तीन टिकट, महा विकट
भारतीय संस्कृति में तीन की संख्या को अमंगलसूचक माना गया है। एक लोकप्रचलित कहावत भी है-'तीन टिकट, महा विकट'। इस तीन की विकटता आज नई नहीं है। प्राचीन ज़माने में तो तीसरी शादी तक को अमंगलसूचक ठहराया गया है। इसीलिए तीसरा विवाह करनेवाले पुरुष के लिए पहले मदार से विवाह करने का विधान किया गया है, ताकि तीसरी पत्नी चौथी हो जाए। 'चतुर्थादि-विवाहार्थं तृतीये$र्कम् समद्वहेत् (आप्टे, संस्कृत हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 110) राजा दशरथ की तीन रानियां थीं। तीसरी से पहले दशरथ की मदार से शादी हुई थी अथवा नहीं, नहीं मालूम लेकिन उनके जीवन में बड़ा ही अमंगल रहा। आज के 'दशरथ' सबक लें तो भला हो।
किन्तु तीन की संख्या को अमंगलसूचक मानने की परंपरा की शुरुआत अवैदिक लगती है क्योंकि वेद तीन हैं और 'वेदत्रयी' कहलाते हैं। वैदिक साहित्य में अग्नि के तीन जन्म, तीन सिर, तीन शरीर एवं स्थान हैं। अतः यह भारतीय त्रयी का प्राचीनतम रूप है। (देवराज चानना (संपादक), ऋग्भाष्यसंग्रह:, मुंशी मनोहरलाल, पृष्ठ 291) अग्नि एक दिन में तीन बार खाता है। (वही, पृष्ठ 292)
वैदिक देवता अश्विनीकुमार का तीन की संख्या से खास सम्बन्ध है। ऋग्वेद के प्रथम मंडल, सूक्त 34, मन्त्र 1-9 में अश्विनीकुमार को तीन के साथ संबद्ध दिखाया गया है। उनसे तीन बार (प्रातः, मध्यान्ह, सायं) आने की प्रार्थना की गई है। अश्विनीकुमार के रथ में तीन पहिये लगे हैं। रथ में अवलम्बन के लिये तीन खम्भे लगे हैं। वे उस रथ से तीन बार रात्रि में और तीन बार दिन में गमन करते हैं। उनसे यह भी प्रार्थना है कि वे यज्ञ में दिन में तीन बार मधुर रसों से सिंचन करें तथा प्रातः, मध्यान्ह एवं सायं तीन प्रकार के पुष्टिवर्धक अन्न प्रदान करें, अनुयायी जनों को तीन बार सुरक्षित करें, उन्हें तीन बार तीन विशिष्ट ज्ञान कराएं। सुखप्रद पदार्थों को तीन बार हमारी ओर पहुंचायें। यह भी कि हमारी बुद्धि को तीन बार देवों की स्तुति में प्रेरित करें, तीन बार सौभाग्य और तीन बार यश प्रदान करें। अश्विनीकुमार को स्मरण कराया गया कि उन्होंने तीन बार दिव्य औषधियां, तीन बार पार्थिव औषधियां तथा तीन बार जल औषधियां प्रदान की हैं। तीन धातुओं (वात, पित्त, कफ) से मिलनेवाला सुख, आरोग्य एवं ऐश्वर्य भी प्रदान किया है। अश्विनीकुमार तीन बार यजन करने योग्य हैं, अतः उनसे यज्ञों में तीन बार आने और तीन ओर आसनों पर बैठने का आग्रह है। उनके निमित्त जलों से तीन बार तीन पात्र भर दिये गये हैं, हवियों को भी तीन भागों में विभाजित किया गया है। अश्विनीकुमार तीनों लोकों की रक्षा करते हैं। इसलिए 'हे अश्विनीकुमारो! आपके तीन छोरवाले रथ के तीन चक्र और एक ही आधार पर स्थापित होनेवाले तीन स्तम्भ कहाँ हैं?'
अष्टादश पुराणेषु...
यद्यपि सम संख्या को अशुभ माना गया है, किंतु अठारह की संज्ञा/संख्या भारतीय साहित्य-संस्कृति में काफी लोकप्रिय है। पुराण अठारह हैं, स्मृतियां अठारह हैं, महाभारत में अठारह पर्व हैं, और गीता में अठारह अध्याय हैं। महाभारत की लड़ाई भी अठारह दिनों तक अठारह अक्षोहिणियों के बीच चली। ब्राह्मणों के गोत्र भी अठारह ही कहे जाते हैं। (डी डी कोसांबी, मिथक और यथार्थ, पृष्ठ 20)। 'ईश उपनिषद भी अठारह पद्यों का एक छोटा-सा संग्रह है।' (राहुल सांकृत्यायन, दर्शन दिग्दर्शन, पृष्ठ 391) ज्योतिष के प्रवर्तक अठारह आचार्य हैं। अन्य विषयों के भी अठारह आचार्यों का उल्लेख मिल जाया करता है। राजशेखर ने 'काव्य-मीमांसा' के आरंभ में काव्य-विद्या के अठारह अंग और उसके अठारह आचार्य बताये हैं। राजशेखर ने इस वृहद ग्रंथ को अठारह अध्यायों में पूरा किया था। एकमात्र उपलब्ध प्रथम खंड 'कविरहस्य' के भी अठारह अध्याय ही कहे जाते हैं। (हजारीप्रसाद द्विवेदी, मध्यकालीन बोध का स्वरूप, पंजाब यूनिवर्सिटी, मार्च 1970, पृष्ठ 89) कभी-कभी जातियों और प्रकृतियों की संख्या भी 18 बतलाई जाती है। विद्याओं की संख्या भी अठारह मानी जाती है। महाकवि श्रीहर्ष ने राजा नल के बारे में लिखा है कि इन्होंने अठारह विद्याओं का अध्ययन किया था। (डॉक्टर कृष्णदेव उपाध्याय, भारतीय लोक-विश्वास, हिन्दुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद, 1991, पृष्ठ 239)
इस तरह 18 एक पारंपरिक पद है जिसका प्रयोग कई संदर्भों में होता है। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, पृष्ठ 33)
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