Monday, September 7, 2026

जनपद-संस्कृति-कोश है देहाती दुनिया

शिवपूजन सहाय लिखित ‘देहाती दुनिया’ नामक उपन्यास सन् 1926 ई. में हिन्दी पुस्तक भंडार, लहेरियासराय से प्रकाशित एवं ज्ञानमंडल यंत्रालय (कबीर-चौरा, काशी) के माधव विष्णु पराड़कर द्वारा मुद्रित हुआ था। पुस्तक के विवरण में लिखा है-‘पृष्ठ लगभग 200, सुनहले अक्षर से युक्त नये फैशन की रेशमी जिल्द, चमकीला रेशमी बुकमार्क, ऑयल पेपर का चिकना आवरण’ आदि। ठीक यही वर्ष है जब बच्चों की रंगीन और सचित्र मासिक पत्रिका ‘बालक’ का प्रवेशांक रामवृक्ष बेनीपुरी के संपादन व शिवपूजन सहाय की देखरेख में निकला था। ‘देहाती दुनिया’ के चार संस्करण पुस्तक भंडार से निकले। पांचवां तथा छठा संस्करण ग्रन्थमाला कार्यालय, पटना से क्रमशः 1950 एवं 1951 में निकला। इन संस्करणों का मुद्रण हिन्दुस्तानी प्रेस, पटना के देवकुमार मिश्र ने किया। छठे संस्करण के अपने ‘वक्तव्य’ में लेखक ने स्वीकार किया है कि ‘कुछ कठिन परिस्थितियों और अनिवार्य कारणों से विवश होकर ग्रन्थमाला-कार्यालय से प्रस्तुत नवीन संस्करण निकालना पड़ा।’ इस नवीन संस्करण में कोई ‘नया हेर-फेर’ नहीं किया गया है, सिवा इसके कि ‘पिछले संस्करणों की लंबी भूमिका निकाल दी गई है’। इस लंबी भूमिका को 'हमारा गांव' शीर्षक से एक अन्य किताब के रूप में तब्दील होना था।

'देहाती दुनिया' पुस्तक के विज्ञापन में लिखा गया था कि ‘‘इस उपन्यास में देहाती दृश्यों का ऐसा स्वाभाविक वर्णन है कि आप पढ़कर केवल चकित और पुलकित ही नहीं होंगे, बल्कि हँसते-हँसते लोटपोट भी हो जाएंगे। सच पूछिए तो इसमें केवल मधुर और शुद्ध विनोद ही नहीं, अनेक उपदेश भी भरे पड़े हैं। भाषा ऐसी सरल, रसीली, रंगीली, लोचदार, फड़कती हुई, सजीव और सुबोध है कि हलवाहे और मजदूर भी खूब धड़ल्ले से पढ़कर बड़ी आसानी से समझ सकते हैं, और खूब मजा भी लूट सकते हैं। वर्णनशैली तो बहुत ही हृदयग्राहिणी है और सजीव रचनाशैली भी एकदम निराले ढंग की है। बिल्कुल मुहावरेदार भाषा है। रोजमर्रे की बोलचाल की ऐसी सीधी सादी भाषा में ऐसा मनोरंजक और शिक्षाप्रद उपन्यास आजतक हिन्दी में नहीं निकला। मजाल क्या कि एक बार पढ़कर आप अपने दस मित्रों से इसे पढ़ने के लिए साग्रह अनुरोध न करें। हम शर्तिया गारण्टी करते हैं कि यह मौलिक उपन्यास पढ़कर आप अवश्य ही मुग्ध हुए बिना न रहेंगे। विश्वास कीजिए, ‘देहाती दुनिया’ की सैर करके आप निस्संदेह अपने को कृतार्थ मानेंगे।’’ 

पुस्तक के मुखपृष्ठ पर ‘देहाती दुनिया’ को ‘ठेठ देहात का औपन्यासिक चित्र’ बताया गया है। जाहिर है, इसके लेखक ने इसे ‘उपन्यास’ की संज्ञा दी थी। हालांकि उस समय उपन्यास के विषय में जो आम धारणा थी, उसे देखते हुए आलोचक गोपाल राय इसे ‘बेतुकी बात’ कहते हैं। यद्यपि वे मानते हैं कि ‘इधर आकर हिन्दी के अनेक आलोचकों ने इसे हिन्दी का ‘‘पहला आंचलिक उपन्यास’’ घोषित किया है।' ‘देहाती दुनिया’ पुस्तक से यह भी भलीभाँति सिद्ध होता है कि हिंदी साहित्य में ‘उपन्यास’ कितनी लचीली विधा है। अपने उपन्यास की रचना के बारे में बाबू शिवपूजन सहाय लिखते हैं, ‘मैं ऐसी ठेठ देहात का रहने वाला हूं जहां इस युग की नयी सभ्यता का बहुत ही धुंधला प्रकाश पहुंचा है। यहां केवल दो ही चीजें प्रत्यक्ष देखने में आती हैं-अज्ञानता का घोर अन्धकार और दरिद्रता का ताण्डव नृत्य! वहीं पर मैंने जो कुछ देखा सुना है, उसे यथाशक्ति ज्यों का त्यों चित्रित कर दिया है। इसका एक शब्द भी मेरे दिमाग की खास उपज या मौलिक कल्पना नहीं है।’

‘देहाती दुनिया’ ग्रामीण जीवन के अनेक प्रसंगों का संकलन है। इसमें समाज की अनेक झाँकियाँ, जो बिलकुल वास्तविक हैं, प्रस्तुत की गयी हैं। एक तरह से यह जनपद के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का प्रामाणिक किंतु जीवंत दस्तावेज है। जाति व्यवस्था की अमानवीयता, जमींदारी शोषण के दंश से लेकर मध्यवर्ग के जीवन में शिक्षा से जुड़ी उम्मीद तक का चित्रण है। 'भोलानाथ' को पिता समझाते हैं: ‘सुबह मकतब में पढ़ना, खा-पीकर स्कूल में। जब उर्दू और हिन्दी पढ़ जाओगे तब तुम्हें गाजीपुर ले चलूंगा। वहां तुम्हें अंगरेजी स्कूल में भर्ती करा दूंगा। अंगरेजी पढ़कर तुम मुख्तार होगे, वकील होगे, मुन्सिफ होगे, खूब रुपये कमाओगे।’ ‘उपन्यास’ एक छोटे बालक के अवलोकन-बिन्दु से प्रस्तुत किया गया है, यद्यपि बीच-बीच में लेखक इस बात को भूल जाता है, और स्वयं भी कहानी कहने लगता है। 

'देहाती दुनिया’ अपने ढंग की एक विशिष्ट पुस्तक है। इसकी विशिष्टता भाषा एवं शैली को लेकर खास तौर से है। अकारण नहीं है कि उपन्यास ‘हिन्दी के गद्यकवि’ ‘श्रीसूर्यपुराधीश राजा राधिकारमणप्रसाद सिंह, एम. ए.’ को समर्पित है। शिवपूजन सहाय ने हिंदी लेखकों को कभी ‘कहानी का प्लॉट’ दिया था, ‘देहाती दुनिया’ के माध्यम से उन्होंने 'उपन्यास का प्लॉट' मुहैया कराया। भाषा के स्तर पर अधिकतर हिंदी लेखकों का आम जन से जुड़ाव नहीं हो सका, क्योंकि उनके साहित्य की भाषा वह नहीं रही जिसमें आम जन बात करता हो। सहाय जी ने ‘देहाती दुनिया’ में उसी भाषा का प्रयोग किया जो जनपद के लोगों की भाषा थी। इसी जनपदीय भाषा को कुछ आधुनिक लोगों ने 'मातृभाषा' का 'छद्मनाम' प्रदान किया। आज 2026 में, जब ‘देहाती दुनिया’ उपन्यास के सौ साल पूरे हो चुके हैं, पढ़ते हुए पता चलता है कि हम अपनी मातृभाषा के कितने ही शब्दों, मुहावरों, कहावतों आदि से वंचित हो गये हैं। इन अर्थों में, ‘देहाती दुनिया’ उपन्यास जनपद-संस्कृति का एक समग्र कोश है।

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