वर्षों से पढ़ते-सुनते आ रहे हैं कि अबतक का सारा इतिहास पुरुषों का, पुरुषों द्वारा लिखा गया इतिहास है। अर्थात पुरुष अपराधी और जज दोनों की भूमिका निभाता रहा है और मनोनुकूल फैसले लेता रहा है। इतिहास के इन फैसलों की वस्तुनिष्ठता जाँचने के लिए जरूरी है कि प्रतिपक्ष को भी सुना जाय। इतिहास की इस पहल से उन नये साक्ष्यों की खोज शुरू हुई है जिन्हें पुरुष प्रभावित कर पाने में लगभग असमर्थ रहे हैं। स्त्री-गीत इतिहास के ऐसे ही साक्ष्य हैं जिनके बारे में लगभग विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि वे मूलतया स्त्रियों द्वारा रचित एवं संरक्षित हैं। प्रेमचंद कहा करते थे कि "पुरुष इतना भावुक नहीं हो सकता कि स्त्रियों के अंदर के दर्द को महसूस कर सके। यह तो स्त्रियों ही के बनाए हुए हैं। स्त्रियों का दर्द स्त्रियां ही जान सकती हैं, और उन्हीं के बनाए यह गाने हैं।" (शिवरानी देवी, प्रेमचंद : घर में, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 222) इसलिए स्त्रियों का कोई भी वास्तविक और प्रामाणिक इतिहास स्त्री-गीतों से गुजरे बगैर नहीं लिखा जा सकता।
औरतों के बारे में कहा जाता है कि वे सब कुछ बर्दाश्त कर लेती हैं, किंतु सौत नहीं। एक कहावत भी है कि 'सौतिन काठो के न अच्छा।' इसी को 'सौतिया डाह' कहा गया है। हमारे प्राचीनतम लिखित साक्ष्य वैदिक साहित्य के दिनों से ही हमें स्त्री-मन में सौतों से डर तथा घृणा के उल्लेख प्राप्त होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋग्वैदिक काल के अंत तक एकपत्नीत्व की प्रथा जड़ जमा चुकी थी। दशम् मंडल की सूक्त संख्या 33 में इंद्र को संबोधित मन्त्र में कहा गया है कि 'सपत्नियों की तरह मेरे पार्श्व पीड़ा देते है।' दिलचस्प बात है क़ि इसी दशम् मंडल का सूक्त 145 सपत्नीबाधन अथवा उत्पीड़न के भाव से भरा है। इस सूक्त की ऋषिका इन्द्राणी हैं। इन्हें शची भी कहते हैं। देवता हैं सपत्नीबाधन। सूक्त के प्रथम मन्त्र में कहा गया है कि इस लता रूपिणी बलवती औषधि को हम खोदकर निकालते हैं, इससे सपत्नी को पीड़ित किया जाता है। दूसरे मन्त्र में कहा गया है कि आप मेरी सपत्नी को दूर करें तथा मेरे स्वामी को मात्र मेरे लिए प्रीतियुक्त करें। तीसरे मन्त्र में है कि हमारी सपत्नी निकृष्टों में भी अति निकृष्ट स्थिति को प्राप्त करें। चौथे मन्त्र में है कि मैं इन्द्राणी, सपत्नी का नाम तक लेना उचित नहीं समझती हूँ। सपत्नी सभी के लिए अप्रिय होती है। सपत्नी को मैं दूर से भी अति दूर देश में भेज देना चाहती हूँ। 5वें मन्त्र में, 'हे औषधे! मैं आपके सहयोग से सपत्नी को पराजित करनेवाली हूँ। आप भी इस कार्य में समर्थ हैं। हम दोनों शक्ति संपन्न बनकर सपत्नी को शक्तिहीन करें।' और अंत में, मन्त्र संख्या 6 में पति से प्रार्थना है क़ि मैं आपके सिर के स्थान सिरहाने के समीप सपत्नी को पराभूत करनेवाली इस औषधि को स्थापित करती हूँ। रामचरितमानस की मंथरा, कैकेयी से कहती है कि पुत्र को राज्य और राम को वनवास दो और 'सौत का सारा
आनंद तुम ले लो'-'देहु लेहु सब सवति हुलासू'। (रामचरितमानस, गीता प्रेस, गोरखपुर, पृष्ठ
324) कैकेयी भी दृढ़प्रतिज्ञ है कि 'मैं भले ही नैहर जाकर वहीं जीवन बिता दूंगी; पर जीते-जी सौत की चाकरी नहीं करूंगी'-"नैहर जनमु भरब बरु जाई। जिअत न करबि सवति सेवकाई।" (वही, पृष्ठ 323) पुत्र के मुख से वनगमन का दुःसंवाद सुनकर कौसल्या कहती है-'विप्रकारं सपत्नीनामेबं जीर्णपि राघव।' अर्थात 'हे राम, बुढ़ापे में सौतों का अनादर मुझसे अब सहा न जायगा।' (2/20/47; शिवबालक राय, वाल्मीकि- रामायण : काव्यानुशीलन, मोतीलाल बनारसीदास, 1988, पृष्ठ 292)
पितृसत्तात्मक समाज में सौत स्त्रियों की स्थायी पीड़ा रही है, इसलिए उससे संबंधित कई मुहावरे भाषा में दर्ज हैं। एक कहावत है 'सेज की मक्खी भी बुरी'। (एस. डब्ल्यू. फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 344) फिर सौत के संबंध में अलग से कहा ही क्या जाय? एक दूसरी कहावत है, 'सौकन चून की भी बुरी है' (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 348) इसी बात को एक अन्य कहावत में कुछ इस तरह कहा गया है- 'सौकन बुरी चून की और साझे का काम/कांटा बुरा करील का और बदरी का घाम।' (वही)
यह डर लोक और लोकगीतों में भी मुखर है। कई दफा इस डर को हथियार बनाकर परिवार के सदस्यों, खासकर ननद और पति के द्वारा स्त्री को काबू में करने की कोशिश की गई है। अंगिका में इस आशय का एक गीत है। पति अपनी पत्नी के लिए कंगन खरीदकर लाता है। उसकी ननद उसे पहने हुए देख लेती है और वह निश्चय कर लेती है कि भाभी के पुत्र होने पर मैं यह कंगन ही बधाई में लूँगी-'कँगना पहिर भौजो ठाढ़ भेलै, अँगनमा से ठाढ़ भेलै हे। ललना रे, परि गेल ननदो मुँह दीठ, कँगनमा भौजो पहिरल हे।। तोहें ननदो मनाव$ गोसाईं, औरू भगमानजी सें हे। ललना रे, जौं घर बबुआ जनम लेल, कँगनमा पहिराई देब हे।।' भाभी पुत्रवती होती है और ननद उससे बधाई में कँगन की माँग करती है। भाभी सौरगृह से कँगन की चोरी हो जाने का बहाना बनाती है। ननद, माता-पिता तथा भाई से कँगन दिलवाने का अनुरोध करती है। सब से वही चोरी का बहाना। अंत में भाई अपनी बहन से कहता है कि जाने दो, मैं दूसरा विवाह कर लूंगा और तुम्हारी नई भाभी से तुम्हें कँगन दिलवा दूंगा। इस खबर को पाकर जच्चे का सारा गर्व टूट जाता है और वह कँगन अपनी ननद को दे देती है तथा अपने पति से दूसरा विवाह न करने की प्रार्थना करने लगती है। 'चुप रहु चुप रहु बहनियां कि बहिनियां, से अरज करियो हे। ललना रे, करबौ में दोसरो बिअहबा, कि कँगनमां तोरा पेन्हाइ देबौ हे।। गोड़ लागियों पैयाँ परियो परभुजी, अब अरजिया करियो हे। ललना रे, जनि करिहो दोसरो बिआह, कँगनमां ननदो देइ देब न हे।।'
एक अन्य गीत में वर्णन है कि पुत्रोत्पत्ति की ख़ुशी में जच्चे के नैहर से 'पियरी' में जड़ीदार साड़ी आई है। ननद बधावे में 'पियरी' ही की मांग करती है। ननद अपने माता-पिता और अपने प्यारे भाई से पियरी दिलाने का अनुरोध करती है, लेकिन जच्चा सबके अनुरोध को ठुकरा देती है। अंत में भाई अपने बहन को सांत्वना देते हुए कहता है- 'बहन, अधीर मत हो। मैं दूसरी शादी करूँगा, तो उससे पुत्र होने पर मैं उसकी पियरी तुम्हें दिला दूंगा। पति की इस बात से मानिनी जच्चे का गर्व चूर हो जाता है और वह सौत के डर से अपनी पिटारी से पियरी निकालकर ननद के आगे फेंक देती है। 'चुप रहु, चुप रहु बहिनी, त बहिनी सें अरज करी हे। ए बहिनी, करबै हम दोसर बियाह, पियरिया तू बधावा लिहें हे।। एतना बचनिया जब सुनल, त सुनहु न पाओल हे। ए ललना, झाँपी से काढ़ली पियरिया, अँगनमा धय बजारी देल हे। ए ननदो, लेहो छिनरिया पियरिया, त सौतिन मंगाबे लागल हे।।'
शिव द्वारा अपनी साली से ही दूसरा विवाह कर लेने पर गौरी रुष्ट होकर शाप देती है। 'मरियो गे संझा भाइ रे भतिजबा, आरो होइहो कोखिया बिनास हे। तीनि भुवन बर कतहुँ न मिललौ, भै गेलै सौतनी हमार हे।' संध्या, जो सौत बनकर आयी है, बड़े ही मार्मिक शब्दों में कहती है, बहन, भला-बुरा क्यों कहती हो तथा शाप क्यों देती हो? मेरे लिए तो कार्तिकेय और गणपति दो बालक हैं, उनको मैं खेलाऊँगी। 'मतु पढ़अ गारी गौरा, भाइ रे भतीजा लाइ, जनि करिह$ कोखिया बिनास हे। कारतिक गनपति, दोइ रे बालक, गोदी के खेलाइबअ होइबअ में दासी तोहार हे।।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 195)
मगही लोककथाओं में भाभी के प्रति ननद की कटुता परिलक्षित होती है। सोभानायका बनजारा लोक-गाथा में ननद की कटुता जसोमती के प्रति ऐसी है कि ननद के प्रति घृणा उत्पन्न हो जाती है। (डॉक्टर एनामुल हक, मगही लोक-गाथाओं का साहित्यिक अनुशीलन, विशाल पब्लिकेशन, प्रथम संस्करण : 2007, पृष्ठ 267) भाभी की कटुता भी छिपी नहीं रहती- "ये नन्दो राँड़ का काम होगा-वही तायी से कराय के घर गई है।" (बूँद और समुद्र, अध्याय 6; भारतेन्दु-युग और हिन्दी-भाषा की विकास-परंपरा, पृष्ठ 149 में उद्धृत)
लोकगीत में सास-बहू प्रसंग
एक नेपाली गीत में बहुओं के प्रति निर्दयी सासों का अत्याचार कुछ इस तरह चित्रित किया गया है :
'सास कहती है-बहू! बहू कहती है-जी!
'काठ की हांडी में रखा हुआ घी किसने खाया?'
'न देखा न सुना, मैंने कहाँ खाया।'
तेरे होंठ चिकने हैं, मैंने थाह पा ली।
जितने द्वार हैं बंद किये देती हूँ, जितनी खिड़कियां हैं खोले देती हूँ।
तू घी-चोर बहू है, तेरे होंठों को दाग दूंगी।'
सास के अत्याचारों का कहीं अंत नजर नहीं आता-
'मैं इस परदेस में मर जाऊंगी,
मेरे लिए आंसू बहाने वाला कोई नहीं।'
और अंत में,
'नारी का जन्म एक पराजित कर्म है,
सदैव दूसरों की परतंत्रता!' (देवेंद्र सत्यार्थी, धरती गाती है, पृष्ठ 154-155)
सास-बहू के बीच मतभेद नया नहीं पुराना है। गीतों में स्त्री अपनी मां के लिए प्रेम दिखाती है तो सास के लिए स्वाभाविक घृणा। एक गर्भवती स्त्री पतिगृह आने से दुखी है। सोचती है कि शादी के बाद भी अगर अपनी मां के घर रहती, तो मेरे दुःख को मेरी मां अपने अथक परिश्रम और सेवा-शुश्रुषा से कम कर देती, जबकि उसे अपनी सास के व्यवहार से दुःख है। 'अपन मैया रहतिऐ, दरदियो हरी लेतिऐ हो लाल। परभुजी के मैया हे बेदरदी, दरदो नहीं हरी लिय हो लाल।।' सास को भी बहू से कुछ कम शिकायत नहीं है। फिर बात अगर बहू की संतानहीनता की हो तो वह बहू के पद से भी उतार दी जाती है। 'सासू मन टूटल ननदी मन, औरु सभै के मन रे।' वंश परंपरा को कायम रखने की सबसे अधिक चिंता सास को सताती है, इसलिए निःसंतान बहू सास के लिए बहू न रहकर 'बाँझिन' हो जाती है। सास द्वारा बहू की इस प्रताड़ना में प्रायः ननदें भी शामिल रहती हैं। 'सासु मोरी कहले बँझिनियाँ, ननद मोरी बाँझिन हे।' सास बहू के बीच प्रेमपूर्ण सम्बन्ध न होने से सास मायके जाकर बैठी है। बहू जब प्रसव वेदना से परेशान हो उठती है तब बेटा अपनी माँ को मनाने जाता है। माँ आने को तैयार नहीं है; क्योंकि उसे अपनी बहू की बातें सह्य नहीं होतीं। 'ललना रे तोरि धनि क बोली न सोहाय, हुआँ रे कैसे जायब हे।' फिर, किसी तरह मानती है। सौरगृह में प्रवेश करते ही वह बच्चे को देखकर समय पर अनुपस्थित रहने के लिए पश्चाताप करने लगती है। लेकिन, बहू ऐसे अवसर पर भी उसे अपमानित करने से बाज नहीं आती। कहती है, 'बबुआ, मामा के देहुन धकिआई, केहुनि फुटि जैतेन कि ठेहुनि फुटि जैतेन हे।...दरद बेर न आएल हे।।'
डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने जैसाकि अपनी 'आत्मकथा' में लिखा है, 'मेरी हालत यह थी कि मैं जब कभी गांव पर छुट्टियों में आता, बाहर ही सोता। रात के समय जब सबलोग सो जाते तो मां दाई को भेजतीं कि जगा लाओ और वह जगाकर मुझे ले जाती और उस कमरे में छोड़ देती, जिसमें मेरी पत्नी रहतीं। नींद के मारे मुझे उस वक्त रात को जागना कठिन हो जाता। अक्सर मैं, कितनी भी कोशिश होती, जागता ही नहीं। दूसरे दिन माँ या चाची डांटती कि रात को जागते नहीं और बुलाने पर भी नहीं आते। सवेरे जब सब लोग सोये ही रहते उठकर चला आना होता और बाहर की चारपाई पर सो जाता, जिसमें किसी को यह पता न चले कि रात को कहीं दूसरी जगह गया था! यहाँ तक कि साथ के नौकर को भी इसका पता कम ही लगता।' (पृष्ठ 47-48) इसी आशय का एक गीत देखें, 'चुनरी पहरि मैं ओलयों ओसरवाँ/पियवा के मन ललचाय, हो गोरिया!/चोर की नैयां पिया लुकि लुकि आवै/जेकरे मैं बियाही तेउ पख फोरबा, हो गोरिया!' अर्थात 'चुनरी पहनकर मैं ओसारे में सोई/पिया का मन ललचा उठा, ओ गोरी!/चोर के समान पिया छिप-छिपकर आते हैं,/वही मानो सेंध लगाते हैं, ओ गोरी!' (देवेंद्र सत्यार्थी, बेला फूले आधी रात, पृष्ठ 7-8)
ऐसी स्थिति भी सास के लिए बहू के विरुद्ध हथियार ही बनती है। बहू के गर्भवती हो जाने पर सास को शंका हुई कि मेरा लड़का तो घर के बाहर बँगले पर सोता है, फिर यह गर्भवती कैसे हो गयी? उसे उसके चरित्र पर शंका होने लगी। उसकी पुत्रवधू ने शंका-निवारण के लिए मेघ से प्रार्थना की। वर्षा होने लगी। उसका पति छिपकर उसके पास आया। उपयुक्त अवसर पर उस स्त्री ने सास को उसके पुत्र को दिखलाकर उसकी शंका का निवारण किया-'बेटा मोरा सुतै बंगलवा, पुतहुआ मनहर घर हे। ललना रे, कौने रे रसिकवा से लोभायल, त पुतहू गरभ सैं हे।। बरिसहु हे मेघ बरिसहु, बरिसहु सोने बूंद हे। ललना रे, ओते ओते ऐतन बलमुआ, कि सिर के कलंक मेटत हे।। मंचिया बैठल मोरी सासु छेकी हे, कि सासु छेकी हे। ललना रे, चिन्ही लिअ$ सासु अपन बेटवा, कलंक मोर मेटि दिअऊ हे।।'
देवकी की ऑंखें और शरीर का रंग देखकर उसकी सास शंका करने लगती है; क्योंकि उसका बेटा तो गोकुल में रहता है, वह गर्भवती कैसे हो गयी? सास को शंका है कि उसकी बहू को किसी से अवैध संबंध हो गया है। 'मोर पूत बसै दूर देस, नगर गोखुला में रे। ललना रे, कौन पुरुखबा से रिझली, रहली गरभ सैं रे।।' बहू पटेवा से जाल बनाने का अनुरोध करती है; क्योंकि रात में छिपकर आये हुए अपने पति को वह फंसाकर अपनी सास की शंका दूर करना चाहती है। 'घर पछुअरबा में बसै पटेबा भैया, तोहिं मोरा हितबन रे। ललना रे, पाट सूत जाल बुनि देहो, कि पिआ के बझायब रे। ललना रे, पिआ के बझाई हम राखब, सासु पतियायब।।'
लोकगीत की पत्नी
लोकगीत वैसा संग्रहालय है जहाँ हमारा समाज अपनी संपूर्णता में देखा जा सकता है। समाज की एक एक चीज यहाँ करीने से धरी मिलेंगी आपको जिन्हें आप अपने समय और सुविधा के हिसाब से उलट- पलट सकते हैं। इन गीतों में स्त्रियों ने सिर्फ सोहर ही नहीं गाया है, बल्कि अपने पतियों के स्वछंद यौनाचार और उसके प्रतिरोध के गीत भी रचा है। अंगिका भाषा में एक ऐसा ही गीत दर्ज है-'गर्भवती नारी, जिसे अभी अपने गर्भ का अंदाज नहीं है, अपने पति के पास जाती है। पति उस समय मालिन के साथ घर के अंदर है। वह दरवाजा खोलने को तैयार नहीं है। उसने अपनी सास से इसकी शिकायत की। सास ने बहू को समझाया कि जाने दो, अभी तुम अपने महल में आराम करो, तुम्हारी गोद भरनेवाली है। 'धीरहि धीरहि अयलै चौकठिया धरि ठाढ़ि, केवड़िया धरि ठाढ़ि हे। खोलू राजा खोलू केवड़िया, महलिया जा के सोइब, माथा मोर पिराबै हे।। मालिन संग हमें सूतब, जाहो रानी रंग महलिया, जाके सोइ रह$ हे।।' पितृसत्तात्मक समाज में चूँकि पुरुष के यौनाचार को समाज से लगभग मान्यता प्राप्त है, इसलिए सास उसे समझाकर लौटा देती है। 'मचिया बइठली तोहे सासु, से ठकुराइन सासु, राउर पूता मलिनिया संगे हे। पुतहू, तोहरा क होतै नन्दलाल, मलिनिया संगे सूते देहू, तुहूँ महलिया सोइ रह हे।।' जब सास भी पितृसत्ता के पक्ष में खड़ी नजर आती है तो उसका अंतिम सहारा भी उसके हाथ से निकल जाता है। डूबती पत्नी के लिए चौकठ तिनके का सहारा बनता है-'धीरहिं धीरहिं अयलै चौकठिया धरि ठाढ़, केवड़िया धरि ठाढ़ रे।' किंतु भारतीय पत्नी पितृसत्ता को अपने तरीके से चुनौती देती है। पति के बार बार के आग्रह के बाद भी वह किवाड़ नहीं खोलती- 'खोलू रानी खोलू सोने के केबड़िया, महलिया में सोबे देहू हे।' पत्नी के हथियार देखें, 'राजा, माथा मोर पिराबे, बलकवा मोर रोबइ हे। राजा, मूठि एक लेहू भुसबा, भुसघरवा जा के सोइ रहू हे।।' सीता के गृहनिकाला का पत्नी यहाँ अपने 'राम' से बदला लेती है। पति को पत्नी के इस 'बदले तेवर' का भान होता है-'रानी बहै के पुरबैया बहै पछिया, भूसा उड़ि मुख पड़ै हे।' इस लोकगीत की ताकत यही है कि 'सीता' के समक्ष 'राम' को अपनी पराजय स्वीकार किये बगैर घर वापसी की अनुमति नहीं मिलती-'रानी हे, खोलू आजु खोलू केबड़िया, महलिया में सोबे देहू हे। तोहि आज जीतल हम हारलें, महलिया में सोबे देहू हे।।'
एक अंगिका सोहर में राम द्वारा जंगल में निर्वासित सीता नाई को बुलवाकर लोचन पहुँचाने के लिए उसे अयोध्या भेजती हैं। कहती हैं, 'पुत्रोत्पत्ति की खबर दशरथ, कौशल्या और लक्ष्मण को देना, लेकिन किसी प्रकार राम इसे जानने न पायें।' 'पहिली लोचन राजा दसरथ, तब कय कोसिलेआ रानी हे। ललना, दोसरी लोचन देवरा लछुमन, राम नहीं जानै हे।।' हजाम अयोध्या पहुँचता है तो उसे सबसे पहले राम ही से भेंट होती है। राम हजाम को विदाई के समय सीता के नाम से एक पत्र लिखकर देते हैं। सीता उस पत्र को पाकर मुस्कराती तो हैं, लेकिन राम को भला-बुरा भी कहती हैं। एक परित्यक्ता का अपने निष्ठुर पति के प्रति ऐसा भाव उचित/ यथार्थ चित्रण है। 'चिठिया लिखिये राम देलन, औरो राम देलन हे। ललना रे, दय दिहें सीता के हाथ, त राम चली आबै हे।। चिठिया में बाँची बाँची सीता, त मन मुसुकाबै हे। ललना रे, कौने कुलबोरना, चिठी लिखल लिखी के पठाबल हे।।'
इन गीतों से रामायण की सीता की बरबस याद आती है। राम जब सीता को वन में साथ चलने की अनुमति नहीं देते तो क्षत्राणी का छिपा तेज लहक उठता है। वे कहती हैं, 'हे राम, यदि मेरे पिता मिथिलापति विदेह यह जानते कि तुम पुरुष के रूप में स्त्री हो, तो वे तुम्हें अपना जामाता कदापि न बनाते।' (किं त्वामन्यत वैदेह: पिता मे मिथिलाधिपः। राम जामातरं प्राप्य स्त्रियं पुरुषविग्रहम्।। 2/30/3; शिवबालक राय, वाल्मीकि रामायण : काव्यानुशीलन, मोतीलाल बनारसीदास, 1988, पृष्ठ 327) 'आह, जनक ने पुरुष वेश में एक स्त्री को (धोखे में) अपना जमाई बना लिया। खेद है, अज्ञानवश लोग झूठा ही कहने लगे कि राम सूर्य के समान तेजस्वी हैं; किंतु, (सच तो यह है) इनमें तेज है ही नहीं--'अनृतं वत लोको$यमज्ञानाद् यदि वक्ष्यति। तेजो नास्ति परं रामे तपतीव दिवाकरे।।' (2/30/34; शिवबालक राय, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 327)
लोकगीत की पत्नियां पति के फैसलों को चुपचाप नियति मानकर स्वीकार करनेवाली नहीं हैं, न पति हमेशा परमेश्वर। फैसला अगर अनुचित हुआ तो पत्नियां मंसूबे पर पानी फेर देने में सक्षम हैं। एक गीत में पति दूसरा विवाह करने निकलता है। उसकी पत्नी ने उसे रोका और पूछा-'आप तो विवाह करने जा रहे हैं, परंतु मुझे किसे सौंप रहे हैं?' पति ने उत्तर दिया-'मैं तुम्हें अपनी मां और बहन को सौंप जाऊंगा तथा तुम्हारे लिए बहुत-सा धन दे जाऊंगा।' पति चला गया। पत्नी ने मनौती मानी कि विवाह करने के लिए जाते समय जोरों से आँधी-पानी आ जाए। पानी में भींगता हुआ पति लौट आया और पत्नी से किवाड़ खोलने का अनुरोध करने लगा। 'देबौ रे कागा तोंहे खसिया ओ पठिया, जौं परभु जैता बिआह करे हे। आन्ही पानी सूप, नेवोति रखिहें हे।। आन्ही अछकाल कैने, पानी छछकाल कैने हे। हे खोलु धानि सोबरन केबरिया, सोहामन मौरिया भींगी जैतो हे।।' (अंगिका संस्कार गीत, पृष्ठ 223)
लोकगीत में भाभी-ननद प्रसंग
हिंदी का ननद शब्द संस्कृत का ननान्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है आनंद न देनेवाली। लोकगीतों में भी ननद ज्यादातर भाभी के समक्ष इसी रूप में प्रकट होती रही है। सास-बहू की लड़ाई में तो यह अपनी मां का साथ देती ही है, इसकी नजर भाभी के वस्त्राभूषणों पर भी होती है। अकारण नहीं है कि ननद लोकगीतों में अक्सर भाभी पर उपहार देने का दवाब बनाती चित्रित है। अंगिका के एक मुण्डन-संबंधी गीत में वर्णन है कि मुण्डन के अवसर पर बहू ननद को इसलिए निमंत्रित नहीं करना चाहती कि उसे बधैया देना पड़ेगा। 'ललना रे, एक नहीं नेतब ननद दाइ, जिनि रे बधैया मांगे रे।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 95)
एक गीत में वर्णन है कि पुत्रोत्पत्ति की ख़ुशी में भाई के दरवाजे पर बधावे बज रहे हैं। बाजा बजानेवाले को धीरे-धीरे बजाने का आदेश दिया जाता है, क्योंकि बाजे की आवाज सुनकर बहन के आ जाने का भय है। 'घर पिछुअरबा चमरबा भैया, चमरबा भैया हितबा हो लाल। नीचा कय ठोकिहे ढोलकबा, बहिनी जनु सुनै हो लाल।।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 42) बहन नैहर आ धमकती है और भाभी से बधावे से उसका नगर ही मांगती है। 'भौजो, नहिं हमें पैर धोबै, नहिं हमें जेमबै हो लाल। भौजो, बाबा के नगर अजोधा, बधैया हमें लेबो हो लाल।।' (वही, पृष्ठ 43) भाभी उसका अपमान करती हुई कहती है, 'यह नगर न तुम्हारे बाप का अर्जित किया हुआ है और न तुम्हारी माँ के छिपाकर रखे हुए रुपये का है। तुम भागो यहाँ से। मैं बधैया नहीं देती।' 'नहिं तोरा बाप के अरजल, माई के कोसल हो लाल। नहिं मिलतो नगर अजोधा, रोबैते घरबा जाहो हो लाल।।' (वही, पृष्ठ 43)
एक अन्य गीत में भी बच्चे की माँ नाचने-गानेवाले को चुप रहने को कहती है; क्योंकि उसे भय है कि इन लोगों की आवाज को सुनकर ननद बधावा लेने आ जायेगी। 'चुप रहू नाच नचनियां, ढोलक बजनियां रे। ललना, सुनि पैती ननद गोसावनि, बधैया माँगे आयती रे।।' (वही, पृष्ठ 43) फिर भी ननद पहुँच जाती है। भाभी उससे भोजन करने का आग्रह करती है, किंतु ननद कहती है कि मैं तो अपने भतीजे का बधावा लेने आई हूँ। भाभी कहती है कि मां-बाप के बिना नैहर में बेटी की इज्जत नहीं होती। ननद भी इतनी जल्दी अपना अधिकार नहीं छोड़नेवाली। कहती है, मैं तो अपनी मां की पिटारी, जिसमें चीजें संजोकर रखी है, खोलने आई थी। 'मति जनिह$ ए भौजो, मति जनिह$, तोरे भनि आयल रे। भौजो, अम्माँ के साँठल पेटरिया, बह खोले आयली रे।।' (पृष्ठ 44) बधावा न मिलने पर ननद रोते हुए, भगिना ठुनकते हुए और ननदोसी बिहँसते हुए जाता है। पति खुश है कि नैहर का उसका घमंड तो टुटा। 'कनैत जाय ननदिया, ठुनकैत भगिनमा रे। हँसैत जाय ननदोसिया, भले रे मग तोरल रे।।' (पृष्ठ 44) पति सांत्वना देता है कि अधीर मत हो। मैं नौकरी करूँगा और तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति कर दूंगा। तुम अपने नैहर को भूल जाओ। 'तोरा लय आनबौ चुनरिया, बबुआ गले हँसुलिया रे। अपना लय चढ़न के घोड़बा, नैहरबा तोहिं बिसरहो रे।।' (पृष्ठ 44) उसकी पत्नी इन चीजों को लात मारने के लिए तैयार है, परंतु अपमानित होकर भी वह अपने नैहर से सम्बन्ध तोड़ना नहीं चाहती क्योंकि वहां उसकी जड़ होती है। अपनी जड़ों से कटना हवा में होना है। 'अगिया लगैबो चुनरिया, बालक गले हँसुलिया रे। ललना रे, नदिये भंसैबो चढ़न के घोड़बा, नैहर केना बिसरब रे।।' (पृष्ठ 45)
एक गीत में सीता का अपनी भाभी के व्यवहार से दुखी होने का वर्णन प्राप्त होता है। इस गीत में सीता के विवाह के बाद की स्थिति का वर्णन है। सीता नैहर से विदा हो रही है। सभी परिजन दुखी हैं। 'अम्माँ के काननें गँगा बहि गेलै, बाबा के भींजल पटोर हे। भैया के काननें जमुना बाढ़ि आयल भौजो के हिरदा कठोर हे।।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 205) अतः सीता भाई को तो आशीर्वाद देती है किंतु भाभी को शाप। 'दूधें नहैह भैया पूत भरैहअ, नित उठि करिह काज हे। सात सौतिनियाँ भैया भौजी सेज धरिहअ, घूरि न आयब भौजी राज हे।।' (वही, पृष्ठ 205) इसी आशय का एक पंजाबी गीत है जो यहाँ द्रष्टव्य है। गीत का अंश है: 'आले ते जाले बाबल गुड्डियाँ, मेरे नई खेड्डन ते चाह होये। माँ रोंदी दी अँगिया भिज्ज गयी, प्यू रोये दरया बहे। मेरा बीर रोये, सारा जग रोये, मेरी भाभियाँ मन चाव होये।' (वही, पृष्ठ 205, पादटिप्पणी में उद्धृत) गीत का भावार्थ है: 'हे पिता, मैं तो अभी नन्हीं हूँ। घर के कोनों में, दीवारों के आलों में, सभी जगह मेरी गुड़ियाँ रखी हैं। अभी मेरा गुड़िया खेलने का चाव कहाँ पूरा हुआ? मुझे अभी क्यों घर से निकाल दे रहे हो? मैं घर छोड़कर जा रही हूँ। रोते-रोते मां की अँगिया भींग गई, पिता के रोने से नदियां बह गईं, भाई को रोता देखकर संसार रो रहा है, परंतु भाभियों के मन प्रसन्न हैं!'
लोक गीतों में भाभी-ननद प्रसंग हमेशा कटुतापूर्ण ही नहीं प्राप्त होते बल्कि परस्पर प्रेम और विश्वास से भरे भी हैं। ब्रज में प्रचलित 'विजयरानी का गीत' इसका बेहतर उदहारण है। विजयरानी असाधारण सुंदरी थी-'डाबरनैनी' (बड़ी और सुन्दर आँखोंवाली स्त्री को डाबरनैनी कहा गया है)। उसके पति ने बिरादरी के किसी अन्य पुरुष से हँसते देखकर उसके चरित्र पर संदेह किया। इसी मनोमालिन्य के कारण वह विजयरानी को हाथ में दिया थामे आते देखकर 'बजर केबार' बंद कर लेता है। भला हो विजयरानी की ननद का जिसने अपने भैया को समझाया कि विजयरानी निर्दोष है क्योंकि हँसकर बोलना डाबरनैनी के स्वभाव में सम्मिलित है। झट 'बजर केबार' खोले जाते हैं और विजयरानी अपने पति से मिल सकती है और ननद को पहनने के लिए दक्षिण का चीर और खाने के लिए गिरी छुआरे पुरस्कार-स्वरूप देने की बात सोच रही है। (देवेंद्र सत्यार्थी, बेला फूले आधी रात, पृष्ठ 29) भाभी-ननद के बीच प्रेम का एक और गीत है। वर्णन है कि भाई के घर में पुत्र होने पर बहन बधैया माँगने पहुँचती है। उसे मुँहमाँगी चीजें बधावे में मिलती हैं। बधावे की चीजों को लेकर वह अपनी भाभी और बच्चे को आशीर्वाद देती हुई जाती है। 'जैसें जैसें फूलत, माली फुलबरिया हे। वैसें फूलत मोर भौजो, कि आहो लाल।।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 89)
सोहर और पुत्री का जन्म
संतान के जन्म के उपरांत जो मंगल गीत गाये जाते हैं, 'सोहर' कहलाते हैं। इन सोहरों में बलवती पुत्रकामना, पुत्रप्राप्ति से परिवार में व्याप्त हो जानेवाली प्रसन्नता की लहर, पुत्रवती के सम्मान की वृद्धि आदि की बड़ी ही मार्मिक व्यंजना मिलती है। पुत्र की अपेक्षा पुत्री के जन्म को कम महत्त्व देने की प्रवृत्ति भी इन गीतों में सहज भाव से प्रकट है। इसका कारण वह सामाजिक व्यवस्था है जिसमें स्त्री-पुरुष के समानाधिकार को स्वीकार नहीं किया गया है। इन गीतों में पुत्रहीना के प्रति पति एवं परिवार के अन्य सदस्यों की उपेक्षा, प्रसव-पीड़ा के समय सास की उपेक्षा और निर्दय पति का जुए एवं अन्य व्यसनों में व्यस्त रहने का वर्णन पुत्री के कमतर महत्त्व को ही रेखांकित करते हैं। एक गीत में तो साफ-साफ स्वीकार किया गया है कि सौरगृह बिना पुत्र के नहीं सुहाता-'सोइर न होरिला बिनु रे'।(अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 73)
एक निमाड़ी लोकगीत में पति अपनी गर्भवती पत्नी को छोड़कर चला गया था। गांव के समीप पहुँचते हुए उसे ढोल की आवाज सुनाई देती है और वह झट समझ जाता है कि उसकी पत्नी ने पुत्र को जन्म दिया है। पत्नी कहती है, 'हम तो हारया पियाजी तुम जीतिया/बोल्या ते बचन समालो/पियाजी हमन लाल हो जायो।' (हम हार गये, पियाजी, तुम जीत गये/अब अपना दिया हुआ वचन सँभालो/पियाजी, मैंने लाल को जन्म दिया।) कदाचित पति ने घर से जाते समय पत्नी को वचन दिया था कि यदि गोरी ने लाल को जन्म दिया तो उसे बड़े-बड़े उपहार मिलेंगे। (देवेंद्र सत्यार्थी, बाजत आवे ढोल, पृष्ठ 12)
बहन पुत्रोत्सव सुनकर नैहर आती है। भाई उसे मुँहमाँगी चीजें देकर खुश करता है। बहन अपने भाई और भाभी के लिए शुभकामना प्रकट करती है और कहती है कि भाभी, तुम दूधों नहाओ, पूतों फलो-'दूधे लहैंहें हे भौजो पुतर बियैहें हे'। (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 82)
पितृसत्तात्मक समाज में जहाँ पुत्र का जन्म उत्सव का कारण बनता है, वहीँ पुत्री के जन्म से घर में विषाद के बादल छा जाते हैं। 'जहे दिन अगे बेटी तोहर$ जनम भेल, धरती उठल हहकार हे।' परिवार के दूसरे सदस्य के बारे में क्या कहा जाय, स्वयं माता-पिता का ह्रदय अपनी संतान के प्रति बदल जाता है। 'सास ननद बेटी मुखहुँ न बोलै, हरिजी के जियरा उदास हे।' ...जौ हमें जानतें धिया जनम लेती, खैते में मरीच पचास हे। मरिच के झांसे झूँसे धिया मरी जैती, छूटी जैत जीब के जंजाल हे।।' (अंगिका संस्कार गीत, पृष्ठ 152) बेटी के जन्म पर परिवार का दुखी होना एक सार्वभौम घटना प्रतीत होता है। पंजाब की पुत्री के जन्म का चित्रण आप यहाँ देख सकते हैं। जिस दिन कन्या ने जन्म लिया सारा परिवार दुखी हो गया, 'जिस दिन बाली बेटी ने जन्म लिया/सोच पई सब परिवारजी/तुसीं क्यों रे बाबल सीस नमाया।'
बहन किसी योगी के साथ प्रेम कर बैठती है। भाई उसे ऐसा करने से रोकता है। बहन-भाई का यहाँ जो संवाद है, उससे समाज में लड़की की वास्तविक स्थिति का पता चलता है। बहन कहती है, 'भैया, जो होना था, हो गया। मेरे लिए योगी ही अब सब कुछ है। आपके भाग्य में तो पिता की सारी संपत्ति लिखी हुई है। मेरे भाग्य में भिखारी का भाग्य ही वदा है। हम दोनों के जन्म के साथ ही दो तरह के व्यवहार किये गये। आपके जन्म के समय नार काटने के लिए सोने की छुरी का उपयोग किया गया, लेकिन मेरे जन्म के समय खुरपी काम में लाई गई। 'जहि दिन आहो भैया तोहर जनम छल, भै गेल चाँननी रात हे। हँसुआ खोजैते भैया सोना छूरी भेंटल, ओहि से छिलाय तोहर नार हे। जाहि दिन आहो भैया हमरो जनम छल, भै गेल अन्हारी रात हे। हँसुआ खोजैते भैया पसनी भेंटल, ओहि से अम्मा छिलल नार हे। तोहरा के लिखल भैया बाबा के सम्पतिया, हमरा के जोगिया भिखारी हे।।' (वही, पृष्ठ 134)
दान-दहेज की प्रथा और दुलहा खोजने की परेशानी से ऊबकर पिता का यह कहना कितना मार्मिक है कि विधाता बेटी का जन्म कभी नहीं देना। 'धिया के जलम जनु देहु बिधाता, सेहो देइय बड़ जे संताफ हे।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 149) विवाह के बाद राम सीता को लेकर घर चलते हैं। लड़की पराई हो जाने पर सीता की माँ रोने लगी कि अगर मैं जानती कि बेटी पैदा होगी, तो मैं पहले ही मिर्च खा लेती, जिसकी झांस से यह मर जाती। 'जौ हमें जनितौं माई हे सीता जनमती, खइतौं में मरीच पचास।' (अंगिका संस्कार-गीत, पृष्ठ 199) रास्ते में राम ने सीता से परिचय पूछा। सीता ने परिचय में कहा-'मैं राजा जनक की बेटी और राजा दशरथ की पतोहू हूँ। कौशल्या मेरी सास हैं तथा श्रीराम मेरे पति हैं।' 'राजा जनक जी के बारी कुमारी, राजा दसरथ के पुतोह हे। आहे रानी कोसिलेआ के अलख दुलरुआ, सामी के नाम सिरी राम हे।।' (वही, पृष्ठ 206) राम परिचय पाकर 'हँसने' लगे, परंतु सीता मन ही मन दुखी होने लगी कि अब मेरे मायके का खेल, सखी-सहेलियों का साथ तथा मेरी माता की गोद सब कुछ छूट गया। 'कोठियहिं छूटल सुपती मौनियाँ, मड़बहिं सखि सब लोग हे। आहे मंदिरहिं छूटल सुनैना रानी, जिनि कोखि भेल अवतार हे।।' (वही, पृष्ठ 206) 'राम' की खुशी का कारण कहीं यही तो नहीं कि 'सीता' अपनी जड़, अपने अतीत से कट चुकी है! मगही लोक-गाथा में गोपीचंद की माँ उससे कहती है, 'तीन मुल्क भिक्षा मांगना, पर बहन के देश मत जाना। तुम्हारी बहन छह मास रोएगी और प्राण त्याग देगी, क्योंकि तुम्हारे योगी बन जाने से जो उसे नैहर की आशा थी वह भी टूट गयी।' (डॉक्टर एनामुल हक, मगही लोक-गाथाओं का साहित्यिक अनुशीलन, विशाल पब्लिकेशन, प्रथम संस्करण : 2007, पृष्ठ 132) अंततः बहन के दुख से धरती फट गयी और गोपीचंद की बहन वीरम उसी फटी धरती में प्रविष्ट कर गयी। सदा के लिए भाई-बहन-नैहर का नाता टूट गया। (वही, पृष्ठ 133) लेकिन एक स्त्री के मन से नैहर की याद कहाँ जा पाती है। एक संताली विदाई गीत में बेटी अपनी माँ से कहती है-"हे माँ! तुम्हारी टूटी झाड़ू अंगना में है, तुम्हारा गोबर फेंकने की टोकरी गोहाल में है, तुम्हारा पीतल के घड़ा 'गंड़सादी' के ऊपर है, हे मेरी कल्पतरु! मैं तुमको छोड़कर जा रही हूँ।" (झारखण्ड एनसाइक्लोपीडिया, खण्ड 4, पृष्ठ 446) ये तमाम चीजें अब उसकी स्मृति में हैं। उससे कैसे पीछा छूटे?
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