Wednesday, November 4, 2009

कौन कहेगा ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं...’

राजू रंजन प्रसाद


कुछ साल पहले अस्पताल से लेकर कॉलेज तक की दीवारों पर लिखा होता था, ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं।’ जनवादी और प्रजातांत्रिक मूल्यों के खिलाफ सांप्रदायिकता को बल प्रदान करने वाले एक से बढ़ कर एक लेखों के ढेर लगाए जा रहे थे। विकृत मानसिकता को तरजीह दी जा रही थी और बच्चों की पाठ्य-पुस्तकों तक में सांप्रदायिक रंग भरे जा रहे थे। यह मानवीय मूल्यों और चेतना का संकट है। यह विचारों की स्वच्छता, आत्मा की पवित्रता और इन सबसे एक कदम आगे बढ़ कर एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के अस्तित्व का सवाल है। ऐसे में गांधीजी को याद करने का मतलब होगा सांप्रदायिकता विरोधी अभियान चलाना, हर ऐन मौके पर फिरकापरस्त ताकतों को शिकस्त देना, मात देना।

हालांकि कुछ लोग गांधीजी के सांप्रदायिकता संबंधी दृष्टिकोण के बारे में दूसरे ही तरह का खयाल रखते हैं। रजनी पाम दत्त जैसे मार्क्सवादी इतिहासकारों का मानना है कि ‘हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अपील करते हुए भी गांधीजी एक ऐसे राष्ट्रीय नेता के रूप में नहीं बोलते थे जो दोनों संप्रदायों में एक होने की भावना पैदा करता है। वह हिंदू नेता के रूप में बोलते थे, जो हिंदुओं को ‘‘हमलोग’’ कहता था, और मुसलमानों को ‘‘वे लोग’’।’

गांधीजी एक सच्चे धार्मिक व्यक्ति थे। उनका धर्म लोगों से प्यार करने को कहता था, उनका धर्म उन्हें मानवता की पूजा करना बताता था। उनका धर्म कभी नहीं कहता था कि एक धर्म की रक्षा दूसरे धर्मावलंबी की हिंसा/हत्या के बाद ही हो सकती है। अहिंसा, सदाचार और अपने दुश्मनों तक को प्यार करने की नीति उनके धर्म के आदर्श थे। इस मायने में अगर कहा जाए तो वे एक सच्चे धार्मिक थे, एक संत थे, जिसकी मिसाल भारत क्या, इस पूरे संसार में भी बहुत कम ही है। अक्सर सांप्रदायिक दंगों के लिए धर्म को गुनहगार ठहराया जाता रहा है। लेकिन जब कभी सांप्रदायिक दंगों के मूल कारणों की खोज की दिशा में पहल होती है तो एक व्यापक संदर्भ में सामाजिक-आर्थिक कारण ही हाथ लगते हैं।

धर्म तो मात्र एक बहाना है, जिसकी आड़ में स्वार्थी तत्त्व अपने हितों की पटरी बैठाते हैं। दंगे की जड़ में अगर धर्म होता तो गांधी निस्संदेह दुनिया के सबसे बड़े दंगाई या फिरकापरस्त होते। लेकिन यह क्या है कि भारत के किसी भी क्षेत्र में सांप्रदायिक दंगा भड़क जाने पर यह विचार किए बगैर कि इलाका हिंदू का है या मुसलमान का, अमन कायम करने पहुंच जाते थे? कभी-कभी तो महीनों तक अन्न तक का त्याग कर देते।

सांप्रदायिक दंगों की जड़ में धर्म नहीं है, इसे स्पष्ट करते हुए गांधीजी ने एक बार ‘हरिजन’ में लिखा था- ‘मुझे लगता है कि सांप्रदायिक दंगे का कारण हिंदू-मुसलमान का आपसी विद्वेष नहीं है, बल्कि इसके कारण अंग्रेजी राज द्वारा जनता का शोषण, करों का भारी बोझ और इसी तरह के अन्य असंतोष हैं।

कुछ लोग गोकशी/गोहत्या को भी सांप्रदायिक दंगों का एक प्रमुख कारण मानते हैं। डॉ अखिलेश कुमार ने अपनी पुस्तक ‘कम्युनल रॉयट्स इन मॉडर्न इंडिया’ (दरअसल, यह काम बिहार के दंगों पर है, लेकिन प्रकाशक ने व्यावसायिक कारणों से ‘मॉडर्न बिहार’ की जगह ‘मॉडर्न इंडिया’ प्रकाशित कर दिया। यहां यह जोड़ देना मुनासिब है कि बिहार के दंगों पर यह संभवतः पहली और अकेली पुस्तक है।) में सप्रमाण दिखाया है कि गोकशी/गोहत्या कहीं से भी हिंदू-मुस्लिम विद्वेष का असली कारण नहीं है। अगर सवाल सिर्फ गोहत्या का होता तो हिंदू अंग्रेजों का भी विरोध करते क्योंकि गोमांस उनके भोजन में प्रमुखता से शामिल था। डॉ कुमार ने जोर देकर लिखा है कि गोकशी को लेकर हिंदुओं ने अंग्रेजों का कभी विरोध नहीं किया। यह सांप्रदायिक तनाव सिर्फ हिंदू-मुसलमान के बीच देखा जाता था। गांधीजी ने तो लिखा भी है- ‘मैं यह समझने में सदा असमर्थ रहा कि अंग्रेजों द्वारा की जा रही गोकशी का हम विरोध क्यों नहीं करते? हमारे गुस्से में इजाफा तब होता है, जब गोहत्या कोई मुसलमान करता है।’

यह सही है कि सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक दंगा के मामले में गांधीजी की दृष्टि बहुत साफ नहीं थी और हमें बहुत दूर ले भी नहीं जाती। इसका कारण शायद यह हो कि वे आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को एक सही संदर्भ में विश्लेशित कर पाने में असमर्थ थे। लेकिन इतना तो फिर भी मानना पड़ेगा कि धर्म को इसका कारण मानने के लिए वे तैयार न थे।

हिंदू-मुसलमान दोनों ही संप्रदायों के उच्च वर्ग के लिए गोकशी/गोहत्या कोई समस्या नहीं रही। इसको स्पष्ट करते हुए प्रेमचंद ने ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ शीर्षक लेख में लिखा था- ‘शायद ऐसे बहुत कम राजे-महाराजे या विदेश में शिक्षा प्राप्त करने वाले हिंदू निकलेंगे जो गोमांस न खा चुके हों। और उनमें से कितने ही आज हमारे नेता हैं, और हम उनके नामों का जयघोष करते हैं।’ कहना होगा कि पंडित मोतीलाल नेहरू भी कई मौकों पर गोमांस का स्वाद चख चुके थे। खुद गांधीजी ने स्वीकार किया है कि यूरोप प्रवास के दिनों में गोमांस खाते-खाते बचे। ऐतिहासिक तथ्य है कि ‘गौरक्षिणी समिति’ की स्थापना से पहले गोकशी समाप्त करने पर उत्तर प्रदेश के एक स्कूल शिक्षक ने काफी जोर दिया है।

हिंदू-मुस्लिम दंगों की जड़ सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में निहित थी। प्रथम विश्व युद्ध के आसपास हिंदू-मुस्लिम दंगों का मुख्य कारण गोकशी/गोहत्या है। इस तरह के दंगों का केंद्र पशु मेला हुआ करता था। बिहार के ऐसे पशु मेलों में सोनपुर, बराहपुर और ऐनखांव के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। हिंदू संप्रदाय के निम्न मध्य-वर्ग के लोगों के बीच ही सांप्रदायिक तनाव की स्थिति थी। संभवतः इन लोगों के बीच यह भ्रांत धारणा बैठा दी गई थी कि गोकशी/गोहत्या के कारण पशुओं की कीमत में वृद्धि हो जा रही है।

मुसलमानों के बीच निम्न मध्य-वर्ग के लोग चमड़े के व्यापार में लगे थे। गोहत्या पर पाबंदी से उनके व्यापार-व्यवसाय को धक्का पहुंचने का डर व्याप्त था। इसलिए गोकशी का संबंध धर्म से कम आर्थिक हितों से ज्यादा था।

इस नजरिए से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो धर्म कहीं से भी सांप्रदायिक दंगों या वैमनस्य का कारण नहीं है। हालांकि दंगा शुरू हो जाने के बाद अक्सर इसे ही मूल कारण का जामा पहना कर पेश किया जाता रहा है। यह हमारे सांप्रदायिक लीडरानों की करतूत है और अप्रत्यक्ष उनकी भी जो ‘धर्मनिरपेक्षता’ की ‘दुकान’ को जिंदा रखने में विश्वास रखते हैं। गांधीजी ने एक बार कहा था- ‘अगर हमारे नेतागण आपस में भाईचारा कायम कर लें तो शायद सांप्रदायिक तनाव खत्म हो सकता है।’ गांधीजी के इस वक्तव्य के दो अर्थ निकलते हैं। पहले अर्थ के बारे में कहा जा सकता है कि गांधीजी का यह अभिजातवर्गीय दृष्टिकोण था, जो सांप्रदायिकता की समस्या का हल राजनीतिज्ञों के हेल-मेल में ढूंढ़ता था। दूसरा अर्थ कहीं ज्यादा दुखद और अनर्थकारी है जो ‘धर्मनिरपेक्ष’ नेताओं की पोल खोल देता है।

धर्म सांप्रदायिक दंगों का कारण नहीं है, लेकिन जनता की सदियों पुरानी एकता को भी तोड़ डालने का सबसे कारगर अस्त्र अवश्य है। बिहार राज्य अभिलेखागार के पॉलिटिकल स्पेशल फाइल नंबर 112/1918 में एक अत्यंत ही मजेदार घटना का हवाला दर्ज है। उसमें लिखा है कि दंगा करने वाले लोग ‘अंग्रेजी राज उठ गया’ और ‘जर्मन की जय’ के नारे लगा रहे थे। इस तरह की साम्राज्य-विरोधी चेतना को तोड़ने के लिए सरकार ने अनेक स्थलों पर प्रायोजित तरीके से मंदिरों-मस्जिदों को तुड़वाया। तब सीआईडी की रिपोर्ट आई कि जर्मनी और इंग्लैंड की समस्या से विरत हो लोग सांप्रदायिक दंगों में मशगूल हो चुके हैं। यह प्रथम विश्वयुद्ध के दिनों की बात है।

बिहार के जहानाबाद जिले के अंतर्गत मथुरा सिंह नाम के एक विख्यात ‘हिंदू नेता’ थे। उनके बड़े लड़के ने ‘साक्षात्कार’ के क्रम में इस बात पर जोर दिया कि उनके पिता को मुसलमानों से कोई ऐतराज नहीं था, जबकि वे उस क्षेत्र के लगभग सारे दंगों में शामिल थे। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ‘उनके पिताजी कभी मुसलमानों का कत्ल करते तो कभी उसकी रक्षा भी करते, क्योंकि उनका एकमात्र उद्देश्य कत्ल करना ही नहीं होता।’ दंगों के दौरान मंदिर-मस्जिद अगर आक्रमण का केंद्र बनते हैं तो इसका कारण शायद यही है कि वे धन-दौलत के साथ-साथ हथियार के भी केंद्र होते हैं। ‘गोल्डेन टेंपल’ इसका हाल का उदाहरण है।

गांधी और सांप्रदायिकता पर बात करते इतना तो कहा ही जा सकता है कि उनके स्वभाव और आचरण के कुछ खास ऐसे नियम थे जिसके फलस्वरूप जनसाधारण मुसलमान के अंदर असुरक्षा का डर पैदा होता था। स्वराज्य की चर्चा करते गांधीजी ‘रामराज्य’ पर विशेष बल देते। ऐसा वे अपने ‘विशुद्ध धार्मिक’ संस्कारों की वजह से करते। लेकिन मुसलमान भाइयों को लगता कि वे आजाद भारत में ‘हिंदू राज’ की स्थापना की बात कर रहे हैं। मुसलमानों के एक अत्यंत ‘आधुनिक’ (धर्मनिरपेक्ष नहीं) नेता जिन्ना ने इस डर को व्यक्त करते हुए कहा था- ‘गांधीजी का लक्ष्य मुसलमानों की सभ्यता और संस्कृति को समाप्त कर भारत में हिंदू राज स्थापित करना है।’ आगे और भी कहते हैं- ‘उनकी मनसा ये नहीं है कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ दिया जाए, बल्कि वे अंग्रेजों की देखरेख में मुसलमानों पर शासन करने की छूट पा लेने की कोशिश मात्र में हैं।’ यह कहना क्षम्य है कि गांधीजी के आचार-विचार के नियमों से सांप्रदायिक तनाव में वृद्धि हो जाया करती थी। लेकिन ‘गांधीजी की ऐसी मनसा थी,’ ऐसा कहना मनगढ़ंत, अनैतिहासिक और अनर्थकारी होगा।

जब-जब व्यवस्था-विरोधी संघर्ष तेज हुआ है, तब-तब भूख के मूल मसले को परे धकेल कर धर्म के मसले को सामने कर दिया जाता रहा है। कोई रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद लेकर आता है तो कोई इसके बंद ताले को ‘सरकारी कुंजी’ से खोलने की कोशिश करता है। मंदिर हो या मस्जिद- सभी मनुष्य के जीवन में मनुष्य के बाद ही स्थान पाने के हकदार हैं। लेकिन कभी-कभी तो ऐसा भी लगता है कि गाय-सुअर, मंदिर-मस्जिद सभी बने रहेंगे, केवल इसके नाम पर अपनी जान देने वाले भोले-भाले हिंदू-मुसलमान न बचेंगे। और तब ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ के उदघोष के लिए कोई ‘हिंदू’ भी बचा न रह सकेगा।

Thursday, August 6, 2009

शिक्षक नशेड़ी, गंजेड़ी हैं तो क्या पत्रकार संत हैं?




नवनियोजित शिक्षकों के आन्दोलन की खबरें बिहार के अखबारों में ‘प्रभात खबर’ ने सबसे शानदार तरीके से छापीं लेकिन ‘सुशासनी।’ डांट से अब ये ‘उल्टी गंगा बहाने’ लगे हैं। अनुराग कश्यप, दर्शक (लेखक हैं तो बुर्के में क्यों हैं?) और सुरेन्द्र किशोर इन शिक्षकों को अयोग्य साबित करने पर तुले हैं। शायद कोई ‘सरकारी फरमान’ मिला हो या कि ‘राजकीय पत्रकार’ नियुक्त होने के लिए ये लोग भी ‘दक्षता परीक्षा’ से गुजर रहें हैं। अनुराग कश्यप जी शिक्षकों को गुटखा-पान खाने वाला बता कर अयोग्य घोषित करना चाहते हैं। अगर योग्यता-अयोग्यता का यह भी एक पैमाना है तो न चाहते हुए भी कहना पड़ रहा है कि मद्यपान का प्रतिशत पूरी दुनिया में और खासकर बिहार में, किसी भी अन्य पेशे के लोगों से ज्यादा पत्रकारों में है। यहां तो ‘पियक्कड़’ होना एक अच्छा पत्रकार होने की पूर्व शर्त की तरह है। आप पत्रकार हैं तो मालूम ही होगा कि अधिक सिगरेट पीने वालों में एक नाम कार्ल मार्क्स भी है। मोतीलाल नेहरु ‘विदेशी दारू’ पीते थे। वाजपेयी जी के बारे में तो कभी आपने भी लिखा ही होगा। हिन्दी कविता के ‘सूर्य’ निराला हमेशा सोडा-वाटर के साथ पीते थे। नहीं तो नीट। पानी मिलाना उन्हें बिल्कुल गवारा न था। अलबत्ता कम आय वाले पत्रकार ‘ठर्रा’ से ही काम चलाते हैं। अनुराग जी सोचें कि क्या शराब पीने वाले पत्रकार अयोग्य हैं या कि सिर्फ अयोग्य पत्रकार ही पीते हैं? मेरे लिए तो अब भी यह योग्यता-अयोग्यता का पैमाना नहीं हो सकता।





पहले सुरेन्द्र किशोर और फिर अनुराग कश्यप लिखते हैं कि नवनियोजित शिक्षकों को आवेदन तक लिखने का ज्ञान नहीं है। उनके अनुसार ऐसे शिक्षक ‘स्टॉमेक में हेडक’ होने की बात लिख डालते हैं। अनुराग जी, पाठकों से छिपा नहीं है कि आप जैसे पत्रकार दफ़्तर में डेस्क पर बैठे-बैठे बगैर किसी शिक्षक से मिले पूरी की पूरी ‘स्टोरी’ गढ़ लेते हैं और अंत में लिख देते हैं ‘इस लेख में उल्लेख किए गए नाम बदल दिए गए हैं।’ मैं यह नहीं कहता कि शिक्षकों में कुछ अयोग्य लोग शामिल नहीं हैं। लेकिन क्या आप कोई ऐसा पेशा बता सकते हैं, जिसमें कुछ अयोग्य लोग न हों? कुछ साल पहले बिहार में व्याख्याताओं की नियुक्ति हुई थी। तत्कालीन गवर्नर को लगा कि इसमें बड़े पैमाने पर धांधली हो रही है तो उन्होंने नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगा दी। यही ‘सुशासनी मोदी’ थे जो गलत को सही करने के लिए नया गवर्नर लाए। उक्त नये गवर्नर ने अपने शपथ ग्रहण के तुरंत बाद (तीन दिनों के अंदर) ‘अयोग्य व्याख्याताओं’ की नियुक्ति की। मामला विजिलेंस में गया और उस पर रिपोर्ट भी कई सालों से मुख्यमंत्री के टेबुल पर पड़ी है। यह रिपोर्ट व्याख्याताओं की ‘अदृश्य योग्यता’ के बारे में अनगिनत सबूतों से भरी पड़ी है। सरकार और उनके चाटुकारों को उनकी भी ‘योग्यता’ पर कुछ बोलना चाहिए। मुख्यमंत्री चुप हैं कि बोलेंगे तो उनकी भी ‘परीक्षा’ हो जाएगी।


इसलिए अनुराग जी, परीक्षा से सिर्फ नवनियोजित शिक्षक ही नहीं डर रहे, हमारे मुख्यमंत्री तक डरते हैं। हम शिक्षक अगर ‘स्टॉमेक में हेडक’ होने की बात लिखते हैं तो सचमुच चिंता का विषय है। इस पर सामूहिक विमर्श की जरूरत है। क्या आप नहीं मानते कि देश अथवा सभ्य समाज का नागरिक अखबारों और पत्रिकाओं के सहारे भाषा समृद्ध करता है और यह भी कि आजकल हिन्दी अखबारों की भाषा कितनी अशुद्ध हो गई है। यह कहते अच्छा नहीं लगता कि ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ लेना बंद करके बीच में कुछ दिनों के लिए मैंने ‘सहारा इंडिया’ अखबार लेना शुरु किया। एक माह के अंदर ही उसे बंद करना पड़ा क्योंकि बेटे ने ‘विद्रोह’ कर दिया। कहा - ‘पापा इसका एक वाक्य भी शुद्ध नहीं होता।’ परिवार की आंतरिक शांति को ध्यान में रखते हुए मैंने ‘सहारा इंडिया’ लेना बंद कर दिया। तभी ‘प्रभात खबर’ के संपादक अजय कुमार के यहां ‘उनका’ अखबार देखा। मुझे पसंद आया और कहूं कि पिछले दो माह से हिन्दी अखबार के नाम पर मैं ‘प्रभात खबर’ ही लेता हूं। लेकिन इसकी भाषा पर भी ध्यान देने की जरूरत है।


पत्रकारिता स्कूल के ‘द्रोणाचार्य’ सुरेन्द्र किशोर अगर ‘महत्त्वपूर्ण स्मरणीय बात’ लिखते हैं तो क्या भाषा भ्रष्ट नहीं होती? उन्हें खूब मालूम है कि महत्त्वपूर्ण बातें स्मरणीय होती हैं या फिर स्मरणीय बातें महत्त्वपूर्ण होती ही हैं। जून माह में आपके अखबार के एक अंक में किसी पत्रकार ने लिखा ‘ब्रिटिशवासी’ वह भी खबर के शीर्षक में, मोटे (बोल्ड)अक्षरों में। आए दिन आप छापते रहते हैं ‘पांच फीट चौड़ी सड़क।’ आप जानते हैं कि हिन्दी में फुट का ही प्रयोग चलता है फीट का नहीं। इसलिए महाशय, शिक्षक अपनी भाषा की दुर्दशा के लिए अकेले जिम्मेवार नहीं हैं। दूसरों की गलती दिखा कर आप बेदाग नहीं बच सकते।


कुछ समय पहले ‘बिहार राज्य अभिलेखागार’ में पुस्तक लोकार्पण समारोह था। शहर के ‘तोप’ बुद्धिजीवी वहां पधारे थे। ‘इतिहासवेत्ता’ हेमंत भी थे। मुख्यमंत्री को अशोक अंशुमान एवं श्रीकांत द्वारा ‘संपादित दस्तावेज’ का लोकार्पण करना था। तीन-तीन बैनर लगे थे, लेकिन किसी पर भी ‘मुख्यमंत्री’ शब्द सही तरीके से नहीं लिखा गया था। जाहिर है, इस कार्यक्रम के पीछे किसी नवनियोजित शिक्षक का हाथ नहीं था।


इसीलिए कहता हूं कि अनुराग जी, गिरावट आई है, लेकिन केवल नियोजित शिक्षक ही उसकी चपेट में नहीं हैं। हिन्दी अखबार का संपादकीय तक गिरावट की चपेट में है।

Monday, June 29, 2009

यादों में बसे लोग- 5


यथार्थ तो परछाई की तरह है...

कवि ‘अव्यावहारिक’ जीव होता है...

व्यथित जी जब कभी पटना आते और हमलोग मिल बैठते तो आलोक धन्वा की चर्चा अवश्य होती। आलोक जी की कविताओं से वे बेहद प्रभावित थे। वे जब बात करने लगते तो निर्दोष बच्चों-सी ललक दिख पड़ती उनमें। मैं कभी कहता कि ‘आपने आलोक धन्वा की सिर्फ कविताएं पड़ी हैं, जीवन नहीं देखा है’ तो हल्के-से प्रतिवाद से साथ बच निकलने की कोशिश करते। मुझे लगता वे अपना विश्वास नहीं तोड़ना चाहते और मैं चुप लगा जाता। लेकिन यथार्थ तो परछाईं की तरह है। उससे बहुत दिनों तक बचा तो नहीं जा सकता।

एक दिन की बात है कि अशोक जी को साथ लेकर व्यथित जी आलोक धन्वा से मिलने चले गए। वहां से लौटे तो बहुत उदास और अशांत थे। पूछने पर बताया कि ‘क्रांति के साथ निभ नहीं रही है। वे गुस्से में लगातार चीख के साथ बर्तनें तोड़े जा रही थीं।’ में यह सब सुन कर बहुत उदास और दुखी नहीं हुआ। ऐसी स्थित की आशंका मुझे पहले ही से थी। एकांत के क्षणों में आलोक धन्वा कहने लगे थे- ‘राजू भाई, मैंने दरवाजा खुला छोड़ रखा है। क्रांति जिस दरवाजे से होकर आई है, जा भी सकती है।’ मैं सोचता, लोग ठीक ही कहते हैं कि कवि ‘अव्यावहारिक’ जीव होता है। व्यथित जी इस घटना के बाद खासे डरे लग रहे थे। वे भी अपनी शादी लेकर गंभीर हो रहे थे, वह भी दूसरी के लिए।

साहित्य के जनतंत्र में...

इधर कुछ दिनों से आलोक धन्वा मुझसे नाराज थे। व्यथित जी की पुस्तिका ‘कविता का तीसरा संसार’ की समीक्षा को लेकर। यह जबलपुर से निकलने वाली अनियतकालीन पत्रिका ‘विकल्प’ में छपी थी। दरअसल, मैंने जो लिखा था, उसका सार यह था कि आलोक धन्वा के यहां मुक्तिबोध के उलट कविता और जीवन दो अलग-अलग चीजें हैं। समीक्षा को पढ़ कर या सुन कर आलोक धन्वा ने कुमार मुकुल से कहा था- ‘राजू बदतमीज और चूतिया है...।’ मुझे सहज ही विश्वास हो गया, क्योंकि कुमार मुकुल के बारे में मुझसे ठीक-ठीक यही वाक्य कहा था उन्होंने और यह भी कि ‘उसने मेरे घर में कागज-कलम पकड़ना सीखा है।’

आलोक धन्वा को ‘साहित्य के जनतंत्र’ में ‘असहमति’ मुश्किल से बर्दाश्त होती थी।

समीक्षा की आग मंद भी न पड़ी थी कि व्यथित जी पटना आ धमके। उन्हें उसी ‘विकल्प’ पत्रिका का नक्सलबाड़ी अंक संपादित करने का दाय्त्व दिया गया था। वे चाहते थे कि आलोक धन्वा का एक लंबा (ऐतिहासिक) इंटरव्यू हो पत्रिका के लिए। इस उद्देश्य से वे अपने नायक कवि के पास पहुंचे ही थे कि आलोक धन्वा बमक उठे। कहने लगे- ‘शर्मा जी, मुझे समझ में नहीं आता कि राजू जैसा पाजी लड़का आपका मित्र कैसे हो गया।’ शर्मा जी के ज्ञान पर चोट थी यह। इसलिए प्रतिवाद करने से अपने को रोक न पाए- ‘क्या मुझमें यह विवेक भी नहीं कि अपने मित्र का चुनाव मैं स्वतंत्र होकर कर सकूं?’ आलोक धन्वा को अपना दांव बेअसर होता लगा तो कहने लगे- ‘जहां से पहल जैसी पत्रका निकल रही हो वहां से विकल्प निकालने की क्या जरूरत है?’ महाकवि का इंटरव्यू करने की शर्मा जी की ख्वाहिश पूरी न हो सकी।

व्यथित जी अब भी पटना आते हैं, लेकिन आलोक धन्वा का नाम उन्हें उत्तेजित नहीं कर पाता।

‘क्रांति ड्रामा करने गई है...’

एक दिन मैं स्वरूप विद्या निकेतन स्कूल में अपनी कक्षा से ज्योंहि निकला तो पाया कि आलोक धन्वा निदेशक जनार्दन सिंह से बातचीत में उलझे हुए हैं। बहस का विषय था कि बच्चों को पीटा जाए या नहीं। जनार्दन सिंह जहां बच्चों को पीटने के लाभ बता रहे थे, वहीं आलोक उसे ‘सामंती समाज की देन’ बता रहे थे। दरअसल वे अपनी वकील भाई के बेटे को छात्रावास में दाखिला दिलाना चाहते थे। जनार्दन सिंह यानी बच्चों के स्वघोषित ‘चाचाजी’ को आलोक धन्वा सामंतों का लठैत घोषत कर चल निकले। मुझे भी साथ ले लिया।

रास्ते में नोटों की गड्डी दिखाते हुए कहा- ‘चलिए राजू भाई, आज पैसों की दिक्कत नहीं है।’ बेली रोड स्थित बेलट्रॉन भवन में कोई कार्यशाला चली थी, उसके पैसे थे उनके पास। मैं ‘न’ कह पाया और चल दिया। डाकबंगला के पास पहुंच कर एक साफ-सुथरी (महंगी भी) दुकान से ब्रेड और नाश्ते का अन्य सामान लिया। अपने घर के पास हरा चना भी खरीदा। हम दोनों घर में दाखिल हुए। मुझे ड्राइंग रूप में बिठा कर खुद एप्रन में बंधे किचेन में जा घुसे। हमलोगों ने साथ-साथ नाश्ता लिया। उन्होंने अपनी मशहूर काली चाय भी पिलाई।

थोड़ा निश्चिंत होने पर मैंने पूछा ‘घर में कहीं ‘क्रांति’ नहीं दिख रही है?’

थोड़ी देर मौन साध कर वे बोले- ‘क्रांति ड्रामा करने गई है।’

Wednesday, June 10, 2009

यादों में बसे लोग- 4

‘छत की लड़की’ से परिचय…

एक दिन अखबार से मालूम हुआ कि ‘छत की लड़की’ उनके आंगन में दाखिल हो चुकी है, यानी उन्होंने शादी कर ली है। हम लोगों के लिए यह खबर बहुत रोमांचक थी। मैं तब अशोक जी के साथ सुनील जी के मकान में रहा करता था। मैं, अशोक जी और सैदपुर छात्रावास के दिनों के पुराने परिचित सियाराम शर्मा व्यथित साथ-साथ आलोक धन्वा को बधाई देने पहुंचे। आलोक जी ने तीनों का बारी-बारी से पत्नी से परिचय कराया। अशोक जी के परिचय में उन्होंने ठीक-ठीक कौन-सा वाक्य कहा था, फिलहाल मुझे याद नहीं है। मेरा परिचय देते उन्होंने बताया- ‘आप राजू भाई हैं, मेरे पुराने प्रेमी और प्रशंसक।’ यह भी जोड़ा कि ‘ये मेरे एकांत के दिनों के साथी रहे हैं और समाजशास्त्र के विद्वान हैं।’ फिर व्यथित जी का परिचय दिया- ‘आप हिंदी के विद्वान और साहित्य के गंभीर आलोचक हैं।’ तब तक सियाराम जी की आलोचना पुस्तिका ‘कविता का तीसरा संसार’ पहल पत्रिका से प्रकाशित होकर आ चुकी थी। इसमें आलोक धन्वा वीरेन डंगवाल और कुमार विकल की कविताओं की समीक्षा थी। हालांकि अपने साथ गोरख पांडेय को पाकर आलोक धन्वा सियाराम जी से थोड़ा नाराज भी थे। कवियों की जमात में ‘गीतकार’ का शामिल करना शायद आलोक को अच्छा न लगा था।

खैर, तो अब आलोक अपनी पत्नी का परिचय देने वाले थे। उन्होंने अभिनय की मुद्रा बनाते हुए कहा- ‘आप हैं क्रांति भट्ट। बैट (बिहार आर्ट थियेटर) की प्रख्यात अदाकारा। और फिलहाल ये कंप्यूटर से खेल रही हैं।’ हमलोगों को काफी देर की मगजमारी के बाद मुश्किल से मालूम हुआ कि स्थानीय ‘आज’ अखबार के कंप्यूटर विभाग में नौकरी करती हैं।

"क्रांति तो मेरी बेटी के समान है..."

शादी के बाद जब कभी आलोक धन्वा से मिलने जाता तो वे काफई व्यस्त हो जाते। खिड़कियों और कमरों के परदे दुरुस्त करते और कहते जाते- ‘राजू भाई, अब मैं पारिवारिक हो गया हूं न!’ मेरे मन को थोड़ा विनोद सूझता और मन ही मन बोलता- आलोक धन्वा ने ‘पारिवारिक’ होने में इतना समय लिया है, पता नहीं ‘सामाजिक’ बन भी पाएंगे या नहीं। साथ बैठे होने पर पत्नी को अक्सर ‘बच्ची’ संबोधित करते। बातचीत के क्रम में सहज ही कह जाते ‘क्रांति तो मेरी बेटी के समान है, बच्ची है।’ पत्नी को बेटी बनना पसंद न था और आलोक धन्वा थे कि उसे बेटी बना कर पिता का असीमित अधिकार हासिल कर लेना चाहते थे।

‘कुलीनता की हिंसा’…

वे क्रांति की सामान्य दिनचर्या की छोटी-से-छोटी चीज में दखल देते और अपनी बात पास करवाना चाहते। मसलन, उसे कब दही खाना चाहिए और कब नहीं, इस तक का भी वे ‘खयाल’ रखते। क्रांति का नाटकों के लिए घर से बाहर निकलना अब उन्हें अखरता था। एक दिन वे मुझसे कहने लगे- ‘राजू भाई, क्रांति रघुवीर सहाय की कविताओं का मंचन करने जा रही है। आप तो जानते हैं कि रघुवीर सहाय की कविताओं में अद्भुत नाटकीयता है। उसका निर्वाह क्रांति से संभव न हो सकेगा। इसलिए मैंने तो कह रखा है कि रघुवीर सहाय की कविताओं का मंचन करने जाओंगी, तो मेरे सीने से गुजर कर जाना पड़ेगा। मैं हिंदी कविता का अपमान सहन करने के लिए जीवित नहीं रह सकता।’ एकबारगी मेरी आंखों के सामने ‘कुलीनता की हिंसा’ का बिंब जीवित हो उठा। क्रांति तो गईं, लेकिन आलोक जीवित रह गए।

Wednesday, May 20, 2009

यादों में बसे लोग- 3

"जो जात-पांत की बात करे, उस पर थूक दीजिए..."

1991 में मैं एमए (इतिहास) में दाखिला ले चुका था। विजय कुमार ठाकुर के संरक्षण में अशोक जी ने "इतिहास विचार मंच" की स्थापना की, जिसका मुझे संयोजक बनाया गया। इस संस्था का प्रमुख काम अकादमिक महत्त्व के विषयों में लेक्चर आयोजित करना था। इसी सिलसिले में हमलोग एक दिन आलोक धन्वा से मिले और "प्राचीन भारत में जाति व्यवस्था" विषय पर अपनी बात रखने के लिए उनसे आग्रह किया। लगभग आधे घंटे तक वे तफसील से बताते रहे कि किन-किन महत्त्वपूर्ण गोष्ठयों की उन्होंने अध्यक्षता की है। इस बात को भी रेखांकित किया कि कैसे आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा ने उनसे एक बार किसी गोष्ठी की अध्यक्षता करवाई थी, जब वे महज इंटर के छात्र थे। लगभग आधे घंटे की अपनी विरुद् गाथा से निवृत्त होकर उन्होनें बदली भंगिमा में कहना शुरू किया- "राजू भाई, अगर कोई जाति-पांति की बात करता हो तो वैसे लोगों पर थूक दीजिए।" मैंने हल्का प्रतिवाद करने की कोशिश की- "आलोक जी, मैं जाति की राजनीति करने की कोई मंशा नहीं रखता। मेरा उद्देश्य तो समस्या का समाजशास्त्रीय अध्ययन भर है।"

वे कहां मानने वाले थे। जब वे अपनी रौ में होते तो सामने वाले की शायद ही सुनते थे। फिर वे अपने मूल कथन को ही दुहराने लगे। मैं तो लिहाजवश चुप ही रहा, लेकिन अशोक जी ने अपना मुखर मौन तोड़ा। कहने लगे- "आलोक जी, सच्चाई यह है कि जाति-पांति का नाम लेने वाले हर आदमी पर अगर इसी तरह थूकते रहे तो आप डिहाइड्रेशन के शिकार हो जाएंगे और देवयोग से अगर बच भी गए तो अपने ही थूक के अंबार में डूबे जीवन की भीख मांगते नजर आएंगे। वैसे इसकी कम ही संभावना है कि ऐसा करने को आप बचे भी रहें।" इसके बाद हम दोनों मन ही मन कुढ़ते हुए अशोक जी के लालबाग स्थित डेरे में लौट आए।

नौकर के खर्च में तो एक बीवी रखी जा सकती है...

आलोक धन्वा एक लंबे समय से एकाकीपन में जीते आ रहे थे। शादी नहीं की थी। इस लायक शायद किसी को समझा नहीं था। या फिर कोई और कारण भी हो सकता है। कभी-कभी वे शारीरिक दुर्बलताओं का भी जिक्र किया करते। लेकिन इन दिनों शादी को लेकर कुछ गंभीर होने लगे थे। "छतों पर लड़कियां" कविता का ठीक यही समय है। एक दिन वे खाने-पीने की दिक्कतों की बात करने लगे। मैंने सलाह दी, "कोई नौकर क्यों नहीं रख लेते?" वे बोल उठे- "नौकर बहुत महंगा हो गया है। खाता भी बहुत है। उतने खर्च में तो एक बीवी भी रखी जा सकती है।"

मैं भी वही हूं...

वे जानते थे कि मेरी शादी हो चुकी है, इसलिए पूछ बैठे- "राजू भाई, आपकी कोई बड़ी साली है?" मैंने मजाक के लहजे में कहा- "सर, मेरी पत्नी बहनों में सबसे बड़ी है। अफसोस!" वे कहने लगे- "कोई बात नहीं, इधर-उधर ही देखिए।"

आगे उन्होंने अंतिम सत्य की तरह जोड़ते हुए कहा- "आप तो मेरी जाति जानते हैं न राजू भाई? आप भूमिहार हैं न! मैं भी वही हूं।"

Friday, May 8, 2009

यादों में बसे लोग- 2

कुल्हाड़ी फेंक के नहीं, थाम के मारो कॉमरेड...

1984 में मैट्रिक की परीक्षा पास कर मैं पटना के सैदपुर छात्रावास में अपने बड़े भाई से साथ रहने लगा। कथाकार हंसकुमार पांडेय भी साथ रहा करते थे। पांडेय जी कहानियों में ही नहीं, सामान्य बातचीत में भी कथा बुनते नजर आते। वे दोनों जब आपस की बातचीत शुरू कर देते तो पटने की साहित्यिक मंडली के नायकों-खलनायकों की जानकारी सहज ही सुलभ होने लगती। कुछ चरित्र तो ऐसे थे जो बाचचीत के क्रम में बार-बार आते। नंदकिशोर नवल, अरुण कमल, आलोक धन्वा, तरुण कुमार और अपूर्वानंद का नाम मैंने उन्हीं दिनों जान-सुन रखा था। आलोकधन्वा का नाम वे खास अंदाज और संदर्भ में लेते।

पांडेय जी ने एक दिन किसी स्टडी सर्किल की एक कथा सुनाई। आलोक धन्वा अपनी या किसी और की कविता का पाठ कर रहे थे। कविता शायद कुछ इस तरह शुरू होती थी- 'कुल्हाड़ी फेंक के मारो कॉमरेड, कुल्हाड़ी फेंक के मारो।' तभी आलोचकीय बुद्धि से लैस एक वकील उठ खड़ा हुआ और कहने लगा- 'कॉमरेड, आपने भारी भूल कर दी। कुल्हाड़ी फेंक के मारो नहीं, कुल्हाड़ी थाम के मारो कॉमरेड, कुल्हाड़ी थाम के मारो।' आलोचना का सार यह था कि कुल्हाड़ी फेंक कर मारने पर हथियार वर्गशत्रु के हाथ लग सकता है जो क्रांति के साथ गद्दारी है। मेरी छोटी बुद्धि तब इसे समझ न पाई थी, लेकिन आलोक धन्वा मेरे लिए एक अद्भुत जिज्ञासा की चीज बन चुके थे। उनकी कविताओं से पहली बार मेरा सीधा परिचय 'हंस' के माध्यम से हुआ। उनकी कविताएं मुझे दूर तक आकर्षित करतीं। मिलने की चाह तेज होती गई और अंततः भिखना पहाड़ी स्थित उनके निवास पर पहुंच ही गया। पहली बातचीत कैसे शुरू हुई थी, मुझे आज कुछ भी याद नहीं है- सिर्फ इतना कि लगभग घंटा भर वे बोलते रहे थे। बातचीत के क्रम में उन्होंने घर की दीवार पर सटे पोस्टर 'हैंड्स ऑफ क्यूबा' की भी चर्चा की। आलोक की जब भी याद आती है 'हैंड्स ऑफ क्यूबा' भी मूर्त हो उठता है।

'छोटी-सी जमींदारी...'

धीरे-धीरे आलोक धन्वा मेरी जरूरत बनने लगे। महीने-दो महीने पर उनसे अवश्य मिल लेता। उनसे जब भी मिला, बोलता हुआ ही पाया। हालांकि बीच-बीच में कह डालते कि डॉक्टर ने थोड़ा कम बोलने को कहा है, लेकिन इस हिदायत पर अमल मुझ जैसे श्रोता को ही करना पड़ता था। वे एक अतिसंवेदनशील वक्ता थे। श्रोता के मनोभावों का खास खयाल रखते थे। दूसरों की मौजूदगी में प्रायः ही कहते- 'राजू समाजशास्त्र के विद्वान हैं।' मेरे लिए यह शायद सांत्वना पुरस्कार होता। मेरा भी कद कुछ-कुछ बड़ा हो जाता। अचानक विद्यार्थी से विद्वान हो जाता। इससे ज्यादा किसी को भला क्या चाहिए। बातचीत का विषय काफी विस्तृत और आत्मीय होता। देश-दुनिया बात करते-करते वे अपने बारे, स्वास्थ्य के बारे में और यहां तक कि अपने कमरे के बारे में भी घंटों बोल जाते। यह भी कि उस कमरे को अब छोड़ नहीं सकता, चाहे कितना भी महंगा क्यों न हो। उस फ्लैट का ऐतिहासिक महत्त्व जो हो चला था। फणीश्वरनाथ रेणु और भगवत रावत सरीखे लोगों की यादें जुड़ी थीं उससे। निजी जिंदगी से जुड़ी कहानियों का अक्सर एक लोक रचते और बताते कि मिर्जापुर में कभी उनकी भी एक छोटी-सी जमींदारी हुआ करती थी। इन कहानियों में उनके पिताजी सदैव दोनाली बंदूक रखते, लेकिन कभी किसी की हत्या नहीं की। मिर्जापुर की जमींदारी की चर्चा उनके वकील भाई भी करते।

अब मैं स्वरूप विद्या निकेतन में हिंदी शिक्षक के रूप में काम कर रहा था तो एक दिन मिर्जापुर से एक सज्जन पधारे। पूछने पर पता चला कि वे पेशे से वकील हैं और उनकी एक जमींदारी भी है। अनायास ही मैंने पूछ डाला कि कहीं आप मेरे शहर के चर्चित कवि आलोक धन्वा के भाई तो नहीं। लगभग चौंकते हुए उन्होंने पूछा- 'क्यों? मैंने कहा- 'मिर्जापुर में एक छोटी-सी जमींदारी उनकी भी हुआ करती थी।' जब यह बातचीत चल रही थी, मेरे सहकर्मी श्री ओमप्रकाश पांडेय भी वहां मौजूद थे। वह मुझे आश्चर्य और विस्मय से घूरने लगे।

आप हैंडपंप चला लेते हैं...?

आलोक धन्वा एक स्वास्थ्य-सजग जनवादी कवि थे। घर से बाहर भी वे हमेशा अपना ही पानी पीते। मैंने पानी की इनकी बोतल तब देखी थी, जब पटना की स्वास्थ्य-संस्कृति के लिए यह लगभग हास्य-विनोद की चीज थी। अब तो अधिकतर लोग उनके अनुयायी हो चले हैं। जनवाद बढ़ा-फैला-सा लगता है। पीने के पानी के बारे में वे मुझसे भी पूछते। जब मैं कहता कि चापाकल का पानी पीता हूं तो अचलज भरी निगाहों से देखते और समान प्रश्न को दुहराते- 'आप हैंडपंप चला लेते हैं? मैं 'हां' में जवाब देकर मन ही मन मजदूरिनों पर लिखी उनकी कविताओं पर पुनर्विचार की मुद्रा में आ जाता। बातचीत में कभी-कभी वे अधिक समय लगा देते तो बीच में बाथरूम की दरकार हो आती। पूछने पर रेडीमेड जवाब देते- 'इस्तेमाल के लायक नहीं है।' यह सच भी हो सकता था, लेकिन मुझे लगता कि वे सफाईपसंद आदमी हैं, इसलिए परहेज रखते हैं। वैसे वे सफाई का काफी खयाल रखते थे। जब भी किचेन जाते एप्रन जरूर लटका लेते। वे अपने घर में उन्नीसवीं शताब्दी के रूसी उपन्यास के नायकों की तरह रहते।

Friday, April 3, 2009

यादों में बसे लोग- 1

व्यवस्था बहुत कम शब्दों को जानती है...

बीएन कॉलेज में इतिहास ऑनर्स का छात्र था जब पहली बार आकाशवाणी, पटना में सुलभ जी से मिला। रेडियो पर लेख पढ़ना चाहता था- भक्ति आंदोलन का सामंत विरोधी स्वर। सुलभ जी ने उसे उलट-पलट कर देखा और कहा- 'राजू जी, व्यवस्था बहुत कम शब्दों को जानती है।' उनके इस एक वाक्य ने मुझे काफी प्रभावित किया। फिर और बातें होने लगीं। मेरे प्रिय कवि के बारे में भी पूछा। मैं भूला नहीं हूं कि मैंने आलोक धन्वा का नाम लिया था। आगे उन्होंने एक किताब दी- 'धूप की एक विराट नाव।' हरेकृष्ण झा की काव्य पुस्तिका, जो मध्यप्रदेश की 'साम्य' पत्रिका की तरफ से मुद्रित हुई थी। मैंने इसे स्वीकार किया और दो-तीन दिनों में समीक्षा जमा कर दी। कविताएं चूंकि राजनीतिक थीं, इसलिए अमूमन मैंने राजनीतिक विश्लेषण ही किया। यह और बात है कि हरेकृष्ण झा ने उसकी तारीफ की और देर तक बातचीत की। पता चला, झा जी के नक्सलबाड़ी आंदोलन के साथ कभी गहरे रिश्ते थे।

वे सब प्रतिबद्धता की फसल काट रहे थे...

शायद बीए का ही छात्र था, जब आरक्षण को लेकर देशव्यापी हंगामा हुआ था। पूरे देश के छात्र समर्थन और विरोध में बंटे हुए थे। इस मुद्दे को लेकर मैं भी अपने मित्रों के बहस छेड़ दिया करता था। एक दिन जोर-जोर से कॉलेज कैंपस में बोल ही रहा था कि दो अपरिचित सज्जनों ने मुझसे थोड़ा एकांत में चलने का आग्रह किया। भीड़ से अलग हुआ और एक औपचारिक परिचय के बाद फिर नए सिरे से बातचीत में भिड़ गया। सज्जनों में इरफान काफी बौद्धिक छटा बिखेरते थे। उनकी बातचीत का अंदाज काफी गंभीर और बौद्धिकतापूर्ण था, हालांकि उन्होंने सिगरेट भी सुलगाई थी। मुझे भी शरीक किया।
बातचीत के क्रम में पता चला कि वे लोग 'समकालीन जनमत' पत्रिका की तरफ से थे। स्टोरी के लिए मैटर का जुगाड़ बिठाने और क़ॉलेज में आंदोलन की तासीर जानने आए थे। दोनों ने मुझे रामजी राय और प्रदीप झा से मिलने की सलाह दी। मिला भी। इस परिचय के बाद हमलोगों ने नियमित मिलना-जुलना जारी रखा। विष्णु तो अक्सर कम बोलते थे, लेकिन इरफान मुझे अक्सर इस बात के लिए कोंचते थे कि 'मैं पार्टी में नहीं हूं, इसलिए प्रतिबद्ध नहीं हूं।' उनका अत्यंत प्रिय सूत्रवाक्य था कि 'जो पार्टी का कैडर नहीं है, उसकी क्रांतिकारिता पर भरोसा नहीं किया जा सकता।' वैसे सीपीआई (माले) का सिंपेथाइजर अवश्य था, लेकिन पार्टी का बंधन मानने को मन तैयार न था। प्रेमचंद का यह वाक्य कहीं पढ़ रखा था कि 'मेरी पार्टी अभी बनी नहीं है।' उसी तर्ज पर मैं भविष्य की पार्टी का इंतजार कर रहा था।
कहना होगा कि इस मेलजोल के साथ ही मन में दुराव का भाव भी पैदा हो रहा था। लोगों के रहने के तरीके को लेकर कभी-कभी मैं हैरान और चिंतित हो उठता। इरफान सदैव मोटरसाइकिल से ही चलते और हर आधे घंटे पर विल्स सिगरेट फूंकते। मुझे लगता यह पार्टी के पैसे का दुरुपयोग है। एक दिन थोड़ी खीझ होने पर मैंने कह दिया था- 'इरफान, अगर प्रतिबद्धता का यह मतलब है तो इस कीमत पर मैं प्रतिबद्ध नहीं हो सकता।' माले के लड़कों में सिगरेट की बड़ी भारी लत थी। अपने 'गॉडफादर' विनोद मिश्र की नकल हो शायद! रंजीत अभिज्ञान भी तब पटने में बहुत सिगरेट पीता था और हमेशा चंदे के नाम पर लोगों से पैसे लेता था और भागा फिरता। नए लड़कों में नवीन और अभ्युदय बहुत सिगरेट पीते हैं। संगठन का पीते हैं, यह नहीं कह सकता।
समकालीन जनमत का विष्णु, इरफान और चंद्रभूषण वाला ग्रुप 'श्रेष्ठतबोध' की भावना से भरा हुआ था। एक शाम मैं टहलते हुए महेंद्र सिंह के शास्त्रीनगर वाले फ्लैट पर पहुंचा, जहां वे लोग स्थायी तौर पर रहा करते थे, तो पाया कि सभी किसी गंभीर विमर्श में फंसे हैं। मैंने भी कुछ कहने की हिम्मत (जुर्रत!) की तो तीनों मुझे कुछ इस कदर घूरने लगे, मानों आंखों ही आंखों में मुझे बता रहे हों कि यह आपके बूते की चीज नहीं है। वे लोग 'दि सेकेंड सेक्स' पर बातें कर रहे थे। माले का यह हिरावल दस्ता 'सेक्स' को भरपूर जीता था। पार्टी के अंदर 'सेक्स स्कैंडल' और यौन शोषण की कम किंवदंतियां नहीं हैं।
इसी क्रम में फरवरी, 1990 में मेरी शादी होनी तय हुई। जनमत के इस ग्रुप से मैंने शादी में शरीक होने के लिए आग्रह किया। कार्ड दिया ही था कि इरफान ने कहा, 'चलो, एक और जीवन नष्ट हुआ।' खैर, वे लोग वहां पहुंचे। कमलेश शर्मा भी उनलोगों के साथ थे। लड़की वाले की तरफ से निवेदिता थीं। मेरे बड़े भाई के साले अमरेंद्र कुमार भी थे। अमरेंद्र का मैंने जनमत के लोगों से परिचय भी कराया। इरफान ने अमरेंद्र से दार्शनिक अंदाज में पूछा- 'आपको सबसे ज्यादा कौन-सी चीज आतंकित करती है?' अमरेंद्र ने बिल्कुल अपने स्वभाव के अनुकूल जवाब दिया- 'पेड़ से पत्तों का गिरना।' अमरेंद्र कुमार को आज भी मैं इसी बिंब के साथ याद करता हूं यह जवाब इरफान के लायक भी था। सुना है, आजकल वे सब प्रतिबद्धता की फसल काट रहे हैं...।