'बिहारभूषण’, ‘भारतभूषण’, ‘भारतरत्न’, ‘भारतभास्कर’, ‘धर्माचार्य’, ‘महामहोपदेशक’, ‘सुकवि’, ‘अभिनव बाण’ व ‘साहित्याचार्य’ की उपाधियों से विभूषित पंडित अंबिकादत्त व्यास (24 मार्च, 1858-19 नवंबर, 1900) का जन्म तो जयपुर के सिलवटों के मुहल्ले में चैत्र शुक्ल अष्टमी को हुआ था, किन्तु उनका कार्यक्षेत्र बिहार रहा। व्यास जी में इतनी विलक्षण सृजन-प्रतिभा थी कि उन्होंने दस वर्ष की अल्पायु ही में साहित्य-सृजन के क्षेत्र में प्रवेश कर लिया। उनकी रचनाएँ दसवर्षीय बालक द्वारा विरचित हैं, यह अविश्वसनीय माना गया और समझा गया कि ये रचनाएँ समकालीन कवि मण्डल में ‘दत्त’ उपनाम से काव्य-रचना करनेवाले उनके पिता दुर्गादत्त की रचनाएँ हैं। कहा जाता है कि जब 'ग्वाल कवि' के शिष्य 'खंग कवि' काशी पधारे और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के दरबार में ‘सूरज देखि सकै नहि घुग्घू’ समस्या, पूर्ति के लिए दी गयी तो वहाँ पिता के साथ उपस्थित बालक अम्बिकादत्त व्यास ने तुरन्त एक सुन्दर पूर्ति करके वहाँ मौजूद कवि-समुदाय को चौंका दिया। फिर भी उनकी काव्य-प्रतिभा पर लोगों का सन्देह मिटा नहीं। ग्यारह वर्ष की अवस्था में उनकी काव्य-परीक्षा ली गई और ‘मूँदि गयी आँखें तब लाखें कौन काम की’ समस्या, पूर्ति के लिए दी गई तो उन्होंने पुनः तत्काल ही एक सुन्दर कवित्त बनाकर सुना दिया। भारतेन्दु ने 'कविवचन सुधा' में इनकी कविता इस सम्पादकीय टिप्पणी के साथ प्रकाशित की-‘इस विलक्षण बालक की बुद्धि विलक्षण ही है और अवस्था इसकी केवल बारह वर्ष की है। हम इसके और समाचार भी लिखेंगे।’ इस तरह बारह वर्ष ही की आयु में व्यास जी ने सरस्वती मन्त्र, अष्टावधान और अन्य चमत्कारों से काशी के रसिक मण्डल को मन्त्रमुग्ध कर अपने भावी सृजन के प्रति पूरी तरह आश्वस्त कर लिया। कवि भारतेन्दु उनकी काव्य-प्रतिभा पर ऐसे रीझे कि उन्होंने ‘काशी कवितावर्धिनी सभा’ में उन्हें ‘सुकवि’ की उपाधि से विभूषित कर दिया। आशुकवि के रूप में भी व्यास जी ने खूब ख्याति प्राप्त की। आप एक घटिका अर्थात् 24 मिनट में सौ श्लोकों की रचना कर लेने के कारण ‘घटिकाशतक’ तथा स्मृति प्रबुद्धतावश ‘शतावधानी’ भी कहे जाते थे।
गवर्नमेंट संस्कृत काॅलेज से सन् 1880 में ‘साहित्याचार्य’ की उपाधि प्राप्त करने के बाद सन् 1883 ई. में आपकी नियुक्ति मधुबनी (दरभंगा, बिहार) के एक ग्रामीण संस्कृत स्कूल में हुई जहां लगभग तीन वर्षों तक अध्यापन कार्य किया। उसके बाद 1886 में मुजफ्फरपुर संस्कृत विद्यालय में, 1887 में भागलपुर जिला स्कूल में, 1896 में छपरा जिला स्कूल में तथा अंत में 1899 में पटना में रहकर संस्कृत एवं हिन्दी की अनथक सेवा की। भागलपुर जिला स्कूल के आप हेड पण्डित रहे थे।
स्मरणीय और रेखांकित करने लायक तथ्य है कि पं. अम्बिकादत्त व्यास भागलपुर की हिंदी पत्रकारिता के जनक हैं। वहां की हिंदी पत्रकारिता का आरंभ सन् 1883 में हास्य रस की सामग्री से भरपूर मासिक 'वैष्णव पत्रिका’ के प्रकाशन से होता है। 'वैष्णव पत्रिका' ही साल भर बाद अर्थात् सन् 1884 में 'पीयूष प्रवाह' के नाम से निकली। (हिन्दी पत्रकारिता का बृहद् इतिहास के 118वें पृष्ठ में इसका नाम ‘पीयूष पत्रिका’ लिखा मिलता है जो सही नहीं है।) यह नारायण प्रेस, मुजफ्फरपुर से मुद्रित-प्रकाशित होती थी। इसके संपादक पंडित अम्बिकादत्त व्यास स्वयं थे। 1906 की विजयादशमी को जौनपुर से कालीशंकर व्यास ने भी सचित्र हिन्दी मासिक पत्र 'पीयूष प्रवाह' का प्रकाशन किया था।
'आधुनिक हिन्दी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका' के लेखक धीरेन्द्रनाथ सिंह ने लिखा है कि पण्डित अम्बिकादत्त व्यास द्वारा संपादित 'पीयूष-प्रवाह' और 'वैणव-पत्रिका' की प्रतियां भी खड्गविलास प्रेस के साहित्य-संग्रहालय में अवश्य रही होंगी, किंतु देखने में नहीं आईं। ऐसा इसलिए कि उक्त पुस्तकालय व्यास जी के पटना-निवास में गोष्ठी का प्रधान केंद्र था। अतः यहां के संग्रह में 'पीयूष-प्रवाह' और 'वैणव-पत्रिका' की फाइलों का होना स्वाभाविक था। आपके अधिकतर निबंध इसी पत्र में निकलते थे। इन निबंधों में ‘धैर्य’, ‘क्षमा’, ‘ग्रामवास’, ‘नगरवास’ आदि उल्लेखनीय हैं।
'पीयूष प्रवाह मासिक पत्र वैणव पत्रिका सम्मिलित’ में 'बिहारी सतसई' पर अम्बिकादत्त व्यास की कुछ कुंडलियां धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुई थीं। ‘जले पर नोन ऐसा शोक पर शोक’ शीर्षक समाचार में संपादक पंडित अम्बिकादत्त व्यास ने भारतेन्दु जी के प्रति पद्यबद्ध अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि भी सादर अर्पित की है।
व्यास जी की कुल 91 रचनाओं का उल्लेख मिलता है। डॉक्टर कृष्णकुमार द्वारा निर्मित सूची के अनुसार अम्बिकादत्त व्यास ने संस्कृत भाषा में कुल 27 और हिंदी तथा ब्रजभाषा में 64 ग्रन्थ लिखे थे, किन्तु हिंदी में 38 और संस्कृत में कुल 14 रचनाएं ही उपलब्ध हो सकी हैं। 1882 ई. के मार्च में व्यास जी ने भारतेन्दु के 'वेश्या-स्तोत्र' ही की भांति संस्कृत में 'द्रव्यस्तोत्र' की रचना की। यह रचना 'हिन्दी प्रदीप' में प्रकाशित हुई थी। बाद में इसका पुस्तकाकार प्रकाशन खड्गविलास प्रेस, पटना से 1888 ई. में हुआ था। इसमें 42 अनुष्टुप छन्द हैं, जिनमें धनकुबेरों पर व्यंग्य है। व्यास जी की यह कृति उनकी नाट्य-कृतियों में उत्कृष्ट मानी जाती है। 1882 ही में संस्कृत पुस्तक 'सांख्यतत्त्व-कौमुदी’ की कारिका 'सांख्यतरंगिणी' की रचना की जिसका प्रकाशन 1891 ई. में रामदीन सिंह के ‘प्रकाशकीय वक्तव्य’ के साथ हुआ है। यह धारावाहिक रूप से 'वैष्णव-पत्रिका' तथा 'पीयूष-प्रवाह' में प्रकाशित हुई थी। 63 पृष्ठ की इस पुस्तक में कुल 72 लोकों की व्याख्या की गई है।
बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि व्यास जी ने तीन संस्कृत रूपकों की रचना की थी। 'बिहारी बिहार' नामक पुस्तक के अंतिम भाग में उनके ग्रंथों का विवरण प्राप्त होता है, किंतु उस सूची में एकमात्र 'सामवतम्' ही का उल्लेख है। हालांकि 'सामवतम्' रूपक के अध्ययन से तीन रूपक की बात उजागर हो जाती है। उनके नाम 'सामवतम्', ’धर्माधर्मकलकलम' तथा 'मित्रालापः' हैं। उनके 'मन की उमंग' संग्रह में पांच रूपक हिंदी में तथा दो रूपक संस्कृत में है। 'मन की उमंग' संग्रह की भूमिका से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि इनका अभिनय मुजफ्फरपुर की धर्मसभा (धर्म संरक्षिणी सभा) में संपन्न हुआ था। आप कह सकते हैं कि मुजफ्फरपुर के रंगमंच के इतिहास में पहला नाटक ‘धर्म संरक्षिणी सभा’ के द्वारा अम्बिकादत्त व्यास ही का अभिनीत हुआ। 1882 में लिखा गया 'सामवतम्' नाटक खड्गविलास प्रेस, पटना से 1888 ई. में हुआ था। 'स्कन्दपुराण’ के एक पौराणिक आख्यान को 'सामवतम्’ नाटक की कथा का आधार बनाया गया है। इस नाटक में दुर्वासा मुनि अपने मित्रपुत्र सामवान् को ‘स्त्री हो जाने का शाप’ देते हैं। उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध का हिंदी लेखक ‘स्त्री-जीवन’ को शाप की तरह लेता है! व्यासजी ने संस्कृत नाट्य परंपरा में 'धर्माधर्मकलकलम' और 'मित्रालापः’ के रूप में एक नवीन शैली जोड़ी है। दोनों एक-एक संवाद के छोटे रूपक हैं। कुछ पद्यों से युक्त यह संवाद मुख्यतः गद्य में है और नाट्यशास्त्रीय दृष्टि से किसी नाट्यविधा में परिगणित नहीं किया जा सकता।
'बिहारी बिहार' पुस्तक से जानकारी मिलती है कि भक्तिभाव से ओत-प्रोत संस्कृत भाषा में 'रत्नपुराण' एवं 'गणेश शतक' नामक दो रचना और थी जो अब उपलब्ध नहीं है। किंतु जो उपलब्ध है उसका नाम 'सहस्रनाम रामायणम्' है। यह संस्कृत की स्तोत्र परंपरा के अनुपालन में लिखा गया है। इसमें 1000 नामों द्वारा श्रीराम के गुणों को प्रदर्शित करते हुए संपूर्ण रामायण की कथा कही गई है। कहा जाता है कि इस पर तुलसी की 'विनयपत्रिका' का प्रभाव परिलक्षित है। संस्कृत के 'सांख्य सागर सुधा', 'पातंजल प्रतिबिंब' एवं 'दुखद्रुमकुठार’ ग्रन्थ इनके दार्शनिक चिंतन की गहराई को अभिव्यक्त करते हैं। 'सांख्य सागर सुधा' की रचना बालकों को सांख्य दर्शन का आरंभिक ज्ञान करवाने हेतु की गई थी। इसमें सांख्य दर्शन के प्रतिपाद्य विषय जड़-चेतन दो तत्त्वों की कल्पना, 25 तत्त्वों का विवेचन, तीन प्रकार के शरीर, जीव द्वारा प्रकृति एवं पुरुष के भेद को समझ लेने से परे कैवल्य ज्ञान, त्रिगुणात्मिका सृष्टि की उत्पत्ति आदि सभी विषय सरलता से वर्णित हैं। 'पातंजल प्रतिबिंब' ग्रन्थ में योग दर्शन के सूत्रों की परिभाषाओं और सिद्धांतों को कारिका रूप में निबद्ध करके प्रस्तुत किया गया है। इनमें समाधि, साधन, विभूति और कैवल्य चार पाद हैं। अपनी सरल भाषा शैली के कारण योग दर्शन का यह ग्रन्थ भी उपयोगी है।
व्यास जी ने संस्कृत में 'अवतारमीमांसा' कारिका ग्रन्थ भी लिखा। इसमें अव्यक्त एवं अनादि ब्रह्म के पृथ्वी पर अवतरण को शंका एवं समाधान की शैली में सप्रमाण विवेचित किया गया है। 261 अनुष्टुप छंदों में 8 प्रश्न और ग्रन्थ के उत्तरार्द्ध में उनके समीचीन उत्तर देते हुए व्यास जी ने अवतारवाद के प्रति अपनी गहन निष्ठा व्यक्त की है। आपने संस्कृत कवियों के अभ्यास के लिए संस्कृत में 'कुण्डली दीपक' तथा 'समस्यापूर्ति सर्वस्व' जैसे ग्रन्थ लिखे तो विज्ञान, रेखागणित और इतिहास की भी पुस्तकें लिखीं, जो आज अनुपलब्ध हैं।
बच्चों को संस्कृत भाषा सिखलाने की गरज से व्यास जी ने 'रत्नाष्टक', 'संस्कृत अभ्यास पुस्तकम्' (दो भाग), 'प्राकृत प्रवेशिका', 'बाल व्याकरण' तथा 'कथा कुसुमम्' आदि कृतियां लिखीं। 'कथा कुसुमम्' में विद्यार्थियों के लिए लिखी गई 25 छोटी-छोटी कथाएं संकलित हैं। 'बाल व्याकरण' पुस्तक में संस्कृत व्याकरण का प्रारंभिक ज्ञान कराने का प्रयत्न है। 'संस्कृत अभ्यास पुस्तकम्' की रचना अंग्रेजी भाषा से संस्कृत का अभ्यास कराने के लिए 'अंग्रेजी कम्पोजिशन बुक्स' के आधार पर लिखी गई थी। संस्कृत व्याकरण की दुरुहता से परिचय के लिए व्यास जी ने 'गुप्ताशुद्धिप्रदर्शनम्' की रचना की।
संस्कृत की समृद्धि एवं प्रतिष्ठा तथा शिक्षा प्रणाली के परिष्कार के लिए पं. अम्बिकादत्त व्यास द्वारा सन् 1887 ई. में स्थापित संस्था ‘बिहार संस्कृत-संजीवन समाज’ संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयासरत रही। इसकी पहली बैठक 5 अप्रैल, 1887 ई. को हुई, जिसकी अध्यक्षता पोप जॉन बेंजिन ने की थी। इसमें देश-देशान्तर के लोग आये थे। समाज के प्रथम सचिव स्वयं पं. अम्बिकादत्त व्यास थे। इस समाज द्वारा सन् 1940 ई. में त्रैमासिक के रूप में 'संस्कृतसंजीवनम्' का प्रकाशनारम्भ किया गया। यह पत्र पटना के बारी पथ से प्रकाशित होता था। इसका वार्षिक मूल्य छः रुपये था। इसके संपादक-मंडल में केदारनाथ ओझा, भवानीदत्त शर्मा, चंद्रकांत पाण्डे, त्रिगुणानंद शुक्ल तथा राम पदार्थ शर्मा आदि विद्वान थे। 'संस्कृतसंजीवनम्' के प्राचीन अंक नहीं मिलते। यह पत्रिका अपने प्रकाशनारम्भ के तेईसवें वर्ष अर्थात् जून, 1962 ई. से मासिक के रूप में प्रकाशित होने लगी। इसकी सम्पुष्टि 'संजीवनम्' के जून, 1962 ई. के अंक के सम्पादकीय की निम्नांकित पंक्तियों से होती है: ‘साम्प्रतिकानांसंस्कृतानुरागिणां सहयोगेन द्वाविंशवर्षं समाप्य संस्कृतसंजीवनमिदं त्रयोविंशवर्षेऽवतरतीति सुरसरस्वतीसेवकेभ्यः परमहर्षस्यायं विषयः। महतः हर्षस्यायमपि विषयो यत् त्रैमासिकं संस्कृत-सज्जीवनमनेनांङ्कन मासिकरूपेण प्रकाशते।’
पत्रिका के मुखपृष्ठ पर ‘भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतंचैव संस्कृतिः’ वाक्य छपता था तथा प्रायः प्रत्येक अंक के मुखपृष्ठ पर कोई न कोई मन्त्र, श्लोक या संस्कृत के सम्बन्ध में प्रसिद्ध व्यक्तियों की उक्ति प्रकाशित होती थी। इसमें प्रायः शोधात्मक निबन्ध, गीत, नाटक, प्रहेलिका, सामयिक समाचार, बालमण्डली के अतिरिक्त संस्कृत जगत् की गतिविधियों से सम्बद्ध समाचार होते थे।
हिंदी के रूपकों में 'ललिता नाटिका', 'गोसंकट नाटक', 'भारत सौभाग्य', 'कलियुग और घी' तथा 'मन की उमंग' प्रसिद्ध हैं। भारतीय संस्कृति के ‘परम संरक्षक’ तथा हिन्दू धर्म के प्रति आस्थावान व्यास जी ने 'गोसंकट नाटक' (प्रथम संस्करण सन् 1886) के द्वारा समस्त हिन्दुओं को गोरक्षा के लिए सम्बोधित किया है। लेखक की राय में, ‘मुसलमान गोवध करने में तत्पर रहे हैं, किन्तु हिन्दू उसे माता के समान सम्मान देते रहे हैं।’ कहा जाता है कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के प्रोत्साहन में इस नाटक की रचना सम्वत् 1939 में सम्पन्न हुई। इसका प्रथम प्रकाशन 'उचित वक्ता' नामक पत्रिका में हुआ तथा बाद में सम्वत् 1941 में खड्गविलास प्रेस में पुस्तक के आकार में इसका प्रकाशन हुआ।
'गोसंकट नाटक' का कथानक अकबर बादशाह के समय का है। इसमें श्री व्यास ने मुसलमानों का नृशंस औेर हिन्दू जाति पर अत्याचार करनेवाला रूप व्यक्त किया है। आपने इस नाटक में गाय की उपयोगिता का विशद वर्णन किया है और कहा है कि मुसलमान केवल हिन्दुओं को उत्तेजित करने के लिए गोवघ किया करते थे। मुसलमानों के ‘अत्याचारों’ का ‘मर्मस्पर्शी’ वर्णन है। एक बार गोवध के लिए जिद करनेवाले मुसलमानों से हिन्दू बलात् उस गाय को छुड़ा तो लेते है, परन्तु उन्हें सघर्ष करना पडता है। अकबर के दरबार में हस्ताक्षर अभियान से फरियाद की जाती है। अतः वह गोवध के निषेध की आज्ञा प्रसारित करता है। इस प्रसन्नता में हिन्दू ‘गोरक्षा-महोत्सव’ मनाते हैं।
भारतेन्दु समाचार पत्रों की उपयोगिता और ताकत से परिचित थे। इसलिए 1873 में जब उन्होंने ‘हिन्दी समाज’ की स्थापना की तो अपने समय के वैष्णव मत का परिष्कार करके लोकोपयोगी बनाने की चेष्टा की और इस उद्देश्य हेतु 'भगवद्तोषिणी' नाम की एक पत्रिका भी निकाली जो अर्थाभाव के कारण कुछ ही महीने निकलकर बन्द हो गई। कभी-कभी उनका ‘वैष्णव-मत-परिष्कार’ मुस्लिम विरोध का रूप धारण कर लेता था। बकरीद के मौके पर मुसलमानों ने गोहत्या की तो भारतेंदु ने पटने के खड्गविलास प्रेस से प्रकाशित 'क्षत्रिय पत्रिका' के संपादक बाबू रामदीन सिंह को लिखा, ‘‘भागलपुर, मिर्जापुर, काशी इत्यादि कई स्थानों में प्रकाश्यरूप से केवल हमारा जी दुखाने के हॉको-ठोक यह अत्याचार हुआ है जो किसी-किसी समाचार-पत्र में प्रकाश भी हुआ है। आप भी अपने पत्र में इस विषय का भली भांति आंदोलन कीजिए। सब पत्र एक साथ कोलाहल करेंगे। तब काम चलेगा। हिन्दी, उर्दू, बंगाली, मराठी, अंग्रेजी सब भाषाओं के पत्रों में जिनके संपादक हिन्दू हों एक बेर बड़े धूम से इसका आन्दोलन होना आवश्यक है आशा है कि अपने शक्य भर आप इस विषय में कोई बात उठा न रक्खेंगे।’’
'कलियुग और घी' एक छोटा सा रूपक है। इस रूपक की रचना सम्वत् 1942 (सन् 1885) में हुई। यह उसी वर्ष नारायण प्रेस, मुजपफरपुर से प्रकाशित हुआ। यह रूपक वस्तुतः एक प्रचारात्मक रचना है, जिसमें कवि ने हिन्दुओं की सामाजिक तथा धार्मिक परम्पराओं में सुधारों का विरोध किया है। उस समय आर्यसमाजियों और ब्रह्मसमाजियों द्वारा किए जाने वाले बालविवाह और मूर्तिपूजा के खण्डन आदि का विरोध इस रूपक में है। अपने कथन की पुष्टि के लिए श्री व्यास ने स्थान-स्थान पर संस्कृत के वाक्यों व श्लोकों को उद्धृत किया है। उनकी यह मान्यता है कि कलियुग के प्रभाव से ही घी में चर्बी आदि अपवित्र द्रव्यों का संयोग हुआा है। इस तरह, अम्बिकादत्त व्यास ने धी में मिलावट के बहाने अपने हृदय की पीड़ा को अभिव्यक्त किया है।
ब्रह्म समाज आंदोलन, जो विधवा विवाह समेत महिला मुक्ति का पक्षधर था, बिहार में प्रभावकारी स्थिति में नहीं था। थोड़े से बंगाली परिवारों के बीच ही यह सीमित था। बावजूद इसके, बिहार का तत्कालीन हिंदू समाज ब्रह्मसमाजियों के विचारों को हिंदू धर्म के लिए खतरा मानकर नापसंद करता था। सन् 1887 ई. में मुजफ्फरपुर में हरिसुंदर बोस को इन्हीं विचारों के प्रचार के लिए जूतों की माला पहनाई गई थी। 'बिहार बन्धु' भी ब्रह्म समाज के समाज सुधार संबंधी कतिपय क्रांतिकारी विचारों की आलोचना करता था। यद्यपि आर्य समाज भी विधवा पुनर्विवाह का पक्षधर था और समय-समय पर बहुविवाह, बाल विवाह एवं बेमेल विवाह की प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाता रहा था, 'बिहार बन्धु' ने आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानंद का एक लेख प्रमुखता से छापा जिसका शीर्षक था, ‘अस्पृयता को हटाइए, स्वदेशी को अपनाइए।’
व्यास जी सनातन मतावलम्बी कट्टर हिन्दू ब्राह्मण थे। उनका मानना था कि प्राचीन वैदिक सभ्यता एवं ब्राह्मणों की गरिमा को लौटाकर ही हिन्दू समाज का भला हो सकता है। 'गीता' के उद्घोष ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परघर्मो हि भयावहः’ में उनकी गहन निष्ठा थी। उन्होंने तत्कालीन सामाजिक एव धार्मिक सुधारवादी आन्दोलनों का विरोध करते हुए खण्डनमण्डनात्मक साहित्य लिखा। पौराणिक धर्म के पक्ष में आपने हिन्दी में 'अबोध निवारण', 'पण्डित प्रपंच', 'दयानन्दमतमूलोच्छेद', 'दोषग्राही', 'गुणग्राही', 'मानस-प्रशंसा', 'वर्णव्यवस्था', 'आश्रम घर्म-निरूपण', 'मूर्तिपूजा' एवं 'अवतार मीमांसा' आदि पुस्तकें लिखी।
उन्नीसवीं सदी के आठवें दशक में स्वामी दयानन्द के आर्यसमाज का बोलबाला था। सनातन धर्म का बड़ी बेरहमी से तर्क के साथ खण्डन किया जा रहा था। व्यास जी ने पटना में स्वामी दयानन्द के प्रभाव को अपने अनेक भाषणों से कम करने का प्रयास किया था। उनका एक भाषण 16 नवम्बर, 1885 ई. को पटना में हुआ था, जो अत्यन्त प्रभावशाली था। उस भाषण को खड्गविलास प्रेस के बाबू साहेबप्रसाद सिंह ने संकलित किया था। बाबू शिवनन्दन सहाय ने उसका उर्दू तथा अँगरेजी में अनुवाद किया था। इन भाषणों का संकलन 'दयानन्द-मत-मूलोच्छेद’ सन् 1885 ई में प्रकाशित हुआ था। हिंदी पुस्तक 'अबोध निवारण' की रचना व्यास जी ने स्वामी दयानंद की पुस्तक 'संस्कृत वाक्य प्रबोध' की अशुद्धियों को प्रदर्शित करते हुए की, और यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि स्वामी जी द्वारा लिखे गये वैदिक मंत्रों के अर्थ प्रामाणिक नहीं माने जा सकते।
कट्टर सनातनी और समाज सुधार के विरोधी अम्बिकादत्त व्यास ने 'पीयूष प्रवाह' में ‘काजी जी दुबले क्यों' शीर्षक एक लेख छापा, जिसमें राजा रामपाल सिंह (सुधारकों में अग्रगण्य) पर यह आक्षेप था कि ‘अत्रभवान (अनेक पुस्तकों में अत्रभावन लिखा मिलता है) तो चाहते हैं कि सारा भारत इंग्लैंड हो जाए, लेकिन जो मर्दुमशुमारी दस-दस साल पर पाँच-पाँच करोड़ बढ़ रही है, उसी से यहाँ के लोगों को दोनों जून भरपेट खाने को नहीं मिलता और अब यदि अत्रभावन के सिद्धांत पर विधवा विवाह का भंडा फूटेगा तो भारत की मेदिनी और भूखों मरने लगेगी।’ वह लेख राजा साहब के पास आया। उन्होंने कहा कि ‘कोई इसका मुंहतोड़ उत्तर नहीं दे सकता?’ बालमुकुंद गुप्त जी ने उसी समय कहा-‘‘कल मैं इसका उत्तर ‘हिंदोस्थान’ में निकाल दूंगा।’’ उसी अवसर पर गुप्त जी ने ‘हिंदोस्थान’ में एक लेख लिखा, जिसका शीर्षक था ‘मैं सुकवि हूंँ’ (व्यास जी कविता में अपना नाम ‘सुकवि’ लिखा करते थे)। उस लेख में ‘सुकवि’ की खूब खबर ली गई।
अम्बिकादत्त व्यास भारत को इंगलैंड बना दिये जाने के समर्थक नहीं थे किंतु ‘चिरजीवी रहो विक्टोरिया रानी’ के पूर्तिकारों में वे भी शामिल थे। इतना ही नहीं, व्यास जी ने मुजफ्फरपुर (बिहार) में सन् 1887 ई. में 'भारत-सौभाग्य' नामक नाटक की रचना की थी। उसी वर्ष यह पुस्तक खड्गविलास प्रेस से छपी। श्री कृष्णबिहारी मिश्र रचित 'प्रबोधचन्द्रोदय' नाटक के सदृश यह भी एक भावात्मक रूपक है जिसमें भारतसौभाग्य, विषयभोग, भारतदौर्भाग्य, प्रताप, उत्साह तथा शिल्प ‘पुरुष पात्र’ है तथा मूर्खता, फूट, शिक्षा, एकता, भारत-पताका, अंग्रेजीपताका, राजभक्ति, यंत्रविद्या, उदारता तथा दया ‘स्त्री पात्र’ है। रामदीन सिंह ने महारानी विक्टोरिया की जुबिली के अवसर पर ’भारत-सौभाग्य' को मुद्रित कर निःशुल्क वितरित किया था। यह पुस्तक बड़ी अच्छी सुनहली किनारी तथा विभिन्न रंगों में छापी गई थी। विदेाी पत्रों ने इसकी बड़ी सराहना की थी। यह नाटक 'क्षत्रिय-पत्रिका’ के ‘प्रीति-स्वरूप’ वितरित किया गया उपहार था। चार दृयों और इक्यावन पृठों का यह नाटक अंग्रेजी शासन के प्रति आस्था प्रकट करता है। इन चार अंकों में दिखलाया गया है कि अंग्रेजी राज के पूर्व मुगलकाल में यवनों के दुराचार, मूर्खता, फूट आदि से भारत में दुर्भाग्य का साम्राज्य आ गया था। अंग्रेजी राज में शिक्षा, उत्साह, एकता, यन्त्रविद्या और शिल्प ने दुर्भाग्य को दूर कर दिया। इसका श्रेय महारानी विक्टोरिया को दिया गया है, इसलिए अनेक भाषाओं में रचित कविताओं द्वारा महारानी के प्रति शुभकामनाएं व्यक्त की गई हैं।
'जटिल वणिक्' रूपक में व्यास जी ने मुसलमानी राज्य की तुलना में अंग्रेजी राज की श्रेष्ठता साबित और अभिव्यक्त की है। इस हेतु उन्होंने एक जटिल तपस्वी और एक वणिक् का वार्तालाप कराया है। एक जटिल तपस्वी जब अपनी तपस्या से उठता है तो वह चित्तौड़ की रक्षा तथा उस पर मुसलमानों के आक्रमण की घटना से क्षुब्ध है तथा उनका संहार करने के लिए उस वणिक् से वह खड्ग मांगता है, परंतु वणिक् यह बताता है कि मुसलमानों का शासन समाप्त हो चुका है तथा इस समय राज-राजेश्वरी विक्टोरिया का राज्य है। इस समय प्रजा सुखी और धर्माचरण में पूर्ण स्वतंत्र है।
बिहार की शिक्षण व्यवस्था में अपने जीवन का अधिकांश समय बितानेवाले अम्बिकादत्त व्यास ने बिहार के हिन्दी पढ़नेवाले छात्रों को अपनी प्रसिद्ध पाठ्यपुस्तक 'साहित्य-नवनीत' द्वारा काफी लाभ पहुंचाया। यह पुस्तक बहुत दिनों तक यहां स्वीकृत पाठ्य सामग्री थी। वे अपने समय के श्रेष्ठ विद्वानों में से थे। सन् 1885 ई. में प्रकाशित बाबू रामचरण सिंह के 'भाषा प्रभाकर' को उन्होंने जिस पाण्डित्य के साथ संशोधित किया था और उसमें जैसी समीक्षात्मक टिप्पणियाँ दी थीं, उनसे उनकी अद्भुत विद्वता का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। उसी ग्रन्थ में उन्होंने 'हिन्दीभाषा सूत्राधार' नामक एक व्याकरण की रचना प्रारम्भ करने की सूचना दी थी जो उनके असामयिक निधन से सम्भवतः पूरा नहीं हो सका। सन् 1901 ई. में माधव प्रसाद पाठक ने अपने 'हिन्दी बालबोध व्याकरण' की भूमिका में उसका उल्लेख करते हुए लिखा था कि ‘‘पण्डित अम्बिकादत्त व्यास साहित्याचार्य स्वर्गवासी ने ‘आर्यभाषा सूत्रधार’ नामक व्याकरण का लिखना आरम्भ किया था, परन्तु नहीं जान पड़ता कि वह ग्रन्थ कहाँ है, समाप्त हुआ कि नहीं, किसी ने कभी उसको देखा या नहीं, यह सब बातें गुप्त। उक्त पण्डित जी लोकोत्तर बुद्धि के मनुष्य थे यदि जीते रहते, तो अवश्य उस ग्रन्थ को प्रकाश करते। दैवयोग से वे अल्पायु हो गये।’’ हिन्दी व्याकरण का इतिहास के लेखक अनन्त चौधरी ने भी लिखा है कि ‘पं. अम्बिकादत्त व्यास संभवतः उक्त ग्रंथ को पूरा नहीं कर सके थे, क्योंकि बहुत खोज करने पर भी न तो हमें उसकी कोई प्रति कहीं मिली और न उसका अन्यत्र कोई उल्लेख ही मिला।’
1890 के आसपास हिंदुस्तान में खड़ी बोली के प्रचार का आंदोलन उठ खड़ा हुआ। खड़ी बोली के उन्नायक मुजफ्फरपुर के बाबू अयोध्याप्रसाद खत्री ने हिन्दी में विराम-चिह्न आदि के व्यवहार पर कई लेख लिखे। इसी समय, कलकत्ता में 1890 में 'हिन्दी बंगवासी' का जन्म हुआ। इसका संपादन पण्डित अमृत लाल चक्रवर्ती और पण्डित रुद्रदत्त शर्मा कर रहे थे। ये दोनों व्यक्ति विभक्तियों को मिलाकर लिखने के कट्टर समर्थक थे। इधर अम्बिकादत्त व्यास तथा श्री गोपालराम गहमरी बिहार बन्धु में मोर्चा संभाले थे। ये दोनों ही विभक्ति को शब्द से न मिलाकर लिखने के पक्ष में थे। अतः 'बिहार बन्धु' ने इनका समर्थन किया और अपना निर्णय देते हुए लिखा-‘‘सर्वनाम के साथ जो विभक्ति आवे वह साथ लिखी जावे।’’ इस विषय पर 'बिहार बन्धु' में गहमरी जी के कई करारे लेख छपे हैं। व्यास जी की 'विभक्ति विलास' (अनन्त चौधरी की किताब हिन्दी व्याकरण का इतिहास, पृष्ठ 380 में भूलवश ‘विभक्ति विभाग’ छप गया है।) नाम की एक पुस्तक सन् 1890 ई. में भागलपुर से प्रकाशित हुई थी, जिसमें हिन्दी भाषा में विभक्तियों को अलग लिखना कि नहीं; इस विषय का विचार करते हुए मानकीकरण का विचार किया था। 'विभक्ति विलास' में आपने इस बात को भलीभांति रखा था कि विभक्तियों को पृथकतया ही लिखना चाहिए।
पण्डित जी ने विभक्ति संबंधी उक्त प्रन को पत्र के रूप में छपाकर देश के श्रेष्ठ विद्वानों के पास भेजा था। अपनी पुस्तक में उन्होंने सभी विद्वानों के नाम के साथ उनकी सम्मतियाँ प्रकाशित की थीं। वे स्वयं विभक्ति को शब्द से हटाकर लिखने के पक्ष में थे। अधिकतर विद्वानों ने उन्हीं के मत का समर्थन भी किया था, किन्तु कलकत्ते के 'हिन्दी बंगवासी' नामक मासिक पत्र के सम्पादक ने उनके मत का विरोध करते हुए विभक्ति को शब्द से सटाकर लिखना उचित बताया था। पण्डित जी ने उक्त सम्पादक के पत्र का बड़ा ही तर्कयुक्त एवं व्यंग्यपूर्ण उत्तर दिया था। अपनी पुस्तक में उन्होंने उक्त सारी सामग्री ज्यों-की-त्यों उद्धृत की थी। अन्त में अपना निष्कर्ष देते हुए उन्होंने लिखा था कि “विभक्ति और उनके पूर्व के शब्दों को अलग ही लिखना उत्तम है और मिला के लिखना साधारण है, परन्तु जहाँ विभक्ति का रूपान्तर हो गया हो, वहाँ अलग नहीं लिखना और जहाँ विभक्ति के पहले कोई दूसरी विभक्ति अथवा अव्यय हो, वहाँ मिला के नहीं लिखना चाहिये।’’
No comments:
Post a Comment