वागर्थ (सितंबर, 2025) पलटना शुरू किया तो संपादकीय लेख पर नजर गयी। शीर्षक है-'हिंदी संस्कृति की जमीन'। पत्रिका के संपादक और इस लेख के लेखक शंभुनाथ हैं। वे भारतीय नवजागरण पर 'साधिकार' विचार करते रहे हैं। पत्रिका में लिखते हैं : "1857 की घटना के बाद अंग्रेजों ने भारत में समाज सुधार को प्रोत्साहन देना बंद कर दिया। विधवा पुनर्विवाह (1856) उनका आखिरी सुधार था। उन्हें भय था कि सामाजिक सुधार से भारत के लोग पुरानी खाइयों से मुक्त हो जाएंगे तो वे एक होकर औपनिवेशिक सत्ता के लिए खतरा बन जाएंगे।" (पृ. 9)
उपर्युक्त पंक्तियों में उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध के भारत की बड़ी सतही समझ है। भारत में अंग्रेज व्यापारिक कंपनी के रूप में आए थे। सामाजिक चेतना में ये इंग्लैंड के सबसे पिछड़े तबके के प्रतिनिधि थे, इसलिए हमें इस भ्रम से मुक्त रहना होगा कि इनके द्वारा भारत में किये जा रहे परिवर्तन समाज-सुधार की उदात्त भावना से प्रेरित थे। दरअसल, उनके परिवर्तन बाजार-निर्माण से प्रेरित थे। अठारहवीं-उन्नीसवीं शती का भारत अंग्रेजी माल का बेहतर उपभोक्ता नहीं था। एक जड़ समाज बेहतर उपभोक्ता हो भी नहीं सकता। जिस उन्नीसवीं शती के नवजागरण/हिंदी नवजागरण की हम बात करते हैं, किसी भी हिंदी पत्र के ग्राहक सौ की संख्या तक नहीं पहुंच पाये। पत्र की बिक्री सरकारी खरीद और संपादकों की इस गारंटी पर निर्भर थी कि वे घर-घर जाकर पत्र बांच आया करेंगे। एक उन्मुक्त या उदार समाज ही बाजार की वकालत कर सकता है। जातियों में बंटे समाज का व्यक्ति अव्वल तो बाजार/शहर से दूर ही रहता है, अगर किसी मुसीबत में आ भी गया तो अपना सत्तू लेकर आता है, ताकि बाजार की चीज खाकर उसे जाति-धर्म गँवाने की नौबत न आये। आरम्भ ही से हिन्दू धर्म बाजार विरोधी रहा है। इतिहास में झांकें तो प्राचीन भारत में बौद्ध धर्म का उद्भव और विकास बाजार के लिए समाज को खोलने का संघर्ष है। अकारण नहीं है कि बुद्ध, अम्बपाली (आज की भाषा में बाजारू स्त्री) का आतिथ्य स्वीकार करते हैं। इतना ही नहीं, बुद्ध शहरों की यात्रा करते हैं और नोट करने लायक बात है कि किसी शहर ही में उन्होंने अपनी मृत्यु की कल्पना/इच्छा की थी। अंग्रेज भी इसी बाजार के घोड़े पर सवार थे। यह अर्थहीन बात है कि उनके समाज-सुधार से भारतीय समाज की खाइयां कम हो रही थीं। इस तथाकथित सुधार ने जिस शिक्षित वर्ग/समाज का निर्माण किया था, वह अंग्रेजी राज का समर्थक था। बंगाल का मध्यवर्ग 1857 में अंग्रेजों के पक्ष में तो था ही, हिंदी का लेखक भी महारानी की प्रशस्ति और 'शोक-प्रकाश' लिख रहा था।
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