Saturday, September 12, 2026

मेरी पीढ़ी का कॉफी हाउस

हमारी पीढ़ी के लोगों ने पटना का कॉफी हाउस नहीं देखा है। हाँ, जब तब लोगों के किस्सों में, और अख़बारों में कॉफी हाउस से जुड़ी यादें हमारी आँखों के सामने जीवंत होती रही हैं। कभी-कभी मन व्याकुल-सा हो उठता है कि उन टेबुल-कुर्सियों को छूकर देखता जिनपर बैठकर बाबा और रेणु सरीखे साहित्यकार अपना कथाजाल बुना करते थे। लेकिन हमारे इस दुःख पर पीपुल्स बुक हाउस ने मरहम लगाने का काम किया। सन 84 में यह मेरी दिनचर्या का हिस्सा बना। इसी वर्ष बी एन कॉलेज में मेरा दाखिला हुआ और सैदपुर का 3 नंबर का पी जी छात्रावास मेरा ठिकाना। पीपुल्स बुक हाउस मेरे आने-जाने के रास्ते में पड़ता था। कॉलेज से हॉस्टल की दूरी पैदल नापने के लिए यहाँ पांच-दस मिनट का जर्नी-ब्रेक लेना सुविधाजनक मालूम होता था। जिस तरह गांवों में राहगीर वृक्ष की शीतल छाया में थोड़ा सुस्ताकर आगे की यात्रा के लिए शक्ति बटोरते हैं, ठीक उसी तरह पी बी एच धूप और गर्मी से उपजी मेरी थकान दूर कर मुझे ऊर्जस्वित करता। इस किताब घर की आजादी आकर्षण का अतिरिक्त कारण बनती। प्रगति प्रकाशन, मीर और रादुगा प्रकाशन की किताबें हमारा स्वागत करतीं और इनकी कीमत हमारे अंदर लालच पैदा करतीं। सामान्यतया 20 पैसे से लेकर 2 रुपये तक में विश्व साहित्य और दर्शन की दुर्लभ किताबें सुलभ होतीं। इन किताबों के अतिरिक्त सीपीआई की 'कम्युनिस्ट' (हिंदीें) और 'पार्टी लाईन' (अंग्रेजी) जैसी पत्रिकाएं नियमित रूप से आया करतीं जिनका हम बेसब्री से इंतजार करते। वाल्टर रूबेन के कालिदास संबंधी लेख इसी 'कम्युनिस्ट' में पढ़े थे।

इन सस्ती किताबों ने पाठक और ग्राहक तो बनाया ही, साथ ही एक और आदत गले बांध दी। मित्रों और सगे-सम्बन्धियों को किताबें गिफ्ट करने की आदत। इस दुकान से किताबें एक प्रति में शायद ही खरीदता। किताब पढ़ाने का भी चस्का लगा। क्योंकि इन सस्ती किताबों ने मित्र द्वारा किताबें न लौटाये जाने अथवा खो जाने के उपरांत होनेवाले दुःख से लगभग मुक्त कर दिया था। गीता के शब्दों में कहें तो इसने हमें स्थितप्रज्ञ बनाया। 

पीपुल्स बुक हाउस में ही सरल, सहज और निश्छल 'आत्मा' श्री सत्यनारायण जी से परिचय हुआ। वे वहां की पुस्तकों के विक्रेता थे। हालाँकि विक्रेता कहना उनका अपमान करने जैसा है। मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन वे पार्टी के होलटाइमर सदस्य प्रतीत होते थे। सत्यनारायण जी की मृदु मुस्कान किसी को भी आकर्षित और वशीभूत करने के लिए काफी थी। विशेषकर जब वे पान खाए होते तो उसकी (पान की) लालिमा पूरे चेहरे पर मुस्कान बन फैल जाती। बाद में जब पीपुल्स बुक हाउस के पराभव के दिन शुरू हुए तो उन्होंने अजय भवन वाली गली में अपने मकान में दुकान लगा ली। और तब किताबें, जो पी बी एच में अनुपलब्ध होतीं, उन्हीं के यहाँ मिलतीं। कुछ सालों बाद असमय उनका निधन हो गया।

सोचता हूँ, जिस तरह काफी हाउस मेरी पीढ़ी के लिए कल्पना की चीज है, मेरे बाद की पीढ़ी के लिए पीपुल्स बुक हाउस।

थोड़ा और बड़ा हुआ तो एक और अड्डे के बारे में जानकारी हुई। यह नंदकिशोर सिंह का जानकी प्रकाशन था। यहां विश्वविद्यालय के विद्वान शिक्षकों एवं शोध-छात्रों का मेला लग जाता। घंटा-दो-घंटा यहां नियमित बैठते। हमारी पीढ़ी ने कॉफी हाउस की सिर्फ कहानियां सुनी थीं, हकीकत में जानकी प्रकाशन का ‘कुभ’ ही देखा था। यहां इतिहासवालों की बैठक होती और ‘राजकमल प्रकाशन’ में साहित्यकारों की गोष्ठी जमती। जानकी प्रकाशन में आकर्षण का केन्द्र थे ठाकुर जी। यहीं शोधार्थी अपने आलेख व थीसिस दुरुस्त करवाते। हिस्ट्री कांग्रेस के समय यहां भीड़ अचानक बढ़ जाती। सैकड़ों लोग आते, अपना पर्चा सुनाते-दिखाते और उचित मार्गदर्शन पाते। कभी-कभी वे इतना काटते-छांटते कि लेखक का ‘मूल’ ‘निर्मूल’ हो जाता। वे नये लोगों को बहुत प्रोत्साहित करते और मान देते थे। अन्य जगहों पर लोग इसका अभाव महसूस करते।

जानकी प्रकाशन का आकर्षण दारू की वजह से भी था। यहां खूंखार पियक्कड़ से लेकर नौसिखिये तक सब पहुंचते। कुछ तो वैसे लोग भी होते जिनके कान में दीक्षा-मंत्र यहीं फूंके गए थे। सब इसी एक घाट पर 'पानी' पीते। दारू खत्म होते ही बोतलें निष्ठुरतापूर्वक किताब की अलमारियों के पीछे लुढ़का दी जातीं। नंदकिशोर जी को कुछ लोग मजाक में कहते भी कि किताब से ज्यादा फायदा आपको बोतल बेचने में है। इन चुहलों के बीच कभी किताब के कवर से निराला हमें डांटते : सोडा के साथ पीओ या फिर नीट। पानी कभी नहीं।

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