Thursday, September 10, 2026

भारत में बौद्धिकता और श्रम

भारतीय आर्यों के आरंभिक समाज-परिवार को समझने के क्रम में ऋग्वेद (9.112.3) के इस कथन को अक्सर उद्धृत किया जाता है कि 'मैं कवि हूँ, मेरे पिता वैद्य हैं और मेरी माँ अनाज पीसनेवाली है।' 90 के दशक के एक लेखक ने अपनी किताब में पत्नी के योगदान/श्रम को इन शब्दों में याद किया, 'पत्नी ने मुझे घरेलू झंझटों से मुक्त रखा। एक स्कॉलर को अपनी पत्नी से इससे ज्यादा और क्या अपेक्षा/उम्मीद हो सकती है!' अब ऋग्वेद के उपर्युक्त कथन को 'और' की जगह 'किन्तु' के साथ पढ़ें तो कहना होगा कि 'मैं कवि हूँ, मेरे पिता वैद्य हैं किन्तु मेरी माँ अनाज पीसनेवाली है।' इतिहास का यह पहला श्रम-विभाजन है जो स्त्री पुरुष के बीच का है। यह पुरुष-वर्चस्व का भी उदाहरण है जो इतिहास के एक लंबे कालखंड के बीत जाने के बाद भी बहुत-कुछ यथावत है। मदन कश्यप की 'चूल्हे के पास' कविता स्त्री जाति के अधीनीकरण के इस इतिहास को बखूबी रखती है : 'गीली लकड़ियों को फूँक मारती/आँसू और पसीने से लथपथ/ चूल्हे के पास बैठी है औरत/ हज़ारों-हज़ार बरसों से/ धुएँ में डूबी हुई/ चूल्हे के पास बैठी है औरत/ जब पहली बार जली थी आग धरती पर/ तभी से राख की परतों में दबाकर आग ज़िंदा रखे हुई है औरत!'

आप कह ले सकते हैं कि भारत का आम बुद्धिजीवी पत्नी को एक श्रमिक से ज्यादा नहीं देख पाता। दूसरे शब्दों में आप कह ले सकते हैं कि भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग का निर्माण स्त्री के गुलाम श्रम की बदौलत हुआ है। मुझे मदन कश्यप की कविता 'जब तुम आओगी' की याद आती है। कविता कुछ इस तरह है: 'नहीं खुली है चटाई/जिसे लपेटकर रख गयी हो कोने में/एकबार भी नहीं बिछी है वह चटाई/तुम्हारे जाने के बाद/जिसे बिछाकर धूप सेंकते थे हम/जो अंगीठी तुमने जलायी थी/चूल्हे में उसी की राख भरी है/चीजें यथावत पड़ी हैं अप्रयुक्त/तुम्हारे जाने के साथ ही/मेरे भीतर का एक बहुत बड़ा हिस्सा/जहाँ का तहाँ ठहर गया है/मैं तभी से भूखा हूँ/जब तुम आओगी/तुम्हारे साथ आये/मिकी-मिकू की बेखौफ हंसी की उष्मा से/मेरे अकेले की बर्फ पिघल जायेगी/जब तुम आओगी/तुम्हारे हाथ की बनी अच्छी चाय पिऊँगा/और बढ़िया खाना खाऊंगा/जब तुम आओगी/मौसम कोई भी हो अच्छा लगेगा/जब तुम आओगी/सिर्फ तभी/आंखों की भाषा का उपयोग करूँगा/जब तुम आओगी/और चीजों पर पड़ी महीनों की गर्द/झाड़ोगी/चीजें मुस्कुराकर तुम्हारा स्वागत करेंगी।'

मदन कश्यप की एक और कविता है 'फाव' शीर्षक से। संभवतः नंदकिशोर नवल द्वारा संपादित 'कसौटी' पत्रिका में मैंने पढ़ी थी। मुफ्त में मिलना फाव है। कवि को फाव पसंद है। बचपन में मुझे भी पसंद था। बनिये की दूकान का खास आकर्षण होता था। मूल वस्तु की बजाय कई बार इसपर ज्यादा ध्यान होता था। किंतु आज मुझे मालूम है कि बिना श्रम लगे किसी वस्तु का उत्पादन सम्भव नहीं। श्रम अपना मूल्य पैदा करेगा इसलिए फाव का 'सृजन' बाजार का धोखा है और 'फाव' के प्रति हमारी ललक कायम होने का मतलब है कि श्रम/श्रमिक के प्रति हमारा नजरिया दोषपूर्ण है।

भारतीय बुद्धिजीवियों का श्रम के प्रति हिकारत की भावना कोई नई परिघटना नहीं है। ऋग्वैदिक समाज में अगर श्रम के प्रति कोई तीव्र घृणा-भाव नहीं है तो इसका कारण है कि समाज में तीखा वर्ग-विभाजन नहीं है। स्त्री-पुरुष के बीच का श्रम-विभाजन तीखा अवश्य है। पुरुष कवि और वैद्य इसीलिए हो पा रहे हैं कि अनाज पीसने का काम अर्थात भूख की चिंता औरतें कर रही हैं। इन स्त्रियों ने पुरुषों को अवकाश के अवसर प्रदान किये। दुनिया की सारी कला, सारे दर्शन का जन्म अवकाश के क्षणों में हुआ है। इसी बात को सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता 'पोस्टमार्टम की रिपोर्ट' कुछ यूं रखती है :

गोली खाकर/ एक के मुँह से निकला-

'राम'।

दूसरे के मुँह से निकला-

'माओ'।

लेकिन तीसरे के मुंह से निकला-'आलू'।

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है

कि पहले दो के पेट भरे हुए थे।'

उपनिषदों के काल में जब अतिरिक्त उत्पादन के फलस्वरूप अधिशेष का उत्पादन शुरू हुआ तो समाज में न केवल वर्ग-विभाजन हुआ बल्कि श्रम-विभाजन भी हुआ। वर्ग-विभाजन हमेशा श्रम-विभाजन भी हुआ करता है। समाज में चार वर्ण बने-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। वर्ण चार थे किंतु वर्ग दो ही थे। पहले वर्ग में ब्राह्मण और क्षत्रिय थे तो दूसरे वर्ग में वैश्य और शूद्र थे। ब्राह्मण-क्षत्रिय का उत्पादन में श्रम नहीं लगता था इसलिए वे मालिक/सम्मानित थे। वैश्य और शूद्र उत्पादन से सीधे तौर पर जुड़े हुए थे। उनके श्रम के बिना उत्पादन सम्भव नहीं था। वे श्रमिक थे इसलिए उनकी हैसियत ब्राह्मण-क्षत्रिय के मुकाबले हीन थी। समाज में तो तरह के लोग थे। पहले श्रम करनेवाले तो दूसरे श्रम नहीं करनेवाले-सुविधाभोगी और भुक्तभोगी। श्रम से दूर रहनेवाले दार्शनिकों, संन्यासियों की महिमा समाज में बढ़ी और मजदूरों की घटी। सुविधाभोगी/अवकाशभोगी वर्ग कलाकार और दार्शनिक कहलाया तो श्रम करनेवाला मजदूर।

एक वर्ण/वर्ग विभाजित समाज में मनुष्य के क्रियाकलापों का भी एक नियत सामाजिक दर्जा होता है। संभवतः इसीलिए ऐसा जान पड़ता है कि हमारे यहाँ पुराने जमाने से ही विद्या और कला के दो अलग-अलग क्षेत्र स्वीकार कर लिए गए थे। वेदों और ब्रह्मविद्या का अध्ययन-अध्यापन विद्या या ज्ञान के रूप में था और लिखना-पढ़ना, हिसाब लगाना तथा जीवन-यात्रा में उपयोगी अन्यान्य बातें कला का विषय समझी जाती थीं। विद्या का क्षेत्र ब्राह्मणों के हाथ में रहा और कला का क्षेत्र क्षत्रियों, राजकुमारों, राजकुमारियों तथा वैश्यों के लिए नियत था। (हजारीप्रसाद द्विवेदी, प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद, पृष्ठ 32) विद्या का संबंध चूंकि ब्राह्मण से था और कला का ब्राह्मणेतर वर्णों से, इसलिए विद्या की तुलना में कला हेय रही।

प्राचीन भारत के ग्रंथकार प्रायः 64 कलाओं का जिक्र करते हैं। ये ग्रंथकार अपनी रुचि, वक्तव्य, वस्तु और संस्कार के अनुसार 64 भेद कर लिया करते थे। कालक्रम से कला का रूप कौशल ने ले लिया। सुप्रसिद्ध कश्मीरी पंडित क्षेमेन्द्र ने 'कलाविलास' नाम की एक छोटी-सी पुस्तिका लिखी थी। इस पुस्तक में वेश्याओं की 64 कलाएं हैं, जिनमें अधिकतर लोककर्षक और धनापहरण के कौशल हैं। कायस्थों की 16 कलाएं जिनमें लिखने के कौशल से लोगों को धोखा देना आदि बातें ही प्रमुख हैं; गानेवालों की अनेक प्रकार की धनापहरण की कलाएं हैं, सोना चुरानेवाले सुनारों की 64 कलाएं हैं, गणकों या ज्योतिषियों की बहुविध धूर्तताएँ हैं। (हजारीप्रसाद द्विवेदी, प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद, पृष्ठ 18) 

प्राचीन भारत में चोरी करना भी एक कला है, एक शास्त्र है। मृच्छकटिक के शर्विलक ने उसका अच्छा अध्ययन किया था। कैसे सेंध मारना होता है, दीपक बुझा देने के लिए कीट को कैसे उड़ाया जाता है, दरवाजे पर पानी छिड़क के उसे कैसे निःशब्द खोला जा सकता है, आदि सारी बातें उसने सीखी थीं। (हजारीप्रसाद द्विवेदी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 30) शर्विलक के चौरकर्म का ज्ञान इतना गहन है कि देखते बनता है। उन्होंने ब्राह्मण के जनेऊ का जो गुण-वर्णन किया है वह ध्यान देने योग्य है-"एतेन मापयति भित्तिषु कर्म मार्गम" अर्थात 'इस यज्ञोपवीत से सेंध मारने की जगह पाई जा सकती है।' (मृच्छकटिक 3-17)

उन दिनों देह दबाना भी कला की श्रेणी में शुमार था। मृच्छकटिक नाटक के नायक चारुदत्त का एक उत्तम संवाहक था। चारुदत्त की प्रेमिका वसंतसेना से जब उसका परिचय हुआ तो वसंतसेना ने उसकी कला की दाद देते हुए कहा कि 'भाई, तुमने तो बहुत उत्तम कला सीखी है।' इस पर उसने जवाब दिया कि 'आर्य, कला समझकर ही सीखी थी, पर अब तो यह जीविका हो गई है।' (हजारीप्रसाद द्विवेदी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 35)

भारतीय विचारकों का एक वर्ग ऐसा है, (जो सदा अल्पसंख्यक ही रहा है) जिसने सौंदर्य को अपमूल्य माना है। इस वर्ग में निवृत्तिवादी दार्शनिक और कुछ स्मृतिकार आते हैं। अथर्ववेद के 'गोपथ' नामक ब्राह्मण में विप्रों के लिए संगीत सर्वथा निषिद्ध माना गया है: "तस्माद् ब्राह्मणो नैव गायेन्न नृत्येत  माम्लागृधः" (2.21)। मनुस्मृति में संगीत (तौर्यत्रिक) अथवा नृत्य, गीत और काव्य की गणना कामज व्यसनों के अंतर्गत की गयी है और उन्हें वर्जनीय माना गया है-"मृगयाक्षो दिवास्वप्नः परिवादः स्त्रियो मदः। तौर्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः।।" (मनु., 7-47; नगेन्द्र, 'सौंदर्य -मूल्य तथा अन्य जीवन -मूल्य', मन्नू भंडारी/अजित कुमार(संपादक), संकल्प का सौंदर्य शास्त्र, राधाकृष्ण, दिल्ली, पहला संस्करण:1997, पृष्ठ 75)

इस चेतना के फलस्वरूप भारत में यांत्रिकी और भौतिकी की प्रगति नहीं के बराबर हुई। ऐसा संभवतः श्रम के प्रति घृणा की वजह से हुआ। इस विषय पर प्रफुल्ल चंद्र राय ने सविस्तार लिखा है। आस्तीन चढ़ाकर, हाथ काले करके, पसीना बहाये बिना जिस विज्ञान की रत्ती भर भी प्रगति नहीं हो सकती, वह है यांत्रिकी और भौतिकी। और जिन विज्ञानों की प्रगति के लिए सबसे कम शारीरिक श्रम करने पढ़ते हैं वह हैं गणित और ज्योतिष। निरीक्षण और तात्विक चिंतन-ये दो गुण यदि भरपूर हों तो गणित और ज्योतिष की प्रगति हो सकती है और इस बात में संदेह नहीं कि ये गुण ‘हमारे’ ब्राह्मणों में भरपूर थे।

चिकित्सा और आरंभिक अवस्था के रसायन की कितनी भी जीवन के लिए कितनी भी जरूरत क्यों न हो, तो भी ब्राह्मणों/धर्मरक्षकों के लिए 'अशौच' ही थीं क्योंकि दस्त लगे आदमी का उपचार करने का अर्थ है भंगी का भी काम करना। शव-विच्छेदन भी हीन जाति का काम; और चमड़ा कमाने की रासायनिक प्रक्रिया का अध्ययन करने का अर्थ है चमार का काम। चरक और सुश्रुत को वेदान्तवादी ब्राह्मणों का रोष सहना पड़ा तो इसमें ताज्जुब की कोई बात नहीं है। (एस. जी. सरदेसाई, भारतीय दर्शन : वैचारिक और सामाजिक संघर्ष, पी. पी. एच., नई दिल्ली, हिन्दी: प्रथम संस्करण: अगस्त 1979, पृष्ठ 109-10) इन चिकित्सको को कौटिल्य का भी विरोध झेलना पड़ा है। ऋग्वैदिक अश्विनकुमारों के सचमुच अब बुरे दिन आ चुके थे।

श्रम के प्रति घृणा का भाव लिए हम आधुनिकता की दहलीज भी लांघ गये। अकारण नहीं है कि रवींद्रनाथ के 'गोरा' उपन्यास में जो पुनर्जागरणकालीन बंगाल की सांस्कृतिक दुनिया का सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक मूल्यांकन माना जा सकता है, कोई भी चरित्र अपनी रोजी-रोटी के लिए श्रम करता नहीं लगता : इसके ठीक विपरीत, मिसाल के लिए, चार्ल्स डिकेन्स के उपन्यासों में जीवन के प्रति 'पात्रों' की अभिवृत्ति के निर्माण में श्रम की अहम भूमिका है। (हम्फ्रे हाउस, दि डिकेन्स वर्ल्ड, 1961, पृष्ठ 55; के एन पणिक्कर, 'आधुनिक भारत का सामाजिक और बौद्धिक इतिहास', आधुनिक भारत (सं.-बिपन चंद्र), अनामिका पब्लिशर्स, दिल्ली, 2000, पृष्ठ 135)

एक पुरानी कहावत है-'खेती, खसम सेती' अर्थात खेती का स्वामी किसान जब स्वयं अपने हाथों से खेती करता है, तभी सुख से जीवन बिता सकता है। दूसरी कहावत है कि 'खेती क्यारी बीनती, और घोड़ा कौ तंग। अपने हाथ सँवारियौ, लाख लोग होइ सँग।' सीख है कि खेती-क्यारी, विनती और घोड़े का तंग अपने हाथों से संभालो, चाहे कितने ही मनुष्य उसे करने के लिए तैयार हों। (डॉक्टर अम्बाप्रसाद 'सुमन', ब्रजभाषा-शब्दावली, प्रथम खंड, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण : 1960, पृष्ठ 1) बाबा तुलसीदासदास भी खुद से खेतों की निराई करनेवाले को चतुर किसान कह गये हैं, किन्तु ये सब बातें किताबी हैं। पढ़ा-लिखा स्वाधीन नागरिक तो किसानी की गंध तक से परहेज करता प्रतीत होता है। पुरखों में अगर कोई हुआ भी तो वह किसान या 'फार्मर' कहते हुए सकुचाता है। वह रूसी लेखक तुर्गनेव के 'पिता और पुत्र' उपन्यास का बजारोव नहीं जो अपने दादा के हलवाहे होने की बात स्वीकार ले। इसलिए वह भाषा में भी सावधानी बरतेगा। हाँ, एग्रिकल्चरिस्ट में वह गंध नहीं है! 

प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों में किसान को भूमिहीन खेतिहर मजदूर बनते देखा तो फणीश्वरनाथ रेणु की 'ठेस' कहानी में एक कलाकार/शिल्पकार को मजदूर में परिणत होने का चित्र देखा। बचपन में पढ़ी इस कहानी के दो पात्र-सिरचन और मानू अब भी याद को कारुणिक बना जाते हैं। इतिहास सामाजिक परिवर्तन का इतिहास है। समाज का परिवर्तन साँप का केंचुल उतारने जैसा है। सुना है, साँप को अपना केंचुल उतारते/छोड़ते गहरी पीड़ा होती है। समाज की इस पीड़ा को होरी, गोबर और सिरचन जैसे लोग व्यक्त कर पाते हैं। आज हम बात-बात में सामंती समाज की मूल्यहीनता की बात कर लें, किन्तु कला का मूल्य उसी समाज में था। सामंती समाज के ध्वंस के बाद सिरचन एक कलाकार/शिल्पकार से मजदूर बनता है। परिवर्तन की त्रासदी यह है कि वह पूरा मजदूर भी कहाँ बन सका है। मन और मिजाज तो उसका अब भी कलाकार वाला है लेकिन गांव के लोग मजदूर भी नहीं बेगार समझते हैं। मजदूर अपने उत्पादन के जरिए मूल्य सृजित करने की क्षमता रखता है। बेगार कोई मूल्य सृजित नहीं करता। हमारी तरफ अर्थात मगही में एक कहावत चलती है-'बइठल से बेगारी भल'। बेगारी को श्रम की कोटि में नहीं रखा गया है। सिरचन इसी कोटि का है। जब गाँव में किसी को कोई मजदूर नहीं मिलता तो सिरचन को याद करता है। सिरचन कोई मूल्य सृजित नहीं करता इसलिए पेट-भर भोजन का भी अब हकदार नहीं। पेट-भर खाना पर भी उससे काम कराना अब घाटे का सौदा करना है। सिरचन का मन-मिजाज चूँकि अब भी नहीं बदला है, इसलिए घाटे-लाभ का बीजगणित उसे नहीं मालूम। अब भी उसके अंदर एक कलाकार का स्वाभिमान फन काढ़े बैठा रहता है। एक समय था जब उसकी कारीगरी के देश-विदेश में चर्चे थे। महानगरों में उसकी कला की पूछ थी। उसकी बनाई शीतलपाटी कलाप्रेमियों के ड्राइंगरूम की शान बनती थी। मिथिला-क्षेत्र में इस शीतलपाटी जैसी कला-शिल्प की कितनी ही नायाब वस्तुएं बनती थीं। उस जमाने के एक लेखक ने तो यहां तक बयान किया है कि शीतलपाटी भारत ही नहीं बल्कि यूरोपीय घरों की भी शोभा बढ़ाती थी। यह इतनी चिकनी और मुलायम होती कि थोड़ी भी असावधानी से कोई इस पर फिसलकर गिर सकता था। रेणु ने इस कला की और कलाकार की मृत्यु देखी थी।

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