Thursday, October 1, 2026

पाणिनि की सांस्कृतिक विरासत

इतिहास और साहित्य के विद्यार्थी इस बात से वाकिफ हैं कि किसी ने 'परंपरा का मूल्यांकन' किया तो किसी ने 'दूसरी परंपरा की खोज' कर डाली और हम विवाद में उलझे-फंसे रहे कि यह परंपरा कि वह परंपरा। इन बहसों से जो बात छनकर आ रही थी कि अतीत में कोई एक परंपरा नहीं होती बल्कि परंपराएं होती हैं, उसको हमलोगों ने यथोचित ग्रहण नहीं किया। यह हमारी सांस्कृतिक अनुदारता है। फिराक गोरखपुरी साहब अक्सर कहा करते थे कि पाणिनि के समय में संस्कृत के 90 तरह के रूप लोक में प्रचलित थे। इसीलिए फिराक इस संस्कृत को 'संस्कृत' न कह 'संस्कृतियां' कहते थे। पाणिनि ने इन 90 रूपों के बीच से संस्कृत का एक मानक रूप गढ़ा और कहा कि यही संस्कृत है। (विश्वनाथ त्रिपाठी, फिराक वार्ता, 'तद्भव', अप्रैल, 2002, पृष्ठ 135) उनके चेलों समेत कई और परवर्ती विद्वानों ने मान लिया कि जो पाणिनि कहे वही मान्य है। इस तरह से पाणिनि के नाम पर संस्कृत भाषा के साथ ज्यादती हुई उससे हम सभी परिचित हैं। इसके दुष्परिणामों से और भी ज्यादा परिचित हैं। एक समय 'पाणिनीय' होना प्रमाण माना जाता था और 'अपाणिनीय' गलत का पर्याय। मेरी जानकारी में पाणिनि के नाम का जो आतंक है उसका जोड़ दुनिया के शायद ही किसी भाषा और साहित्य में हो।

आज जरूरत इस बात की है कि हम सांस्कृतिक उदारता का परिचय देते हुए संस्कृति की जगह संस्कृतियां और परंपरा की जगह परंपराएं मानकर बहस करें और भिन्न परंपरा और संस्कृति के लिए स्पेस छोड़ते हुए जो समय की मांग है उस अनुरूप उससे ग्रहण करें। इस कार्य में परंपरा, संस्कृति और इतिहास का विवेक हमारी मदद करेगा।

अगर प्राचीन भारत का इतिहास देखें तो आधी से अधिक आबादी, अर्थात स्त्री और शूद्र को शिक्षा से दूर रखा गया। कहा गया कि इन्हें वेदपाठ आदि करने का कोई अधिकार नहीं है, ये शब्दों को बिगाड़कर कहते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि तब हम लेखनकला से परिचित नहीं थे, साहित्य केवल मौखिक परंपरा में जीवित रह सकता था। पाणिनि ने कहीं लिखा है कि पुस्तकों के सहारे पढ़नेवाले छात्र निकृष्ट कोटि के माने जाते हैं। वैयाकरण का यह कथन प्राचीन भारत में ज्ञान की समृद्ध वाचिक परंपरा की स्वीकृति/सहमति से ज्यादा कुछ नहीं लगता। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक साहित्य/ज्ञान अपने अपरिवर्तित रूप में जाये, इसके लिए भाषा में शुद्धता, उच्चारण आदि पर एक हद तक 'अनावश्यक जोर' की आवश्यकता थी। ज्ञान की मौलिकता की रक्षा का दायित्व ब्राह्मणों के पास था। उसने लोगों में डर पैदा किया कि मंत्रों के गलत उच्चारण के कुप्रभाव से यजमान को अनिष्ट भोगना पड़ सकता है। इस डर का भी एक सीमा तक ही प्रभाव रहा होगा क्योंकि पाणिनि कई तरह के उच्चारण की बात करता है। उच्चारण की इतनी गड़बड़ी थी कि कई शब्दों के स्रोत, अर्थ और निर्माण/विकास प्रक्रिया उन्हें भी अज्ञात थे। इस समस्या को दूर करने के उद्देश्य से उन्होंने एक 'व्याकरण' तैयार किया। इस व्याकरण से इधर-उधर होने का मतलब 'अपाणिनीय' अर्थात अशुद्ध/गलत होना था।

पाणिनीय व्याकरण की प्रतिष्ठा इतनी अधिक हो चली थी कि बहुत से कवि व्याकरण की पटुता की वजह से ख्याति अर्जित करने लगे थे। कभी-कभी पाणिनी के कहे हुए अप्रचलित प्रयोगों के व्यवहार के कारण कवि की खूब प्रशंसा हुई। राजा भोज ने किसी ग्रामीण ब्राह्मण से पूछा 'नद्यां कियज्जलं विप्र' (नदी में कितना पानी है, ब्राह्मण देवता)? उसने तपाक से उत्तर दिया 'जानुदघ्नं नराधिप' (जंघे तक महाराज)। यहाँ दघ्नच (च हलयुक्त) प्रत्यय का प्रयोग है, जो केवल व्याकरण की पोथी में ही सुरक्षित है। इस अप्रचलित प्रत्यय के प्रयोग के कारण ही राजा भोज प्रसन्न हुए थे और गरीब ब्राह्मण प्रचुर पुरस्कार पाने में समर्थ हुआ था। (हजारीप्रसाद द्विवेदी, मध्यकालीन बोध का स्वरूप, पृष्ठ 78)

संस्कृत भाषा का प्रकाण्ड विद्वान पाणिनि पाठान था और शलातुर (त्रिनेल के उत्तरपश्चिम लाह/लाहुल ग्राम इसे आजकल बताते हैं-नन्दलाल दे) का रहनेवाला था। इसकी माता का नाम दाक्षी था। ह्वेनत्सांग इसकी मूर्ति का शलातुर में उल्लेख करता है। पतंजलि के अनुसार कौत्स इसका शिष्य था। इस पाठान ने 'अष्टाध्यायी' (यह तमिल भाषा के प्रथम व्याकरण तोलक्कपियम की पथ प्रदर्शिका रही। देखें, आर. एच. राॅबिन्स, ‘लिंग्विस्टिक्स इन इंडिया’, आस्पेक्ट्स ऑफ इंगलिश प्रोज (संपा.-के. एम. तिवारी, आर. सी. पी. सिन्हा) विकास पब्लिशिंग हाउस, 1988, पुनर्मुद्रण: 2000, पृष्ठ 14) गणपाठ, धातुपाठ, लिंगानुशासन और शिक्षा लिखी जिसकी समता आज तक किसी अन्य भारतीय ने नहीं की। इसने अपने पूर्व वैयाकरण पिशलि, काश्यप, गार्ग्य, गालव, चक्रवर्मा, भारद्वाज, शाकटायन, शाकल्य, सोनक एवं स्फोटायन सभी को मात कर दिया।

इस पाठान वैयाकरण का काल विवादास्पद है। गोल्डस्टूकर इसे संहिता-निर्माण के समीप का बतलाता है। सत्यव्रत भट्टाचार्य तो इसे यास्क से पूर्व मानते हैं। कौटिल्य केवल 63 अक्षर एवं चार पदों का वर्णन करता है। पाणिनि 64 एवं सुबन्त-तिडन्त दो ही पदों का उल्लेख करता है। सायण अपने तैत्तिरीय ब्राह्मण भाष्य में कहता है कि नाम, आख्यात, उपसर्ग, निपात और चतुष्पद व्याख्या श्रौत है, जिनका यास्क भी अनुसरण करता है, यद्यपि वे पाणिनि विहित नहीं हैं। कौटिल्य ने पाणिनि का अनुसरण न किया, इससे सिद्ध है कि पाणिनि की तब तक जड़ नहीं जमी थी, जिसे इन्हें प्राचीन और प्रामाणिक माना जाता। अपितु पाणिनि, बुद्ध के समकालीन मस्करी (पाणिनि) का उल्लेख करता है। 'आर्यमंजुश्रीमूलकल्प' (जायसवाल, इम्पिरियल हिस्ट्री, पृष्ठ 15) कहता है कि वररुचि, नंद का मंत्री था तथा पाणिनि इसका प्रेमभाजन था। बौद्ध साहित्य में इसे बौद्ध बतलाया गया है। (देवसहाय त्रिवेद, प्राकमौर्य, पृष्ठ 163)

पाणिनि  की पुस्तक को केवल व्याकरण न समझना चाहिए। लेनिनग्राद के सोवियत प्रोफेसर टी. शेरबात्स्की ने उसका बयान करते हुए उसे ‘इन्सानी दिमाग की सबसे बड़ी रचनाओं में से एक’ बताया है। आज भी पाणिनि संस्कृत व्याकरण पर प्रमाण माना जाता है, हालांकि बाद के वैयाकरणों ने उसमें और बातें जोड़ी हैं और उसकी अपने ढंग से व्याख्याएं की हैं। यह एक दिलचस्प बात है कि पाणिनि ने यूनानी लिपि की चर्चा की है। इससे पता चलता है कि हिन्दुस्तान और यूनान के बीच सिकंदर के पूरब जाने से पहले ही किसी-न-किसी तरह का संपर्क हो चुका था। (जवाहरलाल नेहरू, हिंदुस्तान की कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, 1988, पृष्ठ 153) 

कहा जाता है कि पिंगल ने छंदःशास्त्र के लिए जो काम किया वही काम पाणिनि ने व्याकरण के लिए किया। उन्होंने पिंगल-छंदः-सूत्र की रचना की है। उसे चन्द्रगुप्त एवं बिन्दुसार का समकालीन बताया गया है। (सुरेश चन्द्र बनर्जी, कंट्रिब्यूशन ऑफ बिहार टु संस्कृत लिटरेचर, के. पी. जायसवाल शोध संस्थान, पटना, 1973, पृष्ठ 2) यदि 'अशोकावदान'  विश्वस्त माना जाय तो बिन्दुसार ने अपने पुत्र अशोक को पिंगल नाग के आश्रम में शिक्षा के लिए भेजा था। (देवसहाय त्रिवेद, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 163) सूत्र की रचना इसलिए नहीं हो रही है कि शब्द-भण्डार की कमी है, बल्कि इसलिए भी कि कई पीढ़ियों से प्राप्त और संचित ज्ञान को आगे की पीढ़ी को सौंप देना है। इस पूरी प्रक्रिया की सफलता के लिए आवश्यक था कि कम से कम शब्दों का इस्तेमाल हो। वैयाकरणों के संबंध में तो परंपरा से यह अनुश्रुति चली ही आ रही है कि आधी मात्रा भर कम कर देने से वह उतना ही हर्ष मनाता है, जितना कि पुत्रोत्सव के उपलक्ष्य में : 'अर्धमात्रालाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणाः'। वैयाकरण पाणिनि की महत्ता इस बात में भी है कि उन्होंने बहुत छोटे-छोटे सूत्रों के माध्यम से अपनी बात कही है। वे इतने छोटे हैं कि एक मात्रा तक निकाले नहीं जा सकते।

व्याडि (व्याडि नाम से दो विद्वान का पता चलता है। इनमें से प्रथम को सौनक का शिष्य एवं विकृतिवलि का लेखक बताया जाता है। उसका काल पाणिनि से पहले, अर्थात् करीब चैथी शती बताया गया है। इस व्याडि ने 'व्याडिय-संग्रह' की रचना की थी जिसे व्याडि द्वितीय ने पाणिनि के व्याकरण की रोशनी में इसे संशोधित किया। व्याडि द्वितीय को दो पुस्तकों-व्याडिय कोष एवं व्याडिय लिंगानुशासन का लेखक होने का श्रेय प्राप्त है। (सुरेश चन्द्र बनर्जी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 2) पाठान था और अपने मामा पाणिनि के वंश का प्रमाता था, क्योंकि इसे भी दाक्षोयण कहा गया है। इसने लक्षश्लोकों का संग्रह तैयार किया, जिसे पतंजलि (यह निश्चय नहीं हो पाया है कि वैयाकरण पतंजलि और ‘योगसूत्र’ को रचनेवाले पतंजलि एक ही हैं कि दो हैं। वैयाकरण की तिथि तो निश्चित रूप से मालूम है कि ईसा से पहले की दूसरी सदी है। कुछ लोगों की राय है कि योगसूत्र का रचयिता दूसरा ही है, जो इसके दो-तीन साल बाद हुआ है। (जवाहरलाल नेहरू, हिंदुस्तान की कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, 1988, पृष्ठ 247-248, पादटिप्पणी संख्या-1) अत्यंत आदर और श्रद्धा की दृष्टि से देखता है। (पाणिनि 2. 3. 66) भर्तृहरि के 'वाक्यपदीय' में भी कहा गया है कि संग्रह में 14,000 पदों में व्याकरण है। कुछ विद्वानों का मत है कि पतंजलि ने संग्रह के ऊपर ही भाष्य किया, क्योंकि प्रथम सूत्र ‘अथशब्दानुशासनम्’ जिस पर पतंजलि भाष्य करता है, न तो पाणिनि का ही प्रथम सूत्र है और न वार्तिक का ही। 

वररुचि कात्यायन गोत्र का था। इन्हें कात्यायन भी कहा जाता है। इन्होंने पाणिनि सूत्रों पर वार्तिक लिखा। वार्तिकों की कुल संख्या 5032 है, जो 'महाभाष्य' में पाये जाते हैं। वार्तिककार कात्यायन न केवल 'अष्टाध्यायी' का प्राश्निक था वरन् पाणिनि की क्षत्रिय पोषक नीति का शत्रु भी था। (भगवतशरण उपाध्याय, भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, पी. पी. एच., नई दिल्ली, 1973, पृष्ठ 24) कैयट अपनी महाभाष्य टीका में 34 और वार्तिकों का उल्लेख करता है। पाणिनि पश्चिम का था और कात्यायन पूर्व का। अतः भाषा की विषमता को दूर करने के लिए वार्तिक की आवश्यकता हुई। नन्द की सभा में दोनों का विवाद हुआ था। 

पतंजलि को 'महाभाष्य' का लेखक तथा पाटलिपुत्र के आसपास का निवासी बताया गया है। 'महाभाष्य' में पाटलिपुत्र का इतना अधिक उल्लेख है कि कोई सहज ही निष्कर्ष निकाल सकता है कि उक्त पुस्तक का सम्पूर्ण नहीं भी तो अधिकांश भाग इसी शहर की धरती पर रचा गया था। (जे. एन. समादार, ग्लोरिज ऑफ मगध, के. पी. जायसवाल रिसर्च इंस्टीट्यूट, मार्च 1990, पृष्ठ 24, पाद टिप्पणी संख्या 13) 'महाभाष्य' में हमें ‘चन्द्रगुप्त-सभा’ एवं ‘पुष्यमित्र-सभा’ जैसे पद के उल्लेख प्राप्त होते हैं। यह भी जानकारी मिलती है कि प्रसिद्ध नगर महिष्मती से भी वह परिचित था। (सुरेश चन्द्र बनर्जी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 2) वह पुष्यमित्र शुंग का समकालीन था। (देवसहाय त्रिवेद, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 134) पतंजलि व्याकरण में ही नहीं राजनीति में भी वार्तिककार कात्यायन का विरोधी था। वह क्षत्रिय-शत्रु (इस विषय पर विस्तृत अध्ययन के लिए देखें, राजू रंजन प्रसाद, प्राचीन भारत में प्रभुत्व की खोज : ब्राह्मण-क्षत्रिय संघर्ष के विशेष संदर्भ में, पीएच. डी. थीसिस, पटना विश्वविद्यालय, पटना, 2006, अप्रकाशित।) और पुष्यमित्र का स्रष्टा था, इससे वह पाणिनि और कात्यायन दोनों का विरोधी था। (भगवतशरण उपाध्याय, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 24)

पतंजलि ने पाणिनि के संस्कृत व्याकरण की टीका लिखी। यह टीका, जो ‘महाभाष्य’ के नाम से मशहूर है, उतनी ही प्रामाणिक मानी जाती है, जितना कि पाणिनि का ग्रंथ। शेरबात्स्की ने लिखा है कि हिन्दुस्तान की आदर्श वैज्ञानिक कृति पाणिनि का व्याकरण और पतंजलि का ‘महाभाष्य’ है। (जवाहरलाल नेहरू, हिंदुस्तान की कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, 1988, पृष्ठ 247) महाभाष्य पद-योजना तथा शब्दों के विकास का एक प्रभावशाली अध्ययन ही नहीं है, अपितु वह, अप्रासंगिक रूप से, उस समय के इतिहास पर उपयोगी सामग्री भी प्रस्तुत करता है। (रोमिला थापर, भारत का इतिहास (हिंदी), राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, चतुर्थ संस्करण : 1985, पृष्ठ 93)

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