अनुवाद एक अत्यंत कठिन दायित्व है। रचनाकार किसी एक भाषा में सर्जना करता है, जबकि अनुवादक को एक ही समय में दो भिन्न भाषा और परिवेश/वातावरण को साधना होता है। परिवेश और वातावरण पर बल देते हुए राधाकृष्णन ने गीता के अनुवाद के बहाने कहा था-‘गीता के किसी भी अनुवाद में वह प्रभाव और चारुता नहीं आ सकती, जो मूल में है। इसका माधुर्य और शब्दों का जादू किसी भी अन्य माध्यम में ज्यों का त्यों ला पाना बहुत कठिन है। अनुवादक का यत्न विचार को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करने का रहता है, परन्तु वह शब्दों की आत्मा को पूरी तरह सामने नहीं ला सकता। वह पाठक में उन मनोभावों को नहीं जगा सकता, जिनमें कि वह विचार उत्पन्न हुआ था।’ (राधाकृष्णन, भगवद्गीता (हिंदी), राजपाल एंड संस, 'भूमिका', पृष्ठ 8)
एक अनुवादक के लिए स्थानीय संस्कृति, परिवेश और वातावरण का ज्ञान आवश्यक है। बात 1920 के आसपास की है, जब ‘ललाट में लाल चंदन का टीका लगाए हुए भारतीय महिला की फोटो देखकर एक अमेरिकन स्त्री ने कहा था कि यह इसके पति द्वारा मारी हुई ईंट के कारण निकला हुआ रुधिर-चिह्न है।’ (गणेशशंकर विद्यार्थी रचनावली : एक, पृष्ठ 187) महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भी एक रोचक तथ्य की ओर ध्यान दिलाया है। एक बार कलकत्ते के किसी अखबार में एक खबर छपी थी कि उसी तरफ किसी जिले के अंगरेज मजिस्ट्रेट अपने इजलास में बैठे हुए एक मुकद्दमा सुन रहे थे। उस समय मुकद्दमे वालों में से किसी ने कहा कि ‘‘इस जमीन पर चिर दिन (बहुत रोज) से कब्जा है’’। साहब ने समझा कि 'चिर दिन' किसी आदमी का नाम है। इससे आपने 'चिर दिन' के हाजिर होने का हुक्म दे दिया! (महावीरप्रसाद द्विवेदी, सहित्यालाप, खड्गविलास प्रेस, पटना, 1929, पृष्ठ 166)
यद्यपि किस्सा है, लेकिन रोचक एवं सारगर्भित है। कहानी है कि कई साल पहले एक इतिहासकार वीर कुंवर सिंह पर शोध के सिलसिले में भारत आये थे। उन्होंने एक फाइल में burhi शब्द लिखा देखा जिस पर कुंवर सिंह ने कभी एक लाख रुपये खर्च किये थे। उक्त इतिहासकार ने लिखा कि वीर कुंवर सिंह की एक बूढ़ी हो चली रखैल थी जिस पर उन्होंने रुपये खर्च किये थे। एक जमींदार के बारे में ऐसा निष्कर्ष निकालना तनिक स्वाभाविक और सुविधाजनक भी था। कुछ दिनों बाद उसी फाइल को एक बिहारी इतिहासकार ने देखा और burhi को ‘बरही’ पढ़ा। लिखा कि कुंवर सिंह ने पोते की ‘बरही’ पर लाख रुपये खर्च किये थे। 'जालहंस की सुभाषित मुक्तावली’ में चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने एक भारतीय विद्वान की खोज पर व्यंग्य किया है। उक्त विद्वान ने अंग्रेजी माध्यम से अर्जित संस्कृत ज्ञान की वजह से जल्हण को जालहंस बना दिया था। दरअसल उसने रोमन लिपि में लिखे Jalhan's को 'जालहंस' पढ़ लिया। (मस्तराम कपूर, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, साहित्य अकादेमी, द्वितीय संस्करण ; 1993, पृष्ठ 52)
रवींद्रनाथ ठाकुर ने एक बार पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी से कहा था : ‘हिन्दी मैं पढ़ लेता हूँ, सामान्यतः उसका अर्थ भी समझ लेता हूँ, किन्तु शब्दों के साथ जो वातावरण लिपटा होता है, उसे मैं नहीं समझ सकता। सच तो यह है कि शब्दों के साथ लिपटे हुए वातावरण का ज्ञान मुझे अपनी भाषा को छोड़कर और कहीं भी नहीं होता, यहां तक कि अंग्रेजी में भी नहीं।’ (दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 79) गुरुदेव से बातचीत के उपरांत चतुर्वेदी जी ने कहा, ‘दिनकर जी, रवींद्रनाथ स्वीकार करते हैं कि अँगरेजी शब्दों के साथ लिपटे हुए वातावरण को वे समझ नहीं पाते। यह एक बात है, जिसकी खबर उन सभी भारतीय लेखकों तक पहुंचा दी जानी चाहिए, जो अपनी भाषाएं छोड़कर अँगरेजी में लिख रहे हैं, विशेषतः कविताएं लिख रहे हैं।’ (वही) इसलिए, जो दोनों भाषा का ‘मर्म’ नहीं जानता, अच्छा अनुवादक नहीं हो सकता। अर्थ का अनर्थ तो कोई भी कर सकता है! अनर्थ ही कहिए कि आनंदमठ उपन्यास में एक बांग्ला कहावत का अनुवाद करते लिखा है, "गाय है तो गाड़ीवान नहीं गाड़ीवान है तो गाय नहीं!" (हिंदी अनुवाद, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 41) गाड़ी में जब बैल जुतते हैं तो कहावत में गाय क्यों? क्या बंगाल में हल या गाड़ी में गाय जोतने की परंपरा रही है?
अर्थ का अनर्थ तब ज्यादा ही होता है जब हम शब्दशः अनुवाद कर देना चाहते हैं। ‘‘कभी एक स्थानीय दैनिक में निकला था-‘जब पुलिस के बड़े अधिकारी वहां पहुंचे, तब पुलिसवालों और डाकुओं में गोलियों का आदान-प्रदान हो रहा था।’ गोलियां न हुईं मानों मिठाइयां हो गईं। अनुवादक को अंग्रेजी में ‘एक्सचेंज’ मिला; और उसने बिना समझे-बूझे उसके स्थान पर आदान-प्रदान रखकर काम चलता किया।’’ (रामचंद्र वर्मा, शब्दार्थ दर्शन, पृष्ठ 17) रामवृक्ष बेनीपुरी हजारीबाग जेल के वार्डों के अंग्रेजी नामों के हिंदी अनुवाद पर टिप्पणी करते हैं : "जुवेनाइल वार्ड के लिए 'छोकरा किता' अनुवाद वैसे ही है, जैसा विमेन्स वार्ड के लिए 'रंडी किता'। समझ में नहीं आता, ये अनुवाद किसने कब किये, किन्तु जेलों में, थोड़े दिनों पहले तक, 'रंडी किता', 'छोकरा किता' आदि शब्द ही प्रचलित थे।" (रामवृक्ष बेनीपुरी, जयप्रकाश, साहित्यालय, पटना, प्रथम संस्करण : मार्च 1947, पृष्ठ 164)
हर भाषा की अपनी एक खास प्रकृति है। इसलिए जिस भाषा में हम अनुवाद कर रहे होते हैं, उसकी प्रकृति, उसके मिजाज का रक्षण आवश्यक हो जाता है। शब्द, संस्कृति के वाहक होते हैं। यह भी कह सकते हैं कि संस्कृति बदलने से शब्द, वाक्यांश तथा मुहावरों के अर्थ बदल जाते हैं। मिसाल के तौर पर ‘दीपक तले अंधेरा’ कहावत कन्नड़ और कश्मीरी में भी है। कन्नड़ में (अन्य अर्थों के साथ-साथ) इसका अर्थ है, ‘चरित्रवान आदमी का भी दीपक की तरह अंधेरा पक्ष होता है। यानी उसमें प्रछन्न बुराइयां हो सकती हैं।’ कश्मीरी में अन्य अर्थों के साथ-साथ एक राजनीतिक अर्थ भी है। वह यह कि ‘अच्छे राजा के बुरे अनुचर हो सकते हैं’। (ए के रामानुजन, भारत की लोक कथाएँ, नेशनल बुक ट्रस्ट, 2011, 'भूमिका', पृष्ठ 21) इसलिए शब्दों और वाक्यांशों का अनुवाद अपने देश/प्रदेश की भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार होता है। जैसे अंग्रेजी में ‘वार्म रिसेप्शन’ इसलिए प्रचलित हुआ कि इंग्लैंड जैसे ठंढे देशों में इसकी (गर्मी की) आवश्यकता थी। इसी शब्द के लिए भारत जैसे सम तापमान वाले देशों में इसे ‘हृदय को शीतल करना’ कहा जा सकता है। (प्रसेनजित कुमार, 'अननुवाद्यता के चरण और शब्दावली', गवेषणा, अंक 107, वर्ष 2016) इसलिए अनुवादक को एक ही समय में स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा दोनों की भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना होता है।
शब्दशः अनुवाद एक खतरनाक बीमारी है, क्योंकि एक भाषा के शब्द के लिए हू-ब-हू दूसरी भाषा में अक्सर नहीं मिलते। कई बार शब्द महज शब्द नहीं होते, उनके साथ एक अवधारणा जुड़ी होती है। उन अवधारणाओं का अनुवाद किसी भी विदेशी भाषा में, जहां वैसी किसी अवधारणा का अस्तित्व न हो, मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव कार्य है। एक अच्छे अनुवादक को भाषा की इस सीमा की मर्यादा समझनी होगी। नहीं तो क्या आवश्यकता थी कि अंग्रेजी की किताबों अथवा शब्दकोशों के लिए ‘स्वदेशी’, ‘सत्याग्रह’ और ‘अहिंसा’ जैसे अवधारणात्मक पद ज्यों के त्यों उठा लिये जाते? हिन्दी में भी ठीक अंग्रेजी ही की तरह अनगिनत शब्द हूबहू ले लिये गये हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि आज भी हम इस बहस से मुक्त नहीं हो सके हैं कि ‘सेकुलरिज्म’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ तथा ‘धर्म’ और ‘रिलीजन’ एक ही चीज हैं कि भिन्न हैं। गुलेरी जी ने लिखा है कि ‘‘मत या सम्प्रदाय के अर्थ में धर्म शब्द का प्रयोग करना हमने विदेशियों से सीखा है, जब विदेशी भाषाओं के ‘मजहब’, ‘रिलीजन’ शब्द यहां प्रचलित हुए, तब भूल से या स्पर्धा से हम उनके स्थान में धर्म शब्द का प्रयोग करने लगे। परंतु हमारे प्राचीन ग्रंथों में, जो विदेशियों के आने के पूर्व रचे गये थे, कहीं पर भी ‘धर्म’ शब्द मत, विश्वास या सम्प्रदाय के अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ, प्रत्युत उनमें सर्वत्र स्वभाव और कर्तव्य इन दो ही अर्थों में इसका प्रयोग पाया जाता है।’’ (विश्वनाथ त्रिपाठी, हिंदी नवजागरण के अग्रदूत : चंद्रधर शर्मा गुलेरी, नेशनल बुक ट्रस्ट, 1995, पृष्ठ 81)
यह समस्या तब और विकट रूप में प्रस्तुत होती है जब हम बोली के शब्दों का अनुवाद करना चाहते हैं। बोली के शब्दों और भंगिमाओं का अनुवाद जब उसी देश की भाषा में असंभव है तो विदेशी भाषा के बारे में क्या कहा जाय। क्या रेणु का मैला आँचल उपन्यास बोली के शब्दों को छोड़कर रचा जा सकता था? देवेंद्र सत्यार्थी का विश्वास करें तो स्त्री गीतों में जो दर्द और करुणा है उसका अनुवाद दुनिया की अन्य किसी भी भाषा में असंभव है।
अनुवाद की एक समस्या श्रेष्ठताबोध और हीनताबोध से भी जुड़ी है। हम किसी भाषा को श्रेष्ठ मान लेते हैं तो किसी को हीन। हम भारतीय विदेशी भाषा के शब्दों का शुद्ध उच्चारण करने की कोशिश करते हैं। हवेनत्सांग और माओत्सेतुंग को वांगच्वांग तथा माओजेडोंग होते देर नहीं लगी। तोल्स्तोय का 'लेव' अब लेफ हो गया है तो चेखव, चेखफ। विदेशी नामों के उच्चारण को दुरुस्त करने की इतनी व्यग्रता लेकिन अपने ही देश की बांग्ला भाषा के अनेक नाम गलत वर्तनी के साथ लिखे जा रहे हैं। भूदेव मुकर्जी हिंदी में मुखर्जी बने बैठे हैं।वोमेश (womesh) कहीं व्योमेश तो कहीं उमेश। मजेदार है कि प्रकाशन विभाग की अंग्रेजी की किताब में भी उमेश (Umesh) है। इतिहासकार बिपन तो एकाध अपवाद को छोड़कर प्रायः ही बिपिन हैं। अंग्रेजी काल में मिश्र, गुप्त और मौर्य जो मिश्रा, गुप्ता, मौर्या बना वह आज भी बदस्तूर जारी है। चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ जी ने तनिक चुटकी लेते हुए लिखा भी है, ‘गीता के दर्शनशास्त्र को निचोड़ डालनेवाले लेखक भी पारसीधर्म का हाल लिखते समय जरथुश्त को ‘‘जरथुश्ता’’ और अहूर-मज्द को ‘‘अहुरामज्दा’’ लिख देते हैं।’ (वही, पृष्ठ 19) नामों को लेकर हम तनिक भी सचेत नहीं रहते। द्विवेदी जी कहीं महावीर प्रसाद अलग-थलग हैं तो कहीं साथ (महावीरप्रसाद)। हजारीप्रसाद द्विवेदी की भी यही गति है। फणीश्वरनाथ रेणु की कौन कहे! डॉक्टर सच्चिदानंद सिन्हा ने स्वीकार किया है कि जर्मनी में मैक्स मूलर के साथ मुलाकात से पहले तक वे अपने नाम की स्पेल्लिंग गलत लिखा करते थे।
इस प्रसंग में मुझे अपने काॅलेज (बी. एन. काॅलेज, पटना) के अंग्रेजी प्राध्यापक रमेश प्रसाद सिन्हा की ‘कहानी’ याद आ रही है। उनके बच्चे किसी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते थे। एक दिन उनसे पूछा : ‘पापा, आप भरता के बारे में जानते हैं?' पिता ने विश्वासपूर्वक कहा, ‘अरे! भरता तो हमलोग प्रायः ही खाते हैं। इसे भुरता या चोखा भी कहा जाता है और यह आलू, बैगन या करैला-किसी भी चीज का बनाया जा सकता है।’ बेटे ने पिता के ‘अज्ञान’ का मजाक उड़ाते कहा, ‘नहीं, नहीं पापा। भरता तो रामा का यंगर ब्रदर था।’ बेटे का ‘ज्ञान’ पिता के सिर के उपर से निकल गया। नतीजा हुआ कि मेरे अंगेजी शिक्षक ने बेटे का नाम अंग्रेजी स्कूल से कटवा दिया।
कुछ पाश्चात्य भारतविदों ने भारत के पंडितों के मध्य अपनी धाक जमाने के लिए अपने नाम तक के संस्कृत अनुवाद कर डाले थे। कहना अनावश्यक है कि वेद-विद्वान मैकडाॅनेल अपना संस्कृत नाम ‘मुग्धानलाचार्य’ सुनकर कुछ ज्यादा ही मुदित और मुग्ध थे। मैक्स मूलर भी ‘मोक्ष मूलर’ होकर कैवल्य का सुख लूटते थे। भारतीय विद्वानों ने इन नामों के संस्कृत अनुवाद को लेकर काफी हास-परिहास किया है। महावीरप्रसाद द्विवेदी और चन्द्रधर शर्मा गुलेरी तो खूब ही चुटकी लेते हैं।
समय में बदलाव के साथ शब्द के अर्थ भी बदलते रहे हैं। वेदों का अनुवाद आज की संस्कृत भाषा के प्रचलित शब्दार्थों के सहारे नहीं हो सकता ठीक जैसे शेक्सपीयर के जमाने की अंग्रेजी का अनुवाद आज के प्रचलित शब्दों और अर्थों के सहारे असंभव है। निरुक्तकार यास्क ने भी वेद से लगभग 400 ऐसे शब्द गिनाये हैं जिनके अर्थ उन्हें भी नहीं मालूम थे। लगभग चार सौ शब्द थे जिनका ओर-छोर ज्ञात नहीं हो पा रहा था। इस वैयाकरण ने उन शब्दों की एक सूची भी दी है। इसलिए एक अच्छे अनुवादक से उम्मीद की जाती है कि भाषा की समझ के साथ ही उसका इतिहास बोध भी विकसित हो।
प्रत्येक विषय की अपनी भाषा है, उसके खास पारिभाषिक शब्द हैं जिनकी बारीकी का पता उस विषय के जानकार ही को होता है। इसलिए अनुवाद की आदर्श स्थिति यह है कि कविता का अनुवाद कवि करे, कहानी का अनुवाद कहानीकार और समाज विज्ञान की पुस्तकों का अनुवाद कोई समाज विज्ञानी ही करे। तभी विषय के साथ न्याय की उम्मीद की जा सकती है।
कुछ अनुवादों ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया है। तोलस्तोय की किताब का पुनरुत्थान नाम से भीष्म साहनी का अनुवाद और नेहरू की 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' का हिंदुस्तान की कहानी नाम से सस्ता साहित्य मंडल का अनुवाद उम्दा कहा जा सकता है। नेहरू की ही लेटर्स फ्रॉम ए फादर टू हिज डॉटर के अनुवादक प्रेमचंद जी हैं। उस अनुवाद पर कौन टिप्पणी कर सकता है! हावर्ड फास्ट के 'ग्लैडिएटर' उपन्यास का अमृतराय ने आदिविद्रोही नाम से बेजोड़ अनुवाद किया है। मैं तो ई. एच. कार की 'व्हाट इज हिस्ट्री' के अनुवादक अशोक चक्रधर की भी तारीफ किये बगैर नहीं रह सकता।
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