Saturday, September 12, 2026

सच्चिदानंद सिन्हा : एक जन्मजात चक्रवर्ती

दसवीं की हिंदी की किताब में जगदीश चंद्र माथुर का एक पाठ पढ़ना होता था। शीर्षक था-'एक जन्मजात चक्रवर्ती'। इस शीर्षक से किसी को एतराज नहीं हो सकता। सच्चिदानंद सिन्हा के पूर्वज के नामों में 'बख्शी' लिखे होने का मतलब है कि वे मुग़लों के बड़े ओहदे वाले मुलाजिम रहते आये थे। वैसे उनका जन्म तो बिहार के आरा के पास मुरार गांव (बक्सर जिला के चौगाई प्रखंड) में हुआ था, किन्तु उनके पूर्वज लखनऊ के आसपास के रहे होंगे। अकारण नहीं है कि मुरार गांव का इनका टोला 'लखनौआ टोला' के नाम से जाना जाता है। कायस्थ तो वे थे ही। अब बख्शी, लखनऊ और बिहार के कायस्थ को मिला दीजिए तो चक्रवर्ती से कम क्या बनेगा भला!

तब कायस्थों की पढ़ाई अरबी-फ़ारसी से शुरू होती और विलायत की बैरिस्टरी पर खत्म होती। डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद हों या प्रेमचंद-सब मकतब और मदरसा के विद्यार्थी थे। हमलोग बचपन में एक कहावत सुनते थे-'पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, देखो रे किस्मत का खेल'! मर्म है कि कहावत बनने से पहले फारसीदाँ ही को नौकरी मिलती थी। अरबी-फ़ारसी-अंग्रेजी से पढ़ाई आरम्भ कर सच्चिदानंद विलायत पढ़ने गये। बैरिस्टरी की पढ़ाई कर चुकने के बाद तक वे अपना नाम अशुद्ध लिखा करते थे। 1890 में उनकी मुलाकात मैक्समूलर से हुई। मैक्समूलर को भारतविद और संस्कृतज्ञ दिखने की इतनी प्रबल चाह थी कि वह 'मोक्षमूलर' कहलवाना ज्यादा पसंद करता था। नाम बदलने की यह प्रवृत्ति यूरोप के कई अन्य विद्वानों में देखी गई है। मुजफ्फरपुर (बिहार) में जन्मे वेद-विद्वान मैकडॉनेल ने अपना संस्कृत नाम 'मुग्धानलाचार्य' रख छोड़ा था। भारतीय विद्वानों ने इन नामों के संस्कृत अनुवाद को लेकर काफी हास-परिहास किया है। महावीरप्रसाद द्विवेदी और चंद्रधर शर्मा गुलेरी तो खूब ही चुटकी लेते हैं! उसी मोक्षमूलर ने सच्चिदानंद को बताया कि आप अपना नाम गलत लिखते हो और शुद्ध रूप से परिचय कराया।

सिन्हा साहब जब विलायत से पढ़कर लौटे तो उनके चचेरे बड़े भाई ने उन्हें इलाहाबाद ठहरकर पाप का प्रायश्चित करने को कहा। तब का यही लोकाचार था। गांधीजी के प्रायश्चित भोज के बारे में हम सब जानते हैं। बिहार में डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के एक रिश्तेदार अभी-अभी पढ़कर लौटे थे। किशोरवयप्राप्त राजेन्द्र ने उस घटना से उत्पन्न विवाद को नजदीक से देखा था। आत्मकथा में लिखा भी है। के. पी. जायसवाल जब विलायत पढ़ने गये थे तो इनकी रसोई का सारा सामान भारत से गया था। अलग से क्या कहना कि इसमें ईंधन का कोयला तक शामिल था। सिन्हा साहब ने इस सामाजिक माहौल में प्रायश्चित करने और भोज करने से बड़े भाई को साफ मना कर दिया। किन्तु वे अपनी ताबीज लाना न भूले थे। तथ्य है कि बालक सच्चिदानंद का जब जन्म हुआ तो उन्हें एक मुसलमान संत के पास ले जाया गया। उस संत ने अपनी मूंछ के बाल उखाड़े और सच्चिदानंद के चाचा को इस हिदायत के साथ दिये कि इसे ताबीज बनाकर वह आजन्म साथ रखे। इस हिदायत का सच्चिदानंद ने आजन्म पालन किया।

1893 में जब वे स्वदेश लौटे तो देखे कि नौकरियों पर बंगाली कुंडली मारे बैठे हैं। महेशनारायण के बड़े भाई गोविंदनारायण बिहार के पहले ग्रेजुएट थे लेकिन बंगालियों के आगे इनकी एक न चल रही थी फलतः बेरोजगार थे। इससे महेशनारायण काफी क्षुब्ध और व्यथित थे। रोजगार एवं अवसर की तलाश की इस 'मध्यवर्गीय लड़ाई' को सच्चिदानंद सिन्हा ने एक व्यापक आधार प्रदान करने हेतु 'बिहारी पहचान' एवं 'बिहारी नवजागरण' की बात 'गढ़ी'। उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा है, 'सिर्फ खुद बिहारियों को छोड़कर बाकी लोगों में बिहार का नाम भी लगभग अनजान था।' आगे उन्होंने लिखा, 'पिछली सदी के 90 के दशक के प्रारंभ में मैं जब एक छात्र के रूप में लंदन में था, तब मुझे जबरन इस ओर ध्यान दिलाया गया। तभी मैंने यह दर्दनाक और शर्मनाक खोज की कि आम बर्ताव के लिए तो बिहार एक अनजान जगह है ही, और यहां तक कि अवकाशप्राप्त आंग्ल-भारतीयों के बहुमत के लिए भी बिहार अनजाना ही है।... मेरे लिए आज के बिहारियों को यह बताना बड़ा कठिन है कि उस वक्त मुझे और कुछ दूसरे उतने ही संवेदनशील बिहारी मित्रों को कितनी शर्मिंदगी और हीनता महसूस हुई जब हमें महसूस हुआ कि हम ऐसे लोग हैं जिनकी अपनी कोई अलग पहचान नहीं है, कोई प्रांत नहीं है जिसको वे अपना होने का दावा करें, दरअसल उनकी कोई स्थानीय वासभूमि नहीं है जिसका कोई नाम हो। यह पीड़ादायक भावना उस वक्त और टीस बन गई जब सन् 1893 में स्वदेश लौटने पर बिहार में प्रवेश करते-करते पहले ही रेलवे स्टेशन पर एक लंबे-तगड़े बिहारी सिपाही के बैज पर 'बंगाल पुलिस' अंकित देखा । घर लौटने की खुशियां गायब हो गईं और मन खट्टा हो गया। ... पर सहसा ख्याल आया कि बिहार को एक अलग और सम्मानजनक इकाई का दर्जा दिलाने के लिए, जिसकी देश के अन्य महत्वपूर्ण प्रांतों की तरह अपनी एक अलग पहचान हो, मैं सब कुछ करने का संकल्प लूं जो करना मेरे बूते में है। एक शब्द में कहूं तो यही मेरे जीवन का मिशन बन गया और इसको हासिल करना मेरे सार्वजनिक क्रियाकलापों की प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत।'

बिहार में बंगाली हितों का प्रवक्ता गुरुप्रसाद सेन का 'बिहार हेरल्ड' (1875) तब मौजूद था। बंगाली हितों के विरुद्ध बिहारी हितों की वकालत करनेवाला भी एक अखबार चाहिए था। अतएव, 1893 में विलायत से पढ़कर लौटे सच्चिदानंद सिन्हा ने पत्र शुरू करने के ख्याल से एक मीटिंग आयोजित की। उक्त मीटिंग में पत्र का नाम 'बिहारी' प्रस्तावित किया गया, किन्तु अंतत: साल भर के अंदर 1894 में 'बिहार टाइम्स' नाम से अंग्रेजी पत्र शुरू किया और 'कायस्थ समाचार' में काम कर रहे महेशनारायण को इसका संपादक बनाया। 1906 ही में इन दोनों ने मिलकर बंगाल से बिहार के पृथक्करण पर एक पुस्तिका जारी की। इसी वर्ष अखबार का पुराना प्रस्तावित नाम 'बिहारी' कर दिया गया किन्तु 1907 में महेश बाबू का निधन हो गया और वे अकेले पड़ गये। बंगाल से बिहार को पृथक किये जाने की इस लड़ाई में उन्होंने कायस्थ बुद्धिजीवियों को एक मंच पर ला दिया। अंग्रेजों के प्रति 'राजभक्ति' और राष्ट्रीय आंदोलन से 'विरक्ति' ने 1912 में बिहार को बंगाल से पृथक होना संभव बनाया।

सच्चिदानंद सिन्हा को किताब पढ़ने और उसे लाल-पीले रंगों में रंगने अर्थात स्केच से 'अंडरलाइन' करने का गहरा शौक था। उनकी इन्हीं किताबों के संग्रह से बाद में प्रसिद्ध सिन्हा लाइब्रेरी की स्थापना हुई। सिन्हा साहब पाठक के साथ-साथ पत्रकार और लेखक भी थे। उन्होंने बिहार और भारत के अपने समकालीनों के ऊपर विद्वतापूर्ण टिप्पणियां की हैं। टिप्पणियां पुस्तकाकार प्रकाशित हैं। अखिल भारतीय स्तर के नेताओं और बुद्धिजीवियों वाली किताब जानकी प्रकाशन, पटना से छपी तो बिहार के समकालीनों के ऊपर लिखी गई जीवनीपरक टिप्पणियां हिमालय प्रेस, पटना के मैनेजर पंडित जयनाथ मिश्र के आग्रह पर 1944 में छपी थीं। कहने की आवश्यकता नहीं कि हिमालय प्रेस बिहार में टेक्स्टबुक लेखन के प्रणेता रामलोचनशरण बिहारी के प्रसिद्ध पुस्तक भण्डार (लहेरियासराय, दरभंगा) का पटना ब्रांच था। इस किताब में बीसियों लोगों की जीवनियों के साथ-साथ लगभग चालीस पृष्ठों की एक लंबी भूमिका भी है जिसमें 1893 से 1912 तक के बंगाल से बिहार के पृथक्करण का जो संघर्ष चला उसका संक्षिप्त किन्तु ऐतिहासिक महत्त्व का विवरण लिखा है। आज किताब का 'ब्लर्ब' या 'आमुख' किसी वरिष्ठ लेखक से लिखाने का चलन है, किन्तु सच्चिदानंद सिन्हा ने अपनी किताब 'सम एमिनेंट बिहार कंटेम्प्रेरीज' का 'आमुख' उम्र में काफी छोटे किन्तु उद्भट विद्वान अमरनाथ झा से लिखवाया था! अमरनाथ झा के बारे में कहा जाता है कि अगर शेक्सपियर का सम्पूर्ण साहित्य भी खो जाय तो उनकी सहायता से एक-एक बात फिर से लिख ली जा सकती है। अमरनाथ झा के पिता सर गंगानाथ झा उनके गहरे मित्र थे और इस किताब में उनकी जीवनी भी संकलित है।

सच्चिदानंद सिन्हा का मानना है कि चूंकि 1894 में 'बिहार टाइम्स' के प्रकाशन से बिहार की पत्रकारिता और पृथक बिहार की मांग शुरू हुई, इसलिए इस वर्ष को बिहार में रेनेसां की शुरुआत का वर्ष माना जा सकता है। अगर अखबार के प्रकाशन से बिहार के रिनेसाँ को जोड़ा जा सकता है तो हिन्दी अखबार 'बिहार बन्धु' को यह श्रेय क्यों नहीं दिया जा सकता जो बंगाल से बिहार को अलग करने के मुद्दे को उठाता रहा था। फिर 'अनीश' और 'कासिद' जैसे उर्दू रिसाले तो बहुत पहले से ये मांग रखते आ रहे थे।

आश्चर्यजनक है कि किताब में महेशनारायण पर एक स्वतंत्र अध्याय है किंतु हिन्दी पत्र 'बिहार बन्धु' से उनके जुड़ाव की कोई चर्चा नहीं है। हो सकता है कि इसका कारण उनका हिंदी विरोधी रुझान रहा हो। सिन्हा साहब हिंदी के हिमायती तो नहीं ही थे, समय-बेसमय वे उस पर व्यंग्य भी किया करते थे। (राधिकारमण स्मृति अंक, नई धारा, पृष्ठ 317) 'बिहार बन्धु' से जुड़े महेशनारायण नाम के एक कवि भी थे जिनकी बिहार बन्धु प्रेस से 'स्वप्न' नाम की मुक्तछंद की लंबी कविता छपी थी। वे खड़ी बोली के बिहार के आरंभिक कवि हैं। सिन्हा साहब द्वारा उनकी इस उपलब्धि की चर्चा न किया जाना मेरे इस संदेह को और गहरा करता रहा है कि 'बिहार टाइम्स' के महेशनारायण और 'बिहार बन्धु' में खड़ी बोली की कविताएं लिखने वाला महेशनारायण अलग-अलग व्यक्तित्व तो नहीं? श्री जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी जी को भी इस बात को लेकर शक हुआ था। किन्तु, श्री रामलोचनशरण बिहारी द्वारा संपादित एवं संवत 1883 वि. में हिन्दी-पुस्तक भंडार, लहेरियासराय से प्रकाशित किताब 'बिहार का साहित्य' (पहला भाग) की पृष्ठ संख्या 6 पर जो संपादकीय टिप्पणी है, उससे स्पष्ट है कि दोनों एक ही आदमी थे।

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