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Monday, October 5, 2026

सुधांशु जी के हिन्दी-प्रेम के किस्से

 बिहार में सरकारी स्तर पर हिन्दीकरण की दिशा में जो प्रयास हुआ है, वह बहुत हद तक लक्ष्मीनारायण सुधांशु के धीरज और चेष्टाओं का नतीजा है। उन्हीं के सुझाव से राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने सरकारी काम-काज में हिन्दी के उत्तरोत्तर व्यवहार में कैसे प्रगति की जाए, इसके लिए एक 'हिन्दी समिति' गठित की थी, जिसके प्रमुख स्तंभ सुधांशु जी ही रहे। (हंसकुमार तिवारी, 'राजनीति और साहित्य के सेतुबंध', परिषद-पत्रिका, वर्ष : 40, अंक : 3, दिसंबर 2000, पृष्ठ 19) उन्होंने ही बिहार विधानसभा द्वारा बिहार-राष्ट्रभाषा-अधिनियम निर्मित कराया और बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद की भी स्थापना करवाई। (रामदयाल पांडेय, 'डॉ. सुधांशु : एक स्मृति', परिषद पत्रिका, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 25)

जब वे विधानसभा के अध्यक्ष हुए तो कई लोगों ने सवाल उठाया कि इस पद पर रहते हुए आप प्रगति समिति के सिलसिले में घूम तो नहीं सकेंगे। सुधांशु जी मामला स्पष्ट किया। कहा, 'तो मैं विधानसभा का अध्यक्ष-पद छोड़ दूंगा। हिन्दी मेरे लिए पहले है।' (हंसकुमार तिवारी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 21)

उनके काल में विधानसभा में अंग्रेजी नहीं बोली जाती थी। कार्यालय की लिखा-पढ़ी अंग्रेजी में बिल्कुल नहीं होती थी, सरकार का कोई अंग्रेजी पत्र स्वीकार नहीं किया जाता था। यहां तक कि विधायकों आदि के देयक, जिनका संबंध कोषागार, बैंक और महालेखापाल से होता है, हिन्दी में ही होते थे। दिलचस्प घटना है कि 'मुख्यमंत्री होने पर पहले ही दिन श्री कृष्णवल्लभ सहाय जब विधानसभा में बोलने को खड़े हुए और अंग्रेजी से जैसे ही शुरुआत की, सुधांशु जी उन्हें बेधड़क रोक दिया।' (हंसकुमार तिवारी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 20)

प्रधानमंत्री इंदिरा जी जब पटना पधारीं तो हवाई अड्डे पर उनके स्वागत का जो आमंत्रण पत्र था, वह अंग्रेजी में छपा था इसलिए सुधांशु जी हवाई अड्डे स्वागत में नहीं गए। शाम को राजभवन के स्वागत-भोज में उपस्थित हुए क्योंकि वह निमंत्रण-पत्र हिन्दी में था। (हंसकुमार तिवारी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 20)

जब दिनकर जी भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति पद का 'चार्ज' लेकर सुधांशु जी से मिलने आए तो छूटते ही सुधांशु जी ने दिनकर जी से पूछा कि 'हस्ताक्षर हिंदी में किया या अंग्रेजी में?' इस तीखे प्रश्न पर दिनकर जी का चेहरा उतर गया और वे ग्लानिभरे शब्दों में धीमे से बोले-'किया तो अंग्रेजी में'। (भुवनेश्वरनाथ मिश्र माधव, 'गंगा की तरह पवित्र', परिषद पत्रिका, वर्ष 40, अंक 3, अक्तूबर-दिसंबर 2000, पृष्ठ 15)