मैं निराला के गोत्र का नहीं हूं
नागार्जुन कहते थे कि 'मैं निराला के गोत्र का आदमी नहीं हूँ। निराला में बहुत कुछ ऐसा है जो अभिजातों के ड्राइंग रूम में सजाने लायक हैं, मुझमें नहीं। मेरा गोत्र औघड़ों का है। मुझे करीब बिठाने में बहुत हिम्मत की जरूरत पड़ेगी। निराला भी साहसिक हैं पर उनके साहस में सांस्कृतिक परिष्कार भी है। मुझमें इस तुलना में थोड़ा फूहड़पन और भदेसपन है। ...मैं सीधे-सीधे गाली बक सकता हूँ नाम लेकर। निराला यही सब प्रतीकों के जरिए करेंगे। मैं इस सीमा के बाहर भी चला जाता हूँ।' (विजय बहादुर सिंह, 'बातचीत आसान नहीं थी नागार्जुन से', परिषद-पत्रिका, वर्ष 38, अंक 1-4, दिसंबर 1999)
नागार्जुन जनकवि थे और जनकवि हकलाते नहीं-'जन-कवि हूँ मैं, साफ कहूँगा/क्यों हकलाऊँ।' जनकवि जन से जुड़ने के उत्साह में कविता के नाम पर कभी-कभी 'सीमा के बाहर जाकर' अण्डबण्ड (ट्रैश) भी लिख दिया करते थे। (डॉक्टर कुमार विमल, परिषद-पत्रिका, वर्ष : 38, अंक 1-4) नागार्जुन अश्लील या भदेस शब्दों के प्रयोग में संकोच नहीं करते-एक-दूसरे के गुह्य अंगों को सूंघने का निर्लज्ज चित्रण भी कर देते और ऐसी भद्दी भाषा लिखने में भी उन्हें कोई हिचक नहीं होती-'कोई ससुर आपकी झांट नहीं उखाड़ सकता'। (भूल जाओ पुराने सपने, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1994, पृष्ठ 11; डॉक्टर विमल कुमार, पूर्वोद्धृत, पादटिप्पणी संख्या 26, 27)
दिनकर अपने समय के सूर्य रहे होंगे इस बात में संदेह का कोई कारण नहीं दिखता बल्कि 'जनकवि' की ईर्ष्या उसके प्रखर ताप का सबूत देती है। नागार्जुन के मन में दिनकर के प्रति एक खुन्नस रहती थी। 'तिकड़म के ताऊ' शीर्षक कविता में नागार्जुन ने लिखा है--
'नये पुराने लेखों के संकलन छपाना।
आप लगाना फेरी खा खा उन्हें छपाना।
पास मिलेगा अब पहले दर्जे का तुमको
पार्ल में रहो सूंघते नील कुसुम को
नेहरू छींके, मौलाना को हो खुजलाहट
मिल जायेगी तुमको घर बैठे ही आहट।'
(डॉक्टर कुमार विमल, नागार्जुन : 'एक-एक दाने की खातिर सौ-सौ पापड़ बेले', परिषद पत्रिका, वर्ष 38, अंक 1-4, पृष्ठ 46, पादटिप्पणी संख्या 23 में उद्धृत) राममनोहर लोहिया पटना आते ही कवि नागार्जुन की खोज करते थे क्योंकि उन्होंने नेहरू की आलोचना करते हुए कविता लिखी थी। (परिषद पत्रिका, वर्ष 38, अंक 1-4, दिसम्बर 1999, पृष्ठ 198)
'नागार्जुन जीवन के व्यावहारिक धरातल पर बहुत ही चतुर-चालाक थे और लाभकारी प्रसंगों में बेदारमग्जी से काम लेते थे। यह कहना, शायद, अनुचित नहीं होगा कि नागार्जुन 'निरे साहित्यकार' नहीं थे-लक्ष्मी को अपमानित करनेवाले कवि नहीं थे।' (डॉक्टर कुमार विमल, परिषद पत्रिका, वर्ष : 38, अंक : 4, पृष्ठ 35)
आपातकाल और सम्पूर्ण क्रांति के दिनों में नागार्जुन, लोकनायक के साथ थे। कविता से लेकर जेल तक। फिर साथ छोड़ दिया। जेल से छूटने के बाद बाबा नागार्जुन लोगों को एक कविता सुनाते थे-'कदमकुआं, हुआँ, हुआँ, हुआँ', यानी सियार लोग जहाँ जमा थे, वही कदमकुआं था। कहने की जरूरत नहीं कि पटना के कदमकुआं मुहल्ले में जयप्रकाश बाबू रहते थे!
जब नागार्जुन पर चली थी अपूर्वानंद की तलवार
कभी पटना प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से 'धारा' नाम से एक बुलेटिन जारी हुई थी जिसमें अपूर्वानंद जी का चर्चित और विवादास्पद लेख 'नागार्जुन की राजनीति' छापा गया था। कहने की जरुरत नहीं कि इस लेख में नागार्जुन को सोवियत-विरोधी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विरोधी साबित किया गया था। बौद्धिक जगत में इस लेख को लेकर काफी प्रतिक्रिया हुई थी।
यह लेख 1985 में आया था। खगेन्द्र ठाकुर ने उसके लेखक और भूमिका लेखक (बाद में ससुर-दामाद) दोनों को निजी तौर पर बता दिया था कि यह लेख उचित नहीं है। बिहार प्रगतिशील लेखक संघ ने भी अपने को उससे अलग बताया। इस विवाद में भीष्म साहनी जी ने एक पत्र लिखा और स्पष्ट कहा कि लेखक को लिखने की आजादी है, लेकिन उसे प्रगतिशील लेखक संघ से नहीं छापना चाहिए था। (देखें, खगेन्द्र ठाकुर, प्रगतिशील आंदोलन के इतिहास-पुरुष, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ 92)
उसके कुछ दिनों के बाद जमशेदपुर में प्रगतिशील लेखक संघ का राज्य सम्मेलन हुआ। नामवर जी उद्घाटन करने पहुंचे थे। जब नामवर जी जमशेदपुर पहुँच गये, तो उनसे मिलने खगेन्द्र ठाकुर होटल में गये। मिलते ही उन्होंने पूछा, 'खगेन जी यह सब क्या हो रहा है?' खगेन्द्र जी ने पहले समझा नहीं, इसलिए पूछा, क्या हो रहा है? अरे यह 'नागार्जुन की राजनीति' का मामला! "ओह, वह, मैंने भी छपने पर उसे देखा और पढ़ा।" "ऐसा है?" खगेन्द्र जी ने कहा, "जी हां"। वे बोले, "समझ गया"। नामवर जी को अध्यक्षीय भाषण करना था। उन्होंने समकालीन कविता और उसके मूल्यांकन की समस्या पर बोलते हुए उग्र स्वर में कहा, "आज नागार्जुन की राजनीति पर संदेह किया जा रहा है, उन पर प्रश्न उठाया जा रहा है। मुझे भी कुछ लोगों ने पिछले बीस-पच्चीस वर्षों से संशोधनवादी घोषित कर रखा है। लेकिन मैं जो काम तब कर रहा था, वही आज भी कर रहा हूँ। कुछ लोग लगे हैं प्रगतिशील लेखक संघ को झाड़ू से बुहारकर साफ कर देने को, गोया यह लेखक संघ न हुआ मेहतरों का संघ हो गया। ...हमारे बीच कुछ लोग हैं जिनके हाथ में खून की प्यासी तलवार है, उन्हें जब दुश्मन नहीं मिलता तो अपने घर में ही तलवार भांजने लगते हैं।" (देखें, खगेन्द्र ठाकुर, प्रगतिशील आंदोलन के इतिहास-पुरुष, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ 116-17)
गद्य लिखो बेटा गद्य
नागार्जुन पत्र खूब लिखा करते थे। कहा जाता है कि उनका झोला पोस्टकार्ड और अंतर्देशीय से भरा होता था। कुछ पत्र उन्होंने नंदकिशोर नवल को भी लिखे थे। नवल जी तब युवा थे और गीत-नवगीत लिखा करते थे। नागार्जुन को मालूम था कि गीत-गवनई में लड़के का भविष्य उज्ज्वल नहीं है। इसलिए एक डांटभरी चिट्ठी नवल जी को पकड़ा दी। लिखा-गद्य लिखो बेटा गद्य नहीं तो साहित्य की दुनिया से बाहर कर दिये जाओगे!
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