Thursday, October 1, 2026

स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो हि भयावह:

दुनिया की हरेक भाषा में देश, काल और परिस्थिति के हिसाब से शब्द के अर्थ बदलते रहे हैं। कहना न होगा कि धर्म शब्द भी अपना अर्थ बदलता रहा है। यह शब्द 'धृ' धातु से बना है जिसका तात्पर्य है धारण करना, आलंबन देना, पालन करना आदि। यात्रा की अपनी आरंभिक अवस्था में वस्तु की प्रकृति धर्म है। इस धर्म को कहीं-कहीं ऋत शब्द से भी द्योतित करने की कोशिश की गई है। इस समय प्रकृति और मानव समाज की अत्यंत सहज और बालसुलभ समझ थी। इस दृष्टिकोण के हिसाब से विश्व की वह हर वस्तु जो प्रकृति के अनुसार कार्य करती है, ऋत कहलाती है। यह प्रकृति यानी ऋत ही थी कि सूर्य प्रातःकाल उदित होता है और सायंकाल अस्त हो जाता है। इसी के साथ ऋत एक ऐसी सत्ता भी थी जो सूर्य को अविचलित भाव से उसके निर्धारित क्रम से संचालित रखती थी। यदि सूर्य अपने मार्ग से विचलित होता तो ऋत का देवता वरुण उसे दंडित कर सकता था। यही बात समस्त मानवीय क्रियाकलाप पर भी लागू होती थी। यह धर्म की ऋग्वैदिक/पूर्ववैदिक पृष्ठभूमि थी। 

ऋग्वेद (5/76/2) में संस्कृत शब्द 'धर्म' बरतन के लिए प्रयुक्त हुआ है। (धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 176) अथर्ववेद में धर्म शब्द का प्रयोग 'धार्मिक क्रिया संस्कार करने से अर्जित गुण' के अर्थ में हुआ है। ऐतरेय ब्राह्मण में धर्म शब्द सकल धार्मिक कर्तव्यों के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। छान्दोग्य उपनिषद में धर्म का एक महत्त्वपूर्ण अर्थ मिलता है जिसके अनुसार धर्म की धर्म की तीन शाखाएँ मानी गई हैं-(1) यज्ञ, अध्ययन एवं दान अर्थात गृहस्थधर्म (2) तपस्या अर्थात तापस धर्म तथा (3) ब्रह्मचारित्व अर्थात आचार्य के गृह में अंत तक रहना। यहां से धर्म आश्रम धर्मों/कर्तव्यों की ओर संकेत करता हुआ विशिष्ट अर्थ ग्रहण करना शुरू करता है। यहां आकर धर्म मानव के विशेषाधिकारों, कर्तव्यों, बंधनों, वर्णाश्रम तथा वर्ण की योग्यता/अयोग्यता में परिणत हो गया। तैत्तिरीयोपनिषद में छात्रों को 'सत्यं वद' और 'धर्मं चर' का जो पाठ पढ़ाया जा रहा है, इसी वर्णाश्रम धर्म की बात करता है। भगवद्गीता के 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः' में धर्म और कुछ नहीं, वर्णधर्म है।

यह 'धर्म' से 'स्वधर्म' तक की यात्रा है। 'स्वधर्म' की रक्षा की भावना का विकास राजसत्ता के लिए बड़ी ही उपयोगी है। कहा भी गया है कि राजधर्म सर्वोपरि है। राजधर्म वर्णाश्रम धर्म के अनुपालन को सुनिश्चित करना है। गीता में 'स्वधर्म' का पालन न होने से उत्पन्न परिस्थितियों का बड़ा ही भयावह चित्र खींचा गया है। कहा गया है कि 'जब अधर्म फैल जाता है तब परिवारों की स्त्रियां भ्रष्ट हो जाती हैं। और जब स्त्रियां भ्रष्ट हो जाती हैं तब वर्णसंकर पैदा होता है अर्थात विभिन्न जातियों का मिश्रण हो जाता है।' कहने की जरूरत नहीं कि सामाजिक व्यवस्था सामान्यतया सत्ता के प्रति आज्ञापालन पर निर्भर रहती है। तभी सुकरात ने भी क्रिटो से कहा था कि 'वह एथेंस के उन कानूनों को नहीं तोड़ेगा जिन्होंने उसका पालन-पोषण किया है, उसकी रक्षा की है और सदा उसका ध्यान रखा है।'

प्रसंगवश, महाभारत के शांतिपर्व में उल्लिखित एक तथ्योद्घाटक अनुच्छेद का उल्लेख मात्र करूँगा। इस अनुच्छेद में ब्राह्मणों और क्षत्रियों में संबद्धता और एकता पर बल देने की बात करते हुए शिकायत की गई है कि शूद्रों और वैश्यों ने एक स्तर पर, स्वेच्छा से ब्राह्मणों की पत्नियों के साथ अपने संबंध स्थापित करना आरंभ कर दिया है। अतः इससे जान पड़ता है कि उनकी (शूद्रों की) स्थिति कीड़ों-मकोड़ों जैसी होने के बावजूद (जघन्य अपराध के होते हुए) उन्होंने ब्राह्मणों की पावन ‘संपदा’ ब्राह्मण पत्नियों को अपने वश में कर लिया था। 

'वर्णधर्म' अथवा 'स्वधर्म' का पालन मनुष्य का सर्वोत्तम कर्त्तव्य माना गया है। वर्णधर्म पालन से मुकर जाना अधर्म है। शम्बूक वध की कथा हम सब जानते हैं। यह कथा रामायण में बड़े विस्तार से कही गई है। कुछ सौम्य रूप देकर भवभूति ने इस प्रसंग को उत्तररामचरित में भी ले लिया है. बेचारा शम्बूक मर्यादापुरुषोत्तम राम के हाथों सिर्फ इसलिए मारा गया कि उसने भगवान को याद किया था। शम्बूक का वध करना राजा राम का राजधर्म था। यह वह समय था जब शूद्रों को वेदपाठ तक करने से रोक दिया गया था। पढ़ना तो दूर अगर भूल कर भी शूद्र वेद सुन लें तो उसके कानों शीशा पिघला कर डाल देने का सख्त से सख्त प्रावधान था। ऐसा था हमारा प्रगतिशील हिंदू धर्म, जिसमें अपने ही धर्मावलंबियों को अपना धर्मशास्त्र पढ़ने का अधिकार नही था। शूद्रों के लिए धर्म के सारे रास्ते बंद थे किन्तु सत्ता के नियामक ब्राह्मणों की तो बात निराली थी। वे तो धर्म का निर्माण करने वाले थे। जरूरत पड़ने पर वे धर्म को ठेंगा भी दिखा सकते थे, उसमें आवश्यक संशोधन करने में समर्थ थे। मनुस्मृति में लिखा है- “आपत्तिकाल में ब्राह्मण गर्हित जनों को, जिन्हें वेद पढ़ने का अधिकार नहीं हैं, उन्हें पढ़ाएं, उनसे यज्ञ कराएं और दान लें तो उन्हें (ब्राह्मणों को) दोष नहीं है क्योंकि वे जल और अग्नि के समान पवित्र हैं।”

बेचारा शंबूक मर्यादा पुरुषोत्तम राम के हाथों सिर्फ इसलिए मारा गया कि उसने भगवान को याद किया था। परन्तु ऐसी घटना बुद्ध से पहले या बौद्ध धर्म के हिंदुस्तान में रहते हुए कभी घटी हो, इसका प्रमाण कहीं भी नही मिलता। इस कहानी के रचयिता का हेतु केवल यही दिखाना होगा कि राजा को ऐसा बर्ताव करना चाहिए। इसकी ऐतिहासिकता चाहे जो रही हो, शम्बूक का अपराध था कि उसने मुक्ति के लिए भक्ति का मार्ग पकड़ना चाहा था जबकि शूद्र वर्ण की मुक्ति तीन उच्च वर्णों की सेवा से ही सम्भव है।

हिन्दू धर्मग्रंथों की तरह प्राचीन बौद्ध धर्म में समता के सिद्धांत का आलंबन रहने पर भी अभिजात तंत्र की ओर विशेष झुकाव था। बौद्धों ने वर्ण व्यवस्था के आधारभूत तथ्यों का शायद ही कभी खुलकर विरोध किया, जिसके अनुसार शूद्रों को सेवि वर्ग के अंतर्गत रखा गया था। ब्राह्मणों का यह दावा था कि वे अन्य तीन वर्णों से श्रेष्ठ हैं, किंतु गौतम बुद्ध ने इसका खंडन करते हुए बताया कि जहाँ तक उद्गम का प्रश्न है, क्षत्रिय उच्च हैं और ब्राह्मण निम्न। पर ये वैश्यों या शूद्रों की अपेक्षा न तो ब्राह्मणों और न क्षत्रियों की ही श्रेष्ठता पर आपत्ति करते हैं। बौद्ध धर्म केवल यह बताने का प्रयास करता है कि मुक्ति की खोज में जाति का कोई महत्त्व नहीं। 

ईसाई धर्म की ही तरह बौद्ध धर्म ने भी दासता की बुनियाद पर कभी कोई आघात नहीं किया। उन्होंने शूद्रों की आर्थिक एवं राजनैतिक अशक्तताओं को भी दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया। उलटे बौद्ध संघ का दरवाजा गुलामों और कर्जखोरों के लिए बंद था, और बौद्ध धर्म कर्ज की अदायगी पर जोर देता था। ध्यान देने की बात है कि बुद्ध ने समाज की व्यवस्था के उल्लंघन का कभी समर्थन नहीं किया और उन्होंने भागे हुए दासों को अपने धर्म में दीक्षित करने से इनकार कर दिया। बौद्ध धर्म के प्रचलित नियमों के अनुसार कोई भिक्षु सम्बद्ध साहूकार की अनुमति के बिना किसी कर्जदार/दास को दीक्षित करता है तो वह (धर्म के विरुद्ध आचरण का) अपराधी है।

धम्म अट्ठकथा में एक जगह वर्णन है, "एक दासी अपनी रोटी बुद्ध को भेंट करके अपने आप से कहती है कि बुद्ध ने इसे सौजन्य से स्वीकार किया है और थोड़ा-सा आगे जाकर वे इसे किसी कौवे या कुत्ते को डाल देंगे।"

भारतीय समाज राजसत्ता की असहिष्णुता से लड़ने की अपनी तरकीब विकसित करता रहा है। धर्मांतरण को इसी प्रकाश में देखे जाने की जरूरत है। इतिहासकार रामशरण शर्मा ने लिखा है, 'विचार करने की बात है कि भारत में धर्म के रूप में इस्लाम केवल उन क्षेत्रों में ही पैर जमा सका जो बौद्ध धर्म के मजबूत गढ़ थे. यह बात कश्मीर, उत्तर-पश्चिमी सीमांत क्षेत्र, पंजाब और सिंध के बारे में सच लगाती है. उसी तरह नालंदा (बिहार शरीफ़), भागलपुर (चम्पानगर) और बंगलादेश में, जहाँ बौद्ध काफी संख्या में रहते थे, मुस्लिम आबादी है.' (रामशरण शर्मा, सांप्रदायिक इतिहास और राम की अयोध्या, पृष्ठ 13) स्पष्ट है कि कुछ सालों पहले देश की राजधानी दिल्ली में जो व्यापक धर्मांतरण हुआ वह हमारे इतिहास की पहली अप्रत्याशित घटना नहीं है बल्कि कहिए कि अम्बेदकर के बाद पहली बार इसने हिन्दुत्व की रीढ़ सीधी की। धर्मांतरण की इस घटना से सहिष्णु होने का हमारा दंभ भाप बनकर उड़ गया। धर्मांतरण को शोषित जनता ने पहली बार बौद्ध-काल में अपना हथियार बनाया। तब से आज तक उसकी एक जीवित परंपरा है।

बौद्ध धर्म : असंबद्ध टिप्पणियां

बौद्ध धर्म और बुद्धिजीवी

मैं सालों से समझने की कोशिश में हूँ कि बौद्ध धर्म पर दलित बुद्धिजीवी से लेकर कुछ मार्क्सवादी तक क्यों लट्टू हैं? आंबेडकर से लेकर राहुल सांकृत्यायन तक। सांकृत्यायन ने तो यहाँ तक लिखा कि बौद्ध धर्म 'हैब्स और हैवनॉट्स' का संघर्ष था। (देखें पीपीएच से प्रकाशित 'बुद्धिज्म : ए मार्क्सिस्ट एप्रोच' में राहुल सांकृत्यायन का लेख) आज भी यह हमारे बुद्धिजीवियों के लिए एक कमजोरी बना हुआ है। हमारे समय के कई 'क्रन्तिकारी' विचारक आंबेडकर में 'सर्वहारा क्रांति' की दार्शनिक पृष्ठभूमि खोजने में लगे हैं। उनकी बौद्धिक मेधा की तुलना कभी बुद्ध और मार्क्स तो कभी भगत सिंह से करते हैं। यह सही है कि भारतीय मार्क्सवादी विचारकों ने उन सवालों को कमतर महत्त्व दिया जिनको बाबा साहब उठा गये हैं। लेकिन 'प्रायश्चित' का मतलब यह तो नहीं होता कि हम मार्क्सवाद को भूलकर आंबेडकर की राह चलना शुरू कर दें। एक मार्क्सवादी को भारत-जापान संस्कृति परिषद् के सम्मान में  आयोजित समारोह में दिया गया आंबेडकर का वक्तव्य स्मरण रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि 'वर्तमान और भावी पीढ़ी को अंततोगत्वा बुद्ध या मार्क्स दोनों में से एक के सिद्धांत को चुनना पड़ेगा। यदि बुद्ध के उपदेशों को स्वीकार नहीं किया गया तो एशिया में भी यूरोप की भांति संघर्षों का दौर शुरू हो जायेगा।' और हमारे मार्क्सवादी मित्र हैं कि कभी बुद्ध पकड़ते हैं तो कभी आंबेडकर। इस आपाधापी में बेचारे मार्क्स ही हमसे किनारा होते जाते हैं।

सच है कि प्राचीन बौद्ध धर्म में समता के सिद्धांत का आलंबन रहने पर भी अभिजात तंत्र की ओर विशेष झुकाव था। (ओल्डेनबर्ग, 'बुद्ध', पृष्ठ 155-9) बौद्धों ने वर्ण व्यवस्था के आधारभूत तथ्यों का शायद ही कभी खुलकर विरोध किया, जिसके अनुसार शूद्रों को सेवि वर्ग के अंतर्गत रखा गया था। ब्राह्मणों का यह दावा था कि वे अन्य तीन वर्णों से श्रेष्ठ हैं, किंतु गौतम बुद्ध ने इसका खंडन करते हुए बताया कि जहाँ तक उद्गम का प्रश्न है, क्षत्रिय उच्च हैं और ब्राह्मण निम्न। पर ये वैश्यों या शूद्रों की अपेक्षा न तो ब्राह्मणों और न क्षत्रियों की ही श्रेष्ठता पर आपत्ति करते हैं। (दीघ निकाय, I, पृष्ठ 91-98) बौद्ध धर्म केवल यह बताने का प्रयास करता है कि मुक्ति की खोज में जाति का कोई महत्त्व नहीं। (फिक, दि सोशल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ नॉर्थ ईस्टर्न इंडिया, पृष्ठ 31) 

ईसाई धर्म की ही तरह इस काल के धार्मिक-सुधार आंदोलनों ने भी दासता की बुनियाद पर कभी कोई आघात नहीं किया। उन्होंने शूद्रों की आर्थिक एवं राजनैतिक अशक्तताओं को भी दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया। उलटे बौद्ध संघ का दरवाजा गुलामों और कर्जखोरों के लिए बंद था, और बौद्ध धर्म कर्ज की अदायगी पर जोर देता था। (रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, पृष्ठ 127) ध्यान देने की बात है कि बुद्ध ने समाज की व्यवस्था के उल्लंघन का कभी समर्थन नहीं किया और उन्होंने भागे हुए दासों को अपने धर्म में दीक्षित करने से इनकार कर दिया। (देवराज चानना, प्राचीन भारत में दास प्रथा, पृष्ठ 95, पादटिप्पणी संख्या 191) बौद्ध धर्म के प्रचलित नियमों के अनुसार कोई भिक्षु सम्बद्ध साहूकार की अनुमति के बिना किसी कर्जदार/दास को दीक्षित करता है तो वह (धर्म के विरुद्ध आचरण का) अपराधी है। (समंतपासादिका, पृष्ठ 999; देवराज चानना, प्राचीन भारत में दास प्रथा, पृष्ठ 152 में उद्धृत) 

"एक दासी अपनी रोटी बुद्ध को भेंट करके अपने आप से कहती है कि बुद्ध ने इसे सौजन्य से स्वीकार किया है और थोड़ा-सा आगे जाकर वे इसे किसी कौवे या कुत्ते को डाल देंगे।" (धम्म अट्ठकथा 3/121; चानना, पूर्वोक्त, पृष्ठ 130, पादटिप्पणी संख्या 141 में उद्धृत)

क्या है बुद्ध का ज्ञान?

सिद्धार्थ गौतम को ज्ञान प्राप्त हुआ, यह प्राचीन भारतीय इतिहास की सर्वाधिक प्रचारित परिघटना है। ज्ञान था कि दुःख है, दुःख का कारण है और उसके निवारण के उपाय हैं। बुद्ध का ज्ञान जब कहता है कि दुख का कारण इच्छा है, तो उन्होंने सामाजिक संस्थाओं से, सामाजिक वातावरण से उत्पन्न दुख पर विचार नहीं किया ।(जयप्रकाश नारायण, समाजवाद सर्वोदय और लोकतंत्र, बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, जून 1988, पृष्ठ 116) किन्तु सत्य है कि यह भारतीय इतिहास में कार्य-कारण संबंध की खोज या प्रस्थापना है। इस रूप में बुद्ध का यह ज्ञान महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी अवश्य है लेकिन जिस तरीके से वे ज्ञान प्राप्त करते हैं, उसकी कहानी बड़ी दिलचस्प है। कहानी है कि बुद्ध ने बीमार आदमी को देखा, वृद्ध को देखा और फिर मृतक को देखा। ये सारे दुख के दृश्य हैं। मजेदार है कि दुःख के इन दृश्यों में सामाजिक समस्या से जुड़ा एक भी दृश्य नहीं है। मसलन किसानों का दुख, दासों का दुख आदि आदि। आप यह भी कह सकते हैं कि बुद्ध के दुःख का सामाजिक सरोकार नहीं है।

ज्ञान-प्राप्ति की एक दूसरी कहानी भी है। बुद्ध कई दिनों से अन्न त्यागे हुए हैं। कभी-कभी अखाद्य खा लेते हैं। तभी सुजाता खीर के साथ प्रकट होती है। जंगल में आकाशवाणी भी होती है कि 'वीणा के तार को इतना न कसो कि टूट जाए, न इतना ढीला रखो कि आवाज ही न निकले।' बुद्ध को ज्ञान मिला कि 'बीच का रास्ता ही रास्ता है'। तब हमारे प्रिय कवि पाश नहीं थे कि कहते, बीच का रास्ता, रास्ता नहीं होता।

बुद्ध ने मध्यम मार्ग अपनाया। इस मध्यम मार्ग का एक ऐतिहासिक सन्दर्भ है। उनके समय में समाज में उथल-पुथल था। किसानों का शोषण इतना बढ़ चुका था कि वे खेती और गांव छोड़कर भाग रहे थे। प्राचीन काल में पलायन किसान विद्रोह का सबसे प्रकट रूप है। बुद्ध ने भूपतियों/ शासक वर्ग से आग्रह किया कि वे किसानों को हल, बैल तथा बीज आदि की व्यवस्था करें। इधर संघ में दास/दासियों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया ताकि प्रभु वर्ग को मुफ्त श्रमिक उपलब्ध हो सके। यह बुद्ध के मध्यम मार्ग का केवल एक उदाहरण है। इसी मध्यम मार्ग से बुद्ध को राज्याश्रय प्राप्त होते थे।

बुद्ध, बौद्ध साहित्य और स्त्री-विमर्श

कथा है कि 'प्राचीन भारत में सड़कों पर यात्रियों के आराम के लिए धर्मशालाएं होती थीं। ऐसी एक शाला बनवाने के संबंध में एक जातक में एक मजेदार कहानी आई है। बोधिसत्त्व और उसके एक बढ़ई साथी ने एक चौमुहानी पर एक सभा बनवाई, पर उन्होंने यह निश्चय किया कि वे उस धर्मकार्य में किसी स्त्री की सहायता नहीं लेंगे, पर स्त्रियां इस तरह प्रण से भला कहाँ धोखा खानेवाली थीं। उनमें से एक स्त्री बढ़ई के पास पहुंची और उसने शिखर बनाने के लिए कहा। बढ़ई के पास शिखर बनाने के लिए सूखी लकड़ी तैयार थी, जिससे उसने खरादकर शिखर तैयार कर दिया। जब सभा का बनना समाप्त हो गया, तब बनानेवालों को पता लगा कि शिखर नदारत था, उसके लिए बढ़ई से कहा गया। बढ़ई ने उन्हें बतलाया कि शिखर एक स्त्री के पास है। स्त्री से उनलोगों ने शिखर मांगा, पर उसने उन्हें वह तबतक देने से इनकार किया, जबतक कि वे उसे अपने पुण्यकार्य में साझी बनाने को तैयार न हों। झख मारकर स्त्री-विरोधियों को उसी शर्त पर शिखर लेना पड़ा।' (जातक, 1, 201; डॉक्टर मोतीचंद्र, सार्थवाह, बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद, पटना, द्वितीय संशोधित संस्करण : 1966, पृष्ठ 54)

एक दूसरी कथा है कि देवी महामाया को स्वप्न आया कि 'उज्ज्वल वर्ण हाथी के रूप में बोधिसत्त्व ने शयनकक्ष में प्रवेश किया। तीन बार प्रदक्षिणा की। फिर देवी की कुक्षि में प्रवेश किया।' स्वप्न का रहस्य पूछे जाने पर ब्राह्मणों ने उत्तर दिया, 'राजन! देवी ने गर्भ धारण किया है।' राजन के लिए उत्तर अपर्याप्त था, अतः मृदु स्वर में पूछा, 'महात्मन का रूप क्या होगा!' प्रश्न का 'तात्पर्य' जानकर ब्राह्मणों ने उत्तर दिया-'देवी की कुक्षि में स्थित गर्भ पुत्र है, कन्या नहीं है।' राजा का कमल मुख खिल गया। (रघुनाथ सिंह, बुद्धकथा, हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी, 1990, पृष्ठ 4)

सिद्धार्थ का मन असार संसार में न रमता था। इसलिए उन्हें खुश करने को कमिनियाँ छोड़ी गईं। कमनीय कामिनियों को राजाज्ञा थी राजकुमार को प्रसन्न करने की। आगे-पीछे 'काम-पुतलियां' चलीं। 'कोई पुष्पित तरु छाया में पालना झूलने चली। जानकर कोई गिर गयी। आशा से-उसे उठा लेंगे। कोई पुष्पसज्जिता उनके सम्मुख पुष्प गिराती चली। कोई कटाक्ष करती समीप से निकल गयी। उनके कंठ में माला डालने के व्याज से किसी ने अपने पीन पयोधर का स्पर्श उनके वक्षस्थल से करा दिया।'

'एक मदोद्धत उत्तुंग पीनपयोधरा रूपसी ने उनका स्पर्श किया। मुस्कुराई। उनके स्कंध प्रदेश पर अपना कपोल रख दबाया।'

'मृदुबाहुलता बाला ने गिरने का बहाना कर उनका आलिंगन कर लिया। मदिर गंध युक्त मुख उनके श्रवणों के पास ले जाकर, कुछ कहने के व्याज से अपना अधर उनके कपोल से लगा दिया।'

'एक मुखर कामिनी की स्वर्ण मेखला कटि प्रदेश से जंघा पर फिसल आयी थी। मेखला ठीक करती हुई, उसने सूक्ष्माम्बर से अपना स्थूल नितंब प्रदर्शित कर दिया।'

'मंजरी-पूर्ण आम्र शाखा से झूलकर एक गौरांगना ने अपना सुवर्ण-कलश सदृश सुंदर स्तन-युगल और अनावृत वक्ष दिखा दिया।' (रघुनाथ सिंह, बुद्धकथा, पृष्ठ 19)

ऊपर की पंक्तियों से बुद्धकालीन समाज और बौद्ध साहित्य का 'स्त्री-विमर्श' समझा जा सकता है।

जीवेत शरदः शतम

आजकल का कोई भद्र व्यक्ति किसी सभा-सोसायटी में छींकता है तो शिष्टाचार की मर्यादा का ध्यान देते हुए वह अंग्रेजी का 'सॉरी' शब्द कहता है, लेकिन बचपन का अनुभव है कि अगर हम बच्चे कभी छींकते तो घर की बड़ी-बूढ़ियाँ तुरत 'छत्तन जी' कहकर उसका प्रतिकार करतीं। बहुत दिनों तक तो यह पता ही नहीं चला कि ये 'छत्तन जी' कौन बला हैं। तभी गाँव में आर्यसमाजियों की एक टोली पहुंची। उनकी किसी शाम की सभा से रहस्योद्घाटन हुआ कि  'छत्तन जी' दरअसल संस्कृत का 'शतम जीवेत' है।

प्राचीन भारत में किसी को आशीर्वाद देते समय 'जीवेत शरदः शतम/पश्येम शरदः शतम' अर्थात सौ शरद जीने और सौ शरद देखने की बात कही जाती थी। तब आज के जैसा ठाकुर प्रसाद का छपा हुआ कैलेंडर नहीं था, इसलिए लोग एक बरसात से दूसरी बरसात की अवधि को वर्ष मान लेते थे। बरसात में नदियों में नियमित बाढ़ आती थी। प्राकृतिक अवलोकन एवं अनुभव से उन्हें मालूम हो चला था कि दो बरसात/बाढ़ के बीच की अवधि सालभर की है। भाषाविज्ञान भी बताता है कि वर्ष का संबंध वर्षा से है। बरसात के ठीक बाद शरद ऋतु है। वर्ष की गिनती शरद से भी होती रही है। इसीलिए वर्ष और साल का एक पर्यायवाची शब्द शरद भी है। (संस्कृत शब्द कौस्तुभ, पृष्ठ 830; भोलानाथ तिवारी, शब्दों का जीवन, पृष्ठ 111) 

वनस्पति विज्ञान की बात करें तो बरसात की ऋतु में पौधे में वृद्धि होती है और शरदकाल में वलय (रिंग) का निर्माण होता है। एक वलय से दूसरे वलय तक पहुंचने में पौधे को सालभर का समय लगता है। शायद इसलिए भी वर्ष की माप शरद से शरद तक की जाती रही है, लेकिन अब के लोग शरद नहीं वसन्त देखने की बात करते है। शरद को वसन्त ने कब पदच्युत किया, यह शोध का विषय हो सकता है!

कविता, संस्कृति का हिस्सा है

कविता, संस्कृति का एक हिस्सा है और निरंतर कविता, संस्कृति को बढ़ाने का भी काम करती है जिसका मनुष्य एक अहम हिस्सा है। इसलिए कह ले सकते हैं कि कविता सबसे पहले रचनाकार को बदलती है। कविता लिखने के बाद या लिखते हुए कवि एक सामान्य आदमी से ऊपर उठा होता है। अगर कविता यह करने में असफल हो तो रचनाकार की भी असफलता मानी जा सकती है। समाज भी व्यक्तियों से बना है। इस हिसाब से कविता समाज को बदलने का काम करती है लेकिन यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है। इतनी लंबी कि कभी-कभी हम बदलने या बदले जाने की आशा खो बैठते हैं। कविता और समाज परस्पर एक-दूसरे को बदलने की चेष्टा करते हैं, ऐसा नहीं कि सिर्फ कविताएं ही समाज को बदलती हैं। बल्कि समाज भी कविता पर अपना असर छोड़ते चलता है तभी तो कोई कविता किसी समय में ज्यादा मूल्यवान होती है और कभी अपना अस्तित्व खो बैठती है। यह सभ्यता और संस्कृति का विराट संघर्ष है। कविता समाज को बदलने में उस तरह का औजार कभी नहीं होती, जिस तरह से समाज को उत्पादन के औजार और तकनीकी विकास बदलते हैं।

 समय भी कविता को प्रभावित करते चलता है। कविता ही नहीं, हमारी फिल्मों में जो वाक्य संरचना है, वह छोटी होती जा रही है। संस्कृत से प्रभावित वाक्य लंबे हुआ करते थे। यह आधुनिकता की एक पहचान भी हो सकती है। हमारे पास आज वैसे नायक नहीं हैं जैसे सामंती युगों में हुआ करते थे। इसलिए महाकाव्य भी नहीं रहे। लंबी कविता के संदर्भ में देखें, तो निराला, मुक्तिबोध के बाद आलोकधन्वा ही लंबी कविता को साध पाते हैं। वजह यह भी हो सकती है कि निराला और मुक्तिबोध की कविताओं में जो एक व्यापक, विश्वजनीन (वैश्विक) दृष्टि है वह हिन्दी के कई कवियों के पास अनुपलब्ध है। तकनीकी विकास ने हमारे समय और समाज को संक्रमणशील बना दिया है। हमारे मूल्य स्थायी भाव लेकर नहीं आते। रोजमर्रा के सामान अब लिखो-फेंको की शैली में आते हैं। यानी हमारी जीवन दृष्टि बदल गई है। हिन्दी कविता इन कारणों की व्यापक जड़ की तलाश में कई अलग-अलग कहानियां गढ़ती है। इन कहानियों को एकसूत्र किये बगैर लंबी कविता लगभग असंभव है।

इन दिनों कविता के सामने नयी चुनौतियां आयी हैं। हमारा वर्तमान समय तकनीकी परिवर्तन का समय है। यह समय आउटडेटेड होने का भी है। कविता हमारी समस्याओं का बहुत ठोस रूप में समाधान नहीं कर सकती। कविता न रोटी पैदा कर सकती है न गरीबी की आग ही बुझा सकती है। यह हमारे अंदर सौंदर्य बोध पैदा कर सकती है जिससे अप्रत्यक्ष रूप से हम मनुष्य विरोधी होने से बच सकते हैं। इसी संदर्भ में कविता की भूमिका जांची जा सकती है। हमारे समय की कविता अपना काम बखूबी कर रही है।

 मुझे लगता है कि आज लेखक आम आदमी हो गया है। लेखक की सामाजिक हैसियत आम आदमी से अलग नहीं है। तब तो आम आदमी का विस्तार आप कह सकते हैं जिसमें एक बहुत बड़ी फौज वैसी है जिसका शब्दों की दुनिया से कोई बना-बनाया रिश्ता नहीं है। आम आदमी की कविता कहते हुए अक्सर हम भ्रम के शिकार होते हैं। निराला की कविता अपने ही समानधर्मा को समझ में नहीं आ रही थी। मुक्तिबोध भी कम कठिन कवि नहीं हैं। दुनिया को बदलने का मार्क्स ने जो घोषणा पत्र तैयार किया वह अर्थशास्त्र के पंडितों को भी समझ में नहीं आता। लेकिन एक समय आता है जब एक अपढ़ व्यक्ति भी मार्क्सवाद के पक्ष में खड़ा दिखता है। आम जन की कविताएं और लोकप्रिय कविताएं दो अलग चीज हैं। साहित्य में लोकप्रियतावाद सबसे घटिया चीज है जिसके शिकार लेखक बनते रहे हैं। एक समय में कोई कविता लोगों की जुबान पर होती है, जैसे होली में कीचड। फिर साल भर हम उससे अलग रहते हैं। दिनकर और बच्चन लोकप्रिय रहे हैं, किन्तु हिन्दी साहित्य या संकीर्णता में कहें तो आम जन के साहित्य में इनकी बहुत थोड़ी भूमिका रही है।

 आलोचक नंदकिशोर नवल ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि एक असफल कवि आलोचक हो जाता है। नवल जी शायद अपनी बात कर रहे हैं, यद्यपि उनका मानना है कि वे तो आलोचक भी नहीं हो सके। यह एक बुझौअल की तरह है कि असफल कवि आलोचक हो जाता है। एक असफल मनुष्य भेड़-बकरी नहीं होता। इस तरह के कथन का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। बचपन में पढ़ते हुए ऐसा लगा था कि प्रेमचंद गणित में फेल करते थे, इसलिए उपन्यासकार हो गए। कविता लिखने और आलोचना करने को मैं अलग करके नहीं देखता। कविता भी संस्कृति की आलोचना ही है। अलबत्ता दोनों के फॉर्म में फर्क है। इधर प्रेमकुमार मणि ने एक अखबार (शिखर भारतेन्दु) में कहा कि कविता सामंती समाज की विधा है। ऐसा कहते हुए कई तरह के अर्थ संप्रेषित किये जा सकते हैं, अर्थात् कविता सामंती समाज की उपज है अथवा कविता अपने चरित्र में सामंती है। दोनों ही अर्थ सही नहीं लगते। हमारे यहां कविता ऋग्वेद से शुरू होती है जहां समाज कबीलाई है। बराबरी का हक और दावा है। समाज में अभी चौधरी नहीं बने हैं। यहां से हटकर सामंती समाज में भी कविता विद्रोह की कविता है। कल्पना करें तुलसीदास के समाज की जिसमें पिता की आज्ञा अकाट्य है, वहां भी लक्ष्मण के बेहोश होने पर राम पिता की आज्ञा के विरुद्ध जाते वक्तव्य देते हैं। बगीचे में राम और सीता के बीच प्रेम का पैदा होना सामंती मूल्यों के विरुद्ध ही जाता है। तुलसीदास का यह कहना कि धूत कहो अवधूत कहो, रजपूत या जोलहा जो चाहो, कह लो, क्या सामंती और मनुवादी मिजाज की कविता है ? पाठक कई बार पूर्वाग्रहों का शिकार होता है। एक अच्छा पाठक और लेखक इससे बचने की कोशिश करता है। जो जितना बच पायेगा वह उतना ही बड़ा व्यक्ति, लेखक और पाठक होगा। सत्ता पर बैठा हुआ व्यक्ति भी जब कविता की सोचता है तो सत्ता-विरोधी हो जाता है। तभी तो अशोक वाजपेयी जैसा कवि कई बार 'क्रांतिकारी' लगने लगता है।                                                                                

शिखर भारतेन्दु, शिमला, 7 जून, 2003

पाणिनि की सांस्कृतिक विरासत

इतिहास और साहित्य के विद्यार्थी इस बात से वाकिफ हैं कि किसी ने 'परंपरा का मूल्यांकन' किया तो किसी ने 'दूसरी परंपरा की खोज' कर डाली और हम विवाद में उलझे-फंसे रहे कि यह परंपरा कि वह परंपरा। इन बहसों से जो बात छनकर आ रही थी कि अतीत में कोई एक परंपरा नहीं होती बल्कि परंपराएं होती हैं, उसको हमलोगों ने यथोचित ग्रहण नहीं किया। यह हमारी सांस्कृतिक अनुदारता है। फिराक गोरखपुरी साहब अक्सर कहा करते थे कि पाणिनि के समय में संस्कृत के 90 तरह के रूप लोक में प्रचलित थे। इसीलिए फिराक इस संस्कृत को 'संस्कृत' न कह 'संस्कृतियां' कहते थे। पाणिनि ने इन 90 रूपों के बीच से संस्कृत का एक मानक रूप गढ़ा और कहा कि यही संस्कृत है। (विश्वनाथ त्रिपाठी, फिराक वार्ता, 'तद्भव', अप्रैल, 2002, पृष्ठ 135) उनके चेलों समेत कई और परवर्ती विद्वानों ने मान लिया कि जो पाणिनि कहे वही मान्य है। इस तरह से पाणिनि के नाम पर संस्कृत भाषा के साथ ज्यादती हुई उससे हम सभी परिचित हैं। इसके दुष्परिणामों से और भी ज्यादा परिचित हैं। एक समय 'पाणिनीय' होना प्रमाण माना जाता था और 'अपाणिनीय' गलत का पर्याय। मेरी जानकारी में पाणिनि के नाम का जो आतंक है उसका जोड़ दुनिया के शायद ही किसी भाषा और साहित्य में हो।

आज जरूरत इस बात की है कि हम सांस्कृतिक उदारता का परिचय देते हुए संस्कृति की जगह संस्कृतियां और परंपरा की जगह परंपराएं मानकर बहस करें और भिन्न परंपरा और संस्कृति के लिए स्पेस छोड़ते हुए जो समय की मांग है उस अनुरूप उससे ग्रहण करें। इस कार्य में परंपरा, संस्कृति और इतिहास का विवेक हमारी मदद करेगा।

अगर प्राचीन भारत का इतिहास देखें तो आधी से अधिक आबादी, अर्थात स्त्री और शूद्र को शिक्षा से दूर रखा गया। कहा गया कि इन्हें वेदपाठ आदि करने का कोई अधिकार नहीं है, ये शब्दों को बिगाड़कर कहते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि तब हम लेखनकला से परिचित नहीं थे, साहित्य केवल मौखिक परंपरा में जीवित रह सकता था। पाणिनि ने कहीं लिखा है कि पुस्तकों के सहारे पढ़नेवाले छात्र निकृष्ट कोटि के माने जाते हैं। वैयाकरण का यह कथन प्राचीन भारत में ज्ञान की समृद्ध वाचिक परंपरा की स्वीकृति/सहमति से ज्यादा कुछ नहीं लगता। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक साहित्य/ज्ञान अपने अपरिवर्तित रूप में जाये, इसके लिए भाषा में शुद्धता, उच्चारण आदि पर एक हद तक 'अनावश्यक जोर' की आवश्यकता थी। ज्ञान की मौलिकता की रक्षा का दायित्व ब्राह्मणों के पास था। उसने लोगों में डर पैदा किया कि मंत्रों के गलत उच्चारण के कुप्रभाव से यजमान को अनिष्ट भोगना पड़ सकता है। इस डर का भी एक सीमा तक ही प्रभाव रहा होगा क्योंकि पाणिनि कई तरह के उच्चारण की बात करता है। उच्चारण की इतनी गड़बड़ी थी कि कई शब्दों के स्रोत, अर्थ और निर्माण/विकास प्रक्रिया उन्हें भी अज्ञात थे। इस समस्या को दूर करने के उद्देश्य से उन्होंने एक 'व्याकरण' तैयार किया। इस व्याकरण से इधर-उधर होने का मतलब 'अपाणिनीय' अर्थात अशुद्ध/गलत होना था।

पाणिनीय व्याकरण की प्रतिष्ठा इतनी अधिक हो चली थी कि बहुत से कवि व्याकरण की पटुता की वजह से ख्याति अर्जित करने लगे थे। कभी-कभी पाणिनी के कहे हुए अप्रचलित प्रयोगों के व्यवहार के कारण कवि की खूब प्रशंसा हुई। राजा भोज ने किसी ग्रामीण ब्राह्मण से पूछा 'नद्यां कियज्जलं विप्र' (नदी में कितना पानी है, ब्राह्मण देवता)? उसने तपाक से उत्तर दिया 'जानुदघ्नं नराधिप' (जंघे तक महाराज)। यहाँ दघ्नच (च हलयुक्त) प्रत्यय का प्रयोग है, जो केवल व्याकरण की पोथी में ही सुरक्षित है। इस अप्रचलित प्रत्यय के प्रयोग के कारण ही राजा भोज प्रसन्न हुए थे और गरीब ब्राह्मण प्रचुर पुरस्कार पाने में समर्थ हुआ था। (हजारीप्रसाद द्विवेदी, मध्यकालीन बोध का स्वरूप, पृष्ठ 78)

संस्कृत भाषा का प्रकाण्ड विद्वान पाणिनि पाठान था और शलातुर (त्रिनेल के उत्तरपश्चिम लाह/लाहुल ग्राम इसे आजकल बताते हैं-नन्दलाल दे) का रहनेवाला था। इसकी माता का नाम दाक्षी था। ह्वेनत्सांग इसकी मूर्ति का शलातुर में उल्लेख करता है। पतंजलि के अनुसार कौत्स इसका शिष्य था। इस पाठान ने 'अष्टाध्यायी' (यह तमिल भाषा के प्रथम व्याकरण तोलक्कपियम की पथ प्रदर्शिका रही। देखें, आर. एच. राॅबिन्स, ‘लिंग्विस्टिक्स इन इंडिया’, आस्पेक्ट्स ऑफ इंगलिश प्रोज (संपा.-के. एम. तिवारी, आर. सी. पी. सिन्हा) विकास पब्लिशिंग हाउस, 1988, पुनर्मुद्रण: 2000, पृष्ठ 14) गणपाठ, धातुपाठ, लिंगानुशासन और शिक्षा लिखी जिसकी समता आज तक किसी अन्य भारतीय ने नहीं की। इसने अपने पूर्व वैयाकरण पिशलि, काश्यप, गार्ग्य, गालव, चक्रवर्मा, भारद्वाज, शाकटायन, शाकल्य, सोनक एवं स्फोटायन सभी को मात कर दिया।

इस पाठान वैयाकरण का काल विवादास्पद है। गोल्डस्टूकर इसे संहिता-निर्माण के समीप का बतलाता है। सत्यव्रत भट्टाचार्य तो इसे यास्क से पूर्व मानते हैं। कौटिल्य केवल 63 अक्षर एवं चार पदों का वर्णन करता है। पाणिनि 64 एवं सुबन्त-तिडन्त दो ही पदों का उल्लेख करता है। सायण अपने तैत्तिरीय ब्राह्मण भाष्य में कहता है कि नाम, आख्यात, उपसर्ग, निपात और चतुष्पद व्याख्या श्रौत है, जिनका यास्क भी अनुसरण करता है, यद्यपि वे पाणिनि विहित नहीं हैं। कौटिल्य ने पाणिनि का अनुसरण न किया, इससे सिद्ध है कि पाणिनि की तब तक जड़ नहीं जमी थी, जिसे इन्हें प्राचीन और प्रामाणिक माना जाता। अपितु पाणिनि, बुद्ध के समकालीन मस्करी (पाणिनि) का उल्लेख करता है। 'आर्यमंजुश्रीमूलकल्प' (जायसवाल, इम्पिरियल हिस्ट्री, पृष्ठ 15) कहता है कि वररुचि, नंद का मंत्री था तथा पाणिनि इसका प्रेमभाजन था। बौद्ध साहित्य में इसे बौद्ध बतलाया गया है। (देवसहाय त्रिवेद, प्राकमौर्य, पृष्ठ 163)

पाणिनि  की पुस्तक को केवल व्याकरण न समझना चाहिए। लेनिनग्राद के सोवियत प्रोफेसर टी. शेरबात्स्की ने उसका बयान करते हुए उसे ‘इन्सानी दिमाग की सबसे बड़ी रचनाओं में से एक’ बताया है। आज भी पाणिनि संस्कृत व्याकरण पर प्रमाण माना जाता है, हालांकि बाद के वैयाकरणों ने उसमें और बातें जोड़ी हैं और उसकी अपने ढंग से व्याख्याएं की हैं। यह एक दिलचस्प बात है कि पाणिनि ने यूनानी लिपि की चर्चा की है। इससे पता चलता है कि हिन्दुस्तान और यूनान के बीच सिकंदर के पूरब जाने से पहले ही किसी-न-किसी तरह का संपर्क हो चुका था। (जवाहरलाल नेहरू, हिंदुस्तान की कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, 1988, पृष्ठ 153) 

कहा जाता है कि पिंगल ने छंदःशास्त्र के लिए जो काम किया वही काम पाणिनि ने व्याकरण के लिए किया। उन्होंने पिंगल-छंदः-सूत्र की रचना की है। उसे चन्द्रगुप्त एवं बिन्दुसार का समकालीन बताया गया है। (सुरेश चन्द्र बनर्जी, कंट्रिब्यूशन ऑफ बिहार टु संस्कृत लिटरेचर, के. पी. जायसवाल शोध संस्थान, पटना, 1973, पृष्ठ 2) यदि 'अशोकावदान'  विश्वस्त माना जाय तो बिन्दुसार ने अपने पुत्र अशोक को पिंगल नाग के आश्रम में शिक्षा के लिए भेजा था। (देवसहाय त्रिवेद, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 163) सूत्र की रचना इसलिए नहीं हो रही है कि शब्द-भण्डार की कमी है, बल्कि इसलिए भी कि कई पीढ़ियों से प्राप्त और संचित ज्ञान को आगे की पीढ़ी को सौंप देना है। इस पूरी प्रक्रिया की सफलता के लिए आवश्यक था कि कम से कम शब्दों का इस्तेमाल हो। वैयाकरणों के संबंध में तो परंपरा से यह अनुश्रुति चली ही आ रही है कि आधी मात्रा भर कम कर देने से वह उतना ही हर्ष मनाता है, जितना कि पुत्रोत्सव के उपलक्ष्य में : 'अर्धमात्रालाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणाः'। वैयाकरण पाणिनि की महत्ता इस बात में भी है कि उन्होंने बहुत छोटे-छोटे सूत्रों के माध्यम से अपनी बात कही है। वे इतने छोटे हैं कि एक मात्रा तक निकाले नहीं जा सकते।

व्याडि (व्याडि नाम से दो विद्वान का पता चलता है। इनमें से प्रथम को सौनक का शिष्य एवं विकृतिवलि का लेखक बताया जाता है। उसका काल पाणिनि से पहले, अर्थात् करीब चैथी शती बताया गया है। इस व्याडि ने 'व्याडिय-संग्रह' की रचना की थी जिसे व्याडि द्वितीय ने पाणिनि के व्याकरण की रोशनी में इसे संशोधित किया। व्याडि द्वितीय को दो पुस्तकों-व्याडिय कोष एवं व्याडिय लिंगानुशासन का लेखक होने का श्रेय प्राप्त है। (सुरेश चन्द्र बनर्जी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 2) पाठान था और अपने मामा पाणिनि के वंश का प्रमाता था, क्योंकि इसे भी दाक्षोयण कहा गया है। इसने लक्षश्लोकों का संग्रह तैयार किया, जिसे पतंजलि (यह निश्चय नहीं हो पाया है कि वैयाकरण पतंजलि और ‘योगसूत्र’ को रचनेवाले पतंजलि एक ही हैं कि दो हैं। वैयाकरण की तिथि तो निश्चित रूप से मालूम है कि ईसा से पहले की दूसरी सदी है। कुछ लोगों की राय है कि योगसूत्र का रचयिता दूसरा ही है, जो इसके दो-तीन साल बाद हुआ है। (जवाहरलाल नेहरू, हिंदुस्तान की कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, 1988, पृष्ठ 247-248, पादटिप्पणी संख्या-1) अत्यंत आदर और श्रद्धा की दृष्टि से देखता है। (पाणिनि 2. 3. 66) भर्तृहरि के 'वाक्यपदीय' में भी कहा गया है कि संग्रह में 14,000 पदों में व्याकरण है। कुछ विद्वानों का मत है कि पतंजलि ने संग्रह के ऊपर ही भाष्य किया, क्योंकि प्रथम सूत्र ‘अथशब्दानुशासनम्’ जिस पर पतंजलि भाष्य करता है, न तो पाणिनि का ही प्रथम सूत्र है और न वार्तिक का ही। 

वररुचि कात्यायन गोत्र का था। इन्हें कात्यायन भी कहा जाता है। इन्होंने पाणिनि सूत्रों पर वार्तिक लिखा। वार्तिकों की कुल संख्या 5032 है, जो 'महाभाष्य' में पाये जाते हैं। वार्तिककार कात्यायन न केवल 'अष्टाध्यायी' का प्राश्निक था वरन् पाणिनि की क्षत्रिय पोषक नीति का शत्रु भी था। (भगवतशरण उपाध्याय, भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, पी. पी. एच., नई दिल्ली, 1973, पृष्ठ 24) कैयट अपनी महाभाष्य टीका में 34 और वार्तिकों का उल्लेख करता है। पाणिनि पश्चिम का था और कात्यायन पूर्व का। अतः भाषा की विषमता को दूर करने के लिए वार्तिक की आवश्यकता हुई। नन्द की सभा में दोनों का विवाद हुआ था। 

पतंजलि को 'महाभाष्य' का लेखक तथा पाटलिपुत्र के आसपास का निवासी बताया गया है। 'महाभाष्य' में पाटलिपुत्र का इतना अधिक उल्लेख है कि कोई सहज ही निष्कर्ष निकाल सकता है कि उक्त पुस्तक का सम्पूर्ण नहीं भी तो अधिकांश भाग इसी शहर की धरती पर रचा गया था। (जे. एन. समादार, ग्लोरिज ऑफ मगध, के. पी. जायसवाल रिसर्च इंस्टीट्यूट, मार्च 1990, पृष्ठ 24, पाद टिप्पणी संख्या 13) 'महाभाष्य' में हमें ‘चन्द्रगुप्त-सभा’ एवं ‘पुष्यमित्र-सभा’ जैसे पद के उल्लेख प्राप्त होते हैं। यह भी जानकारी मिलती है कि प्रसिद्ध नगर महिष्मती से भी वह परिचित था। (सुरेश चन्द्र बनर्जी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 2) वह पुष्यमित्र शुंग का समकालीन था। (देवसहाय त्रिवेद, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 134) पतंजलि व्याकरण में ही नहीं राजनीति में भी वार्तिककार कात्यायन का विरोधी था। वह क्षत्रिय-शत्रु (इस विषय पर विस्तृत अध्ययन के लिए देखें, राजू रंजन प्रसाद, प्राचीन भारत में प्रभुत्व की खोज : ब्राह्मण-क्षत्रिय संघर्ष के विशेष संदर्भ में, पीएच. डी. थीसिस, पटना विश्वविद्यालय, पटना, 2006, अप्रकाशित।) और पुष्यमित्र का स्रष्टा था, इससे वह पाणिनि और कात्यायन दोनों का विरोधी था। (भगवतशरण उपाध्याय, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 24)

पतंजलि ने पाणिनि के संस्कृत व्याकरण की टीका लिखी। यह टीका, जो ‘महाभाष्य’ के नाम से मशहूर है, उतनी ही प्रामाणिक मानी जाती है, जितना कि पाणिनि का ग्रंथ। शेरबात्स्की ने लिखा है कि हिन्दुस्तान की आदर्श वैज्ञानिक कृति पाणिनि का व्याकरण और पतंजलि का ‘महाभाष्य’ है। (जवाहरलाल नेहरू, हिंदुस्तान की कहानी, सस्ता साहित्य मंडल, 1988, पृष्ठ 247) महाभाष्य पद-योजना तथा शब्दों के विकास का एक प्रभावशाली अध्ययन ही नहीं है, अपितु वह, अप्रासंगिक रूप से, उस समय के इतिहास पर उपयोगी सामग्री भी प्रस्तुत करता है। (रोमिला थापर, भारत का इतिहास (हिंदी), राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, चतुर्थ संस्करण : 1985, पृष्ठ 93)

Monday, September 28, 2026

अइसन दुरंगी नीति से समाजवाद न अतौ जयप्रकाशजी

कुछ लोग जीते जी किंवदंती बन जाते हैं। नक्षत्र मालाकार ऐसे ही महापुरुष हैं जो इतिहास की प्रचलित किताबों से ज्यादा मिथकों और किंवदंतियों में बसते हैं। कहा जाता है कि "मोमेंट के समय गोरा मलेटरी इसके नाम को सुनते ही पेसाब करने लगता था। ... जितने सरकारी गवाह बने थे, सबों के नाक-कान काट लिए थे चलित्तर ने। बहादुर है। कभी पकड़ाया नहीं। कितने सी आई डी को जान से खतम किया। धरमपुर के बड़े-बड़े लोग इसके नाम से थर-थर काँपते थे। ज्यों ही चलित्तर का घोड़ा दरवाजे पर पहुंचा कि 'सीसी सटक'। दीजिए चंदा। पचास! नहीं, पाँच सौ से कम एक पैसा नहीं लेंगे। नहीं है? चाबी लाइए तिजोरी की। नहीं? ठाएँ! ठाएँ!" (फणीश्वरनाथ रेणु, मैला आँचल, राजकमल पेपरबैक्स, संस्करण : 1992, पुनर्मुद्रण : 1996, पृष्ठ 121)

नक्षत्र मालाकार गांव में चरवाही किया करते थे। 1930 में नमक बनाने हेतु कांग्रेस की ओर से सत्याग्रहियों की भर्ती का अभियान चलाया जा रहा था। पूर्णियां के प्रख्यात गांधीवादी नेता वैजनाथ चौधरी कांग्रेस की एक मीटिंग में सत्याग्रहियों का नाम लिख रहे थे। युवा नक्षत्र ने अपना नाम सत्याग्रहियों में दर्ज कराया। तब से वैजनाथ चौधरी के संपर्क में उन्होंने नमक सत्याग्रह, विदेशी वस्त्रों की बिक्री के विरुद्ध धरना तथा व्यक्तिगत सत्याग्रह आदि में नेतृत्व प्रदान किया। किन्तु दो घटनाओं की वजह से कांग्रेस से उनका मन उचट गया। पहली घटना है कि किसी गांव में कांग्रेसी नेतागण अंग्रेजी शोषण और गुलामी से मुक्ति हेतु तैयार कर रहे थे। तभी एक जमींदार के खेत में एक गरीब की बकरी चली गयी। जमींदार ने बकरी वाले को बांधकर पीटा। नक्षत्र को लगा कि इसका प्रतिकार होना चाहिए। कांग्रेसी नेताओं के कैम्प में जाकर उन्होंने यह बात रखी, परंतु सभी नेताओं ने एक स्वर में कहा कि 'ऐसे कामों में हस्तक्षेप करना कांग्रेस का काम नहीं है। कांग्रेस का काम रचनात्मक एवं सृजनात्मक काम करना है।' (अकेला रमाकांत, 'कौन थे नक्षत्र मालाकार?', कम्युनिस्ट संदेश, वर्ष 30, अंक 11/12, नवंबर-दिसम्बर 2001) नक्षत्र ने 'नेतृत्व की भावना' के विरुद्ध जाकर इस घटना का न केवल प्रतिकार किया बल्कि जमींदार के यहाँ से उस गरीब को मुक्त भी कराया। (वही) दूसरी घटना यह घटी कि एक बार नक्षत्र मालाकार ने 'जनयुग' नामक अखबार खरीदा। अखबार लेकर जब कांग्रेस कार्यालय गये तो कांग्रेसी नेता पंडित रामनंदन मिश्र ने कहा कि 'जनयुग तो कम्युनिस्टों का अखबार है, इसे फाड़कर फेंको।' (वही) उनके कहने पर जनयुग तो फाड़कर फेंक दिया गया, किन्तु यह बात अंदर गांठ बन गयी।

नक्षत्र मालाकार अपने बचपन में नछत्तर माली थे। 1936 में सोनपुर में समाजवादियों का शिविर आयोजित हुआ था जिसमें जयप्रकाश नारायण ने प्रभावित होकर नाम बदल दिया था। उनका जन्म पुराना पूर्णियां जिले के समैली (अकेला रमाकांत कोढ़ा लिखते हैं) नामक स्थान में हुआ जो वर्तमान में कटिहार जिले में है। (अकेला रमाकांत, 'कौन थे नक्षत्र मालाकार?', कम्युनिस्ट संदेश, वर्ष 30, अंक 11-12, नवंबर-दिसंबर 2001)

नक्षत्र मालाकार 1936 में बिहार सोशलिस्ट पार्टी का सदस्य बने। (मालाकार की डायरी, न्यूजब्रेक, 31 अगस्त 2001) बिहार सोशलिस्ट पार्टी की पूर्णियां शाखा की एक बैठक समैली गांव में हुई। इसमें इक्यावन साथियों ने हिस्सा लिया। बैठक में मदन मोहन झा ने प्रस्ताव लाया कि जिला नेतृत्व का भार नक्षत्र मालाकार के हाथ में सौंप दिया जाये जिसका समर्थन महाराज मंडल ने किया। (वही)

सन 1936 में सोनपुर में समाजवादियों का शिविर आयोजित था. नक्षत्र मालाकार भी शामिल थे. जयप्रकाश नारायण उस शिविर के प्रिंसिपल थे. एक दिन उन्होंने (नक्षत्र मालाकार) देखा कि शिविर के अंतर्गत दो तरह की भोजन-व्यवस्था चल रही है. उन्हें यह सब अच्छा नहीं लगा. उन्होंने जयप्रकाश नारायण जी से इस दोहरी व्यवस्था का कारण पुच दिया. जयप्रकाश जी ने उत्तर दिया-‘यहाँ नेताओं के अलग और कार्यकर्ताओं के लिए अलग भोजन-व्यवस्था है.’ नक्षत्र मालाकार को इस उत्तर से घोर ‘रिएक्शन’ हुआ. उन्होंने कहा- ‘अइसन दुरंगी नीति से समाजवाद न अतौ जयप्रकाशजी.’ उन्होंने गाँधी टोपी माथे से उतारी और उनकी ओर फेंकते हुए हमेशा के लिए शिविर से बाहर चलते बने. तब से जीवनपर्यंत कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े रहे.

नक्षत्र मालाकार पूर्णियां में 1942 के हीरो हैं। उनकी लोकप्रियता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि 42 के आंदोलन में उनपर पचासों केस हुए लेकिन एक भी केस में एक भी गवाह नहीं मिल सका। सरकार को उन्हें छोड़ देने को मजबूर होना पड़ा। 1942 में नक्षत्र मालाकार जेल में बंद थे। जेल ही में उनकी कम्युनिस्ट पार्टी पूर्णियां जिला सचिव कामरेड अनिल दास गुप्ता तथा साथी चंद्रमा सिंह से भेंट हुई थी। पार्टी के प्रति उनका झुकाव वहीं हो गया था। इनलोगों से प्रभावित होकर नक्षत्र मालाकार ने वचन दिया कि जेल से निकलते ही वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हो जायेंगे। जेल से छूटते ही उन्होंने भागलपुर जिले के साथियों से संपर्क किया। (रामावतार शर्मा, भागलपुर जिले में कम्युनिस्ट पार्टी का विकास, कम्युनिस्ट संदेश, वर्ष : 3, अंक : 11/12, नवंबर-दिसंबर, 2001; अकेला रमाकांत, पूर्वोद्धृत)

1944 के आसपास जेल से रिहा होने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने अपील की कि हिंदुस्तान के अंदर जो साथी क्रांतिकारी इधर-उधर भटक रहे हैं, हाजिर हो जायें या कहीं छिपने की जगह नहीं हो तो वे सीधे इलाहाबाद आनन्द भवन में आ जायें। पंडित जवाहरलाल नेहरु के कहने का हिंदुस्तान के क्रांतिकारियों पर अच्छा असर पड़ा। कुछ तो हाजिर हो गए और कुछ इलाहाबाद आनन्द भवन पहुंच गए। नक्षत्र मालाकार ने भी हथियार रख देने का मन बनाया। वे अपने कुछ साथियों (लालगंज का विट्ठल, चंदन का भीम सिंह तथा पुनावा का पुलिस यादव) के साथ वैद्यनाथ प्रसाद चौधरी से मिलने टीकापट्टी कालीस्थान पहुंचे। मालाकार ने जब चौधरी जी से उक्त संबंध में कहा तो उन्होंने कहा कि 'आपलोगों को एस डी ओ के सामने हाजिर हो जाना चाहिए।' मालाकार ने पूछा, 'लेकिन जब अंग्रेजी हुकूमत की ओर से पुलिस केस चार्ज करेगी तो आप वकील-मुख्तार के द्वारा या खुद पैरवी करेंगे?' वे बोले, 'मैं पैरवी नहीं करूंगा। हिंसक प्रवृत्ति वाले की मुझसे पैरवी नहीं हो सकेगी।' (मालाकार की डायरी, न्यूजब्रेक, 30 सितंबर 2001)

1969 के विधानसभा चुनाव में पुराने पूर्णिया जिले के कटिहार विधानसभा क्षेत्र में कम्युनिस्ट पार्टी कम वोटों से हार गई थी। इससे साथियों में बहुत मायूसी थी। उन दिनों राजकिशोर सिंह वहां के नेता थे और वही उम्मीदवार भी थे। 42 के आंदोलन के हीरो नक्षत्र मालाकार भी उसी क्षेत्र में कार्यरत थे। इस मायूसी को दूर करने के लिए पूरे जिले के पार्टी सदस्यों की जी. बी. बैठक बरारी में बुलाई गई थी। उस बैठक में उस क्षेत्र के किसानों की भुभना झील से संबंधित मांग को प्रमुखता दी गई। राजकिशोर सिंह के साथ नक्षत्र मालाकार ने गांव-गांव तक इस पार्टी संदेश को पहुंचाया कि भुभना झील के पानी की निकासी के लिए किसान स्वयं श्रमदान करे। श्रमदान के साथ-साथ किसानों ने चंदा भी दिया ताकि श्रमदान करनेवालों के भोजन का इंतजाम किया जा सके। लगभग दो महीने के श्रमदान से भुभना झील के पानी निकासी का काम पूरा हो गया। लगभग तेरह हजार बीघा जमीन पानी निकासी से खाली हुआ। इसमें कुछ मध्यम किसानों की जमीन थी जो उन्हें दी गई और करीब छः हजार बीघा जमीन जो बिहार सरकार की थी, उसे भूमिहीन किसानों के बीच वितरित कर दी गई। 1972 आते-आते उस विधानसभा चुनाव से पार्टी उम्मीदवार राजकिशोर सिंह विजयी हो गये। कहने की जरूरत नहीं कि इसी भुभना झील से पानी निकासी के लिए उन दिनों पूर्णिया के कांग्रेसी नेता बाबू वैजनाथ चौधरी ने बिहार सरकार के मुख्यमंत्री बाबू श्रीकृष्ण सिंह से अपील की थी। सरकार ने उसे असंभव बताया था जबकि नक्षत्र मालाकार जैसे कम्युनिस्ट नेताओं और श्रमदानियों ने उसे सम्भव कर दिखाया था। (रामावतार शर्मा, 'चाँद भाई को सच्ची श्रद्धांजलि मिहनतकशों की खुशहाली में', जन प्रवाह, वर्ष 2, अंक 10, पृष्ठ 31)

Friday, September 18, 2026

भारतीय राष्ट्रवाद और हिन्दी लेखकों का स्त्री विमर्श

बिहार राज्य अभिलेखागार की पत्रिका ‘अभिलेख बिहार’ में शारदा शरण का एक लेख प्रकाशित है, जिसका शीर्षक है-‘स्वतंत्रता संग्राम के दौरान की वीर गाथाएं: बक्सर जिला के संदर्भ में’। इस लेख में आजादी की लड़ाई के दौरान बिहार के बक्सर में प्रचलित गीतों का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इन गीतों में लगभग सभी स्थलों पर पुरुषों को ‘मर्द हो मर्दानगी के साथ, मरना सीख लो’, ‘चल भइया’, ‘शाहाबाद के वीर सपूतों’ तथा ‘अब चले झुण्ड मर्दानों का’ आदि संबोधनों से संबोधित किया गया है। अकारण नहीं है कि सुभद्राकुमारी चैहान जैसी कवयित्री भी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के लिए ‘खूब लड़ी मर्दानी’ लिख रही है। आजादी के दौर के इन गीतों में स्त्रियों का आह्वान नहीं है। एक गीत में चर्चा भी है तो बाधा के रूप में। कहा गया है-‘हम मातृभूमि के सैनिक हैं/अब प्राणों का है मोह कहाँ/केसरिया बाना पहन लिया/नारी बच्चों का छोह कहाँ।’ सन् 1931 ई. में भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव को फांसी दिये जाने के विरोध में प्रभुनारायण मिश्र द्वारा संपादित लाहौर की सूली अर्थात् सरदार भगत सिंह मस्ताना नामक कविताओं का एक संग्रह गया से प्रकाशित हुआ। इस संकलन में एक भोजपुरी कविता छपी थी जिसमें राट्रवाद के विरोधियों पर किस तरह व्यंग्य किया गया था : ‘मउगान्हि के मरद बनावे के परी।...गांव में मिटिंग सुनि घर में लुकात बाड़े।/ओकरा के चूड़ी पहिरावे के परी।।/आपुस में बइठी के गांधी के सिकायत करे।/तवना के मुंहे कारीख पोते के परी।।’ कहना अनावश्यक है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा पुरुष वर्चस्व की भाषा है। 

श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की ‘आई फॉलो गांधीजी’ शीर्षक से एक किताब छपी थी। दादाभाई नौरोजी की पौत्री खुरशैद नौरोजी ने किताब पर ‘फॉलो’ को काटकर ‘स्वॉलो’ बना दिया। गांधीजी ने ठठाकर हँसते हुए कहा, ‘अरे, लड़कियों की अक्ल ही कितनी होती है? तुम मुंशी को क्या समझोगी?’ खुरशैद ने विषाद-भरे स्वर में कहा-‘बापूजी, आपके तथाकथित गांधीवादी भक्त लोग आपको और गांधीवाद को निगल जायेंगे।’ (रामनंदन मिश्र, महात्मा गांधी और मैं, जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान, 2020, पृष्ठ 26) भगत सिंह बम केस में क्रांतिकारी पार्टी का एक सदस्य फणीन्द्र मुकर्जी पुलिस का भेदिया हो गया था। पार्टी की गोपनीयता के लिए खतरा उत्पन्न होते देख यह निश्चय हुआ कि उसे गोली मार दी जाय। उपयुक्त व्यक्ति की खोज शुरू हुई। बिहार में कहीं पार्टी की मीटिंग हुई। मीटिंग में पार्टी के नेता किशोरी प्रसन्न सिंह अपनी पत्नी सुनीति देवी के साथ उपस्थित थे। सुनीति देवी ने प्रार्थना की: ‘यह काम मुझे सौंपा जाय’, किन्तु किशोरी बाबू ने ‘आदेश’ के इशारे से उन्हें बैठा दिया। सलाह-मशविरे के बाद यह काम एक दूसरे सदस्य को सौंप दिया गया। इस घटना के कुछ वर्ष बाद सुनीति देवी को तपेदिक हो गया। लाख प्रयत्न हुए, पर मृत्यु का पंजा ढीला न पड़ा। मृत्यु से कुछ घड़ी पहले किशोरी बाबू से कहा : ‘मेरी विदाई का समय अब दूर नहीं, इसलिए मुझे आपसे एक बात कहनी है कि जब किसी आदमी को आदमी की तरह मरने का मौका मिल रहा हो, तो उसे कभी रोकना मत।’ (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, जिंदगी मुस्करायी, भारतीय ज्ञानपीठ, नौवां संस्करण: 2000, पृष्ठ 39-40) 

शारदा कुमारी देवी द्वारा छपरा से निकाला गया ‘महिला दर्पण’ नामक हिन्दी मासिक किसी महिला द्वारा संपादित अपने ढंग का पहला पत्र है। इसकी संपादिका को सलाह देते हुए तृतीय बिहार-प्रादेशिक साहित्य-सम्मेलन के सभापति शिवनंदन सहाय ने कहा था : ‘हमारे विचार में तो कौंसिलों में पुरुषो की प्रतिद्वन्द्विनी बनने की अपेक्षा गृहलक्ष्मी और गृहदेवियां बनने ही में आर्या महिलाओं की अधिकतर शोभा है। अपनी भगिनियों को ऐसी ही शिक्षा और उपदेश देना सम्पादिका के लिये उत्तम होगा।’ (बिहार का साहित्य, पहला खण्ड, पुस्तक भंडार, पृष्ठ 112) 

'चाँद' पत्रिका के 29 जनवरी, 1925 के अंक में ‘सती’ की दो सूचनाएँ प्रकाशित हैं। एक छिंदवाड़ा की और दूसरी छपरा (बिहार) की। छपरा की घटना का स्रोत ‘वॉयस और इंडिया’ नामक पत्र है। उसमें ‘पटना के सुप्रसिद्ध देशभक्त बाबू राजेन्द्र प्रसाद जी’ ने उक्त आशय का एक पत्र प्रकाशित कराया था। छपरा के बाबू बब्बन सिंह असहयोग आन्दोलन से जुड़े थे। वे स्त्रियों को सूत कातने और कपड़े बुनने की शिक्षा देते थे। खादी के प्रचार में उन्होंने अपनी जमीन भी रेहन रख दी। इन्हीं बाबू बच्चन सिंह के निधन के बाद उनकी पत्नी ने भी स्वयं को आग लगा ली। राजेन्द्र प्रसाद के पत्र की अन्तिम पंक्तियां ध्यान देने लायक हैं, ‘‘आस-पास के मुहल्ले में बिजली की तरह यह खबर फैल गई कि रामसूरत सती हो गई और हजारों लोग दर्शन के लिए एकत्र होने लगे। जिन दोनों प्राणियों ने खादी के लिए अपना सर्वस्व समर्पण कर दिया था उनका इस तरह अन्त हो गया। रामसूरत उस सच्ची सती का उदाहरण छोड़ गई जिसके विषय में हम लोग पुस्तकों में तो बहुत कुछ पढ़ते हैं पर प्रत्यक्ष उदाहरण किंचित ही देखते हैं।’’ (आशुतोष पार्थेश्वर, चाँद की ‘राजनीति’ (सन्दर्भ : भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन), अनुसंधान, अंक 17-18 जनवरी-दिसम्बर 2021) ‘सती’ का आकर्षण इतना बड़ा है कि प्रेमचन्द भी अपनी कई आरम्भिक कहानियों में उसका उत्फुल्ल अंकन करते मिलते हैं। ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ (1908) और ‘गुनाह का अगनकुंड’ (1910) शीर्षक कहानियों में यह देखा जा सकता है। (आशुतोष पार्थेश्वर, पूवोक्त) पितृसत्तात्मक समाज का एक अत्यंत सहृदय पुरुष भी, अगर बहुत सचेत न हो तो, पुरुष-वर्चस्व अथवा स्त्री-विरोध की भाषा का प्रयोग करेगा। टैगोर एक जगह लिखते हैं : ‘सती जैसे अपने पति के सिवा दूसरे को नहीं देखती, अच्छी कविता सहृदय के सिवा और किसी की अपेक्षा नहीं रखती।’ (अमृतराय, नयी समीक्षा, हिंदुस्तानी पब्लिशिंग हाउस, बनारस, 1950, पृष्ठ 207) 8 नवंबर, 1945 को कुसुम को लिखे पत्र में गांधीजी कहते हैं-‘सच्ची विधवा मानती ही नहीं है कि अपना पति का देह छुट गया इसलिये देहधारी आत्मा भी छुट गया। विवाह होता है वह कुछ पुतले के साथ नहीं लेकिन पुतले में भी आत्मा रहती है उसके साथ। विधवा का पुनर्लग्न निषिद्ध माना जाता है, इसका कारण भी यही है। इस कारण सिर पटकना, आत्मघात करना आदि विचार आते हैं वह सब धर्म और नीति के विरुद्ध है।’ (गांधी संपूर्ण वांग्मय, 82, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली, नवंबर 1991, पृष्ठ 51) 

1926 ई. में गांधीजी बिहार के दरभंगा आए हुए थे। उन्होंने देखा कि स्त्रियों के बैठने के स्थान पर चिक का पर्दा डाला हुआ था। यह स्थिति गांधीजी को ठीक नहीं लगी। उन्होंने विरोधस्वरूप अपने द्वारा संपादित पत्र ‘नवजीवन’ में एक तीव्र टिप्पणी लिखी। (रामनंदन मिश्र, महात्मा गांधी और मैं, जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान, पटना, 2020, पृष्ठ 6) रामनंदन मिश्र ने जब 1928 में पर्दा प्रथा के विरुद्ध संघर्ष का आरंभ किया तो गांधीजी ने 28 जून, 1928 के ‘यंग इंडिया’ में एक अग्रलेख लिखकर इसका स्वागत किया। कहा कि ‘पर्दा प्रथा बिहार की आधी मानवता को सामाजिक सेवा से ही नहीं, बल्कि बहुत स्थानों पर उन्हें प्रकाश और हवा से भी वंचित रखती है। जितना जल्द लोग समझ जायें कि बहुत-सी सामाजिक बुराइयां हमें स्वराज की ओर बढ़ने नहीं देतीं, उतनी ही ज्यादा लक्ष्य की ओर हमारी प्रगति होगी। (रामनंदन मिश्र, पूर्वोक्त) 

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने अपने घर की औरतों का हाल लिखा है-‘हमारे यहाँ पर्दा बहुत सख्त होता है। मैंने देखा है कि जब मेरी भौजाई आईं तो उनके साथ दो दाइयां आई थीं और वह केवल उन दोनों से ही बातें कर सकती थीं! जीरादेई में एक कमरे में रहती थीं। कभी ओसारे में भी निकलने की इजाजत नहीं थी।’ (आत्मकथा, सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2002, पृष्ठ 46) ‘मेरी भौजाई तो कमरे से बाहर निकलती ही न थीं। हाँ, नित्य-क्रिया के लिए जाने के समय पहले सब लोग हटा दिये जाते। लोगों में दूसरा कोई आंगन में रहता ही न था। अगर कोई छोटा लड़का होता तो वह भी हटा दिया जाता। इतने से भी काफी पर्दा नहीं होता और उनके नैहर की दाइयां कपड़े का पर्दा लगाकर उनको ले जातीं।’ ....‘मेरी माँ, चाची और बहन भी जब उनके कमरे में जाती तो वह घूँघट तान के बैठ जातीं। जीरादेई की कोई दाई भी वहां जाने न पाती।’ ......‘जबतक मेरी माँ जीवित रहीं तबतक न तो मेरी भौजाई और न मेरी स्त्री ही कभी अपने कमरे से निकलकर आजादी के साथ आंगन में घूम-फिर सकीं या बैठ सकीं।’ (वही, पृष्ठ 47) ...‘इस प्रकार घर में बराबर बंद रहते-रहते मेरी भौजाई और मेरी स्त्री दोनों का स्वास्थ्य खराब हो जाना स्वाभाविक था। ऐसा ही हुआ भी। दोनों ही कुछ दिनों तक, एक के बाद दूसरी, गठिया से तकलीफ पाती रहीं, जो, बहुत दिनों के बाद, जब वे आँगन में खूब घूमने-फिरने लगीं, तभी छूटी।’ (वही, पृष्ठ 60) श्री धर्मलाल सिंह ने ‘राजेन्द्र अभिनन्दन ग्रन्थ’ में ‘मिथिला की महारानियां’ शीर्षक लेख की पाद-टिप्पणी में लिखा है कि ‘‘दरभंगा-राज-परिचार में पर्दा प्रथा बड़ी कड़ाई से बरती जाती है। ‘असूर्यंपश्या सा तु राजदारा' की कहावत चरितार्थ होती है। अतः उनका छायाचित्र लेना एकदम वर्जित था। इसीलिए, उनके चित्र दुर्लभ हैं।’’ (राजेन्द्र अभिनन्दन ग्रन्थ, पृष्ठ 377)

आजादी की लड़ाई के दौर के अधिकतर हिंदी लेखक अपने-अपने कारणों से ‘स्त्री की आजादी’ से चिंतित लगते हैं। फिलहाल ‘मतवाला-मंडल’ के ‘मनोरंजन-मूर्ति’ तथा शिवपूजन सहाय के ‘साहित्यिक गुरु’ ईश्वरीप्रसाद शर्मा की ‘सुधरी हुई स्त्रियाँ’ कविता के व्यंग्य का ‘आनंद’ लें-‘न कहना सास का माने, न स्वामी का कहा करती।/है मन में जिस तरह आता, उसी ढंग से रहा करती।।/है परदा दूर कर डाला, सभा में बोलती फिरती।/है छोड़ा काम घर का, देश के हित है फिरा करती।।/न भाती पाकशाला औ न भाता कूटना-पिसना।/है भाता पाठ ‘नावेल’ का, कलम का रातदिन घिसना।।/है सुधरी नारियों ने अब सजायी मेम-सी सज्जा।।/पुरुष से लड़ रही अधिकार के हित नारियाँ जग की।/भला क्यों चुप रहेंगी देवियाँ इस वृद्ध भारत की?/हटाकर जाल घुँघट का, मिटाकर आँख की लज्जा।/इसी से भूलकर प्राचीनता आदर्श की अपने।/यहाँ भी देवियाँ हैं देखती यूरोप के सपने।।/मगर भारत का रुतबा क्या बढ़ेगा ऐसे करतब से।/हमारी देवियों का मान बढ़कर है जगत भर से।।/हमारे ढंग निराले हैं, हमारी रीति न्यारी है।/हमें लखकर चकित होता सदा संसार भारी है।/हमारा तो भला होगा, न भूलें रूप यदि अपना।/न छोडें रीति को अपनी, न देखें और का सपना।/पढ़ें सब नारियाँ, विदुषी बनें, कर्तव्य को पालें।/न सीखें किन्तु यूरप की निराले ढंग की चालें।।/बनें गृह-देवियाँ वे तो, कभी मत ‘लेडियां’ होवें।/किसी दिन भूलकर प्राचीन मर्यादा नहीं खोवें।।’ (बिहार के नवयुवक हृदय, पृष्ठ 37-38)

श्रीयुत माधव शुक्ल (लखनऊ) की ‘स्त्री दर्पण’ (पृष्ठ 48-49) में ‘स्त्री-धर्म’ कविता छपी थी, यहां उसे भी उद्धृत करना दिलचस्प होगा: ‘हे अबला गन! धर्म गहो, नहिं बोर नर्क में जाओगी।/कब तक रह इस नीच दशा में अपना समय गंवाओगी।।/घर, दुआर, धन, भाई, बन्धु नहिं अन्त काम कोइ आता है।/केवल एक धर्म मरने पर साथ जीव के जाता है।।1।।/कुल मरजादा, देश बड़ाई, बनी तभी तक रहती है।/जब तक धर्म सत्य की धारा लोगों के हिय बहती है।।/पति चरणों पर ध्यान सदा, यहि केवल धर्म तुम्हारा है।/इसको छोड़ अधर्म महा नहिं जिसका पारावारा है।।2।।/जिस नारी का देव, पितृ, गुरु, जप तप, सबही स्वामी है।/है पतिव्रता वही, अन्त में स्वर्ग लोक की गामी है।।/जो विवाह के पति वचनों को सदा ध्यान में धरती हैं।/नहीं यथोचित धर्म ग्रन्थ का अपने आदर करती हैं।।3।।/वे नारी गन जो अभाग्य वश हो जाती हैं पति से हीन।/तिनको धर्म ग्रन्थ अवलोकन सदा उचित शृंगार विहीन।।/जो गृहस्थ निज कर धर्म का करती हैं श्रम कर प्रतिपाल।/शिक्षा दे पुत्री पुत्रों को सदा सिखाती उत्तम चाल।।4।।/सुख में कभी नहीं आपे से जो बाहर हो जाती हैं।/महा दुःख पड़ने पर भी जो नहीं कभी अकुलाती हैं।।/बड़े धैर्य के साथ सदा जो घर का काज चलाती हैं।/पति का सुयश बढ़ाने के हित जो कर्म सरसाती हैं।।5।।/ऐसे कामों का करना ही है गृहस्थ नारी का धर्म।/अहो देवियो! तिस्से छोड़ो जेते निंदित नीच कुकर्म।।/सुनो तुम्हारे बिना गृहस्थी बन सकती है कभी नहीं।/केवल पुरुष बना लेता है ऐसा भी है सुना कहीं ?।।6।।/मानों एक शरीर गृहस्थी हाथ पांव जिसके हैं नर।/भीतर की अवयव नारी हैं रहता तन जिसके बलपर।।/हाथ उठाकर मुख देता है भीतर अग्नि पचाती है।/और बनाकर रक्त देह की दिन दिन शक्ति बढ़ाती है।।7।।/तो फिर सोंचो यदि हो जावे भीतर रोग ही का वास।/यह शरीर तब धीरे धीरे हो जावेगा सत्यानास।।/जिससे इसकी सब प्रकार से रजा करना है तब धर्म।/सुयश बढ़ानेवाला बढ़कर नहीं कोई सत्कर्म।।8।।’ (श्रीयुत माधव शुक्ल (लखनऊ), ‘स्त्री दर्पण’, प्रयाग, भाग 2, अंक 1, 1 जनवरी, 1910, पृष्ठ 48-49)

‘स्त्री-धर्म’ पर अगर जोर है तो इसका कारण है कि ‘‘एक कुल में यदि कोई पुरुष व्यभिचारी बन जाये, तो उस कुल में वर्णसंकरता नहीं हो सकती; परन्तु उस कुल में यदि कोई स्त्री व्यभिचारिणी बन जाय, तो उसमें अवश्य ही वर्णसंकर पैदा होने लगेंगे। गीता में देख सकते हैं, कि पुरुषों के बिगड़ने से वर्णसंकर पैदा होंगे, ऐसा नहीं कहा गया है। वहाँ लिखा है कि-‘स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय! जायते वर्णसंकरः’ अर्थात् स्त्रियों के बिगड़ जाने से कुल में वर्णसंकर पैदा होते हैं। जिस जाति में वर्णसंकरता आ जाती है, वह जाति अवश्यमेव नष्ट हो जाती है।’’ (विन्ध्येश्वरीप्रसाद शास्त्री, आर्यमहिला, मासिक, भाग 10, संख्या 5-6, भाद्रपद-आश्विन, संवत 1984 विक्रम, पृष्ठ 133; हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ 566-567।) क्योंकि ‘जिस जाति में यह वर्णाश्रम रूपी बन्धन नहीं है, वह जाति चिरकाल तक जीवन धारण नहीं कर सकती। इस विषय में संसार की अनेक जातियों का उदाहरण इतिहास स्वयं दे रहा है। प्राचीन ग्रीक, रोमन, बेबीलोनियन, इजिप्सियन आदि अनेक जातियों का पता तक नहीं रहा है। दुनिया के इतिहास में चार हजार वर्ष के पहले की कोई जाति नहीं है; किन्तु अनन्तकाल से लेकर आज पर्यंत सनातन धर्मावलम्बिनी आर्य जाति जीवित है और भविष्य में भी इस वर्णाश्रम बन्धन की रक्षा करनेवाली हमारी सतीशिरोमणि आर्यमातायें हैं। यदि इनके अन्तःकरण से सतीत्व का संस्कार नष्ट हो जाये तो वह आर्यजाति जीवित नहीं रह सकती।’ (वही) किन्तु, भारतीय पितृसत्तात्मक समाज की मान्यता है कि ‘कुलीन स्त्रियां विपत्ति में भी सती-चरित्र का परित्याग नहीं करतीं।’ (कथासरित्सागर, प्रथम लम्बक, 13-14)

उर्दू के प्रसिद्ध साहित्यकार इम्तयाज अली ‘ताज’ को 14 सितंबर, 1920 के अपने खत में प्रेमचंद ने लिखा था : ‘‘मैं लिटरेचर को मैस्कुलिन देखना चाहता हूँ, फेमिनिज्म, ख्वाह वह किसी सूरत में हो, मुझे पसन्द नहीं। इसी वजह से मुझे टैगोर की अक्सर नज्में नहीं भातीं। यह मेरा भीतरी नुक्स है, क्या करूँ। अशआर भी मुझे वही अपील करते हैं जिनमें कोई जिद्दत (मौलिक सूझ) हो। ‘गालिब’ के रंग का मैं आशिक हूँ। अजीज लखनवी के ‘गुलकदे’ की खूब सैर की थी मगर बदकिस्मती से आज तक एक शेर भी मौजूँ नहीं कर सका। न जी चाहता है। गालिबन शायराना हिस (संवेदनशीलता) दिल में है ही नहीं।’’ (कलम का सिपाही, पृष्ठ 56) इस खत के कई बरस बाद इन्द्रनाथ मदान के एक सवाल का जवाब देते हुए भी कि बंगला साहित्य क्यों दिल को ज्यादा छूता है, उन्होंने लगभग यही बात कही थी-‘‘उसमें एक स्त्रियोचित गुण पाया जाता है, जिसे मैं अपने स्वभाव के प्रतिकूल पाता हूँ।’’ (कलम का सिपाही, पृष्ठ 56) एक बार जैनेन्द्र ने भी चर्चा की थी कि ‘बंगाली साहित्य हृदय को अधिक छूता है’, तो प्रेमचंद ने कहा था कि ‘उसमें स्त्री-भावना अधिक है’। (जैनेन्द्र, ‘प्रेमचंद : मैंने क्या जाना और पाया’, प्रेमचंद स्मृति अंक, प्रेमचंद रचनावली, खंड 20 में संकलित, पृष्ठ 21)

'स्त्री-भावना’ अथवा ‘स्त्रियोचित गुण’ अस्पष्ट नहीं है। आनंदी के बारे में अमृतराय लिखते हैं : ‘उन्हें कभी किसी से झगड़ा करते नहीं देखा गया और न वह दूसरी औरतों की तरह इधर की बात उधर लगाने में या टोले-पडोसवाले की निंदा में ही रस लेती थीं।’ (कलम का सिपाही, पृष्ठ 10) महताब राय को 'स्त्रियोचित गुण' से तनिक सावधान करते प्रेमचंद लिखते हैं : 'एक और बात याद रक्खो। तुम्हारा दिल मैं जानता हूँ, बहुत साफ है, लेकिन औरतों का दिल अक्सर तंगखयाल होता है।(महताब राय को प्रेमचंद का पत्र, चिट्ठी-पत्री 2, हंस प्रकाशन, पृष्ठ 154) कहा जाता है कि खुद ‘मुंशी प्रेमचंद छोटे भाइयों की पत्नियों को घूँघट में ही देखना पसंद करते थे। घर में घुसने से पहले अपने आने की सूचना खांसकर दिया करते थे।’ (आजकल, दिसंबर 2010, पृष्ठ 12) प्रेमचंद कहते हैं, ‘आज काफी स्त्रियां नौकरी करने लगी हैं, मगर वह अच्छा नहीं है, मैं इसको अच्छा नहीं समझता। अब इसका नतीजा क्या हो रहा है? अब पुरुष और स्त्री दोनों नौकरियां करने लगे, तब इसके माने क्या हैं? रुपए ज्यादा आ जाएंगे। उसी का तो यह फल है कि पुरुषों की बेकारी बढ़ रही है।’ आगे, ‘स्त्रियों की कमाई एक पैसा नहीं होती थी, और स्त्रियां काफी दबदबे के साथ घर पर शासन करती थीं, तब क्या वह कमाई करती थीं?’ (शिवरानी देवी, प्रेमचंद : घर में, आत्माराम एंड संस, 2008, पृष्ठ 217)

प्रेमचंद का बालविवाह हुआ था, लेकिन वह ऐसा ‘बालक’ था जिसकी आँख में पत्नी का उम्र में बड़ा होना सबसे ज्यादा चुभा था। शिवरानी देवी की लिखी किताब का भरोसा करें तो ‘बालक प्रेमचंद’ को सबसे पहले पत्नी की उम्र दिखी, सुंदरता-कुरूपता इसके बाद ही आती है। इस शादी की सारी बात प्रेमचंद ने शिवरानी देवी से गुप्त रखी थी। उनके घर के लोग भी इस योजना से वाकिफ नहीं थे। आशंका थी कि बात प्रकट करने पर उनके ब्याहता होने की चर्चा होगी और दूसरी शादी में विघ्न उपस्थित होगा। शिवरानी देवी लिखती हैं, ‘एक की मिट्टी पलीद कर दी जिसकी कुरेदन मुझे हमेशा होती है। जिसे मैं बुरा समझती हूँ, वह हमारे ही यहाँ हो और हमारे हाथों हो। मैं स्वयं तकलीफ सहने को तैयार हूँ, परन्तु स्त्री जाति की तकलीफ मैं नहीं देख सकती। उसी का प्रायश्चित शायद मुझे भी करना पड़ेगा, हालांकि मैं बेगुनाह हूँ। मेरे पिता को मालूम होता तो आपके साथ मेरी शादी हर्गिज न करते।’ (प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 10) आगे, ‘आप पुरुष थे, आप मुझे ब्याह लाये, वे तो घर में बैठी हैं। यह क्या स्त्रियों के साथ अन्याय नहीं है? मैं भी बदसूरत होती, तो आप मुझे भी छोड़ देते। अगर मेरा बस होता तो मैं सब जगह ढिंढोरा पिटवाती कि कोई भी तुम्हारे साथ शादी न करे।’ (प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 10-11) प्रेमचंद झेंपते हुए कहते हैं, ‘इसीलिए तो तुम्हें मालूम न हुआ’। (प्रेमचंद घर में, पृष्ठ 11) प्रेमचंद का तीन स्त्रियों के साथ संबंध रहा। पहली स्त्री के जीवनकाल ही में आपने एक और स्त्री के साथ संबंध बनाया। शिवरानी देवी के साथ शादी के बाद भी प्रेमचंद का उस स्त्री के साथ संबंध बरकरार रहा। सवाल है कि उस स्त्री के रहते प्रेमचंद ने शिवरानी देवी के साथ शादी क्यों की? सवाल यह भी है कि वह स्त्री प्रेमचंद की पत्नी क्यों नहीं बन सकी? 

‘हिन्द स्वराज’ में गांधीजी मशीनीकरण का विरोध करते हैं। विरोध के कई कारण हैं। एक प्रमुख कारण यह हो सकता है कि यंत्रों की वजह से ‘जो स्त्रियां घर की रानियां होनी चाहिए, उन्हें गलियों में भटकना पड़ता है, या कोई मजदूरी करनी पड़ती है।’ (हिन्द स्वराज, सर्व सेवा संघ-प्रकाशन, वाराणसी, जून 2016, पृष्ठ 10-11) स्त्री का ‘मालिक’ उसका पति है। यह ‘मालिक’ स्त्री को ‘घर की रानी’ बनाता है, अन्यथा वह ‘वेश्या’ है। गांधीजी ने पार्लियामेंट को ‘वेश्या’ कहा। वेश्या कहने के पीछे गांधीजी का तर्क है : ‘पार्लियामेंट को मैंने बेसवा (वेश्या) कहा वह भी ठीक है। उसका कोई मालिक नहीं है। उसका कोई एक मालिक नहीं हो सकता।’ (हिन्द स्वराज, पृष्ठ 34) व्युुत्पत्ति विज्ञान कहता है कि ‘विश्’ (कुल) से दो शब्द व्युत्पन्न हुए-‘वैश्य’ और ‘वेश्या’। (भगवतशरण उपाध्याय, खून के छींटे इतिहास के पन्नों पर, पृष्ठ 77) विश् की वर्णविषयक संज्ञा ‘वैश्य’ हुई और उससे सेवित सामूहिक संपत्ति-सी नारी ‘वेश्या’ कहलाई। (भगवतशरण उपाध्याय, भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, पृष्ठ 105) कहना अनावश्यक है कि वैश्य भी ब्राह्मण-क्षत्रिय की सामूहिक संपत्ति थे। पालि भाषा में वैश्य शब्द का स्त्रीलिंग ‘वेसी’, ‘वेसिया’ या ‘वेस्सी’ है, जिसका अनुवाद ‘एक निम्न जाति की औरत’, ‘वेश्या’ दिया गया है। शिवरानी देवी की पुस्तक ‘प्रेमचंद : घर में’ का समर्पण कुछ इस तरह है: ‘स्वामी,/तुम्हारी ही चीज/तुम्हारे चरणों में चढ़ाती हूँ/इस तुच्छ सेवा को अपनाना/तुम्हारी दासी या रानी’।

परंपरागत पितृसत्तात्मक भारतीय समाज ने स्त्रियों की कई कोटियां बना रखी है-पत्नी, प्रेमिका, वेश्या आदि। यहां सहज ही ‘आलोकधन्वा याद आते हैं। कितनी प्रासंगिक हैं उनकी कविता ‘भागी हुई लड़कियां’ की ये पंक्तियां ‘तुम/जो पत्नियों को अलग रखते हो/वेश्याओं से/और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो/पत्नियों से। 1920 के दशक के भारतीय परिवार-समाज के बारे में लिखती हुई मृणाल पांडे बताती हैं कि ‘घरों के भीतर मर्दाने अलग होते थे, जहाँ समय-समय पर घर के मर्दों की महफिलें जमती और कभी-कभार उसमें ‘‘वैसी’’ औरतें मुजरे को बुलवाई भी जाती थीं। पुरुषों के सन्दर्भ में यह सर्वस्वीकृत था, कि उनकी उद्दाम मर्दानगी सिर्फ घरेलू स्त्रियों के सहवास से तृप्त नहीं होती थी। अतः युवा औरतों ने भी दूसरी किस्म की स्त्रियों की बात चुपचाप स्वीकार कर ली थी। इन औरतों के दुखों की अभिव्यक्ति गीतों में होती थी, वास्तविक जीवन में नहीं। प्रसंगवश, वाराणसी की कचौड़ी गली से अनेक रसज्ञ ‘कजली’ का रसास्वादन करने मिर्जापुर पधारते थे। इस पर उनकी पत्नियां उन्हें उलाहने देकर गाती थीं- ‘मिर्जापुर कइल गुलजार/कचैड़ी गली सून कइल बलमू।’ (सुरेश चंद्र वर्मा, ‘ऋतु एवं क्रीड़ा गीत : कजली, आजकल, अगस्त 2012) और बड़ी-बूढ़ियाँ तो इस स्वैराचार को सगर्व अपने खानदान की हैसियत का प्रमाण मानतीं, बखानती थीं। पत्नी से रोमांस या अपनी घरवाली से खुला बनाव-लगाव अच्छी नजर से नहीं देखे जाते थे। लेखिका ने खुद अपने श्वसुर-कुल की बुजुर्ग महिलाओं से एक अधपगली महिला रिश्तेदार के बारे में सुना है, जो घर की युवा बहुओं द्वारा शाम को सिंगार-पटार करने पर बेतरह खफा हो उठती थीं-‘कुछ तो उन दूसरियों के लिए छोड़ो!’ वे कहती थीं, घर-गिरस्तवालियों का, आँचल चिकना होवै है, उन लोगों मैं। तुम लोग उनकी राह पकड़ोगी, तो उन बेचारियों की कमाई धमाई का क्या होगा ? (मृणाल पांडे, स्त्री : देह की राजनीति से देश की राजनीति तक, पृष्ठ 43)

एक बार रामानन्द चट्टोपाध्याय के ‘विशाल भारत’ में नाटक में काम करनेवाली नर्तकियों के चित्र छप गये तो उन्होंने संपादक बनारसीदास चतुर्वेदी जी को बुलाया और सख्त हिदायत दी-‘मैं आपकी स्वाधीनता में बाधक नही हो सकता, पर चूंकि मेरा अनुभव आपसे कुछ अधिक है, इसलिए यह सुझाव दे सकता हूँ कि नर्तकियों के चित्र आप ‘विशाल भारत’ मे न छापें। वे प्रायः चरित्रहीन होती हैं।’ चतुर्वेदी जी ने तर्क करने की धृष्टता की-‘कोई सम्पादक किस-किस के चरित्र की खोज-बीन कर सकता है? चरित्र तो बहुत से लीडरों और लीडरानियों के भी शायद अच्छे नही है।’ इस पर ‘बड़े बाबू’ (रामानन्द चट्टोपाध्याय) ने केवल इतना ही कहा, ‘नेता और नेत्री मंच पर चढकर अपने हाव-भाव से जनता को पथभ्रष्ट तो नहीं करते, जबकि नर्तकियां वैसा करती हैं।’ (बनारसीदास चतुर्वेदी, महापुरुषों की खोज में, पृष्ठ 35) एक और दिलचस्प किस्सा है। कुछ ही दिनो बाद कहीं से घूमते हुए श्री राखालदास बनर्जी (सुप्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता) ‘विशाल भारत’ के कार्यालय में पधारे और जब चतुर्वेदी जी ने उन्हें ‘बडे बाबू’ की उक्त बात सुनाई तो उन्होंने हँसकर कहा, ‘मैं भी अपना एक किस्सा सुना दूं। प्रयाग में मैं एक बार केदार बाबू से मिलने गया हुआ था। वह भी विद्यार्थी थे और मैं भी। गलती से एक ऐक्ट्रेस का चित्र, जो मेरे पास था, बड़े बाबू की मेज पर ही छूट गया। दूसरे दिन जब मैं वहाँ पहुंचा तो वह चित्र चार टुकडो में बंटा हुआ, जहाँ का तहाँ रक्खा दीख पडा। मैंने केदार बाबू से पूछा कि क्या मामला है? उन्होने कहा, ‘यह शिक्षा आपको बडे बाबू ने ही दी है। बडे बाबू प्राचीनतावादी विचारो के हैं। आपको उनसे बहस नही करनी चाहिए।’ तथ्य है कि ‘बडे बाबू ने अपने जीवन में न कोई नाटक देखा था, न कोई फिल्म। हाँ, शान्तिनिकेतन मे विद्याथियो के नाटक उन्होने अवश्य देखे थे।’ (वही) स्मरण रहे कि महात्मा गांधी के लिए रामानन्द बाबू ‘ऋषि’ थे तो महावीरप्रसाद द्विवेदी उन्हें ‘गुरुतुल्य’ मानते थे। रोमा रोला को तोलस्तोय से कुछ अधिक ही ‘करुण’ मालूम पड़े थे।

एक दृष्टांत और : ‘कई वर्षों की पुरानी बात है। हमें एक आवश्यक कार्यवश स्वर्गीय डाॅक्टर गंगानाथजी झा के आवास-स्थान पर जाना पड़ा। हमलोग वार्तालाप कर ही रहे थे कि प्रयाग विश्वविद्यालय के कतिपय छात्र भी वहां आ पहुंचे। आने का कारण पूछने पर छात्रों ने कहा-‘‘हम विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर की लड़की के नृत्य का कार्यक्रम बनाना चाहते हैं। अतः हमें इसके लिये अनुमति प्रदान की जाय।’’ डाॅक्टर साहब ने उन छात्रों की बात सुन लेने पर एक जिज्ञासाभरी दृष्टि हमपर डाली। डाॅक्टर साहब का आंतरिक अभिप्राय जान लेने में हमें कठिनाई नहीं हुई। हमने कहा-‘‘आप विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर हैं और ये आपके विश्वविद्यालय के छात्र हैं। अतः उपस्थित विषय पर हमारा कुछ कहना सर्वथा अनुचित और अप्रासंगिक है।’’ इसपर डाॅक्टर साहब ने मुस्कराकर कहा-वह तो आप ठीक कहते हैं; किंतु ऐसे नृृत्य के संबंध में आपके व्यक्तिगत विचार क्या हैं, हम यही जानना चाहते हैं।’’ उत्तर में हमने कहा-हम तो सनातनधर्मी हैं। हमारे निज के विचार कुछ नहीं; प्रत्युत हमारे विचार तो वे ही हैं, जो हमारे नीतिकारों के अनुभूत विचार हैं। यह कहकर हमने नीति का एक श्लोकार्ध पढ़ा-‘सलज्जा गणिका नष्टा निर्लजास्तु (निर्लज्जाश्च) कुलांगनाः’ अर्थात् ‘जो युवती हया-शर्म को तलाक दे युवकों के बीच नाचे वह क्या कुलांगना कही जा सकती है?’ इसे सुन डाॅक्टर साहब ने उन छात्रों को अनुमति देना अस्वीकृत कर दिया। इस पर स्थानीय दैनिक ‘लीडर’ में डाॅक्टर साहब के विरुद्ध आंदोलन भी उठाया गया; किंतु प्रौढ़ विचार रखनेवाले डाॅक्टर साहब के मन के ऊपर उस अवांछनीय आंदोलन का कुछ भी प्रभाव न पड़ा। इतना ही नहीं, डाॅक्टर साहब ने ‘को-एडुकेशन’ को भी अपने विश्वविद्यालय में पनपने नहीं दिया।’’ (श्री द्वारिकाप्रसाद चतुर्वेदी, ‘आधुनिक नारी’, कल्याण, नारी अंक, पृष्ठ 145-46)

इस चेतना का बीज पुनर्जागरणकालीन साहित्य में है। 1874 ईस्वी में भारतेन्दु हरिश्चंद्र ’बालाबोधिनी’ नाम से एक स्त्री विषयक पत्रिका निकालते हैं, किन्तु उसमें स्त्रियों को वही परंपरागत शिक्षा दी जाती है, जिसमें उन्हें एक ’अच्छा गुलाम’ बनने के ’गुर’ सिखाये जाते थे। दो वर्ष तक प्रकाशित इस मासिक पत्रिका के किसी भी अंक में स्त्रियों के अधिकार के सवाल नहीं उठाये गये, न ही उन्हें नये ज्ञान-विज्ञान की रौशनी में अपने जीवन के बारे में खुद सोचने की कोई प्रेरणा दी गई। ’नारि नर सम होहिं’ का नारा देनेवाले भारतेन्दु अपने बलिया वाले प्रसिद्ध व्याख्यान ’भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ में कहते हैं-’लड़कियों को पढ़ाइए, किन्तु उस चाल से नहीं जैसे आजकल पढ़ाई जाती है, जिससे उपकार के बदले बुराई होती है। ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल धर्म सीखें, पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज शिक्षा दें।’ यह बलिया में ददरी के मेले के समय ‘आर्य देशोपकरिणी सभा’ में दिया गया भाषण है। इसे भारतेन्दु के सेक्रेटरी इंदिरायन उपाध्याय ने पढ़ा था जो बाद में ‘नवोदिता हरिश्चंद्र चंद्रिका’ के दिसंबर, 1884 के अंक में प्रकाशित हुआ।  

’बालाबोधिनी’ में व्यक्त ‘स्त्रियोद्धार’ के संदर्भ में वीर भारत तलवार लिखते हैं कि ’इस मासिक पत्रिका में स्त्रियों की हालत सुधारने के बजाय खुद स्त्रियों को ही सुधारने का इरादा दिखाई देता है। इसमें उनके अधिकारों की नहीं, उनके कर्तव्यों की चर्चा की गई है।’ इस पत्रिका में स्त्रियों से संबंधित सबसे लंबी रचना ’बाला प्रबोध’ थी, जो 1857 की जनवरी से शुरू होकर अगले तीन-चार अंकों तक छपी। बिजनौर (पीलीभीत) के पास सिकंदराबाद के निवासी हीरालाल ने इसे सरकारी स्कूलों में लड़कियों के पाठ्यक्रम में लगवाने के मकसद से लिखा था। यह ठीक वैसा ही था, जैसा पाठ्यक्रम भारतेन्दु चाहते थे। “इसमें सास-ससुर, देवर-ननद, जेठ-जिठानी, शिशु आदि के प्रति और रस्म-रिवाजों तथा त्यौहारों के वक्त घर की बहू को कैसा सुंदर और योग्य वर्ताव करना चाहिए, इसका बखान किया गया है।“ पूरी रचना 1870 में छप चुकी डिप्टी नजीर अहमद की किताब ’मिरात-उल-उरूस’ के ढर्रे पर बनी है। नजीर अहमद ने अपनी इस बेहद लोकप्रिय किताब में स्त्री-शिक्षा की जबरदस्त हिमायत की है, लेकिन साथ ही उन्होंने चेतावनी भी दी है कि ’वे मर्दों की बराबरी करने की बात अपने दिमाग में हर्गिज न लाएं।’ 

भारतेंदु के मित्र रामदीन सिंह के खड्गविलास प्रेस के मैनेजर बाबू साहिबप्रसाद सिंह उन दिनों स्कूली पाठ्यक्रम के लिए किताबें लिखनेवाले प्रमुख लेखक थे। उन्होंने भारतेंदु की सहायता से तीन जिल्दों में स्त्रीशिक्षा की किताब तैयार की। उनकी ‘स्त्रीशिक्षा की पहली किताब’ खड्गविलास प्रेस से 1883 में छपी। इसमें एक पाठ है-शीलवती। इस पाठ में शीलवती नामक स्त्री के जीवन के बारे में लिखा गया है कि वह “घर या बाहर के सब कामों को पति से पूछकर करती और पति जब किसी विषय में कुछ पूछता तो अपनी बुद्धि के अनुसार बड़ी सावधानता से अच्छा और हितकारी मंत्र कहती, पर यह भी कह देती कि नाथ! मैं क्या जानूँ। मेरी स्त्री की बुद्धि कितनी। अपने पति के भोजन इत्यादि किसी काम में विलंब न (रस्साकशी, पृष्ठ 194) करती, नित्य बड़े सवेरे पति के पहले उठती और स्नानादिक करके गृहस्थी के काम में लगती, जो कोई वस्तु बाहर से मँगवाना होता वह मंगवा रखती, पति के भोजन के पीछे आप खाती। भोजन के पीछे वह सीना-पिरोना करती या और जो कुछ घर का काम निकलता करती या कोई पुस्तक अवलोकन करती या कुछ लिखती।’ (बाबू साहिबप्रसाद सिंह, स्त्रीशिक्षा की पहली किताब, खड्गविलास प्रेस, 1883, बांकीपुर, पृष्ठ 46; रस्साकशी, पृष्ठ 194-95 पर उद्धृत) दूसरी पुस्तक की अधिकांश सामग्री ‘बालाबोधिनी’ से संकलित है। लज्जा, पवित्रता, सास, ससुर, जिठानी, देवर, देवरानी आदि से किस ढंग का व्यवहार करना चाहिए-इन सभी विषयों पर विशेष रूप से इस पुस्तक में विचार किया गया है। (आधुनिक हिन्दी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका, पृष्ठ 144)

1907 तक ‘सरस्वती’ में छपे लेखों में स्त्रियों के ‘हिमायती लेखक’ न तो उसे बराबरी का हक देना उचित समझते हैं न स्वतंत्रता देना चाहते हैं। इस पत्रिका के लेखक प्रकारांतर से मनु का समर्थन करते लगते हैं। उदाहरण के लिए यहां जनवरी, 1907 के अंक से उद्धृत है, ’लोग मनु का इस बात में विरोध करते हैं कि वे स्त्रियों को स्वतंत्रता दिए जाने के विरोधी हैं...अच्छा, जरा देर के लिए मान लीजिए कि मनु के इस अन्याय से स्त्रियों को बचाने के लिए गवर्नमेंट ने एक कानून बनाकर स्त्रियों और पुरुषों के अधिकार बराबर कर दिए-उनके अनुसार स्त्रियों को मनमाना काम करने की आज्ञा मिल गई। इस दशा में यदि कोई कानूनदां स्त्री पति से कहने लगे-“सुनिए जनाब! मेरे और आपके अधिकार बराबर हैं-मैं भी स्वाधीन, आप भी स्वाधीन। एक दिन मैं चूल्हा-चैका और झाड़ू-बुहारू करूँ, एक दिन आप। एक दिन मैं आपकी सेवा करूँ, एक दिन आप मेरी सेवा करें, अथवा यदि वह कह बैठे ’मुझे संतान पैदा करने से इंकार है’ तो बताइए ऐसी स्वाधीनता का क्या नतीजा होगा। ...समाज को एक शृंखला में बंधा रखने के लिए व्यक्ति विशेष की स्वाधीनता को एक निर्दिष्ट सीमा के भीतर रखने की बड़ी जरूरत है।“ 

भारतेंदु ने लडकियों के पाठ्यक्रम की आलोचना करते हुए कहा कि 'ये पाठ्यपुस्तकें कई कारणों से आपत्तिजनक हैं। मैं मिस रोज ग्रीनफील्ड से पूरी तरह सहमत हूं कि बड़ी लड़कियों को प्रेमसागर (लल्लूलाल का बनाया) ग्रंथ पढ़ने के लिए नहीं देना चाहिए। विद्यांकुर और इतिहासतिमिरनाशक उनके नैतिक चरित्र का विकास नहीं कर सकते। चरित्र निर्माण (मोरालिटी) और घरेलू प्रबंध वगैरह के बारे में बतानेवाली अच्छी पाठ्यपुस्तकें उनके पाठ्यक्रम में लगानी चाहिए।' कहना अनावश्यक है कि प्रेमसागर अगर आपत्तिजनक ग्रंथ था तो वह लड़कों के लिए भी आपत्तिजनक होना चाहिए था। (वीरभारत तलवार, रस्साकशी, पृष्ठ 34)

'बालाबोधिनी’ में स्त्री को एक इनसान के रूप में देखने और उसकी समस्याओं को समझने का कोई प्रयत्न नहीं दिखता। चार साल तक निकली इस पत्रिका के किसी भी अंक में स्त्रियों के किसी भी अधिकार का सवाल नहीं उठाया गया, न उन्हें नए ज्ञान-विज्ञान की रोशनी में अपने जीवन के बारे में खुद सोचने की कोई प्रेरणा दी गई। भारतेंदु ने ब्रजभाषा में शृंगारिक कविताएं लिखी हैं। अपनी दोनों प्रेमिकाओं के लिए पद लिखे थे। 'अंधेर नगरी' में उस समय की प्रसिद्ध गानेवाली कई वेश्याओं के नाम दिये गये हैं। ये सभी भारतेन्दु के दरबार में आती-जाती थी। इन्हीं में से किसी के हाव-भाव पर भारतेन्दु को कोई नई उक्ति सूझी थी जिसपर कविता बनाकर उपस्थित सज्जनों को सुनाते हुए उन्होंने कहा था कि ‘हम इन सबों (वेश्याओं) का सहवास विशेषकर इसलिए करते हैं। कहिए! यह सच्चा मजमून कैसे हो सकता था।' लेकिन सच है कि चार वर्षों तक छपी 'बालाबोधिनी' में शृंगार रस की दूर-दूर तक कोई गंध नहीं मिलती। (रस्साकशी, पृष्ठ 38)