राजा शिवप्रसाद 'सितारेहिंद' की प्रतिक्रिया में सन 1880 ईस्वी के 'सारसुधानिधि' में एक प्रस्ताव-लेख छपा कि हरिश्चन्द्र को 'भारतेन्दु' की पदवी मिलनी चाहिए, इसको एक स्वर से सारे देश ने स्वीकार कर लिया और सब लोग इन्हें भारतेन्दु लिखने लगे, यहाँ तक कि भारतेन्दु जी इनका उपनाम ही हो गया। इस पदवी को न केवल इस देश के लोगों ने स्वीकार किया, वरंच यूरोप के लोग भी इन्हें बराबर भारतेन्दु लिखने लगे। (राधाकृष्ण दास, भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र का जीवन चरित्र, पृष्ठ 85-86) आइए, इस भारतेन्दु को जानें।
भारतेन्दु की इतिहास दृष्टि
इतिहास पर भारतेन्दु ने कई किताबें लिखीं। (हेमंत शर्मा (संपादक), भारतेन्दु समग्र, वाराणसी, 1987, पृष्ठ 583-803; मुंशी विनायक प्रसाद, तवारीख़-ए-उज्जैनिया, नवल किशोर प्रेस, लखनऊ, वॉल्यूम 1, पृष्ठ 5; सुरेन्द्र गोपाल, उर्दू हिस्ट्रियोग्राफी इन बिहार इन द नाइंटीटिन्थ सेंचुरी, के पी जायसवाल रिसर्च इंस्टीट्यूट, नवंबर, 2000, पृष्ठ 79) 'तवारीख़-ए-उज्जैनिया' लिखने के पहले लेखक मुंशी विनायक प्रसाद ने कई विद्वानों को विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित किया था। भारतेन्दु भी इतिहास लेखक के बतौर उपस्थित हुए थे। विनायक प्रसाद ने लिखा है कि भारतेन्दु ने मौखिक इतिहास के उपयोग के बारे में 18 महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जोर दिया था। भारतेन्दु के लिए मौखिक स्रोत स्थानीय इतिहास लेखन के लिए सबसे भरोसेमंद हैं। स्थानीय परंपरा को जानने-समझने के लिए उन्होंने गांवों के भ्रमण की बात कही। और इन अवसरों पर महत्वपूर्ण भवनों, बगीचों, तालाबों आदि को सूचीबद्ध करने की आवश्यकता पर बल दिया। भवन-मंदिर तथा दूसरे किसी स्थापत्य के नमूने के निर्माता, उसकी शैली आदि के बारे में भी जानकारी लिपिबद्ध हो जाये तो क्या कहने। गांव के नाम के साथ-साथ इसके संस्थापक के नाम व अन्य जानकारियां इकट्ठी की जाएं। आसपास के धनी तथा प्रसिद्ध लोग व गांव के बारे में पूर्वप्रचलित किस्से-कहानियां भी टांक ली जाएं। भारतेन्दु ने स्थानीय अर्थव्यवस्था, कृषि एवं शिल्प के दस्तावेजीकरण पर भी बल दिया। भारतेन्दु की स्पष्ट राय थी कि इतिहास सिर्फ उज्जैनिया सरदारों की वंशावली, उनके युद्ध और जय-पराजय के किस्से न हों, बल्कि दर्पण की भांति दिखा सके कि आम जन अतीत में कैसे रहते थे। (भारतेन्दु समग्र, पृष्ठ 5-7; सुरेन्द्र गोपाल, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 79)
भारतेंदु और विवाह-गीत में गाली
बाबू शिवनंदन सहाय ने लिखा है-'यह (भारतेंदु) विवाह आदि में बुरे गीत गाना पसंद नहीं करते थे वरन मई 1880 में जब इनकी कन्या का विवाह हुआ तो उस समय इन्होंने अपने घर गाली का गाना बन्द कर दिया।' (बाबू शिवनंदन सहाय, हरिश्चंद्र, पृष्ठ 251-52; चंदन कुमार श्रीवास्तव, 'हिन्दी नवजागरण और नारी नर सम होंहिं', परिषद पत्रिका (स्त्री विमर्श विशेषांक), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, अप्रैल 2003-मार्च 2004) 'कविवचनसुधा' में यह बात प्रकाशित हुई और भारतेंदु के मित्र ठाकुर जाहर सिंह ने आगरे से इनको पत्र लिखकर धन्यवाद दिया कि "आपने यह अच्छा प्रबंध किया कि विवाह में जो स्त्री बुरा-बुरा गीत गाती थीं तिस की रीति उठा दी।" (शिवनंदन सहाय, पूर्वोद्धृत) इस पत्र में भारतेंदु से कहा गया कि हमारी जाति की स्त्रियां अच्छा गीत नहीं जानतीं अतः "आपसे मेरी प्रार्थना है कि कोई पुस्तक ऐसी बने जिसमें हर समय के गीत अच्छे-अच्छे और सरल भाषा में होंय जो स्त्रियां उनको पढ़कर बुरी चाल के गीत आदि को छोड़ दें।" (वही) विवाह में गाली-गीत से परहेज रखनेवाले भारतेन्दु हरिश्चंद्र विधवा समस्या पर लिखते हुए 'भ्रूणहत्या' शीर्षक लेख में कहते हैं कि 'स्त्री सती तभी तक है, जब तक मौका नहीं मिला' अर्थात स्त्रियों को स्वतंत्र रहने का कोई अधिकार नहीं है। (डा. पूर्णिमा मौर्या, 'नवजागरणकालीन पत्रिकाएं और आरंभिक नारीवाद', नमन (अर्धवार्षिक), वर्ष 6, अंक 8)
ध्यान रहे, रामविलास जी द्वारा बतायी गयी 'हिन्दी जाति' के एक महाकवि जो किसान चेतना के कवि हैं-वे तुलसीदास, विवाह के बुरे गीतों से परेशान नहीं हैं। वहाँ जनकपुर में जब विवाह संपन्न होता है तो स्त्रियां गाती हैं-'जेंवत देहि मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी'। आखिर अपनी परंपरा से प्रेरणा लेनेवाले भारतेंदु जो उसी 'हिन्दी जाति' के संस्थापक और 'राष्ट्रीय संस्कृति' की नींव रखने वाले हैं-यहां विवाह के बुरे गीत क्यों रोक रहे हैं? (चंदन कुमार श्रीवास्तव, पूर्वोद्धृत)
भाषा के बारे में इस तरह का ख्याल रखने वाले अकेले भारतेन्दु ही नहीं थे। जिक्र है कि फैलन ने एक पढ़े-लिखे आदमी से लोकगीत इकट्ठा करने को कहा। उसने लोकगीत इकट्ठे किये पर लिखा-'इसकी भाषा बहुत अशुद्ध है; उसे सुधारकर भेजने में कुछ समय लगेगा।' (रामविलास शर्मा, भारतेन्दु-युग और हिन्दी भाषा की विकास-परंपरा, राजकमल प्रकाशन, 1975, पृष्ठ 266-67) एक अन्य अंग्रेजी तथा प्राच्य भाषाओं के विद्वान ने फैलन से कहा कि 'नजीर के उद्धरणों से अपने कोश को भ्रष्ट न करें।' (वही, पृष्ठ 267) फैलन का विचार था कि 'सबसे स्वाभाविक और जोरदार मुहावरे लिखित भाषा में नहीं, बोलचाल की भाषा में देखने को मिलते हैं।' (वही, पृष्ठ 264) उन्होंने उत्सवों-त्योहारों में बिहार के अपढ़ जनों को अश्लील गीत गाते और अनुरूप मुद्राएं बनाते देखा था। उनका स्पष्ट मानना था कि ये लोग ऊपर से देखने में अश्लील किन्तु व्यवहार में उन लोगों से कहीं ज्यादा ईमानदार थे जो अपनी नैतिकता की चादर के नीचे हर तरह की बेईमानी छिपाये हुए थे। जीवन में यह सब भी है; उसे छिपाया क्यो जाय? (वही, पृष्ठ 260)
भारतेन्दु और हिन्दी पत्रकारिता
भारतेन्दु जिस दौर के पत्रकार हैं वह हिंदी पत्रकारिता का आरंभिक काल है। तब अखबार का सारा दारोमदार संपादक के ऊपर होता था। संपादक को अखबार की ज्यादातर सामग्री खुद ही तैयार करनी होती थी। कभी-कभी तो पूरा का पूरा अखबार एक अकेला संपादक ही लिख मारता था। डा. राजेन्द्र लाल मित्र स्वयं भारतेन्दु बाबू को 'लिखने की मशीन' कहा करते थे। 'आनन्दकादम्बिनी' के संपादक बद्रीनारायण चौधरी लगभग पूरा अखबार खुद ही रंग डालते थे। 1904-5 के दिनों तक 'सरस्वती' 'मासिक पुस्तक' ही बनी रहती है और जिसका अभिप्रेत था कि जरूरत पड़ने पर एक अकेला आदमी अर्थात संपादक ही सारे लेख लिख डाले। भारतेन्दु इसे पत्रकार-कला के विरुद्ध मानते थे, इसलिए 'आनन्दकादम्बिनी' के संपादक को लिखा था : 'जनाब यह किताब नहीं है कि जो आप इकेले ही इकराम करते हैं बल्कि अखबार है कि जिसमें अनेक-जन-लिखित लेख होना आवश्यक है और यह भी जरूरत नहीं कि सब एक ही तरह के लिखक्कड़ हो।' (रामरतन भटनागर, भारतेन्दु हरिश्चंद्र : एक अध्ययन, किताब महल, इलाहाबाद, 1947, पृष्ठ 106-7)
भारतेन्दु जी ने सन 1873 में 'हरिश्चंद्र मैगजीन' नामक प्रथम मासिक पत्रिका निकाली और यही आठ संख्याओं के अनन्तर 'हरिश्चंद्र चंद्रिका' हो गई। इसी में हिन्दी गद्य का वह परिष्कृत रूप पहिले-पहिल दिखलाई पड़ा जिसे देश की हिंदीभाषी जनता ने उत्कण्ठापूर्वक अपनाया। भारतेन्दु जी ने स्वरचित 'कालचक्र' में लिखा भी है कि 'हिंदी नई चाल में ढली, सन 1873 ईस्वी'। (ब्रजरत्नदास, भूमिका, भारतेन्दु के निबंध, पृष्ठ 6) 'नए चाल में हिन्दी ढली' के संबंध में भारतेन्दु का जीवन-चरित लिखने वाले एक विद्वान का कहना है कि उन्होंने इसके साथ 'हरिश्चन्द्री (हिंदी)' शब्द भी लिखा था, पर छापनेवाले की असावधानी से वह छूट गया और न छप सका। (केसरीनारायण शुक्ल, भारतेन्दु के निबंध, प्राक्कथन, पृष्ठ 11)
1880 तक हरिश्चंद्र ने बड़े उत्साह से प्रकाशित किया। इस पर अंग्रेजी में लिखा रहता था : "A monthly journal published in connection with Kavi Vachan Sudha, contain articles on literary scientific and religious subjects, antiquity reviews, dramas, history, novels, political selections, gosits, human wit." (भारतेंदु : एक अध्ययन, पृष्ठ 104 में उद्धृत)। स्पष्ट है कि भारतेन्दु इस पत्र को सार्वविषयक (Miscellany) बना रहे थे। इतने विषयों की एक साथ कल्पना ही अभी के लिए बड़ी बात थी। एक तरह से यह द्विवेदी जी की 'सरस्वती' के पहले सरस्वती की कल्पना थी। (भारतेन्दु एक अध्ययन, पृष्ठ 104)
1880 ईस्वी में मोहनलाल विष्णुलाल पांड्या इसे उदयपुर से प्रकाशित करने लगे तब इसका नाम बदलकर 'हरिश्चन्द्रचंद्रिका और मोहनचंद्रिका' हो गया। भारतेन्दु अपने पत्र की प्रगति से बहुत असंतुष्ट थे इसलिए 1884 ईस्वी से उन्होंने रिक्तहस्त होते हुए भी इसे पुनः 'नवोदिता हरिश्चंद्र चंद्रिका' के नाम से काशी से प्रकाशित करना शुरू किया। दो संख्या ही निकल पाई थी कि उनकी मृत्यु हो गई। आपके छोटे भाई गोपालचंद ने इसकी तीसरी संख्या निकाली। पांड्या जी ने कहा कि भारतेन्दु ने पत्रिका उन्हें सौंपी थी इसलिए कानूनी पचड़े के भय से प्रकाशन बन्द कर दिया गया। (भारतेन्दु एक अध्ययन, पृष्ठ 105)
'हरिश्चंद्र चंद्रिका' की अंतिम संख्याओं में प्रकाशित शान्तरस की कविता सब मृत्यु के समय की बनी हुई है। उनका अंतिम पद था : "डंका कूच का बज रहा मुसाफिर जागो रे भाई।/देखो लाद चले पन्थी सब तुम क्यों रहे भुलाई।।/जब चलना ही निहचै है तो लै किन माल लदाई।/हरीचंद हरि पद बिनु नहिं तौ रहि जैहौ मुँह बाई।।" (भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र का जीवन चरित्र, पृष्ठ 93)
'हरिश्चंद्र चंद्रिका' की पत्रकारिता के बारे में डॉ. रामविलास शर्मा का मानना है कि साहित्य और पत्रकारिता के माध्यम से भारतेन्दु ने राष्ट्रीय सम्मान की भावना जाग्रत की, साहित्यिक रुचि का संवर्द्धन किया और हिन्दी भाषा को देश के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन में ऊंचा स्थान दिलाने के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया। (डा. रामविलास शर्मा, पूर्वोक्त, पृष्ठ 104)
'कविवचन सुधा' के सिद्धांत वाक्य या 'मोटो' के लिए भारतेन्दु ने निम्नलिखित छंद की रचना की थी-'खल गगन सो सज्जन दुखी/मति होहिं, हरिपद मति रहै।/उपधर्म छूटै, स्वत्व निज/भारत गहै, कर दुख बहै।।/बुध तजहिं मत्सर, नारि नर/सम होहिं, जग आनंद लहै।/तजि ग्राम कविता सुकवि जन/की अमृतबानी सब कहैं।।' (राधाकृष्ण दास, पूर्वोद्धृत, अमृतलाल नागर की टिप्पणी, पृष्ठ 'छ') राधाकृष्ण दास ने ठीक ही लिखा है कि "यद्यपि इन बातों का कहना कुछ कठिन प्रतीत नहीं होता है परंतु उस अंधपरंपरा के समय में इनका प्रकाश्य रूप में इस प्रकार कहना सहज न था। नव्य शिक्षित समाज को 'हरिपद मति रहै' कहना जैसा अरुचिकर था, उससे बढ़कर लकीर के फकीरों को 'उपधर्म छूटै' कहना क्रोधोन्नमत करना था। जैसा ही अंग्रेज हाकिमों को 'स्वत्व निज भारत गहै, कर (टैक्स) दुख बहै' कहना कर्णकटु था, उससे अधिक 'नारि नर सम होंहिं' कहना हिंदुस्तानी भद्र समाज को चिढ़ाना था। परंतु वीर हरिश्चंद्र ने जो जी में ठाना उसे कह ही डाला और जो कहा उसे आजन्म निभाया भी।" (राधाकृष्ण दास, पूर्वोक्त, अमृतलाल नागर की टिप्पणी, पृष्ठ 'छ')
23 मार्च 1874 की 'कविवचन सुधा' में भारतेन्दु ने एक प्रतिज्ञा-पत्र प्रकाशित किया था : 'हम लोग सर्वांतदासी सब स्थल में वर्तमान सर्वद्रष्टा और नित्य सत्य परमेश्वर को साक्षी देकर यह नियम मानते हैं और लिखते हैं कि हम लोग आज के दिन से कोई विलायती कपड़ा नहीं पहिनेंगे और जो कपड़ा पहिले से मोल ले चुके हैं और आज की मिती तक हमारे पास है उनको तो उनके जीर्ण हो जाने तक काम में लावेंगे पर नवीन मोल लेकर किसी भांति का भी विलायती कपड़ा न पहिरेंगे हिंदुस्तान का ही बना कपड़ा पहिरेंगे हम आशा रखते हैं कि इसको बहुत ही क्या प्रायः सब लोग स्वीकार करेंगे और अपना नाम इस श्रेणी में होने के लिए श्रीयुत बाबू हरिश्चंद्र को अपनी मनीषा प्रकाशित करेंगे और सब देशहितैषी इस उपाय के वृद्धि में अवश्य उद्योग करेंगे।" (डॉ. रामविलास शर्मा, भारतेन्दु युग; डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र, हिन्दी पत्रकारिता : जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण-भूमि, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, पृष्ठ 92 में उद्धृत)। डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि 'कांग्रेस ने अभी स्वदेशी आंदोलन विधिपूर्वक न आरम्भ किया था, न बंगभंग आंदोलन ने जन्म लिया था। केवल हिन्दी में भारतेन्दु ने स्वदेशी आंदोलन का सूत्रपात बहुत पहले कर दिया था।' (रामविलास शर्मा, भारतेन्दु युग)
भारतेन्दु की पत्रकारिता और स्त्री-चेतना
9 जनवरी, 1874 को भारतेन्दु ने बालाबोधिनी पत्रिका निकाली। यह महिलाओं की मासिक पत्रिका थी। इसके प्रथम अंक के प्रथम पृष्ठ पर जो निवेदन प्रकाशित हुआ था वह नारी जागरण की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही भाषा-शैली और अभिव्यक्ति की दृष्टि से भी उल्लेखनीय है : "मेरी प्यारी बहिनो! मैं तुम्हारी एक नयी बहन 'बालाबोधिनी' आज तुमसे मिलने आयी हूँ और मेरी यही इच्छा है कि तुम लोगों से, सब बहिनों से, सब महिनों में एक बार मिलूँ, मैं तुम लोगों से अवस्था में कितनी छोटी हूँ और इस नाते से तुम सबकी छोटी बहिन हूँ पर मैं तुम लोगों में हिलमिल कर सहेलियों-संगिनी की भांति रहना चाहती हूँ, इससे मैं तुम लोगों से हाथ जोड़कर और आँचल खोलकर यही माँगती हूँ कि मैं जो कभी कोई भली-बुरी, कड़ी-नरम, कहनी-अनकहनी, कहूँ उसे मुझे अपनी समझकर क्षमा करना क्योंकि मैं जो कुछ भी कहूँगी सो तुम्हारे हित की कहूँगी.....।" (डा. सुशीला जोशी, हिन्दी पत्रकारिता : विकास और विविध आयाम, राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर, द्वितीय संस्करण : 1991, पृष्ठ 32-33)
भारतेन्दु हरिश्चंद्र स्त्री विषयक पत्रिका तो निकालते हैं, किन्तु उसमें स्त्रियों को वही परंपरागत शिक्षा दी जाती है, जिसमें उन्हें एक 'अच्छा गुलाम' बनने के 'गुर' सिखाये जाते थे। दो वर्षों तक प्रकाशित इस मासिक पत्रिका के किसी भी अंक में स्त्रियों के अधिकार के सवाल नहीं उठाये गये, न ही उन्हें नये ज्ञान-विज्ञान की रौशनी में अपने जीवन के बारे में खुद सोचने की कोई प्रेरणा दी गई। 'नारि नर सम होहिं' का नारा देनेवाले भारतेन्दु अपने बलिया वाले प्रसिद्ध व्याख्यान 'भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है' में कहते हैं-'लड़कियों को पढ़ाइए, किन्तु उस चाल से नहीं; जैसे आजकल पढ़ाई जाती है, जिससे उपकार के बदले बुराई होती है। ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल-धर्म सीखें, पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज शिक्षा दें।' (केसरीनारायण शुक्ल, भारतेन्दु के निबंध, पृष्ठ 45) (यह बलिया में ददरी के मेले के समय आर्य देशोपकरिणी सभा में दिया गया भाषण है। इसे भारतेन्दु के सेक्रेटरी इंदिरायन उपाध्याय ने पढ़ा था जो बाद में नवोदिता हरिश्चंद्र चंद्रिका के दिसंबर, 1884 के अंक में प्रकाशित हुआ। (केसरीनारायण शुक्ल, भारतेन्दु के निबंध, पृष्ठ 41)
'बालाबोधिनी' में व्यक्त स्त्रियोद्धार के संदर्भ में वीर भारत तलवार लिखते हैं कि 'इस मासिक पत्रिका में स्त्रियों की हालत सुधारने के बजाय खुद स्त्रियों को ही सुधारने का इरादा दिखाई देता है। इसमें उनके अधिकारों की नहीं, उनके कर्तव्यों की चर्चा की गई है।' (डॉ. पूर्णिमा मौर्या, पूर्वोक्त लेख में उद्धृत) इस पत्रिका में स्त्रियों से संबंधित सबसे लंबी रचना 'बाला प्रबोध' थी, जो 1857 की जनवरी से शुरू होकर अगले तीन-चार अंकों तक छपी। बिजनौर (पीलीभीत) के पास सिकंदराबाद के निवासी हीरालाल ने इसे सरकारी स्कूलों में लड़कियों के पाठ्यक्रम में लगवाने के मकसद से लिखा था। यह ठीक वैसा ही था, जैसा पाठ्यक्रम भारतेन्दु चाहते थे। "इसमें सास-ससुर, देवर-ननद, जेठ-जिठानी, शिशु आदि के प्रति और रस्म-रिवाजों तथा त्यौहारों के वक्त घर की बहू को कैसा सुंदर और योग्य वर्ताव करना चाहिए, इसका बखान किया गया है।" (पूर्णिमा मौर्या, पूर्वोक्त लेख में उद्धृत) पूरी रचना 1870 में छप चुकी डिप्टी नजीर अहमद की किताब 'मिरात-उल-उरूस' के ढर्रे पर बनी है। नजीर अहमद ने अपनी इस बेहद लोकप्रिय किताब में स्त्री-शिक्षा की जबरदस्त हिमायत की है, लेकिन साथ ही उन्होंने चेतावनी भी दी है कि 'वे मर्दों की बराबरी करने की बात अपने दिमाग में हर्गिज न लाएं।' (पूर्णिमा मौर्या, पूर्वोक्त लेख में उद्धृत)
भारतेन्दु मंडल और भारतेन्दु का हिन्दू-मन
भारतेन्दु मंडल के लेखकों में 'सुकवि' अम्बिकादत्त व्यास (1858-1900) नाम के एक बड़े विद्वान हुए हैं। 'सुकवि' की उपाधि उन्हें भारतेंदु की अनुशंसा पर कवितावर्धिनी सभा काशी से मिली थी। भारतेन्दु ने विक्टोरिया रानी की प्रशंसा में 'चिरजीवी रहो विक्टोरिया रानी' समस्यापूर्ति का आयोजन किया था। 'सामवतम' (म हलयुक्त), 'गोसंकट', 'भारत सौभाग्य', 'कलियुग और घी' आदि उनके नाटक काफी चर्चित हुए हैं। इनके अधिकतर नाटकों में मुसलमानों का विरोध, स्त्रियों की हीनता, प्राचीन भारत और अंग्रेजी राज पर समान रूप से गर्व आदि अभिव्यक्त हैं। 'सामवतम' नाटक में दुर्वासा मुनि अपने मित्रपुत्र सामवान (न हलयुक्त) को 'स्त्री हो जाने का शाप देते हैं'। उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध का हिंदी लेखक 'स्त्री-जीवन' को शाप की तरह लेता है।
'गोसंकट' नाटक का जोर इस बात पर है कि मुसलमान गोहत्या को तत्पर रहते हैं जबकि हिंदू उसे माता मानते हुए रक्षार्थ प्रतिरोध करते हैं। व्यास जी के अधिकतर नाटक भारतेन्दु की प्रेरणा से लिखे गये हैं और लगभग सब में मुस्लिम विरोध/घृणा अभिव्यक्त है। मुस्लिम विरोध भारतेन्दु मंडल के अधिकतर लेखकों में है। भारतेंदु में भी है। बकरीद के मौके पर मुसलमानों ने गोहत्या की तो भारतेंदु ने पटने से प्रकाशित 'क्षत्रिय पत्रिका' के संपादक बाबू रामदीन सिंह को लिखा, 'भागलपुर, मिर्जापुर, काशी इत्यादि कई स्थानों में प्रकाश्यरूप से केवल हमारा जी दुखाने के हॉको-ठोक यह अत्याचार हुआ है जो किसी-किसी समाचार-पत्र में प्रकाश भी हुआ है। आप भी अपने पत्र में इस विषय का भली भांति आंदोलन कीजिए। सब पत्र एक साथ कोलाहल करेंगे। तब काम चलेगा। हिन्दी, उर्दू, बंगाली, मराठी, अंग्रेजी सब भाषाओं के पत्रों में जिनके संपादक हिन्दू हों एक बेर बड़े धूम से इसका आन्दोलन होना आवश्यक है आशा है कि अपने शक्य भर आप इस विषय में कोई बात उठा न रक्खेंगे।'
भारतेन्दु और हिंदी व्याकरण
बहुत कम लोगों को पता है कि भारतेन्दु और उनके गुरु शिवप्रसाद 'सितारेहिंद' की एक ही साल अर्थात 1875 में हिन्दी व्याकरण की पुस्तक छपी थी, लेकिन हिन्दी जगत में सर्वत्र भारतेंदु की किताब का प्रकाशन-वर्ष 1883 तथा 1884 छपा मिलता है। अंग्रेजी में लिखी तेज के भाटिया की किताब में इसका प्रकाशन वर्ष 1875 दर्ज है। ब्रिटिश म्यूजियम से प्रकाशित कैटलॉग में इसका प्रकाशन वर्ष 1875 ही अंकित है।
भारतेन्दु के निधन के बाद उनकी व्याकरण-पुस्तिका की हिंदी जगत में बहुत कम चर्चा हुई है। डॉ. धीरेन्द्रनाथ सिंह ने आधुनिक हिंदी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका में इस किताब की चर्चा की है। रामनिरंजन परिमलेंदु की किताब भातेन्दु काल के भूले बिसरे कवि (नागरी प्रचारिणी सभा, अकादमी, पटना) में तनिक अधिक जानकारी है। किंतु, दुखद है कि भारतेन्दु के जीवनीकारों ने इस किताब का उल्लेख नहीं किया है। और तो और, हेमन्त शर्मा द्वारा, संपादित भारतेन्दु समग्र (हिंदी प्रचारक संस्थान, वाराणसी, 1987) में भी भारतेन्दु की उक्त व्याकरण-पुस्तिका को शामिल नहीं किया गया है।
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