Monday, September 14, 2026

संपादक की यात्रा

आप भारत में हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास देखेंगे तो कल और आज का अंतर समझ में आएगा। एक समय था जब अखबार का सारा दारोमदार संपादक के ऊपर होता था। साक्षरता कम होने की वजह से लेखक और पाठक दोनों का मिलना मुश्किल था। पाठकों की कमी का रोना नया नहीं है। एक संपादक को अखबार की ज्यादातर सामग्री खुद ही तैयार करनी होती थी। कभी-कभी तो पूरा का पूरा अखबार एक अकेला संपादक ही लिख मारता था। आनन्दकादम्बिनी के संपादक बद्रीनारायण चैधरी लगभग पूरा अखबार खुद ही रंग डालते थे। 1904-5 के दिनों तक 'सरस्वती' ’मासिक पुस्तक’ ही बनी रहती है और जिसका अभिप्रेत था कि जरूरत पड़ने पर एक अकेला आदमी अर्थात् संपादक नाम का जीव ही सारे लेख लिख डाले। भारतेन्दु इसे पत्रकार-कला के विरुद्ध मानते थे, इसलिए 'आनन्दकादम्बिनी' के संपादक को लिखा था : ’जनाब यह किताब नहीं है कि जो आप इकेले ही इकराम करते हैं बल्कि अखबार है कि जिसमें अनेक-जन-लिखित लेख होना आवश्यक है और यह भी जरूरत नहीं कि सब एक ही तरह के लिखक्कड़ हो।’ (रामरतन भटनागर, भारतेन्दु हरिश्चंद्र : एक अध्ययन, किताब महल, इलाहाबाद, 1947, पृष्ठ 106-7)

अखबार में तब संपादक के कई नाम चलते थे। अलग-अलग नामों से संपादक अपने अखबार में लिखने को अभिशप्त होता था। महावीर प्रसाद द्विवेदी 'सरस्वती' छोड़ने के बाद भी भिन्न नाम से लेख लिखा करते थे। बिहार के 'बिहार बन्धु' के संपादक केशव राम भट्ट ने तब की मुश्किलों का वर्णन करते लिखा है कि लेख, विज्ञापन और समाचार लिखने से लेकर प्रूफ देखने तक का सारा काम संपादक का होता था। इस स्थिति को बिहार बन्धु की एक टिप्पणी से बेहतर समझा जा सकता है। 'बिहार बन्धु' ने 'लक्ष्मी उपदेश लहरी' का स्वागत करते हुए लिखा था : ‘‘जून की संख्या हमारे हाथ में है। ...एक बात इसमें देखकर हमें आश्चर्य हुआ। जब टाइटिल पेज पर सम्पादक का नाम बाबू शब्द के साथ लिखा ही हुआ है तब हर सम्पादकीय लेख के नीचे ‘सम्पादक’ या ‘सम्पादक महाशय’ का उपनाम ‘दीन’ लिखने की क्या जरूरत है? क्या एक जगह नाम रहने से सम्पादक महाशय को सन्तोष नहीं होता?’’ (बिहार बन्धु, 6 जुलाई, 1907, पृष्ठ 3; पंडित रामजी मिश्र मनोहर, बिहार में हिन्दी पत्रकारिता का विकास, के पी जायसवाल शोध संस्थान, पटना, पृष्ठ 126)

1995 के दिनों में भी पटना से कुछ अखबार ऐसे ही निकलते थे। इन दिनों 'अमृतवर्षा' नाम का दैनिक अखबार यहाँ से निकला करता था। एक दिन वहां गया तो देखा कि एक आदमी कुर्सी पर बैठा धांय-धांय लिखे जा रहा है। नाम था प्रह्लाद भगत। बाद में ये एकलव्य एड्यूकेशनल काम्प्लेक्स में हिंदी शिक्षक हुए। बाद में मैं भी वहां काम करने लगा तो अमृतवर्षा के उनके अनुभव को जानने का मौका मिला। वे जबतक वहां रहे, लगभग अकेले ही अखबार निकालते रहे।

लेखक पैदा करनेवाले पहले संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी थे। कैसे-कैसे लोगों को और किस विधि से उन्होंने 'सरस्वती' के लिए एक लेखक-समूह पैदा किया, जगजाहिर है। मैथिलीशरण गुप्त का किस्सा तो मशहूर है ही। इतिहासविद् काशी प्रसाद जायसवाल के साथ दिनकर की बैठकी खूब जमती थी। उनसे जुड़े कई रोचक संस्मरण हैं। एक शाम जायसवाल जी और दिनकर ‘गप्प-शप्प’ के मूड में बैठे थे। जायसवाल जी ने शुरुआत की, ‘हिंदी में केवल दोय कवि भये।’ दिनकर ने पूछा, ‘वे कौन हैं भला?’ उन्होंने कहा, ‘एक तो वही चंद, और दूसरा यही हरिचंद।’ दिनकर ने अकचकाकर पूछा, ‘और तुलसीदास?’ वे बोले, ‘अरे, तुलसिया भी कौनो कवि रहा? उसकी तो बंदरवा न सुधार देता रहा जैसे गुप्तवा की महविरवा।’ प्रसिद्ध है कि तुलसीदास की अधूरी कविताओं को हनुमान जी पूर्ण कर देते थे और इधर तो सर्वविदित ही है कि मैथिलीशरण जी की कविताओं का संशोधन पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी किया करते थे। (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 8)

पद्मसिंह शर्मा ने महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पत्र में लिखा था, ’आजकल के संपादकों के संपादन से जब आपके संपादन की तुलना करता हूँ तो अंतरम् महदन्तरम् प्रतीत होता है। एक बार आपने स्वामी सत्यदेव के प्रसंग में कहा था कि कच्चा माल मांगकर उसे व्यवहारोपयुक्त बनाना पड़ता है। बात बिल्कुल ठीक थी। आजकल तो हिन्दी के अनेक संपादक कच्चे माल में भी कूड़ा-करकट मिलाकर उसे भद्दा बना देते हैं। शब्द-शुद्धि की ओर तो ध्यान नहीं देते, या ज्ञान ही नहीं रखते।’ (पद्मसिंह शर्मा के पत्र, आत्माराम एन्ड संस, 1956, पृष्ठ 221) एक बार सरस्वती में कवि विशाखदत्त-प्रणीत 'मुद्राराक्षस' नाटक पर एक लेख छपने को आया था। उसे देखकर द्विवेदी जी ने छापना स्वीकार कर लिया था। उसमें जहाँ-तहाँ पेंसिल से उन्होंने संशोधन भी किया था। लेख के अंत में पेंसिल से एक नया वाक्य लिखा हुआ था। कंपोज होने से पहले उसे देखने का अवसर उक्त लेख के लेखक को मिल गया। उन्होंने द्विवेदी जी की संपादन-पटुता की प्रशंसा कर कहा कि इस अंतिम वाक्य से लेख में सजीवता आ गई है, संशोधन से लेख की श्रीवृद्धि हुई है। (द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ, पृष्ठ 547) इसी प्रकार एक बार 'सरस्वती' की एक कविता में, कंपोज होने से पूर्व, एक प्रसिद्ध कवि की रचना में से साढ़े तीन पद्य साफ निकाल दिए हैं और अपनी ओर से आधा पद्य जोड़कर रचना के प्रवाह को यथापूर्व कर दिया है। (वही)

अखबार निकल जाने के बाद ग्राहक और पाठक बनाना भी संपादक ही का काम होता। आचार्य शुक्ल ने लिखा है: ‘‘उस समय हिंदी संवाद-पत्र पढ़नेवाले थे ही नहीं। पाठक उत्पन्न करने के लिए बाबू कार्तिकप्रसाद ने बहुत दौड़-धूप की थी। लोगों के घर जा-जाकर वे पत्र सुना तक आते थे। इतना सब करने पर भी उनका पत्र थोड़े दिन चलकर बन्द हो गया।’’ (रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ 457) तब 'भारतमित्र' नामक अखबार निकला करता था। इसके ग्राहकों ने शर्त रखी कि वे अखबार तभी लेना शुरू करेंगे जब उसके संपादक उसके घर आकर उसे बांच भी दें। मरता क्या न करता। भारत मित्र की चर्चा करते हुए संपादकाचार्य पंडित अंबिकाप्रसाद वाजपेयी ने लिखा है कि ‘‘उन दिनों हिन्दी पाठक बहुत कम थे, इसलिए ग्राहक तो लोग बन जाते थे, पर पत्र न पढ़ सकते थे। यह समस्या इस तरह हल की गयी कि पंडित दुर्गाप्रसाद कई गदिद्यों पर जाकर भारत मित्र पढ़कर सुना आया करते थे।’’ (पंडित अंबिकाप्रसाद वाजपेयी, विशाल भारत, मई 1931) 

आज ए.सी. में बैठकर गूगल बाबा के सहारे अखबार निकालने वाले बहुतेरे संपादकों को इस कठिन यात्रा का आभास तक न होगा। वे तो अपना ’संपादकीय’ भी ’टीमवर्क’ समझते हैं! ऐसे ही दौर के लिए पत्रकार-शिरोमणि बाबूराव विष्णु पराड़कर ने 1925 में वृन्दावन हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद से कहा था-‘‘पत्र सर्वांग सुन्दर होंगे। आकार बड़े होंगे। छपाई अच्छी होगी। मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे। लेखों में विविधता होगी, कल्पक्ता होगी, गम्भीर गवेषण की झलक होगी और मनोहारिणी शक्ति भी होगी। ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जायेगी। यह सब होगा, पर पत्र प्राणहीन होंगे। पत्रों की नीति देशभक्त, धर्मभक्त अथवा मानवता के उपासक महाप्राण सम्पादकों की नीति न होगी-इन गुणों से सम्पन्न लेखक विकृत मस्तिष्क समझे जायेंगे। सम्पादक की कुरसी तक उनकी पहुंच भी न होगी। वेतनभोगी सम्पादक मालिक का काम करेंगे। वे हम लोगों से अच्छे होंगे। पर आज भी हमें जो स्वतन्त्रता प्राप्त है, वह उन्हें न होगी।’’ (राजकिशोर, पत्रकारिता के नये परिप्रेक्ष्य, वाणी प्रकाशन, द्वितीय संस्करण: 2005, पृष्ठ 53)

बल्कि अब तो स्थिति है कि अखबार के संपादक बाल्टी-मग बेच रहे हैं। जी हां, आज सुबह मैंने अपने हाॅकर मनोज कुमार को अखबार की जगह हाथ में बाल्टी-मग लटकाए देखा तो तनिक अतिरिक्त जिज्ञासु हो उठा। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि दरअसल बिहार का नंबर वन अखबार दैनिक हिन्दुस्तान का अभी एक आॅफर चल रहा है। अगर आप 'प्रभात खबर', 'दैनिक जागरण' अथवा 'दैनिक भास्कर' में से कोई भी एक अखबार लेते हों तो आप उसे बंद कर तथा 500 रुपये देकर दैनिक हिन्दुस्तान की बुकिंग करवा सकते हैं। इस 500 रुपये की एवज में लगातार पांच महीने आपको हिन्दुस्तान उपलब्ध कराया जायगा। एक बाल्टी के साथ एक मग आपको तत्काल उपलब्ध कराया जायगा। अब हाॅकर आपको अखबार की जगह बाल्टी-मग टांगे मिलेंगे और संपादक बाल्टीवाले संपादक कहे जाएंगे।

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