1930 में हजारीबाग जेल में समय काटने के लिए कैदियों द्वारा एक हस्तलिखित मासिक पत्र निकाला गया था, जिसका नाम ‘कारागार’ था। इसके चित्रकार गिद्धौर के राजकुमार कालिकाप्रसाद सिंह थे और व्यवस्थापक मुजफ्फरपुर के मथुराप्रसाद सिंह थे। संपादन का काम भवानीदयाल संन्यासी को सौंपा गया था। इसके प्रत्येक अंक में डा. राजेन्द्र प्रसाद का एक लेख अवश्य निकलता था। 'कारागार' के अनेक विशेषांक यथा 'कृष्णांक', 'दीपावली-अंक', 'सत्याग्रह-अंक' आदि निकले। 'सत्याग्रह-अंक' में तो बिहार के सत्याग्रह का पूरा इतिहास ही आ गया था। इसमें प्रान्त के प्रत्येक जिले के नेताओं ने अपने जिले के सत्याग्रह-संग्राम का सविस्तार वर्णन किया था। (स्वामी भवानीदयाल संन्यासी, ‘बिहार की विभूति’, श्रीराजेन्द्र अभिनन्दन ग्रन्थ, पृष्ठ 51)
मानिकपुर (गोपालगंज) ग्राम के वासी महेन्द्र सिंह (जन्म : 1886 ई.) को 'पाँच विकट यात्राएँ' (वाणी मंदिर छपरा से 1940 में प्रकाशित) एवं 'मानसरोवर की झाँकी' (उपर्युक्त प्रेस से प्रकाशित) का लेखक बताया जाता है। युद्ध के कारण आपकी ये दोनों पुस्तकें बिहार सरकार द्वारा जब्त कर ली गई थीं। (हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खण्ड, पृष्ठ 724, पादटिप्पणी संख्या 2) सन 1930 ईस्वी में आपको हजारीबाग सेंट्रल जेल में रखा गया था जहाँ आपने निम्नलिखित भजन की रचना की थी :
"दीन दयालु दया करिके, भवसागर से करु पार मुझे।
ममझधार पड़ी प्रभु नाव मेरी, कहुँ सूझत नाहिं अधार मुझे।।
परिवार भरा अति भार प्रभो, अरुझावत विविध प्रकार मुझे।
निरधार भयो पतवार बिना, अब डोलत नाथ उबार मुझे।।" (वही, पृष्ठ 724)
‘युवक’ का ‘विप्लव’ अंक बेनीपुरी डिस्पैच भी नहीं कर पाये थे कि नमक कानून तोड़ने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिये गये। उन्हें पटना कैम्प जेल में रखा गया। कुछ ही दिनों में उन्हें ‘बी’ क्लास देकर हजारीबाग सेंट्रल जेल भेज दिया गया। हजारीबाग जेल से ही इन्होंने 'कैदी' (1930 ई.) तथा 'तूफान' (1942) जैसी हस्तलिखित पत्रिकाओं का भी संपादन किया। (रामवृक्ष बेनीपुरी ग्रंथावली, भाग 1, बेनीपुरी प्रकाशन, पटना) राजेन्द्र बाबू ने ‘कैदी’ के लिए ‘प्रजा का हित’ लेख लिखा। यहीं पर बेनीपुरी ने 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो' का हिन्दी अनुवाद किया और अपनी पहली मार्मिक कहानी ‘कहीं धूप, कहीं छाया’ लिखी। इसी जेल की दीवारों के बीच बेनीपुरी ने ‘चन्द्रगुप्त’ जैसा देशभक्तिपूर्ण नाटक लिखा और जिसे कैम्प जेल के राजबन्दियों ने बड़ी लगन से मंच पर प्रस्तुत किया। (रामवृक्ष बेनीपुरी : रचना संचयन, पृष्ठ 17)
1937 में यूनुस के शपथग्रहण के विरोध में बेनीपुरी और जयप्रकाश नारायण ने पटना में जुलूस और हड़ताल की घोषणा की थी। व्यापक जनसमर्थन के बीच दोनों ही गिरफ्तार कर हजारीबाग सेण्ट्रल जेल भेज दिये गये। इस जेल-प्रवास के दौरान बेनीपुरी के पुत्र 'गांधी' का निधन हो गया। मर्माहत कलाकार ने ‘गांधीनामा’ व्यथा-कथा का सृजन कर डाला। उन्होंने कहा कि ‘कलम केवल प्रहार ही नहीं करती, वह ढाल भी बनती है’। (रामवृक्ष बेनीपुरी, मुझे याद है, पृष्ठ 155)
हजारीबाग जेल के लंबे प्रवास ने बेनीपुरी की रचना को भोथरा करने की बजाय धारदार बनाया। जेल की आम्रतरु की छाया में बेनीपुरी ने हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ नाटकों में एक ‘अम्बपाली’ की रचना की। यहीं ‘माटी की मूरतें’ जैसा भारतीय भाषाओं का अनूठा रेखाचित्र रचा। (मस्तराम कपूर, रामवृक्ष बेनीपुरी : रचना संचयन, साहित्य अकादमी, पृष्ठ 23) 'हजारीबाग सेंट्रल जेल के एकांत जीवन में अचानक मेरे गांव और मेरे ननिहाल के कुछ ऐसे लोगों की मूरतें मेरी आंखों के सामने आकर नाचने और मेरी कलम से चित्रण की याचना करने लगीं। उसकी इस याचना में कुछ ऐसा जोर था कि अंततः ये "माटी की मूरतें" तैयार होकर रहीं।' (रामवृक्ष बेनीपुरी ग्रंथावली, खंड 1, बेनीपुरी प्रकाशन, पटना, पृष्ठ 11) जेल के एकांत ने बेनीपुरी के सोये कवि को जगा दिया। कहने की आवश्यकता नहीं कि अपने आरंभिक साहित्यिक जीवन में बेनीपुरी कवि रहे थे। अतः अपने रवीन्द्रनाथ की सौ श्रेष्ठ कविताओं का अनुवाद किया। शेली, कीट्स और बायरन की श्रेष्ठ कविताओं के अनुवाद का नाम रखा ‘टूलिप्स’ और खुद की लिखी कविताओं का नाम ‘नया आदमी’ रखा। (बेनीपुरी ग्रन्थावली भाग-1, संकलित पृष्ठ 399-475; रामवृक्ष बेनीपुरी : रचना संचयन, पृष्ठ 25)
1940 ईस्वी में राहुल सांकृत्यायन अखिल भारतीय किसान सभा के पलासा (आंध्र प्रदेश) अधिवेशन के सभापति चुने गये थे। इलाहाबाद में अपने पुराने मित्र डा. उदय नारायण तिवारी के घर पर बैठकर वे अपना सभापति का भाषण लिख रहे थे कि तभी भारत सुरक्षा कानून में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। (राहुल सांकृत्यायन, ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ पुस्तक में महादेव साहा की ‘भूमिका’, लोकभारती प्रकाशन, 2014) वहाँ से उन्हें हजारीबाग जेल में पहुंचाया गया। उन्हें लगा कि वर्षों जेल में रहना पड़ेगा। उन्हें एहसास था कि मार्क्सवादी दृष्टिकोण से लिखी विज्ञान, समाजशास्त्र, दर्शन, भौतिकवाद आदि की पुस्तकों की बड़ी कमी है। अतः पुस्तक लिखने के लिए उन्होंने सामग्री एकत्र करना शुरू कर दिया। पहले एक ही बड़ी पुस्तक में उपर्युक्त सारे विषयों को समाहित करने की योजना थी। (वही) हजारीबाग जेल से राहुल का तबादला (21/7/41) देवली कैम्प (अस्थायी) जेल में कर दिया गया। यहां बम्बई, पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा बिहार से आये हुए राजनीतिक बंदियों में अधिकतर कम्युनिस्ट थे और सब के पास कुछ न कुछ किताबें थीं। इन किताबों का अध्ययन करने के बाद हजारीबाग जेल में लिखे सौ पृष्ठों को बेकार समझ ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ पर साइंस से लिखाई शुरू की और एक पुस्तक की जगह चार पुस्तकें लिखीं-‘विश्व की रूपरेखा’ (साइंस), ‘मानव-समाज’ (समाजशास्त्र), ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ (दर्शन) और ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’। (राहुल सांकृत्यायन, ‘प्राक्कथन’, वैज्ञानिक भौतिकवाद, 2014) कुछ पुस्तकें लिख लेने के बाद राहुल का तबादला फिर हजारीबाग जेल में कर दिया गया। यहीं दो हफ्तों में उन्होंने ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ का लिखना समाप्त किया। इसके बाद उन्होंने भोजपुरी में ‘ई हमार लड़ाई’, ‘जपनिया राछछ’, ‘जरमनवा के हार निहिचय’, ‘ढुनमुन नेता’, ‘नइको दुनिया’, ‘मेहरारुन के दुरदशा’ आदि छोटे-छोटे आठ नाटक लिखे। (महादेव साहा, पूर्वोद्धृत)
1940 के सत्याग्रह के दौरान दिसंबर माह में अनुग्रह नारायण सिंह को भी हजारीबाग जेल की यात्रा करनी पड़ी। सत्याग्रही की हैसियत से लक्ष्मी नारायण सुधांशु भी वहां पहुंच चुके थे। सुधांशु जी ने अनुग्रह नारायण सिंह को जेल में किताब लिखने की प्रेरणा दी। 'बचनबद्ध' अनुग्रह बाबू ने काफी सोच-विचार के बाद संस्मरण लिखना ही मुनासिब समझा। आधुनिक बिहार के पुनर्गठन में अनुग्रह बाबू की सक्रिय भूमिका रही थी, इसलिए 1912 के बाद के बिहार के इतिहास से वे भली भांति परिचित थे। और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि जेल में किताबों के अभाव के बीच स्मृति के आधार पर संस्मरण लिखना ही श्रेयस्कर था। इस तरह हजारीबाग जेल में अन्य कई किताबों के बीच 'मेरे संस्मरण' की पांडुलिपि तैयार हुई और आधुनिक बिहार का एक जीवंत दस्तावेज तैयार हुआ।
1942 की क्रांति के दिनों में जयप्रकाश नारायण के साथ हजारीबाग जेल में बाबू वीर कुंअर सिंह के वंशज एवं स्वतंत्रता सेनानी दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह भी बंदी थे। रामवृक्ष बेनीपुरी ने जेपी को बताया कि दुर्गा बाबू को लोकसाहित्य का गहरा अध्ययन है। लोकनायक का लोकसाहित्य से जुड़ाव के बारे में क्या कहना! दुर्गा बाबू ने जेल से प्राप्त डायरी पर रोजनामचा लिखना शुरू किया। जेल से निकलने के बाद हिमालय प्रेस ने इसे 'फरार की डायरी' के नाम से प्रकाशित किया। कहने की आवश्यकता नहीं कि इसमें जेपी के जेल से फरार होने की कथा भी दर्ज है।
जब देश में सन 42 की क्रांति ठंडी पड़ गई और कार्यकर्ता निराश और हताश थे, रामनंदन मिश्र ने हजारीबाग जेल की दीवारों के बीच 'क्रांति कैसे हो' किताब लिखी। इसके अंग्रेजी और बंगला संस्करण को बंगाल सरकार ने जब्त कर लिया था। ('दो शब्द', क्रांति कैसे हो, श्री सुदर्शन प्रेस, दरभंगा)