Saturday, September 12, 2026

रामनवमी के बहाने रामकथा

फादर कामिल बुल्के ने रामकथा पर एक अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण, मूल्यवान शोधकार्य किया है, जिसके आधार पर आप कह सकते हैं कि भारतीय भाषा-साहित्य में इसकी एक समृद्ध परंपरा है। संस्कृत और प्राकृत दोनों ही में थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ रामकथा मिलती है। अब तो बोलियों में भी रामकथा उपलब्ध है। कुछ अनुवाद के रूप में तो कुछ मौलिक कथा के रूप में। 

रामकथा की एक समृद्ध वाचिक परंपरा भी रही है। 'कुशीलव' नामक जाति के लोग इस रामकथा का लोक में और राजा के दरबार में वाचन किया करते थे। इसलिए रामायण पहले लोकनाट्य रूप में है। 'कुशीलव' नाटक के सबसे पुराने ज्ञात अभिनेता हैं। कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में 'कुशीलव' शब्द का प्रयोग अभिनेता अर्थ में हुआ है। इस शब्द का प्रयोग मनु ने भी अपनी स्मृति में अभिनेता ही के अर्थ में किया है, जिससे नट, नर्तक आदि का भी अर्थ लगाया जा सकता है। (भगवतशरण उपाध्याय, सांस्कृतिक निबंध, भारतीय ज्ञानपीठ काशी, 1960, पृष्ठ 57) इसी मौखिक परंपरा को आधार बनाकर वाल्मीकि ने रामकथा और रामायण की रचना की। 'अथर्ववेद' में इतिहास-पुराण तथा गाथा और नाराशंसी की चर्चा मिलती है। गाथा-नाराशंसी ऐसे काव्य की अभिधा हैं, जो राजाओं या जनता के मनोरंजन के लिए चारण आदि के द्वारा गाकर प्रस्तुत की जाती थी। इसमें प्रधानतया वीरतापूर्ण कृत्यों का वर्णन होता था। कुछ विद्वानों के मत में इस प्रकार की रचनाएं ही आगे चलकर 'रामायण' और 'महाभारत' के रूप में विकसित और संकलित हुईं। (राधावल्लभ त्रिपाठी, संस्कृत-कवियों के व्यक्तित्व का विकास, संस्कृत परिषद, सागर विश्वविद्यालय, सागर, 1976, पृष्ठ 4)

तुलसीदास ने इस सम्पूर्ण रामकथा साहित्य का गहन अध्ययन किया था, लेकिन उन्होंने अपनी रामकथा का आधार वाल्मीकि की रामायण को बनाया। राम कोई ऐतिहासिक पात्र न होकर काल्पनिक कथा के पात्र हैं। वाल्मीकि, बिमलसूरि, कबीर तथा तुलसीदास-सबके अपने अपने और बहुत कुछ मिलते जुलते राम हैं, लेकिन हैं सब के सब काल्पनिक और मिथकीय। तुलसी के राम बहुत हद तक वाल्मीकि के राम हैं, तो दोनों एक ऐतिहासिक काल में कैसे संभव हैं? कवि से हम इतिहास की मांग ही क्यों करें? साहित्य को साहित्य की तरह पढ़ें। हाँ, हम इतिहास का विवेक जरूर इस्तेमाल करें। इतिहास के सन्दर्भ में मुझे लाला हरदयाल की कही बात हमेशा याद रहती है कि वह हजाम के उस्तरे की तरह है। अगर हजाम सही हुआ तो दाढ़ी बनने के बाद आप सुन्दर लगेंगे अन्यथा उस्तरा आपको घायल कर सकता है। इतिहास एक सही हजाम की मांग करता है।

रमणीय राम

राम और रामा दो शब्द हैं। तैत्तिरीय आरण्यक में एक स्थल पर 'राम' का पुत्र अर्थ में उल्लेख है। सायण ने राम का अर्थ 'रमणीय पुत्र' माना है। रामा शब्द स्त्री के लिए प्रयुक्त है। कालांतर में काली, वेश्या अथवा शूद्र स्त्री को रामा कहा जाने लगा और आर्यों को उनके संसर्ग से रोका गया। रामा का संबंध वर्ण/रंग से जुड़ता दिखता है। राम का वर्ण भी श्याम है। निःसंतान दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया था। यज्ञ के उपरांत राम का जन्म हुआ। वर्ण से काले ही सही, वांछित फल होने से 'रमणीय' हुए।

लोकस्मृति में राम

वाल्मीकि तथा तुलसीदास के राम, वन में जाकर भी लोक साहित्य के राम नहीं हो सके। उड़िया लोक साहित्य के राम घर का काम-काज अपने हाथों से करते हैं। राम हल चलाते हैं, लक्ष्मण जुताई करते हैं और सीता बीज बोती हैं-'चालो चालो बलद न करो भालोनी/आऊरी घड़िए पाईवो मेलानी/खाईवो कंचा घास जे.. . पीईवो ठंडा पानी हो.../बूढ़ा बलद कु जे हलिया मंगु नांई/राम बाँधे हल लईखन देवे माई/आऊरी कि करिवे जे.../सीताया देवे रोई जे...।' (देवेन्द्र सत्यार्थी, बेला फूले आधी रात, नीलकण्ठ प्रकाशन, 1994, पृष्ठ 101)

रामायण का बालकाण्ड रामजन्म, विवाह, यज्ञोपवीत आदि संस्कारों से संबंधित है। इसमें महिलाओं की उपस्थिति एवं भूमिका अनिवार्य होती है। अतः लोक में इन अवसरों पर होनेवाले कृत्यों में महिलाओं को अपनी उपस्थिति दर्ज कराने एवं अपने मनोभाव लोकगीतों के माध्यम से व्यक्त करने का पर्याप्त अवसर मिला है। 

रामायण के उत्तरकांड के सीता-त्याग के विवादास्पद प्रसंग में महिलाएं एक जातीय आत्मीयता के साथ शामिल होती हैं। परंतु राम के साथ आत्मीयता और श्रद्धा रखते हुए भी स्त्रियाँ उन्हें माफ नहीं करतीं और शुद्ध लौकिक स्तर पर राम को सीता के मुंह से 'पापी' और 'निष्ठुर' कहलवा देती हैं। प्राचीन मिथिला के लोकगीतों में राम को स्त्रियों ने पापी तक कहा है। उन्हें पुत्र-जन्म का समाचार तक देने की मनाही है। एक अंगिका सोहर में राम द्वारा जंगल में निर्वासित सीता नाई को बुलवाकर लोचन पहुँचाने के लिए उसे अयोध्या भेजती हैं। कहती हैं, 'पुत्रोत्पत्ति की खबर दशरथ, कौशल्या और लक्ष्मण को देना, लेकिन किसी प्रकार राम इसे जानने न पायें।' 'पहिली लोचन राजा दसरथ, तब कय कोसिलेआ रानी हे। ललना, दोसरी लोचन देवरा लछुमन, राम नहीं जानै हे।।' हजाम अयोध्या पहुँचता है तो उसे सबसे पहले राम ही से भेंट होती है। राम हजाम को विदाई के समय सीता के नाम से एक पत्र लिखकर देते हैं। सीता उस पत्र को पाकर मुस्कराती तो हैं, लेकिन राम को भला-बुरा भी कहती हैं। एक परित्यक्ता का अपने निष्ठुर पति के प्रति ऐसा भाव उचित/ यथार्थ चित्रण है। 'चिठिया लिखिये राम देलन, औरो राम देलन हे। ललना रे, दय दिहें सीता के हाथ, त राम चली आबै हे।। चिठिया में बाँची बाँची सीता, त मन मुसुकाबै हे। ललना रे, कौने कुलबोरना, चिठी लिखल लिखी के पठाबल हे।।'

इन गीतों से रामायण की सीता की बरबस याद आती है। राम जब सीता को वन में साथ चलने की अनुमति नहीं देते तो 'क्षत्राणी' का छिपा तेज लहक उठता है। वे कहती हैं, 'हे राम, यदि मेरे पिता मिथिलापति विदेह यह जानते कि तुम पुरुष के रूप में स्त्री हो, तो वे तुम्हें अपना जामाता कदापि न बनाते।' (किं त्वामन्यत वैदेह: पिता मे मिथिलाधिपः। राम जामातरं प्राप्य स्त्रियं पुरुषविग्रहम्।। 2/30/3; शिवबालक राय, वाल्मीकि रामायण: काव्यानुशीलन, मोतीलाल बनारसीदास, 1988, पृष्ठ 327)  'आह, जनक ने पुरुष वेश में एक स्त्री को (धोखे में) अपना जमाई बना लिया। खेद है, अज्ञानवश लोग झूठा ही कहने लगे कि राम सूर्य के समान तेजस्वी हैं; किंतु, (सच तो यह है) इनमें तेज है ही नहीं--'अनृतं वत लोको$यमज्ञानाद् यदि वक्ष्यति। तेजो नास्ति परं रामे तपतीव दिवाकरे।।' (2/30/34; शिवबालक राय, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 327) इसके विपरीत, तुलसीदास की सीता तस्वीर के बंदर को भी देखकर डर जाती है-"चित्रलिखित कपि देखि डेराती"!

सीता, राम के प्रेम को समझती है, राम की विवशता को भी, अपने मातृत्व के गौरव को भी, पर जनता नहीं समझती। लोकनिंदा भारतीय संस्कृति की अपनी चीज लगती है। राम, स्त्री के विषय में लोक-अपवाद फैलाने में रस लेनेवाले 'लोक' से परिचित हैं। इस कमजोरी का उत्तर देने के लिए वे सीता के बहाने आत्म निर्वासन लेते हैं। इसीलिए उत्तररामचरितम् में वासंती के प्रश्न पर कि सीता का परित्याग क्यों किया, राम कहते हैं-'लोको न मर्षतिति' लोगों को बर्दाश्त नहीं था सीता का साथ। वासंती पुनः पूछती है क्यों? राम कहते हैं 'स एव जानति किमपि' यह एक खीझ है लोक से, यह खीझ तब भी दिखती है जब सीता-निष्कासन के बाद राम राजकार्य से विमुख हो जाते हैं। सूचना मिलती है-प्रजा आपके दर्शन के लिए तरस रही है, राम कहते हैं-'कौन लोग, जो दूसरे का मन नहीं समझते, वे तरसा करें।' यह भी एक खीझ है। (दयानिधि मिश्र (संपादक), लोक और शास्त्र : अन्वय और समन्वय, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ 130-31)

सत्य के आग्रही राम

सत्य के प्रति राम की आस्था लोकविख्यात है। ('सत्य वाक्यो दृढ़व्रतः' 1/1/2; 'रामः सत्पुरुषो लोके सत्य: सत्यपरायण:' 2/2/29; 'महात्मा सत्यसंगर:' 2/106/6; 'रामस्तथा सत्यवृत्ति:' 2/82/6; 'मिथ्या वाक्यं न ते भूतं न भविष्यति राघव' 3/9/4; 'अनृतं नोक्त्तपूर्वं मे' 4/7/22; 'अनृतं न श्रुतं चैव' 3/37/12; 'सत्य धर्माभिरक्त्तानां नास्ति मृत्युकृतं भयम्' 6/46/33; 'रामो द्विर्नाभिभाषते' 2/18/30) जावालि के नास्तिक-मत के खंडन में उनकी उक्ति विख्यात है कि सबों का मूल सत्य है और सत्य के अतिरिक्त कोई परंपद नहीं है। ('सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम्' 2/109) राम कहते हैं, 'मेरे लिए सर्वदा सत्य ही इष्ट है।' ('सत्यमिष्टम् हि मे सदा' 3/11/17, 18) ( शिवबालक राय, वाल्मीकि रामायण : काव्यानुशीलन, मोतीलाल बनारसीदास, 1988, पृष्ठ 300)

तुलसी के राम : सत्ता-प्रसंग

तुलसी के राम को राजतिलक की बात सुनकर विषाद हुआ था कि सब भाइयों को छोड़कर सबसे बड़े भाई अर्थात मुझको ही राजतिलक क्यों होता है? वे विचार करते हैं कि हम सब भाई एक ही साथ जन्मे; खाना, सोना, लड़कपने के खेलकूद, कनछेदन, यज्ञोपवीत और विवाह आदि उत्सव सब साथ-साथ ही हुए-"जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई।। करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा।।" पर इस निर्मल वंश में यही एक अनुचित बात हो रही है कि और सब भाइयों को छोड़कर राज्याभिषेक एक बड़े का ही (मेरा ही) होता है-"बिमल बंस यह अनुचित एकू। बंधु बिहाई बड़ेहि अभिषेकू।।" राजतिलक की बात से रामचन्द्र का मन नये पकड़े हुए हाथी के समान और राजतिलक उस हाथी के बांधने की कांटेदार लोहे की बेड़ी के समान प्रतीत होता है-"नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।" किन्तु 'वन जाना है', यह बात सुनकर, अपने को बंधन से छूटा जानकर, उनके हृदय में आनंद बढ़ गया है-"छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान"।

शादी के समय राम-सीता की उम्र

रामायण (अरण्यकाण्ड 47/10-11) के अनुसार राम एवं सीता की उम्र विवाह के समय क्रम से 13 एवं 6 वर्ष की थीं किन्तु यह श्लोक स्पष्ट क्षेपक है, क्योंकि बालकाण्ड (77/16-17) में ऐसा आया है कि सीता तथा उनकी अन्य बहिनें विवाहोपरांत ही अपने पतियों के साथ संभोग-कार्य में लिप्त हो गयीं। यदि यह ठीक है तो सीता विवाह के समय छः वर्षीय नहीं हो सकतीं। (धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 276) 

सीता-स्वयंवर एवं सीता-हरण

रामकथा में स्वयंवर एवं हरण की कहानी एकसाथ निबद्ध है। यह कथा कम, काव्य अथवा कथा-रूढ़ि ज्यादा है। स्त्रियों की कमी होने से वैदिक समाज गायों और स्त्रियों की चोरी के लिए प्रसिद्ध है। देवियों की तुलना में देवताओं की संख्या अधिक है। कई देवता तो अविवाहित तक रहने को अभिशप्त हैं। सम्भवतः इसीलिए, प्राचीन काल की शायद ही कोई कथा हो जो स्त्री-हरण के बगैर पूर्ण होती हो। दोनों महाकाव्यों में स्त्री-हरण की कथा है। चाहे भीष्म पितामह हों या रावण। प्राचीन भारत में आठ प्रकार के विवाहों में हरण-विवाह भी एक प्रकार है। उस जमाने में वर्ण-संकरता का जो हाहाकार है, उसकी जड़ में आर्य स्त्रियों की कमी भी है। आदमी की कौन पूछे देवता तक श्याम वर्ण के हो रहे हैं।

क्या है रावण के दस सिर की सच्चाई?

रावण शब्द, एक मतानुसार, तमिल के ईरेवन शब्द से बना है जिसका तमिल में तात्पर्य केवल राजा है। (के एन शिवराज पिल्लइ, अगस्त्य इन तमिल लैंड, मद्रास, पृष्ठ 75) जी रामदास ने 'रावण एंड हिज ट्राइब्स' लेख में रावण पर विशेष प्रकाश डाला है। (इंडियन हिस्टॉरिकल क्वार्टरली, 5, 1929) उन्होंने लिखा है कि वाल्मीकि रामायण में रावण के एक सिर तथा दो भुजाओं का ही उल्लेख है। जब-जब व्यक्ति रूप में रावण का चित्रण हुआ है, ऐसा ही रूप मिलता है। राम ने जब रावण का सिर काट दिया (युद्धकाण्ड 107/54) तो 55, 56, 57 में बार-बार वही सिर उगा। (एवमेवशतं छिन्नम् सिरसां तुल्यवर्चसाम्) तब राम परेशान हो गये और 108/18 में राम ने रावण का हृदय भेद दिया। (विभेद हृदयं तस्य रावणस्य दुरात्मनः) इस प्रकार रावण के दस सिर थे यह प्रकट नहीं होता। एक सिर बार-बार उगता है। रावण की स्त्रियां वाल्मीकि रामायण में रावण का एक ही सिर गोदी में रखकर रोती हैं। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एंड संस, 2008, पृष्ठ 197)

जानकी को प्रसन्न करने के लिए, एक स्थल पर वह अपने दसों माथे उनके चरणों पर रखता है। अवमानित होकर वह वचन देता है--'हे मैथिली, यदि तू मुझे नहीं चाहती, तो मैं भी तुझे कभी स्पर्श नहीं करूंगा ('एवं चैवाकामां त्वां न च स्प्रक्ष्यामि मैथिलि।' 4/20/6; शिवबालक राय, वाल्मीकि-रामायण : काव्यानुशीलन, मोतीलाल बनारसीदास, प्रथम संस्करण:1988, प्रस्तावना, पृष्ठ 7)

रामनवमी में रजिंदर पंडित

जब भी रामनवमी आती है तो गांव की स्मृति में चला जाता हूँ। लगभग पूरे गांव के घरों में धाजा  (ध्वजा) गाड़ा जाता। मेरे घर इस तरह का कोई कार्यक्रम नहीं होता। इसलिए मेरे लिए इस दिन के एकमात्र आकर्षण होते राजेन्द्र पंडित। वे जाति से कुम्हार थे, शायद इसलिए, और मुख-सुख के नियम से राजेंद्र से रजिंदर हुए। वैसे, ज्यादातर ओझा हमें तथाकथित निम्न जातियों में ही देखने को मिले। संभवतः इसका कोई समाजशास्त्रीय कारण हो। हाँ, तो प्रत्येक वर्ष इस दिन राजेन्द्र पंडित पर देवता सवार होते। हमलोग उस खेल को 'देवास लगाना' कहते। राजेन्द्र पंडित एक आधी धोती पहने होते और आधी ओढ़े। इस अधोवस्त्र के अलावा उस श्यामल देह पर और कुछ न होता। हाँ, हाथ में बांस की दो-तीन हरी-हरी छड़ी होती जिसे वे कभी अपनी पीठ पर तो कभी मनोकामना पूरी कराने आनेवाले भक्त ऊपर पड़ती। किसी को भूत आदि पकड़ा होता तो उसके इलाज के लिए भी इस छड़ी का प्रयोग होता। किसी देवी-देवता का प्रकोप है अथवा भूत-चुड़ैल का, इस बात का निर्धारण हर बार छड़ी की लंबाई नापकर होता। इस पूरी प्रक्रिया में, आदि से अंत तक घुटर राम की बराबर की भूमिका होती। वे ढोलक बजाने के साथ ही दुभाषिया का भी काम करते। ओझा और भक्त के बीच संवाद का पुल बनते। दर्शक में ज्यादातर निम्न जातियों के लोग होते। अपवादस्वरूप कुछ भूमिहार जाति के भी होते। हम बच्चे इन जातियों से परे होते।

हमलोग बचपन से ही इसे खेल-तमाशा से अधिक न मानते। एक बार राजेन्द्र जी अपने पूरे जोश में थे कि मेरे छोटे भाई रवि कांत ने कहा कि यह सब झूठ-मूठ का नाटक है। इतना सुनना था कि उनका देवता गुस्से में आ गया। उफ-आफ की विचित्र ध्वनि निकालने लगा। कौन है? कौन है? गुस्से में चिल्लाया। लोगों ने जब बताया कि लालबहादुर सिंह का बेटा है तो उनके देवता थोड़े शांत हुए। गांव के सारे लोग जानते थे कि मेरे पिता पर चौबीसों घण्टे देवता सवार होते हैं। 'डायरेक्ट ऐक्शन' में विश्वास रखते थे। उस दिन मुझे अनुभव हुआ कि देवताओं में भी हायरार्की है। बड़े देवता के सामने छोटे देवता का क्रोध भाप बनकर उड़ जाता है!

रामकथा और आम आदमी की लीला

बचपन की बात है। आज से लगभग चालीस साल पहले। बगल के गांव जमालपुर में कुछ सालों तक रामलीला पार्टी आती थी। दस दिनों तक हमलोग चोरी-चोरी राम जी की लीला देखने जाते। रामलीला पार्टी के लोगों के भोजन आदि का प्रबंध माला उठाकर किया जाता। प्रायः प्रत्येक रात्रि को, जब लीला समाप्त होती तो दर्शक-दीर्घा से कोई एक आदमी माला उठाता और उनके नाम की सार्वजनिक घोषणा होती और अगले दिन के भोजन का उन्हें ही प्रबंध करना होता। यह सब होते-होते एक दिन आया जब राम के हाथों रावण का मारा जाना था। रावण का किरदार निभा रहे व्यक्ति ने उस रात कुछ अजीब तमाशा किया। अजीब इसलिए कि रामलीला के स्क्रिप्ट में वह नहीं लिखा था। दरअसल रामलीला पार्टी के मैनेजर के यहां रावण की कई महीनों की पगार बाकी थी। इस समस्या से मुक्ति के लिए उसे एक युक्ति सूझी। उसने मन ही मन तय कर लिया कि आज वह नहीं मरेगा। राम के अनगिनत घातक प्रहारों को झेलकर भी वह अविचल खड़ा रहा। राम परेशान कि इतने ब्रह्मास्त्रों के प्रयोग के बाद भी रावण जीवित क्यों है। राम की परेशानी देख मैनेजर भी मंच पर दौड़ा आया। चुपके से रावण को नोटों की गड्डी थमाई। अब रावण अधमरा होकर लेटे-लेटे पैसे गिन रहा था। पैसे कुछ कम थे। रावण पुनः जीवित हो उठने के लिए मचलने लगा। स्थिति की नजाकत को भांपते हुए मालिक ने किसी तरह कुछ और पैसों का प्रबंध किया। नोटों की गिनती के बाद रावण ने एक लंबी सांस ली। वह अन्तिम सांस थी!

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