Saturday, November 20, 2010

आखिर किसे कहोगे क्रूरता ?

जब भी मुझसे कोई क्रूरता की शिनाख्त करने को कहता है तो मैं अपने को बेहद उलझा हुआ महसूस करता हूं। विचार थिर होने का नाम ही नहीं लेते। समझ में नहीं आता कि किसे क्रूरता की श्रेणी में रखूं और किसे बख्श दूं। दिमाग में ऐसा गड्डमड्ड होता है कि आखिर को मैं फिर से सवाल पर लौट आता हूं कि आखिर किसे कहोगे क्रूरता ? लेकिन इस दौरान जो कुछ चित्र बनते हैं, दृश्य उपस्थित होते हैं, वे अर्थकर लगते हैं।

बचपन की वो धुंधली यादें हैं जिनमें मेरे दरवाजे पर कोई अपरिचित पहुंचता तो दादाजी पहले और अंतिम सवाल की तरह पूछते ‘आपका आश्रय (मूल में यह शब्द वर्णाश्रम या फिर आश्रम रहा होगा) कौन-सा है ?’ यद्यपि उन दिनों यह बात कुछ बुरी नहीं लगती थी क्योंकि मुझे सवाल ही समझ में न आते थे। लेकिन इतना अवश्य समझता था कि अलग-अलग लोगों को अलग-अलग स्थानों पर बैठाते एवं उनके साथ पेश आने के उनके तरीके भी अलग-अलग होते थे। कुछ खास लोग ही होते जिनकी पहुंच खाट या चौंकी तक हो पाती वरना अधिकतर तो मिट्टी ही की फर्श पर बैठकर अपने को धन्य समझते। प्राचीन इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते जब मैंने प्राचीन समाज-व्यवस्था में इसी तरह की बंदिशें शूद्रों और महिलाओं के संदर्भ में देखीं और उसे अमानवीय पाया तो अपने दादाजी के ‘सदाचार’ का अर्थ समझ में आया। बहुत ही सरल, सहज और अल्पज्ञात दादाजी अक्सर कहते ‘हिंदू बढ़े नेम से मुसलमान बढ़े कुनेम से।’ इसका भी ध्वन्यार्थ अब ही जाकर समझ में आया है।

फिर मैंने पिता को देखा। अत्यंत छोटे किसान। एक बड़े संयुक्त परिवार में अपने हिस्से की उतनी ही जमीन जितनी पिता खेत में काम करनेवाले एक हलवाहे को देते थे। मैंने अक्सर पाया कि मजदूर अगर काम से लौटकर अपनी मजदूरी की मांग करता तो पिता खुदरा पैसे (रेजगारी) न होने की बात कह मजदूर को अगले दिन के लिए टाल देने की भरसक कोशिश करते। मुझे अपने पिता की यह बात बहुत बुरी लगती। इधर कई सालों तक लगातार मैंने पब्लिक स्कूलों में पढ़ाया और कई तरह के अनुभवों से अपने को समृद्ध होता पाया। पटने के पब्लिक स्कूलों में मालिक हमेशा शिक्षकों को वेतन देने में टाल-मटोल करते हैं। शायद कोई मौद्रिक लाभ होता है इससे। और तो और यह भी परंपरा है कि शिक्षकों को चेक के द्वारा मालिक से वेतन-भुगतान होता है और एक नियत राशि अपने पास रखकर शेष राशि शिक्षक पुनः मालिक को लौटा देता है। पब्लिक स्कूलों की बात रहने दें। सरकारी शिक्षकों एवं अन्य सरकारी कर्मचारियों की बात करें। क्या उनके हिस्से के पैसे रोककर नहीं रखे जाते ? आज कितने लोगों को यह बात क्रूरता या क्रूरता-सी लगती या लग सकती है ?

इधर हाल तक एक गीत की कुछ पंक्तियां मुझे सुनायी पड़ती रही हैं। मैं कभी गाने का कोई शौकीन नहीं रहा इसलिए उसका गद्यार्थ ही आपको कह सकता हूं। भावार्थ है कि मुझसे प्रेम न करो कोई बात नहीं लेकिन किसी और को चाहने पर मुश्किल होगी। मैं गीत के इस टुकड़े पर बार-बार रूकता रहा हूं और सोचता हूं कि क्या यह वही या कुछ-कुछ उसी के जैसा है जिसे आप क्रूरता कहते हैं ? हाल ही की बात है कि मैं एक महिला मरीज को लेकर आंख के डाक्टर के पास गया हुआ था। उस मरीज को निकट-दृष्टि-दोष था। डाक्टर ने आंखों की जांच के उपरांत बताया कि यह बीमारी दूर की चीजों को न देखने के अभ्यास की वजह से पैदा हुई है। पहली दफा में तो मैं इस बात का मतलब ही नहीं समझ पाया। कई दिनों के निरंतर प्रयास के बाद जाकर इसका मर्म समझ में आया। क्या आपको लगता है कि पुरुष प्रधान समाज की यह भी कोई क्रूरता है जहां एक औरत को महज देखने तक का भी अधिकार नहीं है। क्या गांधारी की आंखों की पट्टी सिर्फ गांधारी के लिए थी या प्रतीक रूप में संपूर्ण महिला वर्ग के ऊपर लगी बंदिश को प्रतिबिंबित करती है ? एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, विश्व में कुल नेत्रहीनों तथा मोतियाबिंद के शिकार लोगों में से दो तिहाई महिलाएं हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ रोग विशेषज्ञ डा. लीवी एस मूर्ति ने कहा कि विश्व भर में नेत्र रोगों तथा नेत्रहीनता के शिकार लोगों में से महिलाओं की संख्या सर्वाधिक होने का एक प्रमुख कारण यह है कि महिलाओं और लड़कियों के उपचार में भेदभाव बरता जाता है जिसे बंद किया जाना चाहिए। आनेवाले समय में लड़कियां अगर आंखों की रोशनी के बगैर पैदा हों तो क्या आश्चर्य!

बल्कि हमने तो प्रबंध कर रखा है कि लड़कियां पैदा ही न हों। एक समय था कि लड़की के पैदा होते ही उसे मार डालने के उपक्रम पर विचार होने लगता था। आज हम ‘मध्ययुगीन बर्बरता’ कहते हुए उसकी भर्त्सना करते हैं। भला क्यों नहीं! आधुनिक/उत्तर आधुनिक समय में हमारी क्रूरता भी आधुनिक/उत्तर आधुनिक होनी चाहिए! नये जमाने के नये औजार। आज हम उसकी हत्या जन्म लेने से पहले करते हैं। बिल्कुल थोड़ी-सी सावधानी जीवन भर आसानी वाली शैली में। इसलिए भी कि जन्म लेने के बाद हत्या करने पर न चाहने पर भी थोड़ी-बहुत चिल्ल-पों हो ही जाया करती है। आपको याद ही होगा कि रूपकुंवर सती-कांड के दौरान और बाद में भी इस ‘भद्रजनीय’ समाज ने कितना गला फाड़ा था। इसलिए ज्यादा बखेड़ा खड़ा करने की परेशानी से बचने के लिए ही लोगों ने कन्या-भ्रूण-हत्या जैसी चीज की ईजाद की। इस खोज ने मीडियाकर्मियों को भी चपत लगाई है। बेचारे सतीकांड का लाइव टेलीकास्ट दिखाने से वंचित रह जायेंगे।

इस क्रूरता को आधुनिक कहने का एक बाजिव तर्क यह भी है कि आधुनिकता का पाठ पढ़े लोगों के बीच यह पद्धति कुछ ज्यादा ही प्रचलित है। आंकड़े बताते हैं कि कन्या-भ्रूण-हत्या की दर गांवों से ज्यादा नगरों की एवं नगरों से ज्यादा महानगरों की है। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ वाले देश की संसद जिस नगरी में लगती है, इसकी दर सबसे ज्यादा है। इससे भी ज्यादा पुष्ट प्रमाण यह है कि दिल्ली के उन इलाकों में कन्या-भ्रूण-हत्या ज्यादा है जहां के लोग ज्यादा शिक्षित/आधुनिक हैं। जिनकी शिक्षा जितनी अधिक व आधुनिक है वे उतने ही अधिक इस तरकीब का प्रयोग करते हैं। कुछ दिनों पहले जब मैंने एक दिल्लीवासी से कहा कि दिल्ली के विश्वविद्यालयों तक में यौन-शोषण/यौन-उत्पीड़न होता है तो कहने लगे ‘दरअसल बिहार में यह सब ज्यादा होता है लेकिन दबा-दबा रहता है। दिल्ली में चूंकि राजनीतिक चेतना ज्यादा है इसलिए प्रकट हो जाता है।’ उस देश में जहां पालतू जानवरों तक को जोड़ा में रखने का विधान है; यानी अगर आप केवल नर या केवल मादा पालते हैं तो कानून की नजर में आप अपराधी हैं। संवेदना की ऐसी पराकाष्ठा! और दूसरी तरफ कन्या-भ्रूण-हत्या। इसे क्या कहेंगे आप ?

कुछ साल पहले तक मेरे एक मित्र हुआ करते थे। नाम था शैलेन्द्र कुमारकुमार साहब ने एक दिन आंख के डाक्टर के पास साथ चलने को कहा। मैं गया भी। डाक्टर ने उन्हें चश्मे का प्रयोग करने की सलाह दी। चश्मा बनवाया गया। अब उसे पहनने की बारी थी इसलिए पिता को पहले ही से तैयार करना जरूरी था। उन्होंने पिता को चश्मा दिखाया। पिता ने चश्मा अपने कब्जे में कर लिया और रोजाना एक किलो पालक साग खरीदकर लाने का आदेश दे डाला। मेरे मित्र बेचारे चश्मा नहीं पहन पाये। बाद में उनकी आंखों का क्या हुआ मुझे नहीं मालूम क्योंकि फिर हम अलग रहने लगे। मैंने पब्लिक स्कूल में भी एक मुस्लिम छात्र को पिता के भय से चश्मा न पहनने की बात देखी थी। खुद मैं जब पहली बार ऐनक के साथ घर गया और अंधेरे में पड़ी बाल्टी से टकरा गया तो एक आदमी ने टिप्पणी की थी ‘रातो में चश्मा पहने के कउन सौख है।’ यह सुनकर जो मुझे गुस्सा आया था उसकी कल्पना आप नहीं कर सकते। पत्नी को चश्मा पहनवाने में भी मुझे मशक्कत करनी पड़ी। गांव में जरूरतमंद लड़कियां केवल इस डर से चश्मा नहीं लगातीं कि शादी तय होने में यह बात परेशानी पैदा कर सकती है। ऐसे में उन लड़कियों की आंखों का क्या होता होगा शायद आप भी समझते होंगे। गांव में मेरे पड़ोस में एक लड़की है जिसकी चश्मा न लगाने की वजह से आंख ही बैठ गई। हमें अपने बचपन की वो बात याद है जब चश्मा पहनने वाले किसी भी आदमी को ‘चश्मा-चश्मल्लू’ कह चिढ़ाते। उन दिनों बच्चों का यह एक प्रिय खेल की तरह होता। क्या इसे भी आप क्रूरता ही कहेंगे ?

मैंने श्रीकांत वर्मा की पत्नी का कभी किसी पत्रिका में संस्मरण पढ़ा था। उसमें श्रीकांत वर्मा की बीमारी (अंतिम दिनों की) और मृत्यु का हाल छपा था। कवि श्रीकांत वर्मा बीमार थे और सरकारी खर्चे से शायद इंगलैंड में इलाज चल रहा था। बीमारी कुछ ऐसी थी कि डाक्टर ने बचने की किसी भी संभावना से इनकार कर रखा था। साथ ही उन्हें असह्य पीड़ा भी थी। पत्नी को भी उनकी पीड़ा असह्य लगी और डाक्टर एवं दवा की सहायता से कवि को उस पीड़ा से हमेशा के लिए मुक्त कर दिया गया। इस बात को पढ़ते हुए मुझे एक मानसिक आघात-सा लगा था लेकिन जल्द ही संभल गया। पत्नी द्वारा लिया गया निर्णय मुझे बौद्धिक एवं साहसपूर्ण लगा था। भारतीय कानून एवं मानस के लिहाज से यह एक जघन्य अपराध था। यहां आज भी इच्छा-मृत्यु का अधिकार नागरिकों को प्राप्त नहीं है। इसकी बात तो दूर ही रखें। गरीबी, भुखमरी, कुपोशण आदि तक को आप किसी व्याधि का नाम जीवित रहते नहीं दे सकते। शायद उसके लिए आपको पहले मृत्यु-प्रमाण-पत्र हासिल करना होगा। नागार्जुन की कविता ‘प्रेत का बयान ’ का शायद यही निहितार्थ है। आप भूख से मरें किंतु भुखमरी का नाम न लें। अगर ऐसा करते हैं तो आप दंडनीय अपराध करते हैं। इसके लिए भारतीय दंड संहिता का विधान है। आपके बच्चे अगर विकलांग पैदा होनेवाले हैं, और आप पालने में असमर्थ हैं तो सामूहिक आत्महत्या करें। दूसरा कोई विकल्प नहीं। भारतीय कानून आपको ‘क्रूर’ होने का अधिकार प्रदान नहीं कर सकता !

कुछ साल हुए जब कुंभकोणम में सैकड़ों स्कूली बच्चे जलकर बुरी तरह से मरे थे। बच्चों के बीच खासे ‘लोकप्रिय’ तत्कालीन वैज्ञानिक राष्ट्रपति अब्दुल कलाम आजाद की उन्हीं दिनों अंग्रेजी अखबार ( संभवतः ‘दि हिन्दू’ ) में एक कविता आई थी जिसमें ईश्वर से प्रार्थना थी कि उन बच्चों के अभिभावकों को वे दुख बर्दाश्त करने की ताकत दें। इस कविता को पढ़कर मेरा सिर भन्ना गया था कि एक राष्ट्रपति, जिसे मालूम है कि दुख के कारण क्या हैं और जिन्हें वह चाहे तो पल भर में दूर कर सकता है, वह हिंदी कवियों (अपवाद यहां भी हैं ) की तरह कविता लिखने बैठा है ! मुझे नहीं मालूम कि आप क्या सोचते हैं। इस क्रूरता की शिनाख्त आपने की अथवा नहीं?

सन् 1997 के इंडिया टुडे की साहित्य वार्षिकी में अशोक वाजपेयी का प्रकाशित संस्मरण ‘तुम भी, मैं भी आदमी’ पढ़कर मन कड़वाहट से भर गया था। वाजपेयी जी, मुक्तिबोध के साथ रेल-यात्रा पर हैं। उन्होंने लिखा है, ‘बीच में जब मानिकपुर स्टेशन आया तो जाड़े की रात और ठंडी हो चुकी थी। वहां जंक्शन होने के कारण गाड़ी काफी देर ठहरी। हमलोग इलाहाबाद से रात के खाने का कोई इंतजाम कर के नहीं चले थे। मुक्तिबोध ने कहा, ‘‘पार्टनर, आपने स्टेशन पर मिलने वाली पूरी-सब्जी कभी खाई है। बड़ी स्वादिष्ट होती है, चलिए लाते हैं।’’ हम दो दोनों में आलू की सब्जी और पूरियां ले आए। आलू की सब्जी रसेदार थी और उसमें रसाधिक्य इतना था कि तलहट में कहीं कुछ आलू होने का संदेह जरूर होता था पर वह वहां भी था नहीं। पूरियां किसी कदर ठंडी, चीमड़ और खासी सख्त थीं, मैंने देखा मुक्तिबोध बहुत स्वाद लेकर उन्हें रसे में भिगोकर खा रहे थे। मुझसे इतनी सख्त पूरियां चबाई ही नहीं जा रही थीं। पर उस बारे में कुछ कहना बल्कि उन्हें पसंद न कर पाना मुक्तिबोध के आगे मुझे कुछ अश्लील-सा लगा। मैंने थोड़ा-बहुत खाकर उनकी नजर बचाकर बाकी चलती ट्रेन की खिड़की के बाहर फेंक दी। थोड़ी देर बाद जब उन्होंने यह लक्ष्य किया कि मेरे हाथ खाली हैं तो बोले कि ‘‘आप जल्दी खा गए-स्वादिष्ट इतनी है कि क्या कहा जाए।’’ तब यह पढ़कर मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा था। आज की बात आप जाने।

महादेवी वर्मा ने देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के घर का हाल लिखा है। उनके घर का रिवाज था कि कोई अतिथि घर आते तो उनकी पत्नी पैर छूकर प्रणाम करतीं। उनकी इस अतिरिक्त की शिष्टता से रीढ़ की हड्डी ने सीधा रहने से इनकार कर दिया था। संभव है कि यह भी आपको सदाचार का एक अति सामान्य और शिष्ट नियम लगे लेकिन मुझे ऐसी ही छोटी-छोटी बातों से क्रूरता की गंध आती है। मजेदार बात यह है कि इन बातों का हमें इस कदर आदती बना दिया जाता है कि इसमें कोई बुराई नजर ही नहीं आती। स्वयं भोक्ता को भी नहीं। आपको यह जानकर कितनी तसल्ली होगी कि बिल्कुल हाल के एक सर्वेक्षण से यह बात उभर कर आई है कि पत्नियां अपने पति द्वारा पीटे जाने को तनिक बुरा नहीं मानती हैं। मैं तो कहूंगा कि यह क्रूरता की पराकाष्ठा है इस खतरे को भांपते हुए कि आप मुझे मनोरोग का ‘केस’ न समझ लें। अगर नहीं, तो आखिर किसे कहोगे क्रूरता?

प्रकाशन: मनोवेद डाइजेस्ट , अक्तूबर-दिसंबर, २००९.

2 comments:

Rahul Singh said...

ऐसी क्रूरता हर स्‍तर पर 'गेम्‍स पीपुल प्‍ले' सदैव और लगातार खेली जाती है और इस खेल से निपटने के लिए नए खेल ईजाद कर लिए जाते हैं.

Dr. Ravindra S. Mann said...

Yes lot much cruel attitudes are added in our society's day to day practices.