बौद्ध धर्म और बुद्धिजीवी
मैं सालों से समझने की कोशिश में हूँ कि बौद्ध धर्म पर दलित बुद्धिजीवी से लेकर कुछ मार्क्सवादी तक क्यों लट्टू हैं? आंबेडकर से लेकर राहुल सांकृत्यायन तक। सांकृत्यायन ने तो यहाँ तक लिखा कि बौद्ध धर्म 'हैब्स और हैवनॉट्स' का संघर्ष था। (देखें पीपीएच से प्रकाशित 'बुद्धिज्म : ए मार्क्सिस्ट एप्रोच' में राहुल सांकृत्यायन का लेख) आज भी यह हमारे बुद्धिजीवियों के लिए एक कमजोरी बना हुआ है। हमारे समय के कई 'क्रन्तिकारी' विचारक आंबेडकर में 'सर्वहारा क्रांति' की दार्शनिक पृष्ठभूमि खोजने में लगे हैं। उनकी बौद्धिक मेधा की तुलना कभी बुद्ध और मार्क्स तो कभी भगत सिंह से करते हैं। यह सही है कि भारतीय मार्क्सवादी विचारकों ने उन सवालों को कमतर महत्त्व दिया जिनको बाबा साहब उठा गये हैं। लेकिन 'प्रायश्चित' का मतलब यह तो नहीं होता कि हम मार्क्सवाद को भूलकर आंबेडकर की राह चलना शुरू कर दें। एक मार्क्सवादी को भारत-जापान संस्कृति परिषद् के सम्मान में आयोजित समारोह में दिया गया आंबेडकर का वक्तव्य स्मरण रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि 'वर्तमान और भावी पीढ़ी को अंततोगत्वा बुद्ध या मार्क्स दोनों में से एक के सिद्धांत को चुनना पड़ेगा। यदि बुद्ध के उपदेशों को स्वीकार नहीं किया गया तो एशिया में भी यूरोप की भांति संघर्षों का दौर शुरू हो जायेगा।' और हमारे मार्क्सवादी मित्र हैं कि कभी बुद्ध पकड़ते हैं तो कभी आंबेडकर। इस आपाधापी में बेचारे मार्क्स ही हमसे किनारा होते जाते हैं।
सच है कि प्राचीन बौद्ध धर्म में समता के सिद्धांत का आलंबन रहने पर भी अभिजात तंत्र की ओर विशेष झुकाव था। (ओल्डेनबर्ग, 'बुद्ध', पृष्ठ 155-9) बौद्धों ने वर्ण व्यवस्था के आधारभूत तथ्यों का शायद ही कभी खुलकर विरोध किया, जिसके अनुसार शूद्रों को सेवि वर्ग के अंतर्गत रखा गया था। ब्राह्मणों का यह दावा था कि वे अन्य तीन वर्णों से श्रेष्ठ हैं, किंतु गौतम बुद्ध ने इसका खंडन करते हुए बताया कि जहाँ तक उद्गम का प्रश्न है, क्षत्रिय उच्च हैं और ब्राह्मण निम्न। पर ये वैश्यों या शूद्रों की अपेक्षा न तो ब्राह्मणों और न क्षत्रियों की ही श्रेष्ठता पर आपत्ति करते हैं। (दीघ निकाय, I, पृष्ठ 91-98) बौद्ध धर्म केवल यह बताने का प्रयास करता है कि मुक्ति की खोज में जाति का कोई महत्त्व नहीं। (फिक, दि सोशल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ नॉर्थ ईस्टर्न इंडिया, पृष्ठ 31)
ईसाई धर्म की ही तरह इस काल के धार्मिक-सुधार आंदोलनों ने भी दासता की बुनियाद पर कभी कोई आघात नहीं किया। उन्होंने शूद्रों की आर्थिक एवं राजनैतिक अशक्तताओं को भी दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया। उलटे बौद्ध संघ का दरवाजा गुलामों और कर्जखोरों के लिए बंद था, और बौद्ध धर्म कर्ज की अदायगी पर जोर देता था। (रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, पृष्ठ 127) ध्यान देने की बात है कि बुद्ध ने समाज की व्यवस्था के उल्लंघन का कभी समर्थन नहीं किया और उन्होंने भागे हुए दासों को अपने धर्म में दीक्षित करने से इनकार कर दिया। (देवराज चानना, प्राचीन भारत में दास प्रथा, पृष्ठ 95, पादटिप्पणी संख्या 191) बौद्ध धर्म के प्रचलित नियमों के अनुसार कोई भिक्षु सम्बद्ध साहूकार की अनुमति के बिना किसी कर्जदार/दास को दीक्षित करता है तो वह (धर्म के विरुद्ध आचरण का) अपराधी है। (समंतपासादिका, पृष्ठ 999; देवराज चानना, प्राचीन भारत में दास प्रथा, पृष्ठ 152 में उद्धृत)
"एक दासी अपनी रोटी बुद्ध को भेंट करके अपने आप से कहती है कि बुद्ध ने इसे सौजन्य से स्वीकार किया है और थोड़ा-सा आगे जाकर वे इसे किसी कौवे या कुत्ते को डाल देंगे।" (धम्म अट्ठकथा 3/121; चानना, पूर्वोक्त, पृष्ठ 130, पादटिप्पणी संख्या 141 में उद्धृत)
क्या है बुद्ध का ज्ञान?
सिद्धार्थ गौतम को ज्ञान प्राप्त हुआ, यह प्राचीन भारतीय इतिहास की सर्वाधिक प्रचारित परिघटना है। ज्ञान था कि दुःख है, दुःख का कारण है और उसके निवारण के उपाय हैं। बुद्ध का ज्ञान जब कहता है कि दुख का कारण इच्छा है, तो उन्होंने सामाजिक संस्थाओं से, सामाजिक वातावरण से उत्पन्न दुख पर विचार नहीं किया ।(जयप्रकाश नारायण, समाजवाद सर्वोदय और लोकतंत्र, बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, जून 1988, पृष्ठ 116) किन्तु सत्य है कि यह भारतीय इतिहास में कार्य-कारण संबंध की खोज या प्रस्थापना है। इस रूप में बुद्ध का यह ज्ञान महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी अवश्य है लेकिन जिस तरीके से वे ज्ञान प्राप्त करते हैं, उसकी कहानी बड़ी दिलचस्प है। कहानी है कि बुद्ध ने बीमार आदमी को देखा, वृद्ध को देखा और फिर मृतक को देखा। ये सारे दुख के दृश्य हैं। मजेदार है कि दुःख के इन दृश्यों में सामाजिक समस्या से जुड़ा एक भी दृश्य नहीं है। मसलन किसानों का दुख, दासों का दुख आदि आदि। आप यह भी कह सकते हैं कि बुद्ध के दुःख का सामाजिक सरोकार नहीं है।
ज्ञान-प्राप्ति की एक दूसरी कहानी भी है। बुद्ध कई दिनों से अन्न त्यागे हुए हैं। कभी-कभी अखाद्य खा लेते हैं। तभी सुजाता खीर के साथ प्रकट होती है। जंगल में आकाशवाणी भी होती है कि 'वीणा के तार को इतना न कसो कि टूट जाए, न इतना ढीला रखो कि आवाज ही न निकले।' बुद्ध को ज्ञान मिला कि 'बीच का रास्ता ही रास्ता है'। तब हमारे प्रिय कवि पाश नहीं थे कि कहते, बीच का रास्ता, रास्ता नहीं होता।
बुद्ध ने मध्यम मार्ग अपनाया। इस मध्यम मार्ग का एक ऐतिहासिक सन्दर्भ है। उनके समय में समाज में उथल-पुथल था। किसानों का शोषण इतना बढ़ चुका था कि वे खेती और गांव छोड़कर भाग रहे थे। प्राचीन काल में पलायन किसान विद्रोह का सबसे प्रकट रूप है। बुद्ध ने भूपतियों/ शासक वर्ग से आग्रह किया कि वे किसानों को हल, बैल तथा बीज आदि की व्यवस्था करें। इधर संघ में दास/दासियों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया ताकि प्रभु वर्ग को मुफ्त श्रमिक उपलब्ध हो सके। यह बुद्ध के मध्यम मार्ग का केवल एक उदाहरण है। इसी मध्यम मार्ग से बुद्ध को राज्याश्रय प्राप्त होते थे।
बुद्ध, बौद्ध साहित्य और स्त्री-विमर्श
कथा है कि 'प्राचीन भारत में सड़कों पर यात्रियों के आराम के लिए धर्मशालाएं होती थीं। ऐसी एक शाला बनवाने के संबंध में एक जातक में एक मजेदार कहानी आई है। बोधिसत्त्व और उसके एक बढ़ई साथी ने एक चौमुहानी पर एक सभा बनवाई, पर उन्होंने यह निश्चय किया कि वे उस धर्मकार्य में किसी स्त्री की सहायता नहीं लेंगे, पर स्त्रियां इस तरह प्रण से भला कहाँ धोखा खानेवाली थीं। उनमें से एक स्त्री बढ़ई के पास पहुंची और उसने शिखर बनाने के लिए कहा। बढ़ई के पास शिखर बनाने के लिए सूखी लकड़ी तैयार थी, जिससे उसने खरादकर शिखर तैयार कर दिया। जब सभा का बनना समाप्त हो गया, तब बनानेवालों को पता लगा कि शिखर नदारत था, उसके लिए बढ़ई से कहा गया। बढ़ई ने उन्हें बतलाया कि शिखर एक स्त्री के पास है। स्त्री से उनलोगों ने शिखर मांगा, पर उसने उन्हें वह तबतक देने से इनकार किया, जबतक कि वे उसे अपने पुण्यकार्य में साझी बनाने को तैयार न हों। झख मारकर स्त्री-विरोधियों को उसी शर्त पर शिखर लेना पड़ा।' (जातक, 1, 201; डॉक्टर मोतीचंद्र, सार्थवाह, बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद, पटना, द्वितीय संशोधित संस्करण : 1966, पृष्ठ 54)
एक दूसरी कथा है कि देवी महामाया को स्वप्न आया कि 'उज्ज्वल वर्ण हाथी के रूप में बोधिसत्त्व ने शयनकक्ष में प्रवेश किया। तीन बार प्रदक्षिणा की। फिर देवी की कुक्षि में प्रवेश किया।' स्वप्न का रहस्य पूछे जाने पर ब्राह्मणों ने उत्तर दिया, 'राजन! देवी ने गर्भ धारण किया है।' राजन के लिए उत्तर अपर्याप्त था, अतः मृदु स्वर में पूछा, 'महात्मन का रूप क्या होगा!' प्रश्न का 'तात्पर्य' जानकर ब्राह्मणों ने उत्तर दिया-'देवी की कुक्षि में स्थित गर्भ पुत्र है, कन्या नहीं है।' राजा का कमल मुख खिल गया। (रघुनाथ सिंह, बुद्धकथा, हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी, 1990, पृष्ठ 4)
सिद्धार्थ का मन असार संसार में न रमता था। इसलिए उन्हें खुश करने को कमिनियाँ छोड़ी गईं। कमनीय कामिनियों को राजाज्ञा थी राजकुमार को प्रसन्न करने की। आगे-पीछे 'काम-पुतलियां' चलीं। 'कोई पुष्पित तरु छाया में पालना झूलने चली। जानकर कोई गिर गयी। आशा से-उसे उठा लेंगे। कोई पुष्पसज्जिता उनके सम्मुख पुष्प गिराती चली। कोई कटाक्ष करती समीप से निकल गयी। उनके कंठ में माला डालने के व्याज से किसी ने अपने पीन पयोधर का स्पर्श उनके वक्षस्थल से करा दिया।'
'एक मदोद्धत उत्तुंग पीनपयोधरा रूपसी ने उनका स्पर्श किया। मुस्कुराई। उनके स्कंध प्रदेश पर अपना कपोल रख दबाया।'
'मृदुबाहुलता बाला ने गिरने का बहाना कर उनका आलिंगन कर लिया। मदिर गंध युक्त मुख उनके श्रवणों के पास ले जाकर, कुछ कहने के व्याज से अपना अधर उनके कपोल से लगा दिया।'
'एक मुखर कामिनी की स्वर्ण मेखला कटि प्रदेश से जंघा पर फिसल आयी थी। मेखला ठीक करती हुई, उसने सूक्ष्माम्बर से अपना स्थूल नितंब प्रदर्शित कर दिया।'
'मंजरी-पूर्ण आम्र शाखा से झूलकर एक गौरांगना ने अपना सुवर्ण-कलश सदृश सुंदर स्तन-युगल और अनावृत वक्ष दिखा दिया।' (रघुनाथ सिंह, बुद्धकथा, पृष्ठ 19)
ऊपर की पंक्तियों से बुद्धकालीन समाज और बौद्ध साहित्य का 'स्त्री-विमर्श' समझा जा सकता है।
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