संस्कृति प्रवहमान होती है...
संस्कृत के क्षेत्र में इस तरह के अलगाव की प्रक्रिया तब शुरू होती है, जब विकास की एक खास यात्रा हम तय कर चुके होते हैं। उससे पहले शायद ऐसा करना संभव भी नहीं होता। हम इतिहास के अनुभवों के आधार पर देखें तो साफ होगा कि जिस आर्य या वैदिक संस्कृति पर हम गर्व करते हैं, वह अपने प्रारंभिक दिनों में ऐसी कुछ भी नहीं थी। बल्कि कहना होगा कि आर्यों का भारत आगमन इसीलिए एक पिछड़ा कदम था। इसलिए अपने शुरुआती दिनों में आर्यों को जहां कहीं कुछ बेहतर मिलता, अनुकरणीय लगता। उसे वे अपनाने में तनिक संकोच नहीं करते। यहां तक कि दूसरों की पत्नियों और देवता तक को अपना डालते थे। आर्यों को भारतीय प्रदेशों में औरतों की कमी महसूस हुई होगी, क्योंकि लंबी यात्रा में कुछ मृत्यु को प्राप्त हुई होंगी। नतीजतन आर्यों के कई देवता तक बगैर पत्नी के जीवन गुजारने का अभिशप्त हैं। गोरे आर्यों की काली संतानें पैदा हो रही हैं। काले ऋषियों की उस दौर में बाढ़ है।
इन्हीं बातों को लिखने के लिए मुक्तिबोध की पुस्तक "भारतः इतिहास और संस्कृति" की प्रतियां जला दी गईं। आर्य-रक्त की शुद्धता का दावा करने वाले लोगों को भारतीय संस्कृति का यह विमर्श अच्छा नहीं लगता। इससे श्रेष्ठता और शिष्टता वाला भाव जाता रहता है. वे संस्कृति को एक अत्यंत गोलमटोल अर्थ में लेना चाहते हैं। जबकि संस्कृति की अनंत परतें हैं। एक साथ कई रूपों और कई धाराओं में संस्कृति प्रवहमान होती है। इन धाराओं की आपसी टकराहट और सम्मिलन की प्रक्रिया में ही संस्कृति जीवंत बनती और संवर्धित होती चलती है। जिस संस्कृति और कौम में टक्कर और आत्मसातीकरण की प्रक्रिया नहीं चल रही होती या ठप पड़ जाती है, उसका नष्ट होना तय होता है। इतिहास-बोध से संपन्न व्यक्ति को मालूम होता है कि मानव जाति द्वारा निर्मित ऐसी कितनी ही संस्कृतियां काल के गर्भ में विलीन हो गईं, क्योंकि समय की धारा को अपने अंदर समाहित नहीं कर सकीं।
संस्कृति अपने को कई रूपों में व्यक्त करती है। परंपरा और रीति-रिवाज इनमें प्रमुख हैं। जिस तरह एक बहुलतावादी समाज में संस्कृतियों की बहुलता होती है, उसी तरह परंपरा की भी बहुलता होती है। कई परंपराएं एक ही काल में जीवित होती हैं। इनकी आपसी टकराहट से ही नवीनता का उन्मेष होता है। संस्कृति को एक निश्चित ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखने का मतलब एक स्वस्थ और समग्र दृष्टिकोण पैदा करना होता है।
यानी किसी देश या जाति की संस्कृति की अध्ययन या उसकी आलोचना प्रस्तुत करते हुए हमें मुख्य रूप से दो बातों- निरंतरता और परिवर्तन को चिन्हित करने का प्रयास करना होता है। निरंतरता और परिवर्तन की इस प्रकिया में परंपरा संस्कृति की स्मृति होती है। जिस तरह प्रत्येक राष्ट्र और जाति की अपनी स्मृति है, ठीक उसी तरह संस्कृति अपनी परंपराओं में बसती है। मनुष्य की स्मृति में सब कुछ कैद नहीं होता। बहुत कुछ छोड़ते जाते हैं और नया ग्रहण करते जाते हैं। संस्कृति भी परंपरा का त्याग करती जाती है और नवीनता का अंगीकार।
यहां इतिहास-बोध यह निर्णय देता है कि परंपरा हमेशा न तो त्याज्य है और न ही नवीनता हमेशा ग्राह्य। कालिदास जब "मालविकाग्निमित्र" में कहते हैं कि जो पुराना है वह सभी सुंदर नहीं है और न नया मात्र नया होने से ही निंद्य है, तो इसी बात को वे भिन्न तरीके से कह रहे होते हैं। यह कालिदास का इतिहासजनित विवेक ही है, जो परंपरा और नवीनता के बीच फर्क की पहचान करता है।
Saturday, January 17, 2009
संस्कृति और इतिहास-बोध- 2
Saturday, January 10, 2009
संस्कृति और इतिहास-बोध- 1

संस्कृति पर विमर्श प्रकारांतर से मानव जाति पर विमर्श है, क्योंकि इसके केंद्र में वही है। अपने व्यापकतम अर्थ में संस्कृति वह सब है, जिसका निर्माण मानव जाति ने किया है और कर रही है- श्रम के औजारों से लेकर घर-गृहस्थी की वस्तुओं तक, रीति-रिवाजों और रहन-सहन के ढंग से लेकर विज्ञान और कला, धर्म और अनीश्वरवाद, नैतिकता और दर्शन तक, केवल इतना ही कहें तो संस्कृति की हमारी अवधारणा या परिभाषा एकांगी, और साथ ही साथ भ्रामक भी होगी। इसलिए इतना भर याद रखना जरूरी है कि मानव संस्कृति का रचयिता है और साथ ही उसकी रचना भी। ऐसा करते या मानते हुए हम अपना इतिहास-बोध जाग्रत कर रहे होते हैं। यानी यह इतिहास का विवेक है जो हमें बताता है कि मानव जाति संस्कृति का केवल रचयिता ही नहीं है, बल्कि खुद उसी की निर्मिति भी। और हमारा इतिहास-बोध भी ठीक-ठीक इसी रूप में संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।
अगर संस्कृति शब्द की व्युत्पत्ति पर गौर करें तो यह संस्कृत के बहुत पास मिलेगा। संस्कृत का शाब्दिक अर्थ है शिष्ट और सभ्य। जो शिष्ट या सभ्य नहीं है, प्राकृत है, जंगली है। बर्बरता संस्कृति की परिधि से बाहर की चीज है। जंगल-युग हमारी संस्कृति का पोषक नहीं, क्योंकि इस लिहाज से यह विकास की एक खास अवस्था को पार कर शुरू और निर्मित होती है। संस्कृत शब्द में संस्कार, संशोधन या परिष्कार का भाव जुड़ा हुआ है। एक दूसरे तरीके से कहें तो अलगाव का भाव जन्म ले रहा है। संस्कृत को प्राकृत से अलग करने की मुहिम शुरू हो चुकी है। भाषा के क्षेत्र में भी इसके गणित बिठाए जा रहे हैं। संस्कृत सिर्फ शिष्ट और सभ्य लोगों की भाषा बनी।
लोग अक्सर कहते पाए जाते हैं कि संस्कृत नाटकों में शूद्र और स्त्री प्राकृत भाषा का व्यवहार करते हैं। संस्कृत केवल संभ्रांत वर्ग के लोग ही बोल पाते थे। वे इसका हवाला भर देकर शात हो लेते हैं। वे कभी नहीं कहते कि निम्न वर्ण और स्त्रियों के लिए संस्कृत भाषा का व्यवहार सिद्धांत रूप में भी वर्जित था। नाट्यशास्त्र का लेखक भरत मुनि इसका प्रमुख सिद्धांतकार है। भारत के इतिहास में यह वह काल है जब वर्चस्व की संस्कृति पैदा हो रही थी।
यहां हम यह भी कह सकते हैं कि संस्कृत में वर्चस्व का भाव रहा है। वरना जिस देश में कुत्ता, सियार और हाथियों तक के लिए संस्कृत संबोधन है, वहां मनुष्य जाति के एक बड़े वर्ग को संस्कृत बोलने से क्यों कर रोका जा रहा है? आज भी महावत हाथी के साथ गच्छ, तिष्ठ जैसे संस्कृत शब्दों के ही सहारे संवाद कायम करता है। आज भी हमारे कुत्तों के नाम भले अंग्रेजी ढर्रे पर रखे जाने लगे हों, उनके संबोधन में उच्चारित शब्द अत्तु संस्कृत का ही है। संस्कृत भाषा के जानकार जानते हैं कि यह आदरार्थ प्रयुक्त है। यानी आदर (सम्मान) में कहा गया शब्द, जिसका भाषिक अर्थ है- "आइए खाइए।"
Friday, December 26, 2008
धर्मनिरपेक्षता के अंतर्विरोध- 4
धर्म प्रगतिशील हो ही नहीं सकता...

भारत में मार्क्सवादियों को गुमान रहा है कि धर्मनिरपेक्षता की ध्वजा के असली वाहक वे ही हैं। इनके यहां धर्मनिरपेक्षता की "सर्वधर्म समभाव" की अवधारणा के विपरीत अवधारणा है, जिसमें "धर्म जनता के लिए अफीम है।" धर्म को "अछूत" मान कर मार्क्सवादियों ने अपने को सेक्युलर साबित करने की भयंकर कोशिश की। उनके लिए धर्म सेक्युलरिज्म के रास्ते में बाधा थी। धर्म के विरोध के नाम पर उन्होंने जनता का ही विरोध करना शुरू कर दिया। नतीजतन, जनता का इनसे संवाद खत्म हो गया।
सोवियत संघ में आए संकट के बाद "बुद्धिवादी" मार्क्सवादियों के बीच धर्म की भूमिका को लेकर एक गंभीर बहस छिड़ी। अब उनका जोर धर्म के दूसरे पहलू पर है- यानी धर्म की प्रगतिशील भूमिका अब इनके लिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गई है। दुर्भाग्य की बात है कि इस बार भी मार्क्सवादियों ने धर्म के सिर्फ आधे-अधूरे यथार्थ को ही पकड़ा।
धर्म की प्रगतिशील भूमिका से किसी को भला को क्यों एतराज हो सकता है। हमें भी नहीं है। लेकिन रोना तो सिर्फ इस बात का है कि प्रगतिशीलता के नशे में चूर होकर उन अंतर्विरोधों की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता जो सीधे तौर पर धर्म के अपने निजी अंतर्विरोध के कुफल हैं। धर्मनिरपेक्षता की बात करते वक्त हमें धर्म की आंतरिक संरचना पर एक बार गंभीरता के साथ ध्यान देना होगा, वरना एक बार फिर हम सारे मार्क्सवादी अपनी राय को अत्यंत सरलीकृत ढंग से पेश करने के लिए दोषी माने जाएंगे।
वामपंथियों की धर्म के बारे में जो राय थी, यानी "धर्म अफीम है", निष्कर्ष के तौर पर काफी सही थी। दोष सिर्फ विश्लेषण की पद्धति का था, जिससे हम आज भी बच नहीं पाए हैं। वही निष्कर्ष आज भी सही है। इसलिए धर्म के सिर्फ प्रगतिशील पक्ष पर ध्यान केंद्रित करना आसन्न खतरे को और नजदीक ले आना होगा, क्योंकि धर्म को आधार बना कर धर्म निरपेक्षता की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती।
धर्मनिरपेक्षता के लिए हमें धर्म के खिलाफ लड़ना ही होगा। इस खतरे के साथ कि संभव है, जनता से हमारा संवाद बंद हो जाए। संवाद को निरंतर कायम रखने के लिए उनके पास धर्म के अलावे और भी कई दुखती रगें हैं, जिन पर उंगलियां रखी जा सकती हैं। धर्म को राजनीति के साथ जोड़ने का स्वाद हम देश के विभाजन के रूप में चख चुके हैं। अब और इसे लंबा ले जाने की ताकत हममें नहीं रही।
Monday, December 22, 2008
धर्मनिरपेक्षता के अंतर्विरोध- 3
धर्म विरुद्ध ये सारे काम करने पर भी पेट न भरे और उनके प्राणों पर आ बने तो अगर ब्राह्मण जहां भी जो अन्न मिले उसे खा लें, उसे पाप न होगा। हिंदू धर्मनिरपेक्षता का यह सबसे जबर्दस्त अंतर्विरोध है, जिसे अनदेखा कर हम सिर्फ प्रगतिशील परंपरा के नाम पर धर्मनिरपेक्षता के मूल्य का खून करना चाहते हैं। इन तथ्यों को क्या आप धर्मनिरपेक्षता के खांचों में सही-सही बिठा सकते है?
Wednesday, December 17, 2008
धर्मनिरपेक्षता के अंतर्विरोध- 2
इतिहास और संस्कृति के क्षेत्र में धर्म और राजनीति के अंतर्संबंध को लेकर काफी कुछ लिखा गया है। परंपरावादी चिंतन यह है कि गांधीजी ने धर्म को राजनीति से जोड़ कर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक महत्त्वपूर्ण आधार दिया। धर्म का व्यापक इस्तेमाल करने के बाद भी स्वतंत्रता आंदोलन का चरित्र "सेक्युलर" या धर्मनिरपेक्ष ही रहा। भारतीय राष्ट्रवाद के निर्माण में धर्म की भूमिका को कम करके नहीं देखा जा सकता। लेकिन सवाल है कि इन तथ्यों ने आपस में मिल कर जिस राष्ट्रवाद का निर्माण किया, उसकी वस्तुस्थिति क्या रही।यों राष्ट्रवाद अपने आप में अत्यंत सुंदर और धर्मनिरपेक्ष मूल्य जैसा लगता है। लेकिन यहां हम साफ तौर पर कहना चाहेंगे कि अपने राष्ट्रवाद को बहुत हद तक प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष कहना एक चुनौतीपूर्ण काम है। भारत में राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता दोनों जुड़वा भाई हैं। समान गुण वाले। समानधर्मा। इसलिए भारत के संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता पर बात करते वक्त एक बार अपने राष्ट्रवाद को चुनौती देना आवश्यक-सा लगता है। लगता है कि सांप्रदायिकता राष्ट्रवाद की एक अपरिपक्व धारा है और राष्ट्रवाद सांप्रदायिकता का ही एक "ब्यूटीफायड" नाम है।
राष्ट्रीय आंदोलन के पूरे इतिहास को अगर देखने की बात हो तो कहना पड़ेगा कि उसका चरित्र "सेक्युलर" कभी नहीं रहा। आजादी की लड़ाई के साथ-साथ बढ़ता हुआ अलगाववाद उसी गांधीयुगीन राजनीति की देन था, जिसमें हिंदू धर्म को आंदोलन की जान माना जाता था। जो लोग धर्म की केवल प्रगतिशील भूमिका देखने के आदी हैं, वे इतिहास में दरअसल, अत्यंत सरलीकृत भाव प्रस्तुत करेंगे। उन्हें उनकी ओर भी ध्यान देना चाहिए जो सीधे तौर पर धर्म के अपने निजी अंतर्विरोध के कुफल थे।
हमारी धर्मनिरपेक्षता की असली कमजोरी है कि इन मूल्यों की तलाश हम सिर्फ हिंदू धर्म तक ही कर पाते हैं। अपनी परंपरा का गुणगान करते हैं, वहीं दूसरे धर्म की अच्छी और प्रगतिशील तत्त्वों की अनदेखी कर देते हैं और बिल्कुल ही सहजतापूर्वक यह मान लेते हैं कि उसके अंदर बहस के सारे रास्ते बंद हो गए हैं या कि वे कठमुल्लावाद के शिकार हैं।
कुछ बुद्धिजीवियों की एक शाश्वत चिंता रही है कि -इस्लाम के अंदर बहस नहीं होती, हमें छेड़नी चाहिए। धर्मनिरपेक्षता की यह नई कौन-सी परिभाषा हो गई कि खुलेपन के नाम पर दूसरे धर्मावलंबियों के छेड़ें? ऐसे बुद्धिजीवियों को मालूम होना चाहिए कि इस्लाम के अंदर भी बहस हुई है। बल्कि कई बार तो
दमदार बहस हुई है। बगैर किसी बहस के इस्लाम के अंदर इतनी सारी दर्शन पद्धतियां क्यों कर विकसित होती? उस दार्शनिक चिंतन को हम बहस नहीं मानते, क्योंकि हमारी बहस के मूल में तो उसे राष्ट्रद्रोही साबित करना है। उन्हीं तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोगों की भाषा में कहें, तो क्या "हिंदू धर्मनिरपेक्षता" और "हिंदू धर्म का जनतंत्र" इस्लाम को छोड़ने की इजाजत उसे देता है?
Sunday, December 14, 2008
दूज का चाँद था
और बर्फ-सी चमचम
सफेद दरांती की तरह
उतर आया
पूरे जिस्म में
जाना
दूज का चाँद था।