दुनिया की हरेक भाषा में देश, काल और परिस्थिति के हिसाब से शब्द के अर्थ बदलते रहे हैं। कहना न होगा कि धर्म शब्द भी अपना अर्थ बदलता रहा है। यह शब्द 'धृ' धातु से बना है जिसका तात्पर्य है धारण करना, आलंबन देना, पालन करना आदि। यात्रा की अपनी आरंभिक अवस्था में वस्तु की प्रकृति धर्म है। इस धर्म को कहीं-कहीं ऋत शब्द से भी द्योतित करने की कोशिश की गई है। इस समय प्रकृति और मानव समाज की अत्यंत सहज और बालसुलभ समझ थी। इस दृष्टिकोण के हिसाब से विश्व की वह हर वस्तु जो प्रकृति के अनुसार कार्य करती है, ऋत कहलाती है। यह प्रकृति यानी ऋत ही थी कि सूर्य प्रातःकाल उदित होता है और सायंकाल अस्त हो जाता है। इसी के साथ ऋत एक ऐसी सत्ता भी थी जो सूर्य को अविचलित भाव से उसके निर्धारित क्रम से संचालित रखती थी। यदि सूर्य अपने मार्ग से विचलित होता तो ऋत का देवता वरुण उसे दंडित कर सकता था। यही बात समस्त मानवीय क्रियाकलाप पर भी लागू होती थी। यह धर्म की ऋग्वैदिक/पूर्ववैदिक पृष्ठभूमि थी।
ऋग्वेद (5/76/2) में संस्कृत शब्द 'धर्म' बरतन के लिए प्रयुक्त हुआ है। (धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 176) अथर्ववेद में धर्म शब्द का प्रयोग 'धार्मिक क्रिया संस्कार करने से अर्जित गुण' के अर्थ में हुआ है। ऐतरेय ब्राह्मण में धर्म शब्द सकल धार्मिक कर्तव्यों के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। छान्दोग्य उपनिषद में धर्म का एक महत्त्वपूर्ण अर्थ मिलता है जिसके अनुसार धर्म की धर्म की तीन शाखाएँ मानी गई हैं-(1) यज्ञ, अध्ययन एवं दान अर्थात गृहस्थधर्म (2) तपस्या अर्थात तापस धर्म तथा (3) ब्रह्मचारित्व अर्थात आचार्य के गृह में अंत तक रहना। यहां से धर्म आश्रम धर्मों/कर्तव्यों की ओर संकेत करता हुआ विशिष्ट अर्थ ग्रहण करना शुरू करता है। यहां आकर धर्म मानव के विशेषाधिकारों, कर्तव्यों, बंधनों, वर्णाश्रम तथा वर्ण की योग्यता/अयोग्यता में परिणत हो गया। तैत्तिरीयोपनिषद में छात्रों को 'सत्यं वद' और 'धर्मं चर' का जो पाठ पढ़ाया जा रहा है, इसी वर्णाश्रम धर्म की बात करता है। भगवद्गीता के 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः' में धर्म और कुछ नहीं, वर्णधर्म है।
यह 'धर्म' से 'स्वधर्म' तक की यात्रा है। 'स्वधर्म' की रक्षा की भावना का विकास राजसत्ता के लिए बड़ी ही उपयोगी है। कहा भी गया है कि राजधर्म सर्वोपरि है। राजधर्म वर्णाश्रम धर्म के अनुपालन को सुनिश्चित करना है। गीता में 'स्वधर्म' का पालन न होने से उत्पन्न परिस्थितियों का बड़ा ही भयावह चित्र खींचा गया है। कहा गया है कि 'जब अधर्म फैल जाता है तब परिवारों की स्त्रियां भ्रष्ट हो जाती हैं। और जब स्त्रियां भ्रष्ट हो जाती हैं तब वर्णसंकर पैदा होता है अर्थात विभिन्न जातियों का मिश्रण हो जाता है।' कहने की जरूरत नहीं कि सामाजिक व्यवस्था सामान्यतया सत्ता के प्रति आज्ञापालन पर निर्भर रहती है। तभी सुकरात ने भी क्रिटो से कहा था कि 'वह एथेंस के उन कानूनों को नहीं तोड़ेगा जिन्होंने उसका पालन-पोषण किया है, उसकी रक्षा की है और सदा उसका ध्यान रखा है।'
प्रसंगवश, महाभारत के शांतिपर्व में उल्लिखित एक तथ्योद्घाटक अनुच्छेद का उल्लेख मात्र करूँगा। इस अनुच्छेद में ब्राह्मणों और क्षत्रियों में संबद्धता और एकता पर बल देने की बात करते हुए शिकायत की गई है कि शूद्रों और वैश्यों ने एक स्तर पर, स्वेच्छा से ब्राह्मणों की पत्नियों के साथ अपने संबंध स्थापित करना आरंभ कर दिया है। अतः इससे जान पड़ता है कि उनकी (शूद्रों की) स्थिति कीड़ों-मकोड़ों जैसी होने के बावजूद (जघन्य अपराध के होते हुए) उन्होंने ब्राह्मणों की पावन ‘संपदा’ ब्राह्मण पत्नियों को अपने वश में कर लिया था।
'वर्णधर्म' अथवा 'स्वधर्म' का पालन मनुष्य का सर्वोत्तम कर्त्तव्य माना गया है। वर्णधर्म पालन से मुकर जाना अधर्म है। शम्बूक वध की कथा हम सब जानते हैं। यह कथा रामायण में बड़े विस्तार से कही गई है। कुछ सौम्य रूप देकर भवभूति ने इस प्रसंग को उत्तररामचरित में भी ले लिया है. बेचारा शम्बूक मर्यादापुरुषोत्तम राम के हाथों सिर्फ इसलिए मारा गया कि उसने भगवान को याद किया था। शम्बूक का वध करना राजा राम का राजधर्म था। यह वह समय था जब शूद्रों को वेदपाठ तक करने से रोक दिया गया था। पढ़ना तो दूर अगर भूल कर भी शूद्र वेद सुन लें तो उसके कानों शीशा पिघला कर डाल देने का सख्त से सख्त प्रावधान था। ऐसा था हमारा प्रगतिशील हिंदू धर्म, जिसमें अपने ही धर्मावलंबियों को अपना धर्मशास्त्र पढ़ने का अधिकार नही था। शूद्रों के लिए धर्म के सारे रास्ते बंद थे किन्तु सत्ता के नियामक ब्राह्मणों की तो बात निराली थी। वे तो धर्म का निर्माण करने वाले थे। जरूरत पड़ने पर वे धर्म को ठेंगा भी दिखा सकते थे, उसमें आवश्यक संशोधन करने में समर्थ थे। मनुस्मृति में लिखा है- “आपत्तिकाल में ब्राह्मण गर्हित जनों को, जिन्हें वेद पढ़ने का अधिकार नहीं हैं, उन्हें पढ़ाएं, उनसे यज्ञ कराएं और दान लें तो उन्हें (ब्राह्मणों को) दोष नहीं है क्योंकि वे जल और अग्नि के समान पवित्र हैं।”
बेचारा शंबूक मर्यादा पुरुषोत्तम राम के हाथों सिर्फ इसलिए मारा गया कि उसने भगवान को याद किया था। परन्तु ऐसी घटना बुद्ध से पहले या बौद्ध धर्म के हिंदुस्तान में रहते हुए कभी घटी हो, इसका प्रमाण कहीं भी नही मिलता। इस कहानी के रचयिता का हेतु केवल यही दिखाना होगा कि राजा को ऐसा बर्ताव करना चाहिए। इसकी ऐतिहासिकता चाहे जो रही हो, शम्बूक का अपराध था कि उसने मुक्ति के लिए भक्ति का मार्ग पकड़ना चाहा था जबकि शूद्र वर्ण की मुक्ति तीन उच्च वर्णों की सेवा से ही सम्भव है।
हिन्दू धर्मग्रंथों की तरह प्राचीन बौद्ध धर्म में समता के सिद्धांत का आलंबन रहने पर भी अभिजात तंत्र की ओर विशेष झुकाव था। बौद्धों ने वर्ण व्यवस्था के आधारभूत तथ्यों का शायद ही कभी खुलकर विरोध किया, जिसके अनुसार शूद्रों को सेवि वर्ग के अंतर्गत रखा गया था। ब्राह्मणों का यह दावा था कि वे अन्य तीन वर्णों से श्रेष्ठ हैं, किंतु गौतम बुद्ध ने इसका खंडन करते हुए बताया कि जहाँ तक उद्गम का प्रश्न है, क्षत्रिय उच्च हैं और ब्राह्मण निम्न। पर ये वैश्यों या शूद्रों की अपेक्षा न तो ब्राह्मणों और न क्षत्रियों की ही श्रेष्ठता पर आपत्ति करते हैं। बौद्ध धर्म केवल यह बताने का प्रयास करता है कि मुक्ति की खोज में जाति का कोई महत्त्व नहीं।
ईसाई धर्म की ही तरह बौद्ध धर्म ने भी दासता की बुनियाद पर कभी कोई आघात नहीं किया। उन्होंने शूद्रों की आर्थिक एवं राजनैतिक अशक्तताओं को भी दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया। उलटे बौद्ध संघ का दरवाजा गुलामों और कर्जखोरों के लिए बंद था, और बौद्ध धर्म कर्ज की अदायगी पर जोर देता था। ध्यान देने की बात है कि बुद्ध ने समाज की व्यवस्था के उल्लंघन का कभी समर्थन नहीं किया और उन्होंने भागे हुए दासों को अपने धर्म में दीक्षित करने से इनकार कर दिया। बौद्ध धर्म के प्रचलित नियमों के अनुसार कोई भिक्षु सम्बद्ध साहूकार की अनुमति के बिना किसी कर्जदार/दास को दीक्षित करता है तो वह (धर्म के विरुद्ध आचरण का) अपराधी है।
धम्म अट्ठकथा में एक जगह वर्णन है, "एक दासी अपनी रोटी बुद्ध को भेंट करके अपने आप से कहती है कि बुद्ध ने इसे सौजन्य से स्वीकार किया है और थोड़ा-सा आगे जाकर वे इसे किसी कौवे या कुत्ते को डाल देंगे।"
भारतीय समाज राजसत्ता की असहिष्णुता से लड़ने की अपनी तरकीब विकसित करता रहा है। धर्मांतरण को इसी प्रकाश में देखे जाने की जरूरत है। इतिहासकार रामशरण शर्मा ने लिखा है, 'विचार करने की बात है कि भारत में धर्म के रूप में इस्लाम केवल उन क्षेत्रों में ही पैर जमा सका जो बौद्ध धर्म के मजबूत गढ़ थे. यह बात कश्मीर, उत्तर-पश्चिमी सीमांत क्षेत्र, पंजाब और सिंध के बारे में सच लगाती है. उसी तरह नालंदा (बिहार शरीफ़), भागलपुर (चम्पानगर) और बंगलादेश में, जहाँ बौद्ध काफी संख्या में रहते थे, मुस्लिम आबादी है.' (रामशरण शर्मा, सांप्रदायिक इतिहास और राम की अयोध्या, पृष्ठ 13) स्पष्ट है कि कुछ सालों पहले देश की राजधानी दिल्ली में जो व्यापक धर्मांतरण हुआ वह हमारे इतिहास की पहली अप्रत्याशित घटना नहीं है बल्कि कहिए कि अम्बेदकर के बाद पहली बार इसने हिन्दुत्व की रीढ़ सीधी की। धर्मांतरण की इस घटना से सहिष्णु होने का हमारा दंभ भाप बनकर उड़ गया। धर्मांतरण को शोषित जनता ने पहली बार बौद्ध-काल में अपना हथियार बनाया। तब से आज तक उसकी एक जीवित परंपरा है।
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