Saturday, September 12, 2026

मिथक और इतिहास बोध

मुझे धार्मिक देवी-देवताओं से कोई सहानुभूति नहीं है लेकिन अगर कोई इसका विरोध यह कहते हुए करे कि "पिता ब्रह्मा से बलात्कृता सरस्वती आज हर जगह पूजी जा रही है", तो मुझे घोर आपत्ति है। प्रथमतया, यह कथन स्त्री विरोधी है और बलात्कार के लिए सरस्वती को दोषी ठहराता है। दूसरे, ऐसे कथन इतिहास और मिथकों की अनैतिहासिक समझ से जन्म लेते हैं। मुझे नहीं लगता कि सरस्वती और ब्रह्मा के बीच का यह यौन संबंध कोई बलात्कार की घटना है। हमें अन्य कई देवताओं के जीवन में भी यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। कहा जाता है कि पुषन ने अपनी माता से प्रेम याचना की। बेबिलोनिया में भी स्त्री देवता के साथ पुरुष देवता का संबंध मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण की एक पुरानी गाथा बताती है कि पुत्र प्राप्ति के लिए पुरुषों ने माताओं और बहनों के साथ पत्नी की तरह संभोग किया। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, पृष्ठ57)

ब्रह्मा-सरस्वती का सम्बंध पिता-पुत्री का वैध यौन संबंध है। 'जन्हु ने भी अपनी पुत्री जाह्नवी से विवाह किया था।' (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, पृष्ठ 161) अवेस्ता के यिम, यिमे, ऋग्वेद के यम-यमी का संवाद भाई-बहन के बीच यौन संबंध के अस्तित्व को ध्वनित करते हैं। सर्वदमन सिंह के मतानुसार मातृनामों से, जिनमें ऋग्वेद के 'मामतेय' का उदाहरण भी है, बहुपतित्व, बहुपत्नीत्व अथवा स्वच्छंद संभोग के संकेत मिलते हैं। (पोलिएंड्री इन एनशिएंट इंडिया, 1978, पृष्ठ 68)

प्राचीन मिस्र में भाई-बहन के बीच शादी होती थी क्योंकि संपत्ति का हस्तांतरण मां से पुत्री को होता था। आइसिस ओसिरिस की बहन तथा पत्नी थी। अथर्ववेद में उल्लिखित है कि असुरों में बाप-बेटी के बीच विवाह की प्रथा थी। महाभारत के कर्ण पर्व में मद्र देश के लोगों के विषय में ऐसी अनेक परम्पराओं का उल्लेख है। कहा गया है कि मद्र देश में शाकल की बाह्लीक स्त्रियां नंगी नाचती और हंसती हैं तथा स्वैरणी और स्वेच्छाचारिणी होती हैं और खुले मैदान में मैथुन का आनंद लेती हैं। (कर्ण पर्व, कुंभकोनम प्रकाशन, 37, 22-23) राजतरंगिणी में भी उल्लेख है कि गांधार के ब्राह्मणों में कौटुम्बिक मैथुन प्रचलित था। (राजतरंगिणी, 1.308)

कहने की जरूरत नहीं कि विवाह और परिवार रूपी संस्था के अभ्युदय के पहले पिता, पुत्र सभी यौन संबंध कायम कर सकते थे। एंगेल्स ने ठीक ही इसे 'यौन साम्यवाद' की संज्ञा दी है। भारतीय विद्वानों में काशीनाथ राजवाड़े ने भी काफी कुछ लिखा है इस विषय पर। तो यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति पर बंदिश रातोंरात नहीं लगी है। इतिहास के कई युगों और पीढ़ियों को गुजरना पड़ा है। पांच भाइयों के साथ द्रौपदी की शादी को औचित्य प्रदान करते हुए युधिष्ठिर ने महाभारत में परंपरा की ओर ध्यान दिलाया है। युधिष्ठिर ने इसी परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि गौतम-नन्दिनी जटिला ने सात ऋषियों के साथ ब्याह किया था। स्त्री-पुरुष के स्वच्छंद मैथुन के मामले में महाभारत की उक्तियाँ निर्णयात्मक हैं। पाण्डु उस युग की चर्चा करते हैं जिसमें स्त्रियां अनियंत्रित, स्वैरिणी, स्वेच्छाचारिणी और स्वतंत्र होती थीं। स्त्रियां विवाह के पहले भी पुरुषों की ओर आकृष्ट होती थीं लेकिन यह उनके लिए पाप नहीं माना जाता था। (आदि पर्व, 128. 4-5) ऋग्वैदिक समाज में भी प्रत्येक स्त्री को विवाह करने की आवश्यकता नहीं थी। इसलिए कुमारी से उत्पन्न बच्चे अधम पतित नहीं समझे जाते थे। (कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, लोपामुद्रा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1949, पृष्ठ 9) यह कहना अनावश्यक है कि ऋषि रूपवती स्त्रियों के आकर्षण के लिए मंत्र की रचना करते थे। (वही, पृष्ठ 8)

स्वच्छंद यौन संबंध का सबसे महत्वपूर्ण संकेत उद्दालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु की कथा में मिलता है। श्वेतकेतु ने अपने सामने देखा कि एक ब्राह्मण ने उसकी माता को हाथ पकड़कर खींच लिया है। इससे वह अत्यंत क्रोधित हुआ पर उसके पिता ने श्वेतकेतु से कहा कि इसमें क्रोधित होने की कोई बात नहीं है क्योंकि संसार की सभी स्त्रियां स्वच्छंद विचरण करती हैं और यह प्रथा अति प्राचीन काल से सनातन धर्म के रूप में चली आ रही है। (आदि पर्व, 128. 9-15) श्वेतकेतु के आख्यान से मिलती-जुलती अन्य अनेक परंपराएं हैं अतः कल्पित कथा कहकर इस आख्यान का तिरस्कार नहीं किया जा सकता है। (डी एन मित्तर, पोजीशन ऑफ वीमेन इन हिन्दू लॉ, पृष्ठ 203)

ऐसे ही मुनिकन्या वार्क्षी का ब्याह एक नाम वाले दस प्रचेताओं के साथ हुआ था। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 252) अहिल्या की कथा से भी इतना ही प्रकट होता है कि इंद्र प्राचीन परंपरा का द्योतक है। किसी पुरुष ने स्त्री को स्वतंत्र समझकर अहिल्या से संबंध किया, किन्तु अब सामाजिक परिस्थिति बदल चुकी थी। पितृसत्तात्मक समाज में यह सर्वमान्य नहीं रही थी। राम ने उसी प्राचीन परंपरा में अहिल्या को निर्दोष माना और समाज में जीवित माना। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 201)

हमारा इतिहास-विवेक इस बात को समझने में है कि यह प्रवृत्ति महाभारत के समय मुख्य प्रवृत्ति न होकर मरणासन्न है। दम तोड़ती इस प्रवृत्ति को स्मृति भर ही जगह मिली है हमारे शास्त्रों में। द्रौपदी की सास कुंती स्वयं सूर्य के साथ संभोग करती है। सूर्य ने यहां कुंती को जो समझाया है वह इस संदर्भ के लिए अर्थवान है। सूर्य कहता है कि 'स्वभाव से सभी स्त्री और पुरुष, अपनी इच्छा के अनुसार काम करने के लिए स्वाधीन हैं। वैवाहिक नियम का बंधन स्वभाव के विकार से उत्पन्न हुआ है।' (रांगेय राघव, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 279) किंतु सच है कि उसकी संतान को सामाजिक मान्यता नहीं मिलती। ये सारी कहानियां बस इसी बात की ओर संकेत हैं कि ये नये जमाने की बात नहीं है, जुज़रे जमाने की याद भर हैं।

मातृसत्ता के ध्वंस पर पितृसत्ता को स्थापित करती कहानियां भी रची जा रही थीं। कहानी है कि जमदग्नि, सत्यवती और ऋचीक के पुत्र तथा विख्यात भृगुवंशी परशुराम के पिता थे। उसकी पत्नी रेणुका थी। एक दिन रेणुका स्नान करने के लिए नदी-तट गई तो वहां उसने किसी गन्धर्वदंपति को जल में क्रीड़ा करते देखा। उस मनोहर दृश्य को देखकर उसके मन में ईर्ष्या जागी और वह उन दूषित विचारों से कलुषित हो गई। जब वह वापिस घर आई तो क्रोध के अवतार जमदग्नि ने उसे 'सतीत्व की कांति से हीन' देखकर बड़ा धमकाया और अपने पुत्रों को उसका सिर काट देने की आज्ञा दी। पहले चारों पुत्रों ने ऐसा क्रूर दुष्कृत्य करने में आनाकानी की। परशुराम उनका 'सबसे छोटा पुत्र' था। उसने तुरंत पिता की आज्ञा का पालन किया और कुल्हाड़े से अपनी माता का सिर काट डाला। शांत और प्रसन्न जमदग्नि ने परशुराम से वरदान मांगने के लिए आग्रह किया। परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की जो अविलंब स्वीकार की गई। (आप्टे, संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 438) यह कहानी हमें बताती है कि मातृसत्ता की कब्र पर पितृसत्ता के अंकुर फूटे हैं।

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