Wednesday, September 9, 2026

साहित्य, संस्कृति और राजनीति

बाइबिल में प्रार्थना है कि 'हे प्रभु! मुझे आज की रोटी दो' किन्तु 'मनुष्य सिर्फ रोटी के सहारे जीवित नहीं रह सकता'। इस कथन का सरलार्थ है कि मनुष्य अन्य पशुओं की तरह सिर्फ शारीरिक क्षुधा को तृप्त करने का प्रयास नहीं करता बल्कि वह अपनी मानसिक क्षुधा को भी तृप्त करता है। मनुष्य अन्य पशुओं से अलग इसलिए भी पहचाना गया कि इसके पास एक सोचनेवाला दिमाग था। सोचने के लिए अवकाश चाहिए। यह अवकाश उसने जानवरों को पालतू/गुलाम बनाकर अर्जित किया। अवकाश के बगैर संस्कृति की रचना नहीं हो सकती, साहित्य का सृजन नहीं हो सकता। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक छोटी-सी कविता है। संस्कृति निर्माण को समझने के लिहाज से बड़ी ही अर्थवान कविता है। कविता की पंक्ति है : 'गोली खाकर/पहले के मुंह से निकला राम/दूसरे के मुंह से निकला माओ/लेकिन तीसरे के मुंह से निकला आलू/पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है/कि पहले दो के पेट भरे हुए थे।' आप कह ले सकते हैं कि इतिहास, दर्शन, धर्म और समग्रतः संस्कृति बैठे-ठाले अर्थात अवकाशभोगी वर्ग की सृष्टि है। मनुष्य जबतक 'पशु' रहा, संस्कृति से लगभग अपरिचित रहा। 'पशु' से यहां मतलब उसके खाद्य संग्राहक होने से है। जब तक वह अपनी आजीविका के लिए शिकार और खाद्य संग्रह पर आश्रित रहा, तब तक वह लगभग 'असभ्य' रहा। तब सभी लोग शिकार करने में समान रूप से शामिल होते थे। बंटवारा भी सबके बीच समान रूप से होता था। फिर धीरे-धीरे समूह का एक नायक/सरदार उभरा जो अन्य से 'श्रेष्ठ' माना-समझा जाने लगा। कहने को तो 'आदिम साम्यवाद' का युग था लेकिन गैर-बराबरी की भावना का बीजारोपण हो चुका था। अब सरदार या कबीले के नायक का विशेष महत्त्व स्थापित हो चुका था। युद्ध के दौरान जो कुछ भी हाथ लगता, उसमें उसका विशेष हिस्सा होता। युद्ध में हासिल औरतों पर पहला 'अधिकार' उनका ही घोषित होता। तब लेखन-कला का आविष्कार नहीं हो सका था कि उनके 'श्रेष्ठता बोध' को स्थापित और चुनौती देनेवाला साहित्य हमें उपलब्ध हो सके। हाँ, तब वे पहाड़ की गुफाओं में कुछ आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचना जान चुके थे। कभी-कभी ऐसी ही रेखाएं और जानवरों, पौधों के चित्र वे अपने शरीर पर भी खींचते। यह गोदना कला का आदिम रूप है। इस कला में यह ध्यान रखा जाता कि सरदार के लिए खास रंग और डिजाइन विशेष रूप से सुरक्षित होंगे जिनका प्रयोग कबीले के दूसरे लोग नहीं करेंगे। इस तरह आप कह सकते हैं कला, साहित्य और संस्कृति के मूल में 'श्रेष्ठता बोध' और 'गैर-बराबरी' की भावना है। समाज में जो 'श्रेष्ठ' हुए 'सभ्य' और 'संस्कृत' कहलाए जो निम्न हैसियत वाले लोग थे वे 'असभ्य', 'असंस्कृत' और 'प्राकृत' कहे गए। भाषा में भी जो श्रेष्ठ थी संस्कृत हुई और जो हीनतर रही प्राकृत कहलाई। हाल तक दार्शनिकों का एक समूह मानता रहा था कि संस्कृति सिर्फ कुलीनों की होती है। कहने की जरूरत नहीं कि आरंभ काल से ही यह सब कुछ एक खास राजनीति के तहत हुआ जिसे आप 'संस्कृति की राजनीति' कह सकते हैं। संस्कृति के साथ राजनीति का संबंध पहले से है। साहित्य का जुड़ाव थोड़ा बाद का है।

एक विद्वान ने कहा है कि आधुनिक काल का धर्म राजनीति है जबकि इसके पहले के समाजों में धर्म राजनीति का रोल अदा करता है। साहित्य इस खेल के औजार/उपकरण रहे हैं। समाज में प्रभुत्व/वर्चस्व की स्थापना और स्थापित सत्ता को चुनौती देने का संघर्ष ही सांस्कृतिक विकास का उत्स है। भारतीय संस्कृति के संदर्भ में बात करें तो वेद हमारे सबसे आरंभिक साहित्यिक दस्तावेज हैं। ऋग्वेद के दशम मंडल में पुरुष सूक्त की रचना है, जिसमें समाज को चार वर्णों में बंटा बताया गया है। सबसे पहले तो वेद को 'अपौरुषेय' अर्थात ईश्वरीय बताया गया। इसी अपौरुषेय वेद ने चार वर्णों को शरीर के चार भिन्न अंगों से उत्पन्न बताया। जो अंग जितना महत्त्वपूर्ण था उससे जन्म लेनेवाला वर्ण भी उसी अनुपात में महत्त्वपूर्ण हुआ। मुख से जन्म लेनेवाला वर्ण ब्राह्मण हुआ। मुख शरीर के सभी अंगों में प्रधान है। 'मुख' से ही मुखिया शब्द बना है जिसका अर्थ सरदार है। इसलिए अकारण नहीं है कि मुख से जन्म लेनेवाला ब्राह्मण समाज का सरदार/माथा बना। भुजा से जन्म लेनेवाला क्षत्रिय, जांघ से जन्म लेनेवाला वैश्य और पैर जैसे उपेक्षित अंग से जन्म लेनेवाले शूद्र हुए। ऐसा नहीं है कि ऋग्वेद का यह पुरुषसूक्त बिना किसी राजनीति के यूं ही तुलसीदास की तरह 'स्वान्तः सुखाय' लिख दिया गया। आप सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य को उलटने-पलटने की कोशिश करें तो यही वर्णक्रम देखने को मिलेगा। ब्राह्मण पहले नंबर का 'नागरिक' है, क्षत्रिय दूसरे नंबर का, वैश्य तीसरे नंबर का और शूद्र चौथे नंबर का। थोड़ा सरल करते हुए आप ब्राह्मण-क्षत्रिय को एक ओर तो वैश्य-शूद्र को दूसरी ओर रख सकते हैं। और बात है कि ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच एक नम्बर के स्थान को लेकर संघर्ष होते रहे हैं। बौद्ध साहित्य जिसे आमतौर पर क्षत्रिय वर्ण का प्रतिनिधि साहित्य माना जाता रहा है, क्षत्रिय को आद्योपांत वर्णक्रम में पहला स्थान प्रदान करता रहा है। किन्तु कई स्थानों पर यह 'आम सहमति' व्यक्त हुई है कि ब्राह्मण-क्षत्रिय का मसला इनका 'आपसी मसला' है। ये दोनों मिलकर वैश्यों और शूद्रों का शोषण करते हैं। निचले दोनों वर्ण ऊपर के दोनों वर्णों की सामूहिक संपत्ति हैं। संस्कृत भाषा में वैश्य और वेश्या एक ही मूल शब्द 'विश्' से बने हैं और दोनों ही सामूहिक संपत्ति माने जाते हैं।

ब्राह्मणों ने पहले वे वेद को 'अपौरुषेय' कहा फिर क्षत्रिय अर्थात राजा को दैवी शक्ति से मंडित किया। राजा पृथ्वी पर ईश्वर का भेजा हुआ दूत हुआ और फिर ब्राह्मण साक्षात ईश्वर अर्थात 'भूसुर' कहलाया। यह ब्राह्मण-क्षत्रिय गंठजोड़ की राजनीति थी। यह सारा का सारा आयोजन साहित्य के खोल में हुआ। इस साहित्य से वैश्यों, शूद्रों और स्त्रियों को दूर रखा गया। स्त्रियों और शूद्रों को वेदपाठ से दूर रखा गया। वेदपाठ से मतलब यहाँ महज धर्म और उसके कर्मकांड से नहीं है। वेद से वंचित करने का मतलब ज्ञान के स्रोत से वंचित करना था। वेद 'विद' धातु से निष्पन्न है जिसका अर्थ ज्ञान और जानना है। वेद अपने समय का संचित ज्ञान हैं। ज्ञान के स्रोत से वंचित करने के लिए धर्म की राजनीति की गई। स्त्रियों और शूद्रों को समान रूप से 'अमंत्रक' कहा गया जिसका तात्पर्य था कि ये मंत्र-पाठ के योग्य नहीं हैं। इनमें शब्दों को बिगाड़कर बोलने की सहज प्रवृत्ति है। इसी 'भय' से संस्कृत वैयाकरण पाणिनी ने संस्कृत भाषा का मानकीकरण किया। विद्वानों के बीच इस पाणिनी का इतना दबदबा था कि कोई पाणिनी के व्याकरण से जौ भर भी इधर-उधर होने का माद्दा नहीं रखता था। बड़े से बड़े विद्वान और धुरंधर सिर्फ पाणिनी के दिये सूत्रों का औचित्य साबित करते रह गये। कहने को तो 'महाभाष्य' तक लिखे गए लेकिन वे सब टीका ही रहे। सब पाणिनी के आगे नतशिर थे। अपाणिनीय होने का मतलब गलत होना हो गया।

चूँकि स्त्री और शूद्र शब्दों को 'बिगाड़कर' बोलते थे इसलिए संस्कृत नाटकों में उनके लिए प्राकृत भाषा का विधान कर दिया गया। शूद्रों और स्त्रियों को छोड़कर सभी संस्कृत बोलते-समझते हैं। आज इक्कीसवीं शताब्दी में भी हाथी संस्कृत भाषा का 'गच्छ', 'तिष्ठ' और 'उतिष्ठ' ही समझता है। कुत्ता आज भी 'अत्तु' कहने के बाद पूंछ डुलाता आता है और खाने लगता है। संस्कृत का सामान्य ज्ञान रखनेवाला विद्यार्थी भी जानता हैं कि अत्तु का मतलब है 'आइए, खाइए' और यह आदरार्थ प्रयुक्त है। बाघ वाली कहानी बचपन में हम सब ने पढ़ी होगी जिसमें बूढ़ा बाघ राह जाते ब्राह्मण से संस्कृत में संवाद करता है-'भो, भो पान्थः'। इस बूढ़े बाघ को भी मालूम है कि ब्राह्मण 'भोवादी' है! 'भो' शब्द का प्रयोग राजन्य या वैश्य के संबोधन के लिए होता था, शूद्र के संबोधन के लिए नहीं-'भो राजन्य विशां वा'। तो क्या हम मान लें कि यह साहित्य जो कुत्तों, सियारों तक को संस्कृत बोलने की छूट देता है और स्त्री, शूद्रों पर बंदिशें लगता है, राजनीति से प्रेरित नहीं होगा?

No comments: