जयप्रकाश नारायण कहते हैं : 'मेरा अतीत-जीवन-पथ किसी बाहरी व्यक्ति को अस्थिरता तथा अन्धान्वेषण का एक टेढ़ा-मेढ़ा, वक्र रेखाचित्र-जैसा प्रतीत होगा।'
1929 में जेपी जब स्वदेश लौटे तो एक 'प्रतिबद्ध मार्क्सवादी' थे। मार्क्सवाद में उनका यह विश्वास 1936 में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'समाजवाद ही क्यों?' में स्पष्ट रूप से प्रकट होता है। इस पुस्तक के प्रथम अध्याय में जयप्रकाश स्पष्ट शब्दों में कहते हैं : 'समाजवाद का केवल एक रूप है, एक सिद्धांत है और वह मार्क्सवाद है।' किन्तु बाद के दिनों में उन्होंने स्वीकार किया कि 'वे मार्क्सवाद की विचारधारा द्वारा छले गये थे।'
किन्तु इस 'मार्क्सवादी मन' ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में कांग्रेस की शरण ली, क्योंकि समय उन्हें 'मार्क्सवाद के अनुकूल' नहीं जान पड़ा। नतीजा हुआ कि 1940 के आसपास मार्क्सवाद का दामन छोड़ 'लोकतांत्रिक समाजवाद' का दामन थाम लिया। यह दौर 1952 तक जारी रहा। और कहना जरूरी है कि 1952 के प्रथम चुनाव में आशानुरूप सफलता न मिल पाने के बाद दलीय राजनीति से संन्यास ले भूदानी हो गए।
1934 के दिनों में जयप्रकाश जी सोशलिस्ट-कम्युनिस्ट एकता के लिए चिंतित रहा करते थे। घटना है कि जयप्रकाश जी ने डॉक्टर लोहिया से कहा कि 'यह कागज कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर में दे आओ'। इस पर लोहिया ने उत्तर दिया, 'मैं कम्युनिस्टों के दफ्तर में तो नहीं ही जाऊंगा'। इस पर जयप्रकाश जी ने फाइल लोहिया की देह पर फेंकते हुए कहा, 'डैम इट। तुम कम्युनिस्टों को अछूत समझते हो और देश में समाजवाद की स्थापना करना चाहते हो?'
'1957 के बाद जब कम्युनिस्ट पार्टी का वर्चस्व बढ़ने लगा, और थोड़े दिनों तक कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट पार्टियों में टक्कर के बाद सोशलिस्ट पार्टी का प्रभाव घटने लगा तो जयप्रकाश जैसे सोशलिस्ट नेता कहने लगे कि हम जनसंघ के साथ मिलकर कम्युनिस्टों से लड़ेंगे। जयप्रकाश नारायण, डॉक्टर राममनोहर लोहिया ये सारे जो सोशलिस्ट नेता थे, वे कहते थे कि बिना जनसंघ से मिले हम कम्युनिस्टों का मुकाबला नहीं कर सकते।'
समाजवादी जे.पी. को नक्षत्र मालाकार ने जो फटकार लगायी थी उसे भी याद रखना होगा. सन 1936 में सोनपुर में समाजवादियों का शिविर आयोजित था. नक्षत्र मालाकार भी शामिल थे. जयप्रकाश नारायण उस शिविर के प्रिंसिपल थे. एक दिन उन्होंने (नक्षत्र मालाकार) देखा कि शिविर के अंतर्गत दो तरह की भोजन-व्यवस्था चल रही है. उन्हें यह सब अच्छा नहीं लगा. उन्होंने जयप्रकाश नारायण जी से इस दोहरी व्यवस्था का कारण पूछ दिया. जयप्रकाश जी ने उत्तर दिया-‘यहाँ नेताओं के अलग और कार्यकर्ताओं के लिए अलग भोजन-व्यवस्था है.’ नक्षत्र मालाकार को इस उत्तर से घोर ‘रिएक्शन’ हुआ. उन्होंने कहा- ‘अइसन दुरंगी नीति से समाजवाद न अतौ जयप्रकाशजी.’
जेल से छूटने के बाद बाबा नागार्जुन लोगों को एक कविता सुनाते थे-'कदमकुआं, हुआँ, हुआँ, हुआँ', यानी सियार लोग जहाँ जमा थे, वही कदमकुआं था। कहने की जरूरत नहीं कि पटना के कदमकुआं मुहल्ले में जयप्रकाश बाबू रहते थे!
जे. पी. की कभी 'चेतावनी' थी : ‘मुझे सुनने में आया है कि हमारे बहुत से नौजवान भाई राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में भर्ती हो रहे हैं. मैं साफ कहूँ, यह आप गलत कर रहे हैं, आप गलत रास्ते पर जा रहे हैं.’ ......‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पीछे करोड़पति हैं, राजे महाराजे हैं, उनका रुपया है, उनका हाथ है. उनके पीछे छिपे मतलब को समझना मुश्किल नहीं है.’ दुर्भाग्य कि अपनी ही 'चेतावनी' को भूल जे. पी. खुद आर. एस. एस. की गोद में जा बैठे!
बिहार के मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर ने लोकसभा को बताया था कि आपातकाल के दिनों में एक निर्दोष साधु को पुलिस सब इंस्पेक्टर ने गिरफ्तार कर लिया था। वह साधु गंडक नदी में स्नान के उपरांत 'जय नारायण, जय नारायण' का जाप कर रहा था। कहने की आवश्यकता नहीं कि साधु को जयप्रकाश नारायण का शिष्य समझ लिया गया!
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