Saturday, September 12, 2026

लोक साहित्य में स्त्री-विरोध

लोक साहित्य का अपना 'आकर्षण' तो है ही लेकिन प्रभुत्वशाली ताकतों ने उसे भी अधिकाधिक रूप से अपने पक्ष में करने की कोशिश की है, तोड़-फोड़ की है। एक कहावत है, 'मां पै पूत पिता पै घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़म थोड़ा।' (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश (अनुवाद : कृष्णानंद गुप्त), नेशनल बुक ट्रस्ट, पृष्ठ 270) अर्थात 'लड़के में अपनी मां के और घोड़े में अपने पिता के थोड़े-बहुत गुण अवश्य आते हैं।' लगता है, बाद में उपर्युक्त पहली कहावत को एक दूसरी से 'रिप्लेस' करने की कोशिश की गई-'बापै पूत सिपाह पै घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा थोड़ा।' (वही) कहने की आवश्यकता नहीं कि मुझे लोक स्मृति से बादवाली कहावत ही विरासत के रूप में प्राप्त हुई। 

कहावतों के और भी बहुत सारे उदाहरण हैं जिनसे इनके 'रचनाकार' का स्त्री-विरोधी होना प्रमाणित होता है। कहा गया है कि यदि ठंडी पुरवा हवा चले तो मेह अवश्य पड़ेगा और यदि विधवा पान खाने लगे तो समझ लेना चाहिए कि वह अवश्य किसी पुरुष के साथ भाग जाएगी। कहावत है, 'पुरवाई सीरी चलै, विधवा पान चबाई। वह लै आवे मेह कूँ, यह काहू करिजाइ।।' (नोट : विधवा जब किसी की पत्नी बनना चाहती है तब 'करना' धातु का प्रयोग होता है।) (डॉक्टर अम्बाप्रसाद 'सुमन', ब्रजभाषा-शब्दावली, प्रथम खंड, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण : 1960, पृष्ठ 95)

कवि घाघ पत्नी से कहते हैं कि यदि उलटा धरवा चढ़े अर्थात पुरवा हवा चलते समय बादल पश्चिम से पूरब को जाएँ तो अवश्य वर्षा होगी, और अगर विधवा बाल खोलकर स्नान करे तो निश्चय ही वह किसी पुरुष के साथ भाग जाएगी : 'उलटौ धरवा जौ चढ़ै, राँड़ मूँड़ ते न्हाइ। घाघ कहै सुन घाघिनी, वह बरसै यह जाइ।।' (पूर्वोक्त, पृष्ठ 90) कवि घाघ कहते हैं कि यदि पाँवों की जूतियां नसकट (नस काटनेवाली) हों, स्त्री बात काटनेवाली हो, पहली संतान पुत्री हो, खेती पतली (छेहर) हो और भाई पागल हो तो समझिए कि दुख असहनीय है: 'नसकट पनहीं बतकट जोय। जौ पहलौटी बिटिया होय।। पतरी खेती बोरौ भाइ। घाघ कहैं दुख कहाँ समाइ।।' (अम्बाप्रसाद 'सुमन', पूर्वोक्त, पृष्ठ 29)

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