एक सुबह फेसबुक पर प्रियदर्शन जी की टिप्पणी थी। विषय हिन्दी लेखकों-संपादकों का ‘भाषा-ज्ञान’ था। पढ़कर कुछ पुरानी बातें याद आईं। कुछ अपनी कुछ औरों की।
20 जून, 2021 को ‘फादर्स डे’ था। ह्वाट्सऐप के अपने ‘फैमिली ग्रुप’ में लिखा, ‘‘हमारी पीढ़ी को ‘पिताजी’ अलग-अलग (पिता जी) लिखने के लिए बहुत मार लगी है। जिनको नहीं लगी, ‘पिता जी’ लिख रहे हैं!’’ साली ने मजाक किया-‘‘पुरानी पीढ़ी हो गई आपकी। वर्तनी अब सिर्फ पढ़ने की सहूलियत के लिए है। सही-गलत देखना कम कर दिया है। फेसबुक और ह्वाट्सऐप पर मानकीकरण नहीं चलता।’’ मैंने मजाक को तनिक आगे बढ़ाया। लिखा-‘‘कई साल पहले ‘युवा पीढ़ी’ के एक इतिहासकार ने किसी अभिलेखागार में बाबू वीर कुंवर सिंह से संबंधित एक फाइल में रोमन अक्षर में लिखा burhi शब्द देखा जिस पर बाबू साहब ने कभी एक लाख रुपये खर्च किए थे। ‘नयी पीढ़ी’ के इतिहासकार ने लिखा कि वीर कुंवर सिंह की बूढ़ी हो चली एक रखैल थी जिस पर उन्होंने रुपये खर्च किए। एक जमींदार के बारे में ऐसे निष्कर्ष निकालने की ‘सहूलियत’ भी थी। कुछ दिनों बाद उसी फाइल को ‘पुरानी पीढ़ी’ के एक बिहारी इतिहासकार ने देखा तो burhi को ‘बूढ़ी’ की बजाय ‘बरही’ पढ़ा। लिखा कि कुंवर सिंह ने पोते की ‘बरही’ पर लाख रुपये खर्च किए थे। यद्यपि यह किस्सा है, लेकिन ‘नयी पीढ़ी’ के लिए प्रासंगिक है!’’ एक दूसरा किस्सा भी है, लेकिन दुखद है कि यह यथार्थ है। एक बार कलकत्ते के किसी अंग्रेजी अखबार में एक खबर छपी थी कि पास के किसी जिले के अंग्रेज मजिस्ट्रेट अपने इजलास में बैठे हुए एक मुकद्दमा सुन रहे थे। उस समय मुकद्दमे वालों में से किसी ने कहा कि "इस जमीन पर चिर दिन (बहुत रोज़) से कब्जा है"। साहब ने समझा 'चिर दिन' किसी आदमी का नाम है और आपने 'चिर दिन' के हाजिर किये जाने का हुक्म दे दिया। (महावीर प्रसाद द्विवेदी, साहित्यालाप, खड्गविलास प्रेस, पटना, 1929, पृष्ठ 166)
हम भारतीय विदेशी भाषा के शब्दों का शुद्ध उच्चारण करने की कोशिश करते हैं। ‘हवेनत्सांग’ और ‘माओत्सेतुंग’ को ‘वांगच्वांग’ तथा ‘माओजेडोंग’ होते देर नहीं लगती लेकिन अंग्रेजी काल में ‘मिश्र’, ‘गुप्त’ और ‘मौर्य’ जो ‘मिश्रा’, ‘गुप्ता’, ‘मौर्या’ बना वह आज भी निर्लज्ज रूप से जारी है। गुलेरी जी ने तनिक चुटकी लेते हुए लिखा है, “गीता के दर्शनशास्त्र को निचोड डालनेवाले लेखक भी पारसीधर्म का हाल लिखते समय जरथुश्त को ’जरथुश्ता’ और अहूर-मज्द को ’अहुरामज्दा’ लिख देते हैं।“ (विश्वनाथ त्रिपाठी (सं.), हिंदी नवजागरण के अग्रदूत : चंद्रधर शर्मा ’गुलेरी’, नेशनल बुक ट्रस्ट, 1995, पृष्ठ 19) आज ’योग’ सर्वत्र ’योगा’ बना घूम रहा है। मुझे बी एन कॉलेज के मेरे अंग्रेजी शिक्षक रमेश प्रसाद सिन्हा (अब दिवंगत) की बात याद आ रही है। उनके बच्चे किसी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते थे। एक दिन पूछा उनसे ’पापा, आप भरता जानते हैं?’ पिता ने विश्वासपूर्वक कहा, ’अरे, भरता तो हमलोग प्रायः ही खाते हैं। इसे भुरता या चोखा भी कहा जाता है और यह आलू, बैगन या करैला किसी भी चीज का बनाया जा सकता है।’ बेटे ने पिता के ‘अज्ञान’ का मजाक उड़ाते हुए कहा, ’नहीं, नहीं पापा, भरता तो रामा का यंगर ब्रदर था।’ बेटे का ’ज्ञान’ पिता के सिर के ऊपर से निकल गया। नतीजा हुआ कि मेरे अंग्रेजी शिक्षक ने बेटे का नाम अंग्रेजी स्कूल से कटवा दिया। हिन्दी अनुवादकों में भी निज भाषा को लेकर एक हीनता, उपेक्षा और अगंभीरता का भाव है। हिन्दी अनुवाद की शायद ही कोई गंभीर-से-गंभीर किताब हो (एन सी ई आर टी अपवाद है) जिसमें ‘बिपन चंद्र’ का नाम बिपिन चंद्र न लिखा हो। उच्चारणजनित कुछ भारी भूलें अंग्रेजों ने भी की हैं। ‘ठाकुर’ को ‘टैगोर’ बनाया उन्हीं का है जो आज भी बदस्तूर जारी है।
सुमित्रानन्दन पंत ने ‘सत्य’ शब्द का हमेशा स्त्रीलिंग में प्रयोग किया क्योंकि उन्हें अच्छा लगता था। निराला हमेशा ‘फूलना-फलना’ लिखते रहे। उनका तर्क था कि फलने से पहले फूलने की क्रिया होती है इसलिए फलना-फूलना लिखना अवैज्ञानिक है। लेकिन लोग उनकी सलाह की चिंता किए बगैर आज भी ‘फल-फूल’ रहे हैं। पहले ‘काठ’ से बना ‘कठघरा’ चलता था, अब ‘कटघरा’ लिख रहे हैं। ‘महारथी’ तक ‘महारती’ हो गया-किस विवेक से कहना मुश्किल है। तब बच्चों को समझाना आसान था कि ‘काठ’ से बना है इसलिए ‘कठघरा’ और ‘कई रथों’ का मालिक ‘महारथी’। अब तो राम-रावण दोनों ‘विरथी’ हैं!
निराला जी ने जानकीवल्लभ शास्त्री को लिखा कि आपने “कवितात्व“ लिखा है-कैसे सिद्ध होता है शब्द, लिखियेगा। मैं जानता हूँ, strict grammar के अनुसार व्यक्तिवाचक शब्द (को ?) भाववाचक करने के लिये “ता“, “त्व“ लगते हैं। शब्द “कवि“ व्यक्तिवाचक है, “कवित्व, कविता“ भाववाचक। कवियों ने कविता-कुमारी को personify किया हैः यह वे हर जड़ के लिए कर सकते हैं; पर आलोचक “कविता“ में भाव कैसे पैदा करता है? आप इसे असहृदय न समझियेगा। लोग सत्यता लिखते हैं; रवीन्द्रनाथ को भी लिखते मैंने पढ़ा है, पर “सत्य“ स्वयं विशेष्य है। (-विशेषण तो है ही जिसके कारण लोग “ता“ जोड़ने के आदी हैं। (निराला का पत्र (31/3/36) जानकीवल्लभ शास्त्री को; नंदकिशोर नवल, निराला रचनावली, 8) जानकीवल्लभ शास्त्री को निराला जी की सख्त हिदायत थी कि ‘आप जब तक उर्दू न पढ़ें, उर्दू के किसी शब्द के नीचे बिंदी न लगायें। न वैसा उच्चारण करें।’ इस हिदायत को आज के लेखक कहाँ माननेवाले!
लेखक पैदा करनेवाले पहले संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी थे। कैसे-कैसे लोगों को और किस विधि से उन्होंने ’सरस्वती’ के लिए एक लेखक-समूह पैदा किया, जगजाहिर है। बाबू श्यामसुंदर दास के नाम पत्र (19/10/1923) में आचार्य द्विवेदी ने लिखा, ’मेरे समय की सरस्वती की 17 वर्ष की हस्तलिखित कापियाँ मेरे पास हैं। …उनको देखने से पता लगेगा कि आज कल के हिन्दी के अनेक धुरंधर लेखक किस तरह राह पर लाये गये थे। (बैजनाथ सिंह विनोद, द्विवेदी युग के साहित्यकारों के कुछ पत्र, हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद, 1958, पृष्ठ 48) साहित्यिक दुनिया में इन बातों को लेकर खूब हंसी-मजाक चलता था। प्रचलित है कि एक शाम के. पी. जायसवाल और दिनकर ’गप्प-शप्प’ के मूड में बैठे थे। जायसवाल जी ने शुरुआत की, ’हिंदी में केवल दोय कवि भये।’ दिनकर ने पूछा, ’वे कौन हैं भला?’ उन्होंने कहा, ’एक तो वही चंद, और दूसरा यही हरिचंद।’ दिनकर ने अकचकाकर पूछा, ’और तुलसीदास?’ वे बोले, ’अरे, तुलसिया भी कौनो कवि रहा? उसकी तो बंदरवा न सुधार देता रहा जैसे गुप्तवा की महविरवा।’ लोकश्रुति है कि तुलसीदास की अधूरी कविताओं को हनुमान जी पूर्ण कर देते थे। और इधर तो सर्वविदित ही है कि मैथिलीशरण जी की कविताओं का संशोधन पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी किया करते थे। (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, पृष्ठ 8; मैथिलीशरण गुप्त, श्रद्धांजलि संस्मरण, साकेत प्रकाशन, चिरगांव, 1979)
द्विवेदी जी रचनाओं के ऊपर काफी श्रम करते, आमूल परिवर्तन करते और कभी-कभी शीर्षक भी बदल देते। मैथिलीशरण गुप्त की पहली कविता ’शरद’ अस्वीकृत हुई, परंतु दूसरी कविता ’हेमन्त’ को उचित संशोधन और परिवर्द्धन के साथ ’सरस्वती’ में जगह मिली। दिसंबर 1913 ईस्वी में केशवप्रसाद मिश्र की ‘सुदामा’ शीर्षक लंबी तुकबंदी में उसके दोषों का निर्देश और उन्हें दूर कर कहीं अन्यत्र छपा लेने का आदेश दिया। लक्ष्मीधर वाजपेयी के ’नाना फड़नवीस’ नामक विस्तृत लेख को अत्यंत परिश्रमपूर्वक काट-छाँट के बाद सिर्फ आठ पृष्ठों में छापा। (डॉ. उदयभानु सिंह, महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनका युग, लखनऊ विश्वविद्यालय, पृष्ठ 170)
एक बार ’सरस्वती’ में कवि विशाखदत्त-प्रणीत ’मुद्राराक्षस’ नाटक पर एक लेख छपने को आया था। उसे देखकर द्विवेदी जी ने छापना स्वीकार कर लिया था। उसमें जहाँ-तहाँ पेंसिल से उन्होंने संशोधन भी किया था। लेख के अंत में पेंसिल से एक नया वाक्य लिखा हुआ था। कंपोज होने से पहले उसे देखने का अवसर उक्त लेख के लेखक को मिल गया। उन्होंने द्विवेदी जी की संपादन-पटुता की प्रशंसा कर कहा कि इस अंतिम वाक्य से लेख में सजीवता आ गई है, संशोधन से लेख की श्रीवृद्धि हुई है। (द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ, पृष्ठ 547) इसी प्रकार एक बार ’सरस्वती’ की एक कविता में, कंपोज होने से पूर्व, एक प्रसिद्ध कवि की रचना में से साढ़े तीन पद्य साफ निकाल दिए हैं और अपनी ओर से आधा पद्य जोड़कर रचना के प्रवाह को यथापूर्व कर दिया है। (वही) किन्तु जिस रचना को वे खारिज कर देते उसके ‘उद्धार’ के सारे रास्ते बंद हो जाते। मैथिलीशरण गुप्त को एक पत्र में महावीर प्रसाद द्विवेदी स्पष्ट करते हैं-“आगे से आप सरस्वती में लिखना चाहें तो इधर-उधर अपनी कविताएं छपाने का विचार छोड़ दीजिए। जिस कविता को हम चाहें, उसे छापेंगे। जिसे न चाहें उसे न कहीं दूसरी जगह छपाइए, न किसी को दिखाइए, ताले में बंद करके रखिए।“
’सरस्वती’ के संपादक होने के नाते और लेखकों की पांडुलिपियों को दुरुस्त महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सामूहिक लाभ की दृष्टि से व्याकरण विषयक अशुध्दियों के निवारण हेतु एक योजना बनाई। इस योजना को कार्यान्वित करने के लिए आचार्य द्विवेदी ने नवंबर, 1905 की सरस्वती में ’भाषा और व्याकरण’ शीर्षक एक लेख लिखा था। इस लेख में द्विवेदी जी ने भारतेन्दु हरिश्चंद्र के एक नोटिस से, राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद के विद्यांकुर 23वीं आवृत्ति से, गदाधर सिंह की एक विज्ञप्ति से, राधाचरण गोस्वामी के ’भारतेंदु’ पत्र से, तथा काशीनाथ खत्री की एक सूचना से कुछ व्याकरण विषयक अशुध्दियों का उल्लेख करते हुये एक सर्वमान्य व्याकरण बनने की अनिवार्यता घोषित की थी। (डॉ. नत्थन सिंह, बाबू बालमुकुन्द गुप्त : जीवन और साहित्य, विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा, पृष्ठ 170) इस लेख में द्विवेदी जी ने ’अनस्थिरता’ शब्द का प्रयोग किया था। बालमुकुन्द गुप्त जी ने द्विवेदी जी के ’अनस्थिरता’ शब्द के अशुद्ध प्रयोग पर आपत्ति प्रकट करते हुए उनके भाषा और व्याकरण नामक लेख की प्रत्यलोचना की थी। (डॉ. नत्थन सिंह, गद्यकार बाबू बालमुकुन्द गुप्त, पृष्ठ 168) गुप्त जी ने कहा कि ‘अनस्थिरता’ अशुद्ध है इसलिए ‘अस्थिरता’ लिखिए!
सरदार पूर्ण सिंह के निबंधों में कहीं-कहीं व्याकरण की अशुद्धियां मिलती हैं। उदाहरण के लिए 'नमस्कार किया' के स्थान पर 'नमस्कार की' (पवित्रता), 'युवती कन्या' के स्थान पर 'युवाकन्या' (कन्यादान), 'विद्या उसने नहीं पढ़ी' के स्थान पर 'विद्या वह नहीं पढ़ा' (आचरण की सभ्यता) जैसे प्रयोग चिन्त्य हैं। इसी प्रकार इनका एक वाक्य है-'ईसा को ऐसा ही उपदेश करते हार हुई'। (पवित्रता) यहाँ 'ईसा को' के स्थान पर 'ईसा की' होना चाहिये। यथा-उच्चारण शब्द प्रयोग करने की धुन में सकता के स्थान पर 'सकता' (आधा क) का प्रयोग करते हैं। उदाहरण के लिए-'ब्रह्मचर्य अब इस अपवित्र देश में बिना माता-भक्ति के, कन्या-पूजा के, कभी भी स्थापित नहीं हो सकता (आधा क)। इस देश में क्या कहीं भी ऐसा नहीं हो सकता (आधा क)।' (पवित्रता) उच्चारण संबंधी कुछ त्रुटियां तो फ़ारसी लिपि में लिखने की वजह से भी हुई होंगी। सरदार पूर्ण सिंह प्रायः अपने निबंध फ़ारसी लिपि (उर्दू लिपि) में लिखते थे। पत्रिकाओं के संपादक उनका नागरी में लिप्यंतरण कराते थे। (रामचन्द्र तिवारी, भारतीय साहित्य के निर्माता : अध्यापक सरदार पूर्ण सिंह, साहित्य अकादमी, 1998, पृष्ठ 59)
पद्मसिंह शर्मा ने महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पत्र में लिखा था, ’आजकल के संपादकों के संपादन से जब आपके संपादन की तुलना करता हूँ तो अंतरम् महदन्तरम् प्रतीत होता है। एक बार आपने स्वामी सत्यदेव के प्रसंग में कहा था कि कच्चा माल मांगकर उसे व्यवहारोपयुक्त बनाना पड़ता है। बात बिल्कुल ठीक थी। आजकल तो हिन्दी के अनेक संपादक कच्चे माल में भी कूड़ा-करकट मिलाकर उसे भद्दा बना देते हैं। शब्द-शुद्धि की ओर तो ध्यान नहीं देते, या ज्ञान ही नहीं रखते। (पद्मसिंह शर्मा के पत्र, आत्माराम एन्ड संस, 1956, पृष्ठ 221)
नई पीढ़ी के लेखकों-संपादकों से केवल क्षमा-याचना!
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