Thursday, October 1, 2026

जीवेत शरदः शतम

आजकल का कोई भद्र व्यक्ति किसी सभा-सोसायटी में छींकता है तो शिष्टाचार की मर्यादा का ध्यान देते हुए वह अंग्रेजी का 'सॉरी' शब्द कहता है, लेकिन बचपन का अनुभव है कि अगर हम बच्चे कभी छींकते तो घर की बड़ी-बूढ़ियाँ तुरत 'छत्तन जी' कहकर उसका प्रतिकार करतीं। बहुत दिनों तक तो यह पता ही नहीं चला कि ये 'छत्तन जी' कौन बला हैं। तभी गाँव में आर्यसमाजियों की एक टोली पहुंची। उनकी किसी शाम की सभा से रहस्योद्घाटन हुआ कि  'छत्तन जी' दरअसल संस्कृत का 'शतम जीवेत' है।

प्राचीन भारत में किसी को आशीर्वाद देते समय 'जीवेत शरदः शतम/पश्येम शरदः शतम' अर्थात सौ शरद जीने और सौ शरद देखने की बात कही जाती थी। तब आज के जैसा ठाकुर प्रसाद का छपा हुआ कैलेंडर नहीं था, इसलिए लोग एक बरसात से दूसरी बरसात की अवधि को वर्ष मान लेते थे। बरसात में नदियों में नियमित बाढ़ आती थी। प्राकृतिक अवलोकन एवं अनुभव से उन्हें मालूम हो चला था कि दो बरसात/बाढ़ के बीच की अवधि सालभर की है। भाषाविज्ञान भी बताता है कि वर्ष का संबंध वर्षा से है। बरसात के ठीक बाद शरद ऋतु है। वर्ष की गिनती शरद से भी होती रही है। इसीलिए वर्ष और साल का एक पर्यायवाची शब्द शरद भी है। (संस्कृत शब्द कौस्तुभ, पृष्ठ 830; भोलानाथ तिवारी, शब्दों का जीवन, पृष्ठ 111) 

वनस्पति विज्ञान की बात करें तो बरसात की ऋतु में पौधे में वृद्धि होती है और शरदकाल में वलय (रिंग) का निर्माण होता है। एक वलय से दूसरे वलय तक पहुंचने में पौधे को सालभर का समय लगता है। शायद इसलिए भी वर्ष की माप शरद से शरद तक की जाती रही है, लेकिन अब के लोग शरद नहीं वसन्त देखने की बात करते है। शरद को वसन्त ने कब पदच्युत किया, यह शोध का विषय हो सकता है!

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