एक समय था जब विवाह नाम की संस्था नहीं थी। यौन स्वच्छंदता थी। आदिम साम्यवाद की तर्ज पर आप उसे 'यौन साम्यवाद' का युग कह ले सकते हैं। पुत्र, पिता का नहीं होता था बल्कि उसकी पहचान मां से होती थी। पिता अज्ञात थे। यह व्यक्तिगत/निजी संपत्ति के उदय से पहले का काल था जब पिता और पुत्र सभी कबीले की संपत्ति थे।
महाभारत के शांतिपर्व में गौतम के पुत्र चिरकारी की कथा है। एक बार अपनी पत्नी को व्यभिचार लिप्ता देखकर उन्होंने पुत्र से उसको मार डालने को कहा। पुत्र ने यह सोचकर कि पति ही जब स्त्री का रक्षक है तो उसके चरित्र-भ्रंश का दोष भी रक्षक का ही है, स्त्री का नहीं (265/40), माता को मार नहीं डाला। बाद में गौतम को अपनी 'साध्वी' पत्नी को इस प्रकार मार डालने के आदेश से बड़ा कष्ट हुआ। पर तपःस्थान से लौटकर जब देखा कि पत्नी मार नहीं डाली गई तो संतुष्ट ही हुए। गौतम की पत्नी ही अहल्या थी। अहल्या की कहानी नाना स्थानों में नाना भाव से वर्णित है। पर यहाँ (महाभारत में) जिस प्रकार कही गई है वही अधिक संगत जान पड़ती है। यहाँ न तो अहल्या के पत्थर होने का अभिशाप है न राम के चरणस्पर्श से पुनर्जीवन- लाभ। गौतम ने यहाँ बाद में ठीक ही समझा है कि राग, दर्प, मान, द्रोह, पाप और अप्रिय कार्य में देर से (धैर्यपूर्वक) काम करनेवाला (चिरकारी) ही प्रशस्त है और बंधु, सुहृद, भृत्य और स्त्री के अव्यक्त अपराध के मामलों में (सोच-समझकर धैर्यपूर्वक) देर से काम करनेवाला ही प्रशस्त है। (शांतिपर्व 265/70-71) चिरकारी यहाँ कहते हैं कि स्त्री अपराध नहीं करती, अपराध पुरुष करता है। (वही, 40) फिर संतान के लिए माता ही गुरु है, पिता नहीं; क्योंकि असल में तो माता ही जानती है कि संतान का असली पिता कौन है और उसका गोत्र क्या है (वही, 35)। (आचार्य क्षितिमोहन सेन, संस्कृति संगम, पृष्ठ 72-73 पर उद्धृत)
निजी संपत्ति के उदय के परिणामस्वरूप मां धीरे-धीरे नेपथ्य में गई और पिता सामने आया। अब भारतीय संस्कृति में पिता को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। धर्मग्रंथों में पितृऋण की चर्चा है। पिता बनकर ही इस ऋण से मुक्त हुआ जा सकता है। पिता ने पुत्र पर असीमित अधिकार प्राप्त कर लिया था। कठोपनिषद में वाजश्रवा और नचिकेता की कहानी के माध्यम से पिता-पुत्र संबंध में पिता की श्रेष्ठता, उसके वर्चस्व को दिखाया गया है। वाजश्रवा ने पुत्र नचिकेता को मृत्यु के देवता यम को दानस्वरूप दे डाला। मजेदार है कि नचिकेता ने मृत्यु के देवता यम से तो सवाल किया किन्तु एक पिता के इस असीमित अधिकार पर कोई सवाल खड़ा नहीं किया।
कालक्रम से पिता प्रभुत्वशाली होता गया। रामचरितमानस में भी एक पिता (दशरथ) के द्वारा वनगमन का अनुलंघ्य आदेश दिया जाता है। माता कौसल्या कहती हैं कि पिता की आज्ञा का पालन करना ही सब धर्मों का शिरोमणि धर्म है-"पितु आयसु सब धरमक टीका"। राम पिता की अवज्ञा करेंगे, यह बात कल्पना में भी नहीं आती। इस बात की कल्पना भी तुलसी के राम कर पाते हैं। वह भी भाई लक्ष्मण की मूर्छा को ढाल बनाकर। यहाँ राम कहते हैं कि अगर यह जानता कि वन में भाई से बिछड़ना होगा तो पिता की उस बात को नहीं मानता। कहने की जरूरत नहीं कि दशरथ द्वारा राम को वनगमन का दिया गया आदेश राजा से ज्यादा पिता का आदेश है।
मातृहन्ता परशुराम की कथा भी पिता के असीमित अधिकार ही की कहानी है। कहानी है कि जमदग्नि की पत्नी रेणुका एक दिन स्नान करने के लिए नदी-तट गई तो वहां उसने किसी गन्धर्वदंपति को जल में क्रीड़ा करते देखा। उस मनोहर दृश्य को देखकर उसके मन में ईर्ष्या जागी और वह उन दूषित विचारों से कलुषित हो गई। जब वह वापिस घर आई तो क्रोध के अवतार जमदग्नि ने उसे 'सतीत्व की कांति से हीन' देखकर बड़ा धमकाया और अपने पुत्रों को उसका सिर काट देने की आज्ञा दी। पहले चारों पुत्रों ने ऐसा क्रूर दुष्कृत्य करने में आनाकानी की। परशुराम उनका 'सबसे छोटा पुत्र' था। उसने तुरंत पिता की आज्ञा का पालन किया और कुल्हाड़े से अपनी माता का सिर काट डाला। (आप्टे, संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 438) तुलसीदास ने भी लिखा है, "परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी।। तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ।।" बल्कि तुलसी तो पुत्र को उचित-अनुचित देखने का न अवकाश देना चाहते हैं न अधिकार। कहते हैं कि जो अनुचित और उचित का विचार छोड़कर पिता के वचनों का पालन करते हैं, वे सुख और सुयश का पात्र होकर अंत में इंद्रपुरी में निवास करते हैं : "अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन। ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन।।" (रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा संख्या 174)
मौर्य शासकों की घोषणा है कि 'सारी प्रजा उसकी संतान है।' इसमें प्रजा के कल्याण की चिंता कम, पिता के असीमित अधिकार की घोषणा ज्यादा है। यह असीमित अधिकार प्राचीन भारतीय समाज में पिताओं को स्वेच्छा से अपनी पत्नी और बच्चों को बेचने तक का अधिकार प्रदान करता था। वह उन्हें दासों के रूप में भी बेच सकता था। पालि साहित्य में इसका सर्वोत्तम उदाहरण राजा वेस्सन्तर का है, जिसने अपनी पत्नी मद्दी और दो बच्चों को दासों के रूप में दे दिया। (जातक 6-456; देवराज चानना, प्राचीन भारत में दास प्रथा, पृष्ठ 101 में उद्धृत) राजा हरिश्चंद्र की कहानी भी है जिसने काशी नगरी में अपनी पत्नी और बच्चे को बेच दिया। पिता के इस असीमित अधिकार को कानूनी आवरण उस प्रसिद्ध स्मृतिश्लोक से मिलता है, जिसमें यह विधान है कि बेटे, पत्नी और दास का सम्पत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता। जो कुछ भी उनके पास होता है वह भी उनके स्वामी का अर्थात पिता, पति या स्वामी का अधिकार होता है। हमें राजा सोमक का और भी प्राचीनतर उदाहरण मिलता है जिसने अपना एकमात्र बेटा यज्ञार्थ दे दिया और राजा शिवि का उदाहरण भी जिसने अपने बेटे के मांस से तैयार एक थाल भोजन एक ऋषि को दिया।
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