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Thursday, September 17, 2026

दिनकर को पढ़ते हुए

दसवीं कक्षा की हिंदी पाठ्य-पुस्तक में काका साहब कालेलकर का कोई निबंध पढ़ना था। इसलिए कायदे से लेखक-परिचय के लिए जगह तो बनती ही थी। काका कितना कुछ पढ़ते थे यह बताने के लिए मेरे हिंदी शिक्षक के पास एक किस्सा होता। वे कहते, एक दिन कालेलकर तांगे पर बैठे पुस्तक पढ़ते हुए कहीं जा रहे थे। रास्ते में अचानक तांगा टूट गया और सारे यात्री इधर-उधर बिखर गये। तांगेवाले ने तांगे की मरम्मत कर चुकने के बाद यात्रियों को बिठाया। गिनती की तो एक आदमी कम पड़ जा रहा था। इधर-उधर बहुत नजर दौड़ाने के बाद कालेलकर एक गड्ढे में किताब पढ़ते दिखे। तांगेवाले ने आवाज दी, ‘साहब, तांगे पर नहीं चलेंगे ?’ ‘तो क्या मैं तांगे पर नहीं हूं?’, कालेलकर ने अत्यंत सहजता से पूछा। बहुत समझाने के बाद काका यह मानने को राजी हुए कि वे तांगे पर नहीं किसी गड्ढे में गिरे समाधिस्थ बैठे हैं। अब वे तनिक मुस्कुराये और तांगे पर आकर बैठ गये। कालेलकर के बारे में सुनाया उनका यह किस्सा मैं भी अपने छात्रों को ‘अविश्वसनीय’ मानकर सुना चुका हूं। 

इधर अपने स्कूल की लाइब्रेरी में दिनकर की 'संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ' किताब दिखी। इसमें ‘काका साहब कालेलकर’ एक अध्याय है। दिनकर ने भी कालेलकर से संबंधित एक किस्सा सुनाया है। किस्सा कुछ इस तरह है-‘जब काका साहब की भतीजी का ब्याह हुआ, कन्यादान का कर्म काका साहब ने ही किया था। विवाह के कुछ दिनों बाद काका साहब के नये भतीजदामाद काका साहब से मिलने को वर्धा पहुंचे; किंतु काका साहब ने उन्हें पहचाना ही नहीं, न दामाद साहब ने अपना परिचय देने की उदारता दिखायी। वे काका साहब के घर से लौट गये और उन्होंने काका साहब के बड़े भाई साहब को एक अप्रसन्नता-सूचक पत्र लिखा। यह पत्र काका साहब के भाई ने काका साहब को भेज दिया और साथ में कुछ ऐसी बातें भी लिख भेजीं, जो उलाहने की मुद्रा में लिखी जा सकती थीं। अब काका साहब क्या करते? उन्होंने आदमी भेजकर दामाद को बुलवाया, कई दिनों तक पुत्रवत् स्नेह से उन्हें अपने पास रखा और जाने के समय उनकी अच्छी बिदाई की। जब दामाद जाने लगे, काका साहब ने हंसते-हंसते कहा, ‘‘बेटा, तुम्हें नहीं पहचान सका, उसका दंड मैंने भर दिया। चाहो तो मेरे कान भी मल दो। लेकिन यह वादा नहीं करूंगा कि आगे तुम्हें जरूर पहचान लूंगा।’’ (पृष्ठ 63) 

एक दूसरी किताब आधुनिक भारत के निर्माता (प्रकाशन विभाग) श्रृंखला की है। किताब का नाम है 'काका साहब कालेलकर' और इसके लेखक रवीन्द्र केलेकर हैं। वे लिखते हैं कि 'चूँकि बड़े भाई गुजर चुके थे, इसलिए कन्यादान का काम दत्तोपंत (बचपन का नाम) को करना पड़ा था। कुछ समय बाद दत्तोपंत बेलगाँव में किसी से मिलने जा रहे थे। रास्ते में सामने की ओर से एक सज्जन आते दिखाई दिए। सामनेवाले ने दत्तोपंत को नमस्कार किया। बदले में दत्तोपंत ने भी उन्हें नमस्कार किया। वे पहचान नहीं पाये थे कि जिनको उन्होंने नमस्कार किया वे उनके दामाद थे।' (रवींद्र केलकर, काका साहब कालेलकर, प्रकाशन विभाग, पृष्ठ 180)

इस कहानी के बाद मेरी समझ में नहीं आ रहा कि अपने शिक्षक को ‘अविश्वसनीय’ मानूं या दिनकर अथवा स्वयं काका को ? इस किताब में इसी तरह के और भी कई दिलचस्प संस्मरण हैं। 

भाषा और साहित्य का डॉक्टर लोहिया हूँ!

दिनकर ने लिखा है कि 'समाजवादी नेताओं में से कुछ को अध्यात्म ने खींचा तो कुछ को व्यक्तिवाद ने। (दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1987, पृष्ठ 153) लोहिया का वे विस्तार से वर्णन करते हैं-'1934 का लोहिया युवक होते हुए भी विनयी और सुशील था किन्तु बुढ़ापे के समीप पहुंचकर वे उग्र हो गये थे। जवाहरलाल नेहरू को लेकर संभवतः एक ग्रंथि विकसित हो गयी थी। उनका विचार बन गया था कि जवाहरलाल जी से बढ़कर इस देश का अहित और किसी ने नहीं किया है तथा जब तक देश में कांग्रेस का राज है, तब तक देश की हालत बिगड़ती ही जायेगी। अतः उन्होंने निर्द्वन्द्व और सीधी राय बना ली थी कि जवाहरलाल जी का जितना भी विरोध किया जाय, वह कम है और कांग्रेस को उखाड़ने के लिए जो भी रास्ते दिखायी पड़ें, उन्हें जरूर आजमाना चाहिए।' (दिनकर, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 154)

आजाद भारत में भी लोहिया को कई बार जेल जाना पड़ा था। एक बार वे जिस जेल में कैद किये गये थे, जवाहरलाल नेहरू की एक प्रतिमा स्थापित थी। जेल से छूटने पर लोहिया के मित्रों ने उनसे पूछा, "कहिए, इस बार का कारावास कैसा रहा?" लोहिया ने कहा, "कुछ मत पूछो। मैं जिस कोठरी में कैद था, उसी के सामने नेहरू की मूर्ति खड़ी थी और हर वक्त मेरी नजर उसी पर पड़ जाती थी। जल्दी रिहाई हो गयी, नहीं तो उस मूर्ति को देखते-देखते मैं पागल हो जाता।" (दिनकर, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 154)

सन 1962 ईस्वी के अक्टूबर में, चीनी आक्रमण से पूर्व दिनकर ने 'एनार्की' नामक व्यंग्य-काव्य लिखा था, जिसकी पंक्तियां हैं-"तब कहो, लोहिया महान है,/एक ही तो वीर यहां सीना रहा तान है।" ये दो पंक्तियां लोहिया को बहुत पसंद थीं। कभी-कभी वे दिनकर से पूछते कि 'ये पंक्तियां कहीं तुमने व्यंग्य में तो नहीं लिखी हैं' तो कवि का जवाब होता-"वैसे तो पूरी कविता ही व्यंग्य की कविता है, मगर व्यंग्य होने पर भी आपके 'सीना तानने' की बड़ाई ही होती है।" एक दिन मजाक-मजाक में लोहिया ने यह भी कहा, "महाकवि, ये छिट-पुट पंक्तियां काफी नहीं हैं। तुम्हें मुझ पर कोई वैसी कविता लिखनी चाहिए, जैसी तुमने मेरे दोस्त जयप्रकाशजी पर लिखी थी।" "जिस दिन आप मुझे उस तरह प्रेरित कर देंगे, जिस तरह मैं जयप्रकाशजी से प्रेरित हुआ था, उस दिन कविता आपसे-आप निकल पड़ेगी।" (वही, पृष्ठ 155) जवाब तो दिनकर ने भी हँसते-हँसते दिया था लेकिन बात बड़ी ही गंभीर और चोट करनेवाली थी।

लोहिया जब आखिरी बार अमरीका गये थे, उन्हें लेखकों ने कुछ किताबें भेंट की थीं। उनमें से एक किताब कविता की किताब थी। कवयित्री थीं रूथ स्टीफेन। रूथ स्टीफेन ने अपनी पुस्तक इस टिप्पणी के साथ भेंट की थी : "For Ram, who rips shadows into rags." रूथ की नजर में लोहिया ऐसा आदमी है जो 'बाल की खाल उधेड़ता है और काल्पनिक छायाओं के चिथड़े उड़ा देता है।' सचमुच, कभी-कभी ऐसा लगता है कि जिस शत्रु पर लोहिया बाण चला रहे हैं, वह वास्तविक कम, काल्पनिक अधिक है। (वही)

दिनकर का विश्वास करें तो पंडित किशोरीदास बाजपेयी कहा करते थे : 'असल में मैं हिन्दी भाषा और साहित्य का डॉक्टर लोहिया हूँ।' (दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 88) 'डॉक्टर लोहिया राजनीति में धक्कामार भाषा का प्रयोग करते थे। बाजपेयी जी की भी भक्ति धक्कामार भाषा पर है। लोहिया स्थापित व्यक्तित्वों का विरोध करके आगे बढ़े थे। बाजपेयी जी भी साहित्याचार्य शालिग्राम शास्त्री और पंडित पद्मसिंह शर्मा का विरोध करके प्रसिद्ध हुए। डॉक्टर लोहिया के ही समान बाजपेयी जी भी अन्याय को नहीं सह सकते और जहां-जहां कीर्ति की पूंजी जमा है, उस दिशा की ओर जरा वक्र दृष्टि से देखते हैं।' (वही, पृष्ठ 88)

निराला की विक्षिप्तता

'1947 ईस्वी में काशी में निराला जी की स्वर्ण-जयंती मनायी गयी थी। अभिनंदन-पत्र के साथ निराला जी के हाथ में बांस की एक खोली भी दी गयी और सार्वजनिक रूप से कहा गया कि इस खोली के भीतर दस हजार रुपये हैं। सभा ने बड़े ही उत्साह से तालियां बजायीं। कवि आनंद से खिल उठे। उन्होंने सारी राशि नवजादिकलाल के परिवार, रामकृष्ण मिशन, सिस्टर निवेदिता के स्मारक आदि कामों के लिए वितरित कर दी। ...किन्त यह बांस की खोली बिल्कुल खाली थी। कहीं उनकी विक्षिप्तता के पीछे ऐसी घटनाओं का भी तो हाथ नहीं था?' (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 47)

गुप्त का पुनरुत्थानवाद!

दिनकर ने मैथिलीशरण गुप्त पर पुनरुत्थानवाद का असर देखा है। वे लिखते हैं कि जब पटना विश्वविद्यालय की रजत-जयंती के अवसर पर जो कवि सम्मेलन हुआ था, उसमें मैथिलीशरण जी भी पधारे हुए थे। कवि सम्मेलन में थोड़ा शोर होने लगा। यहां तक कि शोर उस समय भी होता रहा, जब सुभद्रा कुमारी चौहान काव्य-पाठ कर रही थीं। इससे मैथिलीशरण जी को गुस्सा आ गया और माइक पर जाकर उन्होंने गरजकर कहा, "आपने एक हजार वर्ष की गुलामी बर्दाश्त की है। क्या दो-एक कविताएं भी आप बर्दाश्त नहीं कर सकते?" (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 33)

उनके अनुसार श्री मैथिलीशरण जी हिंदी और उर्दू को एक करने के पक्ष में नहीं थे। वे हिंदी में, विशेषतः हिंदी काव्य में उर्दू शब्द लाने का विरोध करते थे। मेरी 'नर्तकी' नामक कविता का संपादन नवीन जी ने राष्ट्रकवि के साथ बैठकर किया था और हर जगह अगर को काटकर यदि तथा चीज को काटकर वस्तु बना दिया था। मेरा ख्याल है, दिल्ली आने के पूर्व मैथिलीशरण जी भाषा के मामले में इतने कठोर नहीं थे। उनकी 'इस शरीर की सकल शिराएं हों तेरी तंत्री के तार' वाली कविता में पहले 'प्रस्तुत हूं, मैं हूं तैयार' आता था। दिल्ली आने के बाद जब भी वे यह कविता पढ़ते थे, तब 'प्रस्तुत हूं मैं सभी प्रकार' कर देते थे। श्री बालस्वरूप राही को जब मैंने राष्ट्रकवि से मिलाया, वे बोल उठे, 'अब यही गड़बड़ है। आपने अपना उपनाम राही क्यों चुना, बटोही क्यों नहीं?' (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 36)

मैथिलीशरण गुप्त केवल वैष्णव ही नहीं, खांटी हिंदुत्व के कवि थे। अपनी हिन्दू भावना को अक्षुण्ण रखते हुए ही उन्होंने अपने राष्ट्रकवि-पद को संभाल रखा था। वैदिक आर्य गोमांस खाते थे, यह विचार उन्हें मान्य नहीं था। खान-पान में उचित से अधिक उदारता उन्हें असह्य थी। जब महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपने खान-पान संबंधी अद्भुत विचार जनता के सामने रखने शुरू किये, श्री मैथिलीशरण जी क्रोध से जल उठे और उसी मनोदशा में उन्होंने एक पद लिख दिया, जो संकलित न होने पर भी अमर हो गया है : 'गंगा गयी, वोलगा का दुख-/दर्द तनिक हम महसूसें,/बुद्ध बाप जी मरे मांस खा,/हाड़ पूत राहुल चूसें।' (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, पृष्ठ 36)

इतिहासविद काशी प्रसाद जायसवाल के साथ दिनकर की बैठकी खूब जमती थी। उनसे जुड़े कई रोचक संस्मरण हैं। एक शाम के पी जायसवाल और दिनकर 'गप्प-शप्प' के मूड में बैठे थे। जायसवाल जी ने शुरुआत की, 'हिंदी में केवल दोय कवि भये।' दिनकर ने पूछा, 'वे कौन हैं भला?' उन्होंने कहा, 'एक तो वही चंद, और दूसरा यही हरिचंद।' दिनकर ने अकचकाकर पूछा, 'और तुलसीदास?' वे बोले, 'अरे, तुलसिया भी कौनो कवि रहा? उसकी तो बंदरवा न सुधार देता रहा जैसे गुप्तवा की महविरवा।' कहावत है कि तुलसीदास की अधूरी कविताओं को हनुमान जी पूर्ण कर देते थे। और इधर तो सर्वविदित ही है कि मैथिलीशरण जी की कविताओं का संशोधन पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी किया करते थे। (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, पृष्ठ 8

"स्वर्ग से फतवा आया है"

जब 'भारत-भारती' पहले-पहल प्रकाशित हुई, द्विवेदी जी ने सरस्वती में उस पर एक लेख लिखा था जो प्रशंसात्मक और अत्यंत प्रभावपूर्ण था। लेख के अंत में द्विवेदी जी ने मैथिलीशरण जी के साथ अपनी मैत्री का भी जिक्र किया था और लिखा था, "लेकिन मैंने इसका कोई खयाल नहीं रखा है। सत्य, इसके साक्षी तुम हो।" जायसवाल जी जब पाटलिपुत्र में इसकी समीक्षा करने लगे, उन्होंने पुस्तक और लेखक तथा प्रकाशक के नाम एवं मूल्यादि लिखकर केवल एक वाक्य लिखा, "स्वर्ग से फतवा आया है।" और उसके बाद द्विवेदी जी का पूरा-का-पूरा लेख उद्धृत कर दिया। (दिनकर, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 10)

संस्कृत, मुसलमान और दिनकर

जिस साल हजारीप्रसाद जी द्विवेदी को लखनऊ विश्वविद्यालय ने डॉक्टरेट दिया, उस साल दीक्षांत-समारोह के अवसर पर होने वाले कवि-सम्मेलन में भाग लेने दिनकर भी गये। वे टंडन जी के पास नहीं ठहरकर कहीं अन्यत्र ठहरे, किन्तु रात में वे उन्हीं के साथ भोजन करने वाले थे। कुछ ऐसा संयोग हुआ कि टंडन जी के घर पहुंचते-पहुंचते दिनकर को काफी देर हो गयी। यह देखकर दिनकर शर्म से गड़ गये कि लोग उनकी प्रतीक्षा में बैठे हुए थे; किन्तु इससे भी बड़ी शर्म की बात  एक और हो गयी। टंडन जी का कमरा मित्रों से भरा हुआ था। दिनकर, हजारीप्रसाद जी के पास जा बैठे और बात-चीत में भाग लेने लगे। न जाने वे चालू प्रसंग में बोल रहा थे या उन्होंने कोई नया तराना छेड़ दिया था, उन्होंने कहा, "बाबू जी, मुसलमान तो संस्कृत का सही उच्चारण कर ही नहीं सकते। अभी मौलाना आजाद पटने आये थे और वाल्मीकि तथा कालिदास का हवाला देते हुए उन्होंने बड़ा ही विद्वतापूर्ण भाषण दिया, मगर वे बदस्तूर संस्कृत को 'संसकिरत' और ब्राह्मण को 'बिरहमन' कहते रहे। आज तक मुझे एक भी मुसलमान नहीं मिला, जो संस्कृत को संस्कृत और ब्राह्मण को ब्राह्मण कह सके।" दिनकर जी अपनी बात जरा जोर से बोल गये थे। उन्हें क्या जानता था कि गोष्ठी में एक मुसलमान सज्जन भी विद्यमान हैं! उनकी इस बेवकूफी को आगे बढ़ने से रोकने के लिए हजारीप्रसाद जी बोल उठे, "अरे, एक मुसलमान तो यहीं सामने बैठे हैं जो उपनिषदों के विद्वान हैं।" यह बात सुनते ही दिनकर हतप्रभ हो गये, फिर भी अपनी लाज छिपाने की कोशिश करता हुआ उन्होंने कहा, तो यही संस्कृत और ब्राह्मण का सही-सही उच्चारण कर दें। जो मुसलमान सज्जन पास बैठे थे, उन्होंने संस्कृत और ब्राह्मण शब्दों का ही सही उच्चारण नहीं किया, बल्कि संस्कृत श्लोकों की वृष्टि से दिनकर को 'तोप' दिया। उनके संस्कृत-ज्ञान से वे इतना अभिभूत हो उठे कि उन्होंने अपनी अभद्रता और मूर्खता के लिए उनसे क्षमा मांगी और कहा कि "अब मैं यह बात स्वीकार करता हूँ कि भारत में एक मुस्लिम विद्वान हैं, जो संस्कृत का सही उच्चारण कर सकते हैं।" - (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 24-25)

किया तो अंग्रेजी में 

जब दिनकर जी भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति पद का 'चार्ज' लेकर सुधांशु जी से मिलने आए तो छूटते ही सुधांशु जी ने दिनकर जी से पूछा कि 'हस्ताक्षर हिंदी में किया या अंग्रेजी में?' इस तीखे प्रश्न पर दिनकर जी का चेहरा उतर गया और वे ग्लानिभरे शब्दों में धीमे से बोले-'किया तो अंग्रेजी में'। (भुवनेश्वर नाथ मिश्र माधव, 'गंगा की तरह पवित्र', परिषद पत्रिका, वर्ष 40, अंक 3, अक्तूबर-दिसंबर 2000, पृष्ठ 15)

दिनकर की लोकप्रियता

दिनकर अपने समय के सूर्य रहे होंगे इस बात में संदेह का कोई कारण नहीं दिखता बल्कि 'महाकवि' और 'जनकवि' की ईर्ष्या उसके प्रखर ताप का सबूत देती है। 

लोगों को लगा, जानकीवल्लभ शास्त्री, निराला के 'शिष्यवत' हैं। निराला ने स्पष्ट किया, 'आपको जो लोग मेरा चेला समझते हैं, वे गलती करते हैं।' (जानकीवल्लभ शास्त्री को निराला का पत्र (19/4/39); नंदकिशोर नवल, निराला रचनावली, 8) निराला, दिनकर के विरुद्ध एक बिहारी कवि को खड़ा करने का भरोसा देते हुए : 'जिन बिहारियों का डंका पीटा जा रहा है, मैं बहुत जल्द उनके समक्ष आपको भिड़ाता हूँ-खासतौर से दिनकर के मुकाबले देखा जाय। एक आंदोलन बिहारियों के काव्य-ज्ञान का खड़ा करके देखना चाहता हूं, डंका पीटनेवाले बाजदार ही हैं या समझदार भी।' (जानकीवल्लभ शास्त्री को लिखा निराला का पत्र (11/2/36); नंदकिशोर नवल, निराला रचनावली, 8 में उद्धृत)

दिनकर की 'हुंकार' छपी तो 'बिहारी शिष्य' को निराला ने अपने मनोभाव से अवगत कराया : 'आपने पत्र में हुँकार (श्री रामधारी सिंह "दिनकर") की तारीफ लिखी थी; किताब मैंने पढ़ी, पढ़ने पर बहुत दिन का पढ़ा "हुं-हुं करोति" याद आया; अब सोचता हूँ, अगर कोई बिहारी भाई डकार लिखते!' (जानकीवल्लभ शास्त्री को निराला का पत्र (7/6/39); नंदकिशोर नवल, निराला रचनावली, 8)

निराला ने दिनकर की 'हुंकार' की वजह ढूंढ ली थी : 'बंगालियों के पड़ोसी होने के कारण शायद बिहारियों में ओज की मात्रा अधिक है। मुर्दों में जान फूंकना बुरी बात नहीं लेकिन जो जिंदा हैं उनके लिये क्या होगा? क्या वे गुलगपाड़ा पसंद करेंगे?' (जानकीवल्लभ शास्त्री को निराला का पत्र (7/6/39); नंदकिशोर नवल, निराला रचनावली, 8)

बिहारी मुर्दे क्यों थे, निराला से जानिए : 'बांकीपुर, पटने में मेरी अनामिका+तुलसीदास नहीं मिली। बिहार में मेरी किताबों की कम खपत है, अर्थात लोकप्रियता नहीं, यह मेरी कामियाबी है।' (जानकीवल्लभ शास्त्री को निराला का पत्र (7/6/39); नंदकिशोर नवल, निराला रचनावली, 8)

नागार्जुन के मन में भी दिनकर के प्रति एक खुनस रहती थी। 'तिकड़म के ताऊ' शीर्षक कविता में नागार्जुन ने लिखा है--

'नये पुराने लेखों के संकलन छपाना।

आप लगाना फेरी खा खा उन्हें छपाना।

पास मिलेगा अब पहले दर्जे का तुमको

पार्ल में रहो सूंघते नील कुसुम को

नेहरू छींके, मौलाना को हो खुजलाहट

मिल जायेगी तुमको घर बैठे ही आहट।' 

(डॉक्टर कुमार विमल, नागार्जुन : 'एक-एक दाने की खातिर सौ-सौ पापड़ बेले', परिषद पत्रिका, वर्ष 38, अंक 1-4, पृष्ठ 46, पादटिप्पणी संख्या 23 में उद्धृत)

संस्कृति के चार अध्याय

'संस्कृति के चार अध्याय’ पुस्तक के लिए दिनकरजी को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान करते हुए देश के प्रथम प्रधानमंत्री श्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विनोदपूर्वक कहा, 'इसमें आधा मेरा है’. ‘पूरा आपही का है’-राष्ट्रकवि ने तुरंत उत्तर दिया और दोनों महापुरुष हंसने लगे.