रामविलास शर्मा मेरे सर्वप्रिय आलोचक रहे हैं, लेकिन उन पर आज तक नहीं लिख पाया। वे पढ़ने से फुर्सत ही नहीं लेने देते कि लिखूं। सोचता हूँ कितना मुश्किल है अपने प्रिय आलोचक पर लिखना।
पाठकों का एक बड़ा वर्ग है जिसने रामविलास शर्मा से मार्क्सवाद की ट्रेनिंग ली है। राहुल सांकृत्यायन के बाद वही हैं जिन्होंने भारत में मार्क्सवाद का इतने बड़े पैमाने पर प्रचार किया। पाठक बनाना एक बड़ा काम है। नंदकिशोर नवल, रामविलास जी को नये लोगों के लिए 'मदनानंद मोदक' कहते थे। और बात है कि नवल जी कुछ कम मोदक नहीं खाये!
रामविलास जी के अध्ययन और लेखन का क्षेत्र काफी व्यापक रहा है। उनकी इस व्यापकता से कई लोग चिढ जाते थे। एक बार मैंने रामशरण शर्मा के सामने रामविलास जी की इतिहास संबंधी स्थापनाओं को रखने की कोशिश की तो वे बिदक गये। बोले- 'उनकी बात रहने दीजिए, वे तो फिजिक्स पर भी लिख सकते हैं।' मैंने कहा कि मार्क्स भी तो तमाम चीजों पर लिखते थे! वे गुम लगा गए। रामविलास जी को इस व्यापकता की वजह से पढ़ना और पचाना-दोनों कठिन है। उन पर लिखना तो और भी। इस कठिनाई को मैंने महसूस किया है। शायद इसीलिए अपने प्रिय आलोचक पर अब तक एक लेख तक न लिख पाया।
1857 के सिलसिले में मैंने उन्हें एक पत्र लिखा था। जवाब में उनका एक पोस्टकार्ड आया था। मुझसे वह पत्र खो गया। वे छोटे-बड़े सबको पत्र लिखते थे, ऐसा मै अपने अनुभव से कह सकता हूँ। दुखद कि उनका इकलौता पत्र भी मैं संभाल न सका।
डॉक्टर रामविलास शर्मा ने साहित्य, इतिहास, दर्शन और भाषा विज्ञान में काफी गंभीर काम किया है। 'भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद' (दो खंडों में) से लेकर 'मार्क्स और पिछड़े हुए समाज' तक में भारतीय और यूरोपीय इतिहास के विभिन्न कालखण्डों को समेटा है। दरअसल 'मार्क्स और पिछड़े हुए समाज' किताब में मूलतः प्राक पूंजीवादी समाज का विश्लेषण है, और मार्क्स ऐसे समाज को पिछड़ा हुआ मानते थे।
सदियों में कभी-कभार
'निराला की साहित्य साधना' किताब डा. रामविलास शर्मा ने कवि के जीवन में डूबकर तैयार की है। निराला के जीवन की छोटी-बड़ी चीजों की ऐसी बारीक अभिव्यक्ति की ऐसी कला और सामर्थ्य पर किसी को भी एक बार ईर्ष्या हो सकती है। बड़ी ही साफगोई, ईमानदारी और उतनी ही गहरी आत्मीयता के साथ तैयार की गई जीवनी कि स्वयं उस जीवन को जीनेवाला भी देख-पढ़कर दंग रह जाए कि कितना कम जानता है वह अपने को। सहज अविश्वसनीय! मेरे लिए तय करना मुश्किल है कि उसे उपन्यास कहूं कि जीवनी। पढ़िए तो लगता है जैसे किसी फिल्म की कहानी आपके आगे से सरक रही हो। निराला को संभवतः रामविलास शर्मा की साहित्यिक मेधा/प्रतिभा का पहले ही अंदाजा हो चुका था इसलिए वे उन्हें डाक्टर साहब कहते। निराला की अकड़ भला किसी ऐरे-गैरे को डाक्टर कहने की अनुमति देती क्या ? इस डाक्टर ने ऐसी शव-परीक्षा की कि जो भी निराला के अंदर था उसे बाहर कर दिया। कुछ भी गोपन न रहा! इस किताब को पढ़ते हुए सदैव यह लगा कि निराला के साथ-साथ रामविलास शर्मा की खुद की साहित्य-साधना भी है। ऐसी जीवनी हमेशा नहीं लिखी जाती। सदियों में कभी-कभार। हिन्दी क्या विश्व साहित्य में भी ऐसी जीवनी दुर्लभ ही है।
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