महाभारत में प्राचीन भारतीय ज्ञान का विशाल भंडार है। उसकी स्वयं की यह घोषणा है कि जो द्विज अंगों और उपनिषदों सहित चारों वेदों को जानता है, परंतु इस महाभारत-इतिहास को नहीं जानता, वह विचक्षण विद्वान नहीं है। महाभारत को बार-बार 'भारत-इतिहास', 'भारत-पुराण', 'इतिहास-शिरोमणि' आदि कहा गया है। सौति पूछते हैं कि मैं आपलोगों को क्या सुनाऊँ ? धर्मार्थ से संयुक्त पुराणों की कथा या 'इतिवृत्तं नरेन्द्राणामृशीणां च महात्मनाम्'? राजाओं और ऋषियों के इतिवृत्त आज के अर्थ में इतिहास नहीं हैं। महाभारत में पुराण का अर्थ पुरानी पुण्य-कथाएं हैं और इतिहास का अर्थ राजाओं-ऋषियों की वंशावलियों और क्रिया-कलापों का वर्णन। यों इन दोनों को प्रत्येक पुराणों में पाया जाता है। पुराण-इतिहास में अन्वय-व्यतिरेक संबंध है।
यह महाग्रंथ आख्यानों और उपाख्यानों से भरा पड़ा है। सच पूछिए तो पूरा महाभारत पीपल के पत्ते में फैली हुई नसों की तरह आख्यानों में बंधा हुआ है। कोई व्यक्ति अपनी बात आख्यानों के बिना नहीं कह पाता। ये आख्यान लोक से लिए गए हैं और जहां तहां जड़ दिए गए हैं। कभी-कभी तो इसमें ऐसी कथा का सन्निवेश किया गया है जो सारी शास्त्रीय मान्यताओं को ध्वस्त कर देती है। नेवला-कथा ऐसी ही एक कथा है। महाभारत में इतने अधिक विषयों का समावेश हुआ है कि विश्वकोष मालूम पड़ता है। कहा भी गया है, 'जो इसमें है वही अन्यत्र भी है और जो नहीं है वह अन्यत्र भी नहीं है।' किंतु, वैविध्य इसकी समस्या नहीं है। विषयों में इतने विपर्यय, अंतर्विरोध और पुनरुक्तियां हैं कि वे विद्वानों की जटिल समस्याएं बनी हुई हैं। ऐसे में महाभारत से प्राप्त सामग्री का उपयोग किसी एक काल के लिए करना कठिन है। जहां इसके आख्यानात्मक अंश से दसवीं शताब्दी ई. पू. की झांकी मिलती है, वहीं इसके उपदेशात्मक अंशों का संबंध काफी परवर्ती काल से, यानी ईसा की चौथी शताब्दी से, मालूम होता है। इस महाकाव्य में मूलतः 8,800 श्लोक थे और यह रचना 'जय' कहलाती थी। फिर वे बढ़कर 24 हजार हुए और रचना का नाम 'भारत' पड़ा। बाद में बढ़कर वे एक लाख हो गये और यह ग्रंथ 'महाभारत' कहलाया। गुप्तकालीन अभिलेखों में एक लाख का उल्लेख है। यद्यपि समीक्षित संस्करण में अभी प्रायः 82 हजार श्लोक मिलते हैं।' कहना होगा कि आज के बृहद्काय महाभारत में भी एक लाख श्लोक नहीं हैं। 'हरिवंश' को मिलाकर, जिसे खिलपर्व के नाम से भी जाना जाता है, श्लोकों की संख्या एक लाख तक पहुंच जाती है। किंतु, अब इसे महाभारत का अंग नहीं माना जाता।
महाभारत में तीन कथावाचक हैं-व्यास, वैशंपायन और गल्व गणकपुत्र उग्रश्रवा सौति। व्यास ने इसे वैशंपायन को सुनाया था, वैशंपायन ने जनमेजय को और उग्रश्रवा सौति ने कुलपति शौनक के नैमिषारण्य में होने वाले द्वादशवर्षीय सत्र में ब्रह्मचारी ऋषियों को। इस तरह भी महाभारत के तीन संस्करण ठहरते हैं। आज के महाकाव्य काव्य की सामग्री सौति संस्करण की ही मानी जानी चाहिए। उसके बाद भी लोगों ने बहुत कुछ जोड़ा होगा। लगता है, शौनक ने अपने द्वादशवर्षीय सत्र में महाभारत का एक नया संस्करण तैयार कराया। उनके कहने से सौति द्वारा भार्गव वंश का इतिहास भी इसमें सम्मिलत कर लिया गया। पौलोम पर्व के पांचवें अध्याय में कथा आरंभ होने के पूर्व ही शौनक कहते हैं 'उनमें से प्रथम मैं भृगुवंश का ही वर्णन सुनना चाहता हूं।' शौनक भार्गव थे। विष्णु सीताराम सुखणकर ने अपने एक प्रसिद्ध लेख 'भृगुवंश और भारत' में इस तथ्य को विस्तार से उजागृत किया है। सुकथंकर के अनुसार, यह कार्य न व्यास का था, न वैशंपायन का और न सौति का। वास्तविकता यह है कि महाभारत का एक महत्त्वपूर्ण संस्करण भार्गवों के प्रबल और साक्षात् प्रभाव के अंतर्गत तैयार किया गया है। आदिपर्व में पौर्व उपाख्यान, आरण्यक में कार्तवीर्य उपाख्यान, उद्योग में अंबा उपाख्यान, शांति में बिपुलोपाख्यान और अश्वमेध में उत्तंक उपाख्यान भार्गवों के उपाख्यान हैं। जमदग्नि और परशुराम की जन्म-कथा का भूरिषः उल्लेख है। भार्गव परशुराम द्वारा इक्कीस बार क्षत्रियों के नाश करने की कहानी दस बार कही गई है, जिसकी टेक 'त्रिसप्तकृत्वः पृथिवी कुता निःक्षत्रिया पुरा' पर टूटती है। क्षत्रियों के गर्व तोड़ने का उल्लेख तो बीस बार आया है। यही नहीं, भार्गव के देवतुल्य चरित्र कृष्ण, द्रोण, कर्ण आदि के चरित्रों से टक्कर लेते हैं। कहीं-कहीं उन्हें पीछे भी छोड़ जाते हैं। कहना पड़ेगा कि सौति संस्करण में बहुत-सी कथाएं बेतरतीब ढंग से एक कर दी गई हैं। उनमें से बहुत से आख्यान-उपाख्यान अप्रासंगिक लगते हैं।
महाभारत युद्धकथा-मात्र नहीं ठहरता। यदि यह युद्धकथा होता तो इसे शल्यपर्व पर समाप्त हो जाना चाहिए था या अधिक से अधिक सौप्तिक पर्व पर। शांतिपर्व के बाद महाभारत एक दूसरी दिशा की ओर मुड़ जाता है-त्रासदी, करुणा या शांति की ओर। स्त्रीपर्व के बाद शांतिपर्व। महाभारत में यह पर्व आकार में सबसे बड़ा है। इसमें राजधर्म, वर्णाश्रम धर्म, मोक्ष, दर्शन, पांचरात्र आदि के संबंध में विस्तृत सामग्री एकत्र कर दी गई है। यह हिन्दू-धर्म-कोश बन गया है। वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार 'इन अध्यायों में प्राचीन भारत के धार्मिक इतिहास की तीन परतें सुरक्षित हैं। पहली परत में विभिन्न तत्त्वचिंतकों के पृथक मत, उनके अनंतर दूसरी परत में सांख्य आदि दर्शनों की सामग्री और तीसरी परत में शैव एवं पंचरात्र भागवत धर्मों की सामग्री है। शांतिपर्व की शैली और शब्दावली महाभारत के अन्य सर्गों से विशिष्ट है।'
रचना की दृष्टि से सभापर्व सबसे पुराना मालूम पड़ता है, फिर भी इसके संकलन का काल ईसा पूर्व पहली शताब्दी से पहले नहीं माना जा सकता। संभवतः, अनुशासन पर्व और शांति पर्व करीब-करीब एक ही समय संकलित हुए। यह भी कह ले सकते हैं कि अनुशासन पर्व, शांतिपर्व ही का विस्तार है। इसमें कई विषयों की पुनरुक्ति है। शांतिपर्व के 'राजधर्म' प्रकरण में मनुस्मृति से मिलते-जुलते अनेक श्लोक हैं, खासकर राजा की दैवी उत्पत्ति, बाह्मणों के दावे और दंड के महत्त्व के संबंध में यह प्रकरण मुख्यतः उपदेशात्मक है, और ऐसा प्रतीत होता है कि यह शांतिपर्व में ईस्वी सन् की प्रथम और चौथी शताब्दियों के बीच किसी समय सन्निविष्ट किया गया। इसलिए, उत्तर वैदिक काल या वेदोत्तर काल की राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन के लिए शांतिपर्व की सामग्री का उपयोग करना उचित नहीं होगा। राजत्व की उत्पत्ति संबंधी परिकल्पना शांतिपर्व के 'राजधर्म' प्रकरण का सर्वाधिक उर्वर अंश है। इस परिकल्पना में ब्राह्मणवादी दृष्टि से राजपद के औचित्य को बुद्धिपूर्वक सिद्ध करने का प्रथम प्रयास किया गया है।
महाभारत का मनुस्मृति के साथ विलक्षण संबंध है। मनुस्मृति के 260 श्लोक ऐसे हैं जो महाभारत में अक्षरशः पाये जाते हैं। कह सकते हैं कि महाभारत के शांति पर्व में बहुत से ऐसे श्लोक हैं जो अक्षरशः मनुस्मृति में मिलते हैं। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली, 1993, पृष्ठ 34) विद्वानों का मानना है कि इन दोनों ग्रंथों ने एक-दूसरे से इन श्लोकों को नहीं लिया है, बल्कि दोनों ग्रंथों का कोई एक मूल है। (गंगानाथ झा, हिन्दू लॉ इन इट्स सोर्सेज, पटना विश्वविद्यालय, पटना, 1931, पृष्ठ 59)
इसलिए महाभारत में किसी एक काल का नहीं, बल्कि कई कालखण्डों का इतिहास है।
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