये गये बमप्रहार पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने मराठी 'केसरी' में लिखा, 'भारत के पूर्वी क्षितिज-मुजफ्फरपुर में स्वाधीनता का सूरज उदित हो चुका। उसे कोई बड़ी से बड़ी शक्ति रोक नहीं सकती। उनकी इस प्रतिक्रिया पर उन्हें छः वर्षों के कारावास की सजा मांडले जेल में भोगनी पड़ी। (के. के. दत्त, बिहार के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास, भाग 1, पृष्ठ 121)
यह वह समय था जब लोग लिखते हुए डरते थे कि इसे पढ़कर तिलक की क्या प्रतिक्रिया होगी। पद्मसिंह शर्मा ने द्विवेदी जी के नाम अपने पत्र में लिखा कि हाल की 'सरस्वती' में 'सभा' की 'सभ्यता' पढ़कर दुख हुआ, कांग्रेस के मौके पर आर. सी. दत्त, मिस्टर तिलक आदि महोदय नागरी प्रचारिणी सभा के भवन में एकत्र हुए थे, वे भले आदमी सभा की करतूत प्रकाश हो जाने पर अपने दिल में क्या कहेंगे। (द्विवेदी युग के साहित्यकारों के कुछ पत्र, पृष्ठ 137)
प्रसिद्ध नेता डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुंजे ने 13 अप्रैल, 1907 में 'हिंदी केसरी' पत्र को नागपुर से निकाला था। इसमें लोकमान्य तिलक के प्रसिद्ध पत्र 'केसरी' का अनुवाद होता था। इसके संपादक माधवराव सप्रे थे तथा सहायता के लिए जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल और पंडित लक्ष्मी वाजपेयी थे। यद्यपि इसके लेख कम से कम एक सप्ताह पुराने होते थे, फिर भी हिंदीसेवी इसे बड़े चाव से पढ़ते थे। यही नहीं यह हिंदी प्रान्तों में राजनीति की गीता के समान उत्सुकता तथा आदर से पढ़ा जाता था। इस पत्र ने विशेषतः उत्तर भारत के नवयुवकों में ओजस्वी देशभक्ति को जागृत करने का साहसपूर्ण कार्य किया था। कुछ दिनों में यह कई हजारों की संख्या में प्रकाशित होने लगा। उस समय गरम दल का यही प्रामाणिक पत्र था। परंतु यह अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सका क्योंकि सरकार की दमन नीति और भारतमाता और कालापानी इन दो संपादकीय टिप्पणियों के प्रकाशित होते ही 23 अगस्त 1908 में इसके संपादक सप्रे को राजद्रोह के अपराध में पकड़ लिया फलतः 1909 में यह पत्र बन्द हो गया। (डॉ. सुशीला जोशी, हिन्दी पत्रकारिता : विकास और विविध आयाम, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, द्वितीय संस्करण : 1991, पृष्ठ 37)
19 दिसंबर, 1919 को दिल्ली में स्थापित 'राजपूताना मध्यभारत सभा' की ओर से सन 1920 में वर्धा से विजय सिंह पथिक के संपादन में बाल गंगाधर तिलक के मराठा 'केसरी' के सहयात्री/सहधर्मी के रूप में 'राजस्थान केसरी' नामक पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ। (एस. एल. राठौड़, पॉलिटिकल एन्ड कॉन्स्टिट्यूशनल डेवलपमेंट इन दि प्रिंसली स्टेट्स ऑफ राजस्थान, पृष्ठ 40; डॉ. मनोहर प्रभाकर, राजस्थान में हिन्दी पत्रकारिता, पंचशील प्रकाशन, जयपुर, 1981, पृष्ठ 73) यह पत्र राजस्थान और मध्यभारत की जनता के अभाव-अभियोगों, उनकी पीड़ाओ और दमन की कथाओं को मुखर करने लगा। श्री अर्जुनलाल सेठी, केसरी सिंह बारहठ और विजय सिंह पथिक की त्रिमूर्ति इस पत्र को संघर्षों के बीच निरंतर प्राण-वायु प्रदान करती रही। श्री रामनारायण चौधरी इस पत्र के प्रकाशक और सहायक संपादक थे। ठाकुर केसरीसिंह बारहट के जामाता श्री ईश्वरीदान आसिया और सागरमल गोपा भी इस पत्र के संपादन से सम्बद्ध थे। पहले यह पत्र वर्धा से और बाद में अजमेर से निकलने लगा। (श्रमजीवी पत्रकार संघ परिचय पुस्तिका, पृष्ठ 61) पत्र की निर्भीक वाणी से घबड़ाकर ब्रिटिश सरकार और रियासती राजाओं ने अपना दमनचक्र आरम्भ कर दिया। श्री रामनारायण चौधरी को मानहानि के एक मुकदमे में तीन माह की सजा भुगतनी पड़ी। (नवज्योति दैनिक, 14 अगस्त, 1972, पृष्ठ 4) परिणामस्वरूप यह तेजस्वी पत्र स्वल्प किन्तु सार्थक जीवन बिताकर समाप्त हो गया।
27 जुलाई, 1924 को तिलक की मूर्ति का अनावरण करते हुए मोतीलाल नेहरू ने जो भाषण किया था उसका एक अंश देखें : "many and various are the glowing tributes paid to the great work of our hero by the ablest writers and speakers of the day. My contribution can be but poor. But I crave your indulgence to put before you a few thoughts on the lesson of his great life as I read it. I shall not detain you at any length over his early career or even the later achievements of his versatile genius which distinguished him as a great scholar, a vigorous writer, and a clear thinker. The Orion, the Arctic Home and the Gita Rahasya, monuments of scholarship and original thinking as they are, have been aptly described by Babu Aurobindo Ghosh as merely the by-products of the great genius of Tilak. For as he observes that these works were produced "in periods of compulsary cessation from his life-work, planned and partly, if not wholly, executed during the imprisonments which could alone enforce leisure upon this unresting worker for his country." (Selected Works of Motilal Nehru, Vol. 4, p 225.)
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