प्रकृति से आदमी दो टाँगोंवाला प्राणी है। 'तीसरी टाँग' उसे इस भूलोक (मर्त्यलोक) में अर्जित करनी होती है। यह तीसरी टाँग 'बुढ़ापे की लाठी' है। यह लाठी इतनी अपरिहार्य है कि हमारे मुहावरों तक में आ घुसी है। इसे आप भाषा में 'बुढ़ापे की लाठी' का 'टाँग अड़ाना' भी कह सकते हैं।
लाठी की महत्ता का अनुमान इसके पर्यायवाची शब्दों की भरमार से भी होता है। इसके लट्ठ, लऊर, लऊरि, लबेद, पटकन, बोंग, गोजी, बासमती, लोहबाना (लोहबंद), डंटा, पैना, छड़ी, सोंटा, ठेंगा, दुखहरन, दुखभंजन आदि कई नाम हैं। (दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह, भोजपुरी के कवि और काव्य, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, 1958, 'भूमिका', पृष्ठ 21)
लाठी से बने 'लठैत', 'लठधर' शब्द की भी भारतीय संस्कृति में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। बिहार के जमींदारों के इन लठैतों की करतूत से भला कौन अपिरिचित होगा। अमवारी किसान आंदोलन के दौरान राहुल का सिर इन्हीं लठैतों ने लहूलुहान कर दिया था। महाकवि निराला का 'लंठ' (लेखकों में लंठ जैसे खुशनसीब) इसी का गोतिया लगता है। 'डोमाजी उस्ताद' के कहने ही क्या!
पहलवानों की लाठियां प्रसिद्ध रही हैं। औपनिवेशिक बिहार के दिनों में मथुरा सिंह (जयकिसुन बिगहा, जहानाबाद) की लाठी के किस्से यहाँ की हवा में होते। कहा जाता है कि उनकी लाठी इतनी बड़ी होती कि उसके सहारे वे दोमंजिले मकान की छत पर आसानी से छलांग लगाकर पहुंच जाते। तब के हिन्दू-मुस्लिम दंगों में इनकी लाठी की भी भूमिका रही।
मेरे गांव में मनियामा (जहानाबाद) के सीताराम सिंह आते। खुद तो पांच फुट के जवान थे लेकिन लाठी सात फुट की रखते। बड़ी लाठी उनके पहलवान होने का भ्रम रचती। 'कलाकारों की रिलीफ पार्टी' में कथाशिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु ने एक ऐसे ही 'लाठीधारी' की तस्वीर खींची है : "आज सुबह से ही 'अपने लोग' स्वजन-सनेही, मित्र और प्रीतिभाजन-जन हमारी सुधि लेने आ रहे हैं। कोई खाली हाथ नहीं आता। एक हाथ में लट्ठ और दूसरे में हमारे लिए कोई-न-कोई आवश्यक सामान। सभी एक अभूतपूर्व 'मेकअप' में लूंगी या धोती लपेटे, गंजी पहने। डाक्टर रामवचन राय आये,- तो उनके हाथ में जो लाठी थी वह उनसे भी वजनी रही होगी। मैंने हँसकर कहा था-'आचार्यजी, लाठी में गुण बहुत हैं, सदा राखिये संग।" (फणीश्वरनाथ रेणु : चुनी हुई रचनाएं, भाग 3, पृष्ठ 114)
कहना अनावश्यक है कि रेणु ने अपनी बात कहने के लिए गिरिधर कविराय का सहारा लिया है। कविराय की पूरी बात कुछ इस तरह है : "लाठी में गुण बहुत हैं, सदा राखिये संग/ गहरी नदी, नारा जहां, तहां बचावै अंग/ तहां बचावै अंग, झपटि कुत्ता को मारै/ दुशमन दावागीर, होय तिनहूं को झारै/ कह गिरिधर कविराय, सुनो हो धूर के बाठी/ सब हथियारन छांड़ि, हाथ में लीजै लाठी।" (डॉक्टर आशीष वशिष्ठ एवं योगिता वशिष्ठ, बृहद सूक्ति कोश, भाग 2, कल्पना प्रकाशन, 2021, पृष्ठ 208 में उद्धृत) गिरिधर कविराय कहते हैं कि हमेशा अपने पास लाठी रखें, अगर राह में गहरी नदी, नाला आ जाता है तो लाठी सहारा देती है, अगर कोई कुत्ता पीछे पड़ जाता है तब भी लाठी उससे बचाती है, अगर कोई दुश्मन हमला कर दे तो लाठी उसे भगा देती है। इसलिए कवि बार-बार यही कहते हैं कि सारे हथियार छोड़कर अपने पास बस लाठी रखो ।
भोजपुरवासियों ने अपने मन-मिजाज से कविराय का कहा माना है। इस मिजाज को सबसे पहले ग्रियर्सन ने पकड़ा। वे कहा करते थे कि बंगालियों ने कलम से जो किया, उसे भोजपुरियों ने लाठी से! शायद इसीलिए लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया में भोजपुरी भाषा पर अध्याय की शुरुआत उन्होंने गिरिधर कविराय की इस लाठी-चर्चा से की है। (दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह, भोजपुरी के कवि और काव्य, पृष्ठ 5) भोजपुरी में लाठी की अमोघ शक्ति को लेकर कई कहावतें प्रचलित हैं। कहा जाता है कि 'सइ पूरा चरन नु एक हूरा चरन' अर्थात सौ बार निहोरा करने से भी जो काम नहीं होता लाठी से हो जाता है।
लाठी ही का असर कहिए कि उन्होंने बेद का तुक लबेद से मिला दिया। एक कहावत प्रचलित है : 'चार बेद और पांचवां लबेद' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 113)। मेरे गांव में इसको 'लाठीकोट' (कोर्ट) कहा जाता है। 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' तो आपने भी सुनी होगी। 'लबेद' का मतलब 'लाठी' ही है। पहले गांवों में 'लाठीकोट' का फैसला 'अंतिम' माना जाता था। जिसका परिवार बड़ा होता वह लाठीकोट में केस जीता हुआ समझा जाता। मेरे बाबा (दादाजी) एक पढ़ुआ पढ़ते थे-'जेकरा पाले चार धुरहिया, मारे लाठी छीने रुपइया'! इसी बात को दूसरे शब्दों में कहा गया है : 'जिसके चार भैय्या, मारें धौल छीन लें रुपैया'। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 140)
लाठी सिर्फ 'झपटि कुत्ते को मारै' ही नहीं है बल्कि यह सौंदर्य की भी खान है। हिंदी के रीतिकालीन कवियों ने 'कनक छड़ी सी कामिनी' कहकर वर्णन किया है तो बिरहा गीत में अत्यंत मोहक अंदाज में लाठी के हुर्रे की प्रशंसा निबद्ध है :
'हुरवा नियर तोर जुरवा ए गोरिया,
पुअवा नियर तोर गाल।
पनवा नियर तू त पातर बाड़ू गोरिया,
लोटवा नियर तोर भाल।।' (राहुल सांकृत्यायन, हिन्दी साहित्य का बृहत इतिहास, भाग 16, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, पृष्ठ 151)
वर्ण और दंड
स्मृतियों में आश्रम और वर्ण के अनुसार दंड धारण करने की व्यवस्था है। उपनयन संस्कार के समय मेखला आदि के साथ ब्रह्मचारी को दंड भी धारण कराया जाता है। प्रत्येक वर्ण के ब्रह्मचारी के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के दंडों की व्यवस्था है। ब्राह्मण को बेल या पलाश का दंड केशांत तक ऊँचा, क्षत्रिय को बरगद या खैर का दंड नाक तक ऊँचा धारण करना चाहिए। गृहस्थों के लिए मनु ने बाँस का डंडा या छड़ी रखने का आदेश दिया है। संन्यासियों में कुटीचक और बहूदक को त्रिदंड (तीन दंड), हंस को एक वेणुदण्ड और परमहंस को भी एक दंड धारण करना चाहिए, ऐसा निर्णयसिंधु में उल्लेख है। किसी-किसी ग्रंथ में यह भी लिखा है कि परमहंस परम ज्ञान को पहुंचा हुआ होता है, अतः उसे दंड आदि धारण करने की कोई आवश्यकता नहीं। राजा लोग शासन और प्रतापसूचक एक प्रकार का राजदंड धारण करते थे। (हिंदी शब्दसागर, चतुर्थ भाग, नागरी प्रचारिणी सभा, 1995, पृष्ठ 2188)
No comments:
Post a Comment