Saturday, September 12, 2026

हिन्दी के पाणिनि

किशोरीदास वाजपेयी संस्कृत के छात्र रहे थे, हिंदी साहित्य में उनका प्रवेश सन 1916 में हुआ माना जा सकता है जब किशोरीलाल गोस्वामी के मासिक पत्र 'वैष्णव-सर्वस्व' में 'दशधा भक्ति' शीर्षक लेख छपा। किशोरीलाल गोस्वामी ने इस लेख में 'दश' को गलत बताकर 'दस' कर दिया। इस बात पर वाजपेयी जी की भृकुटि तन गई। झगड़ बैठा कि 'दश प्रकार की भक्ति के दश को काटकर दस गलत क्यों कर दिया!' (साहित्यिक जीवन के अनुभव और संस्मरण) उस समय गोस्वामी जी ने मुस्कुराते हुए केवल इतना कहा था कि "हिन्दी में 'दश' की जगह 'दस' ही चलता है और क्यों चलता है, यह सब आगे मालूम हो जाएगा।" (वही) और आगे चलकर वाजपेयी जी को कुछ इस तरह मालूम हुआ कि वे हिन्दी के पाणिनि माने गये।

आरम्भ में किशोरीदास वाजपेयी को हिन्दी के आचार्य लोग बहुत हल्के में ले रहे थे तभी राहुल सांकृत्यायन ने लोगों को बताया कि जिस परीक्षा में वे अनुत्तीर्ण रहे किशोरीदास जी उसके टॉपर थे! दरअसल, वाजपेयी जी ने शास्त्री की परीक्षा दी थी। उस परीक्षा में राहुल भी बैठे थे। परीक्षा का परिणाम देखा गया तो राहुल फेल थे और वाजपेयी जी का नाम सूची में सबसे ऊपर था। राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी शब्दानुशासन की प्रस्तावना में ग्रंथ की महत्ता बताने के लिए इस बात की चर्चा कर देना आवश्यक समझा। 17 दिसम्बर उनका जन्मदिन था, लेकिन चतुर्दिक सन्नाटा पसरा रहा। लगता है, आज फिर वे चर्चा से बाहर कर दिये गये हैं। कृतघ्न हिंदी जगत को आज फिर किसी 'राहुल' की डांट का इंतजार हो शायद!

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