Sunday, November 14, 2010

नेहरु और भारतीय भाषा-साहित्य


किसी को यह बताने की जरूरत नहीं कि स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु जितने बड़े राजनेता थे, उतने ही बड़े रचनाकार भी। एक ओर उन्होंने जहां अपने राजनीतिक चिंतन से समाज को सुंदर बनाने का प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर मेरी कहानी, हिन्दुस्तान की कहानी तथा विश्व इतिहास की झलक जैसी महत्त्वपूर्ण कृतियों से अपनी रचनात्मक प्रतिभा की भी धाक जमायी।

हिन्दुस्तान की कहानी विश्व साहित्य की अत्यंत ही प्रसिद्ध और लोकप्रिय पुस्तकों में से एक है। यह किताब नेहरु जी ने अहमदनगर किले के जेलखानों में अप्रैल से सितंबर 1944 के पांच महीनों में लिखी थी। जेल की तंग दीवारों के बीच कैद होने पर भी पंडित जी इस पुस्तक मेंभारत की खोजकी अनंत और दुर्धर्ष यात्रा पर निकल पड़ते हैं। इतिहास के विविध दौरों से परिचय कराते हुए वह इसे आधुनिक काल और उसकी बहुमुखी समस्याओं तक ले जाते हैं और फिर भविष्य की झांकी दिखाकर हमें खुद सोचने-समझने को प्रेरित करते हैं। नेहरु जी की दूसरी महत्त्वपूर्ण पुस्तक मेरी कहानी (सस्ता साहित्य मंडल ने हिंदी में आत्मकथा इसी नाम से प्रकाशित की है) भी जून 1934 से फरवरी 1934 के बीच जेल ही में लिखी गई और विश्व इतिहास की झलक जेल से लिखे पत्रों का एक शानदार संकलन है। जेल ही से लिखे पत्रों का एक छोटा किंतु अतुलनीय महत्त्व का संकलन पिता के पत्र पुत्री के नाम (इसका अनुवाद प्रेमचंद ने किया है ) भी है। इस संकलन के पत्र नेहरु, इंदिरा को तब लिखे थे जब वह मात्र नौ-दस वर्ष की बालिका थी। इन पत्रों के माध्यम से नेहरु जो विषय/प्रश्न उठाते हैं वे बड़े ही गंभीर हैं। अपनी इतिहास-दृष्टि विकसित करने नेहरु की इतिहास-दृष्टि को समझने के लिए यह पुस्तक अवश्य पढ़ी जानी चाहिए। यूरोपीय इतिहास-दर्शन के क्षेत्र में जिस तरह एच। जी। वेल्स, कालिंगवुड और क्रोसे हैं, भारत में नेहरु का भी वही स्थान रहेगा।

इन तथ्यों से दो बात खुलकर सामने आती हैं-पहली यह कि एक राजनेता के अंदर बहुत बड़ा और एक अत्यंत ही सौम्य लेखक छिपा था, जो अवकाश पाते ही अभिव्यक्ति के लिए बेचैन हो उठता था, और दूसरी, कि अपने राजनैतिक जीवन में वे इतने अधिक सक्रिय थे कि लेखक बेचारा टुकुर-टुकुर मुंह ताकता रह जाता था। कहना होगा कि नेहरु की लगभग तमाम रचनाएं जेल के कठिन जीवन के बीच की हैं, लेकिन मजे की बात तो यह है कि जेल के वातावरण की उदासी उनकी रचनाओं को छू तक नहीं सकी। अलबत्ता उन्हें जेल की तंग दीवारों और कठोर अनुशासन वाले माहौल में भी पहाड़ और चांद की याद बराबर सताती है। यह बात नेहरु का एक असाधारण लेखक होना साबित करती है। फिर उनकी रचना की भाषा भी अत्यंत काव्यमयी है। उनका गद्य कविता-सा आनंद लेते हुए पढ़ा जा सकता है। ऐसी रचनाशीलता और लयात्मकता विश्व-गद्य-साहित्य में भी दुर्लभ ही है।

नेहरु का साहित्यिक अंतर्मन आजीवन बड़ी बेचैनी से अंधेरे के खिलाफ रोशनी की तलाश करता है। फलतः स्वतंत्र भारत में, 1954 . में संगीत नाटक अकादमी, साहित्य अकादमी और ललित कला अकादमी के रूप में नेहरु की तीन मानस-पुत्रियों का जन्म हुआ। इन अकादमियों की स्थापना के पीछे नेहरु के दो विचार (सदिच्छा) महत्त्वपूर्ण ढंग से काम कर रहे थे। प्रथम कोटि के विचार स्वयं नेहरु के शब्दों में, ‘भारतीय साहित्य के विकास के लिए कार्य करनेवाली एक राष्ट्रीय संस्था जिसका उद्येश्य होगा ऊँचे साहित्यिक मूल्य कायम करना, सभी भारतीय भाषाओं में जो साहित्यिक कार्य हो रहे हैं, उन्हें आगे बढ़ाना और उसमें मेल पैदा करना और इस प्रकार से देश की एकता को सुदृढ़ करना।दूसरा विचार मानवीय मूल्यों से ज्यादा प्रेरित लगता है। उन्हें भारतीय लेखक की आर्थिक विपन्नता और उससे उत्पन्न मानसिक दासता की पूरी कल्पना थी। इसी कारण से उन्होंने संसद में कई लेखकों को नामित भी किया था। कांग्रेस पार्टी का सदस्य होते हुए भी कई दार्शनिकों, बौद्धिकों और अर्थशास्त्रियों को अपने मंत्रिमंडल और राष्ट्र-रचना के दूसरे प्रमुख कार्यों में स्थान दिया।

इतना ही नहीं, जवाहरलाल नेहरु अपने निजी फंड से आर्थिक दृष्टि से कमजोर या बीमार और साधनहीन कलाकारों-साहित्यकारों को नियमित मासिक सहायता-राशि भेजते थे। डा. प्रभाकर माचवे ने ऐसे लेखकों की एक विस्तृत सूची बनायी है, जिनमें काजी नजरूल इसलाम और एम. एन. राय तक शामिल हैं।

कला अकादमियों की स्थापना नेहरु की लेखकीय प्रतिबद्धता को भी प्रमाणित करती है। जिस समय भारत में नया संविधान लागू होकर सन् 1952 में सार्वजनिक चुनाव होनेवाला था उन्हीं दिनों कांगेस की ओर से तैयार किये गये घोषणा-पत्र के प्रारूप में साहित्य, कला, संगीत तथा नाटक आदि सभी ललित विषयों का उन्नयन एवं विकास करने की चर्चा अत्यंत महत्त्वपूर्ण शब्दावली में की थी। चुनाव-घोषणा-पत्र का यह प्रारूप गहन विचार-विमर्श के बाद स्वीकृत हुआ और कांग्रेस इसी आधार पर चुनाव भी लड़ी। आज का कोई प्रधानमंत्री या राजनीतिक दल ऐसे सवाल को आधार बनाकर चुनाव के मैदान में आयेगा, सोचा तक नहीं जा सकता। नेहरु जैसा कोई सच्चा और प्रतिबद्ध लेखक ही ऐसा कर सकने की हिम्मत प्रदर्शित कर सकता है।

जिस समय अकादमी की ओर से दस भारतीय भाषाओं की चुनी हुई दस-दस कविताओं का देवनागरी लिप्यांतर और उनका हिंदी अनुवाद भारतीय कविता 1953 नाम से प्रकाशित किया जा रहा था, नेहरु जी उसकी भूमिका तैयार करने में जी-जान से लगे हुए थे। अज्ञेय की प्रिजन डेज एंड अदर पोएम्स, बच्चन की हाउस ऑफ वाईन तथा दिनकर की चर्चित एवं बृहदाकार पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय की भूमिका भी उन्हीं दिनों, और नेहरु ही ने तैयार की थी। इतना ही नहीं, बांगला साहित्य का इतिहास भी नेहरु द्वारा ही लिखित विचारोत्तेजक भूमिका के साथ प्रकाशित हुई थी। नेहरु के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने इतनी पुस्तकों की भूमिका लिखी हो, मुझे नहीं मालूम। साहित्य अकादमी का लक्ष्य सभी भारतीय भाषाओं को विकसित करना और उनमें पारस्परिक सहयोग की भावना को प्रोत्साहित करना था। नेहरु की बहुत ही स्पष्ट राय थी कि हम जितना ही अधिक दूसरी भाषाओं को जानेंगे और समझेंगे, उतना ही अधिक अपनी भाषा का भी मर्म समझ सकेंगे। आज हमें मालूम है कि किसी भी भाषा का विकास दूसरी किसी भी भाषा के सहयोग से ही संभव है। एक भाषा के बढ़ने से दूसरी को भी फायदा पहुंचेगा। उनका आपसी संबंध मुकाबले का नहीं बल्कि सहयोग का होना चाहिए। दूसरे की तरक्की से खुश होना चाहिए, क्योंकि उसका नतीजा अन्ततः अपनी तरक्की होगा। नेहरु ने हमें विस्तृत हवाला देकर बताया कि यूरोप में जब नये साहित्य (अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, इटालियन) बढ़े, तब साथ-साथ बढ़े, एक-दूसरे को दबाकर या मुकाबला करके नहीं। वे जोर देकर कहते थे कि भारत का जो भी व्यक्ति शिक्षित है या होने का दावा करता है, उसे अपनी भाषा के अलावा दूसरी भाषाओं का भी कुछ ज्ञान होना चाहिए। विभिन्न भाषाओं में लिखे गये श्रेष्ठ और सुप्रसिद्ध रचनाओं का ज्ञान तो होना ही चाहिए।

नेहरु की भाषा-विकास की समझ बिल्कुल स्पष्ट थी। इसीलिए वे हिंदी के विकास को लेकर चिंतित तो होते थे, किंतु किसी दूसरी किसी भाषा की शर्त पर नहीं। यहां तक कि क्षेत्रीय अथवा प्रांतीय भाषाओं तक के स्वतंत्र अस्तित्त्व को वे राजी-खुशी स्वीकार करते थे। उनका यह मानना कितना वैज्ञानिक और व्यावहारिक था कि हर प्रांत के लिए वहां की बोली जानेवाली भाषा ही प्रथम प्राथमिकता है। हिंदी या हिंदुस्तानी राष्ट्रभाषा अवश्य है और होनी भी चाहिए, लेकिन वह प्रांतीय भाषा के पीछे ही सकती है। जहां तक बच्चों की शिक्षा का सवाल है, वे ठीक-ठीक गांधीजी की तरह, मातृभाषा में ही दिये जाने के पक्षधर थे। दूसरे प्रांतों में निवास करनेवाले बच्चों को भी वे उनकी मातृभाषा ही में शिक्षा प्रदान किये जाने के हिमायती थे। मसलन, अगर कलकत्ते में तमिल बोलनेवाले काफी लोग रहते हैं तो उनको यह अधिकार होना चाहिए कि स्कूलों में तमिल द्वारा ही पढ़ाई हो।

संसद में नेहरु जी द्वारा भाषण किये जाने की परिपाटी यह थी कि वे जिस विषय पर बोलनेवाले होते, उस विषय पर अंतिम वक्ता जिस भाषा में बोलता, उसी भाषा में वे जवाब देते। कहना होगा कि पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने विदेश नीति पर कभी संसद में चर्चा की थी, तो उनके तर्कों का जवाब एवं खंडन नेहरु जी ने हिंदी ही में प्रस्तुत किया था। राज्यसभा में संभवतः हिंदू कोड बिल पर तारकेश्वर पांडे के तर्कों का जवाब देने के लिए भी नेहरु ने हिंदी भाषा को ही हथियार/माध्यम बनाया था। हिंदी के उत्थान की बात करनेवाली राजनीतिक पार्टियों (इसमें भारत की वामपंथी पार्टियां तक शामिल हैं) की भाषा-नीति की वर्तमान दशा से तुलना करने पर नेहरु की भूमिका एवं उनका हिंदी-प्रेम ज्यादा आसानी से समझ में सकता है।

भारतीय राष्ट्रवाद के दौर में एक समय आया जब हिंदी एवं उर्दू शब्दों के प्रयोग में फर्क महसूस किया जाने लगा। नेहरु की दृष्टि में यह फर्क उस राष्ट्रीय जागृति का प्रतिबिंब था जो हिंदुओं एवं मुसलमानों में पैदा हो रही थी। हिंदुओं ने परिष्कृत/संस्कृतनिष्ठ हिंदी और देवनागरी लिपि पर जोर दिया और मुसलमानों ने उर्दू के बहाने अरबी-फारसी पर। आरंभ में हिंदुओं की राष्ट्रीयता का स्वरूप हिंदू राष्ट्रीयता ही था। इसलिए प्रारंभिक काल में ऐसा कुछ घटना नेहरु के लिएपरिस्थितिजन्यथा। कुछ दिनों बाद मुसलमानों में भी धीरे-धीरे जागृति पैदा हुई। उनकी भी आरंभिक राष्ट्रीयता का स्वरूप मुस्लिम राष्ट्रीयता ही रहा। दुर्भाग्यवश, हिंदी हिंदुओं की एवं उर्दू मुसलमानों की भाषा के रूप में प्रचारित-प्रसारित हुई। नेहरु के लिए हिंदी-उर्दू का यह भेद भाषागत होकर महज राजनीतिक है। उनके लिए दोनों का आधार एक है, व्याकरण भी एक है। वास्तव में दोनों का उद्गम भी एक ही है। उर्दू की लिपि को छोड़कर यदि हम केवल भाषा के लिहाज से विचार करें तो मालूम होगा कि उर्दू हिंदुस्तान के बाहर कहीं भी बोली नहीं जाती है। हां, उत्तरी भारत के बहुत-से हिंदुओं के घरों में वह अवश्य बोली जाती है।

हिंदी-उर्दू के आपसी सहयोग को नेहरु जी विकास के लिए आवश्यक समझते थे। हिंदी या उर्दू में किसी भी एक की शब्द-संपदा को नष्ट करके कभी भी हम अपनी भाषा को समृद्ध नहीं कर पायेंगे। नेहरु के लिए, ‘यदि हिंदी का विकास होता है तो उर्दू का भी होता है और यदि उर्दू का होता है तो निस्संदेह हिंदी का भी।वे तो यहां तक चाहते थे कि हिंदी और उर्दू अपने में विदेशी भाषाओं तक के शब्दों एवं विचारों को शामिल कर ले और उन्हें अपना बना ले। ऐसे शब्दों के लिए जो आमतौर पर अंग्रेजी, फ्रेंच और अन्य विदेशी भाषाओं में बोले जाने लगे हैं, संस्कृत या फारसी के शब्द गढ़ना ठीक नहीं है। लेकिन आज नेहरु की सदिच्छाओं एवं स्वयं भाषा की प्रकृति के ठीक विपरीत हो रहा है। हम विदेशी शब्दों को तो धड़ल्ले से अपनाते चले जा रहे हैं, लेकिन हिंदी और उर्दू दोनों ही भाषाओं के बोलनेवाले लोग एक-दूसरे के शब्दों से परहेज बरत रहे हैं। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन तक से प्रसारित होनेवाले समाचार-बुलेटिनों में इसका प्रभाव लक्षित होता है।

नेहरु अक्सर यात्रा रेलगाड़ी में ही करते। यात्रा के दौरान जरूरी सामानों में किताबों से भरा एक भारी-भरकम बक्सा अवश्य होता। रेलगाड़ी की यात्रा के पीछे मूल भावना यह थी कि हिंदुस्तान में एक छोर से दूसरे छोर तक जाने में चार-पांच दिनों का जो एकांत और अवकाश मिलेगा, उसमें कम-से-कम किताबों को उलट-पलट सकेंगे। आज के लेखकों (इसमें जनवादी संगठनों केनामवरलेखक तक शामिल हैं) को, जो किसी जलसे में जाने से पहले हवाई जहाज का टिकट और एक बड़ी राशि का चेक अपने नाम करवा लेते हैं, सबक लेनी चाहिए।

प्रकाशन: प्रभात खबर, दिल्ली, रविवार, 12 सितंबर, 2004; पुनर्प्रकाशन: अमर उजाला कॉम्पैक्ट, इलाहाबाद, शनिवार, 14 नवंबर 2009

2 comments:

अजय कुमार झा said...

एक तथ्यपरक और जानकारीपूर्ण आलेख के लिए बहुत बहुत बधाई हो राजू भाई । आज हिंदी अंतर्जाल पर ऐसी ही सामग्रियों की आवश्यकता है , आज से आपके जाल , अजी नेटवर्क्ड ब्लॉग्स में जुड गया हूं .....ताकि आगे भी जुडा रहूं

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

नेहरू जी के व्‍यक्तित्‍व के इस पहलू से परिचय कराने के लिए धन्‍यवाद भाई साहब.