Sunday, September 6, 2026

प्रेमचंद : कुछ स्वतंत्र टिप्पणियां

गांधी और प्रेमचंद

प्रेमचंद हिंदी प्रदेश के सबसे बड़े लेखक हैं। टैगोर-गांधी विवाद में गांधी का पक्ष निराला के साथ प्रेमचंद ने भी लिया था। दोनों अपने-अपने कारणों से टैगोर से असहमत थे। प्रेमचंद को 'बंगाली भावुकता' पसंद नहीं थी। यह विवाद भी महत्वहीन है कि प्रेमचंद गांधीवादी थे या नहीं। गांधी को लेकर एक विश्वास और आकर्षण अवश्य था प्रेमचंद के यहां किन्तु वे गांधीवाद की सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं। गांधी के असहयोग आंदोलन के प्रभाव में नौकरी भी छोड़ते हैं किंतु आंदोलन और गांधीवाद की असफलता भी बताते चलते हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रेमचंद की राजनीतिक पढ़ाई गांधी से नहीं बल्कि गोखले और तिलक से शुरू होती है। प्रेमचंद की पृष्ठभूमि आर्य समाज की रही थी और अपने बाद के दिनों में वे रूस की बोल्शेविक क्रांति पर संपादकीय लिखा करते थे। साम्प्रदायिक समस्या के मामले में भी गांधी से प्रेमचंद आगे थे। गांधी के यहां सभी तरह की समस्याओं का निदान हृदय परिवर्तन में है। प्रेमचंद हृदय परिवर्तन नहीं मानते। वे कहते हैं कि जेल से लौटे जमींदार के शोषण में कोई फर्क नहीं है। यह भी बताते चलते हैं कि कल को अगर सुराज मिला तो यही जमींदार हमारा नियंता होगा।

प्रेमचंद के स्त्री-विचार

शिवरानी देवी की किताब 'प्रेमचंद घर में' का समर्पण पढ़ते हुए सोचता रहा कि नारीवादी विमर्शकार इसे कैसे पढ़ेंगे। उन्होंने लिखा है, 'स्वामी/तुम्हारी ही चीज तुम्हारे चरणों में चढ़ाती हूँ/इस तुच्छ सेवा को अपनाना/ तुम्हारी दासी या रानी।'

इन 'रानियों' के बारे में प्रेमचंद लिखते हैं, "आज काफी स्त्रियां नौकरी करने लगी हैं, मगर वह अच्छा नहीं है, मैं इसको अच्छा नहीं समझता। अब इसका नतीजा क्या हो रहा है? अब पुरुष और स्त्री दोनों नौकरियां करने लगे, तब इसके माने क्या हैं? रुपए ज्यादा आ जाएंगे। उसी का तो यह फल है कि पुरुषों की बेकारी बढ़ रही है।" (शिवरानी देवी, प्रेमचंद : घर में, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 217

"यह कमाई का सवाल अभी थोड़े दिनों से उठा है, नहीं तो पहले स्त्रियों की कमाई एक पैसा नहीं होती थी, और स्त्रियां काफी दबदबे के साथ घर पर शासन करती थीं, तब क्या वह कमाई करती थीं?" (वही, पृष्ठ 217)

प्रेमचंद और संयुक्त परिवार

शिवरानी देवी ने प्रेमचंद के बचपन की एक घटना का वर्णन किया है। घटना है कि 'चाचा ने सन बेचा और उसके रुपये लाकर उन्होंने ताक पर रख दिये। आपने अपने चचेरे भाई से सलाह की, जो उम्र में आपसे बड़े थे। दोनों ने मिलकर एक रुपया ले लिया। आप रुपया उठा तो लाये; मगर उसे खर्च करना नहीं आता था। चचेरे भाई ने उस रुपये को भुनाकर बारह आने मौलवी साहब की फीस दी। और बाकी चार आनों में से अमरूद, रेवड़ी वगैरह लेकर दोनों भाइयों ने खायी। चाचा साहब ढूंढ़ते हुए वहाँ पहुंचे और बोले-"तुम लोग रुपया चुरा लाये हो?" आपके चचेरे भाई ने कहा-"हाँ, एक रुपया भैया लाये हैं।" चाचा साहब गरजे-"वह रुपया कहाँ है?" "मौलवी साहब को फीस दी है।" चाचा साहब दोनों लड़कों को लेकर मौलवी साहब के पास पहुंचे और बोले-"इन लड़कों ने आपको पैसे दिये हैं?" "हाँ, बारह आने दिये हैं।" "उन्हें मुझे दीजिए।" चाचा साहब ने उनसे फिर पूछा-"चार आने कहाँ हैं?" उसका अमरूद लिया। चाचा अपने लड़के को पीटते हुए घर लाये। मेरी शकल अजीब हो गई थी। मैं डरता-डरता घर आया। मां  एक लड़के को पिटता देखकर मुझे भी पीटने लगीं। चाची ने दौड़कर मुझे छुड़ाया।' (शिवरानी देवी, प्रेमचंद घर में, आत्माराम एंड संस, 2008, पृष्ठ 20)

प्रेमचंद का बालमन सोचता है कि 'चाची ने मुझे ही क्यों छुड़ाया, अपने बच्चे को क्यों नहीं छुड़ाया?' लेकिन वे जान नहीं सके। फिर अनुमान लगाया-'शायद मेरी दुर्बलतावश उन्हें दया आ गई हो।' 

मैं यह तो नहीं कह सकता कि प्रेमचंद का 'अनुमानाधारित उत्तर' गलत है, किन्तु एक संयुक्त परिवार में पले-बढ़े होने का मेरा अनुभव इसे सहजतापूर्वक स्वीकार नहीं कर सकता कि प्रेमचंद 'दुर्बलता' से उपजी 'दया' की वजह से  बचे। क्या कारण है कि यह 'दुर्बलता' चाचा-चाची के हृदय में ही 'दया' उत्पन्न कर पाने में समर्थ है, मां के हृदय में नहीं। इसलिए कहा जा सकता है कि प्रेमचंद को संयुक्त परिवार के मूल्यों, उसकी नैतिकता ने बचाया है।

यहाँ एक चीज ध्यान देने की है कि 'चाचा' अपने बेटे को पीट रहे हैं और 'मां' अपने बेटे को। संयुक्त परिवार में अपने बेटा-बेटी को प्यार करना नैतिक और चारित्रिक 'दुर्बलता' माना जाता था जबकि उपेक्षा और तिरस्कार परिवार के लिए व्यक्ति का 'त्याग'। संयुक्त परिवार में एक बच्चे को प्यार सदैव चाचा-चाची से ही प्राप्त होता था। संयुक्त परिवार में सभी बच्चे आपस में भाई-बहन होते थे। अकारण नहीं है कि प्रेमचंद से बचपन में जब कोई उनसे भाइयों की संख्या पूछता था तो वे सदैव पांच भाई होने की बात कहते थे। (पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 20)

नमक का दारोगा और अलोपीदीन की संतानें

प्रेमचंद की कहानी 'नमक का दारोगा' का जो ‘प्वाईंट ऑफ इंफैसिस’ है वह यह कि कहानी का खलनायक (विलेन) अलोपीदीन नहीं हैं, बल्कि पूरी की पूरी समाज व्यवस्था है। अलोपीदीन से पहले महाजनों के कर्ज में डूबे उनके उनके पिता हैं जो नौकरी में जाने से पहले ही भ्रष्टाचार की घुट्टी पिला रहे हैं। परिवार के सारे लोगों की अतृप्त लालसाएं हैं। पत्नी की साड़ी और मां की तीर्थ-योजना है। समाज में कौन है जो अलोपीदीन की इज्जत न करता हो ? जमादार बदलू सिंह की तो बात ही छोड़ दें। इलाके के सारे प्रतिष्ठित लोग अलोपीदीन का मेहमान बनना अपना सौभाग्य मानते क्योंकि अपने इलाके के वे ‘सबसे प्रतिष्ठित जमींदार’ थे। अंग्रेज अफसर तक उनके मेहमान होते। क्या यह महज संयोग था कि अदालत ने अलोपीदीन को ‘बाइज्जत’ बरी कर दिया? ‘पं अलोपीदीन इस अगाध वन के सिंह थे।’ ‘डिप्टी मजिस्ट्रेट ने अपनी तजवीज में लिखा, पं. अलोपीदीन के विरुद्ध दिए गए प्रमाण निर्मूल और भ्रमात्मक हैं। वह बड़े भारी आदमी हैं। यह बात कल्पना के बाहर है कि उन्होंने थोड़े लाभ के लिए ऐसा दुस्साहस किया हो।’ 

प्रेमचंद का दारोगा ईमानदारी का जो ‘संस्कार’ लेकर नौकरी खोजने निकला है वह मार्के का है। उस संस्कार के जो अनिवार्य उपादान हैं, उसे देखें-‘मुंशी वंशीधर भी जुलेखा की विरह-कथा समाप्त करके सीरी और फरहाद के प्रेम-वृत्तांत को नल और नील की लड़ाई और अमेरिका के आविष्कार से अधिक महत्त्व की बातें समझते हुए (जोर मेरा है) रोजगार की खोज में निकले।’ इस तरह के रोमानी विचार वाले दारोगा की ईमानदारी पर कोई भरोसा करके गलत ही साबित होगा। सच पूछिए तो कहानी पढ़ते हुए मुझे ऐसा कुछ भी नहीं मिलता (सदास्था के बावजूद) जिसकी बुनियाद पर ‘अटूट विश्वास’ हो सके बल्कि प्रेमचंद ने तो दारोगा के भ्रष्ट होने-बनने या बना दिये जाने की ही कहानी लिखी है। नौकरी गंवाकर लौटे दारोगा से घर-समाज में कोई बोलने-बतियाने के लिए तैयार नहीं है। क्या दारोगा इसे महसूस करते हुए बदल नहीं रहा? कहानी के प्रारंभ में अलोपीदीन के बारे में दारोगा की जो राय है वह अंत तक काबिज रहती है क्या? क्या वह पूरी की पूरी बदल नहीं गई है? ‘वंशीधर ने गंभीर भाव से कहा-यों मैं आपका दास हूं। आप जैसे कीर्तिवान, सज्जन पुरुष की सेवा करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है।’ और आगे-वंशीधर की आंखें डबडबा आईं। हृदय के संकुचित पात्र में इतना एहसान न समा सका। एक बार फिर पंडितजी की ओर भक्ति और श्रद्धा की दृष्टि से देखा और कांपते हुए हाथ से मैनेजरी के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए।

...और प्रेमचंद 'स्वर्ग' की सैर नहीं कर सके!

पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी का गुरुदेव के 'दर्शनार्थ' शांतिनिकेतन आना-जाना लगा रहता था। उन्होंने हिन्दी के कई लेखकों को गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के 'दर्शन' कराने में सफलता पाई थी। उनकी यह 'आकांक्षा' थी कि कभी 'प्रेमचन्दजी और कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ को बातचीत करते हुए सुनें'। उन्होंने 'प्रेमचन्दजी को शान्तिनिकेतन बुलाने के लिए कई बार प्रयत्न किया', पर इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली। एक बार तो उन्हें यह 'आशंका' भी हो गई थी कि उन्होंने 'जान बूझकर' उनके निमन्त्रण की उपेक्षा की है। जब काशी में जाकर चतुर्वेदी जी ने उनसे पूछा कि 'आप शान्तिनिकेतन क्यों नहीं गये', तब उन्होंने बतलाया कि वे 'अपनी धर्मपत्नी तथा बच्चोंको छोड़कर अकेले कविवर के दर्शनार्थ नहीं जाना चाहते थे और इतना पैसा उनके पास था नहीं कि सबकी यात्रा का प्रबन्ध कर सकते।' (बनारसीदास चतुर्वेदी, संस्मरण, भारतीय ज्ञानपीठ, काशी, प्रथम संस्करण : अगस्त 1952, पृष्ठ 79-80) 

चतुर्वेदी जी की 'आशंका' निराधार नहीं है। प्रेमचंद के मन में बंगला साहित्य और विशेषकर रवींद्रनाथ ठाकुर के लिए कोई खास आकर्षण नहीं था। एक बार जैनेंद्र ने चर्चा की थी कि 'बंगाली साहित्य हृदय को अधिक छूता है', तो  प्रेमचंद ने कहा था कि 'उसमें स्त्री-भावना अधिक है। ...जैनेंद्र, मुझे कुछ ठीक नहीं मालूम। मैं बंगाली नहीं हूं। वे लोग भावुक हैं। भावुकता में जहाँ पहुंच सकते हैं, वहाँ मेरी पहुंच नहीं। मुझमें उतनी देन कहाँ? ज्ञान से जहाँ नहीं पहुंचा जाता, वहाँ भी भावना से पहुंचा जाता है। (जैनेन्द्र, 'प्रेमचंद मैंने क्या जाना और पाया', प्रेमचंद स्मृति अंक, प्रेमचंद रचनावली, खण्ड 20 में संकलित, पृष्ठ 21) आगे प्रेमचंद ने कहा, 'जैनेंद्र, रवींद्र, शरत दोनों महान हैं। पर हिन्दी के लिए क्या वही रास्ता है, शायद नहीं। हिन्दी राष्ट्रभाषा है। मेरे लिए तो वह राह नहीं ही है।' (वही)

उर्दू के प्रसिद्ध साहित्यकार इम्तयाज अली 'ताज' को 14 सितंबर, 1920 के अपने खत में प्रेमचंद ने लिखा था : "मैं लिटरेचर को मैस्कुलिन देखना चाहता हूँ, फेमिनिज्म, ख्वाह वह किसी सूरत में हो, मुझे पसन्द नहीं। इसी वजह से मुझे टैगोर की अक्सर नज्में नहीं भातीं। यह मेरा भीतरी नुक़्स है, क्या करूँ। अशआर भी मुझे वही अपील करते हैं जिनमें कोई जिद्दत (मौलिक सूझ) हो। 'ग़ालिब' के रंग का मैं आशिक हूँ। अज़ीज लखनवी के 'गुलकदे' की खूब सैर की थी मगर बदकिस्मती से आज तक एक शेर भी मौजूँ नहीं कर सका। न जी चाहता है। गालिबन शायराना हिस (संवेदनशीलता) दिल में है ही नहीं।" (कलम का सिपाही, पृष्ठ 56) इस खत के कई बरस बाद इन्द्रनाथ मदान के एक सवाल का जवाब देते हुए भी कि बंगला साहित्य क्यों दिल को ज्यादा छूता है, उन्होंने लगभग यही बात कही थी-"उसमें एक स्त्रियोचित गुण पाया जाता है, जिसे मैं अपने स्वभाव के प्रतिकूल पाता हूँ।" (वही)

प्रेमचंद के बारे में जैनेन्द्र लिखते हैं कि 'बड़े शब्दों से कहीं अधिक उन्हें छोटी-सी सचाई छूती थी। जहाँ जिंदगी थी वहां प्रेमचंद की निगाह थी। जहां दिखावा था, उसके लिए प्रेमचंद के मन में उत्सुकता तक न थी।' (वही, पृष्ठ 33) इसलिए 'जब शांतिनिकेतन जाने की बात आई तो उनका मन पूरी तरह ग्रहण न कर सका।' जैनेन्द्र को बोले, 'मैं तो वहां उस स्वर्ग की सैर करूँ, यहां घर के लोग तकलीफ में दिन काटें, क्या यह मेरे लिए ठीक है? और जैनेन्द्र, महाकवि रवींद्रनाथ तो अपनी रचनाओं द्वारा यहां भी हमें प्राप्त हैं। क्या वहाँ मैं उन्हें अधिक पाऊंगा?' (वही)

चतुर्वेदी जी ने प्रेमचंद को गुरुदेव से मिलवाने की कई बार कोशिश की लेकिन वे 'बहाने' बनाकर टालते रहे। एक बार जापानी कवि नोगुची कलकत्ते भाषण देने आए थे तब भी प्रेमचंद को बुलावा भिजवाया था। प्रेमचंद ने 'आर्थिक संकट' का 'बहाना' बनाया। चतुर्वेदी जी ने 'विशाल भारत' में प्रेमचंद के आर्थिक संकटों के बारे में लिखा भी था। नोगुची प्रसंग में प्रेमचंद ने जैनेन्द्र को जो बताया था वह ध्यान देने लायक है : 'यहां नोगुची हिन्दू-यूनिवर्सिटी आए उनका व्याख्यान भी हो गया। मगर मैं न जा सका।' (वही, पृष्ठ 30)

प्रेमचंद और अन्धविश्वास

इस बात को लेकर प्रेमचंद की प्रायः ही आलोचना हुई है कि अंधविश्वास और अलौकिक तत्वों के प्रसंग में वे विरोधाभासों के शिकार हैं। "कभी-कभी वे भूत-प्रेत की तरह आव-बाव बकती थीं। एक पण्डित ओझाई का काम करते थे, वैद्य का भी काम करते थे। मेरी चाची ने कहा-उन्हें बुला लाओ। मैं उन्हें बुला लाया। पण्डित जी आये और ओझों की तरह कुछ उन्होंने अलाय-बलाय किया। मैं भी दोपहर तक बैठा उन्हीं के साथ हवन करता रहा।" (शिवरानी देवी प्रेमचंद, प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 13)

"प्रेमचंद को सामुद्रिक विद्या में यकीन था। उनका एक दफ्तरी था जिसका बताया सही-सही घटित होता था।" (जैनेन्द्र कुमार, 'प्रेमचंद मैंने क्या जाना और पाया', प्रेमचंद रचनावली-20, पृष्ठ 23)

जहां एक तरफ वे अंधविश्वास, सामाजिक-नैतिक रूढ़ियों, धार्मिक विश्वासों, यहां तक कि 'ईश्वर' के अस्तित्व में भी संदेह करते हैं, वहीं उनकी कुछ कहानियों में भूत-प्रेत, पुनर्जन्म, तर्कहीन अलौकिकताओं के प्रति स्वीकार का भाव लक्षित होता है। 'विध्वंस', 'मूठ', 'गुप्त धन', 'नाग-पूजा', 'भूत', 'खूनी', 'पिसनहारी का कुआं, 'मन्त्र', 'प्रतिशोध' आदि कहानियां इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। 

इनमें से कुछ कहानियां, जैसे 'नाग पूजा', 'खूनी', 'प्रतिशोध' आदि तो निपट अंधविश्वास की पुष्टि करनेवाली कहानियां हैं और उनका (डा. गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास 1900-1950 पृष्ठ 137) कोई अभिप्रायगत वैशिष्ट्य लक्षित नहीं होता। 'नाग पूजा' में एक नाग के एक लड़की से प्रेम करने और 'खूनी' तथा 'प्रतिशोध' में 'प्रेत विद्या की सहायता से अपराधी का पता लगाने के चमत्कार की कथा प्रस्तुत की गयी है। तत्कालीन समाज में इस प्रकार के विश्वास प्रचलित थे, यह तो सच है, पर इनके प्रति आलोचनात्मक या व्यंग्यात्मक दृष्टि का अभाव प्रेमचंद के संदर्भ में आश्चर्यजनक है। 'मूठ' चलाकर दुश्मन को मार डालने का अंधविश्वास भी गांवों में प्रचलित था और प्रेमचंद की कहानी 'मूठ में इसका वर्णन किया गया है। चोर का पता लगाने के लिए केन्द्रीय पात्र एक ओझा से 'मूठ' चलाने का आयोजन करता है और इसे केवल सुनकर ही चोर नौकरानी की देह ऐंठने लगती है, आंखें पधरा जाती हैं, और वह बेहोश हो जाती है। पर इस कहानी को थोड़ा मोड़ देकर प्रेमचंद ने इसे अन्धविश्वास-समर्थन के दोष से बचा लिया है। वास्तव में 'मूठ चला नहीं है। ओझा 'मूठ' चलाने उतारने का नाटक करके केन्द्रीय पात्र से पांच सौ रुपये झटक लेता है। इस नाटक से ही चोर स्वस्थ भी हो जाता है। कहानी के सतर्क पाठ से पता चलता है कि प्रेमचंद अंधविश्वास ग्रस्त ग्रामीणों और धूर्त ओझाओं का चित्रण करते हैं। पर कथा के आरंभ में 'मूठ' के प्रभाव का वर्णन पाठक को गलत संदेश देता है। यह कहानी भी तत्कालीन सामाजिक संरचना के अध्ययन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हो सकती है। इस स्थिति से उत्पन्न मनःस्थिति का चित्रण करने में भी प्रेमचंद सफल हैं। 

अन्धविश्वास समर्थित प्रेमचंद की कुछ कहानियां सामाजिक-नैतिक मूल्यों से जुड़कर कुछ सार्थकता प्राप्त कर लेती हैं, जैसे 'विध्वंस' में 'ईश्वरीय न्याय' के रूप में जमींदार की हवेली का जल जाना, 'गुप्त धन में अनैतिक तरीके से दूसरों का धन हथिया लेनेवाले बाप-बेटे का मर जाना, 'भूत' में मृत पत्नी का अपने पति के उसकी छोटी बहन से विवाह कर लेने के विरोध में बार-बार प्रकट होना, 'पिसनहारी का कुआं' में धरोहर के पैसे दबा लेने पर मृत गोमती का उसके विरोध में बार-बार प्रकट होना, 'मन्त्र' में मन्त्र द्वारा सांप के विष का उतर जाना आदि प्रसंग सामाजिक-नैतिक प्रश्नों से जुड़कर किंचित् सार्थक हो गये हैं और आज के उत्तर-आधुनिक पाठ में तो उनकी नये ढंग से व्याख्या भी की जा सकती है। 'विध्वंस' में जमींदार की हवेली के आकस्मिक रूप में जल जाने की व्याख्या दलित-आक्रोश की तीव्रता के रूप में, 'पिसनहारी का कुआँ' में धरोहर के धन हड़पने के विरोध के रूप में, 'मन्त्र' में गरीब आदमियों के हृदय में मानवीय संवेदना के बचे होने के रूप में, 'भूत' में पत्नी की मृत्यु के बाद पुत्री के रूप में पाली हुई साली से विवाह करने के नैतिक द्वन्द्व के रूप में संभव है। (डा. गोपाल राय, पृष्ठ 138) 

'नागपूजा' अन्धविश्वास पर आधारित कहानी है। आश्चर्य है कि प्रेमचंद बहुत गंभीरता से इस विषय पर कहानी लिखते हैं जिसमें एक नाग एक कुमारी लड़की से इतना प्रेम करता है कि जिससे भी उसका विवाह तय होता है, या विवाह हो जाता है, उसे वह डस लेता है। यदि इस कथा से किसी विशेष अभिप्राय की व्यंजना होती, यदि इस अन्धविश्वास के प्रति प्रेमचंद की दृष्टि व्यंग्य और आलोचना की होती, तो कहानी सार्थक होती, पर ऐसा कुछ नहीं दिखायी पड़ता। (डा. गोपाल राय)

'पिसनहारी का कुआं' नैतिक मूल्यबोध की कहानी है धरोहर के पैसे दबा लेने का बुरा परिणाम होता है, यही इस कहानी का प्रतिपाद्य है। पर परिणाम दिखाने के लिए प्रेमचंद ने अतिलौकिक बातों का समावेश कर दिया है, जिससे ऐसी बातों में उनके भी विश्वास की पुष्टि होती है। मसलन जब चौधरी विनायक सिंह मृत गोमती के कुआं बनवाने की धरोहर के पैसे अपने बेटे को नहीं देते, तो उनकी पत्नी स्वयं जाकर पैसे लाना चाहती है। पर ले नहीं पाती, क्योंकि वहां उसे गोमती खड़ी दिखायी पड़ती है। उसका बेटा भी ऐसा ही अनुभव करता है। गोमती अपनी धरोहर की रक्षा कर रही है। पर वह चौधरी को पैसे लेने से नहीं रोकती। चौधरी उस पैसे से अपने बेटे का कर्ज चुका देते हैं। कुआं नहीं बन पाता। चौधरी के बेटे को व्यापार में सदा नुकसान ही होता रहता है इस तरह बारस वर्ष बीत जाते हैं। बाप-बेटे की मृत्यु के बाद विधवा बहू को जो लड़की पैदा होती है, वह और कोई नहीं बल्कि गोमती ही है। उसके उद्योग से कुआं तैयार हो जाता है, और उसी दिन वह मर भी जाती है। तात्पर्य यह कि जब तक कुआं तैयार नहीं होता गोमती की आत्मा भटकती रहती है, और कुआं तैयार हो जाने पर उसे शान्ति मिल जाती है। इस अतिलौकिक घटना का कोई तर्क नहीं है। (डा. गोपाल राय, पृष्ठ 201, पाद टिप्पणी 141)

प्रेमचंद-जयन्ती और इतिहास की लीपापोती

कल प्रेमचंद की जयन्ती थी। वक्ताओं की कमी नहीं रही। कुछ ऑफलाइन बोले तो कुछ ऑनलाइन। कुछ लोग सन्तुलित बोले तो अधिकतर बहके-बहके से। दिल्ली विश्वविद्यालय की विदुषी सुधा सिंह भी छात्रों, शोधकर्ताओं और विद्वान मित्रों को ऑनलाइन संबोधित कर रही थीं। अपनी बात कहने से ज्यादा दूसरों के कहे की लीपापोती कर रही थी। लीपापोती के क्रम में उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की पहली शादी बचपन में हो गई थी। यह प्रेमचंद का फैसला नहीं था। उनको जब फैसले लेने का मौका मिला तो उन्होंने एक 'विधवा' को चुना। यह कहकर उन्होंने प्रेमचंद को समाज से आगे चलनेवाला बताया। बिना पढ़े बोलनेवाले को लगता है कि वह सब नया-नया और मौलिक स्थापना दे रहा है। सही है कि प्रेमचंद का बालविवाह हुआ था लेकिन यह ऐसा 'बालक' था जिसकी आँख में पत्नी का उम्र में बड़ा होना सबसे ज्यादा चुभा था। शिवरानी देवी की लिखी किताब का भरोसा करें तो 'बालक प्रेमचंद' को सबसे पहले पत्नी की उम्र दिखी, सुंदरता-कुरूपता इसके बाद ही आती है। फिर भी प्रेमचंद इस शादी को निभा ले जाते। प्रेमचंद ने स्वीकार किया है कि 'अगर बीच में चाची न होतीं तो शायद मेरी उनकी ज़िंदगी एक साथ बीत भी जाती। (वही, पृष्ठ 11) पिता के फैसले ने प्रेमचंद की सुप्त इच्छा को हवा दी। उनका मानना था कि उनके ससुर ने उनके बेटे को कुएं में धकेल दिया है इसलिए वे उसकी दूसरी शादी अवश्य करेंगे। बालक प्रेमचंद को पिता का यह फैसला मालूम था और इस तरह दूसरी शादी की उनकी राह आसान हो गई थी। किन्तु राह इतनी भी आसान नहीं थी कि प्रेमचंद इसे डंके की चोट पर घोषित कर के करते। आज भी और तब भी समाज इतना प्रगतिशील नहीं था कि एक शादीशुदा व्यक्ति को कोई पिता अपनी अब्याहता लड़की देता। इसलिए जो लोग इस प्रेमचंद के विधवा-विवाह के 'फैसले' को क्रांतिकारी कदम घोषित करने को उतावले हो रहे हैं, वे सर्वप्रथम अपने पाँव जमीन पर कर लें। अब हवाबाजी का समय नहीं रहा। सच्चाई तो यह है कि दूसरी शादी की सारी बात प्रेमचंद ने गुप्त रखी थी। उनके घर के लोग भी इस योजना से वाकिफ नहीं थे। आशंका थी कि बात प्रकट करने पर उनके ब्याहता होने की चर्चा होगी और दूसरी शादी में विघ्न उपस्थित होगा। मैं अपनी बात के समर्थन में शिवरानी देवी की किताब 'प्रेमचंद : घर में' से दो उद्धरण पेश करता हूँ। शिवरानी देवी कहती हैं, 'एक की मिट्टी पलीद कर दी। जिसकी कुरेदन मुझे हमेशा होती है। जिसे मैं बुरा समझती हूँ, वह हमारे ही यहाँ हो और हमारे हाथों हो। मैं स्वयं तकलीफ सहने को तैयार हूँ; परन्तु स्त्री जाति की तकलीफ़ मैं नहीं देख सकती। उसी का प्रायश्चित शायद मुझे भी करना पड़ेगा; हालांकि मैं बेगुनाह हूँ। मेरे पिता को मालूम होता तो आपके साथ मेरी शादी हर्गिज़ न करते।' (प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 10) आगे, 'आप पुरुष थे, आप मुझे ब्याह लाये, वे तो घर में बैठी हैं। यह क्या स्त्रियों के साथ अन्याय नहीं है? मैं भी बदसूरत होती, तो आप मुझे भी छोड़ देते। अगर मेरा बस होता तो मैं सब जगह ढिंढोरा पिटवाती कि कोई भी तुम्हारे साथ शादी न करे।' (प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 10-11) प्रेमचंद झेंपते हुए कहते हैं, 'इसीलिए तो तुम्हें मालूम न हुआ'। (वही, पृष्ठ 11)

प्रेमचंद का तीन स्त्रियों के साथ संपर्क रहा। पहली स्त्री के जीवन-काल में ही आपने एक और स्त्री से संबंध बनाया। शिवरानी देवी के साथ शादी के बाद भी प्रेमचंद का उस स्त्री के साथ सम्बन्ध बना रहा। सवाल है कि उस स्त्री के रहते प्रेमचंद ने शिवरानी देवी के साथ शादी क्यों की, वह स्त्री प्रेमचंद की पत्नी क्यों नहीं बन सकी?

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