Wednesday, September 9, 2026

आधुनिक भारत में शिक्षा, विदेश-यात्रा एवं जाति-बिरादरी

18वीं-19वीं शताब्दी का भारत कथित नवजागरण का है। इस नवजागरण में विदेशी शिक्षा का प्रमुख हाथ था। इसलिए उन दिनों विलायत जाने वालों को लेकर एक प्रबल आंदोलन उठ खड़ा हुआ था। समाज के कट्टर और रूढ़िवादी लोग विदेश-यात्रा के विरोधी थे। भारतेन्दु हिन्दी के और नवजागरण के प्रतिनिधि लेखक थे इसलिए वे विदेश यात्रा के पक्षधर थे। उनकी रचनाओं में भी यह पक्षधरता दिखती है। (रामविलास शर्मा, भारतेन्दु युग और हिन्दी भाषा की विकास-परम्परा, राजकमल प्रकाशन, 1975, पृष्ठ 40) भारतेन्दु ने 'विदेश-यात्रा-विचार' लिखकर विदेश-यात्रा को अपना समर्थन दिया था। (बनारसीदास चतुर्वेदी, संस्मरण, भारतीय ज्ञानपीठ, काशी, 1952, पृष्ठ 34) विलायत-यात्रा पर आपकी सम्मति थी कि-

'रोकि विलायत-गमन कूपमंडूक बनायो।

औरन को संसर्ग छोड़ाइ प्रचार घटायो।।' (ब्रजरत्नदास, भारतेन्दु, पृष्ठ 92)

मोहनदास करमचंद गांधी की लालसा डॉक्टरी पढ़ने की थी किन्तु उनकी यह मुराद पूरी न हो सकी क्योंकि यह उनके पिता को पसंद नहीं थी। उनकी राय थी कि 'वैष्णवों को हाड़-मांस नोचने का काम नहीं करना चाहिए'। (गाँधीजी, आत्मकथा, सस्ता साहित्य मंडल, 1984, पृष्ठ 46)

पुनः 1887 में जब मोहनदास मैट्रिकुलेशन की परीक्षा पास कर आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड रवाना होने लगे तो बिरादरी के लोगों में 'खलबली' मच गई। मोहनदास को बिरादरी-पंचायत में हाजिर होने का हुक्म हुआ। बिरादरी के सरपंच (जिनसे दूर की कोई रिश्तेदारी भी थी) ने उनसे कहा, 'बिरादरी समझती है कि तुम्हारा विलायत जाने का विचार ठीक नहीं है। हमारे धर्म में समुद्र-यात्रा की मनाही है। फिर, हम यह भी सुनते हैं कि विलायत में धर्म की रक्षा नहीं हो सकती। वहां साहबों के साथ खाना-पीना पड़ता है।' (आत्मकथा, पृष्ठ 49) बिरादरी की बात अनसुनी करने पर मुखिया ने अपना फैसला सुनाया-'यह लड़का आज से बिरादरी से बाहर माना जायगा। जो कोई इसे मदद देगा या बिदा करने जायगा, बिरादरी उससे जवाब तलब करेगी और उसपर सवा रुपया जुर्माना होगा।' (वही, पृष्ठ 50)

मोहनदास के विलायत से लौट आने तक बिरादरी में जाति-बहिष्कार का मसला जीवित था। बिरादरी दो दल में बंट चुकी थी। एक पक्ष के लोगों ने मोहनदास की बिरादरी-वापसी का स्वागत किया। 'बिरादरी में मिलनेवाले पक्ष के संतोष के लिए राजकोट ले जाने के पहले भाई मुझे नासिक ले गये। वहां गंगास्नान कराया और राजकोट पहुँचकर बिरादरी-भोज किया।' (वही, पृष्ठ 95)

उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में विलायत से पढ़कर लौटनेवाले प्रथम बिहारी कायस्थ (दूसरे पढ़ते ही कहाँ थे!) सच्चिदानंद सिन्हा थे। उन्होंने तत्कालीन प्रचलित लोकरीति 'प्रायश्चित्त-भोज' करके फिर पुराने तरीके से जाति के बंधन को मानना स्वीकार नहीं किया था जिससे वह जाति में नहीं लिये गये थे। (डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद, आत्मकथा, सस्ता साहित्य मंडल, 2002, पृष्ठ 81) कहने की आवश्यकता नहीं कि मि. सिन्हा के लौटने के दस वर्षों बाद तक किसी की हिम्मत उस बंधन को तोड़कर विदेश जाने की नहीं हुई थी। (वही, पृष्ठ 81) 

मि. सिन्हा के बाद सन 1904 में डॉक्टर गणेशप्रसाद विलायत से पढ़कर लौट रहे थे। उनके लौटने की खबर ही से आंदोलन का माहौल बन गया। डॉक्टर गणेशप्रसाद के पहुंचने से पहले ही लिखा-पढ़ी करके तय हो चुका था कि वह जाति-बंधन को मानेंगे। (वही, पृष्ठ 81) सुधारक दल के नेता बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद ने कुछ लोगों को तैयार किया था कि डॉक्टर गणेश के घर चलकर भोज में शरीक होना चाहिए। बलिया में भोज का दिन मुकर्रर हुआ। भोज में शामिल होनेवाले छपरा के बीस-इक्कीस लोगों में राजेन्द्र प्रसाद भी दोनों भाई थे। जिन लोगों ने भोज में शिरकत की थी, उनके नाम अखबारों में छपे और छपरे में यह मांग जोर पकड़ने लगी कि वैसे लोग जाति-बहिष्कृत कर दिये जायँ। (वही, पृष्ठ 83) समुद्र-यात्रा के विरुद्ध काशी से महामहोपाध्याय शिवकुमार शास्त्री की व्यवस्था मंगाई गई। जिले के कायस्थों का सम्मेलन हुआ कि और प्रस्ताव पास किया गया कि 'जितने लोगों ने भोज खाया था, वे जाति-च्युत किये गये'। (वही, पृष्ठ 85) उनके साथ खान-पान, शादी-विवाह सब बन्द कर दिया गया। राजेन्द्र प्रसाद के पिताजी ने तो गाँव-बिरादरी के लोगों को भोज खिला प्रायश्चित्त कर लिया उन्हीं के ग्रामीण जमुनाप्रसाद और गंगाप्रसाद, जो बलिया भोज में शरीक हुए थे, काफी कष्ट उठाना पड़ा। छपरे में "उनके 'मेस' के लड़के उनका छुआ हुआ नहीं लेते थे-उनके साथ खान-पान भी नहीं करते थे। ब्राह्मण रसोई बनाकर उनके बर्तन में अलग से भोजन दे देता। उन्होंने इस अपमान को 'खुशी-खुशी' बर्दाश्त किया।" (वही, पृष्ठ 87)

1907 ईस्वी में गया के बाबू परमेश्वरलाल कायस्थ अम्बष्ट विलायत जाकर तीन साल बाद घर लौटे। "उनके शुभागमन से कायस्थ समाज में शंका उठने लगी कि उनके साथ समाज को कैसा व्यवहार करना चाहिये।" (रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 268) इसका फैसला करने के लिए काशी और मिथिला के पंडितों की एक सभा हुई। उस सभा ने जो व्यवस्था दी, उसे कुछ अन्य सामग्री के साथ 1908 ईस्वी में राय हरप्रसाद लाल ने प्रकाशित किया। व्यवस्था का सारांश है : "ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, सच्छूद्र इनमें कोई विलायत जाय व वहाँ रह कर फिर अपने देश में प्रायश्चित करे तो भी वह अपने जाति के व्यवहार में ग्रहण करने योग्य नहीं हो सकता।" (रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 269 में उद्धृत)

30 अगस्त, 1910 ईस्वी को बनारस के टाउन-हॉल में विलायत से लौटे लोगों को जाति में लेने के लिए एक सभा आयोजित हुई थी जिसके सभापति पंडित सुधाकर द्विवेदी थे। उन्होंने धर्मशास्त्र को छोड़कर परम्परा का उदाहरण देते हुए कहा : "प्राचीन समय से विदेश-यात्रा की प्रथा आती है। जब राजा लोग राजसूय यज्ञ करते थे तब दिग्विजय के हेतु सभी देशों में जाना पड़ता था, क्या वे अयोध्या का जल साथ ले जाया करते थे।" (रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 40 में उद्धृत)

राजेंद्र प्रसाद जब अपनी पढ़ाई के सिलसिले में कलकत्ता पहुंचे-"जाति-पांति का झगड़ा इतना साथ लेते गये थे कि हिन्दू होस्टल में हमने अपने लिए अलग चौका रखा था, जिसमें बिहारी ब्राह्मण रसोई बनाता था। यद्यपि मैं डाक्टर गणेश प्रसाद के साथ भोज में शरीक हुआ था, तथापि जाति का बंधन बहुत मानता था। वह तो मेरी अपनी जाति के आदमी (कायस्थ) थे; किसी भी दूसरी जाति के आदमी का छुआ हुआ कोई अन्न, जो अपने देश (बिहार) में नहीं खाया जाता है, वहां नहीं खाया। इतने दिनों तक वहां रहा, मगर बंगाली 'मेस' में कच्ची रसोई एक दिन भी नहीं खाई।" (आत्मकथा, पृष्ठ 100)

काशी प्रसाद जायसवाल अपनी पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जाते समय ब्राह्मण रसोइया भी साथ लेते गये थे। जब तक वहां रहे, खाने-पीने का सामान भारत ही से जाता रहा। इसमें ईंधन के लिए कोयला भी शामिल समझिए! ('हिन्दू पॉलिटी' में गदाधर प्रसाद अम्बष्ठ की भूमिका देखें)

समुद्री यात्रा के बारे में पंडित तोताराम सनाढ्य का यह दिलचस्प संस्मरण पढ़िए : 'मेरे घर के पास फिजी टापू में एक गुलजारी नाम का कान्यकुब्ज ब्राह्मण रहता था । उसने बड़े परिश्रम से आठ वर्ष में लगभग तीन सौ रुपए इकट्ठे किए। इसको ब्राह्मण जानकर सब लोग प्रायः महीने की पूर्णमासी को सीधा दे दिया करते थे। भारतवर्ष में कन्नौज के रहनेवाले थे। इनके घर से इनके भाई ने पत्र भेजा, उसमें लिखा था कि तुम चले आओ। इस साल में तुम देश को नहीं आओगे तो तुमको एक सौ एक गौ मारने का पाप लगेगा। गुलजारी लाल ने भाई की लिखी जब ऐसी शपथ देखी तब ब्राह्मण धर्म सोचकर वे देश को चले आए। चलते समय इनको लोगों ने कुछ और दक्षिणा दी। जब ये अपने घर आए तो दूसरे घर में ठहराए गए। रुपया-पैसा सब भाई को सौंप दिया। तीन-चार दिन बाद पुरोहितजी बुलाए गए। ये महाशय कानून की पुस्तक साथ लेकर आए। गाँव के बड़े-बूढ़े सब मिलकर बैठे। समुद्र यात्रा पर विचार हुआ। गुलजारी ने घर से निकलने से लेकर फिजी में पहुँचने तक जहाज का खाना-पीना बयान किया। फैसले में सब तीर्थ बताए गए। भागवत सुनने को बताया गया। लगभग पाँच या छः गाँव का भोज बताया, कोई सात सौ या आठ सौ रुपया खर्च करने का फैसला दिया गया। गुलजारी ने खर्च करने के लिए भाई से अपने दिए हुए रुपए माँगे, भाई ने कोरा जवाब दिया, जातिवालों ने अलग कर दिया। गुलजारी के साथ गाँववाले बड़ी घृणा करने लगे, भाई लोग कट्टर शत्रु हो गए। बोले कि तुमने हम लोगों से कुछ रुपया छिपा लिया है, वही खर्च करो। यह रुपया हम न देंगे। लाचार गुलजारी ने फिजी में अपने इष्ट मित्रों को कष्ट- कहानी की चिट्ठी भेजी और लिखा कि कसाई के हाथ से गाय छुड़ाने के समान मुझे बचाकर पुण्य के भागी हो। वहाँ से चन्दा करके छः सौ रुपया लोगों ने भेजा, तब गुलजारी 1914 ई. में फिजी पहुँचे।' (तोताराम सनाढ्य, फिजी द्वीप में मेरे 21 वर्ष, पृष्ठ 33-34; श्रीकांत, बिहार में सामाजिक परिवर्तन, वाणी प्रकाशन, 2001, पृ. 43-44 में उद्धृत) इसी तरह कितने ही लोग लौटकर फिजी गए हैं, और जाकर ईसाई और मुसलमान भी हो गए हैं। समुद्र-यात्रा की दफा में मुजरिम होकर हमारे बहुतेरे भाई मातृभूमि को अंतिम नमस्कार करके चले गए हैं और वहाँ पहुँचकर सनातन धर्म की जय बोलकर मसीह के रूल को पकड़ लिया है।' (वही)

जाति और छुआछूत का बंधन इतना कठोर था कि गैर हिंदुओं (म्लेच्छों) के लिए कथित देवभाषा संस्कृत का अध्ययन कर पाना भारत-भूमि पर भी आसान नहीं था। कहना होगा कि सर विलियम जोन्स, सुप्रीम कोर्ट के जज मुक़र्रर होकर 1783 ईस्वी में कलकत्ते आये तो उन्हें अदालती कामों के लिए संस्कृत सीखने की आवश्यकता महसूस हुई। इस काम में उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। 1907 के 'हिन्दुस्तान रिव्यू' में एस सी सान्याल के छपे एक लेख को आधार बनाकर महावीर प्रसाद द्विवेदी ने उन मुश्किलों का हाल कुछ विस्तार के साथ लिखा है। वर्णन है कि विलियम जोन्स संस्कृत-अध्ययन हेतु एक पंडित की तलाश में लगे पर एक भी ब्राह्मण वेद और शास्त्र की पवित्र संस्कृत भाषा एक यवन को सिखाने पर राजी न हुआ। सर विलियम के मित्र कृष्णनगर के महाराज शिवचंद्र ने भी बहुत कोशिश की, पर सब व्यर्थ साबित हुआ। जब विलियम ने बहुत बड़ी तनख्वाह का लालच दिया तो एक-दो पंडित तनख्वाह तय करने के निमित्त सर विलियम के यहाँ पधारे भी पर पड़ोसियों की जाति-निष्कासन की धमकी से उनका सारा साहस काफूर हो गया। फिर तो उन्होने सर विलियम के बंगले के अहाते में कदम भी नहीं रखा। कलकत्ते के पण्डितों से हारकर सर विलियम संस्कृत के प्रधान पीठ नवद्वीप गये। वहां भी उन्होंने बहुत कोशिश की परन्तु किसी ने भी उन्हें संस्कृत शिक्षा देना अंगीकार न किया। अन्त मे ब्राह्मण तो नही, वैद्य जाति के रामलोचन कवि-भूषण नामक एक संस्कृतज्ञ ने 100 रुपये महीने (पालकी की सवारी के लिए 30 रुपये अलग से) पर आपको पढ़ाना मंजूर किया। ये पण्डित अपने परिवार में निपट अकेले थे। हावड़ा के पास मलकिया में रहते थे। किसी से कुछ सरोकार न रखते थे। इसी से आपको जाति या समाज के बहिष्कार का डर न था। पण्डित महाशय वैद्यविद्या भी जानते थे। पास-पड़ोस के लोग चिकित्सा कराने आपको अक्सर बुलाते थे। कभी-कभी इनके रोगी अच्छे भी हो जाते थे। इससे इन्होंने अपने मन को समझाया कि यदि हम इस यवन को संस्कृत पढ़ायेगे तो भी हमारे टोले-महल्ले के लोग हमें न छोड़ सकेंगे। जब कोई बीमार होगा, लाचार होकर उन्हें हमीं को बुलाना पड़ेगा। इसी से इन्हें सर विलियम जोन्स को पढ़ाने का साहस हुआ।

फिर भी, कवि भूषण ने सर विलियम जोन्स के साथ बड़ी-बड़ी शर्तें की। उनके बंगले के नीचे के खण्ड का एक कमरा पढ़ाने के लिए पसन्द किया गया। उसके फ़र्श में संगमरमर बिछवाया गया। एक हिन्दू नौकर तैनात किया गया। उसका काम रोज हुगली से जल लाकर कमरे के फर्श को, और थोड़ी दूर तक दीवारों को भी, धोना मुकर्रर हुआ। दो-चार लकड़ी की कुरसियों और एक लकड़ी के मेज़ के सिवा और सब चीजें उम कमरे से हटा दी गई। ये चीजें भी रोज धोई जाने लगी। शिक्षा-दान के लिए सवेरे की बेला नियत हुई। पढ़ने के कमरे में कदम रखने के पहले सर विलियम को हुक्म हुआ कि एक प्याला चाय के सिवा न कुछ खायें, न पिये। कवि भूषणजी की यह भी आज्ञा हुई कि गो-मांस, वृष-मांस, शूकर-मांस का मकान में प्रवेश निषिद्ध हो। साथ ही, एक कमरा पण्डितजी को कपड़े पहनने के लिए दिया गया। उसे भी रोज धोये जाने की व्यवस्था हुई। पण्डित जी ने दो जोड़े कपड़े रखे। एक जोड़ा इस कमरे में रखा गया। रोज प्रातःकाल जिस कपड़े को पहनकर आप साहब के यहाँ आते थे उसे इस कमरे में रख देते थे और कमरे में रखा हुआ जोड़ा पहनकर आप पढ़ाते थे। पुनः चलते समय उसे बदलकर घर वाला जोड़ा पहन लेते थे। (भारत यायावर, महावीरप्रसाद द्विवेदी रचनावली, भाग 4, पृष्ठ 47-50)

Tuesday, September 8, 2026

स्त्री, मायका और कउआ

मोबाइल और नेट क्रांति ने औरतों की दुनिया को असीम विस्तार दिया है। घर की चहारदीवारी में कैद स्त्री अब अपनी सुबह की शुरुआत नेट की खिड़की से झांकती हुई करती है। एक समय था जब घर की खिड़की से औरतों का झांकना और आँगन में औरतों का हंसना भी गुनाह माना जाता था। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने अपने घर की औरतों की दारुण दशा का बयान किया है कि उनकी भौजाई जीरादेई में एक कमरे में रहती थीं। कभी ओसारे में भी निकलने की इजाजत नहीं थी। (आत्मकथा, सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2002, पृष्ठ 46) जब तक राजेंद्र प्रसाद की माँ जीवित रहीं तब तक न तो उनकी भौजाई और न उनकी स्त्री ही कभी अपने कमरे से निकलकर आजादी के साथ आंगन में घूम-फिर सकीं या बैठ सकीं। (पृष्ठ 47)

घोर एकांत के इन क्षणों में स्त्री अगर कउआ और मैना से अपने संबंध जोड़ती है तो क्या आश्चर्य! तब स्त्रियों के हिस्से में चिट्ठियां भी बहुत कम ही पड़ती थीं। भरे-पूरे गांव में कोई-कोई स्त्री ही चिट्ठियां पढ़ना-लिखना जानतीं। इन चिट्ठियों को पढ़ना स्त्रियों का दुःख बांचना था। जिनके घर ये चिट्ठियां तक नदारद होतीं उनके हिस्से का दुःख खपड़ैल छत की मुंडेर पर बैठ कौवे बांच जाते। एक हारी हुई स्त्री को कौवे ही तब ढाढ़स बंधाते। स्त्री को कौवे की पहचान होती कि कौन उसके मायके से है और कौन उसकी ससुराल से। मायके का कउआ देखते ही स्त्री रोटी या किसी पकवान (पक्वान्न) का टुकड़ा हवा में उछाल देती और 'एक स्त्री का दुःख' समझ कउआ उसे निगल जाता, ठीक जैसे शंकर ने हलाहल गटक लिया था। ये कौवे स्त्री जाति के लिए किसी शंकर से कम नहीं थे।

मिथिला वाले इतना मीठा बोलते हैं कि कर्कश काग, कउआ का क्या काम! वहाँ के लोग उन्हें क्रूर मान उनसे नफरत करते हैं। उनकी इस क्रूरता से चाणक्य को भी खासी परेशानी थी इसलिए उन्होंने इसे पक्षियों में चांडाल कहा है। (रामइकबाल सिंह 'राकेश', मैथिली लोकगीत) इस क्रूरता के बावजूद उत्तरी बिहार के एक लोकगीत में एक विरहिणी के अंतस्तल से करुण आवाज आती है-'कागा सब तन खाइयो, चुन चुन खइयो मास,/दो नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस।/कागा नैन निकास दूँ, पिया पास ले जाय,/पहिले दरस दिखाइ कै, पीछे लीजौ खाय।' (रामइकबाल सिंह राकेश, वही) एक मैथिल लोकगीत में विरहिणी ने गाया है, 'रे काग, तू नित्य यही बोल कि मेरे प्रियतम आयेंगे। यदि आज मेरे प्राणनाथ मेरे उर-आँगन में आये तो कनक-कटोरे में खीर और पकवान भरकर मैं तुझे खाने को दूँगी। सोने में तेरी चोंच संवारूंगी, और तेरे चरण मढ़ाऊंगी। आगे कहती है कि मेरी बाईं आँख फड़क रही है और दाईं आँख रोती है। उन्हीं आंखों से तुझे नित्य निहारूँगी, और पहले से भी दूने प्रेम से तेरा प्रतिपाल करूँगी। फिर कहती है, रे काग, तू भगवान श्रीकृष्ण की तरह मन को हरनेवाला है। तेरी बोली अत्यंत मीठी है। आज मेरी सारी अभिलाषाएं पूरी हो गईं।' (रामइकबाल सिह राकेश, वही)

अपभ्रंश साहित्य में एक प्रसंग है कि विरहिणी ग्राम-वधू काक के शकुन पर अब विश्वास नहीं करती। सुनते-सुनते कान पक गए, पर प्रिय का आना नहीं हुआ और यह काग है कि बोलता ही जा रहा है। उसने इस मिथ्याभाषी काग को हाथ उठाकर उड़ाना चाहा। विरह के मारे दुबली हुई कलाइयों से चूड़ी निकलकर पृथ्वी पर गिरी लेकिन कागा की बात ठीक ही थी। अचानक प्रिय दिख गया। आधी चूड़ियां धरती पर गिर गई थीं। पर सहसा प्रियदर्शन से खुशी की लहर दौड़ी, दुबली कलाई फूलकर मोटी हुई, आधी चूड़ियां तड़ाक से टूट बिखरीं-'वायस उडावंतिए पिअ दिट्ठइ सहसत्ति।। अद्धा वलअ महिहिंगअ अद्धा फुट्ट तड़त्ति।।' (हजारी प्रसाद द्विवेदी, मध्यकालीन बोध का स्वरूप, पृष्ठ 117-18 में उद्धृत)

काग और कउआ जीवन के आगामी वृत्तांत बतलाने में भी निपुण माने गये हैं। बाबा तुलसीदास तक ने इस विद्या को पढ़ने की कोशिश की है। 'रामचरितमानस' में वर्णन है कि ननिहाल से अयोध्या लौटने के क्रम में भरत जी जब नगर में प्रवेश करते हैं तो गलत जगह बैठे कौओं का बोलना अपशकुन हो गया-'असगुन होहिं नगर पैठारा।/रटहिं कुभाँति कुखेत करारा।।' (रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, गीता प्रेस, पृष्ठ 431) कागा अगर दाहिनी ओर खेत में शोभायमान हो तो समझिए कि सब मंगल है-'दाहिन काग सुखेत सुहावा'। (वही) ऐसा प्रतीत होता है कि भविष्यवाणी कहने के वांछनीय गुण से प्रेरित होकर ही कुल-ललनाओं ने अपने कोमल हृदय में इन्हें स्थान दिया है। जायसी ने भी अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'पद्मावत' में नागमती के विलाप में काग को स्मरण किया है-'होइ खर बान विरह तनु लागा,/जो पिऊ आवै उड़ै तो कागा।' (रामइकबाल सिंह 'राकेश', मैथिली लोकगीत)

पुरुष के जीवन में न कउआ का मान रहा न स्त्री का। बचपन से सुनता आ रहा हूँ कि 'एक स्त्री के लिए मायके का कउआ तक प्यारा होता है'। एक पत्नी ने अपने मायके के शहर से आनेवाले कवि की तारीफ क्या कर दी कि पति ने उक्त कवि को कउआ ही घोषित कर दिया। कहा, औरत को मायके का कउआ भी अच्छा लगता है। स्त्री से संबंधित हर चीज पुरुष की नजर में ओछी है चाहे वह कउआ हो या मायका। 

किसी औरत को बहुत दिनों पर कहीं कोई नैहर की स्त्री, कोई सखी या कोई रिश्ते की औरत मिल जाय, तो वह जार-बेजार रोने लगेगी। यह उनके आदर-सत्कार का ढंग है। न रोए तो शिकायत हो। अगर कोई लड़की नैहर के किसी व्यक्ति को देखकर न रोए, तो मतलब यह हुआ कि ससुराल में वह खूब सुखी है-औरत के लिए यह एक बड़ी शर्मनाक बात है। (विभूतिभूषण वंद्योपाध्याय, आरण्यक (हिंदी अनुवाद : हंसकुमार तिवारी), साहित्य अकादमी, दिल्ली, 1957, पृष्ठ 66) स्त्री के लिए सुखी दिखना भी गुनाह है। दुख ही जीवन की कथा रही...।

परभुजी के मैया हे बेदरदी......

बचपन से पढ़ता-सुनता आ रहा हूँ कि गौतम बुद्ध का जन्म कपिलवस्तु के लुम्बिनी वन में हुआ था, किन्तु कभी ठहरकर विचार नहीं कर सका कि बुद्ध का जन्म आखिर वन में क्यों हुआ? आज सासुमाता से बात करते अचानक ध्यान आया कि गर्भावस्था में स्त्रियों का मायके जाना हमारी परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहा है। गौतम की माता की मायके जानेवाली बात मैंने पढ़ रखी थी। बौद्ध ग्रंथों में जिक्र है कि गर्भ धारण किए जब दस मास होने को आए तो रानी महामाया ने अपने मायके जाने की इच्छा प्रकट की। राजा की अनुमति मिलने पर देवी महामाया मायके जाने की सुखद कल्पना से अत्यंत प्रसन्न हो गईं। देवी ने मंगल वेला/शुभ मुहूर्त में राज कुलोत्पन्न मनोज्ञ सुंदरियों, कुलांगनाओं और देवस्वरूप राजपुरुषों के साथ राजकीय शोभा के बीच देवदह के लिए प्रस्थान किया। देवदह और कपिलवस्तु के बीच लुम्बिनी की भूमि थी। इस भूमि पर देवदह और कपिलवस्तु दोनों ओर के लोगों की समान ममता थी। यहां पहुंचते ही देवी को अकस्मात प्रसव वेदना हुई। देवी का संकेत पाकर लोगों ने वहां की भूमि को वस्त्र वितान से घेर दिया। तभी बच्चे ने माता के गर्भ का त्याग किया।

स्त्रियों की आदिम इच्छा है कि प्रसव के दौरान वह और कहीं नहीं, बस अपने मायके में हो। उस्की यह चाह उनके द्वारा रचित गीतों में भी अभिव्यक्त हुई है। एक गर्भवती स्त्री पतिगृह आने से दुखी है। सोचती है कि शादी के बाद भी अगर अपनी माँ के घर रहती, तो मेरे दुख को मेरी मां अपने अथक परिश्रम और सेवा-शुश्रूषा से कम कर देती, जबकि उसे अपनी सास के व्यवहार से दुःख है : "अपन मैया रहतिऐ, दरदियो हरी लेतिऐ हो लाल। परभुजी के मैया हे बेदरदी, दरदो नहीं हरी लिय हो लाल।।"

ससुराल गेंदाफूल

स्त्रियों का इतिहास केवल कविता, कहानी और गीत को आधार बनाकर लिखा जाना असंभव है। पहले, महिलाएं अपने मायके से रोजमर्रा की चीजें यथा शीतलपाटी, रुमाल, तकिया का खोल आदि बना-बनवाकर लाती रही हैं। उन पर कभी चित्र बने होते थे तो कभी शब्द। इनमें सिर्फ कला नहीं थी, मन का दर्द भी था। एक-एक शब्द अपने में इतिहास लपेटे होता। तब लड़कियां तकिए के खोल पर मायके के लिए 'आजादघर' लिखतीं और ससुराल के लिए 'जेलघर'। पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' ने अपनी कहानी 'आँखों में आँसू' में जैसाकि लिखा है, "पिता के घर 'सोलह वर्षों' तक लड़की की तरह रहने के अभ्यास के आगे ससुर के घर 'पतोहू' की तरह रहने का अभ्यास कारावास मालूम पड़ने लगा। जेल तो, सुना है, इतना बुरा नहीं होता। फिर, वहाँ के जीवन की अवधि होती है-साल, दो साल, दस साल। पतोहू का जेल-उफ़! उसकी कड़ी सजा की कोई अवधि नहीं।" (पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र', आँखों में आँसू', श्रेष्ठ रचनाएँ-1, पृष्ठ 75)

हिन्दी लेखकों-संपादकों से क्षमा-याचना

एक सुबह फेसबुक पर प्रियदर्शन जी की टिप्पणी थी। विषय हिन्दी लेखकों-संपादकों का ‘भाषा-ज्ञान’ था। पढ़कर कुछ पुरानी बातें याद आईं। कुछ अपनी कुछ औरों की।

20 जून, 2021 को ‘फादर्स डे’ था। ह्वाट्सऐप के अपने ‘फैमिली ग्रुप’ में लिखा, ‘‘हमारी पीढ़ी को ‘पिताजी’ अलग-अलग (पिता जी) लिखने के लिए बहुत मार लगी है। जिनको नहीं लगी, ‘पिता जी’ लिख रहे हैं!’’ साली ने मजाक किया-‘‘पुरानी पीढ़ी हो गई आपकी। वर्तनी अब सिर्फ पढ़ने की सहूलियत के लिए है। सही-गलत देखना कम कर दिया है। फेसबुक और ह्वाट्सऐप पर मानकीकरण नहीं चलता।’’ मैंने मजाक को तनिक आगे बढ़ाया। लिखा-‘‘कई साल पहले ‘युवा पीढ़ी’ के एक इतिहासकार ने किसी अभिलेखागार में बाबू वीर कुंवर सिंह से संबंधित एक फाइल में रोमन अक्षर में लिखा burhi शब्द देखा जिस पर बाबू साहब ने कभी एक लाख रुपये खर्च किए थे। ‘नयी पीढ़ी’ के इतिहासकार ने लिखा कि वीर कुंवर सिंह की बूढ़ी हो चली एक रखैल थी जिस पर उन्होंने रुपये खर्च किए। एक जमींदार के बारे में ऐसे निष्कर्ष निकालने की ‘सहूलियत’ भी थी। कुछ दिनों बाद उसी फाइल को ‘पुरानी पीढ़ी’ के एक बिहारी इतिहासकार ने देखा तो burhi को ‘बूढ़ी’ की बजाय ‘बरही’ पढ़ा। लिखा कि कुंवर सिंह ने पोते की ‘बरही’ पर लाख रुपये खर्च किए थे। यद्यपि यह किस्सा है, लेकिन ‘नयी पीढ़ी’ के लिए प्रासंगिक है!’’ एक दूसरा किस्सा भी है, लेकिन दुखद है कि यह यथार्थ है। एक बार कलकत्ते के किसी अंग्रेजी अखबार में एक खबर छपी थी कि पास के किसी जिले के अंग्रेज मजिस्ट्रेट अपने इजलास में बैठे हुए एक मुकद्दमा सुन रहे थे। उस समय मुकद्दमे वालों में से किसी ने कहा कि "इस जमीन पर चिर दिन (बहुत रोज़) से कब्जा है"। साहब ने समझा 'चिर दिन' किसी आदमी का नाम है और आपने 'चिर दिन' के हाजिर किये जाने का हुक्म दे दिया। (महावीर प्रसाद द्विवेदी, साहित्यालाप, खड्गविलास प्रेस, पटना, 1929, पृष्ठ 166)

हम भारतीय विदेशी भाषा के शब्दों का शुद्ध उच्चारण करने की कोशिश करते हैं। ‘हवेनत्सांग’ और ‘माओत्सेतुंग’ को ‘वांगच्वांग’ तथा ‘माओजेडोंग’ होते देर नहीं लगती लेकिन अंग्रेजी काल में ‘मिश्र’, ‘गुप्त’ और ‘मौर्य’ जो ‘मिश्रा’, ‘गुप्ता’, ‘मौर्या’ बना वह आज भी निर्लज्ज रूप से जारी है। गुलेरी जी ने तनिक चुटकी लेते हुए लिखा है, “गीता के दर्शनशास्त्र को निचोड डालनेवाले लेखक भी पारसीधर्म का हाल लिखते समय जरथुश्त को ’जरथुश्ता’ और अहूर-मज्द को ’अहुरामज्दा’ लिख देते हैं।“ (विश्वनाथ त्रिपाठी (सं.), हिंदी नवजागरण के अग्रदूत : चंद्रधर शर्मा ’गुलेरी’, नेशनल बुक ट्रस्ट, 1995, पृष्ठ 19)  आज ’योग’ सर्वत्र ’योगा’ बना घूम रहा है। मुझे बी एन कॉलेज के मेरे अंग्रेजी शिक्षक रमेश प्रसाद सिन्हा (अब दिवंगत) की बात याद आ रही है। उनके बच्चे किसी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते थे। एक दिन पूछा उनसे ’पापा, आप भरता जानते हैं?’ पिता ने विश्वासपूर्वक कहा, ’अरे, भरता तो हमलोग प्रायः ही खाते हैं। इसे भुरता या चोखा भी कहा जाता है और यह आलू, बैगन या करैला किसी भी चीज का बनाया जा सकता है।’ बेटे ने पिता के ‘अज्ञान’ का मजाक उड़ाते हुए कहा, ’नहीं, नहीं पापा, भरता तो रामा का यंगर ब्रदर था।’ बेटे का ’ज्ञान’ पिता के सिर के ऊपर से निकल गया। नतीजा हुआ कि मेरे अंग्रेजी शिक्षक ने बेटे का नाम अंग्रेजी स्कूल से कटवा दिया। हिन्दी अनुवादकों में भी निज भाषा को लेकर एक हीनता, उपेक्षा और अगंभीरता का भाव है। हिन्दी अनुवाद की शायद ही कोई गंभीर-से-गंभीर किताब हो (एन सी ई आर टी अपवाद है) जिसमें ‘बिपन चंद्र’ का नाम बिपिन चंद्र न लिखा हो। उच्चारणजनित कुछ भारी भूलें अंग्रेजों ने भी की हैं। ‘ठाकुर’ को ‘टैगोर’ बनाया उन्हीं का है जो आज भी बदस्तूर जारी है।

सुमित्रानन्दन पंत ने ‘सत्य’ शब्द का हमेशा स्त्रीलिंग में प्रयोग किया क्योंकि उन्हें अच्छा लगता था। निराला हमेशा ‘फूलना-फलना’ लिखते रहे। उनका तर्क था कि फलने से पहले फूलने की क्रिया होती है इसलिए फलना-फूलना लिखना अवैज्ञानिक है। लेकिन लोग उनकी सलाह की चिंता किए बगैर आज भी ‘फल-फूल’ रहे हैं। पहले ‘काठ’ से बना ‘कठघरा’ चलता था, अब ‘कटघरा’ लिख रहे हैं। ‘महारथी’ तक ‘महारती’ हो गया-किस विवेक से कहना मुश्किल है। तब बच्चों को समझाना आसान था कि ‘काठ’ से बना है इसलिए ‘कठघरा’ और ‘कई रथों’ का मालिक ‘महारथी’। अब तो राम-रावण दोनों ‘विरथी’ हैं!

निराला जी ने जानकीवल्लभ शास्त्री को लिखा कि आपने “कवितात्व“ लिखा है-कैसे सिद्ध होता है शब्द, लिखियेगा। मैं जानता हूँ, strict grammar के अनुसार व्यक्तिवाचक शब्द (को ?) भाववाचक करने के लिये “ता“, “त्व“ लगते हैं। शब्द “कवि“ व्यक्तिवाचक है, “कवित्व, कविता“ भाववाचक। कवियों ने कविता-कुमारी को personify किया हैः यह वे हर जड़ के लिए कर सकते हैं; पर आलोचक “कविता“ में भाव कैसे पैदा करता है? आप इसे असहृदय न समझियेगा। लोग सत्यता लिखते हैं; रवीन्द्रनाथ को भी लिखते मैंने पढ़ा है, पर “सत्य“ स्वयं विशेष्य है। (-विशेषण तो है ही जिसके कारण लोग “ता“ जोड़ने के आदी हैं। (निराला का पत्र (31/3/36) जानकीवल्लभ शास्त्री को; नंदकिशोर नवल, निराला रचनावली, 8) जानकीवल्लभ शास्त्री को निराला जी की सख्त हिदायत थी कि ‘आप जब तक उर्दू न पढ़ें, उर्दू के किसी शब्द के नीचे बिंदी न लगायें। न वैसा उच्चारण करें।’ इस हिदायत को आज के लेखक कहाँ माननेवाले!

लेखक पैदा करनेवाले पहले संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी थे। कैसे-कैसे लोगों को और किस विधि से उन्होंने  ’सरस्वती’ के लिए एक लेखक-समूह पैदा किया, जगजाहिर है। बाबू श्यामसुंदर दास के नाम पत्र (19/10/1923) में आचार्य द्विवेदी ने लिखा, ’मेरे समय की सरस्वती की 17 वर्ष की हस्तलिखित कापियाँ मेरे पास हैं। …उनको देखने से पता लगेगा कि आज कल के हिन्दी के अनेक धुरंधर लेखक किस तरह राह पर लाये गये थे। (बैजनाथ सिंह विनोद, द्विवेदी युग के साहित्यकारों के कुछ पत्र, हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद, 1958, पृष्ठ 48) साहित्यिक दुनिया में इन बातों को लेकर खूब हंसी-मजाक चलता था। प्रचलित है कि एक शाम के. पी. जायसवाल और दिनकर ’गप्प-शप्प’ के मूड में बैठे थे। जायसवाल जी ने शुरुआत की, ’हिंदी में केवल दोय कवि भये।’ दिनकर ने पूछा, ’वे कौन हैं भला?’ उन्होंने कहा, ’एक तो वही चंद, और दूसरा यही हरिचंद।’ दिनकर ने अकचकाकर पूछा, ’और तुलसीदास?’ वे बोले, ’अरे, तुलसिया भी कौनो कवि रहा? उसकी तो बंदरवा न सुधार देता रहा जैसे गुप्तवा की महविरवा।’ लोकश्रुति है कि तुलसीदास की अधूरी कविताओं को हनुमान जी पूर्ण कर देते थे। और इधर तो सर्वविदित ही है कि मैथिलीशरण जी की कविताओं का संशोधन पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी किया करते थे। (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, पृष्ठ 8; मैथिलीशरण गुप्त, श्रद्धांजलि संस्मरण, साकेत प्रकाशन, चिरगांव, 1979)

द्विवेदी जी रचनाओं के ऊपर काफी श्रम करते, आमूल परिवर्तन करते और कभी-कभी शीर्षक भी बदल देते। मैथिलीशरण गुप्त की पहली कविता ’शरद’ अस्वीकृत हुई, परंतु दूसरी कविता ’हेमन्त’ को उचित संशोधन और परिवर्द्धन के साथ ’सरस्वती’ में जगह मिली। दिसंबर 1913 ईस्वी में केशवप्रसाद मिश्र की ‘सुदामा’ शीर्षक लंबी तुकबंदी में उसके दोषों का निर्देश और उन्हें दूर कर कहीं अन्यत्र छपा लेने का आदेश दिया। लक्ष्मीधर वाजपेयी के ’नाना फड़नवीस’ नामक विस्तृत लेख को अत्यंत परिश्रमपूर्वक काट-छाँट के बाद सिर्फ आठ पृष्ठों में छापा। (डॉ. उदयभानु सिंह, महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनका युग, लखनऊ विश्वविद्यालय, पृष्ठ 170)

एक बार ’सरस्वती’ में कवि विशाखदत्त-प्रणीत ’मुद्राराक्षस’ नाटक पर एक लेख छपने को आया था। उसे देखकर द्विवेदी जी ने छापना स्वीकार कर लिया था। उसमें जहाँ-तहाँ पेंसिल से उन्होंने संशोधन भी किया था। लेख के अंत में पेंसिल से एक नया वाक्य लिखा हुआ था। कंपोज होने से पहले उसे देखने का अवसर उक्त लेख के लेखक को मिल गया। उन्होंने द्विवेदी जी की संपादन-पटुता की प्रशंसा कर कहा कि इस अंतिम वाक्य से लेख में सजीवता आ गई है, संशोधन से लेख की श्रीवृद्धि हुई है। (द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ, पृष्ठ 547) इसी प्रकार एक बार ’सरस्वती’ की एक कविता में, कंपोज होने से पूर्व, एक प्रसिद्ध कवि की रचना में से साढ़े तीन पद्य साफ निकाल दिए हैं और अपनी ओर से आधा पद्य जोड़कर रचना के प्रवाह को यथापूर्व कर दिया है। (वही) किन्तु जिस रचना को वे खारिज कर देते उसके ‘उद्धार’ के सारे रास्ते बंद हो जाते। मैथिलीशरण गुप्त को एक पत्र में महावीर प्रसाद द्विवेदी स्पष्ट करते हैं-“आगे से आप सरस्वती में लिखना चाहें तो इधर-उधर अपनी कविताएं छपाने का विचार छोड़ दीजिए। जिस कविता को हम चाहें, उसे छापेंगे। जिसे न चाहें उसे न कहीं दूसरी जगह छपाइए, न किसी को दिखाइए, ताले में बंद करके रखिए।“

’सरस्वती’ के संपादक होने के नाते और लेखकों की पांडुलिपियों को दुरुस्त महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सामूहिक लाभ की दृष्टि से व्याकरण विषयक अशुध्दियों के निवारण हेतु एक योजना बनाई। इस योजना को कार्यान्वित करने के लिए आचार्य द्विवेदी ने नवंबर, 1905 की सरस्वती में ’भाषा और व्याकरण’ शीर्षक एक लेख लिखा था। इस लेख में द्विवेदी जी ने भारतेन्दु हरिश्चंद्र के एक नोटिस से, राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद के विद्यांकुर 23वीं आवृत्ति से, गदाधर सिंह की एक विज्ञप्ति से, राधाचरण गोस्वामी के ’भारतेंदु’ पत्र से, तथा काशीनाथ खत्री की एक सूचना से कुछ व्याकरण विषयक अशुध्दियों का उल्लेख करते हुये एक सर्वमान्य व्याकरण बनने की अनिवार्यता घोषित की थी। (डॉ. नत्थन सिंह, बाबू बालमुकुन्द गुप्त : जीवन और साहित्य, विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा, पृष्ठ 170) इस लेख में द्विवेदी जी ने ’अनस्थिरता’ शब्द का प्रयोग किया था। बालमुकुन्द गुप्त जी ने द्विवेदी जी के ’अनस्थिरता’ शब्द के अशुद्ध प्रयोग पर आपत्ति प्रकट करते हुए उनके भाषा और व्याकरण नामक लेख की प्रत्यलोचना की थी। (डॉ. नत्थन सिंह, गद्यकार बाबू बालमुकुन्द गुप्त, पृष्ठ 168) गुप्त जी ने कहा कि ‘अनस्थिरता’ अशुद्ध है इसलिए  ‘अस्थिरता’ लिखिए!

सरदार पूर्ण सिंह के निबंधों में कहीं-कहीं व्याकरण की अशुद्धियां मिलती हैं। उदाहरण के लिए 'नमस्कार किया' के स्थान पर 'नमस्कार की' (पवित्रता), 'युवती कन्या' के स्थान पर 'युवाकन्या' (कन्यादान), 'विद्या उसने नहीं पढ़ी' के स्थान पर 'विद्या वह नहीं पढ़ा' (आचरण की सभ्यता) जैसे प्रयोग चिन्त्य हैं। इसी प्रकार इनका एक वाक्य है-'ईसा को ऐसा ही उपदेश करते हार हुई'। (पवित्रता) यहाँ 'ईसा को' के स्थान पर 'ईसा की' होना चाहिये। यथा-उच्चारण शब्द प्रयोग करने की धुन में सकता के स्थान पर 'सकता' (आधा क) का प्रयोग करते हैं। उदाहरण के लिए-'ब्रह्मचर्य अब इस अपवित्र देश में बिना माता-भक्ति के, कन्या-पूजा के, कभी भी स्थापित नहीं हो सकता (आधा क)। इस देश में क्या कहीं भी ऐसा नहीं हो सकता (आधा क)।' (पवित्रता) उच्चारण संबंधी कुछ त्रुटियां तो फ़ारसी लिपि में लिखने की वजह से भी हुई होंगी। सरदार पूर्ण सिंह प्रायः अपने निबंध फ़ारसी लिपि (उर्दू लिपि) में लिखते थे। पत्रिकाओं के संपादक उनका नागरी में लिप्यंतरण कराते थे। (रामचन्द्र तिवारी, भारतीय साहित्य के निर्माता : अध्यापक सरदार पूर्ण सिंह, साहित्य अकादमी, 1998, पृष्ठ 59)

पद्मसिंह शर्मा ने महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पत्र में लिखा था, ’आजकल के संपादकों के संपादन से जब आपके संपादन की तुलना करता हूँ तो अंतरम् महदन्तरम् प्रतीत होता है। एक बार आपने स्वामी सत्यदेव के प्रसंग में कहा था कि कच्चा माल मांगकर उसे व्यवहारोपयुक्त बनाना पड़ता है। बात बिल्कुल ठीक थी। आजकल तो हिन्दी के अनेक संपादक कच्चे माल में भी कूड़ा-करकट मिलाकर उसे भद्दा बना देते हैं। शब्द-शुद्धि की ओर तो ध्यान नहीं देते, या ज्ञान ही नहीं रखते। (पद्मसिंह शर्मा के पत्र, आत्माराम एन्ड संस, 1956, पृष्ठ 221)


नई पीढ़ी के लेखकों-संपादकों से केवल क्षमा-याचना!

वाचिक परंपरा के निहितार्थ

बीसवीं-इक्कीसवीं शताब्दी में, जहां लिखित शब्दों की दुनिया का अपना एक अलग ही सम्मोहन है, वहां भाषा और साहित्य का एक बड़ा आलोचक/समीक्षक वाचिक परंपरा का चुनाव क्यों करता है? क्या यह ज्ञान की सामूहिकता के विरुद्ध व्यक्तिकेन्द्रित कोई राजनीति अथवा रणनीति है? आइए, जरा हम पीछे इतिहास में चलें और वहां ज्ञान के वर्चस्व की राजनीति को समझने की कोशिश करें।

अगर प्राचीन भारत का इतिहास देखें तो आधी से अधिक आबादी, अर्थात स्त्री और शूद्र को शिक्षा से दूर रखा गया। कहा गया कि इन्हें वेदपाठ आदि करने का कोई अधिकार नहीं है, ये शब्दों को बिगाड़कर कहते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि तब हम लेखनकला से परिचित नहीं थे, साहित्य/ज्ञान और ज्ञान का वर्चस्व केवल मौखिक परंपरा में जीवित और अक्षुण्ण रह सकता था। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक साहित्य/ज्ञान अपने 'अपरिवर्तित' और 'सीमित' रूप में जाय, इसके लिए अगर एक ओर भाषा में 'शुद्धता', 'उच्चारण' आदि पर एक हद तक 'अनावश्यक जोर' की आवश्यकता थी तो दूसरी ओर वाचिक/मौखिक परंपरा की अनिवार्यता और महत्ता सिद्ध करनी थी। अकारण नहीं है कि 'पुस्तक से पढ़नेवाले को निकृष्ट पाठक कहा गया है।' (पाणिनीय शिक्षा, 32) यह वह दौर था जब गुरु ही शास्त्र/टेक्स्ट हुआ करता था। प्राचीन काल में एक ही ग्रंथ के कई टेक्स्ट्स मिलने और गुरु के गोविंद होने के इस सम्भव कारण से इनकार नहीं किया जा सकता।

ज्ञान की 'मौलिकता' और 'वर्चस्व' की रक्षा का दायित्व ब्राह्मणों के पास था। उसने लोगों में डर पैदा किया कि मंत्रों के गलत उच्चारण के कुप्रभाव से यजमान को अनिष्ट भोगना पड़ सकता है। तैत्तिरीय संहिता (2/4/12/1) एवं शतपथ ब्राह्मण (1/6/3/8) त्वष्टा की एक गाथा का वर्णन है जो इस विषय में हमारी मदद कर सकता है। गाथा है कि त्वष्टा 'इंद्रशत्रु' (जिसका अर्थ है इंद्र का नाशक) शब्द का उच्चारण तत्पुरुष समास में करना चाहता था (जिसमें समास के अंतिम अंश में उदात्त स्वर लगाना चाहिए), किन्तु उसने बहुव्रीहि समास के रूप में ही (इंद्र होगा शत्रु जिसका) उच्चारण कर दिया (यहां समास के प्रथम शब्द में उदात्त स्वर आ गया) और फल उलटा हो गया अर्थात 'इंद्र के शत्रु' के स्थान पर इंद्र ही को प्रधानता मिल गई और त्वष्टा की कामना पूर्ण नहीं हो सकी। (पाणिनि 6/1/223, 6/2/1; धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 241)

हालांकि इस डर का भी एक सीमा तक ही प्रभाव रहा होगा क्योंकि पाणिनि कई तरह के उच्चारण की बात करता है। उच्चारण की इतनी गड़बड़ी थी कि कई शब्दों के स्रोत, अर्थ और निर्माण/विकास प्रक्रिया उन्हें भी अज्ञात थे। इस समस्या को दूर करने के उद्देश्य से उन्होंने एक 'व्याकरण' तैयार किया। उनके चेलों ने कुछ इतनी सख्ती से सूत्रों को लागू किया कि इस व्याकरण से इधर-उधर होने का मतलब 'अपाणिनीय' अर्थात अशुद्ध/गलत होना था, ये और बात है कि भाषा की नदी में आई बाढ़ को व्याकरण का बांध कब रोक पाया है!

Monday, September 7, 2026

जनपद-संस्कृति-कोश है देहाती दुनिया

शिवपूजन सहाय लिखित ‘देहाती दुनिया’ नामक उपन्यास सन् 1926 ई. में हिन्दी पुस्तक भंडार, लहेरियासराय से प्रकाशित एवं ज्ञानमंडल यंत्रालय (कबीर-चौरा, काशी) के माधव विष्णु पराड़कर द्वारा मुद्रित हुआ था। पुस्तक के विवरण में लिखा है-‘पृष्ठ लगभग 200, सुनहले अक्षर से युक्त नये फैशन की रेशमी जिल्द, चमकीला रेशमी बुकमार्क, ऑयल पेपर का चिकना आवरण’ आदि। ठीक यही वर्ष है जब बच्चों की रंगीन और सचित्र मासिक पत्रिका ‘बालक’ का प्रवेशांक रामवृक्ष बेनीपुरी के संपादन व शिवपूजन सहाय की देखरेख में निकला था। ‘देहाती दुनिया’ के चार संस्करण पुस्तक भंडार से निकले। पांचवां तथा छठा संस्करण ग्रन्थमाला कार्यालय, पटना से क्रमशः 1950 एवं 1951 में निकला। इन संस्करणों का मुद्रण हिन्दुस्तानी प्रेस, पटना के देवकुमार मिश्र ने किया। छठे संस्करण के अपने ‘वक्तव्य’ में लेखक ने स्वीकार किया है कि ‘कुछ कठिन परिस्थितियों और अनिवार्य कारणों से विवश होकर ग्रन्थमाला-कार्यालय से प्रस्तुत नवीन संस्करण निकालना पड़ा।’ इस नवीन संस्करण में कोई ‘नया हेर-फेर’ नहीं किया गया है, सिवा इसके कि ‘पिछले संस्करणों की लंबी भूमिका निकाल दी गई है’। इस लंबी भूमिका को 'हमारा गांव' शीर्षक से एक अन्य किताब के रूप में तब्दील होना था।

'देहाती दुनिया' पुस्तक के विज्ञापन में लिखा गया था कि ‘‘इस उपन्यास में देहाती दृश्यों का ऐसा स्वाभाविक वर्णन है कि आप पढ़कर केवल चकित और पुलकित ही नहीं होंगे, बल्कि हँसते-हँसते लोटपोट भी हो जाएंगे। सच पूछिए तो इसमें केवल मधुर और शुद्ध विनोद ही नहीं, अनेक उपदेश भी भरे पड़े हैं। भाषा ऐसी सरल, रसीली, रंगीली, लोचदार, फड़कती हुई, सजीव और सुबोध है कि हलवाहे और मजदूर भी खूब धड़ल्ले से पढ़कर बड़ी आसानी से समझ सकते हैं, और खूब मजा भी लूट सकते हैं। वर्णनशैली तो बहुत ही हृदयग्राहिणी है और सजीव रचनाशैली भी एकदम निराले ढंग की है। बिल्कुल मुहावरेदार भाषा है। रोजमर्रे की बोलचाल की ऐसी सीधी सादी भाषा में ऐसा मनोरंजक और शिक्षाप्रद उपन्यास आजतक हिन्दी में नहीं निकला। मजाल क्या कि एक बार पढ़कर आप अपने दस मित्रों से इसे पढ़ने के लिए साग्रह अनुरोध न करें। हम शर्तिया गारण्टी करते हैं कि यह मौलिक उपन्यास पढ़कर आप अवश्य ही मुग्ध हुए बिना न रहेंगे। विश्वास कीजिए, ‘देहाती दुनिया’ की सैर करके आप निस्संदेह अपने को कृतार्थ मानेंगे।’’ 

पुस्तक के मुखपृष्ठ पर ‘देहाती दुनिया’ को ‘ठेठ देहात का औपन्यासिक चित्र’ बताया गया है। जाहिर है, इसके लेखक ने इसे ‘उपन्यास’ की संज्ञा दी थी। हालांकि उस समय उपन्यास के विषय में जो आम धारणा थी, उसे देखते हुए आलोचक गोपाल राय इसे ‘बेतुकी बात’ कहते हैं। यद्यपि वे मानते हैं कि ‘इधर आकर हिन्दी के अनेक आलोचकों ने इसे हिन्दी का ‘‘पहला आंचलिक उपन्यास’’ घोषित किया है।' ‘देहाती दुनिया’ पुस्तक से यह भी भलीभाँति सिद्ध होता है कि हिंदी साहित्य में ‘उपन्यास’ कितनी लचीली विधा है। अपने उपन्यास की रचना के बारे में बाबू शिवपूजन सहाय लिखते हैं, ‘मैं ऐसी ठेठ देहात का रहने वाला हूं जहां इस युग की नयी सभ्यता का बहुत ही धुंधला प्रकाश पहुंचा है। यहां केवल दो ही चीजें प्रत्यक्ष देखने में आती हैं-अज्ञानता का घोर अन्धकार और दरिद्रता का ताण्डव नृत्य! वहीं पर मैंने जो कुछ देखा सुना है, उसे यथाशक्ति ज्यों का त्यों चित्रित कर दिया है। इसका एक शब्द भी मेरे दिमाग की खास उपज या मौलिक कल्पना नहीं है।’

‘देहाती दुनिया’ ग्रामीण जीवन के अनेक प्रसंगों का संकलन है। इसमें समाज की अनेक झाँकियाँ, जो बिलकुल वास्तविक हैं, प्रस्तुत की गयी हैं। एक तरह से यह जनपद के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का प्रामाणिक किंतु जीवंत दस्तावेज है। जाति व्यवस्था की अमानवीयता, जमींदारी शोषण के दंश से लेकर मध्यवर्ग के जीवन में शिक्षा से जुड़ी उम्मीद तक का चित्रण है। 'भोलानाथ' को पिता समझाते हैं: ‘सुबह मकतब में पढ़ना, खा-पीकर स्कूल में। जब उर्दू और हिन्दी पढ़ जाओगे तब तुम्हें गाजीपुर ले चलूंगा। वहां तुम्हें अंगरेजी स्कूल में भर्ती करा दूंगा। अंगरेजी पढ़कर तुम मुख्तार होगे, वकील होगे, मुन्सिफ होगे, खूब रुपये कमाओगे।’ ‘उपन्यास’ एक छोटे बालक के अवलोकन-बिन्दु से प्रस्तुत किया गया है, यद्यपि बीच-बीच में लेखक इस बात को भूल जाता है, और स्वयं भी कहानी कहने लगता है। 

'देहाती दुनिया’ अपने ढंग की एक विशिष्ट पुस्तक है। इसकी विशिष्टता भाषा एवं शैली को लेकर खास तौर से है। अकारण नहीं है कि उपन्यास ‘हिन्दी के गद्यकवि’ ‘श्रीसूर्यपुराधीश राजा राधिकारमणप्रसाद सिंह, एम. ए.’ को समर्पित है। शिवपूजन सहाय ने हिंदी लेखकों को कभी ‘कहानी का प्लॉट’ दिया था, ‘देहाती दुनिया’ के माध्यम से उन्होंने 'उपन्यास का प्लॉट' मुहैया कराया। भाषा के स्तर पर अधिकतर हिंदी लेखकों का आम जन से जुड़ाव नहीं हो सका, क्योंकि उनके साहित्य की भाषा वह नहीं रही जिसमें आम जन बात करता हो। सहाय जी ने ‘देहाती दुनिया’ में उसी भाषा का प्रयोग किया जो जनपद के लोगों की भाषा थी। इसी जनपदीय भाषा को कुछ आधुनिक लोगों ने 'मातृभाषा' का 'छद्मनाम' प्रदान किया। आज 2026 में, जब ‘देहाती दुनिया’ उपन्यास के सौ साल पूरे हो चुके हैं, पढ़ते हुए पता चलता है कि हम अपनी मातृभाषा के कितने ही शब्दों, मुहावरों, कहावतों आदि से वंचित हो गये हैं। इन अर्थों में, ‘देहाती दुनिया’ उपन्यास जनपद-संस्कृति का एक समग्र कोश है।

Sunday, September 6, 2026

प्रेमचंद : कुछ स्वतंत्र टिप्पणियां

गांधी और प्रेमचंद

प्रेमचंद हिंदी प्रदेश के सबसे बड़े लेखक हैं। टैगोर-गांधी विवाद में गांधी का पक्ष निराला के साथ प्रेमचंद ने भी लिया था। दोनों अपने-अपने कारणों से टैगोर से असहमत थे। प्रेमचंद को 'बंगाली भावुकता' पसंद नहीं थी। यह विवाद भी महत्वहीन है कि प्रेमचंद गांधीवादी थे या नहीं। गांधी को लेकर एक विश्वास और आकर्षण अवश्य था प्रेमचंद के यहां किन्तु वे गांधीवाद की सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं। गांधी के असहयोग आंदोलन के प्रभाव में नौकरी भी छोड़ते हैं किंतु आंदोलन और गांधीवाद की असफलता भी बताते चलते हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रेमचंद की राजनीतिक पढ़ाई गांधी से नहीं बल्कि गोखले और तिलक से शुरू होती है। प्रेमचंद की पृष्ठभूमि आर्य समाज की रही थी और अपने बाद के दिनों में वे रूस की बोल्शेविक क्रांति पर संपादकीय लिखा करते थे। साम्प्रदायिक समस्या के मामले में भी गांधी से प्रेमचंद आगे थे। गांधी के यहां सभी तरह की समस्याओं का निदान हृदय परिवर्तन में है। प्रेमचंद हृदय परिवर्तन नहीं मानते। वे कहते हैं कि जेल से लौटे जमींदार के शोषण में कोई फर्क नहीं है। यह भी बताते चलते हैं कि कल को अगर सुराज मिला तो यही जमींदार हमारा नियंता होगा।

प्रेमचंद के स्त्री-विचार

शिवरानी देवी की किताब 'प्रेमचंद घर में' का समर्पण पढ़ते हुए सोचता रहा कि नारीवादी विमर्शकार इसे कैसे पढ़ेंगे। उन्होंने लिखा है, 'स्वामी/तुम्हारी ही चीज तुम्हारे चरणों में चढ़ाती हूँ/इस तुच्छ सेवा को अपनाना/ तुम्हारी दासी या रानी।'

इन 'रानियों' के बारे में प्रेमचंद लिखते हैं, "आज काफी स्त्रियां नौकरी करने लगी हैं, मगर वह अच्छा नहीं है, मैं इसको अच्छा नहीं समझता। अब इसका नतीजा क्या हो रहा है? अब पुरुष और स्त्री दोनों नौकरियां करने लगे, तब इसके माने क्या हैं? रुपए ज्यादा आ जाएंगे। उसी का तो यह फल है कि पुरुषों की बेकारी बढ़ रही है।" (शिवरानी देवी, प्रेमचंद : घर में, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 217

"यह कमाई का सवाल अभी थोड़े दिनों से उठा है, नहीं तो पहले स्त्रियों की कमाई एक पैसा नहीं होती थी, और स्त्रियां काफी दबदबे के साथ घर पर शासन करती थीं, तब क्या वह कमाई करती थीं?" (वही, पृष्ठ 217)

प्रेमचंद और संयुक्त परिवार

शिवरानी देवी ने प्रेमचंद के बचपन की एक घटना का वर्णन किया है। घटना है कि 'चाचा ने सन बेचा और उसके रुपये लाकर उन्होंने ताक पर रख दिये। आपने अपने चचेरे भाई से सलाह की, जो उम्र में आपसे बड़े थे। दोनों ने मिलकर एक रुपया ले लिया। आप रुपया उठा तो लाये; मगर उसे खर्च करना नहीं आता था। चचेरे भाई ने उस रुपये को भुनाकर बारह आने मौलवी साहब की फीस दी। और बाकी चार आनों में से अमरूद, रेवड़ी वगैरह लेकर दोनों भाइयों ने खायी। चाचा साहब ढूंढ़ते हुए वहाँ पहुंचे और बोले-"तुम लोग रुपया चुरा लाये हो?" आपके चचेरे भाई ने कहा-"हाँ, एक रुपया भैया लाये हैं।" चाचा साहब गरजे-"वह रुपया कहाँ है?" "मौलवी साहब को फीस दी है।" चाचा साहब दोनों लड़कों को लेकर मौलवी साहब के पास पहुंचे और बोले-"इन लड़कों ने आपको पैसे दिये हैं?" "हाँ, बारह आने दिये हैं।" "उन्हें मुझे दीजिए।" चाचा साहब ने उनसे फिर पूछा-"चार आने कहाँ हैं?" उसका अमरूद लिया। चाचा अपने लड़के को पीटते हुए घर लाये। मेरी शकल अजीब हो गई थी। मैं डरता-डरता घर आया। मां  एक लड़के को पिटता देखकर मुझे भी पीटने लगीं। चाची ने दौड़कर मुझे छुड़ाया।' (शिवरानी देवी, प्रेमचंद घर में, आत्माराम एंड संस, 2008, पृष्ठ 20)

प्रेमचंद का बालमन सोचता है कि 'चाची ने मुझे ही क्यों छुड़ाया, अपने बच्चे को क्यों नहीं छुड़ाया?' लेकिन वे जान नहीं सके। फिर अनुमान लगाया-'शायद मेरी दुर्बलतावश उन्हें दया आ गई हो।' 

मैं यह तो नहीं कह सकता कि प्रेमचंद का 'अनुमानाधारित उत्तर' गलत है, किन्तु एक संयुक्त परिवार में पले-बढ़े होने का मेरा अनुभव इसे सहजतापूर्वक स्वीकार नहीं कर सकता कि प्रेमचंद 'दुर्बलता' से उपजी 'दया' की वजह से  बचे। क्या कारण है कि यह 'दुर्बलता' चाचा-चाची के हृदय में ही 'दया' उत्पन्न कर पाने में समर्थ है, मां के हृदय में नहीं। इसलिए कहा जा सकता है कि प्रेमचंद को संयुक्त परिवार के मूल्यों, उसकी नैतिकता ने बचाया है।

यहाँ एक चीज ध्यान देने की है कि 'चाचा' अपने बेटे को पीट रहे हैं और 'मां' अपने बेटे को। संयुक्त परिवार में अपने बेटा-बेटी को प्यार करना नैतिक और चारित्रिक 'दुर्बलता' माना जाता था जबकि उपेक्षा और तिरस्कार परिवार के लिए व्यक्ति का 'त्याग'। संयुक्त परिवार में एक बच्चे को प्यार सदैव चाचा-चाची से ही प्राप्त होता था। संयुक्त परिवार में सभी बच्चे आपस में भाई-बहन होते थे। अकारण नहीं है कि प्रेमचंद से बचपन में जब कोई उनसे भाइयों की संख्या पूछता था तो वे सदैव पांच भाई होने की बात कहते थे। (पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 20)

नमक का दारोगा और अलोपीदीन की संतानें

प्रेमचंद की कहानी 'नमक का दारोगा' का जो ‘प्वाईंट ऑफ इंफैसिस’ है वह यह कि कहानी का खलनायक (विलेन) अलोपीदीन नहीं हैं, बल्कि पूरी की पूरी समाज व्यवस्था है। अलोपीदीन से पहले महाजनों के कर्ज में डूबे उनके उनके पिता हैं जो नौकरी में जाने से पहले ही भ्रष्टाचार की घुट्टी पिला रहे हैं। परिवार के सारे लोगों की अतृप्त लालसाएं हैं। पत्नी की साड़ी और मां की तीर्थ-योजना है। समाज में कौन है जो अलोपीदीन की इज्जत न करता हो ? जमादार बदलू सिंह की तो बात ही छोड़ दें। इलाके के सारे प्रतिष्ठित लोग अलोपीदीन का मेहमान बनना अपना सौभाग्य मानते क्योंकि अपने इलाके के वे ‘सबसे प्रतिष्ठित जमींदार’ थे। अंग्रेज अफसर तक उनके मेहमान होते। क्या यह महज संयोग था कि अदालत ने अलोपीदीन को ‘बाइज्जत’ बरी कर दिया? ‘पं अलोपीदीन इस अगाध वन के सिंह थे।’ ‘डिप्टी मजिस्ट्रेट ने अपनी तजवीज में लिखा, पं. अलोपीदीन के विरुद्ध दिए गए प्रमाण निर्मूल और भ्रमात्मक हैं। वह बड़े भारी आदमी हैं। यह बात कल्पना के बाहर है कि उन्होंने थोड़े लाभ के लिए ऐसा दुस्साहस किया हो।’ 

प्रेमचंद का दारोगा ईमानदारी का जो ‘संस्कार’ लेकर नौकरी खोजने निकला है वह मार्के का है। उस संस्कार के जो अनिवार्य उपादान हैं, उसे देखें-‘मुंशी वंशीधर भी जुलेखा की विरह-कथा समाप्त करके सीरी और फरहाद के प्रेम-वृत्तांत को नल और नील की लड़ाई और अमेरिका के आविष्कार से अधिक महत्त्व की बातें समझते हुए (जोर मेरा है) रोजगार की खोज में निकले।’ इस तरह के रोमानी विचार वाले दारोगा की ईमानदारी पर कोई भरोसा करके गलत ही साबित होगा। सच पूछिए तो कहानी पढ़ते हुए मुझे ऐसा कुछ भी नहीं मिलता (सदास्था के बावजूद) जिसकी बुनियाद पर ‘अटूट विश्वास’ हो सके बल्कि प्रेमचंद ने तो दारोगा के भ्रष्ट होने-बनने या बना दिये जाने की ही कहानी लिखी है। नौकरी गंवाकर लौटे दारोगा से घर-समाज में कोई बोलने-बतियाने के लिए तैयार नहीं है। क्या दारोगा इसे महसूस करते हुए बदल नहीं रहा? कहानी के प्रारंभ में अलोपीदीन के बारे में दारोगा की जो राय है वह अंत तक काबिज रहती है क्या? क्या वह पूरी की पूरी बदल नहीं गई है? ‘वंशीधर ने गंभीर भाव से कहा-यों मैं आपका दास हूं। आप जैसे कीर्तिवान, सज्जन पुरुष की सेवा करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है।’ और आगे-वंशीधर की आंखें डबडबा आईं। हृदय के संकुचित पात्र में इतना एहसान न समा सका। एक बार फिर पंडितजी की ओर भक्ति और श्रद्धा की दृष्टि से देखा और कांपते हुए हाथ से मैनेजरी के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए।

...और प्रेमचंद 'स्वर्ग' की सैर नहीं कर सके!

पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी का गुरुदेव के 'दर्शनार्थ' शांतिनिकेतन आना-जाना लगा रहता था। उन्होंने हिन्दी के कई लेखकों को गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के 'दर्शन' कराने में सफलता पाई थी। उनकी यह 'आकांक्षा' थी कि कभी 'प्रेमचन्दजी और कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ को बातचीत करते हुए सुनें'। उन्होंने 'प्रेमचन्दजी को शान्तिनिकेतन बुलाने के लिए कई बार प्रयत्न किया', पर इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली। एक बार तो उन्हें यह 'आशंका' भी हो गई थी कि उन्होंने 'जान बूझकर' उनके निमन्त्रण की उपेक्षा की है। जब काशी में जाकर चतुर्वेदी जी ने उनसे पूछा कि 'आप शान्तिनिकेतन क्यों नहीं गये', तब उन्होंने बतलाया कि वे 'अपनी धर्मपत्नी तथा बच्चोंको छोड़कर अकेले कविवर के दर्शनार्थ नहीं जाना चाहते थे और इतना पैसा उनके पास था नहीं कि सबकी यात्रा का प्रबन्ध कर सकते।' (बनारसीदास चतुर्वेदी, संस्मरण, भारतीय ज्ञानपीठ, काशी, प्रथम संस्करण : अगस्त 1952, पृष्ठ 79-80) 

चतुर्वेदी जी की 'आशंका' निराधार नहीं है। प्रेमचंद के मन में बंगला साहित्य और विशेषकर रवींद्रनाथ ठाकुर के लिए कोई खास आकर्षण नहीं था। एक बार जैनेंद्र ने चर्चा की थी कि 'बंगाली साहित्य हृदय को अधिक छूता है', तो  प्रेमचंद ने कहा था कि 'उसमें स्त्री-भावना अधिक है। ...जैनेंद्र, मुझे कुछ ठीक नहीं मालूम। मैं बंगाली नहीं हूं। वे लोग भावुक हैं। भावुकता में जहाँ पहुंच सकते हैं, वहाँ मेरी पहुंच नहीं। मुझमें उतनी देन कहाँ? ज्ञान से जहाँ नहीं पहुंचा जाता, वहाँ भी भावना से पहुंचा जाता है। (जैनेन्द्र, 'प्रेमचंद मैंने क्या जाना और पाया', प्रेमचंद स्मृति अंक, प्रेमचंद रचनावली, खण्ड 20 में संकलित, पृष्ठ 21) आगे प्रेमचंद ने कहा, 'जैनेंद्र, रवींद्र, शरत दोनों महान हैं। पर हिन्दी के लिए क्या वही रास्ता है, शायद नहीं। हिन्दी राष्ट्रभाषा है। मेरे लिए तो वह राह नहीं ही है।' (वही)

उर्दू के प्रसिद्ध साहित्यकार इम्तयाज अली 'ताज' को 14 सितंबर, 1920 के अपने खत में प्रेमचंद ने लिखा था : "मैं लिटरेचर को मैस्कुलिन देखना चाहता हूँ, फेमिनिज्म, ख्वाह वह किसी सूरत में हो, मुझे पसन्द नहीं। इसी वजह से मुझे टैगोर की अक्सर नज्में नहीं भातीं। यह मेरा भीतरी नुक़्स है, क्या करूँ। अशआर भी मुझे वही अपील करते हैं जिनमें कोई जिद्दत (मौलिक सूझ) हो। 'ग़ालिब' के रंग का मैं आशिक हूँ। अज़ीज लखनवी के 'गुलकदे' की खूब सैर की थी मगर बदकिस्मती से आज तक एक शेर भी मौजूँ नहीं कर सका। न जी चाहता है। गालिबन शायराना हिस (संवेदनशीलता) दिल में है ही नहीं।" (कलम का सिपाही, पृष्ठ 56) इस खत के कई बरस बाद इन्द्रनाथ मदान के एक सवाल का जवाब देते हुए भी कि बंगला साहित्य क्यों दिल को ज्यादा छूता है, उन्होंने लगभग यही बात कही थी-"उसमें एक स्त्रियोचित गुण पाया जाता है, जिसे मैं अपने स्वभाव के प्रतिकूल पाता हूँ।" (वही)

प्रेमचंद के बारे में जैनेन्द्र लिखते हैं कि 'बड़े शब्दों से कहीं अधिक उन्हें छोटी-सी सचाई छूती थी। जहाँ जिंदगी थी वहां प्रेमचंद की निगाह थी। जहां दिखावा था, उसके लिए प्रेमचंद के मन में उत्सुकता तक न थी।' (वही, पृष्ठ 33) इसलिए 'जब शांतिनिकेतन जाने की बात आई तो उनका मन पूरी तरह ग्रहण न कर सका।' जैनेन्द्र को बोले, 'मैं तो वहां उस स्वर्ग की सैर करूँ, यहां घर के लोग तकलीफ में दिन काटें, क्या यह मेरे लिए ठीक है? और जैनेन्द्र, महाकवि रवींद्रनाथ तो अपनी रचनाओं द्वारा यहां भी हमें प्राप्त हैं। क्या वहाँ मैं उन्हें अधिक पाऊंगा?' (वही)

चतुर्वेदी जी ने प्रेमचंद को गुरुदेव से मिलवाने की कई बार कोशिश की लेकिन वे 'बहाने' बनाकर टालते रहे। एक बार जापानी कवि नोगुची कलकत्ते भाषण देने आए थे तब भी प्रेमचंद को बुलावा भिजवाया था। प्रेमचंद ने 'आर्थिक संकट' का 'बहाना' बनाया। चतुर्वेदी जी ने 'विशाल भारत' में प्रेमचंद के आर्थिक संकटों के बारे में लिखा भी था। नोगुची प्रसंग में प्रेमचंद ने जैनेन्द्र को जो बताया था वह ध्यान देने लायक है : 'यहां नोगुची हिन्दू-यूनिवर्सिटी आए उनका व्याख्यान भी हो गया। मगर मैं न जा सका।' (वही, पृष्ठ 30)

प्रेमचंद और अन्धविश्वास

इस बात को लेकर प्रेमचंद की प्रायः ही आलोचना हुई है कि अंधविश्वास और अलौकिक तत्वों के प्रसंग में वे विरोधाभासों के शिकार हैं। "कभी-कभी वे भूत-प्रेत की तरह आव-बाव बकती थीं। एक पण्डित ओझाई का काम करते थे, वैद्य का भी काम करते थे। मेरी चाची ने कहा-उन्हें बुला लाओ। मैं उन्हें बुला लाया। पण्डित जी आये और ओझों की तरह कुछ उन्होंने अलाय-बलाय किया। मैं भी दोपहर तक बैठा उन्हीं के साथ हवन करता रहा।" (शिवरानी देवी प्रेमचंद, प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 13)

"प्रेमचंद को सामुद्रिक विद्या में यकीन था। उनका एक दफ्तरी था जिसका बताया सही-सही घटित होता था।" (जैनेन्द्र कुमार, 'प्रेमचंद मैंने क्या जाना और पाया', प्रेमचंद रचनावली-20, पृष्ठ 23)

जहां एक तरफ वे अंधविश्वास, सामाजिक-नैतिक रूढ़ियों, धार्मिक विश्वासों, यहां तक कि 'ईश्वर' के अस्तित्व में भी संदेह करते हैं, वहीं उनकी कुछ कहानियों में भूत-प्रेत, पुनर्जन्म, तर्कहीन अलौकिकताओं के प्रति स्वीकार का भाव लक्षित होता है। 'विध्वंस', 'मूठ', 'गुप्त धन', 'नाग-पूजा', 'भूत', 'खूनी', 'पिसनहारी का कुआं, 'मन्त्र', 'प्रतिशोध' आदि कहानियां इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। 

इनमें से कुछ कहानियां, जैसे 'नाग पूजा', 'खूनी', 'प्रतिशोध' आदि तो निपट अंधविश्वास की पुष्टि करनेवाली कहानियां हैं और उनका (डा. गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास 1900-1950 पृष्ठ 137) कोई अभिप्रायगत वैशिष्ट्य लक्षित नहीं होता। 'नाग पूजा' में एक नाग के एक लड़की से प्रेम करने और 'खूनी' तथा 'प्रतिशोध' में 'प्रेत विद्या की सहायता से अपराधी का पता लगाने के चमत्कार की कथा प्रस्तुत की गयी है। तत्कालीन समाज में इस प्रकार के विश्वास प्रचलित थे, यह तो सच है, पर इनके प्रति आलोचनात्मक या व्यंग्यात्मक दृष्टि का अभाव प्रेमचंद के संदर्भ में आश्चर्यजनक है। 'मूठ' चलाकर दुश्मन को मार डालने का अंधविश्वास भी गांवों में प्रचलित था और प्रेमचंद की कहानी 'मूठ में इसका वर्णन किया गया है। चोर का पता लगाने के लिए केन्द्रीय पात्र एक ओझा से 'मूठ' चलाने का आयोजन करता है और इसे केवल सुनकर ही चोर नौकरानी की देह ऐंठने लगती है, आंखें पधरा जाती हैं, और वह बेहोश हो जाती है। पर इस कहानी को थोड़ा मोड़ देकर प्रेमचंद ने इसे अन्धविश्वास-समर्थन के दोष से बचा लिया है। वास्तव में 'मूठ चला नहीं है। ओझा 'मूठ' चलाने उतारने का नाटक करके केन्द्रीय पात्र से पांच सौ रुपये झटक लेता है। इस नाटक से ही चोर स्वस्थ भी हो जाता है। कहानी के सतर्क पाठ से पता चलता है कि प्रेमचंद अंधविश्वास ग्रस्त ग्रामीणों और धूर्त ओझाओं का चित्रण करते हैं। पर कथा के आरंभ में 'मूठ' के प्रभाव का वर्णन पाठक को गलत संदेश देता है। यह कहानी भी तत्कालीन सामाजिक संरचना के अध्ययन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हो सकती है। इस स्थिति से उत्पन्न मनःस्थिति का चित्रण करने में भी प्रेमचंद सफल हैं। 

अन्धविश्वास समर्थित प्रेमचंद की कुछ कहानियां सामाजिक-नैतिक मूल्यों से जुड़कर कुछ सार्थकता प्राप्त कर लेती हैं, जैसे 'विध्वंस' में 'ईश्वरीय न्याय' के रूप में जमींदार की हवेली का जल जाना, 'गुप्त धन में अनैतिक तरीके से दूसरों का धन हथिया लेनेवाले बाप-बेटे का मर जाना, 'भूत' में मृत पत्नी का अपने पति के उसकी छोटी बहन से विवाह कर लेने के विरोध में बार-बार प्रकट होना, 'पिसनहारी का कुआं' में धरोहर के पैसे दबा लेने पर मृत गोमती का उसके विरोध में बार-बार प्रकट होना, 'मन्त्र' में मन्त्र द्वारा सांप के विष का उतर जाना आदि प्रसंग सामाजिक-नैतिक प्रश्नों से जुड़कर किंचित् सार्थक हो गये हैं और आज के उत्तर-आधुनिक पाठ में तो उनकी नये ढंग से व्याख्या भी की जा सकती है। 'विध्वंस' में जमींदार की हवेली के आकस्मिक रूप में जल जाने की व्याख्या दलित-आक्रोश की तीव्रता के रूप में, 'पिसनहारी का कुआँ' में धरोहर के धन हड़पने के विरोध के रूप में, 'मन्त्र' में गरीब आदमियों के हृदय में मानवीय संवेदना के बचे होने के रूप में, 'भूत' में पत्नी की मृत्यु के बाद पुत्री के रूप में पाली हुई साली से विवाह करने के नैतिक द्वन्द्व के रूप में संभव है। (डा. गोपाल राय, पृष्ठ 138) 

'नागपूजा' अन्धविश्वास पर आधारित कहानी है। आश्चर्य है कि प्रेमचंद बहुत गंभीरता से इस विषय पर कहानी लिखते हैं जिसमें एक नाग एक कुमारी लड़की से इतना प्रेम करता है कि जिससे भी उसका विवाह तय होता है, या विवाह हो जाता है, उसे वह डस लेता है। यदि इस कथा से किसी विशेष अभिप्राय की व्यंजना होती, यदि इस अन्धविश्वास के प्रति प्रेमचंद की दृष्टि व्यंग्य और आलोचना की होती, तो कहानी सार्थक होती, पर ऐसा कुछ नहीं दिखायी पड़ता। (डा. गोपाल राय)

'पिसनहारी का कुआं' नैतिक मूल्यबोध की कहानी है धरोहर के पैसे दबा लेने का बुरा परिणाम होता है, यही इस कहानी का प्रतिपाद्य है। पर परिणाम दिखाने के लिए प्रेमचंद ने अतिलौकिक बातों का समावेश कर दिया है, जिससे ऐसी बातों में उनके भी विश्वास की पुष्टि होती है। मसलन जब चौधरी विनायक सिंह मृत गोमती के कुआं बनवाने की धरोहर के पैसे अपने बेटे को नहीं देते, तो उनकी पत्नी स्वयं जाकर पैसे लाना चाहती है। पर ले नहीं पाती, क्योंकि वहां उसे गोमती खड़ी दिखायी पड़ती है। उसका बेटा भी ऐसा ही अनुभव करता है। गोमती अपनी धरोहर की रक्षा कर रही है। पर वह चौधरी को पैसे लेने से नहीं रोकती। चौधरी उस पैसे से अपने बेटे का कर्ज चुका देते हैं। कुआं नहीं बन पाता। चौधरी के बेटे को व्यापार में सदा नुकसान ही होता रहता है इस तरह बारस वर्ष बीत जाते हैं। बाप-बेटे की मृत्यु के बाद विधवा बहू को जो लड़की पैदा होती है, वह और कोई नहीं बल्कि गोमती ही है। उसके उद्योग से कुआं तैयार हो जाता है, और उसी दिन वह मर भी जाती है। तात्पर्य यह कि जब तक कुआं तैयार नहीं होता गोमती की आत्मा भटकती रहती है, और कुआं तैयार हो जाने पर उसे शान्ति मिल जाती है। इस अतिलौकिक घटना का कोई तर्क नहीं है। (डा. गोपाल राय, पृष्ठ 201, पाद टिप्पणी 141)

प्रेमचंद-जयन्ती और इतिहास की लीपापोती

कल प्रेमचंद की जयन्ती थी। वक्ताओं की कमी नहीं रही। कुछ ऑफलाइन बोले तो कुछ ऑनलाइन। कुछ लोग सन्तुलित बोले तो अधिकतर बहके-बहके से। दिल्ली विश्वविद्यालय की विदुषी सुधा सिंह भी छात्रों, शोधकर्ताओं और विद्वान मित्रों को ऑनलाइन संबोधित कर रही थीं। अपनी बात कहने से ज्यादा दूसरों के कहे की लीपापोती कर रही थी। लीपापोती के क्रम में उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की पहली शादी बचपन में हो गई थी। यह प्रेमचंद का फैसला नहीं था। उनको जब फैसले लेने का मौका मिला तो उन्होंने एक 'विधवा' को चुना। यह कहकर उन्होंने प्रेमचंद को समाज से आगे चलनेवाला बताया। बिना पढ़े बोलनेवाले को लगता है कि वह सब नया-नया और मौलिक स्थापना दे रहा है। सही है कि प्रेमचंद का बालविवाह हुआ था लेकिन यह ऐसा 'बालक' था जिसकी आँख में पत्नी का उम्र में बड़ा होना सबसे ज्यादा चुभा था। शिवरानी देवी की लिखी किताब का भरोसा करें तो 'बालक प्रेमचंद' को सबसे पहले पत्नी की उम्र दिखी, सुंदरता-कुरूपता इसके बाद ही आती है। फिर भी प्रेमचंद इस शादी को निभा ले जाते। प्रेमचंद ने स्वीकार किया है कि 'अगर बीच में चाची न होतीं तो शायद मेरी उनकी ज़िंदगी एक साथ बीत भी जाती। (वही, पृष्ठ 11) पिता के फैसले ने प्रेमचंद की सुप्त इच्छा को हवा दी। उनका मानना था कि उनके ससुर ने उनके बेटे को कुएं में धकेल दिया है इसलिए वे उसकी दूसरी शादी अवश्य करेंगे। बालक प्रेमचंद को पिता का यह फैसला मालूम था और इस तरह दूसरी शादी की उनकी राह आसान हो गई थी। किन्तु राह इतनी भी आसान नहीं थी कि प्रेमचंद इसे डंके की चोट पर घोषित कर के करते। आज भी और तब भी समाज इतना प्रगतिशील नहीं था कि एक शादीशुदा व्यक्ति को कोई पिता अपनी अब्याहता लड़की देता। इसलिए जो लोग इस प्रेमचंद के विधवा-विवाह के 'फैसले' को क्रांतिकारी कदम घोषित करने को उतावले हो रहे हैं, वे सर्वप्रथम अपने पाँव जमीन पर कर लें। अब हवाबाजी का समय नहीं रहा। सच्चाई तो यह है कि दूसरी शादी की सारी बात प्रेमचंद ने गुप्त रखी थी। उनके घर के लोग भी इस योजना से वाकिफ नहीं थे। आशंका थी कि बात प्रकट करने पर उनके ब्याहता होने की चर्चा होगी और दूसरी शादी में विघ्न उपस्थित होगा। मैं अपनी बात के समर्थन में शिवरानी देवी की किताब 'प्रेमचंद : घर में' से दो उद्धरण पेश करता हूँ। शिवरानी देवी कहती हैं, 'एक की मिट्टी पलीद कर दी। जिसकी कुरेदन मुझे हमेशा होती है। जिसे मैं बुरा समझती हूँ, वह हमारे ही यहाँ हो और हमारे हाथों हो। मैं स्वयं तकलीफ सहने को तैयार हूँ; परन्तु स्त्री जाति की तकलीफ़ मैं नहीं देख सकती। उसी का प्रायश्चित शायद मुझे भी करना पड़ेगा; हालांकि मैं बेगुनाह हूँ। मेरे पिता को मालूम होता तो आपके साथ मेरी शादी हर्गिज़ न करते।' (प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 10) आगे, 'आप पुरुष थे, आप मुझे ब्याह लाये, वे तो घर में बैठी हैं। यह क्या स्त्रियों के साथ अन्याय नहीं है? मैं भी बदसूरत होती, तो आप मुझे भी छोड़ देते। अगर मेरा बस होता तो मैं सब जगह ढिंढोरा पिटवाती कि कोई भी तुम्हारे साथ शादी न करे।' (प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 10-11) प्रेमचंद झेंपते हुए कहते हैं, 'इसीलिए तो तुम्हें मालूम न हुआ'। (वही, पृष्ठ 11)

प्रेमचंद का तीन स्त्रियों के साथ संपर्क रहा। पहली स्त्री के जीवन-काल में ही आपने एक और स्त्री से संबंध बनाया। शिवरानी देवी के साथ शादी के बाद भी प्रेमचंद का उस स्त्री के साथ सम्बन्ध बना रहा। सवाल है कि उस स्त्री के रहते प्रेमचंद ने शिवरानी देवी के साथ शादी क्यों की, वह स्त्री प्रेमचंद की पत्नी क्यों नहीं बन सकी?

देशकाल, परिवेश और अनुवाद की समस्या

अनुवाद एक अत्यंत कठिन दायित्व है। रचनाकार किसी एक भाषा में सर्जना करता है, जबकि अनुवादक को एक ही समय में दो भिन्न भाषा और परिवेश/वातावरण को साधना होता है। परिवेश और वातावरण पर बल देते हुए राधाकृष्णन ने गीता के अनुवाद के बहाने कहा था-‘गीता के किसी भी अनुवाद में वह प्रभाव और चारुता नहीं आ सकती, जो मूल में है। इसका माधुर्य और शब्दों का जादू किसी भी अन्य माध्यम में ज्यों का त्यों ला पाना बहुत कठिन है। अनुवादक का यत्न विचार को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करने का रहता है, परन्तु वह शब्दों की आत्मा को पूरी तरह सामने नहीं ला सकता। वह पाठक में उन मनोभावों को नहीं जगा सकता, जिनमें कि वह विचार उत्पन्न हुआ था।’ (राधाकृष्णन, भगवद्गीता (हिंदी), राजपाल एंड संस, 'भूमिका', पृष्ठ 8)

एक अनुवादक के लिए स्थानीय संस्कृति, परिवेश और वातावरण का ज्ञान आवश्यक है। बात 1920 के आसपास की है, जब ‘ललाट में लाल चंदन का टीका लगाए हुए भारतीय महिला की फोटो देखकर एक अमेरिकन स्त्री ने कहा था कि यह इसके पति द्वारा मारी हुई ईंट के कारण निकला हुआ रुधिर-चिह्न है।’ (गणेशशंकर विद्यार्थी रचनावली : एक, पृष्ठ 187) महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भी एक रोचक तथ्य की ओर ध्यान दिलाया है। एक बार कलकत्ते के किसी अखबार में एक खबर छपी थी कि उसी तरफ किसी जिले के अंगरेज मजिस्ट्रेट अपने इजलास में बैठे हुए एक मुकद्दमा सुन रहे थे। उस समय मुकद्दमे वालों में से किसी ने कहा कि ‘‘इस जमीन पर चिर दिन (बहुत रोज) से कब्जा है’’। साहब ने समझा कि 'चिर दिन' किसी आदमी का नाम है। इससे आपने 'चिर दिन' के हाजिर होने का हुक्म दे दिया! (महावीरप्रसाद द्विवेदी, सहित्यालाप, खड्गविलास प्रेस, पटना, 1929, पृष्ठ 166)

यद्यपि किस्सा है, लेकिन रोचक एवं सारगर्भित है। कहानी है कि कई साल पहले एक इतिहासकार वीर कुंवर सिंह पर शोध के सिलसिले में भारत आये थे। उन्होंने एक फाइल में burhi शब्द लिखा देखा जिस पर कुंवर सिंह ने कभी एक लाख रुपये खर्च किये थे। उक्त इतिहासकार ने लिखा कि वीर कुंवर सिंह की एक बूढ़ी हो चली रखैल थी जिस पर उन्होंने रुपये खर्च किये थे। एक जमींदार के बारे में ऐसा निष्कर्ष निकालना तनिक स्वाभाविक और सुविधाजनक भी था। कुछ दिनों बाद उसी फाइल को एक बिहारी इतिहासकार ने देखा और burhi को ‘बरही’ पढ़ा। लिखा कि कुंवर सिंह ने पोते की ‘बरही’ पर लाख रुपये खर्च किये थे। 'जालहंस की सुभाषित मुक्तावली’ में चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने एक भारतीय विद्वान की खोज पर व्यंग्य किया है। उक्त विद्वान ने अंग्रेजी माध्यम से अर्जित संस्कृत ज्ञान की वजह से जल्हण को जालहंस बना दिया था। दरअसल उसने रोमन लिपि में लिखे Jalhan's को 'जालहंस' पढ़ लिया। (मस्तराम कपूर, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, साहित्य अकादेमी, द्वितीय संस्करण ; 1993, पृष्ठ 52)

रवींद्रनाथ ठाकुर ने एक बार पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी से कहा था : ‘हिन्दी मैं पढ़ लेता हूँ, सामान्यतः उसका अर्थ भी समझ लेता हूँ, किन्तु शब्दों के साथ जो वातावरण लिपटा होता है, उसे मैं नहीं समझ सकता। सच तो यह है कि शब्दों के साथ लिपटे हुए वातावरण का ज्ञान मुझे अपनी भाषा को छोड़कर और कहीं भी नहीं होता, यहां तक कि अंग्रेजी में भी नहीं।’ (दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 79) गुरुदेव से बातचीत के उपरांत चतुर्वेदी जी ने कहा, ‘दिनकर जी, रवींद्रनाथ स्वीकार करते हैं कि अँगरेजी शब्दों के साथ लिपटे हुए वातावरण को वे समझ नहीं पाते। यह एक बात है, जिसकी खबर उन सभी भारतीय लेखकों तक पहुंचा दी जानी चाहिए, जो अपनी भाषाएं छोड़कर अँगरेजी में लिख रहे हैं, विशेषतः कविताएं लिख रहे हैं।’ (वही) इसलिए, जो दोनों भाषा का ‘मर्म’ नहीं जानता, अच्छा अनुवादक नहीं हो सकता। अर्थ का अनर्थ तो कोई भी कर सकता है! अनर्थ ही कहिए कि आनंदमठ उपन्यास में एक बांग्ला कहावत का अनुवाद करते लिखा है, "गाय है तो गाड़ीवान नहीं गाड़ीवान है तो गाय नहीं!" (हिंदी अनुवाद, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 41) गाड़ी में जब बैल जुतते हैं तो कहावत में गाय क्यों? क्या बंगाल में हल या गाड़ी में गाय जोतने की परंपरा रही है?

अर्थ का अनर्थ तब ज्यादा ही होता है जब हम शब्दशः अनुवाद कर देना चाहते हैं। ‘‘कभी एक स्थानीय दैनिक में निकला था-‘जब पुलिस के बड़े अधिकारी वहां पहुंचे, तब पुलिसवालों और डाकुओं में गोलियों का आदान-प्रदान हो रहा था।’ गोलियां न हुईं मानों मिठाइयां हो गईं। अनुवादक को अंग्रेजी में ‘एक्सचेंज’ मिला; और उसने बिना समझे-बूझे उसके स्थान पर आदान-प्रदान रखकर काम चलता किया।’’ (रामचंद्र वर्मा, शब्दार्थ दर्शन, पृष्ठ 17) रामवृक्ष बेनीपुरी हजारीबाग जेल के वार्डों के अंग्रेजी नामों के हिंदी अनुवाद पर टिप्पणी करते हैं : "जुवेनाइल वार्ड के लिए 'छोकरा किता' अनुवाद वैसे ही है, जैसा विमेन्स वार्ड के लिए 'रंडी किता'। समझ में नहीं आता, ये अनुवाद किसने कब किये, किन्तु जेलों में, थोड़े दिनों पहले तक, 'रंडी किता', 'छोकरा किता' आदि शब्द ही प्रचलित थे।" (रामवृक्ष बेनीपुरी, जयप्रकाश, साहित्यालय, पटना, प्रथम संस्करण : मार्च 1947, पृष्ठ 164)

हर भाषा की अपनी एक खास प्रकृति है। इसलिए जिस भाषा में हम अनुवाद कर रहे होते हैं, उसकी प्रकृति, उसके मिजाज का रक्षण आवश्यक हो जाता है। शब्द, संस्कृति के वाहक होते हैं। यह भी कह सकते हैं कि संस्कृति बदलने से शब्द, वाक्यांश तथा मुहावरों के अर्थ बदल जाते हैं। मिसाल के तौर पर ‘दीपक तले अंधेरा’ कहावत कन्नड़ और कश्मीरी में भी है। कन्नड़ में (अन्य अर्थों के साथ-साथ) इसका अर्थ है, ‘चरित्रवान आदमी का भी दीपक की तरह अंधेरा पक्ष होता है। यानी उसमें प्रछन्न बुराइयां हो सकती हैं।’ कश्मीरी में अन्य अर्थों के साथ-साथ एक राजनीतिक अर्थ भी है। वह यह कि ‘अच्छे राजा के बुरे अनुचर हो सकते हैं’। (ए के रामानुजन, भारत की लोक कथाएँ, नेशनल बुक ट्रस्ट, 2011, 'भूमिका', पृष्ठ 21) इसलिए शब्दों और वाक्यांशों का अनुवाद अपने देश/प्रदेश की भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार होता है। जैसे अंग्रेजी में ‘वार्म रिसेप्शन’ इसलिए प्रचलित हुआ कि इंग्लैंड जैसे ठंढे देशों में इसकी (गर्मी की) आवश्यकता थी। इसी शब्द के लिए भारत जैसे सम तापमान वाले देशों में इसे ‘हृदय को शीतल करना’ कहा जा सकता है। (प्रसेनजित कुमार, 'अननुवाद्यता के चरण और शब्दावली', गवेषणा, अंक 107, वर्ष 2016) इसलिए अनुवादक को एक ही समय में स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा दोनों की भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना होता है।

शब्दशः अनुवाद एक खतरनाक बीमारी है, क्योंकि एक भाषा के शब्द के लिए हू-ब-हू दूसरी भाषा में अक्सर नहीं मिलते। कई बार शब्द महज शब्द नहीं होते, उनके साथ एक अवधारणा जुड़ी होती है। उन अवधारणाओं का अनुवाद किसी भी विदेशी भाषा में, जहां वैसी किसी अवधारणा का अस्तित्व न हो, मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव कार्य है। एक अच्छे अनुवादक को भाषा की इस सीमा की मर्यादा समझनी होगी। नहीं तो क्या आवश्यकता थी कि अंग्रेजी की किताबों अथवा शब्दकोशों के लिए ‘स्वदेशी’, ‘सत्याग्रह’ और ‘अहिंसा’ जैसे अवधारणात्मक पद ज्यों के त्यों उठा लिये जाते? हिन्दी में भी ठीक अंग्रेजी ही की तरह अनगिनत शब्द हूबहू ले लिये गये हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि आज भी हम इस बहस से मुक्त नहीं हो सके हैं कि ‘सेकुलरिज्म’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ तथा ‘धर्म’ और ‘रिलीजन’ एक ही चीज हैं कि भिन्न हैं। गुलेरी जी ने लिखा है कि ‘‘मत या सम्प्रदाय के अर्थ में धर्म शब्द का प्रयोग करना हमने विदेशियों से सीखा है, जब विदेशी भाषाओं के ‘मजहब’, ‘रिलीजन’ शब्द यहां प्रचलित हुए, तब भूल से या स्पर्धा से हम उनके स्थान में धर्म शब्द का प्रयोग करने लगे। परंतु हमारे प्राचीन ग्रंथों में, जो विदेशियों के आने के पूर्व रचे गये थे, कहीं पर भी ‘धर्म’ शब्द मत, विश्वास या सम्प्रदाय के अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ, प्रत्युत उनमें सर्वत्र स्वभाव और कर्तव्य इन दो ही अर्थों में इसका प्रयोग पाया जाता है।’’ (विश्वनाथ त्रिपाठी, हिंदी नवजागरण के अग्रदूत : चंद्रधर शर्मा गुलेरी, नेशनल बुक ट्रस्ट, 1995, पृष्ठ 81)

यह समस्या तब और विकट रूप में प्रस्तुत होती है जब हम बोली के शब्दों का अनुवाद करना चाहते हैं। बोली के शब्दों और भंगिमाओं का अनुवाद जब उसी देश की भाषा में असंभव है तो विदेशी भाषा के बारे में क्या कहा जाय। क्या रेणु का मैला आँचल उपन्यास बोली के शब्दों को छोड़कर रचा जा सकता था? देवेंद्र सत्यार्थी का विश्वास करें तो स्त्री गीतों में जो दर्द और करुणा है उसका अनुवाद दुनिया की अन्य किसी भी भाषा में असंभव है।

अनुवाद की एक समस्या श्रेष्ठताबोध और हीनताबोध से भी जुड़ी है। हम किसी भाषा को श्रेष्ठ मान लेते हैं तो किसी को हीन। हम भारतीय विदेशी भाषा के शब्दों का शुद्ध उच्चारण करने की कोशिश करते हैं। हवेनत्सांग और माओत्सेतुंग को वांगच्वांग तथा माओजेडोंग होते देर नहीं लगी। तोल्स्तोय का 'लेव' अब लेफ हो गया है तो चेखव, चेखफ। विदेशी नामों के उच्चारण को दुरुस्त करने की इतनी व्यग्रता लेकिन अपने ही देश की बांग्ला भाषा के अनेक नाम गलत वर्तनी के साथ लिखे जा रहे हैं। भूदेव मुकर्जी हिंदी में मुखर्जी बने बैठे हैं।वोमेश (womesh) कहीं व्योमेश तो कहीं उमेश। मजेदार है कि प्रकाशन विभाग की अंग्रेजी की किताब में भी उमेश (Umesh) है। इतिहासकार बिपन तो एकाध अपवाद को छोड़कर प्रायः ही बिपिन हैं। अंग्रेजी काल में मिश्र, गुप्त और मौर्य जो मिश्रा, गुप्ता, मौर्या बना वह आज भी बदस्तूर जारी है। चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ जी ने तनिक चुटकी लेते हुए लिखा भी है, ‘गीता के दर्शनशास्त्र को निचोड़ डालनेवाले लेखक भी पारसीधर्म का हाल लिखते समय जरथुश्त को ‘‘जरथुश्ता’’ और अहूर-मज्द को ‘‘अहुरामज्दा’’ लिख देते हैं।’ (वही, पृष्ठ 19) नामों को लेकर हम तनिक भी सचेत नहीं रहते। द्विवेदी जी कहीं महावीर प्रसाद अलग-थलग हैं तो कहीं साथ (महावीरप्रसाद)। हजारीप्रसाद द्विवेदी की भी यही गति है। फणीश्वरनाथ रेणु की कौन कहे! डॉक्टर सच्चिदानंद सिन्हा ने स्वीकार किया है कि जर्मनी में मैक्स मूलर के साथ मुलाकात से पहले तक वे अपने नाम की स्पेल्लिंग गलत लिखा करते थे।

इस प्रसंग में मुझे अपने काॅलेज (बी. एन. काॅलेज, पटना) के अंग्रेजी प्राध्यापक रमेश प्रसाद सिन्हा की ‘कहानी’ याद आ रही है। उनके बच्चे किसी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते थे। एक दिन उनसे पूछा : ‘पापा, आप भरता के बारे में जानते हैं?' पिता ने विश्वासपूर्वक कहा, ‘अरे! भरता तो हमलोग प्रायः ही खाते हैं। इसे भुरता या चोखा भी कहा जाता है और यह आलू, बैगन या करैला-किसी भी चीज का बनाया जा सकता है।’ बेटे ने पिता के ‘अज्ञान’ का मजाक उड़ाते कहा, ‘नहीं, नहीं पापा। भरता तो रामा का यंगर ब्रदर था।’ बेटे का ‘ज्ञान’ पिता के सिर के उपर से निकल गया। नतीजा हुआ कि मेरे अंगेजी शिक्षक ने बेटे का नाम अंग्रेजी स्कूल से कटवा दिया।

कुछ पाश्चात्य भारतविदों ने भारत के पंडितों के मध्य अपनी धाक जमाने के लिए अपने नाम तक के संस्कृत अनुवाद कर डाले थे। कहना अनावश्यक है कि वेद-विद्वान मैकडाॅनेल अपना संस्कृत नाम ‘मुग्धानलाचार्य’ सुनकर कुछ ज्यादा ही मुदित और मुग्ध थे। मैक्स मूलर भी ‘मोक्ष मूलर’ होकर कैवल्य का सुख लूटते थे। भारतीय विद्वानों ने इन नामों के संस्कृत अनुवाद को लेकर काफी हास-परिहास किया है। महावीरप्रसाद द्विवेदी और चन्द्रधर शर्मा गुलेरी तो खूब ही चुटकी लेते हैं।

समय में बदलाव के साथ शब्द के अर्थ भी बदलते रहे हैं। वेदों का अनुवाद आज की संस्कृत भाषा के प्रचलित शब्दार्थों के सहारे नहीं हो सकता ठीक जैसे शेक्सपीयर के जमाने की अंग्रेजी का अनुवाद आज के प्रचलित शब्दों और अर्थों के सहारे असंभव है। निरुक्तकार यास्क ने भी वेद से लगभग 400 ऐसे शब्द गिनाये हैं जिनके अर्थ उन्हें भी नहीं मालूम थे। लगभग चार सौ शब्द थे जिनका ओर-छोर ज्ञात नहीं हो पा रहा था। इस वैयाकरण ने उन शब्दों की एक सूची भी दी है। इसलिए एक अच्छे अनुवादक से उम्मीद की जाती है कि भाषा की समझ के साथ ही उसका इतिहास बोध भी विकसित हो।

प्रत्येक विषय की अपनी भाषा है, उसके खास पारिभाषिक शब्द हैं जिनकी बारीकी का पता उस विषय के जानकार ही को होता है। इसलिए अनुवाद की आदर्श स्थिति यह है कि कविता का अनुवाद कवि करे, कहानी का अनुवाद कहानीकार और समाज विज्ञान की पुस्तकों का अनुवाद कोई समाज विज्ञानी ही करे। तभी विषय के साथ न्याय की उम्मीद की जा सकती है।

कुछ अनुवादों ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया है। तोलस्तोय की किताब का पुनरुत्थान नाम से भीष्म साहनी का अनुवाद और नेहरू की 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' का हिंदुस्तान की कहानी नाम से सस्ता साहित्य मंडल का अनुवाद उम्दा कहा जा सकता है। नेहरू की ही लेटर्स फ्रॉम ए फादर टू हिज डॉटर के अनुवादक प्रेमचंद जी हैं। उस अनुवाद पर कौन टिप्पणी कर सकता है! हावर्ड फास्ट के 'ग्लैडिएटर' उपन्यास का अमृतराय ने आदिविद्रोही नाम से बेजोड़ अनुवाद किया है। मैं तो ई. एच. कार की 'व्हाट इज हिस्ट्री' के अनुवादक अशोक चक्रधर की भी तारीफ किये बगैर नहीं रह सकता।