Monday, November 10, 2014

पलासी की नहीं, बक्सर की लड़ाई से आया अंगरेजी राज

पलासी की लड़ाई एवं बक्सर की लड़ाई-अंगे्रज कंपनी और आधुनिक भारत के इतिहास की ये दो राजनीतिक लड़ाइयां काफी निर्णायक रहीं। पलासी युद्ध की तुलना में बक्सर युद्ध के परिणाम कहीं ज्यादा असरदार थे। सच कहें तो पलासी में अंग्रेजों को अपना रण-कौशल दिखाने का मौका भी नहीं मिला। यह बक्सर की लड़ाई ही थी जिसने अंग्रेजी तरीके से प्रशिक्षित सैनिकों की श्रेष्ठता को साबित होने का पहला अवसर प्रदान किया। बक्सर की लड़ाई में भारतीय सैनिक मानसिक रूप से भी पराजित हुए थे और अंग्रेजों की सैन्य-श्रेष्ठता को हकीकत में देखा था।
पलासी युद्ध के बाद अंग्रेज बंगाल में एक कठपुतली नवाब को बनाने में कामयाब हुए थे लेकिन शीघ्र ही उन्हें मीर कासिम की चुनौती का सामना भी करना पड़ा था। किंतु बक्सर युद्ध ने अवध के नवाब एवं मुगल बादशाह को भी अंग्रेजों की शरण में जाने को विवश कर दिया। 1757 की पलासी की लड़ाई से कंपनी का बंगाल में शासन सुनिश्चित हुआ तो 1764 की बक्सर की लड़ाई से अंग्रेजी शासन अखिल भारतीय स्वरूप ग्रहण कर सका। दिल्ली के कमजोर बादशाह शाह आलम ने सन् 1764 ई. में अंग्रेजों को बक्सर की लड़ाई के बाद बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर दीवानी का अधिकार प्रदान किया। इंगलिश ईस्ट इंडिया कंपनी एवं नजमुद्दौला के बीच 20 फरवरी 1765 को हुए एकरारनामे एवं शाह आलम द्वितीय का अगस्त 1765 के दीवानी अधिकार ने अंग्रेजों को बंगाल सुबे का वास्तविक मालिक बना डाला। बर्क ने लिखा है कि ‘भारतीय राजनीति में अंग्रेजों का यह पहला वैधानिक प्रवेश था’। इस तरह कहा जा सकता है कि अंग्रेजी शासन का इतिहास बिहार से प्रारंभ हुआ।
बक्सर युद्ध के बाद बिहार का शासन मीर जाफर का भाई मिर्जा मुहम्मद काजिम खान राजा रामनारायण के भाई धीरज नारायण की मदद से चला रहा था। किंतु माहौल अव्यवस्थापूर्ण था। अंदर-अंदर शासन की कई धाराएं काम कर रही थीं। पटना में अंग्रेजी फैक्ट्री का प्रधान विलियम बिलियर्स, जो एलीज का उत्तराधिकारी था, स्थिति का गांभीर्य एवं चतुराई के साथ मुकाबला करने में अक्षम साबित हो रहा था जबकि नये राजनीतिक परिवर्तन के बाद उसकी स्थिति पहले की तुलना में काफी बेहतर हो चली थी। एक तरफ शासन की कमजोरियां और दुश्वारियां थीं तो दूसरी तरफ कंपनी के देशी-विदेशी कर्मचारियों का अनियंत्रित लोभ राजनीतिक अस्थिरता को हवा दे रहा था। लार्ड क्लाइब ने तत्कालीन स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा था, ‘बंगाल में लूट, भ्रष्टाचार, भ्रम आदि की जो स्थिति बनी हुई है, ऐसी स्थिति के बारे में मैंने पहले कभी नहीं सुना।’
सितंबर 1765 में, पटने में अपने पड़ाव के दौरान क्लाइब ने बिहार के शासन में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किया। उसने मीर मुहम्मद काजिम को हटाकर महज पेशनयाफ्ता बना दिया एवं उसके स्थान पर धीरज नारायण को बिठा दिया। राजा सिताब राय को दीवान नियुक्त किया गया। 1766 के आरंभ में धीरज नारायण, सिताब राय एवं सैमुअल मिड्लटन की एक समिति गठित कर दी गई। पटना फैक्ट्री के प्रधान बिलियर्स को हटाकर मिड्लटन को नियुक्त किया गया। उसने अपने अधिकारों का व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल करते हुए स्थिति को नियंत्रण में लाने की भरसक कोशिश की।
यह पहला अवसर था जब बिहार में राजस्व एवं अन्य बकाया राशि की वसूली के लिए अंग्रेजी सैन्य बल का प्रयोग होने लगा। बेतिया के जमींदार राजा जुगल किशोर को 24 जुलाई 1765 को गवर्नर ने लिखा, ‘मीर कासिम के जमाने में आप शाही खजाने में जमींदारी से प्राप्त आय से छः-सात लाख रुपये जमा करते थे। मुझे सूचना मिली है कि इन दिनों आप केवल कुछ लकड़ी भेजकर ही काम चला रहे हैं। इसलिए मैं कहता हूं कि अगर आपने अविलंब सारे बकायों की अदायगी नहीं कर दी तो आपसे निपटने के लिए शीघ्र ही अंग्रेजी सेना कूच करेगी।’ राॅबर्ट बार्कर को इस काम को अंजाम देने के लिए 1766 के आरंभ में पटना से बेतिया भेजा गया। कहना न होगा कि राॅबर्ट बार्कर को बेतिया के किले को ध्वस्त करते हुए किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। सुरक्षा के कारणों से जुगल किशोर चुपचाप बेतिया छोड़ बुन्देलखण्ड जा चुके थे। कंपनी सरकार ने जुगल किशोर की अनुपस्थिति में ही बेतिया राज का जिम्मा शिवहर के कृष्ण सिंह व मधुबन के अवधूत सिंह को सौंप दिया। यह प्रबंध संतोषजनक न होने से एवं एडवर्ड गोल्डिंग के सुझाव के बाद 1771 में पुनः जुगल किशोर सिंह को जमींदारी लौटा दी गई। लेकिन अंततः जुगल किशोर पर राजस्व अदायगी में बरती गई अनियमितता का हवाला देते हुए उनकी जमींदारी सीधे कंपनी के अधीन कर ली गई। ‘कोर्ट आॅफ डायरेक्टर्स’ ने ‘कौंसिल’ (कलकत्ता) को 4 मार्च 1767 को लिखा कि ‘बेतिया व्यापार में निवेश के लिए हर संभव आवश्यक साधन मुहैया कराने में मददगार साबित हो सकेगा।’ बार्कर ने भी लिखा कि बेतिया व्यापार के क्षेत्र में कंपनी के लिए असीम संभावनाओं का द्वार खोलनेवाला साबित हो सकता है। इन्हीं प्राप्त सूचनाओं के आधार पर ‘कौंसिल’ ने ड्रोज नामक कंपनी के एक मुलाजिम को बेतिया में उत्पादित प्रत्येक चीज की जानकारी एकत्र करने की सख्त हिदायत दी।
हथवा राज के जमींदार फतेह सिंह ने कंपनी सरकार को मानने से इनकार कर दिया। वह 1767 में राजस्व की वसूली करने आई कंपनी की सेना के साथ उलझ गया। कंपनी ने हथवा राज को एक साल के लिए अपने अधीन कर लिया और समय-सीमा समाप्त होने पर फतेह सिंह के चचेरे भाई बसंत साही को सौंप दिया।
बिहार में व्याप्त राजनीतिक अस्थिरता से उत्पन्न स्थिति को 1769-70 के भीषण अकाल ने और भी भयावह बना दिया। 1770 के जनवरी में अलेक्जेंडर ने लिखा कि ‘चालीस से साठ लोग प्रतिदिन अन्नाभाव में मौत के शिकार हो रहे हैं।’ अप्रैल माह में स्थिति की भयावता और बढ़ चली। उसने लिखा, ‘जिन्हें प्रत्यक्षदर्शी होने का मौका नहीं मिला है, उनके लिए यह विश्वास कर पाना सहज नहीं होगा।’ केवल पटना में एक दिन में 150 से ज्यादा लोग मरे थे। 9 मई 1770 को बंगाल से ‘कोर्ट आॅफ डायरेक्टर्स’ को भेजे गये पत्र में कहा गया कि ‘लोगों की मौत सारे वर्णन/आंकड़े पार कर चुकी है। पूर्णिया के पर्यवेक्षक डूकारेल ने 28 अप्रैल 1770 को सूचित किया कि ‘वहां से प्रतिदिन 30-40 लोग मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं। सच कहिए तो शहर जंगल में तब्दील होकर जंगली जानवरों की शरणस्थली बन चुका है।’ इस आपदा को प्रशासन के नुमाइंदों के लोभ-लालच ने और भयावह बना दिया था। कहना न होगा कि सिताब राय पर भ्रष्टाचार, सरकारी खजाने की लूट एवं अकाल के दौरान बंदइंतजामी के संगीन आरोप लगाये जा चुके थे।
द्वैध शासन से उत्पन्न बुराइयों को दूर करने एवं तत्कालीन व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन के ख्याल से ‘कोर्ट आॅफ डायरेक्टर्स’ ने हेस्टिंग्स को गवर्नर नियुक्त किया। सिताब राय के निधन के बाद उनके सुपुत्र कल्याण सिंह को हेस्टिंग्स के द्वारा सितंबर 1773 में पचास हजार रुपये के सालाना वेतन पर दीवान नियुक्त किया गया। साथ ही, खेयाली राम व साधु राम को कल्याण सिंह के मातहत नाइब दीवान नियुक्त किया गया। लेकिन तब भी बक्सर की लड़ाई से उत्पन्न ‘अस्थिरता’ को दूर नहीं किया जा सका।

Monday, July 30, 2012

हिंदी प्रदेश में न तो फुले, अंबेदकर, पेरियार जैसे दलित चिंतक हुए न राजाराम मोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर एवं दयानंद सरस्वती जैसे समाज सुधारक। इनकी भूमिका निबाही भारतेन्दु, निराला और प्रेमचंद जैसे लेखकों ने। लेकिन इतिहास की विडंबना कहिए कि ये लेखक अपने समय में यथास्थितिवादियों से प्रताड़ित हुए तो आज ‘दलितवादी’ और ‘नारीवादी’ विमर्शकारों से। कुछ विरोधी तो इतने आक्रामक हैं कि किताबें तक जला रहे हैं। फिलहाल इनकी बात छोड़ें, क्योंकि इनका उद्देश्य विरासत और परंपरा का मूल्यांकन नहीं है। उनकी भाषा विमर्श की नहीं, फासीवाद की है।

कुछ दूसरे इसलिए नाराज हैं कि ‘अंबेदकर और गांधी के राजनीतिक विवाद में प्रेमचंद गांधी के साथ थे। वे अंबेदकर के कहीं भी प्रशंसक नहीं हैं। वे दलित समस्या को गांधी की ही दृष्टि से देखते हैं। और जब डा. अंबेदकर और गांधी के बीच पूना-समझौता होता है, तो वे गांधी के साथ खड़े होते हैं, अंबेदकर के साथ नहीं।’ (कंवल भारती, ‘प्रेमचंद और आज की दलित चेतना’, साक्ष्य, मार्च 2007, पृष्ठ 194-202)

दलित लेखिका डा. कुसुम मेघवाल की बात मानें तो, ‘प्रेमचंद अछूत समस्या को आर्थिक शोषण से संबद्ध करके देखते हैं।’ कंवल भारती की यात्रा इससे आगे की है। वे लिखते हैं, ‘प्रेमचंद अछूतों की समस्या को आर्थिक मानकर जाति के सामाजिक यथार्थ की उपेक्षा करते हैं, जो भारतीय समाज की मूल समस्या है।’ प्रेमचंद ने उसी भारतीय समाज के दैनिक जीवन में देखा था कि बात जब अर्थ की आती है तब जाति दबे पांव भागती होती है। सूदखोरी पर विचार करते प्रेमचंद लिखते हैं, ‘हमारी समझ में नहीं आता। हम किस मुंह से दावा कर सकते हैं कि हम पवित्र और अमुक अपवित्र है। किसी ब्राह्मण महाजन के पास उसी का भाई ब्राह्मण आसामी कर्ज मांगने जाता है, ब्राह्मण महाजन एक पाई भी नहीं देता, उस पर उसका विश्वास नहीं है। वह जानता है, इसे रुपये देकर वसूल करना मुश्किल हो जाएगा। उसी ब्राह्मण महाजन के पास एक अछूत आसामी जाता है और बिना किसी लिखा-पढ़ी के रुपये ले आता है। ब्राह्मण को उस पर विश्वास है। वह जानता है, वह बेईमानी नहीं करेगा।’ कंवल भारती, प्रेमचंद की इस दृष्टि को भी ‘गांधी की दृष्टि’ कहेंगे!

कंवल भारती हमें गांधी और अंबेदकर का भेद बताते हैं। ‘डा. अंबेदकर वर्णव्यवस्था के समूल नाश पर जोर देते थे, जबकि गांधीजी केवल छुआछूत-निवारण के पक्ष में थे।’ यह सही है कि अम्बेदकर ने जिस चीज को समझने के लिए अधिक श्रम और समय दिया है, वह है भारत की जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था। इस क्रम में उन्होंने कुछ अत्यंत ‘मौलिक’ बातें भी ढूंढ़ निकालीं। उनका मानना है कि ‘जाति का आधारभूत सिद्धांत वर्ण के आधारभूत सिद्धांत से मूल रूप में भिन्न है, बल्कि मूल रूप से परस्पर विरोधी है। पहला सिद्धांत गुण पर आधारित है। यह सारी गड़बड़ी जाति व्यवस्था की है वर्ण व्यवस्था की नहीं।’ शायद इसीलिए अम्बेदकर ‘आदर्श वर्ण व्यवस्था’ को स्थापित करने की बात करते हैं। ‘उसके उद्येश्य से वर्ण व्यवस्था की स्थापना के लिए पहले जाति व्यवस्था को समाप्त करना होगा।’ (अम्बेदकर वाङ्मय, खंड 1, पृष्ठ 81)। यहां इस बात का भी उल्लेख करते चलें कि ‘वर्णव्यवस्था का समूल विनाश’ करनेवाले अंबेदकर अपनी पुस्तक ‘शूद्र कौन थे’ में शूद्र को क्षत्रिय साबित करते नहीं थकते। प्रेमचंद अगर इस अंबेदकर के साथ खड़े नहीं हैं तो चौंकानेवाली बात नहीं है।

और इन सब के पीछे आधारभूत तर्क यह है कि प्रेमचंद का लेखन स्वानुभूति का नहीं, अपितु सहानुभूति का है, अतः उनका लेखन दलितों के बारे में ‘प्रामाणिक’ लेखन नहीं हो सकता। और प्रेमचंद की कहानियों, उपन्यासों से ढूंढ़-ढूंढ़कर उदाहरण के बतौर पेश किये जा रहे हैं। हालांकि स्वानुभूति का तर्क भी एक मिथ ही गढ़ता है। भोगा हुआ यथार्थ के नाम पर हम कई बार यथार्थ ही बदल डालते हैं, विकृत कर पेश करते हैं। संभव है कि इसकी कोई राजनीति हो। यह भी संभव है कि कोई राजनीति न हो। बिल्कुल हाल के एक सर्वेक्षण से यह बात उभरकर आई है कि ‘पत्नियां अपने पति द्वारा पीटे जाने को तनिक बुरा नहीं मानती हैं।’ क्या नारीवादी विमर्शकार इस यथार्थ को स्वीकारेंगे ? अगर यह उन पत्नियों का ‘स्वानुभूति’ या ‘भोगा हुआ यथार्थ’ है तो भी मेरी सदिच्छा है कि वह ‘प्रामाणिक’ न हो!

रत्नकुमार सांभरिया कहते हैं कि ‘इसकी (स्वानुभूति की) लैंगिक सीमाएं भी होती हैं। एक ही जाति के स्त्री-पुरुष की स्वानुभूतियां समान नहीं होती हैं। दलित स्त्री के प्रसव के समय की लेबर रूम की स्वानुभूति दलित पुरुष की स्वानुभूति कतई नहीं हो सकती। उस महिला की वह स्वानुभूति किसी भी धर्म, जाति या वर्ग की उस महिला की स्वानुभूति के अनुरूप होगी, जो लेबर रूम से गुजरती है।’ (‘मैं दलित साहित्य का विरोधी हूं’, हंस, अगस्त 2004)    

किंतु राजेंद्र यादव कहेंगे, ...‘एक दलित जब बोलता है, तब उसका पूरा समाज बोल रहा होता है। ...उसकी पीड़ा, उसके जीवन की व्यथा-कथा उसके पूरे समाज की पीड़ा और व्यथा-कथा हुआ करती है।’ स्वामी अछूतानंद ने 1920 के आसपास लिखा था, ‘तुम अपनी खातिर स्वतंत्रता को, समझ रहे हो अवश्य लाजिम; मगर करोड़ो ही आदि हिंदू गुलामी में क्योंकर जड़े रहेंगे।’ 1914 के आसपास हीरा डोम की ‘सरस्वती’ में एक कविता छपी थी। हीरा डोम की स्वानुभूति है-‘हाय राम! धरम न छोड़त बनत बाजे,/बेधरम हो के कैसे मुंहवा देखइबि।’ और एक स्वानुभूति अंबेदकर की है जो ‘धर्मांतरण की धमकी’ दे रही है! प्रेमचंद से विमर्शकार नाराज हो सकते हैं क्योंकि संभव है, वे हीरा डोम और अंबेदकर की 'स्वानुभूति' के बीच फर्क में ‘वर्गीय भूमिका’ की तलाश करें।

Monday, May 21, 2012

मनोविज्ञान  एवं मानसिक स्वास्थ्य  की पत्रिका 'मनोवेद' के लिए कुमार मुकुल ने मेरे सामने कुछ सवाल रखे थे. उन्हीं सवालों पर आधारित यह लिखित बातचीत है---
क्या आप ईश्वर को मानते हैं ? धर्म को लेकर आपका नजरिया क्या है?

जब से मैंने होश संभाला है, धर्म और ईश्वर के प्रति घृणा और हिकारत का ही भाव रहा है। अपने मामले में अनास्था शब्द को अनुपयुक्त मानता हूं मैं। हालांकि तब इसके लिए मेरे पास कोई तर्क नहीं था। इसकी कोई जरूरत भी नहीं थी शायद। मेरी पैदाइशी गड़बड़ी रही हो या फिर कुछ ऐसा जो मेरे लिए आजतक अज्ञात और अपरिभाषित है। सात-आठ साल का होऊंगा जब अपने गांव के मन्दिर के प्रांगण में स्थापित महादेव को बड़े भाई (अमरेन्द्र कुमार) व उनके एक ग्रामीण दोस्त (बिपिन कुमार) के साथ मिलकर पहले तो जमकर पिटाई की, फिर पानी से भरे आहर में फेंक दिया। उन्हीं दिनों की एक दूसरी घटना भी है जिसे मैं यहां याद करना चाहता हूं। विजय ठाकुर नामक विज्ञान के एक शिक्षक थे जिनके पास मैं अपने छोटे चचेरे भाई (कृष्णकांत) के साथ पढ़ने जाता। वहां से लौटते समय मेरे मित्र पूजा करने के ख्याल से कुछ फूल भी साथ ले लेते। फूल तो मैं भी लाता लेकिन घर पहुंचने से पहले एक खूंटे पर उसे रखता और पेशाब कर डालता। यह क्रम जारी रहा जबतक भाई की शिकायत पर मास्टर साहब ने मेरी खासी मरम्मत नहीं कर दी। आज धर्म और ईश्वर मेरे लिए जनता के शोषण का प्रभावी जरिया हैं। न कम न ज्यादा। इनका अस्तित्व हममें वैज्ञानिक चेतना का अभाव होना सिद्ध करता है।  विज्ञान की पढ़ाई करना और वैज्ञानिक चेतना से लैस होना-दो अलग-अलग चीज है।

किस व्यक्ति, घटना, पुस्तक, विचार, परिस्थिति आदि ने आपके युवा मानस को निर्मित करने में अपनी क्या भूमिका अदा की, इस बाबत बतलाएं। अपने मानस की निर्माण-प्रक्रिया के बारे में बतलाएं।
मनुष्यता मैंने मां से सीखी। मेरे घर कोई भी आता-साघु, भिखारी आदि तो मां कुछ-न-कुछ उन्हें अवश्य देती। साधुओं को देख कभी-कभार हम भाई लोग बिदक जाते तो मां समझाती कि भांट-फकीर के मुह लगना अच्छी बात नहीं है। धर्म और ईश्वर में मेरी मां की भरपूर आस्था थी लेकिन धार्मिक कट्टरता या मूर्खता तनिक नहीं थी। ऐसा प्रायः होता कि हमलोग घर में अंडा, मुर्गी आदि लाते तो चुपके से मां उसी चूल्हे पर बना लेने को कहती जिसपर बाकी लोगों का निरामिष खाना बन चुका होता। उनका सामान्य-सा तर्क होता कि आग तो खुद एक पवित्र चीज है। आग में तपकर अशुद्ध चीज भी शुद्ध हो जाती है। अलबत्ता मुर्गा-अंडा बन जाने के बाद चूल्हे को मिट्टी से अवश्य लीपती। सादगी, त्याग और ईमानदारी जैसे ‘दुर्लभ’ और ‘खतरनाक’ गुण मां और चाचा (दिवंगत शिवनारायण शर्मा) से संयुक्त रूप से सीखने को मिले। कभी-कभी मां की भूमिका अगर कमतर लगी तो इसके कारण हैं। यह भी हो सकता है कि मां की दुनिया सीमित थी इसलिए चचाजान थोड़े फायदे में जा रहे हैं। चाचा, जिन्होंने हम सब को पढ़ाया, मेरे आदर्श बने। सरकारी नौकरी में होने के बावजूद परिवार की वजह से वे हमेशा अभाव में रहे। खादी की एक धोती, एक कुरता और एक चप्पल (जाड़े में जूता)। इससे ज्यादा मैंने नहीं देखा। लेकिन बड़े-बड़ों के सामने सीधा तनकर खड़े होने का माद्दा था। यह दृढ़ता शायद उन्हीं से मैंने हासिल की है।

व्यक्तित्व-निर्माण में शिक्षकों की भूमिका को भी निर्णयकारी मानता हूं। आरंभिक स्कूली जीवन के ग्रामीण शिक्षक जगदीश शर्मा मेरे लिए आदर्श रहे। उर्दू मिश्रित उनकी हिंदी मुझमें भाषा के प्रति झुकाव पैदा कर गई। हाईस्कूल के हिन्दी शिक्षक श्री रामविनय शर्मा, जो आज भी मेरे लिए आदर्श हैं, की भी बराबर की भूमिका रही। सन् 84 से बड़े भाई अखिलेश कुमार के साथ सैदपुर पी. जी. हॉस्टल (3, कमरा 11 एस) में रहने लगा। इतिहास की आलेचनात्मक दृष्टि उन्हीं से हासिल की। आज भी जब एकांत में होता हूं वे मुझे बड़े भाई से अधिक वैचारिक गुरु के रूप में ही याद आते हैं। और इन सबके साथ निराला मुझे बार-बार अपनी ओर आकर्षित करते रहे हैं। अंदर कहीं कुछ भरने में निराला के व्यक्तित्व का भी असर कबूल करता हूं।

बचपन के मेरे विद्रोही तेवर को हवा मिली पुस्तकों से। यों बचपन तो किताबों के बगैर ही गुजरा लेकिन आठवीं कक्षा तक आते-आते मैं मार्क्सवादी दर्शन से प्रभावित हो चुका था, परिचित कितना था नहीं जानता। उन दिनों कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र, साम्राज्यवाद: पूंजीवाद की चरम अवस्था, कम्युनिस्ट समाज में नैतिकता आदि कुछ किताबें मैंने मनोयोग से पढ़ीं। इसने मेरे व्यक्तित्व को एक आकार प्रदान करना प्रारंभ किया। इनके अलावे जिन किताबों ने मेरी मदद कीं उनमें गोर्की की मां, मेरा बचपन और जीवन की राहों पर  उल्लेखनीय हैं। हावर्ड फास्ट का हिन्दी में अनूदित आदि विद्रोही, अज्ञेय की शेखर: एक जीवनी (प्रथम खण्ड)। रजनी पाम दत्त की किताब इंडिया टुडे (संक्षिप्त संस्करण जिसे पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने ‘भारत: वर्तमान और भावी’ शीर्षक से प्रकाशित किया है) मैंने कई दफा पढी। कहिए कि यह किताब इंटर के दिनों में मेरे लिए ‘मनोहर पोथी’ थी। इस किताब का मुझ पर काफी असर हुआ। आज भी अपने को कभी-कभी उसकी पकड़ के अंदर महसूस करता हूं। और इन सबसे आगे तक साथ गये डा. रामविलास शर्माशेखर: एक जीवनी  की बात कि ‘विद्रोही बनते नहीं, पैदा होते हैं’, पढ़ता तो लगता जैसे यह मेरे लिए ही लिखी गई हो। शेखर का स्कूल से भागना और घर आये पिता के कई दोस्तों को ‘नामहीन जंतु’ से संबोधित करना मुझे काफी आह्लादित करता। कहूं कि एकाधिक बार घर से भागने की कोशिश मैं भी कर चुका हूं लेकिन अपने इस निर्णय पर उस दिन की शाम तक ही टिका रह सका। कक्षा नौ में अपने एक ग्रामीण सहपाठी (सतीश कुमार) को किताबें दे दी कि मेरे घर पहुंचा देना और मां को कहना कि वह गरीबों की सेवा करने गया है।

प्रेम... यह शब्द किस तरह से आपके जीवन में आया या नहीं आया... इसे आपने किस तरह से लिया... इसने आपके मानस को कितना और कैसे प्रभावित किया... यह बदलाव सकारात्मक था या नकारात्मक ... प्रेम के वरक्स सेक्स ने आपके युवा मन को किस तरह प्रभावित किया... क्या दोनो पूरक रहे या और कुछ....
प्रेम शायद हर के जीवन में आता है। मेरे जीवन में भी आया। प्रेम में होना अलौकिक (इसके वजन का शब्द न होने की वजह से इसका इस्तेमाल किया है) सुख का साथ होना है। केवल तभी मनुष्य अपनी पूरी मानवीयता के साथ होता है। इस प्रेम ने मेरे जैसे नीरस गद्यकार को भी कवि बना दिया। जब मैंने प्रेम करना शुरू किया था, पहली कविता लिखी थी- सपने से जागकर। तब नींद कम आती थी और सपने अधिक। जब तक जागता होता, बेचैन होता। कविता आने के साथ ही मेरे अंदर एक विचार ने जन्म लिया, कि कविताएं गहन प्रेम और सपनों के बीच ही संभव हो सकती हैं।

मैं प्रेम और सेक्स को अलग-अलग नहीं देख पाता। मुझे तो हमेशा ही लगा कि सेक्स, प्रेम का मुखौटा लगाकर आता है। मुखौटा के हटते ही वह अश्लील लगने लगता है। सभ्य समाज या साहित्य को वह अश्लीलता पसंद नहीं। सबकी एक मर्यादा है। मर्यादा का यह आवरण इतना झीना और पारदर्शी है कि एक की ‘हद’ से दूसरे की ‘बेहद’ को जाना जा सकता है।

इसे संयोग कहें या परिस्थिति कि मेरे जीवन में सबसे पहले मार्क्स आये। स्वदेशी होने के बावजूद गांधी और नेहरु से परिचय बाद में हुआ। परिचय भी ऐसा कि कट्टर आलोचक रहा दोनों का। मेरा पूरा स्कूली जीवन गांधी और नेहरु को गालियां बकने में बीता। इसे मैं मार्क्सवादी होने का फर्ज समझता रहा। कोई अगर गांधी-नेहरु का प्रशंसक मिल जाता तो लानत भेजता उनपर। लेकिन जैसे-जैसे मेरा अध्ययन विस्तृत होता गया, आलोचना की उग्रता कमती रही। नेहरु को पढ़ने के बाद उनका प्रशंसक होने से मैं अपने को नहीं रोक पाया। नेहरु को पहली बार और सीधे तौर पर ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ से जाना। फिर मैंने ‘हिंदुस्तान की कहानी’ पढ़ी। अपनी इतिहास-दृष्टि विकसित करने व नेहरु की इतिहास-दृष्टि को समझने के लिए यह पुस्तक अवश्य पढ़ी जानी चाहिए। इस किताब को मैंने कई दफा पढ़ा बल्कि कहिए कि बार-बार पढ़ा। मेरी कोशिश होती है कि चार-छह माह के भीतर एक बार अवश्य ही पढ़ लूं। मेरा मानना है कि इस छोटी काया वाली पुस्तक को बी.ए. स्तर तक के विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य कर दिया जाये, अगर कुछ भी हम अनिवार्यतया पढ़ाते हों।

पता नहीं मैं इसे नेहरु-प्रेम कहूं या और कुछ कि कई दफा दूसरों के बारे में पढ़ते हुए नेहरु का कद बड़ा होने लगता है। मार्क्सवादी मोहित सेन की आत्मकथा पढ़ते हुए भी ऐसा ही महसूस किया अपने अंदर। ऐसा क्यों के जवाब में कोई उत्तर नहीं आता। गांधी मुझे एक लेखक के रूप में प्रभावित नहीं करते। कभी-कभी तो वे बेहद अतार्किक और बच्चों की-सी बातें करते लगते हैं। कुछ साल पहले जब मेरा बेटा दसवीं में था तो हिंद स्वराज  के बारे में पूछा था। मैंने यही कहा था कि उनकी बहुत सारी बातें बकवास हैं। विचारों की उनके यहां कोई सीधी लाइन नहीं है। वे एक अत्यंत ही व्यावहारिक राजनीतिज्ञ हैं, दार्शनिक अथवा विचारक नहीं। इसलिए उनकी बातों में मुझे कोई तार्किक संगति नहीं दिखती। अपनी पिछली कही बातों का खंडन वे जितनी आसानी से कर जाते हैं कि कभी-कभी कोफ्त होती है। अलबत्ता निजी जीवन में जो उनके आचरण के नियम हैं वे मुझे बेमिसाल लगे हैं। मैं अपने लिए दृष्टि मार्क्स से लेता हूं और जीने का तरीका गांधी से। इन दोनों के मिश्रण में ही शायद भारत का भविष्य बसता है।

पटेल और सुभाष से सीधे कोई प्रभाव मैं नहीं स्वीकारता। अवचेतन में किसी तरह का हो तो उसकी बात अलग है। यही बात भगत सिंह और विवेकानंद के लिए भी कह सकता हूं। हां, स्त्री जाति को समझना मैंने सीमोन द वोउआर से ही सीखा।

मनोविज्ञान का मतलब आपके लिये क्या  है... आप फ्रायड को जानते हैं ए उनके बाद के किसी मनोवैज्ञानिक को आप जानते हैं
मेरे लिए मनोविज्ञान का मतलब है मनुष्य को जानने-समझने का विज्ञान। यह मनुष्य के व्यवहार का विज्ञान है। और मनुष्य का व्यवहार उसके परिवेश पर निर्भर होता है। हमें बहुत सारी चीजें अदृश्य रूप में विरासत में प्राप्त होती हैं। बहुलांश हम अपने सामाजिक जीवन में सृजित करते हैं। इसलिए मेरे लिए एक सच्चा मनोवैज्ञानिक केवल और केवल वही हो सकता है जो समाजशास्त्री भी है। मनोवैज्ञानिकों में फ्रायड को ही थोड़ा-बहुत पढ़ा है।

आपकी प्रिय फिल्में  कौन सी हैं और क्यों
फिल्मों में मेरी कोई खास दिलचस्पी नहीं रही है। हॉल जाकर मैंने अबतक चार ही फिल्म देखी है-‘अर्धसत्य’ अपने बड़े भाई (अखिलेश कुमार) के साथ, ‘प्रतिघात’ साले (मृणाल केसरी) के साथ, ‘खलनायक’ मित्र अशोक कुमार के साथ। एक का अभी स्मरण नहीं। सबसे अच्छी फिल्म मैंने दूरदर्शन पर देखी-‘एक दिन अचानक’। इस फिल्म में संवाद कम ही हैं, परिस्थितियों के चित्रण मात्र से जान आ जाती है। कहिए कि संवाद के बीच कहने के बाद जो कुछ अनकहा रह जाता है और उस अनकहे को व्यक्त करने हेतु जो परिस्थिति निर्मित की जाती है-उसी का मैं कायल हूं। अद्भुत कलात्मक। मैं उस फिल्म को बार-बार देखना चाहता हूं।

आप राजनीति को लेकर किस तरह सोचते हैं
किसी (फिलहाल नाम भूल रहा हूं) ने कहा है कि आधुनिक काल के पहले धर्म राजनीति था जबकि आधुनिक काल का धर्म राजनीति है। मनुष्य न केवल एक सामाजिक प्राणी है बल्कि वह एक राजनीतिक प्राणी भी है। मेरी राजनीति मेरा लेखन है। 

Monday, January 23, 2012

बिहार का सृजन : मिथ क्या सत्य क्या

आधुनिक भारत की ही भांति बिहार के इतिहास पर भी अगर गौर करें तो कहना पड़ेगा कि आधुनिकता और राष्ट्रवाद की प्रगति के साथ-साथ समाज में व्याप्त नकारात्मक शक्तियों में भी वृद्धि होती रही। भारत में राष्ट्रवाद, सम्प्रदायवाद तथा जातिवाद का जन्म साथ-साथ हुआ। तात्पर्य यह कि हमारा राष्ट्रवाद अपनी प्रकृति में नकारात्मक था। साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में जैसे ही प्रगति हुई वैसे ही उनकी प्रतिगामी शक्तियों में भी इजाफा हुआ। सन् १८८५ में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ने सांप्रदायिक विद्वेष एवं जातीय संगठनों के उदय का मार्ग प्रशस्त किया। कहना होगा कि इन अंतर्विरोधों के पीछे एक तो राष्ट्रवादियों द्वारा इस्तेमाल किये गये प्रतीकों तथा सांस्कृतिक चेतना की भूमिका हो सकती है, तो दूसरी ओर साम्राज्यवाद ने राष्ट्रवादी चेतना को शिकस्त देने के लिए उन प्रतीकों तथा चेतना का दुरूपयोग किया। साम्प्रदायिक विचारधारा की प्रगति ने हिन्दुस्तान के दो टुकड़े किये वहीं ‘क्षेत्रीयतावाद’ तथा ‘भाषावाद’ ने बंगाल से बिहार को तथा पुनः बिहार से उड़ीसा को पृथक किया।

उन्नीसवीं शती बिहार में ‘नवजागरण’ की शती है। इस शती के अंतिम दशकों में बिहार के पत्रकारिता-जगत में कई मासिक एवं साप्ताहिक पत्र-पत्रिकाओं का उदय हुआ। किंतु यह कहना मुश्किल है कि नवजागरण पहले शुरू हुआ या पत्रकारिता पहले शुरू हुई। बिहार का नवजागरण एक जटिल परिघटना है। इसने इतिहास के भिन्न कालखंड में भिन्न रूपों में अपने को अभिव्यक्त किया है। यह एक स्थापित ऐतिहासिक तथ्य है कि भारतीय राष्ट्रवाद जहां अंग्रेजी साम्राज्यवाद की प्रतिक्रिया में पैदा हुआ था वहीं बिहार में नवजागरण ब्रिटिश-बंगाली आधिपत्य/वर्चस्व के विरोधस्वरूप पैदा हुआ। दूसरी तरफ, विभिन्न जातियों के आपसी झगडों एवं संगठनों के रूप में भी इसने अपने को अभिव्यक्त करने की कोशिश की।

ध्यान देने की बात है कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के आरंभिक बिहारी नेता यथा महेश नारायण, सच्चिदानन्द सिन्हा एवं अन्य सभी अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति ‘सचेत’ उदासीन भाव रखते हुए बंगाल से बिहार को अलग करने के आंदोलन से गहरे जुड़े थे। बिहार के नवजागरण का एक अत्यंत रोचक तथ्य है कि सन् १९१२ से पहले प्रतिक्रियावादी जमींदार वर्ग कांग्रेस अर्थात् राष्ट्रीय आंदोलन के साथ है और बंगाल से बिहार के पृथक्करण के विरोध में है जबकि प्रगतिशील मध्यवर्ग पृथक्करण के तो पक्ष में है लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति उदासीन है। बल्कि कई बार यह प्रगतिशील तबका अपनी ‘राजभक्ति’ भी प्रदर्शित करता है।

हसन इमाम ने कहा कि महेश नारायण ‘बिहारी जनमत के जनक’ हैं तो सिन्हा ने उन्हें ‘बिहारी नवजागरण का जनक’ कहा। कहना न होगा कि यह नवजागरण बिहार के पृथक्करण की शक्ल में था। महेश नारायण के बड़े भाई गोविंद नारायण कलकत्ता विश्वविद्यालय में एम. ए. की डिग्री पानेवाले पहले बिहारी थे। उनके ही नेतृत्व में बिहार में सर्वप्रथम राष्ट्रभाषा का आंदोलन आरंभ किया गया था और यह उन्हीं की प्रेरणा का फल था कि हिंदी का प्रवेश उस समय स्कूलों और कचहरियों में हो सका। गोविंद नारायण को नौकरी पाने के लिए विकट संघर्ष करना पड़ा था। महेश नारायण अपने भाई के कड़वे अनुभवों से बहुत प्रभावित थे। वे भूल नहीं पाये कि भाई को बिहारी होने की वजह से कितना भेदभाव झेलना पड़ा था।

बंगाल से बिहार के पृथक्करण में महेश नारायण, डा. सच्चिादानंद सिन्हा, नंदकिशोर लाल, परमेश्वर लाल, राम बहादुर कृष्ण सहाय, भगवती सहाय तथा आरा के हरवंश सहाय समेत लगभग तमाम लोग, जिनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण कही जा सकती है, जाति से कायस्थ थे और अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों में उनकी जाति अग्रणी थी। सुमित सरकार ने बंगालियों के प्रभुत्त्व को चुनौती देते बिहार की कायस्थ जाति के लोगों के द्वारा पृथक बिहार हेतु आंदोलन का नेतृत्त्व करने की बात पर प्रकाश डाला है। यह अकारण नहीं था कि १९०७ में महेश नारायण के निधन के बाद डा. सच्चिदानंद सिन्हा ने बंगालियों के प्रभुत्त्व को तोड़नेवाले नेतृत्त्व की अगुआई की और अंततः इस जाति ने बंगाली प्रभुत्त्व को समाप्त कर अपनी प्रभुता कायम कर ली। इस वर्ग की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा ने एक बार पुनः बिहार से उड़ीसा को अलग करने का ‘साहसिक’ कार्य किया। डा. अखिलेश कुमार ने अन्यत्र डा. सच्चिदानंद सिन्हा की उस भूमिका को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि वे उड़ीसा के पृथक्करण के भी प्रमुख हिमायती थे।

आधुनिक शिक्षा प्राप्त बिहारी युवकों में अशराफ मुसलमानों के बाद कायस्थ सबसे आगे थे। इस जाति के युवकों को बेरोजगारी का दंश सबसे ज्यादा झेलना पड़ता था। सरकारी दफ्तरों और शिक्षण संस्थानों में नौकरियां पाने में और स्कूलों-कॉलेजों में दाखिला लेने में उन्हें बंगाली युवकों से कड़ी प्रतियोगिता करनी पड़ती थी। बंगाली युवकों को कई निश्चित सुविधाजनक स्थितियां हासिल थीं। कानून और चिकित्सा के पेशों में बंगाली इस तरह जड़ जमाए हुए थे कि उनमें घुसना किसी बिहारी युवक के लिए अत्यंत कठिन था। शिक्षित बिहारी युवकों ने महसूस किया था कि अपना अलग प्रांत नहीं होगा तो उनका कोई भविष्य नहीं है। इन युवकों में अधिकतर कायस्थ थे। अतएव वे अलग बिहार प्रांत बनाने के आंदोलन में स्वाभाविक रूप से कायस्थ जाति के लोग ही आगे आए।

जाहिर है, रोजगार एवं अवसर की तलाश की इस मध्यवर्गीय लड़ाई को सच्चिदानंद सिन्हा ने एक व्यापक आधार प्रदान करने हेतु ‘बिहारी पहचान’ एवं ‘बिहारी नवजागरण’ की बात ‘गढ़ी’। उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा है, ‘सिर्फ खुद बिहारियों को छोड़कर बाकी लोगों में बिहार का नाम भी लगभग अनजान था।’ आगे उन्होंने लिखा, ‘पिछली सदी के ९० के दशक के प्रारंभ में मैं जब एक छात्र के रूप में लंदन में था, तब मुझे जबरन इस ओर ध्यान दिलाया गया। तभी मैंने यह दर्दनाक और शर्मनाक खोज की कि आम बर्तानवी के लिए तो बिहार एक अनजान जगह है ही, और यहां तक कि अवकाशप्राप्त आंग्ल-भारतीयों के बहुमत के लिए भी बिहार अनजाना ही है। ...मेरे लिए आज के बिहारियों को यह बताना बड़ा कठिन है कि उस वक्त मुझे और कुछ दूसरे उतने ही संवेदनशील बिहारी मित्रों को कितनी शर्मिंदगी और हीनता महसूस हुई जब हमें महसूस हुआ कि हम ऐसे लोग हैं जिनकी अपनी कोई अलग पहचान नहीं है, कोई प्रांत नहीं है जिसको वे अपना होने का दावा करें, दरअसल उनकी कोई स्थानीय वासभूमि नहीं है जिसका कोई नाम हो। यह पीड़ादायक भावना उस वक्त और टीस बन गई जब सन् १८९३ में स्वदेश लौटने पर बिहार में प्रवेश करते-करते पहले ही रेलवे स्टेशन पर एक लंबे-तगड़े बिहारी सिपाही के बैज पर ‘बंगाल पुलिस’ अंकित देखा। घर लौटने की खुशियां गायब हो गईं और मन खट्टा हो गया। ...पर सहसा ख्याल आया कि बिहार को एक अलग और सम्मानजनक इकाई का दर्जा दिलाने के लिए, जिसकी देश के अन्य महत्वपूर्ण प्रांतों की तरह अपनी एक अलग पहचान हो, मैं सब कुछ करने का संकल्प लूं जो करना मेरे बूते में है। एक शब्द में कहूं तो यही मेरे जीवन का मिशन बन गया और इसको हासिल करना मेरे सार्वजनिक क्रियाकलापों की प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत।’

प्रारंभिक दौर में शिक्षा के क्षेत्र में अशराफ मुसलमान, कायस्थों की तुलना में बढ़-चढ़कर थे। इस संदर्भ में १८ जून १८८८ के अंक में ‘अनीश’ नामक अखबार में प्रकाशित एक घटना का उल्लेख प्रासंगिक है। पत्र के अनुसार पटना के आयुक्त के दफ्तर में मुसलमान तथा बंगालियों ने एक संयुक्त मोर्चा कायम कर रखा था। उनका कहना था कि इस दफ्तर में सिर्फ एक बंगाली और एक मुसलमान किरानी है तथा अन्य लाला हैं, जो दूसरी जाति के लोगों की बहाली ही नहीं होने देते। बिहार के सरकारी/गैर सरकारी पदों पर बंगालियों की नियुक्ति की प्राथमिकता से मुसलमानों के पढ़े-लिखे तबके को काफी मुश्किलें आयी थीं। शायद इसीलिए इस आंदोलन में उनकी पहल कायस्थों से पहले हुई। हालांकि यह पहल बिहारी अखबारों को संरक्षण प्रदान करने की बात से हुई। १८ मई, १८७४ को ‘नादिर उल अखबार’ नामक उर्दू अखबार ने सरकार की उस नीति का, जो बिहारी अखबारों के विरुद्ध विभेद करती थी, विरोध किया। अखबार ने लिखा कि जहां दूसरे प्रांतों के अखबारों की कुछ प्रतियां उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए सरकार खरीदती है, वहीं बिहार से प्रकाशित होनेवाले अखबारों की उपेक्षा होती है। उसने मांग की कि बिहार से प्रकाशित अखबारों की प्रतियां भी खरीदें, जिससे इनके प्रकाशन को भी प्रोत्साहन मिल सके।

७ फरवरी १८७६ को पुनः एक दूसरे उर्दू अखबार ‘मुर्ग-ए-सुलेमान’  ने ‘बिहार बिहारियों के लिए’ का नारा दिया और यह मांग रखी गई कि बिहार में बंगालियों की बजाय बिहारियों की बहाली हो, खासकर शिक्षा विभाग में, क्योंकि विद्यार्थियों को यूरोपीयन समेत गैर-बंगालियों की अपेक्षा बंगालियों की अंग्रेजी समझने में ज्यादा दिक्कतें होती हैं। उसने यह भी कहा कि सरकार को बिहारियों के विरुद्ध किसी दूसरे के प्रति अनुग्रह का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। उसका स्पष्ट रूप से कहना था कि अगर किसी पद के लिए बिहारी योग्य हों तो वह पद उन्हें ही मिलना चाहिए। कदाचित् कोई योग्य बिहारी नहीं मिल सके तो किसी दूसरे भारतीय की नियुक्ति होनी चाहिए। यह बात रेखांकित करने योग्य है कि इस पत्र का यह नारा कि ‘बिहार बिहारियों के लिए है’ आगे चलकर पृथक बिहार प्रांत आंदोलन की रीढ़ साबित हुआ।

यह आंदोलन विशुद्ध रूप से आधुनिक शिक्षा प्राप्त मध्यम वर्ग का था जिन्हें नौकरियों में बंगालियों के साथ कड़ी प्रतियोगिता करनी पड़ती थी। इस बँटवारे से कृषि अर्थव्यवस्था से जुड़े किसानों, मजदूरों और यहाँ तक कि जमींदारों का भी कोई खास सरोकार न था क्योंकि पृथक होने से जमींदारों, भूधृतिधारको एंव धनी किसानों की आर्थिक समृद्धि में जायदाद के बँटवारे और बिखराव के कारण उनकी हैसियत में स्वाभाविक तौर पर ह्रास पैदा होता है, अतः वे मूलतः किसी प्रकार के बँटवारे के पक्षधर नहीं हो सकते। इन तथ्यों की पुष्टि इस बात से भी होती है कि कालांतर में जब उड़िया लोगों की माँगों के अनुरूप ब्रिटिश सरकार ने मद्रास, बंगाल, केन्द्रीय प्रान्त तथा बिहार के इलाकों को काटकर पृथक उड़ीसा प्रांत बनाने का निश्चय किया तो अपनी जागीरें बचाने के उद्देश्य से बिहार को छोड़ शेष प्रांतों ने इसका विरोध किया। ऐसे भी, बँटवारे का जो मनोविज्ञान है, उसके अनुसार कृषि-कर्मों से जुडे़ लोग इसके पक्ष में नहीं होते हैं क्योंकि इससे उनकी जमीन का रकबा कम होता जाता है और कृषि कर्म हेतु आदमियों की भी कमी होती जाती है। प्रसंगवश, एक अलग प्रांत के रूप में बिहार के सृजन से दरभंगा महाराज भी खुश नहीं थे। १९ दिसंबर, १९११ के अंक में ‘द नायक’ ने लिखा है, Maharajah of Darbhanga did not take the separation of Bihar from Bengal in good sense, for he was the Raja of Mithila, the Mithila’s connection with Bengal was very intimate and the disruption of this connection could not be pleasing to the Maharajah.

प्रो. ए. आर. देसाई ने ‘सोशल बैकग्राउन्ड ऑफ इंडियन नेशनलिज्म’ में कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था हेतु संयुक्त परिवार की अपरिहार्यता को स्थापित किया है।

१९१२ तक बिहारी मध्यवर्ग ने सुनियोजित तरीके से अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यक्रम से अपने को न केवल अलग रखा बल्कि अंग्रेजी राज के प्रति अपनी ‘भक्ति’ भी प्रदर्शित की। ११  अगस्त, १९०८ को लेफ्टिनेंट गवर्नर के बांकीपुर आगमन के अवसर पर ६००० लोगों के हस्ताक्षर वाला मेनिफेस्टो का समर्पण किया गया, जिसमें बंगाल विभाजन से उत्पन्न अव्यवस्था के दौर में बिहारवासियों की ‘शांति’ एवं ‘न्यायपूर्ण शासन’ में विश्वास की अभिव्यक्ति थी। पुनः जब फ्रेजर इंगलैंड लौटने लगे तो उनके कार्यकाल को बढ़ाने के लिए बिहार के हिन्दू-मुसलमानों ने एक हस्ताक्षर अभियान शुरु किया। १४ अगस्त १९०८ को ‘बिहार लैण्ड होल्डर्स ऐसोसिएशन’, ‘बिहार प्रांतीय संघ’, ‘बिहार प्रांतीय मुस्लिम लीग’ आदि की तरफ से एक संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल को यह आवेदन दिया, जिसमें यह स्पष्ट कर दिया गया कि उपर्युक्त अभिवेदन ‘नम्र’ तथा ‘वफादार’ होने के साथ-साथ धर्म, जाति, वर्ग तथा समुदाय निरपेक्ष है।

अंग्रेजी सरकार को भी समझ में आ रही थी कि यदि बिहार को स्वतंत्र प्रांत का रूप नहीं दिया गया तो क्षोभ की लहर विद्रोह तथा राष्ट्रीय आंदोलन की चिंगारी में परिणत हो जायगी। यदि ऐसा नहीं किया गया तो विद्रोही बंगाल के साथ रहते-रहते बिहार में भी राष्ट्रीय आंदोलन की लहर तेज हो जायगी। अतः इन खतरों तथा बिहारी मध्य वर्ग की ‘राजभक्ति’ को ध्यान में रखकर ब्रिटिश सरकार ने बिहार को पृथक प्रांत बनाने का निर्णय लिया। अतः अगस्त,१९११ में सरकार ने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को लिखा कि ‘बिहार के लोग अत्यंत ही बलिष्ठ तथा ‘‘राजभक्त’’ हैं तथा वे बंगाल से पृथक होना चाहते हैं। बंगाल के विभाजन के समय बिहार के लोगों ने बिहार को पृथक करने के लिए ‘‘जान बूझकर’’ आंदोलन नहीं शुरु किया था, क्योंकि वे सरकार के विरोध में बंगालियों का साथ नहीं देना चाहते थे। हाल के वर्षों में बिहार में बड़ा जागरण हुआ है तथा उनको विश्वास हो गया है कि जबतक बिहार को बंगाल से पृथक नहीं कर दिया जाता तब तक उनका विकास नहीं होगा। अतः बंगाल से बिहार को पृथक कर अब उनकी ‘चिरलंबित मांग’ तथा ‘अच्छे ध्येय’ को पूर्ण करने का अवसर आ गया है।’ इस पत्र का इंगलैंड में अच्छा प्रभाव हुआ तथा इसकी स्वीकृति मिल गई। १२ दिसंबर, १९११ के दिल्ली दरबार से सरकार ने यह घोषणा की कि बिहार, उड़ीसा तथा छोटानागपुर को बंगाल से पृथक किया जाता है। २२ मार्च १९१२ को इसकी अधिसूचना भी निकाल दी गई और १ अप्रैल १९१२ से भारत के मानचित्र पर बिहार नामक एक पृथक प्रांत अस्तित्व में आ गया।

Thursday, December 8, 2011

औपनिवेशिक बिहार में शिक्षा : पाठशाला में दंड के कुछ संदर्भ

‘पाठशाला में दंड के मुख्य रूप तीन होते: मोगली, घोड़न और खजूर की छड़ी। हाथ-पैर रस्सी से बांध, उसमें गर्दन फंसाकर ओधरा दिया-यह मोगली कसना था। आम की टहनियों में लाल चीटियों के बने खोतों को लाकर नंगे बदन पर झाड़ देना घोड़न लगाना था और खजूर की छड़ी तो खजूर की छड़ी ही होती है। ये तीनों सजायें स्वतंत्र होतीं, अलग-अलग दी जातीं, पर अक्सर दो मिलाकर एक ही साथ दी जाती: मोगली और घोड़न: मोगली और छड़ी। हम दोनों का प्रबंध पहले से तैयार रखते। गुरुजी के कहने पर नहीं अपने ‘उत्साह’ से। छड़ी मैं पहले से ही बना-सोनाकर रखता और लंबी-लंबी छड़ियां ताकि गुरुजी को अपनी जगह से उठने का कष्ट नहीं करना पड़े। ...गुरुजी यदि किसी हमारे विद्यार्थी साथी पर रंज हुए तो मैंने छड़ी हाजिर की। गुरुजी के मुह से निकलना था: ‘झाड़ दो इसके बदन पर घोड़न के खोते’ और मैं कह उठता ‘गुरुजी रखले हतीं।’’ (किशोरी प्रसन्न सिंह, राह की खोज में, अन्वेषा प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण, फरवरी 2002, पृष्ठ 52)

...‘और उसके बाद जो होता वह हमारी उम्र के बहुत लोगों को मालूम होगा जिनकी पढ़ाई बचपन में किसी देहात के गुरुजी के यहां हुई है। विद्यार्थी छटपटा रहे हैं ‘बाबू हो जान गेल, गुरुजी अब न’। पर यहां कौन मानता है घोड़न झाड़े चले जा रहे हैं।’ (वही)

...‘गुरुजी क्यों इन साधनों का इस्तेमाल करते हैं और मैं क्यों ऐसा करता, यह उस समय थोड़े कभी पूछा था, सोचा, विचारा। लगभग 15-16 वर्षों बाद एक बार गुरुजी से पूछा: वह ऐसा क्यों करते थे। पता चला, अररा गांव जहां गुरुजी का घर था, (तीन-चार मील ही पड़ता है) वहां के श्यामनन्दन सहाय जमींदार हैं, बहुत बड़े जमींदार, पढ़े-लिखे भी बहुत और आधुनिक दुनिया के जमींदार। इनकी ‘कचहरी’ में ये सारी चीजें बड़े पैमाने पर व्यवहार की जाती थीं। गुरुजी ने देखा था ये साधन, कितने कारगर होते थे, तगड़े किसान भी आसानी से मान लेते थे और दुरुस्त हो जाते थे। वहीं से गुरुजी ने यह दवा सीखी थी।’ (वही)

...‘यह तो हुई गुरुजी की बात। मैं क्यों घोड़न और छड़ी तैयार रखता ? इसका पता और भी देर से लगा। संस्कार का बहुत बड़ा असर होता है। पर यह संस्कार ऐसा नहीं होता जो जनमने के पहले से ही होता हो। यदि कुछ ऐसा होता भी होगा तो वह हम नहीं जानते। जिस संस्कार को हमने देखा है उसको कह सकता हूं।’ (वही, पृष्ठ 53)

...‘एक बार गुरुजी से हमारी भी हुई, पर वह मोगली, घोड़न और छड़ी-तीनों में कोई नहीं, एक अलग चीज हुई खेदा-खेदी। गुरुजी ने कहा-तुम दोनों (हम और चन्द्रदेव) चतुर्भुज को बुला लाओ। हम दोनों चले। चतुर्भुज का घर वहां से चार सौ गज से अधिक ही होगा। यह सबेरे की ही बात थी। बाहर आ रहा था। नून नदी छिछली नदी है। बाढ़ आयी तो कई घंटों में ही सारा इलाका जलमग्न हो जाता है। चतुर्भुज के दरवाजे पर अभी-अभी छिप-छाप पहुचा था, हमदोनों कई दूसरों के साथ, जिसमें चतुर्भुज भी था, चेंगा और गरचुन्नी पकड़ने में लग गये। मछली पकड़ने के सूर में जब भूख-प्यास ही भूल गया तो गुरुजी की आज्ञा का क्या पूछना। दोपहर को किसी से गुरुजी को पता चला कि हमलोग मछली मार रहे हैं।' (वही)

'गुरुजी और नायब गुरुजी, दोनों अपना-अपना सोंटा लिये दीख पड़े। हमलोगों ने समझ लिया कि आत्मसमर्पण का क्या अर्थ होगा। बस उत्तर की ओर भागे। पानी आ गया था, डगर (गांव की सड़क) एक जगह नीची पड़ती थी, वहां पानी भर कमर हो गया था। हमलोगों के तो गर्दन से भी अधिक था। उसे पार करने में गुरुजी और नायब गुरुजी की धोती भी भींग गयी, इसलिए चाहे जहां कहीं भी हो पकड़ने का ही निश्चय किया। बाहा (नून नदी का छाड़ना) के किनारे-किनारे हमलोग भागे जा रहे थे और गुरुजी रगेदे जा रहे थे। चन्द्रदेव तैरने में हमसे सेसर था। वह बाहा में कूद गया और उस पार। गुरुजी कुछ देर धमसाये कि क्या किया जाये, अब किसका पीछा किया जाय। इस अनिश्चितता में उनकी चाल कुछ धीमी हो गयी और हमारी उनकी दूरी लम्बी हो गयी। इतने में ही मैं भी उस पार चला गया। मकई के खेते-खेते घर पर जाकर किल्ली ठोक ली, और तबतक नहीं निकला, जबतक घर की औरतों ने किरिया खा-खाकर यह विश्वास नहीं दिलाया कि वे हमें गुरुजी से बचायेंगी। और उनलोगों ने ईमानदारी के साथ अपना किरिया निभाया। उस दिन हम दोनों अपने बल पर चम्पत हो गये। हमलोगों ने अपने साथियों से कहा: ‘गुरुजी के हरा देली।’ (वही, पृष्ठ 54)

‘मेंरे हेडमास्टर हरेक विद्यार्थी के चाल-चलन पर हमेशा कड़ी निगाह रखते थे। खराब चाल-चलन के कारण कभी-कभी करीब-करीब हर हफ्ते दो-चार बार बेंतबाजी होती थी। हेडमास्टर खुद बेंत मारते थे। बेंतों की कोई गिनती नहीं हो सकती थी। देह पर नीली साटें उखड़ आती थी। सयाने लड़कों की तो दुर्गति हो जाती थी। बदचलन लड़कों के लिए हेडमास्टर यमराज से कम न थे। उनकी कड़ाई और पढ़ाई सारे शहर में मशहूर थी। बहुत अच्छा पढ़ाते और बड़ी बेदर्दी से मारते-पीटते थे। उनका नाम श्री विश्वनाथ गुप्त था। वे बंगाली थे। हिन्दी में प्रसिद्ध लेखक पंडित ईश्वरी प्रसाद शर्मा के बड़े भाई पंडित गुरुदेव प्रसाद शर्मा भी मेरे ही स्कूल में मास्टर थे। वे भी बदमाशों के काल कहे जाते थे। उनसे भी लड़के थर्राते थे। बेंतबाजी में वे भी बड़ी सख्ती करते थे। हेडमास्टर की तरह हीं वे भी एक आदर्श शिक्षक माने जाते थे। इन दोनों के पढ़ाने का तरीका इतना अच्छा था कि विद्यार्थी इनके भक्त बने रहते थे। ये दोनों ही बहुत सुन्दर अक्षर लिखते थे। खराब अक्षर लिखने वाले लड़के इनसे जरूर दंड पाते थे।’ (शिवपूजन सहाय, संस्मरण)

...'शारीरिक दंड की कठोरता से आतंक छाया रहता था। मास्टरों से गुस्ताखी करने की हिम्मत लड़कों में नहीं थी। किन्तु पढ़ाकू लड़कों को प्यार और पुरस्कार भी मिलता था। सुशील और परिश्रमी लड़कों की पहुंच हेडमास्टर तक बेधड़क होती थी। बड़े-बड़े बिगड़ैल भी स्कूल में भीगी बिल्ली बने रहते थे।’ (वही)

...'गुरु में चेलों की श्रद्धा हृदय से थी, केवल डर से नहीं। कारण, आदर्श चरित्र शिक्षकों की संख्या ही अधिक थी।’ (वही)

‘शिक्षा के बारे में एक छोटा सा वाकया कह देता हूं क्योंकि आमतौर से लोग समझते हैं पहले शिक्षक अच्छे थे, शिक्षा अच्छी थी, मेरा यह अनुभव नहीं है। किसी भी क्षेत्र में मेरे जीवनकाल में समाज आज से अच्छा नहीं था। इससे बदतर था। आबादी बढ़ गई है, बड़े पैमाने पर। जब मैं दूसरे दर्जे में था, 6 आने में एक पुस्तक होती थी ‘आमोद-पाठ’ और उस समय 6 आने बहुत कठिन था, रुपए मन धान बिकता था। मेरी मां एक रुपए में डेढ़ सेर घी बेचकर पढ़ने के लिए पैसा देती थी। आप अंदाज कर लीजिए। मेरे पिता और चाचा में पारिवारिक बंटवारा हुआ था, 6 आने की किताब नहीं खरीदी जा सकी। मेरे शिक्षक मेरे ही गांव के थे, वो कुछ किताबें लाए थे बोले-6-6 आने में ले लो। क्लास में सुना कि फर्स्ट कर गया, शिक्षक अड़ गये कि आगे क्लास में नहीं जाने देंगे, क्योंकि किताब नहीं खरीदी है। मेरे चाचा गए, पंचायती हुई और सभी पंचों ने फैसला किया कि मुझको नहीं जाना चाहिए अगले क्लास में, हमलोग बेवकूफ हैं क्या? हमने 6-6 आने पैसे खर्च किए और वह बिना पैसे दिए फर्स्ट कर गया। पैसे की दिक्कत तो सब दिन रही ही लेकिन एक जिद में आ गया कि बिना किताब के ही पढ़ूंगा, जो होगा सो होगा। दूसरे लड़के मदद लेने आते थे, इसी बहाने उनकी किताब से पढ़कर काम चलाता था।’ (भोगेन्द्र झा, क्रांति-योग, मातृभाषा प्रकाशन, दरभंगा, 2002, पृष्ठ 15).

Tuesday, November 15, 2011

औपनिवेशिक बिहार में शिक्षक : एक बानगी

‘बेचारे प्राइमरी स्कूल के शिक्षक, जो रात-दिन छोटे-छोटे बच्चों को लेकर रटाते रहते हैं और उन्हें पढ़ने योग्य बनाते हैं। लेकिन उन्हें केवल दस रुपया मासिक मिलते हैं। कितने गुरुओं को मैंने तीन-तीन रुपए में जिंदगी खत्म करते देखा है।...बेचारे उन गुरुओं और किसानों की एक ही हालत है। ये दोनों राष्ट्र के निर्माता ठहरे, पर इनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाता। फिर क्यों नहीं देश रसातल में जाए ? ...लेकिन समझ में नहीं आता कि गुरुजी के साथ ऐसी बेरहमी क्यों की जाती है, जो शिक्षा की जड़ हैं और जिन पर राष्ट्र की उन्नति बहुत कुछ निर्भर करती है ?' (देखें, त्रिवेणी संघ का बिगुल , और देखें, पी. के. चैधरीश्रीकांत, बिहार में सामाजिक परिवर्तन के दस्तावेज, विद्या विहार, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण: 2010, पृष्ठ 173).

गुरुजी की मुख्य आमदनी चटियों के महीने से थी, लेकिन इसकी गारंटी भी क्या थी ? ‘कभी-कभी किसी लड़के का बाप आकर कहने लगता था-गुरुजी, इस साल पैदा बहुत नरम है। भदई और अगहनी ने कमर तोड़ दी। चैती का भरोसा है। खेत कमाते-कमाते तो पीठ की रीढ़ धनुही हो गई, मगर करम गवाही नहीं देता तो क्या करूँ ? और कोई धंधा भी तो नहीं है! आप तो घर के आदमी हैं, हालत देखते ही हैं। आपसे क्या परदा है ? आप तो सब रत्ती-रत्ती जानते हैं। मगर चैत में सब बाकी बेबाक कर दूँगा। दाम-दाम जोड़कर ले लीजिएगा। भगवान की दया से क्या हरदम सूखा ही पड़ेगा ? अपने ऊपर चाहे लाख बीते, मगर मैं किसी का खदुक रहना नहीं चाहता। किसी का मेरे यहाँ कौड़ी का एक दाँत भी बाकी नहीं है। पेट काटकर तो मालिक की कौड़ी देता हूँ। आपकी दया से यह लड़का अगर कुछ पढ़ जायगा, तो मेरा दुख छूट जायगा। आपका नाम लेता रहूँगा। आपकी एक निसानी रह जायगी। मेरे यहाँ आपका नकद डेढ़ रुपया और साढ़े बारह सेर सीधा बाकी है। कहीं पुरजे पर टाँक लीजिए।’ (देहाती दुनिया से, शिवपूजन रचनावली, खण्ड 1, पृष्ठ 134-35)। अक्सर यह कागज पर टंका ही रह जाता।

गुरुजी की आमदनी ‘शनिचरा’ से भी होती। ‘प्रत्येक शनिवार को अक्षत और तिल से लड़के गणेश जी की पूजा करते, उन पर पैसे चढ़ाते। यह पैसा गुरुजी का होता।’ (किशोरी प्रसन्न सिंह, राह की खोज में, अन्वेषा प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण, फरवरी 2002, पृष्ठ 50) लेकिन यह सौभाग्य अक्सर सोया ही रहता, क्योंकि ‘बहुत-से लड़के ऐसे थे, जो कभी चावल लाते थे तो गुड़ और पैसा नहीं, कभी पैसा तो चावल और गुड़ नहीं, कभी गुड़ तो चावल और पैसा नहीं। उनके यहां गुरुजी का दरमाहा और सीधा भी बाकी पड़ा रहता था।' (देहाती दुनिया से, शिवपूजन रचनावली, खण्ड 1, पृष्ठ 134-35). ये और बात है कि संपन्न घरों के कुछ बच्चे कभी फेल नहीं करते, ‘बल्कि किसी-किसी दिन एक पैसे के बदले गणेश जी पर दो पैसे चढ़ाते। गुरुजी हमारी (किशोरी प्रसन्न सिंह) या चन्द्रदेव (किशोरी जी के सहपाठी-मित्र) की भक्ति से बहुत प्रसन्न होते। गुरुजी हमलोगों का अधिक ख्याल रखते, इन्हीं कारणों से क्योंकि हमलोग सुसंपन्न घर के थे।’ (राह की खोज में, पृष्ठ 51)

अब पेट-पूजा का ही एकमात्र आसरा होता-‘गुरुजी भांज लगाकर पारी-पारी से अपने विद्यार्थियों के घर खाते थे, जो परिवार में बनता था, वही उनको भी मिलता था। बहुत परिवार ऐसे भी थे जहां वह नहीं खाते क्योंकि ऐसे परिवार खिला ही नहीं सकते। हमारे घर में गुरुजी के लिए अच्छा भोजन भी बनता और पारी भी जल्दी-जल्दी पड़ती।’ (किशोरी प्रसन्न सिंह, राह की खोज में, अन्वेषा प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण, फरवरी 2002, पृष्ठ 50).

‘मैं गुरुजी की शिकायत नहीं कर रहा हूं। बचपन में जो देखा और भोगा है, उसे ही लिख रहा हूं।’ (वही, पृष्ठ 51) जिन्हें किशोरी जी की इस ‘शिकायत’ पर विश्वास नहीं है वे जनकवि नागार्जुन की कविता ‘प्रेत का बयान’ देखें-

‘ओ रे प्रेत-’’

कड़क कर बोले नरक के मालिक यमराज

-‘‘सच सच बतला!’’

कैसे मरा तू ?

भूख से, अकाल से ?

बुखार कालाजार से ?

पेचिस बदहजमी, प्लेग महामारी से ?

कैसे मरा तू, सच सच बतला!’’

खड़ खड़ खड़ खड़ हड़ हड़ हड़ हड़

काँपा कुछ हाड़ो का मानवीय ढाँचा

नचाकर लम्बी चमचों-सा पंचगुरा हाथ

रूखी-पतली किट-किट आवाज में

प्रेत ने जबाव दिया-

‘‘महाराज !

सच सच कहूँगा

झूठ नहीं बोलूँगा

नागरिक हैं हम स्वाधीन भारत के....

पूर्णिया जिला है, सूबा बिहार के सीवान पर

थाना धमदाहा, बस्ती रूपउली

जाति का कायथ

उमर है लगभग पचपन साल की

पेशा से प्राइमरी स्कूल का मास्टर था

तनखा थी तीस, सो भी नहीं मिली

मुश्किल से काटे हैं

एक नहीं, दो नहीं, नौ नौ महीने !

घरनी थी, माँ थी, बच्चे थे चार

आ चुके हैं वे भी दया सागर करुणा के अवतार

आपकी ही छाया में !

मैं ही था बाकी

क्योंकि करमी की पत्तियाँ अभी कुछ शेष थीं

हमारे अपने पुस्तैनी पोखर में

मनोबल शेष था, सूखे शरीर में....’’

‘‘अरे वाह-’’

भभाकर हँस पड़ा नरक का राजा

दमक उठीं झालरें कम्पमान सिर के मुकुट थी

फर्श पर ठोककर सुनहला लौह दण्ड

अविश्वास की हँसी हँसा दंडपाणि महाकाल

‘‘-बड़े अच्छे मास्टर हो:

आये हो मुझको भी पढ़ाने !!

मैं भी तो बच्चा हूँ ....

वाह भाई वाह !

तो तुम भूख से नहीं मरे ?’’

हद से ज्यादा डालकर जोर

होकर कठोर

प्रेत फिर बोला

‘‘अचरज की बात है

यकीन नहीं आता है मेरी बात पर आपको ?

कीजिए न कीजिए आप चाहे विश्वास

साक्षी है धरती, साक्षी है आकाश

और और और भले व्याधियाँ हों भारत में ..किन्तु..’’

उठाकर दोनों बाँह

किट किट करने लगा जोरों से प्रेत

-‘‘किंतु भूख या क्षुधा नाम हो जिसका

ऐसी किसी व्याधि का पता नहीं हमको

सावधान महाराज

नाम नहीं लीजिएगा

हमारे सामने फिर कभी भूख का ’’

निकल गया भाफ आवेग का

शांत स्तिमित स्वर में प्रेत फिर बोला-

‘‘ जहाँ तक मेरी अपनी बात है

तनिक भी पीर नहीं

दुख नहीं, दुविधा नहीं

सरलता पूर्वक निकले थे प्राण

सह नहीं सकी आंत जब पेचिश का हमला ....

सुनकर दहाड़

स्वाधीन भारतीय प्राइमरी स्कूल के

भुखमरे स्वाभिमानी सुशिक्षित प्रेत की

रह गये निरुत्तर

महामहिम नरकेश्वर ! !

Thursday, June 9, 2011

भ्रष्टाचार पर राजनीति

४ जून २०११ को दिल्ली के रामलीला मैदान में योग-गुरु रामदेव जी तथा उनके सहयोगियों के द्वारा आहुत सत्याग्रह का प्रत्यक्षदर्शी होने का सौभाग्य या दुर्भाग्य मुझे प्राप्त हुआ. रामदेव जी का संकल्प कि ‘देश से भ्रष्टाचार को समाप्त कर देना है’, ‘इसमें उनकी जान भी चली जाये तो उन्हें कोई गम नहीं’-मुझे रामदेव जी के इस अबोध या नासमझ कथन से खेद होता है. यह इसलिए कि रामदेव जी की इस उक्ति में अर्थव्यवस्था की सही जानकारी का अभाव झलकता है. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में ‘उत्पादन के साधनों पर व्यक्ति विशेष का स्वामित्व होता है’, ‘कम से कम लोगों के हाथों में अधिक से अधिक धन इकठ्ठा होता है’ तथा रुपया भगवान से भी बड़ा हो जाता है. बेकारी, भूखमरी, गरीबी, भ्रष्टाचार, अत्याचार आदि सभी इस पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के अंतर्विरोध हैं. जबतक यह अर्थव्यवस्था अस्तित्व में होगी तबतक उपर्युक्त सारे लक्षण मौजूद रहेंगे. खुद रामदेव चिकित्साशास्त्र पर अपनी टिप्पणियों में यह कहते पाए जाते हैं कि महज लक्षणों का निदान रोग का उपचार नहीं है बल्कि अनावश्यक दवाओं के असर से और कई दूसरे रोग भी हो जाते हैं. रामदेव जी, काश आप भ्रष्टाचार के मूल में पूंजीवाद जैसे रोग को ‘डायग्नोज’ कर पाते तो शायद स्वयं तथा अपने अनुयायियों को भी भ्रम से बचा पाते. भ्रष्टाचार तो उस पौधे की पत्तियां है और पत्तियों को नष्ट करने से पौधे समाप्त नहीं होते. दूसरी ओर, आपके सारे क्रियाकलाप पूंजीवादी संस्कृति के पक्ष में हैं क्योंकि धन और धर्म का गंठजोड ही योग है जिसे लेकर आप जनता को गुमराह कर रहे हैं. पता नहीं आप अर्थव्यवस्था की सही समझ के अभाव में ऐसा कर रहे हैं या कि इसका कोई राजनितिक निहितार्थ है क्योंकि ‘रातों रात आपने भगवा वस्त्र बदलकर सलवार-सूट और दुपट्टा पहन लिया’-जाने क्या मज़बूरी थी ? एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री, प्रूधों ने ‘व्यक्तिगत संपत्ति’ को चोरी कहा था. अतः उस लिहाज से पैसे की संस्कृति ‘करप्शन’ है. ये दोनों ही परिघटनाएं मानव जीवन के विकास के क्रम में जुडी हैं और इनमें उत्तरोत्तर प्रगति होती रही है. मुझे याद है- जब मैं कॉलेज का विद्यार्थी हुआ करता था तो पटने में आयकर चौराहे के पास एक बड़ा-सा होर्डिंग लगा था जिसपर करप्शन के सम्बन्ध में अंग्रेजी में एक सूत्र लिखा था जिसका हिंदी तर्जुमा है कि ‘भ्रष्टाचार कोई नई चीज नहीं है और यह सार्वभौम है’. मेरे तार्किक मन ने इसे इस रूप में लिया कि सार्वभौम और सर्वव्यापी तो सिर्फ भगवान हैं-तो फिर उस वक्त से यह जोड़ लिया कि ‘भगवान और भ्रष्टाचार सार्वभौम और सर्वव्यापी हैं’. उसी दरम्यान मुझे प्राचीन भारतीय अर्थशास्त्री कौटिल्य का यह सूत्र भी मिला कि ‘यदि किसी की जिह्वा पर मधु की दो बूंद रख दी जाएँ तो यह संभव नहीं कि वह व्यक्ति उसके रस का आनंद न लेगा.’ इन तथ्यों से मेरा अभिप्राय भ्रष्टाचार का पक्षपोषण करना नहीं है बल्कि उस ओर इशारा करना है कि यह तो पूंजीवादी संस्कृति का मात्र ‘बाई प्रोडक्ट’ है. असल हथौड़ा तो उस संस्कृति के ऊपर पड़ना चाहिए जिसका कि अबतक किसी ने प्रयास नहीं किया है बल्कि इस नाम पर सरकार गिराने, सत्ता पलट करने तथा सत्ता हथियाने का काम अवश्य हुआ है.


इस सन्दर्भ में भारत के राजनीतिक इतिहास (स्वातंत्र्योत्तर) पर थोड़ी चर्चा अपरिहार्य है. सन १९७४-७५ में जयप्रकाश नारायण ने ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान कर देश के मध्यवर्ग के बीच नई आशाओं का संचार किया तथा मुख्य रूप से छात्रों को अगुवा बनाकर केन्द्र में स्थापित कॉंग्रेस शासन का विरोध किया था. परिणाम के रूप में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ, सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण हुआ. उलटे, उस वक्त जनता के बीच जो घोर हताशा, निराशा और आक्रोश पल रहा था, जिसकी परिणति व्यवस्था परिवर्तन में हो सकता था, किन्तु जयप्रकाश नारायण ने उस पलते-बढ़ते आक्रोश की हवा निकाल दी और भारत में कुछ भी न बदला. चेहरे अवश्य बदले, किन्तु गरीबी, भूखमरी, बेकारी एवं भ्रष्टाचार पूर्व की भांति फलता-फूलता रहा.


नब्बे के दशक में विश्वनाथ सिंह ने पुनः भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर कांग्रेसी एकाधिकार का विरोध किया. मध्यवर्ग के लोग उसके पीछे गोलबंद हुए क्योंकि यह वर्ग अति महत्वाकांक्षी तथा स्वप्नदर्शी वर्ग है. यह वर्ग कतई व्यवस्था परिवर्तन का पक्षधर नहीं है बल्कि उसी व्यवस्था में कामचलाऊ परिवर्तन कर उसे बनाये रखने का पक्षधर है. मार्क्स के शब्दों में यह वर्ग प्रतिक्रांतिकारी की भूमिका में होता है. भ्रष्टाचार का विरोध इस वर्ग में एक नई आशा का संचार करता है, इसलिए नहीं कि वह भ्रष्टाचार विरोधी है बल्कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को अपदस्थ करके वह अपने लिए जगह की मांग रखता है. अतः इनका विरोध इसलिए होता है कि ‘यदि उन्हें भी मौका मिला तो लूट के रख देंगे.’ विश्वनाथ सिंह को मध्यवर्ग का समर्थन प्राप्त हुआ. सत्ता में परिवर्तन हुआ. असंतुष्ट एवं विक्षुब्धों को सत्ता सुख प्राप्त हुआ किन्तु आम जनता ठगी गई. उनकी तक़दीर न बदली. अतः पूंजीवाद के संकट जब-जब गहरे होते हैं और इस कारण से उपजे आक्रोश के बवंडर को ऐसे चालाक लोग एक खास ‘ट्विस्ट’ देकर जनता को गुमराह करते हैं और क्रांति की संभावनाओं को लंबे समय तक टाल देते हैं. अतः इस लिहाज से जयप्रकाश नारायण तथा विश्वनाथ सिंह-दोनों ही को जनता की अदालत में खड़ा कर मुकदमा चलना चाहिए. उसी श्रृंखला में यदि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी प्रलाप पर विचार करें तो यह कहना गलत न होगा कि ये भी जनता की पीठ में छुरा भोंकने का काम कर रहे हैं. अतः बाबाजी, आपसे अनुरोध है कि जनता के बीच जो अकुलाहट है उसे बढ़ने दें, उसके आक्रोश को पक जाने दें, उसकी एकजुटता को कामयाब होने दें-तभी सही वक्त पर कोई क्रांतिकारी कदम कामयाब हो सकता है. पत्तियां नोचने से पेड़ समाप्त नहीं होता, बुखार की दवा से पीलिया रोग ठीक नहीं हो सकता. ये तो रोग के लक्षण मात्र हैं, हमें रोग पर आक्रमण करना होगा. बाबा रामदेव, आप समझें. क्या आपको प्रधानमंत्री बना दिया जाये तो आप महंगाई रोक देंगे, बेकारी भगा देंगे, गरीबी मिटा देंगे, भ्रष्टाचार एवं अनाचार का अंत कर देंगे ? प्रधानमंत्री अपने वक्तव्य में बिल्कुल ईमानदार हैं यदि वे मानते हैं कि ‘उनके पास कोई जादुई छड़ी’ नहीं है. आपको यदि ऐसी छड़ी उपलब्ध हो तो आप जनता के सामने इसी वायदे के साथ खड़े हों न कि सत्याग्रह और अनशन रूपी अस्त्र के इस्तेमाल से अनावश्यक हिंसा एवं भ्रम का माहौल पैदा करके.


डॉक्टर अखिलेश कुमार

सेवासदन, श्रीनगर, ए. जी. कॉलोनी, पटना-२५.

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