Saturday, September 12, 2026

मनुस्मृति-दहन-दिवस

मित्र आज (2021) मनुस्मृति-दहन-दिवस मना रहे हैं। मैं उनके इस उत्सव का साझीदार नहीं हो सकता। इसलिए नहीं कि मैं मनुस्मृति के नियमों का पैरोकार हूँ। पैरोकार हो भी नहीं सकता। किन्तु वह हमारे समाज का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। उसे नष्ट करना इतिहास को, उसके एक महत्त्वपूर्ण स्रोत को नष्ट करना है। ऐसा करना या करने की सोचना मुझे बचकाना लगता है। बच्चा उटपटांग सोचने के लिए आजाद है!

डार्विन के विकासवाद की खोज के बाद यह साबित हो गया है कि मनुष्य, बंदरों की संतान है। आज विज्ञान के इस निष्कर्ष को मनुष्य जाति पर लगा एक 'कलंक' मान बंदरों को समूल नष्ट कर देने की मूर्खता नहीं कर सकते!

अंग्रेजों ने हम पर बड़े जुल्म किये। इसका मतलब यह नहीं कि आज हिंदुस्तान में उनके नाम पर खड़ी इमारतें ढहाते चलें। सारी अंग्रेजी किताबें जला डालें। नहीं, आज वे हमारी विरासत हैं। उन्हें सहेजकर रखना हमारा सरोकार होना चाहिए। ऐसा विवेक हम पैदा कर सकें।

मनु को हमने 'विलेन' गढ़ा है, जबकि अधिकतर लोग कमोबेश वही बात अपने-अपने तरीके से कह गये हैं। जिस बात के लिए मनु सबसे ज्यादा कोसे जाते हैं, 'आदिकवि' उसके स्रोत बनते हैं। मनु की अधिकतर बातें अपने पूर्ववर्ती कवियों और विधि-निर्माताओं की हैं। वाल्मीकि के मत में "नारी सदैव पुरुष के आश्रित रहनी चाहिए। कन्या के रूप में पिता, पत्नी के रूप में पति तथा माता के रूप में पुत्र उनके संरक्षक हुआ करते हैं।" (रामायण, 1/32/21, 1/33/3, 2/61/24; राधावल्लभ त्रिपाठी, संस्कृत कवियों के व्यक्तित्व का विकास, संस्कृत परिषद, सागर विश्वविद्यालय, सागर, 1976, पृष्ठ 13 में उद्धृत) महाभारत के शांति पर्व में बहुत से ऐसे श्लोक मिलते हैं जो अक्षरशः मनुस्मृति में पाए जाते हैं। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली, 1993, पृष्ठ 34) 

मनुस्मृति का महाभारत के साथ विलक्षण सम्बन्ध है। इसके 260 श्लोक ऐसे हैं जो अक्षरशः महाभारत में पाये जाते हैं। विद्वानों का मानना है कि इन दोनों ग्रंथों ने एक-दूसरे से इन श्लोकों को नहीं लिया है, बल्कि दोनों ग्रंथों का कोई एक मूल है। वशिष्ठ और विष्णुस्मृति में भी 160 श्लोक ऐसे हैं जो मनुस्मृति के हैं। (गंगानाथ झा, हिन्दू लॉ इन इट्स सोर्सेज, पटना विश्वविद्यालय, पटना, 1931, पृष्ठ 59)

जिसे हम 'लोकसाहित्य' कहते उल्लसित होते हैं, वहां भी तथ्य को प्रभुत्वशाली ताकतों ने अधिकाधिक रूप से अपने पक्ष में करने की कोशिश की है। एक कहावत है, 'औरत रहे तो आप से, नहीं तो जाय सगे बाप से' अर्थात 'स्त्री यदि स्वयं सच्चरित्रा है, तब तो वह रहेगी, अन्यथा अपने बाप के साथ भी निकल जाती है।' (फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 56) स्त्री को 'कामातुर' साबित करनेवाली कहावत देखिए : 'कातक कुतिया, माघ (कोश में 'माघ' की जगह माह लिखा है।) बिलाई, चैत चिड़िया, सदा लुगाई।' (पृष्ठ 68) और आगे, 'कौड़ी गांठ की, जोरू साथ की' अर्थात 'अपना पैसा हमेशा अपनी गांठ में और स्त्री को अपने साथ रखना चाहिए। अथवा पैसा गांठ का ही काम आता है और स्त्री तभी काबू में रहती है, जब अपने साथ रखी जाए।' (पृष्ठ 78)

मनुस्मृति का मूल्यांकन करते हुए हम ज्यादती करते हैं जब उसको ऐतिहासिक संदर्भ से काट देते हैं।

No comments: