औपनिवेशिक काल में जो अंग्रेज यहाँ आते थे, अधिकतर की आर्थिक, सांस्कृतिक स्थिति अच्छी नहीं होती थी। वे मूलतः क्लर्क थे। हां, भारत में रहकर उनकी स्थिति बदल जाती थी। नेहरू की हैसियत इन अंग्रेजों से बीस थी। पूरे शहर में अकेला उनका घर था जिसके अंदर स्विमिंग पुल था, जिसमें अंग्रेज और भारतीय स्नान करने आते थे। तेजबहादुर सप्रू को पुल में उतरते डर लगता था इसलिए किनारे ही हाथ-पाँव मारते। इंग्लैंड में पढ़ते हुए नेहरू खर्चीले अवश्य थे, किन्तु इनके बारे में कई तरह के दुष्प्रचार थे। पैरिस से कपड़े धुलवाने की बात दुष्प्रचार ही थी। नेहरू जब कांग्रेस में काम करने लगे तो इनके पास आय का कोई स्रोत नहीं था और कांग्रेस के काम के लिए पिता से पैसे ले नहीं सकते थे। नेहरू इस बात को लेकर काफी परेशान रहे तो गांधी ने कहा कि आपको एक नियत राशि कांग्रेस से लेनी चाहिए। ('कुछ पुरानी चिट्ठियां' में बापू के पत्र संकलित) नेहरू समेत तब के नेताओं के साथ इस तरह के संकट भी उपस्थित होते थे, इस बात की समझ आज के नेताओं की शैली से नहीं हो सकती।
जो लोग नेहरू की आर्थिक हैसियत का अंदाजा लगाना चाहते हैं, वे सी. आर. दास की कमाई से लगा लें। डुमराँव के जमींदार का केस लड़ने सी. आर. दास आरा (बिहार) आए थे। उनकी फीस में डेढ़ हजार रुपये रोजाना, जूनियर वकील की फीस तथा रोज का खर्च शामिल था अर्थात होटल में ठहरना, खाना-पीना तथा अन्य व्यय आदि। मोतीलाल नेहरू भी इस केस के सिलसिले में 1920 में आरा आये थे। आरा से जवाहर को लिखे मोतीलाल नेहरू के पत्र 'कुछ पुरानी चिट्ठियां' (सस्ता साहित्य मंडल) में भी संकलित हैं। अनुग्रह नारायण सिंह की किताब 'मेरे संस्मरण' में सारा हाल अंकित है।
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